
गजेन्द्र ठाकुर
रमेशक कविता-समय: विस्तारक उन्माद आ संकोचक विवेकक बीच- एकटा समग्र मूल्यांकन
.
कविता-संग्रह कविता-समय (पाथर पर दूभि, समवेत स्वरक आगू, सङोर आ नागफेनी) केर भारतीय आ पाश्चात्य साहित्यिक सिद्धान्तक आधार पर समीक्षा आ ओकर सीमाक रेखांकन
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भारतीय काव्यशास्त्र (रस, ध्वनि, अलंकार, वक्रोक्ति, औचित्य), पाश्चात्य सिद्धान्त (मार्क्सवाद, उत्तर-उपनिवेशवाद, नारीवाद, पर्यावरण-समीक्षा, आधुनिकतावाद, उत्तर-संरचनावाद) आ तुलनात्मक दृष्टिकोणक।
पहिल खण्ड
१. भारतीय काव्यशास्त्रक आधार पर समीक्षा
१.१ रस सिद्धान्त
भरतमुनिक नाट्यशास्त्र मे प्रतिपादित रस सिद्धान्त ऐ संग्रहक केन्द्रीय आधार अछि। रमेशक कवितामे बहुबिध रसक सफल अभिव्यक्ति भेटैत अछि।
करुण रस (स्थायी भाव: शोक)
कोसी-चक्रक कविता सभमे करुण रसक प्रबल अभिव्यक्ति भेल अछि। कोसी-लोक, मरसीया, कोसी-गीत जकाँका कविता सभमे बाढ़ि, विस्थापन, मृत्यु आ निराश्रयताक चित्रण करुण रसक सशक्त उदाहरण अछि।
तीन दिन भए गेलै नाह पर।
भावहु-बेटी-बेदरा के लाजें
नद्दी ने फीड़ल जाइ छै।
मरसीया
एतय नदी ने फीड़ल जाइ छै कहि क प्रकृतिक निष्ठुरताक संग-संग मानवीय असहायताक द्वारा करुण रसक उद्बोधन भेल अछि।
वीभत्स रस (स्थायी भाव: जुगुप्सा)
लोहक मनुक्ख आ सरकारक परिभाषा सन कविता सभमे पूँजीवादी शोषणक वीभत्स चित्रण भेटैत अछि।
सभकियारीक
सभ पौधा केँ
एक्के रंग पटबिहें।
-भगतिसंहक वसीयतनामा
एतय मानवीय विविधता आ प्रकृतिक वैविध्यक एकरंगीकरण (homogenization) वीभत्स रसक सृजन करैत अछि।
शान्त रस (स्थायी भाव: निर्वेद)
आकांक्षा, जीयब-मरब, अ/नियति सन कविता सभमे संसारिक आकांक्षा सभक अन्तिम निर्वेदक भाव शान्त रसक रूपमे व्यक्त भेल अछि।
जिजीविषामे हिचकीकँ विलीन करैत समदाउनिक भास कँ, आ नाद-स्वरसँ केना आरोह-अवरोहक ऊर्जस्वता अबैए से भीतर धरि देखबैत छथि।
शृङ्गार रस (स्थायी भाव: रति)
ई प्रेम-पत्र नहि थिक!, आदिम राग सन कविता सभमे शृङ्गार रसक अभिव्यक्ति भेल अछि, मुदा ई पारम्परिक शृङ्गार नै भ आधुनिक, शारीरिक आ मनोवैज्ञानिक शृङ्गार छी।
रौद्र रस (स्थायी भाव: क्रोध)
विद्रोह, भगतिसंहक वसीयतनामा, एकबार सँ जका कवितासभमे शोषण-विरोधी क्रोध रौद्र रसक रूपमे व्यक्त भेल अछि।
१.२ ध्वनि सिद्धान्त
आनन्दवर्धनक ध्वन्यालोक मे प्रतिपादित ध्वनि सिद्धान्त अनुसार, रमेशक कवितामे व्यङ्ग्यार्थ (suggested meaning) कऽ सफल प्रयोग भेल अछि।
