विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका

प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका

विदेह नूतन अंक
वि दे ह विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly ejournal विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका नव अंक देखबाक लेल पृष्ठ सभकेँ रिफ्रेश कए देखू। Always refresh the pages for viewing new issue of VIDEHA.

२.२२.श्रीधरम- शरदिन्दु कुमार चौधरीक साहित्य : 'स्वारथ लागि करहिं सब प्रीती'

श्रीधरम

शरदिन्दु कुमार चौधरीक साहित्य : 'स्वारथ लागि करहिं सब प्रीती'

आदिकाल सँ मुख्य रूपें दू प्रकारक साहित्यकार होइत रहलाह अछि। पहिल राजा-महाराजा आकि सत्ताक लेल चारण कोटिक साहित्य लिखनिहार आ दोसर समाजक लेल जनसाहित्य लिखनिहार। ओना कलावादी ललित-साहित्यकारक सेहो अपन ख्यात परंपरा रहल अछि। राजा-महाराजा सँ  भेटय बला अशर्फी-तमगाक स्थान आब लोकतंत्री सरकारी पुरस्कार ल' लेलक अछि। वर्तमान मे एहन 'अधसर' लेखक-कवि सभक पैघ संख्या अछि जे सामाजिक यथार्थ आ जन-साहित्य लिखबाक स्वांग मात्र करैत छथि, मुदा भीतर-भीतर पुरस्कार-तमगा पयबाक लेल कुचक्रक नाली मे डुबकी लगबैत रहैत छथि। ओना सभ काल मे एहन लेखक-बुद्धिजीवी होइत रहलाह अछि जे 'संतन को कहाँ सीकरी सों काम ?...' कहि सत्ताक अभिमान कें मर्दित करैत रहलाह। साहित्यक इतिहास मे दुनू प्रकारक उदहारण उपलब्ध अछि। मैथिली साहित्य सेहो एहि प्रवृत्ति सँ विलग नइँ अछि। मैथिलीक-साहित्यक दुर्भाग्य ई छै जे जेना-जेना ई भावुकताक शिकार भ' 'मां-मैथिली' बनि किछु खास वर्ग आ जातिक चाँगुर मे फँसैत गेल, तेना-तेना एकरा सँ पाठक छिटकैत चलि गेल। आलोचना पर पुरस्कारक गोलैसी हावी होइत चलि गेल आ साहित्य-लेखनक उद्द्येश्य अकादेमी आ अन्य पुरस्कार पयबा लेल तोड़-जोड़ धरि सिमटि क' रहि गेल। एहना मे इमानदार साहित्यकार लेल कुंठित होयब सेहो स्वाभाविक अछि।

 

साहित्यकारक लेल कथनी आ करनी मे एकरूपता होयब परम आवश्यक। ओना एहन साहित्यकार कें आंगुर पर गानल जा सकैत अछि। पोथीक संख्या किंवा ओकर ओजन सँ कोनो साहित्यकारक लेखनक गुणवत्ताक नइँ मूल्याङ्कन कयल जा सकैत अछि। शरदिन्दु कुमार चौधरी एहने लेखक-पत्रकार छथि जिनकर लेखनक पन्ना चाहे कम छनि, पोथीक ओजन चाहे बहुत कम छनि मुदा हुनकर शब्दक ओजन एतेक भारी छनि जे कहियो ओकरा मैथिली साहित्य सँ मिटायल नइँ जा सकैत अछि। शरदिन्दु जीक लेखनक आत्मा व्यंग्य छनि जाहि मे हास्य ठोर पर अबै सँ पहिने बिला जाइत अछि। ताहू मे ओ व्यंग्य कें संस्मरण आ रिपोर्ताज संगे गुँथि दैत छथि। व्यंग्य लीखब अपना आप मे तलवार केर धार पर चलब होइत छै। जकरा व्यक्तित्व मे ईमानदारी नइँ छै, कथनी आ करनी मे फाँक छै, तकरा लेल व्यंग्य लिखब असंभव अछि। व्यंग्यकार कें सब सँ पहिने अपन लेखन के कीमत गमाब' पड़ैत छै। से कीमत निःसंदेह ई लेखक सेहो गमेने हेताह, ताहि मे कोनो शंका नइँ। व्यंग्य मूलतः प्रवृतिगत होइत अछि, व्यक्तिगत नइँ। व्यंग्य मे व्यक्ति-चरित्र अंततः प्रवृत्ति बनि जाइत अछि। ई अलग बात जे शरदिन्दु जीक व्यंग्य मे कएक ठाम व्यक्ति, चरित्र आ प्रवृत्ति पर भारी पड़ि जाइत अछि।

