दामक प्रहसनम् [सम्भवतः भास रचित/ संस्कृतसँ मैथिली अनुवाद गजेन्द्र
ठाकुर]
दामक प्रहसनम् [सम्भवतः भास रचित/ संस्कृतसँ मैथिली अनुवाद गजेन्द्र ठाकुर]
दामक प्रहसनम्
पात्र-परिचय
रंगमञ्च पर प्रवेशक क्रमसँ —
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पात्र |
परिचय |
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सूत्रधारः |
सूत्रधार (रंगमञ्चक निर्देशक); नान्दीक अन्त भेला पर प्रवेश |
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नटी |
नटी (अभिनेत्री), सूत्रधारकेँ "आर्यपुत्र" कहि सम्बोधित करैत छथि |
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दामकः |
दामक ("नेक दामक"), अंगदेशक राजा महाराज कर्णक घनिष्ठ मित्र आ अनुचर; प्रहसनक मुख्य विदूषक-सन पात्र |
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परशुरामः |
परशुराम (भार्गव), धनुर्विद्याक गुरु; क्षत्रियकेँ शिक्षा नहि दैत छथि |
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कर्णः |
कर्ण, अंगदेशक राजा; धनुर्विद्याक उच्चतर रहस्यमे दीक्षित होयबाक इच्छासँ परशुरामक आश्रम आयल छथि |
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दुर्बुद्धिः |
दुर्बुद्धि, एक सैनिक; कर्णक शाप-प्रसंग सुनओनिहार |
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दुर्मुखः |
दुर्मुख, दोसर सैनिक, दुर्बुद्धिक मित्र |
उल्लेख-मात्र पात्र (मंच पर नहि अबैत छथि) —
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पात्र |
परिचय |
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ब्रह्मदत्तः |
ब्रह्मदत्त, काम्पिल्य नगरीक राजा (प्रस्तावनामे उल्लेख) |
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भर्तृदारिका |
राजमहिषी, जे दामक लेल सुस्वादु भोजन तैयार कऽ राखैत छथि (दामकक कथनमे) |
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वज्रमुखः |
वज्रमुख नामक भृंग, जे परशुरामक जाँघ डसलक (दुर्बुद्धिक कथनमे) |
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गालव आदि शिष्याः |
गालव आदि ब्रह्मचारी शिष्यगण (आश्रम-वर्णनमे) |
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(नान्दीक अंत भेला पर सूत्रधारक प्रवेश।)
स्वर्ण-कमलवासिनी ब्रह्माणी केँ प्रणाम करैत छी,
कुश-ध्वजधारी ब्रह्मा केँ,
सभ
देवता आ सभ ऋषि केँ प्रणाम करैत छी।
(पट दिस ताकैत)
सूत्रधार— आर्ये, एतय आउ।
नटी— (प्रवेश करैत) एतय छी, आर्यपुत्र! अहाँक संग उद्यानमे घुमबाक हेतु उत्सुक भऽ, बहुत काल सँ अहाँकेँ खोजि रहल छलहुँ। आब अहाँक संग समय बितेबाक चाहैत छी, आर्यपुत्र!
सूत्रधार— आब उद्यान-भ्रमणक विचार छोड़ू। एहि ब्रह्मदत्तक नगरीमे महाराज काम्पिल्यक समक्ष एकत्रित भेल जन-समुदाय एकटा नव नाटकसँ मनोरञ्जित हेबाक अछि। ताहि लेल हम सुसज्जित आ अपन-अपन भूमिकामे निपुण अभिनेतागणकेँ तैयार कऽ रखने छी।
नटी— हमरा बुझल अछि जे काम्पिल्य नामक एकटा नगरी अछि आ ब्रह्मदत्त नामक एकटा राजा छथि।
सूत्रधार— अहीं कऽ तँ हमहूँ कहलहुँ! अहाँसँ भेंट भेलाक आनन्दमे हम भ्रमित भऽ गेलहुँ।
नटी— आर्यपुत्र! हमरा डर लागि रहल अछि। ई दुष्ट के अछि, जे भोजनमे बिलम्ब भेल ब्राह्मणक समान आ नुका समावर्तन भेल युवा ब्रह्मचारीक समान एना हड़बड़ीमे एतय आबि रहल अछि!