वस्तुध्वनि (Factual suggestion)
कोसी-सरकार मे घोड़ाक माध्यम सँ सरकारी तन्त्रक व्यङ्ग्यात्मक चित्रण ध्वनिक माध्यम सँ वस्तु-स्थितिक उद्घाटन करैत अछि।
अलंकारध्वनि (Figurative suggestion)
लोहक मनुक्ख मे लोह (iron) शब्दक बारम्बार प्रयोग ध्वनित करैत अछि जे मनुष्य आब यन्त्रवत्, निष्ठुर, आ संवेदनाहीन भ गेल अछि।
रसध्वनि (Emotive suggestion)
सदानीरा-तट पर... मे प्रकृति आ मानवक सम्बन्धक चित्रण रसध्वनिक उत्कृष्ट उदाहरण छी।
१.३ अलंकार सिद्धान्त
रमेशक कवितामे अलंकारक सर्जनात्मक प्रयोग भेल अछि।
उपमा अलंकार
बगुलीमे टोलक सोहाग मथैत हाथक सामने स जखन-इति खग्रास-कथा
रूपक अलंकार
कोसी मिथिलाक आँखि स बहै छथि। / मिथिला कोसी मे बहै छथि।
-कोसीक तारांकित प्रश्न
अतिशयोक्ति अलंकार
चन्द्रमाक शीतलता डुमरीक फूल भ गेल अछि।
-सदानीरा-तट पर...
विरोधाभास अलंकार
जीवनक राति मे द्वैपदीक चीर जकाँ बढ़ेत आँखिक सूत
-जिजीविषा
१.४ वक्रोक्ति सिद्धान्त
कुन्तकक वक्रोक्तिजीवित मे प्रतिपादित वक्रोक्ति सिद्धान्त अनुसार, रमेशक भाषा मे काव्यात्मक वक्रता (artistic indirection) स्पष्ट देखल जाइत अछि।
अहाँ जंगली रही / त सुखी रही अपना मे / मुदा बाँचि नहि सकलहुँ
-सन्दर्भ : उबियाइत अफ्रीकी जंगलक मुक्ति
एतय सभ्यता शब्दक सीधा प्रशंसा नै क वक्रोक्तिक माध्यम सँ सभ्यताक आवरणमे नुकायल बर्बरताक अनावरण केने छथि।
१.५ औचित्य सिद्धान्त
क्षेमेन्द्रक औचित्यविचारचर्चा अनुरूपे, रमेशक कवितामे देश-काल-पात्र-प्रकरण-भाषाक औचित्यक पालन भेल अछि। कोसी-क्षेत्रक बोली, संस्कृति, जीवन-शैलीक चित्रणमे प्रादेशिक औचित्यक पूर्ण पालन भेल अछि।
२. पाश्चात्य साहित्यिक सिद्धान्तक आधार पर समीक्षा
२.१ मार्क्सवादी समीक्षा (Marxist Criticism)
रमेशक कविता मार्क्सवादी वर्ग-संघर्ष, शोषण आ विमुक्तिक चेतनासँ गहींरमे जा कऽ जुड़ल अछि।
वर्ग-संघर्ष (Class Struggle)
लोहक मनुक्ख, बजार, कोसी-सरकार मे शोषक वर्ग (पूँजीपति, राजनेता, नौकरशाह) आ शोषित वर्ग (किसान, मजदूर, विस्थापित) क बीचक संघर्षक चित्रण भेल अछि।
सोन-चानीक उपजा, लोह सन हृदय। रुपैयाक मिसल, भावनाक राजस्थान भेटैत अछि बजार मे।
वस्तु-वैचित्र्य (Commodification)
कोसीक कागत के नैया मे मानवीय जीवनक वस्तुमे परिणत भेलाक चित्रण भेल अछि। कोसीक कागत के नैया, गंगा मे ओ उतारि दैत छथि।
विमुक्तिक चेतना (Consciousness of Liberation)
