VIDEHA ISSN 2229-547X  ·  First Maithili Fortnightly eJournal  ·  Since 2000  ·  www.videha.co.in
विदेह — प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका
Twitter / X Facebook Archive

विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका

विदेह

Videha

प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका — First Maithili Fortnightly eJournal

विदेह नूतन अंक
वि दे ह विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly ejournal विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका नव अंक देखबाक लेल पृष्ठ सभकेँ रिफ्रेश कए देखू। Always refresh the pages for viewing new issue of VIDEHA.


 

गजेन्द्र ठाकुर

उमेश पासवानक "मुजरिम"

 

उमेश पासवानक मुजरिममे एक सोरे कथा अछि।

सुनन्दा कथा शिक्षित युवती सुनन्दा आ ओकर पिता रमण मास्टरक माध्यमसँ समाजक संकीर्ण सोचकेँ उजागर करैत अछि । सड़कक कात पर भेटल परित्यक्त नवजात शिशुकेँ सुनन्दा दयावश घर लऽ अबैत अछि, मुदा गाम ओकरा चरित्रहीन ठहरबैत अछि । पिता सेहो लोक-दबावमे आबि जाइ छथि । बादमे खुलासा होइत अछि जे बच्चा गामक प्रतिष्ठित घरक अविवाहित बेटीकेँ जन्मल छल । सत्य सामने आबिते सभ आरोप झूठ साबित भऽ जाइत अछि । ई कथा स्त्री पर लगैत सहज दोषारोपण, जाति-प्रतिष्ठाक दबाव, लोकक कुटिचौल आ मानवताक असली अर्थकेँ प्रभावी ढंग सँ उभारैत अछि । अन्तमे नैतिक साहस आ क्षमाशीलता समाजकेँ सही दिशा देखबैत अछि । सोलकनमा पोखैर कथा गाममे उत्पन्न भीषण पानिक संकट आ जातिगत भेदभावक विडम्बनाकेँ उजागर करैत अछि । सोलकनमा टोलक पोखैरमे पानि रहितो ऊँच जातिक लोक ओकर उपयोगसँ बचैत अछि, आ जे उपयोग करैत अछि, ओकरा समाजसँ बहिष्कृत कऽ दैत अछि । छुआछूत आ ऊँच-नीचक सोच पानिक मूल आवश्यकता पर भारी पड़ैत अछि । अचानक आगि लागैत अछि, आ पूरा गाम ओही पोखैरक पानि सँ बचैत अछि । जकरा अपवित्र कहल गेल छल, ओ पानि संकटमे जीवनरक्षक बनि जाइत अछि । ई कथा स्पष्ट करैत अछि जे प्राकृतिक संसाधन सभक लेल समान अछि, आ संकट समाजक बनावटी भेदरेखाकेँ भंग कऽ दैत अछि । कर्मक फल कथा रंजीतक पतनक कथा अछि । पढ़ल-लिखल आ प्रतिष्ठित घरक बेटा, खराब संगतिक प्रभावमे पड़ि दारूक लतमे फँसि जाइत अछि । पहिल बेर मजाकमे दारू पीबैत ओ पुलिसक हाथ चढ़ि जाइत अछि, जेल पहुँचैत अछि, आ ओतए अपराधीक संगति ओकर जीवनक दिशा बदलि दैत अछि । बादमे ओ दारू कारोबारमे पड़ि जाइत अछि, गिरफ्तारी, फरारी आ भेष बदलि साधु बनि लोककेँ ठगबाक प्रयास करैत अछि । सत्य सामने आबिते लोक ओकरा पुलिसकेँ सौंपि दैत अछि, आ अन्ततः ओकर घर कुर्की-जब्दीमे उजड़ि जाइत अछि । ई कथा स्पष्ट करैत अछि जे गलत संगति आ अनैतिक कर्म अन्ततः अपन दुष्परिणाम अवश्य दैत अछि । गिरहत घर पर गिद्ध कथा दौलतपुर गामक जातिगत