विदेह ४३८ म अंक पर पाठकीय मन्तव्य
प्रणव कुमार झा
'विदेह' अंक ४३८, १५ मार्च २०२६ मैथिली
साहित्यक विविध आयामकेँ समेटने अछि। गद्य-पद्यक संग-संग शोध आ लेख सेहो
एहिमे स्थान बनौने अछि। एहि अंक के नव वेबलुक एकटा आर आकर्षण के केंद्र
रहल। नव लुक पहिने से बेहतर पठनीयता आ नूतन रूप लऽ कऽ आयल, जे मोबाइल
डिवाइस के संग पहिने से बेहतर एडेप्टेशन लेने अछि। एहि के लेल विदेह टीम के
बधाई।
मयंक कुमार झाक 'एआई युग मे मैथिली' समसामयिक विषय सँ जुड़ल अछि, जे
पाठककेँ नूतन चिंतन दिस अग्रसर करैत अछि। लेख मे विविध एआई टूल्स और एप के
विवरण पाठक के एहि विषय मे भऽ रहल नित नवल प्रगति आ प्रयोग से अवगत कारबय
बला अछि। देवनागरी मे मैथिली लिखबाक कठिनाई से जुझैत ई लेख लिखबा लेल लेखक
के बधाई। लेख मे मातृभाषा के जे अवधारणा अछि ओकरा हम खारिज नै करय छी, मुदा
एकर एकटा आर अवधारणा डॉ० प्रवीण झा (नॉर्वे) अपन एकटा लेख मे दैत छैथ जे घर
मे जे भाषा बाजल जाय सैह बच्चा के मातृभाषा भेल। जेना हमर बड़की बेटी संग
हमरा आ ओकर दादी छोड़ि सभ कियौ घर मे हिंदी बाजय, त ओहो हिंदी बाजय लागल। ओ
मैथिली बुझय अछि मुदा समान्यतया हिंदी बाजय अछि। ताहि लेल कदाचित हिंदी ओकर
मातृभाषा भऽ गेल। छोटकी बेटी संग सब मैथिली बाजय छै, त ओहो सबहक संग मैथिली
बाजय छैक। त कदाचित ओकर मातृभाषा मैथिली भेल। अस्तु, मयंक जी के लेख
समसामयिक विषय पर बहुत समग्र आ सूचनात्मक बुझाना गेल। प्रीति कुमारीक
'अशिक्षाक शिकार: केवट समाज' एकटा नीक सामाजिक शोध आलेख अछि, जे केवट समाजक
यथार्थकेँ प्रस्तुत करबाक प्रयास अछि।
गजेन्द्र ठाकुरक 'संरचनात्मक अस्थिरता आ अर्थक लीला: रमेशक मैथिली
कथा-संग्रह 'कथा-समय' क एकटा आलोचना' गंभीर साहित्यिक आलोचनाक उदाहरण थीक आ
हमरा सन पाठक के लेल सूचनात्मक संग मार्गदर्शक। कल्पना झाक धारावाहिक लेख
'मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान' तथा
हितनाथ झाक 'मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान' मैथिली
साहित्यक धरोहरकेँ रेखांकित करैत अछि, संगहि लेखक के फ़ैक्ट समेटब आ ओकरा
साहित्यिक विधा मे लगातार लिखबाक कमिटमेंट सेहो।
आशीष अनचिन्हार
विदेहक नव अंकमे मयंकजीक लेख नीक लागल,
पुनः स्वागत छनि। उम्मेद जे ओ लगातार लिखैत रहताह। प्रीति कुमारीक लेख
शोधात्मक अछि आ उम्मेद जे एहने लेख सभ अबैत रहत।
कल्पना झा (पटना)
विदेह'क नव अंक मे अपन अनुज चि. मयंक कुमार
झाक लिखल लेख "एआइ युग मे मैथिली" पढ़ि कऽ बहुत नीक लागल। अपन लिखल देखबाक
तऽ हिस्सक भऽ गेल अछि पछिला कतेको अंक सँ। एहि बेर दुनू भाए-बहिनक उपस्थिति
जेना आत्मा प्रफुल्लित कऽ देलक।
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