भगतिसंहक वसीयतनामा, विद्रोह, एकटा दोसर दिशा मे बढ़बाक थिक मे विमुक्तिक चेतनाक प्रबल स्वर सुनाई पड़ैत अछि।
२.२ उत्तर-उपनिवेशवादी समीक्षा (Postcolonial Criticism)
रमेशक कविता उत्तर-उपनिवेशवादी दृष्टिसँ अत्यन्त महत्वपूर्ण अछि।
उपनिवेशक मानसिकताक विखण्डन (Deconstruction of Colonial Mentality)
कोसी-कथा मे वाराह-क्षेत्र आ सुगर (pig) शब्दक प्रयोग उपनिवेशवादीक (एतय राज्य) मानसिकताक विखण्डन करैत अछि।
समस्त वाराह-क्षेत्रक समस्त लोक / बना देल गेल अछि सुगर, शब्दशः।
उप-सहायक स्वर (Subaltern Voice)
मरसीया, कोसी-लोक, गाम मे उप-सहायक (subaltern) वर्ग बाढ़ि पीड़ित, किसान, महिला, दलितक स्वर सुनाई पड़ैत अछि।
भाषाक राजनीति (Politics of Language)
मैथिली भाषामे लिखल ई कविता स्वयं भाषायी उपनिवेशवादक विरुद्ध एकटा राजनीतिक अभियान छी।
२.३ नारीवादी समीक्षा (Feminist Criticism)
रमेशक कवितामे नारी-चेतना आ पितृसत्ता-विरोधक स्वर सशक्त रूपमे उपस्थित अछि।
पितृसत्ताक विखण्डन
ई अदराक मेघ नहि मानत... मे स्त्री-शरीर पर नियन्त्रणक पितृसत्तात्मक प्रयासक विखण्डन भेल अछि।
एम.डी.बलसम्मा आकि बुला चौधरी कहियो रण्डी नहि बनि सकैए, गंजी-जंघियाक कारणेँ?
मातृ-शक्ति (Matriarchal Power)
नानीक कविता : एक आ नानीक कविता : दू मे नानीक चरित्रमे मातृ-शक्तिक पारम्परिक आधार पर पुनर्प्रतिष्ठा भेल अछि।
जेना-से नानी सप्ता-विप्ताक कथा कहैत छथिन। रोहीदास कें माछक पेटसँ बहार करबाक लेल आ नहसँ नहसूर चीरऽ लगैत छल आदि।
स्त्री-शरीरक राजनीति
ई अदराक मेघ... आ साँझ भरली मे स्त्री-शरीरक राजनीतिक विश्लेषण भेल अछि, जतय पुरुष दृष्टि आ सामाजिक नियन्त्रणक प्रश्न उठाओल गेल अछि।
२.४ पर्यावरण-समीक्षा (Ecocriticism)
रमेशक कोसी-चक्रक कवितासभ पर्यावरण-समीक्षाक दृष्टिसँ अत्यन्त महत्वपूर्ण अछि।
प्रकृति-विरुद्ध हिंसा
कोसी-घाटी सभ्यता, कोसी-कथा, आदि-कथा मे प्रकृतिक विरुद्ध मानवीय हिंसाक चित्रण भेल अछि।
जेना- ईन्जीनियर भए गेलै अङरेज आ नेता भए गेलै तुरुक मे देखाइत अछि। [आदि-कथा]
प्रकृतिक सबाल्टर्न स्वर (Nature as Subaltern Voice)
कोसी नदी स्वयं एकटा सबाल्टर्न चरित्रक रूपमे उपस्थित अछि, जकर आवाज सुनबाक लेल कियो नै अछि।
जेना- कोनोटा असिर नै छै कोसी माइ पर, ने मनाउनक आ ने भगदत्तक। [कोसी-घाटी सभ्यता]
स्थानीय पारिस्थितिकीक ज्ञान (Local Ecological Knowledge)
कोसी-लोक, कोसी-भगइत मे स्थानीय पारिस्थितिकीक ज्ञानक महत्व आ ओकर विनाशक चित्रण भेल अछि।
