VIDEHA ISSN 2229-547X  ·  First Maithili Fortnightly eJournal  ·  Since 2000  ·  www.videha.co.in
विदेह — प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका
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विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका

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प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका — First Maithili Fortnightly eJournal

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लाल देव कामत

सूर्य पुत्र वा सुतपूत एक धनुर्धर : कनीन पुत कर्ण/ अरे त्तोरी के ! ...... धत् तोरी के?

 

सूर्य पुत्र वा सुतपूत एक धनुर्धर : कनीन पुत कर्ण

मैथिली साहित्यमे चोटी'क उपन्यासकार श्री रविन्द्र नारायण मिश्रजी २१म् कृति 'सूर्य पुत्र ' केर महिमा मण्डित कयल नव पोथी ल' कऽ समक्ष अयलाह अछि। हिनक १४० पृष्ठक मैथिली भाषा मेँ नैका प्रकाशित उपन्यास एहि पोथीक दाम ४०० टाका छैक। सन् २०२५ मे एहि पोथीक प्रकाशकमे ग्रेटर नोएडा ( उ०प्र०) सँ श्रीमती आशा मिश्र जीके नाम छन्हि, जे भारतमे मुद्रीत भेल य। सद्यप्रकाशित ऐ आकर्षक रंगील कभर बाला पुस्तककेँ आई एस बी एन ९७८- ९३-३४४- २७७९- ० संख्याँ भेटल छैक। श्री मिश्रा जीके ३३ गोट मैथिली भाषा मेँ प्रकाशित पोथी अनेकों विधामे पाठक बीच आबि गेल छन्हि,जाहिमे ई एकटा हृदयांगम करय लायक पोथी छी- सूर्य पुत्र । जाहिमे बलशाली महाभारतके एक विशेष पात्र कर्णक' विषयमे अद्भुत लेखन कार्य भेल हेन। मिथिलाक मांटि - पानि पर रहि बहुत कम उपन्यासकार मैथिली भाषामे उपन्यास लिखलनि अछि। एतय हम हिंदी आ मैथिलीक अन्य विधामे अनेकों पोथीक सृजनहार श्री रविन्द्र नारायण मिश्र जी'क धार्मिक अध्ययनक आधार पर रचित महाभारत ग्रंथके एक अदम्य साहसी पात्र कर्णके मादे लिखल गेल " सूर्य पुत्र " नामक पोथीक चर्चा कय रहल छी। एहि पोथीक विशेषता ई छैक जे उपन्यासकार गद्यात्मक लेखनमे बहुतो ठाम यथा - पृष्ठ सँ० १९ सँ २२ धरि , पृष्ठ सँ० ५७ सँ ६० धरि, पृष्ठ ६८ आ ६९, पृष्ठ सँ० ८२ सँ ८६ , पृष्ठ सँ० १०१-१०३ धरि, पृष्ठ १०९ सँ ११२ धरि, पृष्ठ ०११८- १२२ धरि आओर श्रृद्धांजलि रूपेँ आखरिमे पृ ० सं ० १३४ - १३६ धरि काव्यात्मक शैली'क प्रयोग कयलनि अछि। तेँ पाठककेँ सम्पूर्ण पोथी कतोह - कतौह केर प्रकरण पुनः - पुनः दोहराएल जेकाँ संदर्भ अबैत बुझाएत। एहि पोथीके कथ्य ततेक ने गहींरपन सँ उल्लेख कयल गेल छैक ,जे लगैत छैक पोथीक एक - एक पन्नामे वर्णित तत्कालीन समाजक व्यवस्थाक संग - संग प्रत्यक्षदर्शी भेल छी। ओना कथावस्तुक गद्यांश आ पद्यांशक भाव - भंगिमा सँ भारतीय समाज पौराणिक समय सँ विज्ञ छथि। तैयो पोथी पढ़ैत आ मनन करैत काल नव तथ्य बुझाए य। एकबेर पढ़य लेल पोथी हाथ लगाएब तँ बिनु सम्पूर्ण पाठ पढ़ने रहि नै सकब। ई एतेक मनलगू होयबाक मूल कारण इयह रहल छै,जे प्रायः जन-मानस अपना सामाजिक आ संस्कृति रूपेँ ई विषय पंडित सँ प्रवचन सुनि आ टेलीविजन सिरियल देखि पूर्व सँ पात्रक परिचय ओ घटनाक्रम जानि गेल छथि। प्रवेशिका सँ निचा वर्गक विद्यार्थीगण अपन पाठ्य पुस्तकमे सेहो अध्यापक महोदय सँ प्रेरक प्रसंग बुझि अध्ययन कयने रहैत अछि। एहि बहुआयामी उपन्यास केँ पढ़ला सँ धार्मिक - अध्यात्मिक गूढ़ विषयमे अभिरुचि आरो बढ़ैत छैक। वृहद पोथी महाभारत आ आन ग्रन्थ मोटगर ओ भरिगर रहलाक कारणेँ समान्य हिन्दू वर्गक सदस्य खाशकय साकठ लोक पोथी'क पाठक नहिं बनय चाहैत छैक। अपवादमे किछु सेक्युलर लोक सेहो ऐ फेरमे नहिं परैत य ,तँ किछु सरभक्षी लोक खूब अध्ययन कय लोककेँ अपन प्रश्न सँ छकाबैत रहल हेन। किछु वैष्णो लोक सांगोपांग एहन ग्रन्थक अध्ययन नहिं कऽ अबूहवश कतवाह लागल रहैछ। तकर मुल कारण छैक , बहुत लोक साक्षर नहिं छैक; जाहिसँ स्वाध्याय वाबत फराके रहैत आयल छैक। मुदा पढ़ाकू - अध्ययनशील लोक पढ़ि लोकाचार आ लोक व्यवहारमे महाभारत ओ रामायण'क दृष्टांत बात - बात पर दैत ऐ महत्वपूर्ण विषयकेँ तरोताजा कयने रहैत छथि। प्रस्तुत 'सूर्य पुत्र ' प्रभावशाली उपन्यास एक धरोहर रूपेँ सहेजकेँ रखबाक चाही। जाहि कालजयी उपन्यासके मुख्य नायक कर्ण वीर पुरुष रूपेँ ख्यायति छथि,जे मरियोकेँ अमर छथि। हुनक जन्मक गाथा सँ महाभारत युद्धमे जीवनके अन्तिम धरिक व्यथा-कथा दुखान्त रहल अछि। मुदा हृदयपुत्र कर्णजी वचन केर पक्का रहलाह आ आश्वासन लेल बात सँ विमुख नहिं भेलाह। नि: संतान धोवी दम्पत्ति अधिरथ आ राधेय हुनक लालन-पालनेटा प्राणपन सँ नहिं करैत छैन, वरन अपन मित्र धृतराष्ट्र राजा ओतय विद्याभ्यास लेल कर्णक मोनमाफिक अस्त्र-शस्त्रक प्रशिक्षणार्थ जाए दियाबैत छैन। ओहिठाम राज्याश्रित गुरु द्रोणाचार्यक कथन सूत पुत्र हेबाक कारणेँ राजपुत्र संग कोना राखल जाय,एक वाधा नैतिक रूपेँ भेलैक। मुदा प्रदर्शनकारिगण बीच अर्जूनके श्रेष्ठ धनुर्धर होमय केँ ओ चुनौती देमय लेल जुमि जाईछ। कृपाचार्यक कथन जे अधिरत पुत्र राजकुमार नहिं छथि, तेँ ई ऐ महामुकाबला सँ अलग रहय! मुदा एहूठाम कुन्ती ओकरा कान्तेय कहै सँ लोक लज्जावश चुपे रहलीह। जन्मक मूल - गोत्र अनजान रहलाक कारणेँ कर्ण अपमानीत होईछ। मुदा हुनका तेजस्विता पर सहानुभूति राखि दूर्योधन जीक परम उदारता सँ कर्णकें तत्काले अंग देशक राजा घोषित कयल जाई छैन। अन्तर्राष्ट्रीय प्रदर्शनमे सब राजाके नजैरमे कर्ण कृपाचार्यक प्रश्नोत्तर बनि धनुष वाण प्रतियोगितामे अव्बल अबैत छथि। आचार्य द्रोणाचार्य जीके अनदेखी आ एकलव्य मादे अन्त:कथा केँ गमि अधरतियामे ब्रह्मास्त्र शिक्षा पाबै खातिर गुरु आश्रम सँ गुप्त रूपेँ निकलि जाईछ। निसीभाग रातिमे यात्रा