      

      शरदिन्दु कुमार चौधरीक चारि टा व्यंग्य-संग्रह प्रकाशित छनि- 'जँ हम जनितहुँ', 'बड़ अजगुत देखल', 'गोबर गणेश' आ 'करिया कक्काक कोरामिन'। एहि व्यंग्य सभ मे साहित्य सँ समाज धरिक विद्रूपता पसरल अछि। लेखक 'जँ हम जनितहुँ' के भूमिका मे लिखैत छथि जे ओ मैथिलीक जाहि व्यक्ति सभक संपर्क मे अयलाह सैह हुनकर व्यंग्यक आलंबन बनैत गेलाह। हुनके शब्दें- "हुनका लोकनिक (व्यक्तित्वक) आकलन करब जतेक कठिन बुझायल अछि ताहि सँ सरल फूसि बाजब बुझाइत अछि। दोहरी चरित्रक निर्वाह करब जतेक सरल बुझायल ताहिसँ बेसी कठिन हास्य आ व्यंग्य कें फरिछायब बुझायल।" यैह कारण थिक जे  हिनकर व्यंग्य मे एक सँ एक व्यक्तिचित्र भेटैत अछि से प्रतीक अथवा छद्म रूपें नइँ अपितु अपन मूल नामक संग मुदा असली चरित्र मे बेनकाब होइत। जहिया सँ साहित्य अकादेमीक तोड़ा मैथिली कें भेट' लागल तहिया सँ प्रायः अधिकांश पाठक उर्फ लेखक केर क्रांति एही 'तोड़ा' धरि पहुँचबा लेल सीमित होइत गेल। एहि क्रम मे एक सँ एक प्रतिभा कें कतियाबैत एहि पुरस्कारक बन्दरबाँट होइत रहल। शरदिंदु जीक एहि पोथीक पाहिले शीर्षक थिक 'अथ ऑपरेशन साहित्य अकादमी'। ई व्यंग्य दू शताब्दीक मुहाँन पर लिखल गेल अछि जे 'साहित्य अकादमी' पुरस्कारक तोड़-जोड़ आ गोलैसी कें रेखांकित करैत अछि। मैथिली मे जे व्यक्ति साहित्य अकदेमीक प्रतिनिधि होइत अछि से कोना ओकरा अपन बपौती मानि अपन संतति अथवा कुल-खानदान कें अकादमिया-लेखक बना दैत अछि तकर प्रमाण अछि ई व्यंग्य। एहि मे दू व्यक्ति लेखक बनबाक आ अकादेमी हथियेबाक प्लान बना रहल अछि- "हम आ तों, भोला आ बमभोला मिलि क' तेहन-तेहन ने गोला छोड़ब जे बड़का-बड़का पागधारीक मुँह तौला जकाँ खुजले रहि जयतनि आ हम आ तों सर्र द' आकाश चढ़ि जायब जेना एखन एकटा ससुर-जमायक जोड़ी साहित्य अकादमीक अकाशमे विचरण क' रहल छथि।"

