VIDEHA ISSN 2229-547X  ·  First Maithili Fortnightly eJournal  ·  Since 2000  ·  www.videha.co.in
विदेह — प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका
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विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका

विदेह

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प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका — First Maithili Fortnightly eJournal

विदेह नूतन अंक
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तेलुगु काव्य: काठक घोड़ा [मूल तेलुगु'कोय्या गुर्रम' केर लेखक छथि नग्नमुनि (मानेपल्लि हृषीकेशवराव)]

मूल तेलुगु लेखक

नग्नमुनि एक परिचय

नाम: मानेपल्लि हृषीकेशवराव

जन्म: 15 मई 1940

जन्म स्थान: शहर- तेनाली, जिला- गुंटूर (आंध्र प्रदेश)

वृत्ति: चीफ डिटर, आंध्र प्रदेश विधान सभा, तकर बाद डिप्टी सेक्रेटरी, ओतहि

लिंक: पहिने साम्यवादी (कम्युनिस्ट), बादमे राष्ट्रवादी (नेशनलिस्ट)

संस्था: अविभाज्यक जनतंत्र, 1990

आंदोलन: दिगम्बर कविता आन्दोलन 1965

लक्ष्य: नंगट, भूखल, दीन, दरिद्रक हित

कृति:

उदयिंचनि उदयलु (ओ उदय जे उदित नहि भेल)

पूर्वा हवा

जम्मि चेट्ट

विशेष: 1977 ई. मे बहुचर्चित काव्य- 'कोय्या गुर्रम' (KOYA-GURRAM), जकर अर्थ अछि- 'काठक घोड़ा', भाव- 'नकली सरकार'19 नवम्बर 1977, शनि दिन बंगालक खाड़ीमे पचास-साठि फुट ऊँच लहड़ि उमड़ि कऽ कृष्णा जिलाक दिविसीमा क्षेत्रकेँ डुबा कऽ नष्ट कऽ देलक। हजारो लोक मारल गेलाह। घटना काव्यक वस्तु बनल। विषय आ परिस्थितिसँ उपजल ई काव्य हिन्दी कवि मुक्तिबोधक 'अंधेरे में' बराबरीक अछि।

मैथिली अनुवादक

नाम: मानेश्वर मनुज

जन्म: गाम- गम्हरिया (बेनीपट्टी) मधुबनी। जनवरी 1958 (प्रमाण पत्रक अनुसार)।

वृत्ति: भारतीय नौसेनामे तकनीकी सहायक, तकर बाद भारतीय रेलक वाणिज्य विभाग सँ (रिटायर्ड)।

कृति:

'म्बन्ध', कथा संग्रह (मैथिली) 2007

'कि', कविता संग्रह (मैथिली) 2011

'परिवर्तन', कहानी संग्रह (हिन्दी) 2019

'बेघर', कविता संग्रह (हिन्दी) 2022

'तालाब', कहानी संग्रह (हिन्दी) 2024

अनुभव: विभिन्न भाषा सँ हिन्दी आ मैथिलीमे अनुवाद। हिन्दी आ मैथिलीक विभिन्न पत्र-पत्रिकामे लेख, कविता, कथा, कहानी इत्यादि प्रकाशित।

अनुवादकक टिप्पणी: अनेक तेलुगुमित्र, स्वयं नग्नमुनि जी, हिन्दी तथा अंग्रेजी मे अनुदित पुस्तकक मदति सँ दीर्घ काल तक मंथन कयलाक बाद अनुवाद कयल गेल अछि। ई नग्नमुनिक प्रसिद्ध कविता अछि। नग्नमुनि सँ लगातार हमर पत्राचार होइत छल। ओ अंग्रेजी आ तेलुगुक विद्वान छलथि। हुनक किछु पत्र देसिल-बयना, हैदराबाद मे छप अछि। -मानेश्वर मनुज

 

सम्पादकीय टिप्पणी (खण्ड-४)
ई खंड कविताक स्वर आ दार्शनिक धरातल दूनू मे एकटा निर्णायक मोड़ थिक। ई चारिम खंड साक्षात हिंसा, विश्वासघात, आ काल-गणनाक प्रकृतिक गहीर दार्शनिक प्रश्न सभ सँ ढुइस लड़ैत अछि। कविताक आरंभ गृहस्थक एकटा जीवंत चित्र सँ होइत छै- राति फरीछ होबऽ सँ पहिने बड़द संगे हर-फार कन्हा पर लादल, खेत दिस पैर घसीटैत चलऽवाला गृहस्थ। ई चित्र एकटा आकस्मिक मोड़ लैत अछि: हमरा सूली पर लटकैत ईसा-मसीह लगैत छथि।, जेना ग्रामीण श्रम आ ब्रह्मांडिक पीड़ा कोनो गहीर स्तर पर एकहि छथि। ईसा केँ बुझल छलनि जे अंतिम आमंत्रण मे हुनका धोखा देबऽवला के छलनि? कवि आगू कहैत छथि: “हमरा बुझल अछि- नीक जकाँ बुझल अछि जे हत्यारा के?” ई अपन भीतरक अन्हार सँ साक्षात्कारक प्रक्रिया थिक। आ तइयो कवि ई स्वीकारैत छथि- “मुदा थोड़ेक कालकेँ लेल दोख सागर पर मढ़ैत छी।” ई ईमानदार स्वीकारोक्ति कविता केँ नैतिक उँचाई दैत अछि। तारीख (उन्नैस नवंबर) आ पंचांग एकटा स्थिर, वस्तुगत सत्ता जकाँ उपस्थित छल। कवि तारीखक ओहि मिथ्यात्व केँ उधेसि दैत छथि: कैलेंडर केँ हाड़-माँस नहि होइत छैक / ओ कालरूपी कुकरक मुँहक हड्डीक टुकड़ा अछि / ओ बुझू देवालसँ सटल गिरगिट अछि / ओ केवल कागतक टुकड़ा अछि। कैलेंडर- जे काल केँ टुकड़ी-टुकड़ी कऽ कऽ नापैत अछि, तिथि, सप्ताह, महीना बनबैत अछि- स्वयं काल नहि, मात्र कागच थिक। मुदा ई कागच- चद्दैर तानि कऽ पड़ि जाइत अछि- आ ओकर नीचाँ सँ- कुहरबाक आवाज- आबैत अछि। कवि स्पष्ट कहैत छथि: कैलेंडर मे प्रलय आ परिहास केँ छोड़ि नोरक निशान सेहो नहि होइत छैक। अर्थात्, कैलेंडर मानव-निर्मित समय-पत्र पर मात्र भाषाक खेल थिक- असल प्रलय, परिहास, वा नरक कैलेंडर सँ परे अछि। अंत कालक भयावह रूपक चित्रण सेहो अछि: “काल रात्रिक ओ कराल नेत्र / शनिक दिन काँट मे ओझड़ा कऽ / ताबड़तोड़ छटपटाइत रहल- मुदा एहि भयावह चित्रणक बीच कवि एकटा अडिग आस्था व्यक्त करैत छथि: मानवता, सब दिन, सब क्षण / जन्म लेबऽ आ मरऽवला / रोशनीक किरण थिक। अंतिम पाँति पूरा खंडक आँखि थिक। जन्म-मरणक नश्वर मानवता, सभ काल-दोष आ हिंसाक बीच, अंततः रोशनीक किरण थिक। काल भले कराल होइक, मानवीय चेतनाक दीपक ओहि करालताक पार देखऽ मे सक्षम थिक।
- गजेन्द्र ठाकुर

 

 नग्नमुनिक तेलुगु काव्य

 

'काठक घोड़ा' (कोया गुर्रम)

 

खण्ड-४

अपना माथ पर

राति फरी होब सँ पहिनहे

दुब्बर-पातर बद केँ साथ ल

र-फार कन्हा पर लदनें

खेत दिस पैर घसीटै, चलैत गृहस्थ

हमरा सूली पर लटकैत

सा-मसीह लगैत थि

 

हाँ, हम हत्याक विषय कहैत छी

सा केँ बुझल छलनि जे-

अंतिम आमंत्रण मे आखिरकार

हुनका धोखा देबवला के छलनि?

 

हमरा बुझल अछि-

नीक जकाँ बुझल अछि जे

हत्यारा के?

-मुदा थोड़ेक कालकेँ लेल

दो सागर पर मढ़ैत छी।

 

कैलेंडर केँ हाड़-माँस नहि होइत छैक

ओ कालरूपी कुकरक मुँहक हड्डीक टुकड़ा अछि

ओ बुझू देवालसँ सटल गिरगिट अछि

ओ केवल कागतक टुकड़ा अछि।

तारीख मुदै बनि कटघरा मे ठाढ़ रहैत अछि

हाँ, तारीख कोनोटा भऽ सकैत छै

इत्तिफाकसँ संभव अछि कि-

ओ उन्नैस नवंबर अछि।

 

कैलेंडर मे प्रलय आ परिहास केँ छोड़ि

नोरक निशान सेहो नहि होइत छैक

फता भरि दुखिया जकाँ-

द्दैर तानि कऽ पड़ि जाइत अछि

द्दैर त सँ कुहरबक आवाज केँ

छिन्न करवला कागत

तिथि आ सप्ताह, महीनाक रूप मे

काल केँ टुकड़ी-टुकड़ी कऽ दैत अछि।

 

तखन खूब बहल उज्जर खून

दिन वा तारीख आखिर कोनो हो

सप्ताह चाहे कोनो होउक

लहुक पर्दा हटाकऽ

काल सुनैत रहल - आह, आ कराह!

 

काल रात्रिक ओ कराल नेत्र

शनिक दिन काँट मे ओझड़ा कऽ

ताबड़तोड़ छटपटाइत रहल।

सत्य छै जे-

प्रकृति मे होय वा विकृति मे

मानवताक घोर अन्हार

मनुज पर सदि, शासन करैत अछि।

 

मानवता, सब दिन, सब क्षण

जन्म लेबऽ आ मरवला

रोशनीक किरण थिक।

 

-मानेश्वर मनुज आदर्श नगर कॉलोनी गोशाला रोड मधुबनी पिन - 847211 मो. - 9920674861 / 7464077106



 

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