भेदभाव आ सामाजिक टकराव पर आधारित अछि । श्राद्ध-भोजमे दलित युवकसभकेँ पाँतसँ उठा देल जाइत अछि । बादमे मन्दिर-प्रवेशक कारण एक युवककेँ मारि दण्डित कएल जाइत अछि । अपमानित दलित समुदाय निर्णय लैत अछि जे ऊँच जातिक घरक मरलाहा माल-मवेशी उठेनाइ आ परम्परागत सेवा बन्द करत । कनी दिनमे बेमारीसँ जानवर मरए लगैत अछि आ गाममे गिद्ध मँडराए लगैत अछि, जाहिसँ जमींदार स्वयं संकटमे पड़ि जाइ छथि । अन्ततः पंचायत हस्तक्षेप करैत अछि आ समान अधिकारक प्रश्न उठैत अछि । ई कथा सम्मान, श्रम आ बराबरीक प्रश्न सोझाँ आनैत अछि । तेतर दास कथा तेतरा नामक बालकक जीवन-यात्राकेँ प्रस्तुत करैत अछि । जन्म समय माए प्रसवमे गुजरि जाइ छथि, तैं गाम ओकरा अपशकुन मानि लूटना कहैत अछि । पिता प्रेमसँ ओकर पालन-पोषण करैत छथि, आ ओ पढ़ाईमे तेज सिद्ध होइत अछि । संस्कृत अध्ययन करैत-करैत ओ विद्वान बनि सन्त रूपमे प्रसिद्ध होइत अछि आ तेतर दास कहल जाइत अछि । हजारों लोक ओकर प्रवचनसँ प्रभावित होइत अछि । मुदा गोविन्दपुर मठक महंथ बनबाक प्रस्ताव पर जातिगत विरोध उठैत अछि । पीड़ासँ आहत भऽ ओ सब कुछ छोड़ि गाम घुरि जाइत अछि । ई कथा समाजक जाति-आधारित सोच आ प्रतिभाक अवमाननाक विडम्बनाक मार्मिक चित्र प्रस्तुत करैत अछि । कोदारि छाप कथा पंचायत चुनावमे सत्ता आ लोभक खेलकेँ उजागर करैत अछि । बदमाश प्रवृत्तिक फोल्टर आरक्षित सीटक लाभ उठेबाक लेल दलित मजदूर मुसबाक अनपढ़ पत्नी फेकनीकेँ मुखिया बनबैत अछि । दारू, पैसा आ धमकीक बल पर चुनाव जिताओल जाइत अछि । जितलाक बाद फेकनी नाममात्रक मुखिया बनि रहैत अछि, आ सभ वित्तीय निर्णय फोल्टर करैत अछि । सरकारी योजना आ मनरेगा निधिमे भारी घपला होइत अछि । जाँचक दौरान फेकनी सच उजागर करैत अछि जे ऊ केवल औंठा-छाप देत रहल । अन्ततः फोल्टर आ फेकनी दुनू गिरफ्तार होइत छथि । सहोदरा कथा दू सहोदर भायक आ प्रेमक संबंध पर आधारित अछि । माता-पिताक मृत्यु बाद जनक अपन छोट भायकेँ पालि-पोसि पढ़बैत अछि । विवाहक बाद घरमे कलह शुरू होइत अछि आ बँटवारा भऽ जाइत अछि । समयक संग प्रेमक भाग्य चमकि उठैत अछि, आ जनक आर्थिक संकटमे फँसि कर्जक बोझ सँ दबि जाइत अछि । एक दिन प्रेम अपन भायकेँ मजदूरी करैत देखि पीड़ा अनुभव करैत अछि । अन्तमे ओ अपन दोकान जनककेँ सौंपि पुनः एकजुट होएबाक निर्णय लैत अछि । ई कथा त्याग, भाईचारा आ परिवारक संबंधकेँ उभारैत अछि । गरीबक जिनगी कथा भोल्टा आ ओकर बेटा बंठाक माध्यमसँ गरीब मजदूरक शोषण आ संघर्षकेँ चित्रित करैत अछि । गिरहत नूनूबाबू चाल चलि बंठाकेँ पढ़ाइ सँ हटा अपन घरक नोकरीमे लगा दैत अछि, आ महँगाई बढ़लाक बादो मजूरी नहि बढ़बैत अछि । बंठा प्रश्न उठबैत अछि तँ ओकरा धमकी देल जाइत अछि । गरीब सभ संगठित भऽ बाहरक गाममे काज करए लगैत छथि, जकरा कारण गिरहतक खेती ठप्प पड़ि जाइत अछि । बदला लेबाक