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VIDEHA ISSN 2229-547X  ·  First Maithili Fortnightly eJournal  ·  Since 2000  ·  www.videha.co.in
विदेह — प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका
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विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका
विदेह नूतन अंक
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अशोक कुमार ठाकुर

विदेह ४४४/ ई-विदेह :-मैथिलीक प्राण-दीप/ योग : जीवनक अमृत/ संत कबीर : मानवताक अमर दीप


विदेह ४४४

विदेह केवल पत्रिका नहि, मैथिलीक एक उज्ज्वल द्वार अछि। जतय शब्द पाबैत नव जीवन, आ संस्कृति केर श्रृंगार अछि॥
छोट हो वा पैघ कवि-लेखक, सभकेँ समान सम्मान भेटै। प्रतिभाक दीप जराबऽ लेल, सभकेँ आगाँ बढ़बाक स्थान भेटै॥
मिथिलाक विलुप्त होइत शब्द, एतय फेर सँ जीवन पाबै छै। कविता, कथा आ लोक-स्मृति बनि, नव पीढ़ी धरि संदेश पहुँचाबै छै॥
गामक बोली, लोकक भाषा, एतय सहेजल धरोहर बनल। माटिक सुगंध, जन-मनक पीड़ा, शब्द-शब्द मे अमरत्व पाओल॥
हे आदरणीय श्री गजेन्द्र ठाकुर जी,अहाँक प्रयास प्रशंसनीय अछि। मैथिली सेवा केर ई साधना, साहित्य जगत लेल वंदनीय अछि॥
अहाँ सभ रचनाकार केँ, मान, सम्मान आ अवसर दैत छी। मैथिलीक नव अंकुर सभकेँ, विश्वक मंच धरि पहुँचा दैत छी॥
विदेहक ई उज्ज्वल यात्रा, युग-युग धरि प्रकाश फैलाबय। मिथिलाक भाषा, संस्कृति, गौरव, सदिखन नव ऊँचाइ पाबय॥
पाक्षिक विदेह ई-पत्रिका (अंक ४४४) मे स्वरचित कविता प्रकाशित होएबाक अवसर देबाक लेल आदरणीय संपादक श्री गजेन्द्र ठाकुर जीक प्रति हार्दिक आभार।


ई-विदेह :-मैथिलीक प्राण-दीप


ई-विदेह केवल पत्रिका नहि,
मैथिलीक धड़कन, प्राण अछि।
मिथिलाक माटिक सुगंध सँ भरल,
भाषाक पावन सम्मान अछि।

जतय नहि कोनो छोट-पैघ छै,
नहि यश-अपयशक व्यापार।
नव अंकुर आ वटवृक्षक बीच,
सभकेँ भेटै समान अधिकार।

जतय नव कविक स्वर गूँजै छै,
वरिष्ठक अनुभव संग-संग।
शब्द-शब्द मे संस्कृति बोलै,
मिथिलाक अमिट रंग-अनंग।

जे शब्द समयक धूलि तले,
वर्षौं सँ पड़ल विस्मृत छल।
विदेहक पन्ना पर आबि फेर,
जीवनक नव संचार भेल।

लोककथा, लोकगीत, कहबी,
सभकेँ एतय स्थान भेटै।
मातृभाषाक हर धरोहर केँ,
नव पीढ़ीक पहचान भेटै।

हे गजेन्द्र ठाकुर जी अहाँ,
भाषा-सेवाक दीप जरौलहुँ।
असंख्य प्रतिभाक स्वप्न सभकेँ,
साहित्यक आकाश देलहुँ।

अहाँक निष्पक्ष दृष्टि सँ,
कतेको कलम उजागर भेल।
कतेको नव रचनाकारक,
जीवनक पहिल सम्मान भेल।

पाक्षिक अंक चारि सय चवालीस,
मैथिलीक गौरव-गाथा अछि।
ज्ञान, सृजन आ संस्कृतिक,
एक अनुपम परिभाषा अछि।

हमरो स्वरचित कविता केँ,
जतय स्थान ससम्मान भेटल।
साधारण शब्दक एहि साधक केँ,
रचनाकारक पहिचान भेटल।

एहि लेल हृदयक गहिराइ सँ,
आभारक अर्पण करैत छी।
विदेह आ अहाँक चरणमे,
श्रद्धाक पुष्प समर्पित करैत छी।

[युग-युग धरि विदेह प्रकाशित हो, मैथिलीक मान बढ़ाबैत रहय। मिथिलाक भाषा, संस्कृति, साहित्य, विश्व-दिशामे ज्योति फैलाबैत रहय॥]
[आदरणीय संपादक गजेन्द्र ठाकुर जीक प्रति कृतज्ञता-समर्पण]

योग : जीवनक अमृत


योग हमर प्राचीन धरोहर,
भारतक गौरव-गान।
तन-मनकेँ स्वस्थ बनाबय,
योगक अनुपम दान।

भोरक पहिल किरण संगहि,
जँ योगक अभ्यास करब।
आलस, चिन्ता,रोग भगाकऽ,
नव उत्साह सँ जीवन भरब।

योग सिखाबय संयम हमकेँ,
योग सिखाबय ध्यान।
योग सँ बढ़ैत आत्मबल,
मिलैत नव सम्मान।

भाग-दौड़ भरल एहि जीवनमे,
मोन अक्सर घबड़ाय।
योगक शीतल छाँह पाबि कऽ,
मन फेर मुस्काय।

प्राणायामक हर श्वासमे,
नव जीवनक सार।
स्वस्थ शरीर, निर्मल मन,
योगक अनुपम उपहार।

आउ मिलि कऽ संकल्प करिऐ,
योग अपनाएब हम। स्वस्थ,
सुखी आ सबल समाजक,
नव आधार बनाएब हम।

योग मात्र व्यायाम नहि,
जीवनक विज्ञान।
तन, मन आ आत्माक मेल,
एहि मे अछि कल्याण।

संत कबीर : मानवताक अमर दीप

(मौलिक मैथिली कविता)

भोरक अरुणिमा, गंगाक धार,
जगमे आयल एक उजियार।
कमल-पात पर शिशु मुस्कायल,
धरतीक भाग्य नवका जगमगायल।

नीरू-नीमा प्रेमे पालल,
ममताक अँचलमे सँभारल।
गरीबी छल, नेह अपार,
ओहि घर जन्मल प्रेमक संसार।

काशी बनल कर्मभूमि प्यारी,
करघा संग बीतल जिनगी सारी।
सूतक डोर जकाँ जीवन बुनल,
सत्य-प्रेमक संदेश सुनल।

रामानन्द गुरु कृपा बरसौलनि,
ज्ञानक दीप हृदयमे जरौलनि।
"राम" नाम बनल जीवन आधार,
दूर भेल अज्ञानक अन्हार।

जाति-पाँतिक बान्हन तोड़ल,
मानव-प्रेमक दीपक जोड़ल।
हिन्दू-मुसलमान एक समान,
सबमे देखल ईश्वरक स्थान।

दोहा-दोहा अमृत बरसल,
सुतल समाज फेर सँ जागल।
पाखंड, लोभ, अभिमान हरौलनि,
सच्चाईक बाट सबकेँ देखौलनि।

जीवन भरि श्रमक मान बढ़ौलनि,
प्रेम-दयाक फूल खिलौलनि।
नहि राजसिंहासन, नहि अभिमान,
मानव सेवा छल पहचान।

अंतिम बेला मगहर गेला,
अंधविश्वासक परदा फाड़ि देला।
देह विलय भेल प्रकृतिक संग,
नाम अमर भेल युग-युग रंग।

आइयो गूँजै हुनकर बानी,
प्रेम-दयाक अमृत कहानी।
जतए रहत मानव सम्मान,
ततए अमर रहत कबीरक नाम।

आउ, हम सभ प्रण एतबे करी,
सत्य-प्रेमक दीप सदिखन धरी।
कबीरक आदर्श हृदयमे बसाउ,
मानवताक नव प्रभात जगाउ।

-अशोक कुमार ठाकुर; ग्राम–करमौली, पोस्ट–करमौली; थाना–खजौली, जिला–मधुबनी (बिहार)
 

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