
गजेन्द्र ठाकुर
साधु आ वेश्या [भगवदज्जुकम्]
[भगवदज्जुकम् (संस्कृत प्रहसन)- भगवद् (संन्यासी); अज्जुकम् (वेश्या)]
मूल संस्कृत प्रहसन - बौधायन द्वारा रचित; मैथिली अनुवाद: गजेन्द्र ठाकुर
………..
[नान्दी (देवतासँ आशीर्वाद प्राप्त करै लेल) क बाद सूत्रधार प्रवेश करैत छथि।]
सूत्रधार:
शिवक चरण रक्षा करओ!
ज्योतिषी तकर महत्त्व जनैत छथि -
देवताक मुकुटपर नीलम तकरा स्पर्श करैत अछि -
आ रावणक दुष्टता सँ
तकर औंठा एक बेर झुकाओल गेल -
शिवक चरण रक्षा करओ!
(प्रवेश करैत) ई रहल हमर घर, हम भीतर जा रहल छी। विदूषक, कतए छह?
विदूषक: हम एतए छी, स्वामी!
सूत्रधार: जखन तक कियो नै छैक, हम तोरा किछु नीक गप कहबह।
विदूषक: ठीक अछि, स्वामी। (बाहर जाइए, फेर अबैए) घरमे कियो नै अछि, स्वामी। कहियौ ने, किछु नीक गप!
सूत्रधार: सुनह। आइ हम एकटा ब्राह्मण सँ भेँट केलौं; ओ बाहर सँ आयल छलाह- एकटा ज्योतिषी जिनकर भविष्यवाणी बड़ सटीक होइ छै- आ ओ भविष्यवाणी केलनि: "श्रीमान्," ओ बजला, "आइक सात दिन बादे राजमहलमे अहाँ नाटक देखाएब। राजा अहाँक प्रदर्शनसँ बड़ प्रसन्न हेता आ अहाँकेँ खूब धन देता।" ई सत्य होमयबला भविष्यवाणी हमरामे ऊर्जा भरि देलक, तेँ हम एकटा नाटक खेलाएब।
विदूषक: कोन तरहक नाटक खेलाएब?
सूत्रधार: ई बड़ नीक प्रश्न अछि। नाटकमे कोनो दस तरहक भावना देखा सकै छी, आ जहाँ धरि हमरा बुझाइए, हास्य सभसँ श्रेष्ठ अछि। तेँ हम एकटा प्रहसन खेलाएब।
विदूषक: स्वामी? हमरा प्रहसनमे सेहो हास्य नै बुझाइए।
सूत्रधार: तखन हमरा तोरा प्रशिक्षित करऽ पड़त। अप्रशिक्षित मन किछु नै पाबैए।
विदूषक: स्वामी, तखन अहाँ हमरा प्रशिक्षित करू!
सूत्रधार: अवश्य।
जँ अहाँ ज्ञान पर मन लगौने छी
तँ नीक मार्गपर चलयबलाक संग चलू-
(पर्दाक पाछाँ सँ अबाज)
पर्दा पाछाँ सँ अबाज: शाण्डिल्य, कतऽ छह हौ?
सूत्रधार (अकानैत):
हमर पाछाँ आउ, साधुक शिष्य बनि
जेना दृढ़ योगीश्वरक शिष्य अनुसरण करै छथि!
(दुनू प्रस्थान करैत छथि।)
प्रस्तावनाक अन्त
मुख्य नाटक
(एकटा साधु प्रवेश करैत छथि।)
साधु: शाण्डिल्य, कतऽ छह? (पाछाँ देखैत) अखनो कतौ नै देखा रहल अछि। ऐ छौड़ाक स्वभाव छै अनैतिकतासँ भरल। आ किए नै! देह बेमारीक खजाना अछि। बोखार तकरा हिलबै छै, मृत्युक छाह ओकरापर शासन करै छै, आ ओकर गति धारक कातक एहन गाछ सन होइ छै जे सदिखन फेकल समान सभसँ घेराएल रहैए। तखन गुणसँ प्राप्त शरीर पाबि कऽ तोँ चकित छह। आ जँ तोँ एकर दोषकेँ शक्ति, सौन्दर्य, स्वास्थ्य आदि गुणसँ झाँपल देखै छह, तँ तोँ पागल छह! तेँ शाइत ओ दुखी बौआ पूरापूरी दोखी नै अछि। हम एक बेर फेर बजबइ छिऐ। शाण्डिल्य, कतऽ छह!