निडर पूर्वक कर्णके सफल भेलनि आ ओ विश्व प्रसिद्ध विद्वान परशुराम जीके गुरुकुल पहुँचैत छथि। ओहिठाम असत्य'क सहारा लैत अपन शिषत्व परिचय दैत अपनाकें भृगुवंशी ब्राह्मण कहि गुरुवर कें प्रणाम निवेदीत कयल। ब्राह्मण कुल पर क्षत्रिय सम्राज्य विस्तार नहिं होय, ताहि लेल कोनू ब्राह्मणेंक योग्य संतानकेँ परशुराम जी अपन जीवन भरिक सब कला सिखेबाक लेल आह्वान कयने छलाह। हुनका सँ विद्या तँ कर्ण पाबि गेलाह,मुदा हाय रे! भाग्य ! अरण्यमे छल सँ एक ब्राह्मण गायके नवजात बछरू छोरि देने रहय। से धनुर्धर कर्ण विद्या अभ्यास करैत काल ओहि बच्छरूकेँ अनजानमे आघात पहुंचा देल! आब हत्या पापके प्रायश्चित करय गोपालक केँ खोज करैत पहुंचैत अहि। ओ छलि दोसर कियो नै इन्द्र रहथि,जिनक श्रापक कोपभाजन भेलाह। सूर्य भगवान केँ सुमरैत आश्रमक एक भाग पाथर पर उदास बैसल आत्मप्रिय शिष्य केँ देखि परशुराम जी रिझबय लागलनि आ पाकल फल अपना हाथे खुआबैत - उपदेश दैत अलसाए गेलाह। कर्णक पलथा पर मुड़ि राखि सुति रहलाह; ता विषकीट आबि कर्णकेँ जांघ तर पैसि भुर करैत शोणीतक फव्वारा बहा देलकैक। साहसी कर्ण गुरु कए निन नै टुटैन ताहिक सतत् धियान राखि कलमच स्थावर सन बनल रहला। जहन जगलाह गुरू तँ एहन दृश्य देखि चौंकैत तमशाइत कर्ण केँ जातीय फुसि लेल कठोर श्राप देलनि। विचरण करैत काल कर्ण केँ जरासंध सँ पछरा पड़ैत छैन। ओएयह जरासंध जिनका डरे श्रीकृष्ण जी पराए कें मथुरा चलि गेल छलाथि। से पुरस्कारमे कर्ण मालनि नामक नगर जरासंध सँ पबैत दू ठामक यशस्वी राजा बनलाह। महाभारत केर लड़ाईमे अपन युद्ध कौशल सँ सबकें चकित कयने छथि। दू दल कौरव आ पाण्डव बीच महायुध्दमे अपन मित्रताक निर्वाह दूर्योधन संग करयमे कतौह नहिं चुकलाह हेन। महाभारतमे एक स्वप्न कथामे इहो बात पाठक समक्ष आओत कृष्ण आ पाण्डबके माय कुन्ती बेराबेरी सम्पर्क कय महाबली कर्ण केँ हुनक जन्म रहस्य बुझाबैत जेष्ठ पाण्डव रुपेँ हुनका मान्यता दियेबाक प्रसंग छैक। तकर ओ प्रतिकार कयने रहथि। जाहिमे ओ एक दिन पाण्डव केर शिविरमे चलिए जाईछ आ दूनू पक्ष हुनका श्रेष्ठ मानि हस्तिनापुर 'क राजमुकुट धरि दैत राज्य बँटवारा रोकि लेल। मुदा बहुतों सेना ओ सेनापतिक वीरगति तथा विधवा ओ बच्चाक क्रन्दन सं कुरूक्षेत्रक परिवेश चिन्ता जनक रहलैक हेन। तेँ वनगमन केर दृश्य सँ कथाक पूर्णाहुति देखेबामे उपन्यासकार पारंगत भेलाह अछि। एहि पोथीमे रोचकताक संग श्री मिश्र जी बखान कयने छथि। ओ निष्णांत अनुभवी लेखक रहल छथि। तेँ कहलौं हिनक अद्वितीय पोथीक पाठकीय प्रतिक्रियामे वेसी किछु नहिं लिखैत, एतबे कहब जे कर्ण पर एक ब्राह्मण लेखक ब्राह्मणत्वक खिलाफ झांपल तथ्यकेँ उजागर करबाक साहस कयलाह अछि। किछु मुद्रण त्रुटि पाठककेँ अवश्य देखाएत।

 

अरे त्तोरी के ! ...... धत् तोरी के ?