मैथिलीक नाम पर जतेक सरकारी अथवा गैर सरकारी संस्था सभ अस्तित्व मे आयल तकर कर्ता-धर्ता दिनानुदिन वर्ण-व्यवस्था जकाँ जन्मना आ मजगूत होइत गेल। वर्णव्यवस्था भले कनेमने ढील भेल हो मुदा एहि संस्था सभक व्यवस्था पर एखनो खानदानी राज कायम छै- "जेना चेतना-समितिमे कतबो कटाउझ होइ छै, तैयो ओकर बागडोर एक्के (काका-भातिज) घरमे रहैत छै तहिना हमारा भेटय की तोरा, रहत तँ अपने घरमे ने।" अकादेमी पुरस्कारक अंतर्व्यूह रचना पर जँ शोध कैल जाए त' एकर माठाधीसी परंपराक कतेको गूढ़ रहस्य पर सँ पर्दा उठि सकत। ई अलग बात जे कतेको उल्लेखनीय पोथी कें ई पुरस्कार भेटल अछि मुदा प्रश्न ई अछि जे की ओ पुरस्कार उचित आ ईमानदार प्रक्रिया सँ भेटल आकि माठाधीसक सामने दंडप्रणामी सँ, से उल्लेखनीय अछि। पहिने एहि पुरस्कारक आकर्षण नकदी छल मुदा आब मैथिलीक लेखक-कवि सभ त' अयाची, यात्री, चंद्रभानु टाइप त' रहलाह नइँ, तें कैक बेर सुनबा मे ईहो अबैत अछि जे अभ्यर्थी पुरस्कारक मूल राशिक त्याग करैत सूद मे होटल-बोतल आदिक बलें अकादमीक मोमेंटो आ प्रशस्तिपत्र पयबा मे सफल होइत अछि। एमहर त' ईहो सुनल गेल जे पुरस्कार पयबा लेल मृतक सेहो उठि बैसल आ पोथी लिखि क' अपन झंडा बुलंद केलक। आब एहि सँ अधिक माँ मैथिलीक सेवा की भ' सकैत अछि? असल मे शरदिन्दु कुमार चौधरीक लेखन भने ऊपर सँ प्रतिगामी बुझाइत अछि मुदा कने विलमि क' सोचू त' हुनका भीतरक मातृभाषा प्रेमक सोता देखा पड़त जे एकटा नैतिक आ ईमानदार कलमे टा सँ संभव अछि।

शरदिन्दु जीक चिंताक केंद्र मे अछि मैथिल समाज, मैथिल पाठक, तें ओ मैथिली उद्धारक नाम पर मैथिली कें अहित कर' बला व्यक्ति आ प्रवृत्ति पर बेर-बेर चोट मारैत छथि आ एहि क्रम मे ओ कोनो छद्म आवरण आकि प्रतीक के सहारा नइँ लैत छथि। मैथिलीक संस्था हो आकि मैथिलीक पत्रकारिता, अध्यापन हो आकि लेखन-सब ठाम लालची आ भ्रष्ट लोकनिक जुटान अछि। एक-दोसराक रचना कें अपन मरौसी बनेबाक लेल उताहुल। आ सभ सँ बत्तर स्थिति तँ मैथिलीक अध्यापक-अकादमिक दुनिया के अछि जत' किछु अपवाद कें छोड़ि क' एक सँ एक पोंगापंथी सभ भरल अछि। 'अपील' शीर्षक व्यंग्यक ई पंक्ति एहि क्षेत्रक बखिया छोड़ेबाक लेल काफी अछि- "जहिया मैथिली पढ़बा लेल पटना विश्वविद्यालयमे नाम लिखौलहुँ तहिये श्रीमान् पाठकजी सन क्रोधी, श्रीमान् दिनेशजी सन भोगी आ श्रीमान् इन्द्रकांत जी सन लोभी गुरुजीसँ भेंट भेल छल। परिणाम ई भेल जे मैथिलीक पढ़ौनीसँ मन उचटि गेल आ मैथिली सँ प्रेम भ' गेल।" शरदिन्दु जी मैथिलीक स्वनामधन्य रचनाकार आ सम्पादक सुधांशु शेखर चौधरीक पुत्र छथि। साहित्य आ मैथिली प्रेम हुनका विरासत मे भेटलनि। आ यैह हुनकर कमजोरी सेहो बनि गेलनि। ओ राजनीतिशास्त्र मे स्नातकोत्तरक संग एलएलबीक डिग्री सेहो लेने छथि। ओ जँ चाहितथि त' कोनो विश्वविद्यालय मे प्रोफेसरी क' सकैत छलाह, कोनो कोर्ट मे वकील बनि तीन-पाँच क' सकैत छलाह। से सब किछु छोड़ि क' मैथिली प्रकाशनक मरुस्थल मे आबि, जीवन यापन करबाक हुनक जिद निःसंदेह मैथिली भाषाक प्रति अटूट प्रेमक परिणाम रहल होयत। मुदा एत' आबि जखन एहि दुनियाक खुरपैंची सँ ओ अवगत भेल होयताह त' मोहभंगक स्थिति स्वाभाविक अछि। यैह कारण अछि जे हुनक व्यंग्य अथवा संस्मरण यथार्थक धार सँ माँजल एतेक नग्न अछि जे कैक बेर पाठको कें अनसोहाँत सन बुझा सकैत छै।

