
अमरेश ठाकुर
मैथिली साहित्यमे उपन्यासक महत्व
साहित्य की अछि? विद्वान लोकनिक मत छनि जे ओ सबटा बौद्धिक गतिविधि जे लेखनी द्वारा व्यक्त होइत अछि आ अपन पूर्ण विस्तारक संग राष्ट्रीय साहित्यमे समाविष्ट होइत अछि। मुदा किछु विद्वान लोकनिक मत छनि जे साहित्य एकटा कलात्मक साहित्यिक कृतिक समुच्चय अछि जे मुक्त प्रेरणा से कएल गेल प्रयासक देन होइत अछि- आओर एकटा एहन प्रयासक देन होइत अछि जे कलाक लेल जन्म
लैत छथि आओर कलाक लेल जीवैत छथि हुनक सुन्दर कृतिमे अन्तरमनक गहराई, स्वभाविक अभिव्यक्ति, प्रकृत आ क्रमबद्ध नियोजन होइत अछि। “साहित्यकें सामान्यतः समाजक दर्पण कहल जाइत अछि। कारण साहित्यमे समाजक चिन्तन-मनन, क्रिया-कलाप, आशा-अभिलाषा, खान-पान, भेष-भूषा, विधि-व्यवहार आचार-विचार, व्यंग्य विद्रूप ओ सभ्यता-संस्कृति आदिक अभिव्यंजना कएल रहैत अछि वा प्रतिविम्बित होइत अछि । साहित्य समाजक यथावत रुप स्वरुपायित करैत एकर विसंगति, विद्रूप अभव्यक परिस्कारक मार्ग-दर्शन करैत अछि। समाजक अवाँछनिय स्थिति-मन स्थिति पर प्रहार करैत साहित्य एकर संशोधन संवर्द्धनक लेल समाजकें प्रेरित करैत अछि, सक्रिय करैत अछि ओ तँ हम साहित्यकें दर्पण सँ विशिष्ट मानैत छी, प्रभावोत्पादक मानैत छी, मुदा साहित्यक ई रुप स्मपूर्णतः स्वरुपायित होइत अछि वस्तुतः उपन्यासहि मे । साहित्य वैयक्तित्वक दुश्चिन्तन, समाजिक विसंगति ओ मानवीय दुर्बलताक उद्घाटन कए अपन विशिष्ट शैली सँ ओही पर प्रहार करैत सुधारक मार्गदर्शनक सर्वाधिक अवसर
सुनियोजित करैत अछि।1
भारतीय साहित्यकार ओ आलोचक, लोकनिक दृष्टिमे उपन्यास साहित्यक एकटा महत्वपूर्ण अंग थीक । उपन्यास विद्याक बिना साहित्य अपूर्ण मानल जाइत । उपन्यास आओर महाकाव्यक बीच तुलना करैत विद्वान लोकनिक मत छनि जे उपन्यास आधुनिक समाजक उपज आदि मुद्रा महाकाव्य प्राचीन समाजक । उपन्यास बुर्जुआ साहित्यक श्रेष्ठतम रचना अघ्छि- जे साहित्य कलाक एकटा नव मुदा महत्वपूर्ण अंग अछि। महाकाव्य द्वारा समाजक पूर्ण अभिव्यक्ति होइत अछि मुदा उपन्यासक विषय होइत अछि व्यक्ति जे समाजक विरुद्ध, प्रकृतिक विरुद्ध व्यक्तिक संघर्षक महाकाव्य होइत अछि आओर वो ओहि समाजमे विकसित होइत अछि जाहिमे व्यक्ति आ समाजक बीचमे संतुलन नष्ट भऽ जाइत अछि आ व्यक्तिके अपन सहजीवी साथी वा प्रकृतिक बीच युद्ध ठनल होए।
”उपन्यास विश्वक कल्पना-प्रसूत सभ्यता-संस्कृतिक एकटा सबसँ महत्वपूर्ण देन अछि। विश्वकें महान उपन्यास- डॉन क्चिगजोट, गारगनतुआ आओर पान्तागुएल रौबिन्सन कुसो, जोनाथन वाइल्ड, जाक्चे ला फेटैलिस्त, ला रुज ए ला न्यावर, युद्ध और शांति, ला एजुकेशन सेन्टिमेटल, वुदरिंग हाइट्स, दी वे ऑफ फ्लैश- एहि कारणें
