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VIDEHA ISSN 2229-547X  ·  First Maithili Fortnightly eJournal  ·  Since 2000  ·  www.videha.co.in
विदेह — प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका
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विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका
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अशोक कुमार ठाकुर

उपवास केवल शरीरक नहि/ मिथिलाक पुकार/ धरती माँ के पुकार


उपवास केवल शरीरक नहि


उपवास
भूखक पीड़ा सहि जे सकय,
ओ पीड़क मर्म बुझैत अछि।
अपन सुखकेँ त्यागि कऽ जे चलय,
ओ मानव धर्म निभैत अछि।

जाति नहि, धर्म नहि पूछू,
पूछू कतेक विचार।
जे जनहितमे दीप जरबय,
ओहि पर हो सत्कार।

राजनीतिक रंग बदलैत रहय,
सत्ता अबय-जाय।
मुदा जनकल्याणक संकल्प,
कखनो नहि मुरझाय।

जे अपन हित छोड़ि समाजक,
पीड़ा अपन बनाबय।
मानवताक ओ पावन पथ पर,
इतिहास अमर कहाबय।

संघर्षक मोल बुझू मित्र,
घृणाक बीज नहि बोउ।
प्रेम, करुणा, सत्य आ सेवा,
एही सँ जीवन जोउ।

भूख जँ केवल पेटक रहितय,
क्षणभरमे मिटि जाइत।
मुदा जे भूख न्यायक होइत अछि,
युग-युग लोक जगाइत।

आब समय अछि हाथ मिलाबी,
मनमे प्रेम जगाबी।
जाति, धर्म, राजनीति छोड़ि,
पहिने मनुष्य बनि जाबी।

मिथिलाक पुकार


उठू मिथिलाक सपूत सभ,
जागू नव अभियान।
माटि, भाषा, संस्कृति बचाबू,
ई हमर पहचान॥

कोयलि गाबय आमक डारि पर,
भोरक मधुर विहान।
माँ मैथिलीक चरणमे अर्पित,
तन-मन आ सम्मान॥

विद्यापतिक वाणी बाजय,
जनकक पावन धाम।
सीताक पग-पग पवित्र कयने,
धन्य भेल ई ग्राम॥

पढ़ू मैथिली, लिखू मैथिली,
ई जीवनक शृंगार।
भाषा बिनु संस्कृति अधूरी,
बुझू एहि विचार॥

जाति-पाँतिक भेद बिसरू,
जोड़ू प्रेमक डोर।
एकतामे मिथिल बसैत अछि,
ई सत्य अति घोर॥

सत्य, श्रम आ ज्ञानक बलसँ,
गढ़ब नव इतिहास।
मिथिल धरणी फेर गबैत रहत,
गौरवक मधुमास॥

जय-जय मिथिला, जय-जय भाषा,
जय जननीक मान।
युग-युग धरि अमर रहय,
हमर मिथिल स्थान॥

धरती माँ के पुकार


धरती रोइ-रोइ कहै छैक,
"बौआ,हम धरती माई छी।
तोहर माइक माइक माई छी,
सभ जीवक जननी ठाढ़ि छी।

तोरा लेल अन्न उपजौलौं,
तोरा लेल जल बहौलौं।
तोहर सभ दुख अपन बुझि,
छाती चीरि फल-फूल देलौं।

मुदा अहाँ हमर कोन बेटा,
जे हमरा टुकड़ा-टुकड़ा करै।
एक धूर, एक कट्ठा खातिर,
भाइक संग लड़ै-मरै।

मरैत दम धरि 'हमर-हमर',
कहैत रहै संसारमे।
खाली हाथ आयल छल,
खाली हाथ जाएत पारमे।

जन्म देनिहार माइक तक,
अहाँ सम्मान बिसरि गेलौं
वृद्धाश्रमक सून्न कोठरीमे,
जीवित भगवान छोड़ि देलौं।

जे माई राति-राति जागल,
तोहर ज्वरमे कानल छल।
अपन सुख सब तोरा देलक,
तोहर दुःखमे पागल छल।

आइ ओही माई बाट जोहै,
कखनो बेटा आबि भेटत।
एक बेर 'माँ' कहि बजा देत,
मोनक घाव सभ मिटत।

धरती फेर हौले सँ बजली—
"बौआ, एते अभिमान नहि कर।
जमीनक झगड़ा छोड़ि क
माइक चरणक सम्मान कर।

धरती, धन आ घर-दुआर,
एहि संसारमे रहि जाएत।
माइक आशीष जकरा भेटत,
से जीवन भर सुख पाएत।"
*कविताक मुख्य संदेश: जमीन बाँटए सँ पहिने ओहि माइकें मोन पाड़ू, जे अहाँकेँ जन्म देने छथि; आ ओहि धरती माइकें सेहो, जे अहाँकेँ जीवन देने छथि।
अथवा धरती बाँटए सँ पहिने जननीक सम्मान करू, किएक तँ जननी आ धरती दुनू जीवनक आधार छथि। अथवा अधिक मार्मिक रूपमे- धूर-कट्ठाक हिसाब करए सँ पहिने माइक ममता मोन पाड़ू, किएक तँ जमीन जीवन धारण करबैत अछि, मुदा माई जीवन दैत छथि। एक पंक्ति मे सार: "धरती आ जननीक मोल नहि होइत छै; एक जीवन दैत छथि, दोसर जीवन चलबैत छथि।

-अशोक कुमार ठाकुर; ग्राम–करमौली, पोस्ट–करमौली, थाना–खजौली, जिला–मधुबनी (बिहार); मोबाइल नंबर:8709568993, जनसेवा:एस.डी.आर.एफ. मे कार्यरत सिपाही।

 

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