२.५ आधुनिकतावादी समीक्षा (Modernist Criticism)
रमेशक कविताक शैलीगत विशेषता आधुनिकतावादी अछि।
खण्डित आख्यान (Fragmented Narrative)
मिथिलामे बीसम शताब्दी जकाँ कवितामे खण्डित आख्यानक प्रयोग भेल अछि, जे आधुनिक जीवनक खण्डित अनुभवक प्रतिनिधित्व करैत अछि।
प्रवाह-चेतना तकनीक (Stream of Consciousness)
जिजीविषा, अ/नियति मे प्रवाह-चेतनाक तकनीकक प्रयोग भेल अछि।
विडम्बना (Irony)
राजा आ प्रजा, सरकारक परिभाषा मे विडम्बनाक सशक्त प्रयोग भेल अछि।
जेना- समस्त प्रजा तिला-संक्रान्तिक खिच्चरि लेल केना हनैत अछि से ओ देखबैत अछि। [राजा आ प्रजा]
२.६ उत्तर-संरचनावादी समीक्षा (Poststructuralist Criticism)
रमेशक कविता भाषाक अस्थिरता आ अर्थक अनिश्चितताक प्रश्न उठाबैत अछि।
द्वैतवादक विखण्डन (Deconstruction of Binaries)
ओइ पार, अइ पार, शून्यकाल सँ शून्यकाल धरि मे द्वैतवादी संरचनाक विखण्डन भेल अछि।
आरो देखू- हम शब्द गढ़ैत छी- आ फेर,/ ओ आगि गढ़ैत छथि आ फेर, ओ हमरा शब्दकेँ आगि मानैत छथि। [शून्यकाल सँ शून्यकाल धरि]
अर्थक अनिश्चितता
प्रश्नोत्तरी मे प्रश्न आ उत्तरक बीचक अर्थ-अनिश्चितता उत्तर-संरचनावादी विमर्शक प्रतिनिधित्व करैत अछि।
२.७ मनोवैज्ञानिक समीक्षा (Psychoanalytic Criticism)
रमेशक कविता मनोवैज्ञानिक रूपसँ खूब भीतर धरि जुड़ल अछि।
सामूहिक अचेतन (Collective Unconscious)
कोसी-चक्रक कविता सभमे सामूहिक अचेतनक प्रतीक (जल, बाढ़ि, बालु) बारम्बार प्रयुक्त भेल अछि।
आघात (Trauma)
मरसीया, कोसी-गीत, एकटा कोनो भटसिम्मरिक कथा मे सामूहिक आ व्यक्तिगत आघातक चित्रण भेल अछि।
दमन आ प्रतिफलन (Repression and Return)
कोसी-घाटी सभ्यता मे दमित प्रकृतिक प्रतिफलनक चित्रण भेल अछि।
३. भारतीय आ पाश्चात्य सिद्धान्तक समन्वय
रमेशक कविता भारतीय आ पाश्चात्य सिद्धान्तक समन्वयक उत्कृष्ट उदाहरण अछि।
३.१ रस आ मार्क्सवादक समन्वय
रमेशक कवितामे करुण रस आ मार्क्सवादी वर्ग-चेतना एक-दोसरक पूरक बनैत अछि। मरसीया मे बाढ़ि पीड़ितक करुण रस मार्क्सवादी दृष्टिसँ वर्ग-शोषणक प्रतीक बनि जाइत अछि।
३.२ ध्वनि आ उत्तर-संरचनावादक समन्वय
ध्वनि सिद्धान्तक व्यङ्ग्यार्थ आ उत्तर-संरचनावादक अनुपस्थित उपस्थिति (absent presence) केर बीच सम्बन्ध स्थापित कएल जा सकैत अछि।
३.३ वक्रोक्ति आ विडम्बनाक समन्वय
भारतीय वक्रोक्ति सिद्धान्त आ पाश्चात्य विडम्बना (irony) क बीचक समानता रमेशक कवितामे स्पष्ट देखल जाइत अछि।
४. निष्कर्ष