अधिकतर कलमजीवी रचनाकारमे कम्युनिस्ट समर्थक लेखक - साहित्यकार वामपंथी राजनीतिके पक्षधर रहल छथि। ओहि पथकें पकड़ि चलनिहार गद्य - पद्य विधाक' अनण्य सेवक श्रीमान विभुति आनन्द जी मैथिली भाषा 'क लेल अग्रसर रहैत अयलाह अछि। हिनक रचना सर्वहारा राजनीतिक - समाजीक विचारधारा केर तहत प्रवाहित काव्यधारामे एक शिर्षक ' अरे त्तोरी के ! ..... पर पाठक धियान देब तँ स्वत: पायब जकरा मुँह सँ बोल नहिं फुटैत छैक, तकर आवाज बनि मुखर भेल छथि - कविजी! से शोषणके विरुद्ध शोषक केँ हम कहैत छियैन -" धत् तोरी के?...
हुनक सृजन एहि तरहेँ पाँति रचल गेल छन्हि :-
तोहर हिस्सा खोआ - मिसरी,
हमरा लागी मठ्ठा
अरे तोरी के ! .........
हमरे बल पर सब फरफइसी,
आ हमरे पर फट्ठा, अरे तोरी के!......
दिन दुपहरिया खटते रहली
जिनगी की से बुझ न पइली
तइयो कर तु ठठ्ठा ,अरे त्तोरी के!.......
कल - करखाना हमे सजइली ।
सपना पुड़लइ गीतो गईली
अब तु अँइठे गट्टा,अरे त्तोरी के!.......….
न सोचइ तू अब मनमानी ,
बन कर देबऊ दाना - पानी
अबहो बूझ रे नट्ठा,अरे तोरी के!.....
एकहतर वर्षीय मैथिली भाषाके अत्यंत प्रतिष्ठित आ बहुमुखी प्रतिभा बाला कवि-कथाकार श्री विभुति आनन्द जी एक समीक्षक सेहो छथि। हिनक पैतृक निवास :- रूद्रागंन ग्राम+ पो०- शिवनगर,जि०-मधुबनी आ वर्तमानमे बिहार क' राजधानी पटना स्थित एजी. कालोनी - शेखपुरामे रहैत छथि। ओतहि पटना विश्वविद्यालय सँ पीएचडी कयलनि।आर एन कालेज -पण्डौल'क मैथिली विभागाध्यक्ष आ प्राधानाचार्य पद पर सँ सेवा निवृत्त भेलाथि। पूर्वहि सँ साहित्य सृजनमे सतत् लागल रहैत चारि दर्जन सँ अधिक पोथीक लेखक भेलाह हेन। किछ पोथीक पाण्डुलिपी प्रकाशकक प्रतिक्षामे छैक ,तँ किछु प्रकाश्य कृति यन्त्रनालयमे छैन। श्री विभुति आनन्द सरकेँ सन् २००६ ई०मे कथा संग्रह 'काठ' लेल साहित्य अकादमी सँ पुरस्कृत कयल गेलनि। वैचारिक स्तर पर लोक चेतनाक पक्षधर रहि कतिपय वाम पक्षक कार्यकर्ता तँ रहले छथि,आ अपन परिवर्तनकामी सोचक कारणेँ बिहार छात्र आन्दोलनमे सेहो उपस्थिति धरि कयने रहथि। परिस्थितिवश जहलो गेल छथि। भाषा आन्दोलन सँ सेहो जुड़ल रहि अपन अभिनय कलाक अभिव्यक्ति लेल रंगमंच पर 'भंगिमा' केर माध्यमे समक्ष अयलाह । ओ दर्जनभरि पत्र - पत्रिका'क सम्पादन करैत साहित्य सेवामे अपन नांह बजेलनि हय। हिनक सम्पादित संग्रहमे १.-गीतनाद (संयुक्त), २.- विद्यापति पदावली आ ३.- विद्यापति पदावली (संयुक्त) छन्हि। मैथिली नव कविता संग्रहमे हिनक बहुचर्चित पोथी -: १.- डेग(सहयोगी), २.- उपक्रम, ३.- पुनर्नवा होईत ओ छौड़ी, ४.- नेहाई पर स्वप्न , ५.- अहाँ नहि, ओ दिवस चल गेल ,६.- उठा रहल घोघ तिमिर ,७.- झूमि रहल पाथर - मन , ८.- पीयर रंग पियरगर धरती, ९.- बाबा मोनक बस्ती सँ , १०.- शव्दके नहबैत, अन्य आरो नैका काव्य रचना छैन।
प्रयोगधर्मी व्यक्तित्व , साहित्यक विविध विधामे गद्य लेखन कार्य मुख्य रुपेँ मनोयोग सँ कयने छथि। लाइट स्टोरी "इस्स" आ मनलगू कथाक पोथी -जिद्द ,जवर्दस्ती आ जिनगीमे श्री आनन्द जी अपना छात्राक वियाहमे भाग लेबाक आमन्त्रण फौन पर वार्तालाप सँ लालित्य पूर्वक प्रेम रस सँ सराबोर कथा लिखने छथि। गद्य विधामे फेर कहियो विमर्श करब। हिनक चर्चित पोथी -: १.-प्रवेश, २.-खापड़ि महक धान, ३.- काठ, ४.- एकटा उड़ल फुर्र ,५.- गोट सँ बाहर ,६.- कथा २१, ७.- गाम सुनगैत , ८. - परिजात- अपरिजात, ९.- बाबाक एकटा नाम रहनि, १०.- लय, ११.- अभिनय,१२.- रंगमंच पर नाटक , १३.- ललित,१४.- भाषा-टीका, १५.- स्मरणक संग, १६.- हरिमोहन झाक रचना क्रम ,१७.- अर्द्धविराम , १८.- फेसबुक डाइरी,१९.- लाॅक डाउन डाइरी, २०.- पहाड़ डाइरी आदि। दू दर्जन सँ फाजिल पाण्डुलिपि अद्यावधि अप्रकाशित कृर्ति छैन। श्री विभुति आनन्द जीक एक मैथिली भाषा मेँ प्रकाशित पोथी 'की चाही ,बोल न! ' कविता संग्रह हालहिमे पढ़बाक सौभाग्य भेटल। ई पोथी नवारम्भ प्रकाशन सँ वर्ष २०२१ मे बहराएल य। ऐहिमे ८० टा पृष्ठ छै ,जकर दाम २०० टाका छै। पोथीकें नीक पन्नामे मुद्रण काज आर .के. आफसेट प्रोसेस ,नवीन शाहदरा ,पुरना डिल्ली सँ छपल छै। ऐ पोथी पर अन्य पाठक सेहो पाठकीय प्रतिक्रिया देने होथि,से हमरा नहिं बूझल अछि। पोथीमे पूर्वी मिथिलाक अंगिका टोन आ पैछमि मिथिलाक वज्जिका टोन भेटैत अछि। दलित - पिछरल- अधिक पिछरल मैथिल इयह भाखा अपन बाणीमे बजैत य। मधुबनी जिलाक पछिमक भूभाग लगाएत सीतामढ़ी जिलाके मातृभाषा मैथिलीमे वज्जिका बोली अवश्य हुलकी देने छै। "भाषा के न बाँटियो" मैथिली पोथीक रचनाकार आचार्य रामानन्द मंडल जीक शव्द शैलीक निकट ऐ पोथीक शव्द विन्यास पबैत छी। नवारम्भ प्रकाशन केर कर्ता-धर्ता अजीत आजाद जी अपना भूमिका पृष्ठ पर श्री आनन्द जीक मादे लिखैत छथि -"भाषा - टोनक मास्टरपीस छथि आओर हिनक रचनाधर्मिता सूक्ष्मता आ स्थानिकता सँ भरल रहल छन्हि। ओ कवितामे रहस्यमयताक पक्षधर छथि।"
पोथीक नामकरण "की चाही,बोल न! केर एक कविता 'चुनाव मे चुनाव हय' शिर्षक केर अंतरा पाँति छी । एहि केन्द्रीय कविताक चेतौनी भाव बिहार निर्वाचन सँ समादृत अछि। ई हिनक दूपनिया रचना कोरोना कालीन थीकैन। एक नागरिक ( मतदाता) कें कोन तरहेँ सब्जबाग देखाएल जाईछ आ निर्धन गरीब जनता कतेक अभावमे रोग- वियाधिक सामना करैत कैंचा लऽ बिकैत य से एक सजीब दृष्टांत देखाइत छै। एहि पोथीमे ७८ गोट कविताक सौन्दर्य उपरा - उपरी नीक गरहैनमे रचल गेल छै, जे पाठक वृन्धकेँ पढ़ैत आनन्द आओत। पहिल पाठमे ' चिल्का दे देलकै ' कविता'क भाव छै - तरुणी विधबाक पुर्नवियाह भेलासन्ता अपन सहेली जेकाँ ओहि विधबाकेँ सधबा बनला सँ कोरामे पतिक प्रतापे बच्चा आयल छै। पहिले खेप बियहुति नायिका अपन सासुर जाईछ आ ओहिठाम पतिक आकस्मिक निधन भेलापर समाजक लोक भुतसपा सँ स्वयं डसा देबाक कलंक थोपि दैत छैन। दुलहाक परिवारक लोकक कोपभाजन बनल कठिन जीवन पहाड़ सन कोना खेपत। से सती प्रथाक विरुद्ध ई काव्य धारा आधुनिकता सँ भरल समसामयिक य। कविवर महोदयके ऐ तरहक पाँति होय छनि। यथा -:
विधबा छलियै
सधबा भेलिऐ ,गे बहिना
आब जिबै गऽ निमन जीवन ,गे बहिना
भेलै शादी ,
ससुरा गेलिऐ ,अरे माई गे
दुल्हाके भुँई सप्पा नै, इहे खेलकै
हम तऽ धक,कुच्छो नै फुड़ले, गे बहिना.........
सद्यप्रकाशित पोथीमे आखरी पाठ शिर्षक "जोगिरा" नामक काव्य प्रस्तुत कयने छथि,जे होरी- फगुआ केर सुअवसर पर एकटा अलगे संस्कृतिगत महौत रखैत होय । हास्य विनोदक पांति द्रष्टव्य -:
........जोगी जी सा रा रा रा .........
बाभण गोरी जँघिया पेन्हउ
कैथिन साटउ टिकली
जादव छउँरी जुलुम करई हऊ
मारह धक्का हओ जी।
जोगी जी जान बचा बऽ
जोगी जी भागऽ - भागऽ .........
अपन सामाजिक चिंतन केँ श्री विभूती जी गद्यमे लिखैत आबि रहल छथि,मुदा जे विषय सब ओहिमे नहिं अँटि सकलनि तँ ; ताहिके पद्द द्वारा लेखन क्रम सतत् गतिशील बनौने रहलाह हेन। हिनक प्रकाशित पोथी झट दऽ शतक धरि पहुँचत जाहि सँ माय मैथिली'क अक्षय भंडार आरो भरय, से कामना!

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