(शाण्डिल्यक प्रवेश।)
शाण्डिल्य: तँ, शुरुए सँ कहू- हम ढंगसँ जनमल छलौं। हमर परिवार गीदड़क ऐंठ-कूठपर जिबै छलय, हमर जीह ओकरा पकड़ने सुखा गेल, हमर ब्राह्मण-जनौ गरदनिमे सटल रहल, आ हमसभ ब्राह्मण भेलापर बड़ सन्तुष्ट छलौं! तेँ घरमे खाइले किछु नै छलय। हम भूखसँ मरै छलौं। हम बौद्ध बनै लेल भागलौं जे जलखै भेटत। जलखै भेटल, मुदा ई बदमाश सभ दिनमे एक्के बेर मात्र खाइ जाइए। तेँ हम फेर भुखले रहलौं। हम गेरुआ वस्त्र फेकलौं, भिक्षापात्र तोड़लौं, आ मात्र एकटा धरिया पहीरि छत्ता लेने चलि एलौं। आ आखिरीमे ऐ दुष्ट गुरुक मोटा उठबैबला बनलौं। कतऽ छथि ओ पूज्यवर? ओ अपने भिक्षाटनपर गेल हेता आलसी। बेसी दूर नै गेल हेता। (मंचपर घुमैत देखैत अछि।) ओह्हो, ई रहला पूज्यवर! (नम्रतासँ) क्षमा करू, क्षमा करू, पूज्यवर!
साधु: डरह नै, शाण्डिल्य, डरह नै!
शाण्डिल्य: पूज्यवर, ऐ संसारमे- जतऽ सदिखन झगड़ा होइत रहैए, जतऽ सुखे सभ बौस्तु अछि- अहाँ भिक्षाटन केना करै छिऐ?
साधु: सुनह। हमरा मान-सम्मानक कामना नै अछि; संकट सदिखन हमर पाछाँ रहत, आ हमरा खाइ लेल जे भिक्षा चाही से दुर्बल लोकसँ अबैए। हम ऐ व्यसन-ग्रस्त संसारमे समधानि कऽ चलै छी, जेना पनिडुम्मीसँ भरल पोखरि।
शाण्डिल्य: मुदा पूज्यवर, हमर तँ नहिये परिवार अछि, नहिये भाई, ने बाप; अहाँ हमरापर एत्ते कृपा किए करै छी? हम साधुक लाठी ऐले नै पकड़लौं जे पुण्य भेटत, मुदा ऐले जे भूखे मरि रहल छलौं।
साधु: शाण्डिल्य, एकर अर्थ की?
शाण्डिल्य: सत्य कऽ अलाबे की? अहाँ सदिखन कहै छी जे झूठ बन्हन अछि।
साधु: एकदम ठीक। जँ कियो झूठकेँ संगी बनबैए तँ बन्हनमे बन्हा जाइए। भूझऽ चाहै छह किए? जखन एकटा सचर लोक नीक प्रेरणासँ नीक काज करैए, देवता तकर फलकेँ एना राखै छथि जेना कोनो धरोहरि।
शाण्डिल्य: मुदा ओ आपस कखन भेटत?
साधु: जखन ओइ विरागसँ ओ श्रेष्ठ बनत।
शाण्डिल्य: श्रीमान्, श्रेष्ठ केना बनल जाइए?
साधु: चीजक इच्छा नै केला सऽ।
शाण्डिल्य: पूज्यवर, ई प्रश्न उठैए जे इच्छा केना नै कएल जाय।
साधु: प्रेम आ घृणासँ एकात भऽ। किए? "सुख-दुखमे सम रहब, भय-हर्षमे सन्तुलित रहब, मित्र-शत्रुकेँ समान दृष्टिसँ देखब - एकरे बुद्धिमान लोक एकात हएब कहै छथि।"
शाण्डिल्य: मुदा ई अछि की?
साधु: जे अखनो अस्तित्वमे नै आयल तकर नाम नै होइए।
शाण्डिल्य: मुदा कहू, की एकरा कएल जा सकैए, पूज्यवर?
साधु: कोनो सन्देह अछि?
शाण्डिल्य: झूठ! झूठ!
साधु: माने?
शाण्डिल्य: श्रीमान्, अहाँ हमरापर किए तमसाइ छी?
साधु: तोँ सीखबे नै करबह।
शाण्डिल्य: हम सीखी आकि नै। अहाँकेँ की? अहाँ तँ स्वतन्त्र छी!
साधु: एना नै बाजऽ! परम्परा अछि जे छड़ी छात्रक लेल पुष्टाइ होइ छै। तेँ पूर्ण तटस्थतासँ हम तोरा बड़ तरीकासँ सैंतबऽ।
शाण्डिल्य: अहा! पूर्ण तटस्थतासँ दण्ड दै छी, हे पूज्यवर! आब ई संवाद बन्द करू; भिक्षाक समय बीतल जाइए।
साधु: मूर्ख, अखन भोर-सकाले अछि, दुपहरिया नै। लिखल अछि: भिक्षा तखन मायगी जखन उक्खड़ि राखि देल जाय, चूल्हि मिझा जाय, आ सभ खा-पी लेथि। चलह, किछु काल कलममे बितबै छी।
शाण्डिल्य: ओह ओह! अहाँक पावन व्यवहार अपन वचन तोड़ैए!
साधु: माने?
शाण्डिल्य: की अहाँक पावन व्यवहार एक रंग नै अछि, नीक आकि बेजाय?
साधु: एकदम्म! हमर आत्मा एक रंगक अछि, नीक आकि बेजाय, मुदा हमर सक्रिय स्व केँ विश्राम चाहि।
शाण्डिल्य: श्रीमान्, आत्मा की अछि? सक्रिय स्व की अछि?