महान अछि कियाक ओहिमे चिन्तनक गुण निहित अछि एवं जीवनक अत्यंत भावपूर्ण वा प्रेरणापूर्ण घटनाक्रमकें कलात्मक अभिव्यंजना कएल गेल अछि।2
पाश्चात्य विद्वान लोकनि ओ भारतीय विद्वान लोकनिक मान्यताक तुलनात्मक विवेचन कयलाक उपरांत एतबा बात स्पष्ट रुपें देखबामे आओत जे उपन्यास एकटा एहन नवीन ओ सशक्त विद्या अछि जाहि मध्य कथानकक-सघटना, चरित्र-निर्माण देश-काल सयोजन, अभिव्यक्ति भंगिमा अथवा भाषा-शैली, उद्देश्य वो वातावरणक शिल्पगत सयोजन कएल जाइत अछि जाहिमे मनोरंजकता ओ कलात्मक सौंदर्य होएब आवश्यक होएत अछि। उपन्यास साहित्यक एक गोट नवीन विद्या थीक जाहिमे कल्पनाक आधार पर मानव, जीवनक यथावत चित्रण कथानकक रुपमे रहैत अछि। कथानक तें एकर मुख्य अंग भेल किन्तु घटनाक संग-संग चरित्र वो वातावरणक सृष्टी सेहो ओहीमे आवश्यक होएत अछि।
“कलाक दृष्टीसँ उपन्यासक उपादान कथानक, चरित्र वातावरण, कथोपकथन, भाषा-शैली, लेखकक अपन दृष्टिकोण प्रभृति सबहुँ स्वीकार करैत अछि। मैथिलीमे उपन्यास नव वस्तु थीक । वस्तुतः उपन्यास साहित्य पश्चिमसँ आएल अछि ओ एकर विकास भारतीय भाषा सभमे पश्चिमहिक प्रभावसँ भेल अछि ।3
भारतीय साहित्यमे आरंभमे बंगला भाषाक माध्यमसँ उपन्यासक अभिव्यक्ति भेल आ धीरे-धीरे सभ भाषामे एकर रचना होमए लागल।
मिथिलाक सुशिक्षित साहित्यकार पाश्चात्य साहित्यक उपन्यासक परम्परामे लिखल बंगला उपन्यासक अनुकरण कए मैथिलीमे उपन्यास रचनाक प्रारम्भ कएलनि । मैथिली साहित्यमे उपन्यासक बहुत महत्व छैक किएक जखन एकबेर उपन्यासक रचना प्रारम्भ भेल ओ निरंतर नव-नव विषय-वस्तु समाजिक समस्या आ नव विचारधाराक संग चलैत आबि रहल अछि। मैथिलीक उपन्यासकार लोकनिमे पं. जर्नादन झा ”जनसीदन“ पं. रास बिहारी लाल दास, पं. पुण्यानन्द झा, पं. काञ्चीनाथ झा ”किरण“ बाबू लक्ष्मीपति सिंह ओ पं. ब्रजनन्दन आदि । ई लोकनि समाज-सुधार ओ मनोरंजक उद्देश्य से उपन्यासक रचना कएल। एहि सब उपन्यासक कथा रोमांटिक अछि जकर विकास संयोग आश्रित अछि।
”पाश्चात्य भाषा साहित्यक प्रत्यक्ष प्रभावमे पर मैथिलीक सर्वप्रथम उपन्यास लिखलनि अंग्रेजी शिक्षासँ दिक्षित प्रो. हरिमोहन झा। प्रो. हरिमोहन झाक ई उपन्यास थीक “कन्यादान”। “कन्यादान” क लोकप्रियता ओ प्रभावकें देखैत एकरा एकटा करिश्मा कहल गेल। एहि उपन्यासमे हास्य-व्यंग्यक आश्रय लए मैथिल समाजक बहुविध दोषक उद्घाटन कए ओकर सुधारक मार्गदर्शन कएल गेल अछि । एहिमे एकहि संग मिथिलामे स्त्री शिक्षाक अभावक कुपरिणाम अंग्रेजी शिक्षाक कुपरिणाम ओ अनमेल विवाहक कुपरिणामक विस्तारसँ वर्णन भेल अछि ।