असल मे पाठक जाहि रचनाकारक रचना पढ़ि हुनका अपन प्रिय बना लैत अछि, भावनात्मक रूपें हुनका सँ जुड़ि जाइत अछि, हुनकर व्यक्तित्व पर कोनो दाग लगिते ओ ढाल बनि ठाढ़ भ' जाइत अछि। आ एत' ' एक्को घर नइँ बारल गेल अछि। हमरा जनैत यैह कारण रहल होयत जे शरदिन्दु जीक रचनाक जे मूल्याङ्कन हेबाक चाही छल से नइँ भ' सकल। सभ क्यो चर्चा कर' सँ कतराइत रहल होयताह। कोनो समाज अथवा राष्ट्रक जनता भ्रष्ट भ' जाय त' ओकरा लेखक आ बुद्धिजीवी वर्ग रस्ता पर अनैत अछि, मुदा जँ लेखके बुद्धिजीवी भ्रष्ट भ' जाय त' ओहि समाजक केहन अराजक स्थिति भ' सकैत छै, तकर कल्पना कैल जा सकैत अछि। यैह कारण अछि जे शरदिन्दु जीक कलम केर नोक पर सब सँ पहिने लेखक-बिद्धिजीवी वर्ग अबैत अछि- "गुंडा-बदमाश कें हल्ला-गुल्ला, मारि-पीटि करैत देखैत छिऐक तँ ई होइत अछि जे जँ बुद्धि रहितैक तँ ऐना नइँ करितय। मुदा पढ़ल-लीखल साहित्यकार, ओकील, नेता-अभिनेता, डॉक्टर, इंजीनियर, अधिकारी-पदाधिकारी आदि बुद्धिजीवी कें जखन आपसमे कटाउझ करैत, तू-तू, मे-मे करैत देखैत छिऐक तँ हठात कुकुरक हेंज मोन पड़ि जाइत अछि।" आ फेर एहि पंक्ति पर ध्यान दी- "एहन-एहन नेताजीकें होइत छनि जे जेँ हम छी तेँ मैथिली टिकल अछि आ संस्था चलि रहल अछि मुदा हुनका ई नइँ सूझैत छनि जे जाहि पदपर ओ छथि तत' सँ एकोरत्ती जँ जोर लगा देथिन तँ एकटा संस्था कें के पूछय कैकटा संस्था कें उसाहि देथिन। साहित्यकारक बीच उतराचौरी आ पछाड़-सम्हार आदि प्रवृत्तिक सम्यक विवेचन फगुआक बहन्ने 'देखल एक शूर्टिंग' आ 'स्वास्थ्य रक्षा पुरस्कार' मे भेल अछि। 'एकालाप' शीर्षक व्यंग्य सेहो अही कड़ीक विस्तार थिक। असल मे ई लेखक, बुद्धिजीवी चारित्रिक आ नैतिक पतन सब सँ अधिक खिन्न छथि से वर्त्तमान मे बहुत प्रासंगिक अछि। आइ जाहि तरहें बुद्धिजीवी-लेखक-पत्रकार सभ सत्ताक पाछाँ पीकदान ल' चारण परंपरा कें चरम धरि पहुंचा क' लोकतंत्रक चटनी बना रहल छथि, एहना मे शरदिन्दु जीक चिंता प्रासंगिक भ' उठैत अछि- "आ आब तँ ई बुद्धिजीवी वर्ग चारिम खंभा बनिक' सभ हलकान मे 'रंभा हो, रंभा हो' क ताल पर नृत्य करैत 'तहलका' मचा रहल अछि।"