रमेशक कविता-समय संग्रह भारतीय आ पाश्चात्य साहित्यिक सिद्धान्तक समन्वयक उत्कृष्ट उदाहरण अछि। भारतीय सिद्धान्तक दृष्टिसँ ऐ संग्रहमे रस, ध्वनि, अलंकार, वक्रोक्ति आ औचित्यक सफल प्रयोग भेल अछि। पाश्चात्य सिद्धान्तक दृष्टिसँ ई संग्रह मार्क्सवादी, उत्तर-उपनिवेशवादी, नारीवादी, पर्यावरणीय, आधुनिकतावादी आ उत्तर-संरचनावादी विमर्शसँ जुड़ल अछि।
कोसी-चक्रक कविता सभ एहि संग्रहक सर्वाधिक महत्वपूर्ण हिस्सा छी, जतय प्रकृति-मानव सम्बन्ध, वर्ग-शोषण, उपनिवेशवादी मानसिकता, स्त्री-चेतना आ आधुनिकताक संकट एक संग उभरि अबैत अछि। रमेशक भाषा-शैली आ प्रतीक-योजना ओकरा मैथिली साहित्यक एकटा महत्वपूर्ण हस्ताक्षरक रूपमे स्थापित करैत अछि।
अन्ततः, ई संग्रह सिद्ध करैत अछि जे मैथिलीमे लिखल साहित्य वैश्विक साहित्यिक विमर्शसँ संवाद करबाक पूर्ण क्षमता रखैत अछि आ मैथिली कविता आधुनिकता आ उत्तर-आधुनिकताक संकट सभक अभिव्यक्तिक सशक्त माध्यम बनि सकैत अछि।
रमेशक कविता-समय भारतीय काव्यशास्त्रक परम्परागत सिद्धान्त सभक पाश्चात्य सैद्धान्तिक विमर्शसँ सफल समन्वय स्थापित करैत, समकालीन सामाजिक-राजनीतिक-पारिस्थितिकीय यथार्थक गहन आ मौलिक अभिव्यक्ति देने अछि।
दोसर खण्ड
कविता-समय संग्रहक सीमा
कोनोहु साहित्यिक कृति पूर्ण होइत अछि तँ ओइमे ओकर सीमा आ कमी सभ सेहो होइत अछि। रमेशक कविता-समय संग्रह अपन विशालता, गहनता आ सैद्धान्तिक विविधताक बादो किछु सीमा आ कमी सभ सँ मुक्त नहि अछि। नीचाँ विस्तृत रूपमे ओकर समीक्षा प्रस्तुत अछि।
१. भाषागत सीमा
१.१ अति-प्रादेशिक भाषा (Excessive Regionalism)
संग्रहक सबसँ बड़का सीमा ओकर अति-प्रादेशिक भाषा अछि। मैथिलीक कोसी-क्षेत्रीय बोलीक अतिप्रयोग आ किछु स्थान पर हिन्दी, उर्दू, अंग्रेजी शब्दक अनावश्यक मिश्रण पाठकक पहुँचमे बाधा उत्पन्न करैत अछि।
जेना- पेटेन्ट/ स्काइ-लैब आदि। सामान्य लोकसँ ऐ तरहक प्रयोग होइत अछि मुदा लेखक/ कविसँ केनी बेशी आशा लोक करैत अछि।
ई अति-प्रादेशिकता संग्रहक सीमा संकुचित कऽ दैत अछि, विशेष रूप सँ ओइ पाठक लेल जे कोसी-क्षेत्रीय बोली सँ परिचित नहि छथि।
१.२ भाषायी असंगति (Linguistic Inconsistency)
एहि संग्रहमे एकटा स्थिर भाषा-शैलीक अभाव अछि। कतौ प्रौढ़ मैथिली, कतौ खिचड़ी भाषा, कतौ अंग्रेजीक अत्यधिक प्रयोग दृष्टिगोचर होइत अछि।
जेना- डॉलर झनझनबैत, टाइटेनिक फिलिम आदि।
१.३ वर्तनीक अनियमितता (Orthographic Irregularity)
