
संतोष कुमार राय 'बटोही'
कथा 'गैस सिलिंडर'
आधा देह जरि गेल छै आओर आधा देह अधजरल छै। भरि आँगन मे लोक भरल छै । सभ
कियो एक-दोसर सँ पूछि रहल छै-''एना कोना भऽ गेलै ?" सभ दुखि छथि । सभ कियो
कनिया केँ मुँह देखवाक लेल बेचैन छथि। एँड़ी उठा-उठा कऽ सभ कियो ओसारा पर
मुइल कनिया केँ देखवाक यत्न कऽ रहल छथि ।
"ई मोदी सरकार केर किरतानी छियैय । देश चलौल नहि होयत छन्हि तँ गद्दी पर
क्याक बैसल छथि ?" , सिधपावाली बजलीह ।
"मोदी की केलकौ ,गे बहिन ई तँ ईरान आओर अमरिका केँ बीच युद्धक कारणे भऽ रहल
छै।", सांगीवाली बजलीह ।
एतबे मे कनिया केँ नैहर सँ कनिया केँ भाई आओर माय आबि गेलथिन्ह । बपहारि
काटि कऽ कनियाक माय कानि रहल छलथिन्ह । आँगन मे हड़बड़ी मचि गेलै। सभ कियो
कनिया केँ माय के देखि रहल छलथिन्ह । कनिया माय केँ दाँति लागि गेलैन्ह।
" हे ....हे मुँह पर पानि केँ छिंटा मारियौ ।" रतन काका बजलाह ।
" नाक केँ दाबि दहक ।" रौदी बाजि कऽ कनिया केँ माय दिस दौड़लाह ।
कनिया केर माय ओरियानी में चीत्ते गिर गेल छलथिन्ह । सभ कियो हुनका घेरने
छलैन्ह।
दामोदर बजलाह , " हे कनी विएन देल जाउ ।"
पिंकू घर सँ विएन निकालि कऽ दामोदर दिस बढ़ौलाह । विएन सँ घंघौरवाली काकी
कनिया माय के मुँह पर हवा देमऽ लगलीह । नाक दबेला सँ दाँती लगलाह छुटि
गेलैन्ह ।
" गे जानकी गे जानकी .....नहि बुझलियै बेदरदा सभ मिलि कऽ तोरा गैस लेल मारि
देतौ ....नहि तँ केकरो सँ करजा माँगि कऽ गैस सिलिंडर किन दैतियौ । .....बाप
रौ....बाप .....हमरा बेटी केँ मारि कऽ ई गाम वाला नीक नहि केलाथि । "
जानकी केँ देह कारी भऽ गेल छलैन्ह । हुनकर मुइल देह सँ पीब जँका किछु निकैल
रहल छै । दस दिन दरभंगा सँ इलाज भेलैन्ह, परञ्च ओ नहि बचलीह ।
हुनकर साउस-ससुर घर-बाड़ छोड़ि कऽणगाम सँ भागि गेल छथि। घरवाला परदेश कमैत
छथि । ब्याह केर तीन बरख भेल छलैन्ह । कतेक नीक रहैत छलीह । गैस सिलिंडर
लेल देश मे मारा-मारि भऽ रहल छेलै । एजेंसी पर एक-दु किलोमीटर लाईन लगैत
छेलै । कतेक दिन तँ गैसक नहि भेटलाक कारणे चिउरा आओर दही खाय पड़लैन्ह कतेक
लोक के । एजेंसी पर दु-सँ-तीन दिन चक्कर लगौला सँ थाकि कऽ कतेत लोक गोइठा
आओर जरना केँ जुगाड़ केलाथि । कतेक दिन भूखे सुतऽ पड़लैन्ह लोक के ।
नेना-भुटकाक भूख सँ मुँह सुखा गेल छेलैक । अंधरावाली हवोडकार मारि कऽ अपन
आठ महीना केर नेना केँ कोरा मे नेने कानैत छलीह ।
अमित पीबिकऽ राति मे घर ऐलाह । दु दिन सँ एजेंसी पर दौड़ैत-दौड़ैत तबाह
छेलाह, परञ्च देश मे गैस सिलिंडरक संकट केँ कारणे हुनका गैस नहि भेटलैन्ह ।
तेसर दिन भौजी केँ दबाब डालि कऽ कहऽ लगलथिन्ह जे नैहरा सँ एकटा गैस भरवा कऽ
भाई केँ कहियौ भेज देत । देवरक ई गप सुनि कऽ जानकी केर माथा घुमि गेलै।
देवरक दबाब केँ कारणे वो हारि कऽ नैहर फोन केलीह ।
"माय गै ! एकटा गप कहियौ ?"
" की ? ...कह ने ।"
" हमरा ऐठन गैस सैध गेल छै ।"
" त ?"
" त, ....त एकटा भरलाहा गैस सिलिंडर भेज दैतही ऐठाम .....।"
" बउवा गै ! ...गै....गैस तऽ अहुठाम नहि भेट रहल छै.....। दु दिन सँ घरमे
सभ उपासे छै । नवीन गैस एजेंसी केर तीन दिन सँ चक्कर काटि रहल छौ, परञ्च
गैस हाथ नहि लगलउ ओकरा।"
" देखिइएह, ....भेट जेतौ त......।"
फोन कटि गेलै ।
अगिला दिन जानकी केर देवर नशा मे धूत भौजी सँ बजलाह, " की भेल
भ...भ...उ...जी....?"
"गैस तऽ ओतौ नहि भेट रहल छै बउआ।"
" की...की...कहलियै ?"
" गैस ओतौ नहि भेट रहल छै ।"
"धूत तेरी की.....त अहाँ कथी केँ भ...उ..जीजीजी....।"
अमित दु दिन सँ ठीक सँ खाना नहि खेने छलाह ।
गोस्सा सँ तमतमैत बाजल, " अहाँ माय-बाप सँ दहेजो मे किछु नहि लेल गेल छल ।
आओर एकटा गैस सिलिंडर अहाँ केँ नैहरा सँ लौल नहि भेल ?"
अमित तमतमैत किचेन घर दिस गेल। चाह बनबै लेल जे पाँच लिटर केर गैस सिलिंडर
छेलै ओकरा
लऽकऽ भौजी केर बेड रूम मे पहुँचल । घरक सभ कियो खेत-पथार दिस गेल छेलै।
अमित भउजी केँ घरक खाम मे बैन्ह देलकै । मुँह मे कपड़ा ठुसी देलकै आओर गैस
आन कऽके आगि लगा देलकै। जानकी केँ देह मे आगि लागि गेलै । काँच आमक चेरा
जकाँ चरचरैत ओकर देह जरऽ लगलै । संयोग छेलै जे अमित केँ खोजैत राहुल आबि
गेलैक। अमित केँ नशा मे धूत देखलक । कतौ सँ कपड़ा जरै केँ गंध आबैत देखि कऽ
ओ अमित केँ दिस दौड़ैत बजलाह, " की जरि रहल छौ भाय ?"
अमित सकपका गेलै। ओ हड़बरैत बाजलाह
, " नहि किछु ।"
रोहित केँ बेड रूम सँ गंध आबैत सुंइघ कऽ ओ रोहितक बेड रूम दिस दौड़लाह।
केबाड़ लग जैत मातर ओ बुझि गेलाह की किछु गड़बड़ भऽ रहल छै । खिड़की सँ ओ
रूम मे देखैत छथि जे भौजी खाम सँ बानहल छै आओर देह मे आगि लागल छै। राहुल
चिल्ला कऽ शोर केलाथि। लोक सभ जमा भेलै । केबाड़ तोरल गेलै । ताबेतक भौजी
केर देह केर ज्यादा हिस्सा जरि गेल छेलैक ।
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