सूत्रधार— आर्ये, प्रदर्शन प्रारम्भ भऽ गेल। हमहूँ सभ अपन आगाँक कार्यक तैयारीमे लागी।
(दुनू गोटे प्रस्थान करैत छथि।)
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(तखन दामकक प्रवेश।)
दामक— (अपना मनमे) आह! बड़का लोक भाग्यक उलट-फेरकेँ नहि बुझि सकैत छथि। “एक विपत्ति कहियो असगर नहि अबैत अछि” ई कहबी सत्य सिद्ध होइत अछि। हम छी नेक दामक, अंगदेशक राजा महाराज कर्णक घनिष्ठ मित्र। बुद्धिमान्, शक्तिशाली, उन्नतिशील, सभ राजाकेँ वशमे कएने महाराज कर्ण एखनो सन्तुष्ट नहि छथि। त्रिभुवन-विजयी रावणक समान अद्वितीय शक्तिशाली बनबाक इच्छासँ, ओ धनुर्विद्याक उच्चतर रहस्यमे दीक्षित होयबाक उद्देश्यसँ आब परशुरामक आश्रम पर पहुँचल छथि। यद्यपि हमरा महाराजक अनुचर होयबाक सौभाग्य प्राप्त अछि, तथापि आब हम एकटा भारी संकट-भँवरमे पड़ल छी। हम तँ महाराजक ऊँच अट्टालिका, राजमहलक तड़ागमे स्नान, सुसज्जित शय्या पर सुतब, सन्ध्याकाल मीठ पेय, पाँच सुगन्धसँ युक्त पान, आ कोमल मलमली वस्त्रक अभ्यस्त छी। भर्तृदारिका (राजमहिषी) हमरा लेल सुस्वादु भोजन तैयार कऽ राखैत छथि आ बेर-बेर पूछैत छथि जे 'नेक दामक कतय छथि।' मुदा एहि सभक बादो एकटा कठिनाइ अछि — हमरा भूख नहि लागैत अछि। आरामदायक बिछौनासँ ढाँकल ओहि शय्या पर सेहो हमरा निन्न नहि अबैत अछि। पगड़ी बन्हने माथसँ हम महाराजकेँ प्रणाम कऽ सूचित कएने छलहुँ जे हम अहाँक संग एतय नहि आबि रहल छी। पशु-पक्षीक एहि वनमे भटकैत हम एहि प्राणीगणकेँ अपन आहार बुझि रहल छी। हमरा शरीर सेहो नीक नहि लागि रहल अछि। पेटू हम, भोजनक विचारसँ हमर आँखि बेचैन भऽ जाइत अछि। कपार-दर्द सेहो हमरा सतबैत अछि। बयारिसँ उड़ल काशक फूलक पराग हमर आँखिमे पड़ि गेल अछि जे हमरा आँखिकेँ नोरायल बना देलक। ई दुष्ट मधुमाछी सभ बाटमे हमरा काटलक। हमर इन्द्रियगण दर्पणक प्रतिबिम्बक समान हमरासँ छल कऽ रहल अछि—दहिनाक बदला बामाँ आ बामाँक बदला दहिना। हम कानसँ सुँघैत छी; हम अपन कारी नथुनासँ देखैत छी।
(विचार करैत)
जे स्वामी सलाह नहि सुनैत छथि, ओकर आश्रित रहनिहारक भाग्यमे दुःखे दुःख अछि।
(आगाँ दृष्टि देल)
आह! ई दुष्ट कुकुर ओहि आश्रमसँ एकटा वल्कल-वस्त्र लऽ कऽ भागि रहल अछि। रे दुष्ट, कतय जा रहल छह? हम तोहर दाँत तोड़ि देब।
(घुमि-घुमि कऽ देखैत)
आह! ई आश्रम तँ सभक लेल विश्रामक साझा स्थान थिक। एतय हरेक तपस्वी संतुष्ट जीवन बिता रहल छथि। वल्कल-वस्त्र पहिरने, माथसँ लटकैत विविधरंगी जटा, आ कारी मृगचर्मक करधनी बन्हने, आश्रमक तपस्वीगण वनसँ स्वच्छन्द समित्, कुश आ फूल आनि रहल छथि। एतय किछु गोटे जलमे स्नान कऽ रहल छथि। ओतय जगायल अग्नि जरि रहल अछि। अग्निक धुँआ तपोवन पर पसरि रहल अछि। अन्य महात्मा तपस्वी, जे अग्निमे आहुति देने छथि आ वेद-वेदाङ्गमे पारंगत छथि, अपन जीर्ण वल्कल-वस्त्र आ कान्हपर ढुलकैत जटामे शोभित भऽ रहल छथि। अपन मोतीसन यज्ञोपवीत, स्वर्ण-वल्कल आ मणि-सन माला सहित ओ अपन तपस्यामे कल्पवृक्ष सन देखबामे आबि रहल छथि। गालव आदि ब्रह्मचारी शिष्यगण, अपन पाठमे तत्पर, समित्-ईंधनसँ अग्निकेँ प्रज्वलित कऽ रहल छथि। सभ प्रकारक तेलहन, अन्न, घास, ईंधन, चर्म, समित्, सिंग, बाँस, वल्कल आ पाथर वर्ष भरिक उपयोगक लेल एतय संग्रहित अछि। वनक अन्नक मुट्ठी खा कऽ पोसायल हरिण आश्रमक द्वार पर एम्हर-ओम्हर घुमि रहल अछि। तपस्विनी कन्यागण अपन घैलासँ नव पौधाकेँ एना सिंचि रहल छथि जेना माता अपन शिशुकेँ स्तनपान करबैत होथि। आह! ई आश्रम सचमुच अद्भुत अछि।
(सुनैत)
आह! एरण्ड वृक्ष 'समय भऽ गेल, समय भऽ गेल' कहि रहल अछि। तँ हम महाराजक ओहिठाम जाइत छी। देवगण अपन आशीर्वाद दिअथि।
(प्रस्थान।)
(तखन परशुराम आ कर्णक प्रवेश।)
कर्ण— भगवन्! हम अहाँकेँ प्रणाम करैत छी।
परशुराम— तूँ के छह? की लऽ कऽ एतय आयल छह?
कर्ण— हम धनुर्विद्याक उच्चतर रहस्यमे दीक्षित होयबाक इच्छुक छी।
परशुराम— हम ब्राह्मणकेँ शिक्षा देब, क्षत्रियकेँ नहि।
कर्ण— हम क्षत्रिय नहि छी।
परशुराम— तखन हम तोरा शिक्षा देब; आउ।
(दुनू गोटे प्रस्थान करैत छथि।)
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(तखन दू टा सैनिकक प्रवेश।)
दुर्बुद्धि— दुर्मुख, हे मित्र! की तोहरा बुझल अछि?
दुर्मुख— दुर्बुद्धि, की बात अछि?
दुर्बुद्धि— हमर महाराज अपन गुरु परशुरामक संग फल, मूल, समित्, कुश आ फूल संग्रह करबाक लेल वनमे गेल छलाह। वन-यात्रासँ थाकल परशुराम महाराजक जाँघ पर माथ राखि सुति गेलाह।
दुर्मुख— तखन की भेल? तखन की भेल?
दुर्बुद्धि— आ तखन, वज्रमुख नामक एकटा भृंगसँ गुरुजीक जाँघ अनायास डसा गेल। गुरुक निन्न भंग नहि हुअय, ताहि डरसँ महाराज चुपचाप ई पीड़ा साहससँ सहि लेलनि। रक्तसँ लथपथ आ अत्यन्त क्रुद्ध भऽ गुरु उठि ठाढ़ भेलाह, महाराजक क्षत्रियत्व चिन्हि गेलाह, आ ई शाप देलनि—'जखन जरूरत पड़तह, तोहर अस्त्र काज नहि करतौह।'
दुर्मुख— आह! ई दुःखक बात अछि जे गुरुदेव एना कहलनि। चलू।
(दुनू गोटे प्रस्थान करैत छथि।)
(भरतवाक्य।)
सर्वत्र समृद्धि होउ
आ
कतहु आपदा नहि होउ।
सभकेँ संतोष प्राप्त होउ
आ
केओ असंतुष्ट नहि रहथि।
समाप्त
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