पूरा संग्रहमे वर्तनीक एकरूपता नहि अछि। एकहि शब्दक बहुबिध वर्तनी भेटैत अछि।
२. संरचनागत सीमा
२.१ अति-दीर्घता (Excessive Length)
अनेक कविता अनावश्यक रूपमे नाम भऽ गेल अछि, ओतय संक्षेपणक आवश्यकता छल।
कोसी-घाटी सभ्यता सन कविता अपन दीर्घता आ पुनरुक्तिक कारण पाठकक रस-भंग करैत अछि।
२.२ खण्डित आख्यानक अति-प्रयोग (Excessive Fragmentation)
आधुनिकतावादी खण्डित आख्यानक तकनीकक अतिप्रयोग कतौ-कतौ अर्थक अस्पष्टता उत्पन्न कऽ दैत अछि।
जिजीविषा, अ/नियति, सन कविता सभमे विचार-खण्डक अत्यधिक खण्डीकरण पाठकक समझबामे कठिनाई उत्पन्न करैत अछि।
२.३ विधागत अस्पष्टता (Generic Ambiguity)
संग्रहमे कविता, गीत, गजल, निबन्ध, संवाद, कथा-कविताक बीचक सीमा झलफल भ गेल अछि। प्रश्नोत्तरी सन रचना नहिये पूर्ण कविता अछि, ने पूर्ण नाटक, आ नहिये पूर्ण निबन्ध।
३. वैचारिक सीमा
३.१ आदर्शवादी अतिशयोक्ति (Idealistic Exaggeration)
मार्क्सवादी आ उत्तर-उपनिवेशवादी विमर्शक अतिशयोक्तिपूर्ण प्रस्तुति कतय-कतय एकांगी दृष्टिकोणक जन्म दैत अछि।
जेना- हमरा तों कोंचला खुआ दे- मंजूर अछि। चाहे किच्छु भ जाय आदिमे।
ई क्रान्तिकारी उद्घोषणा अपन आदर्शवादी अतिशयोक्तिमे वास्तविक राजनीतिक व्यवहारक जटिलताक उपेक्षा करैत अछि।
३.२ पुरुष-केन्द्रित दृष्टि (Male-Centered Perspective)
नारीवादी चेतनाक बादो, संग्रहक अधिकांश कविता पुरुष-केन्द्रित दृष्टिसँ लिखल गेल अछि। स्त्री-पात्रसभ (नानी, माय, पितिआइनि) अधिकांशतः पुरुष दृष्टिक परिधि मे चित्रित भेल छथि।
३.३ शहरी-ग्रामीण द्वैतक अति-सरलीकरण (Over-simplification of Urban-Rural Binary)
शहर आ गामक बीचक द्वैतक अति-सरलीकरण भेल अछि। गामक सभटा पवित्र, सरल, सहज आ शहरक सभटा भ्रष्ट, कृत्रिम, शोषक रूपमे प्रस्तुत करबाक प्रवृत्ति वास्तविकताक जटिलताक उपेक्षा करैत अछि।
जेना- आङन मे, चौक मर्दानगीक गर्मी हाथ, लात, मुँह आ डाँड सँ निकालैत अछि। [साँझ भरली]
४. शैलीगत सीमा
४.१ पुनरुक्ति (Repetition)
अनेक स्थान पर विचार, प्रतीक आ शब्दक अनावश्यक पुनरावृत्ति भेल अछि।
बाबा गीत मे नै-नै, बावा शब्दक पुनरावृत्ति कतौ-कतौ शैलीगत कमजोरीक रूपमे परिलक्षित होइत अछि।
४.२ प्रतीकक अति-प्रयोग (Excessive Symbolism)
प्रतीकक अतिप्रयोग कतौ-कतौ अर्थक दुरूहता अनैत अछि।
जेना- सूर्यमुखीक पुंकेसर पर परागकणक अविरल संरचना होइए आदिमे।
एहि शीर्षक आ ओकर सामग्रीक बीचक सम्बन्ध सामान्य पाठक लेल सहज नहि अछि।
४.३ भावुकताक अति (Excessive Sentimentality)