“कन्यादानमे” मैथिल समाजक विसंगति ओ विकृतिक, समाजक व्यक्तित्व, पारिवारीक ओ समाजिक दोषक उद्घाटन कएल गेल अछि।
प्रो. हरिमोहन झा मैथिल समाजके एहि समस्याक समाधान देखाओल अछि “द्विरागमनमे” जे वस्तुतः “कन्यादान क” दोसर भाग थिक । स्पष्ट अछि जे प्रो. झा ई कथा कहि मैथिल समाजमे स्त्री-शिक्षाक मार्गदर्शन कएल “कन्यादान” क लोकप्रियता सँ उत्साहित, प्रभावित ओ प्रेरित भए मैथिलीक साहित्यकार लोकनि नव-नव कथा लए नव-नव शिल्प-शैलीमे उपन्यासक रचना करए लगलाह।4
मैथिली उपन्यासक विकासक्रममे प्रो. हरिमोहन झाक पश्चात 1960 ई. धरिक अवधिमे सफल उपन्यास-रचयिताक रुपमे प्रमुख मानल जाइत छथि पं. योगानन्द झा, पं. वैद्यनाथ मिश्र “यात्री”, पं. उपेन्द्रनाथ झा “व्यास”, पं. मणीन्द्र नारायण चौधरी “राजकमल” डॉ. शैलेन्द्र मोहन झा, पं. चन्द्रनाथ मिश्र “अमर” ओ प्रो. मायानन्द मिश्र। पं. योगानन्द झाक उपन्यास “भलमानुषमे” मिथिलाक कुलीन प्रथाक वैवाहिक दोषक उद्घाटन कएल गेल अछि। पं. वैद्यनाथ मिश्र “यात्री”, क “पारो” उपन्यासमे प्रेम ओ कोमल भावनाक चित्रांकन कएल गेल अछि। प्रो. मायानन्द मिश्रक उपन्यास “बिहाड़ी पात आ पाथर” अवस्थाजन्य अनमेल विवाहक समस्या आ नायिकाक दलित वासनाक, उष्णताक स्वभाविक चित्रांकन कएल गेल अछि। पं. उपेन्द्रनाथ झाक उपन्यास दू-पत्र जे साहित्य अकादमी द्वारा पुरस्कृत भेल। ई पत्रात्मक शैलीक उपन्यास थिक। एहि उपन्यासमे भारतीय वो पाश्चात्य नारी-समाजक मनस्थिति ओ आदर्शक चित्रांकन क संगहि दूहू देशक संस्कृतिक तुलनात्मक वर्णन सेहो कएल गेल अछि।
प्रो. मायानन्द मिश्रक तेसर उपन्यास “मन्त्रपुत्र” जे 1988 ई मे साहित्य अकादमी द्वारा पुरस्कृत कएल गेल ओहीमे वैदिक युगक आर्य-अनार्यक समन्वयसँ परिवर्तित होइत समाजक संस्कृति चित्रांकन कएल गेल अछि। 1973 ई मे साहित्य अकादमी सँ पुरस्कृत ब्रजकिशोर वर्मा “मणिपदम” द्वारा रचित उपन्यास “नैका बनिजारा” लोकतत्व पर आधारित अछि । एहि मध्य तीन कथाक गुम्फन कएल गेल अछि हिमालय अंचलक कनकमंजरी, सागरक निजारा रत्नसेन आ महाभिक्षु देवपद्म कथा। 1976 ई. मे मैथिली अकादमीक स्थापनासँ मैथिली प्रकाशन तीव्रसँ तीव्रतर भेल। मैथिली अकादमीसँ मैथिली उपन्यासहुक प्रकाशन प्रारंभ भेल। 