VIDEHA ISSN 2229-547X  ·  First Maithili Fortnightly eJournal  ·  Since 2000  ·  www.videha.co.in
विदेह — प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका
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विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका

विदेह

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प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका — First Maithili Fortnightly eJournal

विदेह नूतन अंक
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लाल देव कामत

सेतुषाम : एक अनुशीलन


अनचिन्हार आखर केर संस्थापक आ सम्पादक आशिष अनचिन्हार जीक सम्पादनमे प्रीति कारण सेतु बान्हल'क वाद आब ' सेतु षाम ' सद्यप्रकाशित मैथिलीमे पोथी एहि वर्ष २०२६ मे बहराएल छैक। श्री अनचिन्हारजी मैथिली गजल'क व्याकरण ओ इतिहास तथा मैथिली वेब पत्रकारिताक इतिहास सहित ११ गोट पोथीक' लेखक छथि। सेतु षाम १७५ पृष्ठक छैक जाहिके आई एस बी एन ९७८- ९३- ५७१७- ३५८ - २ य , जे सिरजनहार केँ समर्पित कयने छथि। आवरण पृष्ठसज्जा कुट गत्ता पर पौराणिक भवन'क एक झलक प्रथम दृष्ट्या देखमे अबैत छैक,मुदा ई एक सारगर्भित धरोहर थीकैक। प्रस्तुत पोथीक दू खण्ड अछि । खण्ड १. मे श्रीमती प्रीति ठाकुर जीके मादे दू महिला लेखिका सविस्तर अपन कलम चलेलनि अछि। पृष्ठ सँ० २६-३४ धरिमे बाल मनक सिद्धहस्त लेखिका 'शिर्षक' सँ श्रीमती मुन्नी कामत जी आ मैथिली चित्र कथामे प्रीति ठाकुरक योगदान 'शिर्षक' सँ इरा मल्लिक जी आलेख लिखलनि अछि। खण्ड २. पृष्ठ सँ० ३५ सँ १६६ धरिमे इन्टरनेट , भाषा, पंजी,लिपि, शव्द कोश , सम्पादन , अनुसंधान, साहित्य एवं अन्य विविध विषयमे श्री गजेन्द्र ठाकुर जीके मादे विस्तार सँ आलेख लिखलनि अछि। जाहिमे दू महिला लेखिका आ एक दर्जन पुरुष लेखक भाग लैत अपन कलमक धार तेज कयने छथि। उपरोक्त सभ सहयोगी लेखक - लेखिका'क परिचय लेल हुनक तस्वीरके संगहि सम्पादक आशिष जीके पृष्ठ सँ० १६८ सँ पृष्ठ सँ० १७१ धरिमे लौकैत अछि। पोथीक केन्द्रमे छथि इन्टरनेट मैन श्री गजेन्द्र ठाकुर जी, जिनक साहित्यिक योगदान आ विश्व भाषा मंच पर मैथिलीकेँ सेहो लोक जानय - बूझय ताहि लेल पछिला २६ साल सँ हुनक परियासक चर्चा संगहि हुनक धर्मपत्नी श्रीमती प्रीति ठाकुर जीक साहित्यिक अवदान केँ एहि पोथीमे लेल गेल छै। पाठक ई- विदेह पर हुनका दूनूप्राणीक सराहनीय परियासकेँ अवलोकन कय ज्ञानार्जनमे अभिवृद्धि करैत आबि रहल छथि। ‌ एहू पोथीमे हुनक दूनू व्यक्तिके मादे विशेष जनतब एक शोरे पाठमे वरेण्य रचनाकारक देल आलेखमे पढ़ि पाठक नेहाल होएत, से हमर अभिष्ट अछि। प्रथमदृष्टया पाठककेँ एहि पोथीक प्रायः सब शिर्षक संस्कृत भाषामे देखि अचरज लागत। संस्कृतकेँ जौं सब भाषाक जननी कहल जाय आ ताहिक प्राचिनताक इतिहासमे जाएब तँ धर्मग्रंथ'क स्वत: स्थान समक्ष देखाएत। से अहू पोथीक' रचना सँ अथवा अस्तित्वमे अयबा सँ पूर्व सम्पादकके मानस पटल पर सनातन धर्म ग्रन्थक अनेको सुनल आ अध्ययन कयल पाठ ओ खण्डके बावत आयल हेतैन। ताहि परिकल्पना'क उदाहरण रूपेँ श्री गजेन्द्र जीक तुलना करयमे संस्कृतक शव्द आ श्लोकमे गहिंरगर रुपेँ श्री आशीष जीके जाए पड़लनि हेन। चारू वेदमे सँ तीन वेदके सारांश चारिम वेद ' सामवेद' क निर्माण महर्षि वेदव्यास जी केने छथि। जे वेदपाठी लेल नहिं अपितु गायन लेल प्रयुक्त होईत आयल अछि। मानव जीवनमे अदौ सँ एहि वेद- पुराण , आ शास्त्रक प्रभाव पड़ल छैक ,आओर इयह हमरा भारतके मीशन थीक। पोथी 'क शुभ संज्ञा "सेतु षाम" रखबाक अभिप्राय जानबाक लेल एहिमे वेदवाणीक सहारा लैत पढ़ाकू पाठक बीच बढ़ विलक्षण तरहेँ सम्पादक जी समक्ष रखलनि य।