कतौ-कतौ भावुकताक अतिशयोक्ति काव्य-गरिमाक ह्रास करैत अछि।
जेना- आह! कोसीक जीवन! आह! दीर्घ-काव्य, कोसीक जीवन! कोसी-लोकमे।
५. ऐतिहासिक-सन्दर्भगत सीमा
५.१. समसामयिक सन्दर्भक अति-विशिष्टता (Over-specificity of Contemporary References)
भगतिसंहक वसीयतनामा, दिशांश लागल उका-पतङ मे समसामयिक राजनीतिक सन्दर्भक अति-विशिष्टता ओकरा कालातीत (timeless) नै बनयबाक अनुमति दैत अछि।
५.२ ऐतिहासिक अशुद्धिक सम्भावना (Potential Historical Inaccuracies)
कोसी-कथा, आदि-कथा मे ऐतिहासिक तथ्यक काव्यात्मक प्रस्तुति मे अशुद्धिक सम्भावना रहैत अछि।
६. समग्र मूल्यांकन
सीमाक सारांश:
| क्रम | सीमाक प्रकार | प्रमुख समस्या |
| | --| |
| १ | भाषागत | अति-प्रादेशिकता, वर्तनीक अनियमितता |
| २ | संरचनागत | अति-दीर्घता, खण्डीकरणक अति |
| ३ | वैचारिक | आदर्शवादी अतिशयोक्ति, पुरुष-केन्द्रित दृष्टि |
| ४ | शैलीगत | पुनरुक्ति, प्रतीकक अति |
| ५ | ऐतिहासिक | समसामयिक सन्दर्भक अति-विशिष्टता |
७. निष्कर्ष
रमेशक कविता-समय संग्रह अपन सामर्थ्य आ उपलब्धिक बादो किछु सीमा आ कमीसभ सँ मुक्त नहि अछि। ई सीमासभ मोटामोटी चारि स्तर पर देखल जाइत अछि- भाषायी, संरचनात्मक, वैचारिक आ शैलीगत।
भाषायी स्तर पर अति-प्रादेशिकता आ वर्तनीक अनियमितता संग्रहक व्यापक पाठक-वर्ग तक पहुँचमे बाधा उत्पन्न करैत अछि। संरचनात्मक स्तर पर अति-दीर्घता आ खण्डीकरणक अति-प्रयोग पाठकक सहज-पठनमे व्यवधान डालैत अछि। वैचारिक स्तर पर आदर्शवादी अतिशयोक्ति आ पुरुष-केन्द्रित दृष्टि वैचारिक एकांगिताकेँ जन्म दैत अछि। शैलीगत स्तर पर पुनरुक्ति आ प्रतीकक अति-प्रयोग काव्य-गरिमाक ह्रास करैत अछि।
तथापि, ई सीमासभ संग्रहक मौलिकता आ सामर्थ्यकेँ नकारैत नहि अछि। कोसी-चक्र, नानीक कविता, भगतिसंहक वसीयतनामा सन सशक्त कवितासभ आ भारतीय-पाश्चात्य सिद्धान्तक समन्वयक मौलिक प्रयास ऐ संग्रहक महत्व प्रमाणित करैत अछि। कविता-समय संग्रहक सीमासभ ओकर विशालता आ महत्वाकांक्षाक सहज उप-उत्पादन अछि। ई सीमासभ संग्रहक अन्तर्निहित कमजोरी सँ बेसी ओकर अतिरिक्त विस्तार, अति-आत्मीयता आ प्रायोगिक उत्साहक परिणाम अछि। भविष्यक संस्करणमे भाषायी संपादन, संरचनात्मक संक्षेपण आ शैलीगत एकरूपताक माध्यम सँ ऐ सीमासभक समाधान कएल जा सकैत अछि।
[सैद्धांतिक विवेचन लेल देखू- मैथिली समीक्षाशास्त्र- गजेन्द्र ठाकुर]
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