शरदिन्दु कुमार चौधरीक राजनीतिक चेतना स्पष्ट छनि। ई अलग बात जे अस्मितावादी विमर्शक एहि समय मे हुनक किछु वक्तव्य आकि 'टोन' एहन अछि जकर पक्ष मे नइँ गेल जा सकै अछि। हुनकर एक टा व्यंग्य छनि 'प्लेटोक सपना, भारत आ कौमार्य-राजनीति'। ई निबंध भले लगभग बीस साल पुरान हो मुदा एकर अनुगूँज एखनो सूनल जा सकैत अछि। एहि आलेख सँ साम्प्रदायिकताक प्रति लेखकक आलोचनात्मक दृष्टिकोण स्पष्ट रूपें सामने आबि जाइत अछि। एहिना लेखकक स्त्रीक प्रति संवेदनशील दृष्टिकोण 'अहाँ की करबै?' शीर्षक व्यंग्य मे देखल जा सकैत अछि जत' आधुनिक सामाजिक परिवर्तनक नजरिए दाम्पत्य जीवनक हास-परिहासक बीच एक टा गीतक मादे स्त्री-चेतना कें रेखांकित कैल गेल अछि। करिया कक्का कें काकीक ई जवाब ध्यातव्य अछि- "कहलहुँ ई जे स्त्रीगन मे जे धैर्य, काजक प्रति निष्ठा आ लगाव होइत छैक से पुरुष मे कत' सँ हेतैक ओ तँ एके छड़पान मे झंडा गाड़य जनैत छैक आ से जँ नहि भेलैक तँ एहिना कोनो गप्प उछाह' लगैत छैक।" मैथिली मे 'गोलैसी' शब्द आलोचनाक पारिभाषिक शब्दावली बनि गेल अछि। बिना गोलैसी के मैथिलीक पुरस्कार अथवा समीक्षा आकि पत्रकारिताक कल्पने नइँ कैल जा सकैत अछि। अपन एही शीर्षक निबंध में शरदिंदु जी एहि शब्द कें एहि रूपें परिभाषित करैत छथि- "ओना शाब्दिक अर्थ कें छोड़ि जँ ठेंठ अर्थ भजिआओल जाय तँ 'गोलैसी ओहि निति कें कहल जाइछ जाहिमे एकटा व्यक्ति वा गुट दोसर व्यक्ति, गुट, समूह वा व्यक्तिक निंदा करैत अपन गुट अथवा अपन स्वार्थ पूर्ति लेल निर्लज्ज भ' ओहि व्यक्ति अथवा समाजक अहित कारबामे आनंद अनुभव करय।" गोलैसीक एहि परिभाषा मे जे व्यंग्य निहित अछि तकर गूंज मैथिली साहित्य मे 'अनुरणन ध्वनि' जकां सुनल जा सकैत अछि।