श्री गजेन्द्र जीक मादे पहिल पाँतिक आरंभ करैत सम्पादक जी लिखैत छथि -"सामवेद केर अर्थ भेलैक - गानवेद अर्थात एहन वेद जकरा गायल जा सकै। ऋग्वेद, यजुर्वेद आ अथर्ववेद सँ ऋचा संकलन भेलै ,जकरा नव वेद अर्थात सामवेद कहल गेलैक। गीतामे श्रीकृष्ण जी स्वयं बांसुरी वादक,कला पारखी रहथि; जे सामवेद के गायन लेल विशेष कय तत्कालीन संस्कृत भाषा मेँ सोहर गीतक आरंभ मानलनि।" तेँ भारतीय शास्त्रीय संगीत'क मूल छलैक,से बात पाणिनि अपन महाभाष्यमे सूचित कयने छथि। परंच वर्तमानमे एकर तीनेटा मुख्य शाखा अछि - कौथुमीय ,राणायनीय आ जैमिनीय । मिथिला सहित अधिकांश उत्तर भारतमे कौथुमीय शाखा प्रचलित अछि। तैयो आनों शाखाके पाठ होइते छैक। सामवेदक कौथुम शाखामे आरण्य गानमे एकटा मंत्र छै,जकरा " सेतुषाम" कहल जाए छै। एहि मंत्रक स्वरूप देखू -:
अहमस्मि प्रथमजा ऋतस्य पूर्व देवेभ्यो अमृतस्य नाम।
यो मा ददाति स इदेवमावदहम न्नम न्नम दन्तमाझे ।।
ई मन्त्र ब्रह्मांडक ओहि स्वरुपक वर्णन छैक जे सभमे समाहित छै। ब्रह्मांडमे ऋतु सँ पहिनहि सँ अर्थात देव - देवता सँ पहिले सँ हम मनुष जन्म लेबय बाला अमृत छी। हम अन्न खाईत छी आ अन्नकेँ खायबालाकेँ सेहो हमही खाइत छी। एहिक सरल भावे बुझल जाए- " चारिटा सेतु बनाऊ ,चारिटा बाधा पार करू।" ई बाधा छैक- क्रोध ,लोभ, अश्रद्धा आ फुसि(असत्य) । क्रोध नामक बाधाकेँ शांतिक सेतु सँ पार करू। अश्रद्धा नामक वाधाकेँ श्रधा सेतु सँ पार करु । असत्य (झूठ) नामक बाधाकेँ साँच (सच) सेतु सँ पार करू । अर्थात् स्वर्ग दिस जाए,इजोत दिस जाऊ। आब मूलमंत्र आ जोड़ल पाठ दूनू अर्थ मिलाकऽ देखबै तँ अपने बुझाए जाएत जे एहिमे चारि बाधाकेँ जे पार कऽ लेताह से ब्रह्माण्डक ओहने स्वरुप बनि जेताह, जे सबमे समाहित छथि आ जकरामे सभ समाहित छै।
एहि शव्दकेँ महाभारतक ( उद्योग ३९/७३) एक श्लोकमे देखल जाऊ -:
अक्रोधेन जयेत् क्रोधम । असाधुं साधुना जयेत्।
जयेत् कदर्यं दानेन । जयेत् सत्येन चानृतम्।।
तामश पर शांति सँ दुष्ट दुर्जन पर सदाचार सँ , कंजूस पर दान सँ आ ,झूठ- फुसियाह पर सत्य सँ विजय प्राप्त कयल जा सकैए । बौद्ध धर्म'क ग्रन्थ सेहो संपुष्ट करैत छै। आगू अनचिन्हार जी लिखैत छथि -" एहि संसारमे किछ लोक एहन होइत छैक ,जिनकर नैतिकता जीवनके हरेक परिस्थितिमे नैतिक बन्धनमे रहि अपन काज करैत छै । आ जँ दोसर शव्दमे कही तँ कहल जा सकैए जे ओहन लोक अपन नीजी जीवन आ सामाजिक जीवनकेँ यथा संभव एक समान रखैत छथि। जँ एहन लोक लेखन कार्य सँ जुड़ल होइथ तऽ हुनकर लेखन एवं आचरण एक समान रहैत छनि। एहने किछ लोक मे सँ एक छथि - श्री गजेन्द्र ठाकुर। श्री ठाकुर जी अपन जीवनमे सामवेदक सेतुषाम मन्त्रक चारिसेतु बना ,चारु बाधा पार कऽ लेने छथि आ अपना भरि आनों लोककेँ एहि लेल प्रेरित करैत छथि। मैथिली साहित्यमे मुख्य चारि बाधा अछि-: पहिल- मँच माला माइक,दोसर - पुरस्कार, तेसर - साहित्यिक रचना चोरी आ चारिम- दोसरकें आगू नहिं बढऽ देब ; सहायता नहिं करब।
ऋचाक' पाँति ....