भावसँ गिरहत रस्ता रोकि रोगीक इलाजमे बाधा दैत अछि, जकर परिणामस्वरूप बंठाक छोट भाय मरि जाइत अछि । बादमे झूठ चोरिक आरोप लगा बंठा आ भोल्टापर हमला कएल जाइत अछि, जाहिमे भोल्टा मरि जाइत अछि । बंठा हिंसाक रास्ता नहि चुनैत अछि, बल्कि कानूनक सहारा लैत अछि आ न्याय प्राप्त करैत अछि । श्रमदानी बान्ह कथा बरखाक समय गामक सुरक्षा-बान्ह पर केन्द्रित अछि । घनघोर वर्षासँ श्रमदानी बान्ह कमजोर भऽ जाइत अछि, आ लोक मुखियासँ मदद माँगैत अछि । मुखिया ऊपरसँ प्रशासनक भरोसा दऽ लोककेँ शांत करैत अछि, मुदा भीतरे-भीतर ओ बान्ह टूटबाक चाह रखैत अछि, जाहिसँ फसल-क्षति, राहत आ आवास योजनामे घूस-कमीशन कमा सकय । रातिमे ओ अपन चमचा सभसँ बान्ह कटवा दैत अछि, परिणामस्वरूप गाममे बाढ़ि पसैर जाइत अछि आ घर, अनाज आ मवेशी नष्ट भऽ जाइत अछि । बादमे पानिमे एक युवकक लाश भेटैत अछि, जे मुखियाक अपन बेटा निकलैत अछि । अन्ततः लालचक परिणाम निजी शोकक रूपमे सोझाँ अबैत अछि । दछिनवारि टोल कथामे मानिकपुर गाममे एन.एच. निर्माणक योजना बनैत अछि । गाम बचाबए लेल सड़क दच्छिन दिस घुमा देल जाइत अछि, मुदा दछिनवारि टोलक बुधना मल्लिकक घर उजड़ि जाइत अछि । ओकरा जमीनक मुआवजा नहि भेटै छै, तैं ओ नवका स्थान पर घर बनबैत अछि । सवर्ण टोलक लोक ओकरा जातिक कारण नापसंद करैत अछि आ ओकर पत्नी पर डायन हेबाक आरोप लगबैत अछि । रातिमे ओकर घरमे आगि लगा देल जाइत अछि । परिवार जान बचा कऽ बाहर निकलैत अछि, मुदा उजाड़ अवस्थामे सड़क कात सूतल चारू परानी ट्रकसँ पिचा कऽ मरि जाइत छथि । ई कथा जातिगत घृणा आ अमानवीयताक क्रूर रूप उजागर करैत अछि । पगला पुल कथा विनीत दासक जीवनक उतार-चढ़ाव प्रस्तुत करैत अछि । पढ़ाईमे तेज विनीतक, गलत संगति आ नशाक कारण, सभ जमीन बिका जाइ छै, ओ बताह सन भऽ जाइत अछि । गामक लोक ओकरा तिरस्कृत करैत अछि, तँ ओ नदी कात अपन जीविका चलबैत रहैत अछि । एक दिन मंत्री आ अधिकारीसभ नाव डूबला पर संकटमे पड़ैत छथि । सभ लोक तमाशा देखैत रहैत अछि, मुदा तथाकथित पगला विनीत नदीमे कूदि चारू गोटाक जान बचा लैत अछि । ओकर साहस चर्चाक विषय बनैत अछि, आ इलाजक बाद ओ आस्ते-आस्ते स्वस्थ होइत अछि । पुरस्कार माँगलापर ओ धन नहि, बल्कि नदी पर पुल निर्माणक आग्रह करैत अछि । अन्ततः पुल बनैत अछि आ समाज ओकरा नव सम्मान दैत अछि । विधवा विवाह कथा सुशीलाक जीवन-संघर्षक मार्मिक चित्रण करैत अछि । विवाहक पहिल रातिमे पति राजीव साँपक डँसला सँ मृत्युकेँ प्राप्त होइत छथि, आ सुशीला अल्प आयुमे विधवा बनि जाइ छथि । सासुरमे अपमान आ समाजक तिरस्कार हुनका भीतरसँ तोड़ि दैत अछि । पिता हुनका नैहर लऽ अबैत छथि, मुदा समाज विधवा-विवाह स्वीकार करबाक लेल तैयार नहि अछि । मानसिक पीड़ासँ व्यथित सुशीला आत्महत्या करबाक प्रयास करैत छथि । ओहि समय एक अभियन्ता युवक समय पर पहुँचि हुनका बचबैत अछि विवाहक प्रस्ताव रखैत अछि । ई कथा समाजमे विधवा-विवाहक आवश्यकता आ मानवीय संवेदनाक प्रबल पक्ष प्रस्तुत करैत अछि । वृद्धाश्रम कथा गोपाल जी आ हुनकर बेटा रमणक माध्यमे कर्तव्य आ कृतघ्नताक संवेदनशील चित्र प्रस्तुत करैत अछि । गोपाल जी अपन जमीन बेचि आ मेहनत-मजूरी क बेटाकेँ पढ़बैत छथि, आ ओकरा बैंक अधिकारी बनबैत छथि । विवाहक बाद रमण आ सुलोचना नौकरीक कारण शहरमे बसि जाइ छथि । वृद्ध माता-पिता सेवा-योग्य रहितो असुविधा बुझि वृद्धाश्रम भेजि देल जाइ छथि । समय बीतैत गोपाल जी आ हुनकर पत्नी दुनू परानीक मृत्यु भऽ जाइत अछि । अन्ततः रमण आ सुलोचना सेहो अपन बेटाक हाथे ओही वृद्धाश्रममे पहुँचा देल जाइ छथि । ई कथा स्पष्ट करैत अछि जे माता-पिताक उपेक्षा अन्ततः अपन जीवनमे दुखद परिणाम बनि घुरि अबैत अछि । दोस्तक बिआह कथा मित्रता आ जातिगत भेदभावक अनुभवक सजीव वर्णन करैत अछि । लेखक आ महेश बाल्यकालसँ घनिष्ठ मित्र छथि, संग पढ़ैत आ खाइत छथि । समय बीतैत महेश विवाह करैत छथि, आ लेखक लोकनियाँ बनि संग रहैत छथि । बरातमे लेखकक जाति उजागर होइतहि कन्यापक्ष लोकनियाँक रूपमे हुनका स्वीकार करब सँ इन्कार करैत अछि । ई घटना लेखककेँ अपमानसँ भरि दैत अछि, आ ओ रातिएँ घुरि जाइ छथि । पछाति महेश आ हुनकर परिवार क्षमा-याचना करैत अछि । अन्ततः लेखक सफल नौकरी प्राप्त करैत छथि आ अनुभव करैत छथि जे समाजमे जातिसँ बेसी आर्थिक स्थिति सम्मानक निर्धारक बनि गेल अछि । मानवताक पूजारी कथा लालच, शोषण आ आत्मपरिवर्तनक प्रभावशाली चित्र प्रस्तुत करैत अछि । चुन्नीलाल सेठ सूदखोरी क गरीबक शोषण करैत छथि, आ हुनकर बेटा डॉ. श्याम रोगीक अनावश्यक जाँच लिखि धन अर्जित करैत छथि । डॉ. विवेक जानबूझि श्यामकेँ ब्लड कैंसरक झूठ निदान दऽ चेतना जगबैत छथि । मृत्यु-भय सँ विचलित पिता-पुत्र अपन आचरण बदलि दैत छथि, कर्जा माफ करैत छथि, गरीबक सहायता करैत छथि आ निःस्वार्थ भावसँ उपचार करए लगैत छथि । अन्ततः पता चलैत अछि जे बीमारी फुसि छल, मुदा एहि झटकासँ दुनू सचेत भऽ मानव-सेवा अपनबैत छथि । ई कथा स्पष्ट करैत अछि जे सच्ची प्रतिष्ठा धनमे नहि, बल्कि मानवता आ करुणामे निहित अछि । भगवानपुर कथा भगवान लाल दासक अद्भुत मानव-सेवा आ त्यागमय जीवनक प्रेरक चित्रण करैत अछि । ओ अविवाहित रहि अपन सम्पूर्ण जीवन गरीब-गुरबाक सहायता, बेटीक बिआह, पढ़ाइ, इलाज आ बसोबासमे समर्पित करैत छथि । बी.डी.ओ. बनलाक बाद सेहो ओ ईमानदारीसँ सेवा करैत अपन आय जनहितमे लगा दैत छथि । अन्ततः विद्यालय स्थापित क शिक्षा-प्रसारक कार्यमे जुटि जाइत छथि । मृत्युक बादो समाजक जातिगत संकीर्णता उजागर होइत अछि, जखन हुनकर दाह-संस्कार श्मशानमे रोकल जाइत अछि । तथापि हुनकर त्याग आ सेवा समाजकेँ झकझोरि दैत अछि आ अन्ततः गाम हुनकर सम्मानमे अपन नाओं बदलि भगवानपुर राखैत अछि ।

सभसँ पहिने पोथीक शीर्षक "मुजरिम" स्थापित अर्थक विखंडन करैत अछि । सामान्य अर्थमे 'मुजरिम' ओ थिक जे अपराध करैत अछि। मुदा ऐ पोथीमे 'मुजरिम' शब्द अपन पारंपरिक अर्थ छोड़ि सत्ताक क्रूरता आ विशेषाधिकारक प्रतीक बनि जाइत अछि । समाजमे कात-करोटामे ठाढ़ लोक जेकर शोषण भऽ रहल अछि, ओकरा व्यवस्था 'मुजरिम' घोषित कऽ दैत अछि। एतय प्रश्न उठैत अछि जे असली मुजरिम के अछिओ शोषित वर्ग जकरा पर लेबल लगाओल गेल अछि, वा ओ वर्चस्ववादी व्यवस्था जे ई लेबल तय करैत अछि?

समाजमे जेकरा 'हीन' वा 'अपवित्र' मानल जाइत अछि, अंततः 'पवित्र' केंद्र ओकरे पर निर्भर होइत अछि। "सोलकनमा पोखैर" कथामे सोलकनमा टोलक पोखैर कें ऊँच जातिक लोक अछूत आ अपवित्र मानैत अछि । मुदा जखन गाममे आगि लगैत अछि, तखन ओही 'अपवित्र' पोखैरक पानि पूरा गामक प्राण बचबैत अछि आ जीवनरक्षक (अमृत/पवित्र) बनि जाइत अछि । ई कथा छुआछूत आ पवित्रताक मिथक कें पूर्ण रूपेँ उलटि दैत अछि आ देखाबैत अछि जे संकट कालमे बनावटी सामाजिक भेदरेखा कोना भसि जाइत अछि ।

"गिरहत घरपर गिद्ध" कथामे सवर्ण जमींदार स्वयं कें सत्ता आ शक्तिक केंद्र मानैत छथि । मुदा जखन दलित वर्ग अपमानित भऽ कऽ मरल माल-मवेशी उठबय सँ इन्कार कऽ दैत अछि, तखन ओही 'शक्तिशाली' लोकक घरपर गिद्ध मँडराय लगैत अछि आ ओ नचार भऽ जाइ छथि । एतय परिधि पर रहै-बला दलित वर्गक निष्क्रियता केंद्रकें पंगु बना दैत अछि। ई सामंती व्यवस्थाक खोखलापन आ वर्चस्ववादकें विखंडित करैत अछि ।

"पगला पुल" कथामे समाज जकरा पागल आ तिरस्कृत मानैत अछि (विनीत दास), ओ नदीक कात अपन जीवन निर्वाह करैत अछि । दोसर दिस मंत्री आ अधिकारी वर्ग अछि जकरा समाज 'बौद्धिक' 'सभ्य' मानैत अछि । मुदा नाव डूबबाक संकटकालमे 'सभ्य' 'बुद्धिमान' वर्ग असहाय भऽ जाइत अछि आ 'पागल' विनीत नदीमे कूदि सभक जान बचबैत अछि । एतय समझदारी आ पागलपनक देवाल खसि जाइत अछि आ 'पागल' समाजकें मानवताक पाठ पढ़बैत अछि ।

"तेतर दास" कथामे एकटा 'लूटना' (अपशकुन) कहल जाय बला बालक संस्कृतक प्रकांड विद्वान आ सन्त 'तेतर दास' बनि जाइत अछि । ओकर प्रवचनसँ हजारों लोक प्रभावित होइत अछि । मुदा जखन हुनका महंथ बनबाक बेर अबैत अछि, तखन हुनकर 'ज्ञान' पर हुनकर 'जाति' भारी पड़ि जाइत अछि । ई कथा धार्मिक आ आध्यात्मिक समभावक दाबा कें विखंडित करैत अछि आ ई प्रमाणित करैत अछि जे संस्थागत धर्ममे योग्यता सँ बेसी जन्मक सत्ता अछि ।

मेश पासवानक "मुजरिम"  खाली दलित उत्पीड़नक कन्नारोहट नहि थिक। ई ओ भाषिक आ वैचारिक संरचनाकें भीतरसँ तोड़ैत अछि जे कात-करोट आ फराक करबाक प्रवृत्तिकें जन्म दैत अछि । ई पाठ देखाबैत अछि जे समाजक केंद्र अपन अस्तित्वक लेल ओही परिधि पर निर्भर अछि जकरा ओ घृणा करैत अछि।

अत्यंत मार्मिक आ राजनीतिक दृष्टिसँ महत्त्वपूर्ण कथा "कोदारि छाप" जतऽ पंचायत चुनावमे दलित महिला लेल सीट आरक्षित होब लोकतंत्रक एकटा पैघ जीत आ शोषित वर्गक सशक्तिकरणक प्रतीक अछि । मुदा कथा ऐ दाबीकें भथा दैत अछि। आरक्षित सीट दलित महिला 'फेकनी' कें शक्ति नहि दैत अछि, बल्कि ओकरा सवर्ण/दबंग 'फोल्टर'क हाथक कठपुतली बना दैत अछि । लोकतंत्रक आवरणमे ई वास्तवमे नव-सामंतवाद थिक, जतय शोषक वर्ग सोझे शासन करबाक बदला दलितकें मुखौटा बना कऽ शासन करैत अछि । 'सशक्तिकरण' वास्तवमे नवका 'शोषण' कें जन्म दैत अछि। चुनाव चिह्न 'कोदारि' मजदूर वर्ग, श्रम, पसीना आ माटिक प्रतीक अछि । ई शोषित मुसबा आ ओकर पत्नी फेकनीक असली पहिचान थिक। चुनाव जितबाक लेल ई 'कोदारि छाप' अपन मूल अर्थ सँ कटि जाइत अछि । जे कोदारि खेत कोड़बाक काज अबैत छल, ओहि कोदारिक छाप आब मनरेगा योजनाक लाखो टाकाक घपला आ लूटक प्रतीक बनि जाइत अछि । शोषितक प्रतीक (कोदारि) कें शोषक (फोल्टर) अपन लाभक लेल 'हाइजैक' कऽ लैत अछि। कथाक अंतमे भ्रष्टाचारक जाँच होइत अछि आ फोल्टरक संगे-संग फेकनी सेहो गिरफ्तार भऽ जाइत अछि । ई देखाबैत अछि जे "कानून सभक लेल समान अछि"। की फेकनी वास्तवमे मुजरिम अछि? फेकनी अनपढ़ अछि , दारू आ प्रलोभनक जालमे फँसल ओकर पति मुसबा ओकरा चुनावमे ठाढ़ करबैत अछि , आ ओ मात्र कागज पर औंठा-छाप दैत रहल अछि । न्याय व्यवस्था फोल्टर (मास्टरमाइंड) आ फेकनी (शिकार) कें एकहि तराजू पर तौलैत अछि । एतय विखंडनवाद स्थापित करैत अछि जे तथाकथित 'न्याय' वास्तवमे अत्यंत अन्यायपूर्ण अछि, किएक तँ ई अज्ञानता आ व्यवस्थागत बेबसीकें सेहो 'अपराध' मानि लैत अछि। सामंती सोच वाला फोल्टर (केंद्र) मुसबा जहिना गरीब मजदूर कें नीचाँ देखाबैत अछि। मुदा सत्ता प्राप्त करबाक लेल (मुखिया बनबाक लेल) फोल्टर कें पूर्ण रूपेँ ओही दलित मुसबा आ ओकर पत्नी फेकनी (परिधि) पर निर्भर होवय पड़ैत अछि । शक्तिशाली फोल्टरक सत्ताक चाभी एकटा गरीब, अनपढ़ दलित महिलाक हाथमे अछि। ई शोषक आ शोषितक बीचक शक्ति-संतुलनकें विखंडित कऽ दैत अछि। "कोदारि छाप" स्पष्ट करैत अछि जे जा धरि समाजमे आर्थिक आ शैक्षिक असमानता (जेना मुसबाक गरीबी आ फेकनीक अशिक्षा) अछि, ता धरि केवल राजनीतिक आरक्षण (मुखिया पद) सँ कोनो वास्तविक बदलाव नहि आबि सकैत अछि । ई कथा शोषक वर्गक चालाकी आ कानूनी व्यवस्थाक डकढोल स्थितिक चित्र थिक।

"सहोदरा"मे रक्त-संबंध आर्थिक असुरक्षा, दू भायक बीच बँटवारा आ पुनः मिलापक कथा थिक । कथा ई स्थापित करैत अछि जे "सहोदर आखिर सहोदरे होइ छइ" । जनक अपन छोट भाय प्रेमकें पिता जकाँ पोसैत अछि । जखन जनक गरीबीमे फँसि मजदूरी करैत अछि, तखन सम्पन्न भऽ चुकल प्रेम अपन दोकान भायकें सौंपि दैत अछि । ई भाय-भायक प्रेमक एकटा आदर्श आ भावुक विजय थिक। ऐ कथामे पितृसत्ताक एकटा पैघ अंतर्विरोध नुकाएल अछि। घरमे बँटवाराक सम्पूर्ण दोष जनकक पत्नी (स्त्री) पर मढ़ि देल गेल अछि । समाज प्रायः पारिवारिक विघटनक मूल आर्थिक कारणकें छोड़ि स्त्रीकें 'घर फोरनी' वा कलहक कारण मानि लैत अछि। प्रेमक जे महानता देखाओल गेल अछि, ओ वास्तवमे ओकर आर्थिक संपन्नताक उपज थिक। जँ प्रेमक खेत एन.एच. (राजमार्ग) मे नहि पड़ितै आ ओकरा मुआवजासँ दोकान नहि भेटितै , तँ की ओ अपन भायकें ओतबा सहजतासँ उद्धार कऽ सकैत छल? ई कथा अचेतन रूपसँ ई साबित करैत अछि जे महानता आ त्यागक लेल सेहो 'पूँजी' क आवश्यकता होइत अछि।

१०

"विधवा विवाह" स्त्री-विमर्श आ 'पुरुष उद्धारक' क मिथक कथा अछि, कथा अल्पायुमे विधवा भेल सुशीलाक संघर्ष आ पुनः विवाहक अछि । समाज विधवाक प्रति अत्यंत क्रूर अछि। सुशीलाकें ओकर सासु डनियाही आ अलक्ष कहैत छथि । समाज ओकरा पर खराप नजरि रखैत अछि मुदा अपनाबय लेल तैयार नहि अछि । कथा एकर विरोध करैत एकटा प्रगतिशील युवा (अभियन्ता) द्वारा सुशीलाकें अपनाबय कें एकटा आदर्शक रूपमे प्रस्तुत करैत अछि । कथाक प्रारम्भमे सुशीलाक शारीरिक सुन्दरता (गोर वर्ण, पैघ आँखि, नम्हर केश) कें बहुत विस्तारसँ बताओल गेल अछि आ ओकरा 'ड्रीम गर्ल' कहल गेल अछि । जँ सुशीला कुरूप वा साधारण रूप-रंगक रहैत, तँ की अभियन्ता ओकरा बचाबय आ बिआह करबाक प्रस्ताव रखैत? स्त्रीक 'मूल्य' अखनो ओकर देह आ रूपे पर निर्धारित अछि। सुशीला समाजसँ आजिज आबि आत्महत्या करय जाइत अछि । ओकरा ऐ दुर्दशासँ निकालबाक लेल एकटा 'सक्षम पुरुष' (अभियन्ता) कें आबय पड़ैत अछि । सुशीला स्वयं स्वावलंबी भऽ कऽ समाजसँ नहि लड़ैत अछि; ओकर मुक्ति एकटा पुरुष सँ दोसर पुरुषक संरक्षणमे जाइ सँ होइत अछि। ई कथा प्रगतिशील भेलाक बादो स्त्रीकें 'असहाय' आ पुरुषकें 'रक्षक' मानबाक पारंपरिक पितृसत्तात्मक द्वैतवादकें नहि तोड़ि पबैत अछि।

११

"श्रमदानी बान्ह" समकालीन राजनीतिक व्यवस्था, संस्थागत भ्रष्टाचार आ 'डिजास्टर कैपिटलिज्म' (आपदा पूँजीवाद) क एकटा अत्यंत तीक्ष्ण आलोचना प्रस्तुत करैत अछि। लोक अपन परेशानी (बान्ह टूटबाक खतरा) लऽ कऽ मुखिया लग जाइत अछि, किएक तँ मुखिया गामक निर्वाचित प्रतिनिधि आ रक्षक थिक । मुखिया आश्वासन दैत अछि जे ओ प्रशासन (बी.डी.ओ., सी.ओ.) कें बजा कऽ बान्हक मरम्मत कराओत । कथा ई स्थापित करैत अछि जे राज्य-सत्ता (जेकर प्रतिनिधित्व मुखिया कऽ रहल अछि) नागरिकक रक्षाक लेल नहि, परन्तु शोषणक लेल अछि। मुखिया ग्रामीण लोककें बान्ह पर माटि देबय सँ रोकि दैत अछि । एतय 'रक्षक' (मुखिया) वास्तवमे 'भक्षक' प्रमाणित होइत अछि जे रातिक अन्हारमे अपन लठैतसँ बान्ह कटवा दैत अछि । ई लोकतंत्रमे जन-प्रतिनिधित्वक दाबाकें पूर्णतः विखंडित कऽ दैत अछि। राजनीतिक दृष्टिसँ ई कथा नव-उदारवादी अर्थव्यवस्थामे 'आपदा' कें 'अवसर' मे बदलबाक क्रूरतम रूपकें उजागर करैत अछि। मुखिया लेल गामक विनाश कोनो त्रासदी नहि, बल्कि एकटा 'प्रोजेक्ट' थिक। ओ स्पष्ट कहैत अछि जे जँ बान्ह नहि टूटत तँ घर केना खसत, आ जँ घर नहि खसत तँ इन्दिरा आवास, फसल-क्षति आ राहतक राशीमे ओकरा कमीशन (घूस) केना भेटत । एतय मानवीय पीड़ा आ बर्बादीकें सीधा-सीधा आर्थिक लाभमे बदलल जा रहल अछि। ई कथा स्पष्ट करैत अछि जे भ्रष्ट व्यवस्थामे 'विकास' लेल 'विनाश' एकटा आवश्यक पूर्व-शर्त बनि जाइत अछि। बान्हक नाम "श्रमदानी बान्ह" अत्यंत प्रतीकात्मक अछि । 'श्रमदान' जनताक सामूहिक शक्ति, आत्मनिर्भरता आ सामूहिकताक प्रतीक थिक। जखन सत्ता (मुखिया) ऐ बान्हकें कटबैत अछि, तँ ई केवल माटिक देवालकें तोड़नाइ नहि थिक, ई वास्तवमे जनताक 'सामूहिक श्रम' 'आत्मनिर्भरता' कें राज्य द्वारा नष्ट करबाक प्रतीक थिक। सत्ता नहि चाहैत अछि जे जनता आत्मनिर्भर रहय; ओ चाहैत अछि जे जनता घर-विहीन भऽ कऽ 'राहत' 'इन्दिरा आवास' लेल सत्ताक मोहताज बनल रहय। मुखिया लालचमे बान्ह कटबैत अछि आ अंततः पानिमे डूबि कऽ ओकरे अपन बेटा (अमित) क मृत्यु भऽ जाइत अछि । ई अछि "कर्म-फल" क संदेश। सत्ता आ विशेषाधिकारक नशामे मुखिया मानि लैत अछि जे ओ अपन रचल गेल विनाशी व्यवस्थासँ अछूत रहत। ओ सोचैत अछि जे बाढ़िक पानि केवल 'गरीब' कें डुबओत । मुदा प्राकृतिक आपदा आ भ्रष्ट व्यवस्थाक गठजोड़ आन्हर होइत अछि। शोषक वर्ग दोसरो लेल खाधि खनित करैत अछि, ओकर स्वयं कें सुरक्षित रहबाक भ्रम अंततः टूटनाइ निश्चित अछि । 'मुखियाक सत्ता' प्रकृति आ कर्मक अगाड़ि असहाय भऽ जाइत अछि। "श्रमदानी बान्ह" केवल एकटा भ्रष्ट मुखियाक व्यक्तिगत पतनक कथा नहि थिक, बल्कि ई समूचा 'सिस्टम' कें कटघरामे ठाढ़ करैत अछि। ई देखबैत अछि जे कोना संस्थागत लालच आम नागरिकक जीवनकें दाँव पर लगा दैत अछि, आ कोना सत्ताक केंद्र अपनहि रचल गेल जालमे अंततः फाँसि जाइत अछि।

 

१२

उमेश पासवान जीक  कथासभ समाजक यथार्थवादी आ मार्मिक चित्र खींचैत अछि, मुदा एकर विश्लेषण ई देखाबैत अछि जे समाजक सुधारवादी सोचक भीतरो कतहु ने कतहु पारंपरिक पूर्वाग्रह आ आर्थिक यथार्थ नुकाएल रहैत अछि।

 

[सैद्धांतिक विवेचन लेल देखू- मैथिली समीक्षाशास्त्र- गजेन्द्र ठाकुर]

 

अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ।