विदेह ४४५ म अंक पर पाठकीय मन्तव्य
प्रणव कुमार झा
अशोक कुमार ठाकुर के कविता निक लगल। प्रीति कुमारी श्री जगदीश प्रसाद मण्डल पर निक लेख लिखने छथि। डॉ० किशन कारीगर के हास्य कथा मोन पाडलक पहिने गाम घरक लोक सभ सहिए मे पादब मे संकोच नै करय छलाह आ एकरा ल क खूब हास्य होई। हमर एकटा भैया छलाह दिनकर दद्दा । दिल्ली मे एकटा मंदिर मे पुजारी। हुनक डेरा जाइत रहि त एक चरण एहि पर खिस्सा चलय। ओतय एकर कंपीटीशन लगय। गिनीज़ सन संस्था आ लोको प्रसिद्धि लेल केहन केहन रिकॉर्ड बनबय मे लगल रहय अछि! आचार्य रमानन्द मण्डल के लागय अछि प्रिय विषय छैन विद्यापति आ रानी लखिमा। मैथिलीक सेवा केवल मंच पर गर्जन-तर्जन आ नारा लगबलासँ होइत अछि, आ कि विद्यालंकार जकाँ मौन रहि पोथी संपादन आ सम्पादकीय कत्तव्य निभबलासँ? कल्पना जी अपन धारावाहिक लेख मे वाजिब सवाल जवाब केने छथि।
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