महो अर्ण: सरस्वती प्र चेतयति केतुना ।
धियो विश्वा वि राजति ! !
सँ खण्ड १. श्रीमती प्रीति ठाकुर मादे आलेख लेखिका लेल आह्वान रूपेँ महौत देल गेलनि अछि । एहिमे श्रीमती मुन्नी कामत जीके पहिल आलेख " बाल मनक सिद्धहस्त लेखिका श्रीमती प्रीति ठाकुर" आ दोसर आलेख इरा मल्लिक के " मैथिली चित्र कथामे प्रीति ठाकुरक योगदान" शिर्षक सँ छपल छन्हि। दोसर खण्डमे श्री गजेन्द्र ठाकुर जीक मादे १२. गोटय अपना कलम सँ अग्रलेख लिखने छथि, हुनको सब लेल ऋचाक पांति -:
पुनन्तु मा पितर: सोम्यास: पुनन्तु मा पितामहा: पुनन्तु प्रपितामहा: पवित्रेण शतायुषा।
पुनन्तु मा पितामहा: पुनन्तु प्रपितामहा: पवित्रेण शतायुषा विश्वमायुर्व्यश्न्नवै।।
सँ आह्वान कयल गेल छन्हि। एहि खण्ड लेल विस्तार सँ लेखन कार्य शिर्षक - 'मैथिलीक डिजिटल युगक निर्माता : गजेन्द्र ठाकुर ' मेँ कैलास कुमार ठाकुर जी जमलाह अछि, जे पृष्ठ सँ० ३६ सँ ५९ धरिमे वृतांत आयल छैक । दोसर गोटे छथि - विकास वत्सनाभ,जे पृष्ठ सँ० ६० सँ ७० धरिमे शिर्षक - डिजिटल युगमे मैथिली: विदेह आ गजेन्द्र ठाकुर ' रूपे आयल छैक। भैरव लाल दास जीक 'मिथिलाक पंजी संरक्षणमे गजेन्द्र ठाकुर'क योगदान ' विषय पृष्ठ सँ० ७१ सँ ८० धरिमे समाएल छैक। पुनम जा "सुधा" जीक डायवर्सिटी आ विदेह : आधुनिक मैथिली साहित्यक चेतनामूलक पुनर्जागरण ' पृष्ठ सँ० ८१ सँ ८६ धरिमे आयल छैक। डॉ० शिव प्रसाद जीक ' डायवर्सिटी आ विदेह ' पृष्ठ सँ० ८७ सँ १०९ धरिमे अनेको सहयोगी ई-विदेह'क लेखक मादे चर्चा कयल गेल छैक। एहि पाँतिक लेखक'क विषयमे अति संक्षिप्त रूपेँ पाठककेँ पढ़य ले भेटि जाएत -: विदेह - ई पत्रिकाक एकटा सहयोगी रचनाकार रूप मे श्री लाल देव कामत एखनधरि अपन समीक्षाक माध्यम सँ सहयोग द' रहल छथि। पोथी पर पाठकीय प्रतिक्रिया वा पोथी समीक्षा मादे हिनक नाम विदेह ई-पत्रिकाक अनेकों अंक मे सहज सुलभ अछि। अपन परिचित, आदरणीय व्यक्ति सभकें सेहो ई नीक परिचय उपस्थापित कयने छथि। मैथिली संस्कृति आ ग्रामीण समाज सँ सम्वध्द हिनक शोध 'हटनी' सँ प्रकाशित कोशी संदेश : मिथिलाक आवाज ' पत्रिका हित लेल सदैव तत्पर रहैत छथि। हिनक ' दिव्य दृष्टि ' (पल्लवी प्रकाशन, निर्मली) सँ २०२२ ई० मे निवन्ध - प्रवन्ध - समालोचनाक पोथी प्रकाशित छन्हि,जाहिमे कुल ४८ गोट निवंध , समीक्षा आ पाठकीय प्रतिक्रिया संकलित छनि। अपन सामर्थ्य अनुसार ई अपन लेखन काजमे सदैव लीन रहैत