1960 ई. सँ एही रुपें प्रकाशित उपन्यासकार लोकनिक लोकप्रिय उपन्यास सभ थिक पं. सुधांश शेखर चौधरीक “तर पट्टा ऊपर पट्टा” “ई बतहा संसार” “दरिद्रछिम्मरि” “निवेदिता”। धीरेश्वर झा “धीरेन्द्रक ”भोरुकबा“ ”कादो आ कोयला“। पं. ललितेश मिश्र ”ललित“ क ”पृथ्वीपुत्र“ पं. जीवकान्त जीक ”पानीपत“ ”दू कुहेशक बाट“ पं. ब्रजकिशोर वर्मा ”मणिपद्म“क विद्यापति, अनलपथ, अर्द्धनारीश्वर, क्रोब्रागर्ल, लोरिक विजय, राजा सलहेश आदि। श्री प्रभास कुमार चौधरीक युगपुरुष, अभिशप्त, हमरा लग रहब?, नवारम्भ, राजा पोखरिमे कतेक मछरी, पं. मार्कण्डे प्रवासीक ”अभियान“ श्री मति लीलीरेक ”पटाक्षेप, मरीचिका, पं. विभूति आन्नदक “पराजित” “गाम सुनगै” श्री मति उषा किरण खाँक “अनूत्तरित प्रश्न” “दूर्वाक्षत” पं. गोविन्द्र झाक “विद्यापतिक आत्मकथा” ओ मदनेश्वर मिश्रक “एक छलीह महारानी” आदि। 1960 ई. पश्चातक प्रतिनिधि उपन्यासकार ख्याति प्राप्त कएल अछि डॉ. मायानन्द मिश्र, पं. सुधांसु शेखर चौधरी, डॉ. धीरेश्वर झा “धीरेन्द्र”, पं. ललितेश मिश्र “ललित”, पं. रामानन्द रेणु, पं. जीवकान्त, पं. प्रभाष कुमार चौधरी, डॉ. गंगेश्वर झा “गंगेश गुजन” आ श्रीमति लिली रे कारण ई लोकनि अंत होइत मध्यकालिन व्यवस्थाक पृष्ठभूमिमे आगत आधुनिक युगीन नवभावना, नवचेतना, नवजागरण, नव समस्या ओ तकर समाधानक नवतरीकाक सूक्ष्मतासँ परिदर्शन कएल अछि। नव-नव विषयक अभिव्यक्तिक लेल नव-नव शैलीक प्रयोग कएल अछि ओ समाजक नव-नव चरित्रक उद्घाटन कएल अछि।5
1980 ई0 मे साहित्य अकादमीसँ पुरस्कृत “ई बतहा संसार” मैथिली उपन्यासकें एक नव नूतन विषयसँ साक्षात्कार कराओल अछि।
धीरेन्द्र जीक “भोरुकबा” ग्राम्य जीवनक परिवर्तित होइत परिवेशक कथा कहैत अछि। ललित जीक “पृथ्वीपुत्रमे” शोषित वर्गक चित्रण कएल एल गेल अछि। जीवकान्तजीक “दू कुहेसक बाटमे” संकोची, भावुक, कल्पनाशील, स्वाभिमानी ओ अर्न्तमुखी निर्धन नवयुवकक द्वन्दक संघर्षक चित्रांकन कएल अछि। प्रभाष कुमार चौधरी क “युगपुरुष” आ “अभिशप्त” उपन्यासमे समन्वयात्मक दृष्टिसँ एहि दुहू उपन्यासमे वर्तमान युगक समाजिक जीवनक दिशाहीनता, खण्डित, विश्वास, विषाद, अनास्था, असंतोष ओ नैतिकताक हास आदिक चित्रांकन कएल गेल अछि।
गंगेश गुंजन जीक उपन्यास “पहिल लोकमे” विसंगति ओ असन्तुलन स अक्रान्त समाजक शिक्षित नवयुवकक अवसाद वो कुण्ठासँ उत्पीड़ित, विवश, हारल-थाकल ओ निष्क्रिय बनल मनस्थितिक कथा कहल गेल अछि। श्रीमती लिली रेक 1982 ई0 मे साहित्य अकादमी सँ पुरस्कृत उपन्यास “मरीचिका” दू खण्डमे प्रकाशित अछि। दूनू खण्ड मिलाए हजार पृष्ठक एहि उपन्यासमे सरलता, सहजता ओ रोचकता सर्वदा बनल रहल अछि। 1990 ई क पश्चात उपन्यास लेखन एवं प्रकाशनक गति अत्यंत मंधर भए गेल। धूमकेतुक उपन्यास “मोड़ पर” विषय वस्तु अछि स्वतंत्रता प्राप्तिसँ पूर्वापरक समाजिक चित्र । एकैसम शताब्दीक दू दशकक अंतरालमे आशाक किरण पुनः जागि रहल अछि । एहि अवधिक सर्वाधिक दीर्घकार्य उपन्यास थिक “हरि इच्छा गरीयसी” एही उपन्यासये इतिहास, भूगोल, राजनीति, ज्योतिष, दर्शन नीति इत्यादिक स्पष्ट आ सजीव चित्रण भेल अछि ।
2010 ई0 साहित्य अकादमीसँ पुरस्कृत डॉ. उषाकिरण खाँ रचित उपन्यास “भामती” मिथिलाक पूर्व मध्यकालीन आ मध्यकालीन इतिहासक युग ओही समयक समाजिक परिस्थिति आ स्त्री दशा-दिशा ओ स्त्रीक शिक्षा व्यवस्थाकें उजागर करैत अछि। 2014 ई0 मे आशा मिश्रक “उचाट” के साहित्य अकादमी द्वारा पुरस्कृत कएल गेल। एही उपन्यासक आधार अछि टू गोट अर्न्तमनक ग्रन्थिक एक उचाटक कारण तँ दोसर परिणाम । मैथिली उपन्यासक उद्भव, विकास ओ अद्यतन स्थितिक निष्कर्षस्वरुप कहि सकैत छी जे दीर्घ कथाक रुपमे प्रादुर्भूत मैथिली उपन्यास अंग्रेजी भाषा साहित्यक प्रभावमे औपन्यासिक रुपमे स्वरुपायित भेल । मुदा 1960 ई धरि अपवाद-स्वरुप एक आधकं छोड़ि सकल उपन्यास मैथिल समाजक अनमेल विवाहक समस्या रचित होइत रहल।
मिथिला मिहिर क प्रकाशन ओ मैथिली अकादमीक स्थापना मैथिली उपन्यासक रचना ओ प्रकाशनक गतिकें तीव्रतम कए देलक, फलस्वरूप 1960 ई0 सँ 1987 ई. क अवधिमे प्रायः शतावधि उपन्यास प्रकाशित भेल। विषय वैविध्यहुक दृष्टीसँ ई अवधि मैथिली उपन्यासक लेल महत्वपूर्ण कहल जाए सकैत अछि। एहि अवधिक उपन्यासमे प्रायः समस्त समाजिक समस्या ओ सम्पूर्ण वैयक्तिवक मनोदशाक कथा कहल गेल अछि।
“उपन्यास साहित्यक सर्वोत्कृष्ट निधि थीक । समाजक हृदयमे आदर्श सदविचार एवं सदाचारकं दृढ़तापूर्वक स्थापित करबाक श्रेय मधुर उपन्यास विद्यार्के देल जा सकैत अछि जे सरल, रोचक एवं मधुर-शैलीमे पात्रक चरित्र-चित्रणकें दर्पण जकाँ समाजक समक्ष आनैत अछि जाहि मध्य कथानकक-सघटना, चरित्र निर्माण, देश-काल संयोजन, अभिव्यक्ति भंगिमा अथवा भाषा शैली, उद्देश्य वो वातावरण शिल्पगत रुपसँ संयोजन कएल रहैत अछि ।6
सन्दर्भ :
1) मिश्र, विश्वेश्वर 1996, मैथिली गद्य साहित्य, मैथिली विभाग, पटना विश्वविद्यालय पृ.- 86
2) फॉक्स, रेल्फ 1980, उपन्यास और लोकजीवन, पब्लिसिंग हाउस, नई दिल्ली
3) पाठक, अमरेश 2007, मैथिली उपन्यासक आलोचनात्मक अध्ययन, आलोक प्रकाशन, पटना, भूमिका
4) मिश्र, विश्वेश्वर 1996 मैथिली गद्य साहित्य मैथिली विभाग, पटना विश्वविद्यालय पृ.- 87
5) मिश्र, विश्वेश्वर 1996, मैथिली गध साहित्य मैथिली विभाग, पटना विश्वविद्यालय पृ.- 90
6) झा, किशोर कुमार 1996, मैथिली गद्य साहित्य, मैथिली विभाग, पटना विश्वविद्यालय पृ.- 164
-अमरेश ठाकुर, शोधार्थी,
विश्वविद्यालय मैथिली विभाग,
ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय,
कामेश्वरनगर,
दरभंगा
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