 

'बात बात पर बात' चारि सीरिज मे छपल शरदिंदुजीक संस्मरण छनि। मुदा ई संस्मरण सभ पारंपरिक विधा सँ अलग टिप्पणी छनि। एहि टिप्पणी सभ लेल ओ कहैत छथि जे 'जत' प्रवृत्ति दुष्प्रवृत्ति बनि प्रगट भेल हो ओत' हमर बात कने कटु अवश्य भ' गेल अछि। ओ भूमिका मे अहू बात कें रेखांकित करैत छथि जे "हमर बात सभ मुख्यतया अथवा पूर्णतया सत्य पर आधारित अछि तें किछु गोटे कें अप्रिय अवश्य लगतनि मुदा ई सत्य किछु गोटेकें प्रिय सेहो लगतनि। हँ जिनका अप्रिय लागनि से अवश्ये अपन छाती पर हाथ राखि सोचथि जे हम कतहु सत्य सँ दूर त' नहि भेल छी।" शरदिंदुजीक एहि संस्मरण सभ कें ध्यान सँ पढ़ला सँ स्पष्ट होइत अछि जे मैथिली आन्दोलन, प्रकाशन, शिक्षण, साहित्य आ समाज कें ल' ' हुनक चिंता आ सरोकार जमीनी आ तटस्थ छनि। ओ पत्रकार छथि तें एहि समस्या सभक प्रति भावुकताक शिकार नइँ होइत छथि आ मैथिलीक नाम पर पसरल गोलैसी, भाई-भतीजावाद आ व्यक्तिक गिरगिटिया-चरित्र कें स्पष्ट रूपें रेखांकित करैत छथि। हुनकर चिंताक केंद्र मे मैथिलीक पाठक आ विद्यार्थी सभ अछि जाहि पर बहुत कम ध्यान देल जाइत अछि। पाठक निर्माणक लेल प्राथमिक स्तर पर मैथिलीक शिक्षण आ पत्र-पत्रिकाक प्रकाशन पहिल शर्त जकाँ छै, जाहि लेल वर्तमान मे बहुत कम प्रयास भेल आ भ' रहल अछि। जे व्यक्तिगत प्रयास एहि क्षेत्र मे भेल तकरो अपन सीमा छै। मैथिली पत्रकारिता के सन्दर्भ मे शरदिंदु जीक चिंता बहुत जेनुइन अछि- "दुर्भाग्य मैथिलीक छै जे पत्रकारिता जगत में पचास प्रतिशत सँ बेसी मैथिल कार्यरत छथि मुदा ओ मैथिली भाषा मे किछु नइँ लिखताह। मानहानि अथवा स्तरहीनताक बोध हुनका होइत छनि। ख़ासक' ओ मैथिली लेखनकें हीन बुझैत छथि। तें आइ स्थिति ई छनि जे ओ दोसरक खेत तामैत-कोड़ैत छथि आ दोसर हुनकर खेतकें चरिकें चलि जाइत छनि।" शरदिंदु जीक एहि चिंता संग ईहो जोड़ब उचित जे ई पत्रकार सभ मैथिली में किएक नइँ लिखैत छथि। जा धरि आर्थिक उपार्जनक साधन मैथिली पत्रकारिता नइँ बनत, ताधरि ई चिंता बनले रहत। जीवन यापन लेल प्रेम सँ पहिने अर्थक आवश्यकता होइत छै।

"मैथिल संस्था : 'छी छा' सँ 'दूर-दूर छिया-छिया' धरि" मे लेखक मैथिली संस्था सभक पोस्टमार्टम करैत छथि। ओ सूचना दैत छथि जे भारत भरि मे लगभग डेढ़ सौ मैथिली संस्था अछि मुदा सभ अपन-अपन डपोरशंख फूकबा मे व्यस्त आ मस्त। विद्यापति पर्वक नाम पर गीत-नाद, नाच-गान धरि सीमित एहि संस्था सभ द्वारा समवेत रूपें जँ पोथी आ पत्रिका लेल ठोस पहल होइ त' निःसंदेह मैथिलीक कल्याण भ' सकैत छै। मिथिला मे लाखो रुपैया लगा क' एक सँ एक यज्ञ होइत अछि, श्राद्धक नाम पर लाखो बुकि देल जाइत अछि मुदा एक टा पत्रिका अथवा पोथी कीनबाक इच्छा कतेक लोक मे होइत छै? असल मे मिथिलाक वृहत्तर समुदायक बीच 'मैथिल जातीयता'क विकासक लेल कोनो प्रयास नइँ भेल, जकर परिणाम आइ सोझाँ अछि।

'मर्मान्तक' मे किछु व्यक्तिगत आ पारिवारिक संस्मरणक संग सामाजिक-सांस्कृतक विषय सभ पर टिप्पणी कैल गेल अछि जाहि मे शरदिंदु जीक वृहत्त्तर सामाजिक-सांस्कृतिक सरोकारक दिग्दर्शन होइत अछि। भाव अथवा मनोभाव पर लिखब अत्यंत कठिन होइत अछि। मानव स्वभाव सँ अंतर्मुखी आ अपना प्रति व्यामोह सँ ग्रस्त रहैत अछि तें ओ दोसराक भीतर बेसी झांकैत अछि। लेखक एहि संकलन मे आस्था, भय, चित्तवृत्ति, सुख-शांति, घृणा, पीड़ा, इच्छा, तनाव आदि विषय पर जे टिप्पणी करैत छथि से दार्शनिकता, मनोवैज्ञानिकताक संग-संग अनुभव आ मानवता सँ ओतप्रोत अछि। कोनो रचनाकार लेल अपन जातीय-धार्मिक सीमा सँ ऊपर उठि मनुष्य बनब पहिल शर्त थिक। कोरोना महामारी सम्पूर्ण दुनिया कें ठमका देलक। मंदिर, मस्जिद, गिरिजा आ गुरुद्वारा सभ पर ताला लगा देलक। मुदा की आस्थाक नाम पर समाज मे पसरल कट्टरता कें कोरोना कम क' सकल? शरदिंदु जी अपन आस्था शीर्षक टिप्पणी मे लिखैत छथि- "की आस्था मरि जायत। की आस्थाक रूप में परिवर्तन होयत! की आस्थाक प्रति कट्टरतामे कमी आओत! की आगाँ विभिन्न सम्प्रदायमे आस्थाक टकराहटि कम होयत। कोरोना आगाँ जे करय, आस्थाकें घर-घर पसारि दिअय वा समेटि क' एकठाम क' दिअय एखन तँ आस्था एकेठाम केन्द्रित अछि- कहुना हमर प्राण बाँचि जाय बादमे सोचल जायत जे कतय माथ झुकाबी।" मुदा ई देखल गेल जे जेना-जेना कोरोना घटैत गेल तेना-तेना आस्थाक नाम पर घृणा आ तकरारक खेती पुनः शुरू भ' गेल। एहि सँ ईहो स्पष्ट होइत अछि जे आब लोक 'आस्तिक' सँ बेसी 'धार्मिक'' गेल अछि।

'हमर अभाग हुनक नइँ दोष' मे किछु एहन व्यक्तिगत प्रसंगक चर्चा अछि जे व्यक्तिक दोहरापनक संग, लोलुपता आ 'विषकुम्भम पयोमुखम' बला चरित्र कें सोझाँ अनैत अछि। बिच्छू कखनो पाछाँ सँ नइँ डंक मारैत अछि, आकि साँप कखनो पीठ पर नइँ डसैत अछि, किएक त' एकरा सभ लग मानव जकाँ विकसित दिमाग नइँ होइत छै। ई सौभाग्य मनुष्ये कें भेटल छै। आ बुद्धिजीवी लोकनिक दिमाग त' सामान्य सँ किछु बेसिए विकसित होइत अछि तें हुनकर 'विष' अन्तःसलिला रहैत अछि। वर्ष 2021 मे मैथिली अकादेमी अपन पत्रिकाक प्रूफ पढ़बा लेल 280/- रुपैया दैत अछि सेहो कतेक तागेदाक बाद। जँ सरकारी संस्थाक ई आर्थिक हालत छै, तखन बिहारक नेता सभ कें मैथिलीक संस्था सभ कोन मुहें पाग-डोपटा पहिरा क' मंच पर बैसा चारण-गान करैत अछि से विचारणीय अछि। एहने किछु प्रसंग सभक चर्चा एहि खंड मे भेल अछि जे लेखकीय इमानदारी आ तटस्थताक प्रमाण थिक। एहिना 'साक्षात्' मे स्वयं द्वारा लेल गेल अपन साक्षात्कार अछि। जाहि मे एक टा प्रसंग एहन मार्मिक अछि जे एहि बात दिस इशारा करैत अछि जे कोनो व्यक्ति जँ मैथिली सेवाक (प्रकाशन, पत्रकारिता आकि लेखन) बलें अपन जीवन यापन कर' चाहत त' ई समाज ओकरा कतेक रिटर्न देतै। अपन जीवनक सब सँ पैघ गलती आ कचोट कें अभिव्यक्त करैत ओ लिखैत छथि- "हम अपन एकमात्र पुत्र राजशेखर कें इंजीनियरिंगक पढ़ाइक खर्च नइँ द' सकलियनि जे कि हुनकर सभ सँ पैघ लक्ष्य रहनि। ओ इंटरक बाद ओहि हेतु चयनित सेहो भ' गेल छलाह मुदा...। आ एतहिए सँ हमर जीवनक दिशा ओ दशा बदलि गेल, हम निर्जीव-निराकार मनुष्यक रूप मे अपन काया ल' ' पृथ्वीक भार बनल जीव रहल छी। अहाँ एकरा पुत्र-मोह कहि सकैत छी, से तँ छैके, मुदा एहि 'केस' मे हम दायित्व आ कर्तव्य सँ च्युत भेल छी।"

असल मे 'बात बात पर बात' चारि खंड मे प्रकाशित शरदिन्दु जीक संस्मरणात्मक आत्मकथा थिक जकरा पढ़ैत ह्रदय मे एक टा टीस उठैत अछि जे मैथिली आ मिथिलाक लेल एक टा जेनुईन चिंता कर' बला व्यक्ति कें ई समाज कतेक प्रतिदान करैत अछि।

'विदेह' ई अंक निकालि क' शरदिंदु कुमार चौधरीक लेखनक मूल्याङ्कन करबाक आरम्भ केलक अछि, ताहि लेल हुनक कर्ता-धर्ता लोकनि कें बहुत बहुत आभार आ धन्यवाद।

शरदिन्दु जीक रचना सभ कें पढ़ैत तुलसीदासक ई पंक्ति बेर बेर मन पड़ैत अछि किएक त' तुलसी देवतो लोकनिक चारित्रिक दुर्गुन पर व्यंग्य कर' सँ नइँ चुकैत छथि-

 "सुर नर मुनि सब कै यह रीती।

स्वारथ लागि करहिं सब प्रीती।।
 
    

सम्पर्क- डॉ श्रीधरम, असिसटेण्ट प्रोफेसर, हिन्दी विभाग, आत्मा राम सनातन धर्म कॉलेज, धौलाकुँआ (दिल्ली विश्वविद्यालय), निवास- बी-२७७-, वसंत कुंज एनक्लेव, नई दिल्ली ११००७०, मो. ९८६९३२५८११

 

अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ।