VIDEHA ISSN 2229-547X  ·  First Maithili Fortnightly eJournal  ·  Since 2000  ·  www.videha.co.in
विदेह — प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका
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विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका

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प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका — First Maithili Fortnightly eJournal

विदेह नूतन अंक
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लाल देव कामत

पोथी चर्चा : मिथिलाक माटिक सुगन्ध / पोथी चर्चा : प्रेम और विरह

पोथी चर्चा : मिथिलाक माटिक सुगन्ध

आशु कवि श्री झौली पासवान कृत ११९ पन्नाके मैथिली कविता संग्रह ' मिथिलाक माटिक सुगन्ध ' पल्लवी प्रकाशन निर्मली सँ सन् २०२५ मे बहराएल छैक, जाहिक दाम २९० टाका य। एहि पोथीके आई एस बी एन ९७८-९३-४८४६५- ३२-८ छै। ऐ पोथिमे कुल ६३ गोट नव कविता संग्रहित छैक। सात पृष्टक भूमिका लिखैत श्री पासवान जी बहुत बात स्पष्ट कयने छथि । एहि पोथीकेँ कविजी अपन पिता स्व० गरीब नाथ पासवान आ माय स्व० फुलेश्वरी देवी'क स्मृतिमे समर्पित कयने छथि। श्री पासवान जीक मातृभाषा मैथिली साहित्यमे " अक्षय पात्र" पोथीक अतिरिक्त राजभाषा हिंदीमे अनेकों पोथी प्रकाशित भेल छन्हि। सद्यप्रकाशित ' मिथिलाक माटिक सुगन्ध ' नव कविताक संग्रह मेँ मिथिलांचल क्षेत्र 'क रहन - सहन , रीति-रिवाज, खाएन -पीयन आ सामाजिक विषमता - विपणता आ मिथिलाक पाबनि- तिहार 'क महिमाके संग संस्कृतिक बखान कयल गेल छैक। मिथिला'क बाबा विद्यापति जीक आ दीनाभद्री जीक धरती पर सामाजिक समन्वय आबय ले बाबू - भईया आ बहिन लोकनि सँ संदेश,अपील कयल गेल छैक। स्वर्गहुँमे दुर्लभ पान, माछ,मौध आ मखानक संगहि एतय हरियर फूलबाड़ी - जलाशय छैक। एतुका मीठगर आम लिच्ची फल आकर्षित करैत छैक। जनक विदेहक धरतीकेँ मिथिला पेंटिंग कलाके माध्यम विश्व स्तरीय पहिचान दियेबामे पद्मश्री महासुन्दरी देवी एहन ग्रामीण स्त्री कलाकार 'क चर्चा बढ़ शिद्दत सँ केन्द्रीय कविता " माटिक सुगन्ध" मेँ भेल अछि। कविजीक सहज सोझ पाँतिक रचनाक गरहैन छन्हि,से एक वानगी देखल जाए -:
...... महमह महुआ मीठ
चहटगर बढ़ तिलकोर
धन्य ई धरती जकरा
लागय देवतो गोड़
दीना भद्री आ भवानिक गाम
अहाँ केँ बजा रहल अछि।
कविवर श्री झौली जी ' चोंचा' कालजयी अपन काव्य धारामे कहैत छथि ,चंदा सूरज कायमे य,मुदा तारक गाछ पर लटकल चोंचाक खोता जाहिमे रातिकेँ भगजोगनिक चकमक इजोत होइत रहैत छल से छज्जा पर नजरि नहिं अबैत छैक। बगराक प्रति सेहो चिन्तित देखेलाह हेन। ओहि कलाकार सँ आगू नहिं भेला हेन आधुनिक कलाकार - मिस्त्री जिनक बनाओल पुल - पुलिया वर्खाक आ हवाके पहिल झोंका केँ नहिं झेल पबैत छै। हुनक रचल निशन पांति द्रष्टव्य य -:
.......... चराउर करै छल दिन भरि कतौ
गाम,घर,घर - चाँचरमे
विश्राम करै छल रातिमे दम्पति
चूजाक सँग अपन चोचामे ।
नहिं चुना, नहिं सीमेंट आ सुरखी
देखल अछि चोंचाक खुबसूरती
अन्हर , बिहारि सभ टा सहै छल
छज्जामे बनाओल चोंचा नहीं गिरै छल। .....
कविजीक 'प्रेमक पांति' शिर्षक कविताक भाव जकर पति परदेश खटय गेल रहैछ,तकर परोछमे ओहि नारी'क मनोदशा कोना होईछ से सरस वृतांत बुझाईत छैक । यथा -:
.......... जो जो रे कौआ जतय प्रियतम कमौआ रे।
खाय ले देबौ पूड़ी गमकौआ रे
नोरहिसँ लिखै छी प्रेमक ई पांति
पढ़ि - पढ़ि आखर के दहलैए छाती।
बटिया जोहैत पिया बीतल धनकटनी
एक्केटा आश अछि फगुआ के
एक्केटा आश अछि फगुआ के
जो- जो रे कौआ जतय प्रियतम कमौआ रे
खाय ले देबौ पूड़ी गमकौआ रे।.............
कवि मैथिल प्रेमी ,समस्त मैथिली भाषी आ पाठक लोकनिकेँ प्रस्तुत पोथी पढ़ि प्रतिक्रिया ओ विचार सँ अवगत करेबा ले निवेदन करैत छथि। एकटा कचोट सालैत रहैत छैन जे प्राथमिक विद्यालयमे मैथिली साहित्य आ मातृभाषामे आनों विषयके पढौनी नहिं भ' रहलैक हेन।
माइक ममता घोरल अइमे
मिठगर माइक दूध जकाँ
नेन्नो करय विचार मैथिलीमे
ढ़िठगर कोनो विद्वान जकाँ।
कविजी एक पर एक विलक्षण कविता सिरजलथि हेन। जहन पाठक ऐ पोथीक कविता ' नजरि लागल छै' ओ भेल बुढ़, अगराहीक धनछोहा , सांचमे ई लपेटल झूठ, अप्पन हाथ ई जगन्नाथ ,लहरल धधरा , सुनू भाय जनता , साक्षी, माटिक पुकार सुनू ,निस्तेज ,कड़ी ,अपन देशक माटि पानि आओर हम मधुकर मधुबनी छी आदि कविता पढ़ि मनन करब तँ बहुत रहस्य बूझिमे आओत। श्री पासवान जी शव्दक जादूगरी करबामे निपुण छथि। आश करैत छी जे हिनक बहुआयामी रचना एहि तरहेँ फेर आगूक समयमे पढ़य भेटत। कविता पोथीक बाढ़िमे हिनक सारगर्भित पोथीक पृथक पहिचान सुधिजन करताह,ताही मंगल कामनाक संग-: लाल देव कामत (समालोचक)मो. ७६३१३९०७६१


पोथी चर्चा : प्रेम और विरह



आई एस एस एन ९७८- ९३- ४८८६५- १०-६ गगन कुमार कृत प्रेम और विरह 'पोथी' हिन्दी कविता संग्रह २०२६ ई० मे पल्लवी प्रकाशन निर्मली सँ निकलल अछि। एहि पोथीक' दाम दू सय टाका छै,जाहिमे ९४ पृष्ठ संख्याँ छैक। सद्यप्रकाशित 'प्रेम और विरह ' पोथी मादे भूमिकामे पूर्व प्रधानाचार्य डॉ० राम अशिष सिंहजी एचपीएस. कालेज निर्मली , सारगर्भित तथ्य परसलनि अछि। युवा कवि श्री गगन जी साहित्य क्षेत्रमे अपना रचनाके तराशय लेल आ पोथी प्रकाशन लेल प्रोत्साहित करय ले डा० उमेश मंडल जी, पल्लवी मंडल , गायत्री दीदी आओर अपन माता-पिताके प्रति आभार प्रकट करैत ऐ पोथीकेँ ओहन मानव मात्रकेँ समर्पित कयलनि अछि जे संवेदना सँ ओत- प्रोत छथि। नव उत्साह आ जागरूक युवा पीढ़ी बीच अपन रचनात्मक सेवा सँ उपस्थित भेनिहार गगन कुमार'क संक्षिप्त परिचय पाठक बीच होय; ताहि लेल पोथी समीक्षा सँ पूर्व जनतब दऽ रहल छी। मधुबनी जिला'क नरहिया थाना अन्तर्गत छजना गामक रहबासी माय श्रीमती रेखा देवी आ बाबूजी श्री शिवजी साह के घर दि० १२-८-२००६ ई०कें होनहार बालक गगन के जन्म भेलनि अछि। वर्तमानमे निरमली अनुमंडल मुख्यालयके नगर बैरियर चौक स्थित हिनक आबास छन्हि। शिक्षा -दीक्षा नरहिया सागर हाईस्कूल सँ मैट्रिक तथा सीएमबी. कालेज - घोघरडीहा (डेवढ़) सँ अन्तर स्नातक प्रथम श्रेणी सँ उत्तीर्ण भऽ बीएससी नर्सिंग केर पढ़ाय- लिखायमे लागल छथि। मैथिली कथा साहित्य दिश ' सगर राति दीप जरय ' कार्यक्रम सँ दू सालके नियमितता हिनकामे सृजन करबाक गुणके उत्प्रेरणा भरलकनि हय। टैगोर लिटरेचर अवार्ड आ साहित्य अकादमी सँ पुरस्कृत उपन्यासकार श्री जगदीश प्रसाद मंडल जीके मैथिली भाषा मेँ पोथी 'कुण्ठा' केर हिंदी अनुवाद "अन्तर्मन का पीड़ा " शिर्षक सँ कय अपन गम्भीर उपस्थिति बनेलनि हेन।
अपन कवित्व मेँ भावनात्मक ईमानदारी सँ डेग आगू बढ़बैत सरल रूपेँ अभिव्यक्ति प्रस्तुत केलनि हेन। कविजी ' चल बंधू' शिर्षक कविताक माध्यम पाठककेँ एतय सँ चलबाक संदेश दैत चेतौनी करैत छथि। जगतमे आब स्नेह- प्रीत नहिं बाँचल रहल, प्रकृतिमे आब कोइली पंछीक मीठगर स्वर केँ ग्रहण लागि गेल छै। पहिले जकाँ आब खेत - खरिहान'क रहस्य नहिं बाँचल छैक। गहुँमक शीश धरि चुप्पी साधि लेने य। एकटा पांति द्रष्टव्य अछि -: आधुनिक युग में आकर
फूल गया सुगन्धित रे ,
इस माया के मृत्यु लोक में
केवट बचा ने परीक्षित रे।।
संसारमे परस्पर प्रेम भाव नायक - नायिकाक बीच रहैत आयल छैक। हमसफर महबूब कें ई बूझय पड़तैन जे एहि धराधाम पर सब किछ छैक।

एक पाँति अएलैक हेन जे करूण रस में अछि।देखल जाए ,-:
भोर की तुम भास्कर हो , रात की तुम चन्द्रमा ,
तेरे बिना सुना - सुना लगता है आसमाँ।
अँखियों के काजल से दिन भी अंधेरा हुआ ,
जुल्फों की घटा तेरी झरती है कालिमा।
पुनर्जन्म तँ एक दिलेशा आ भ्रम थीकैक। एक बेर जे असरकारी बरखा होईछ नेत्र सँ ,फेर जीवनमे ओहन साऊन कहाँ अबैत छैक। कविवर गगन जीके हिंदी भाषा मेँ पांतिक एक बानगी देखल जाए -:
आज तक बिछड़ने वाला
फिर कहाँ मिल पाया ?
फूल जो मुरझा गया था ,
वो फिर से नहीं खिल पाया ।
एहि तरहेँ सद्यप्रकाशित पोथीमे कुल ५१ गोट कविताक संग्रह य,जे बढ़ सौष्ठव अछि। नवोदित युवा कवि सँ अपेक्षा रहत जे मैथिली काव्य दिस अपन रचनाधर्मिता केँ बढ़ाबैत पाठक बीच यश बटोरथि।

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