छथि।" कल्पना झा 'क पृष सं०११० सँ १२५ धरि शिर्षक - ' विदेह आ नव लेखक ' संदर्भमे छन्हि। मुन्ना जीक पृष्ठ सँ० १२६ सन्न १२८ धरिमे मैथिलीमे गैर सवर्ण लेखकक कमी आ श्री गजेंद्र ठाकुर' शिर्षक सँ छपल छन्हि। डा० धनाकर ठाकुर जीक पृष्ठ सँ० १२९ सँ १३३ धरिमे ' विदेह पत्रिकाक जनपक्षधरता ' पाठ सँ पाठक अवगत हेताह। श्री हितनाथ जा जी खूब लिखैत रहैत छथि ,एहू पोथीक पृष्ठ संख्या १३४ सँ १४० धरिमे ' गजेन्द्र ठाकुर आ मैथिली समीक्षा शास्त्र ' शिर्षक सँ उल्लेख परिमार्जित रुपेँ कयलनि अछि। प्रवीण कुमार झाजी पृष्ठ संख्या १४१ सँ १४६ धरिमे ' गजेन्द्र ठाकुर : लेखक , इतिहासकार आ आधुनिक मैथिली अध्ययनक शिल्पकार ' शिर्षक सँ पाठ लिखलनि अछि। कुन्दन कर्णजी पृष्ठ सँ० १४७ आओर १४८ मेँ शिर्षक ' अनुपम अतुल्य योगदान' नामे लिखलनि अछि। श्री जगदानंद झा 'मनु' पृष्ठ सँ० १४९ सँ १५२ धरिमे ' मैथिली साहित्यमे गजेन्द्र ठाकुर जीक योगदान ' शिर्षक सँ एक पाठ लिखने छथि। उज्ज्वल कुमार झा जीके पृष्ठ संख्या १५३ सँ १६० पर 'गजेन्द्र ठाकुर : मैथिली भाषा - साहित्यक नवजागरणक सेतु पुरूष ' शिर्षक मेँ पाठक केँ आकर्षित करैत छथि। आखरी लेखकमे मुकेश आनन्द पृ० सं० १६१ सँ १६६ धरि शिर्षक ' मिथिला - मैथिलीक मंच सँ गजेन्द्र ठाकुरक अनुपस्थिति : कारण एवं प्रभाव ' विषय सँ पाठकक धेयान आकृष्ट कयलाह हेन। सम्पादक रूपेँ जहिना ओ संस्कृत सँ प्रारम्भ करैत शिर्षक दू गोट देलाह हेन ,यथा -
गणनां त्वा गणपति हवामहे....पृष्ठ सँ० ३-१६ आओर पृष्ठ सँ० १७-२५ धरिमे प्रस्तुति ऋजुनीती नो वरुणो मित्रो ..... मेँ अनेको अनोखा तथ्य रखलनि अछि, तहिना सहयोगी लेखक परिचय (फोटो पृ० १६७-१७० धरिमे) संस्कृतक श्लोक ' नमो गणेभ्यो गणपतिभ्यश्च ' देलाह अछि । पृष्ठ सँ० १७२ मेँ समस्त पाठको लेल संस्कृत श्लोक देलाह अहि ,जेना -:
मधुमतीरोषधीर्घाव आपो मधुमन्नो भवत्वन्तरिक्षम् क्षेत्रस्य पतिर्मधुमान्नो अस्तवरिष्यन्तो अन्वेनं चरेम। शारांशत: कहब जे एहि सेतु षाम मे लेखकगण ठाकुर जीके विरूदावली नहिं , एक मैथिली तपस्वीके संदर्भमे आकलन करबामे समर्थ होईत गेल छथि। एगारह गोट पोथीक लेखक आ ४ गो पोथीक सम्पादक श्री आशीष कुमार झा जीक विशेष परिचय लेल एहि लिंक पर पाठक जा सकैत छी -:
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हार्दिक शुभकामनाक संग बधाय होय!
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