साधु: सुनह! अन्तर-आत्मा अछि जे सुतला पर स्वर्ग जाइए। फेर मात्र आत्मा अछि जे अपन कर्तव्य करैए आ जन्म-जन्मान्तर यात्रा करैए। आ तखन ईहो आत्मा अछि जकरा हम सक्रिय स्व कहै छी: "मनुष्य अपन देह अछि," आ ई आत्मा विश्रामक सुख चाहैए।
शाण्डिल्य: ठीके, "ओ आत्मा, जे बूढ़ नै होइए, मरैए नै, अविनाशी अछि, अक्षय अछि- वएह आत्मा अछि। आ जे हँसैए, हँसबैए, सुतैए, मरैए- वएह सक्रिय स्व अछि।"
साधु: जेना सिखेलौं, सएह सिखलौं।
शाण्डिल्य: ओह ओह! चलू! अहाँ ठका गेलौं!
साधु: माने?
शाण्डिल्य: आत्मा जे अखन अछि, ठीक ने? जँ देह नै तँ किछु नै।
साधु: जनसाधारण सन बजै छह। सभ प्राणी कइएक अवस्थासँ गुजरैए, बुझलहीं। तेँ हम सभ ओइ रूपमे बजै छी।
शाण्डिल्य: आ अहाँ कोन अवस्थामे छी?
साधु: सुनह। आकाश, वायु, जल आ अग्निक कणसँ बनल देह लेने, बाकी मात्र माटि, कान, आँखि, जीह, नाक आ स्पर्शसँ चेतन, हम श्वास लेबऽ बला प्राणी छी जकर नाम मनुष्य अछि।
शाण्डिल्य: ओह ओह! एना अहाँ स्व केँ नै जानि सकब, अपन आत्मा तँ दूरक बात। (चारू दिश देखैत) श्रीमान्, ई देखू एकटा कलम अछि।
साधु: तोँ पहिने जाह। ऐ एकान्तक आश्रय वन हमरा सभकेँ छाह दैत अछि।
शाण्डिल्य: श्रीमान्, अहाँ श्रेष्ठ, पहिने जाउ, हम पाछाँ आएब।
साधु: कोन प्रयोजन?
शाण्डिल्य: हमर माय एक बेर एकटा पवित्र महिलासँ सुनलनि जे अशोकक फूलमे बाघ नुकायल रहैए। तेँ अहाँकेँ पहिने जाय पड़त, श्रीमान्!
साधु: ठीक छै। (दुनू प्रवेश करैत छथि।)
शाण्डिल्य: आह, बाघ काटि लेलक! बाघक मुँहसँ बचाउ! बिन मुक्तिए बाघ खा लेलक! हमर गरदनिसँ खून बहि रहल अछि!
साधु: डरह नै, शाण्डिल्य। ई मात्र एकटा मोर अछि।
शाण्डिल्य: तँ मोर अछि!
साधु: हँ, मात्र मोर।
शाण्डिल्य: तखन आँखि खोलै छी।
साधु: खोलह।
शाण्डिल्य: (कलमकेँ देखैत) हे! ओ बदमाश बाघ हमरासँ डेरा गेल, मोर बनि गेल आ आब भागि रहल अछि! (कलमकेँ देखैत) अहा! कतेक सुन्दर कलम! हम देखैत छी - अर्जुन, कदम्ब, आम, शाल, दूबि, चन्दन, अशोक आ साधारण केराक गाछ- सभ बसन्तमे सुन्दर लगैए! आ हम देखै छी अंकुर, पात, फूल, आ झोंझ, सभ एकटा कलममे जे चमेलीक लताक मंडपसँ सजल अछि, मोर, कोइरी आ मातल भौंराक मधुर गायनसँ गूँजि रहल अछि। ई एकटा कलम अछि जे ओइ युवती सभकेँ पश्चाताप दैए जे अपन प्रियतमक अनुपस्थितिमे कष्ट पबैए आ ओकरा सभकेँ सुख दैए जकर प्रियतम उपस्थित अछि!
साधु: मूर्ख! दिन-प्रतिदिन इन्द्रिय नष्ट होइत अछि, से एतेक सुन्दर की अछि?
सुनह,
एकटा बच्चा कहैए, आह बसन्त आयल
फूलक चद्दरिमे लेपटल!
आ नव ऋतुमे आनन्द लैए: पतझाड़ आयल
कमलक गुच्छमे हेलैत!
मुदा ओ कथीमे आनन्द लऽ रहल अछि
जखन जीवन छोट भेल जाइए?
शाण्डिल्य: एकटा प्रश्न? सुन्दरता जखन आ जतऽ होइए ई होइते अछि।
साधु: एक बेर फेर, कोनो शैक्षणिक पृष्ठभूमि नै! लोक- ओ सभ भविष्य लेल प्रार्थना करैए, अतीतपर शोक मनाबैए आ वर्तमानसँ घृणा करैए।
शाण्डिल्य: ई रस्ताक अन्त अछि। हमसभ कतऽ बैसब?
साधु: एत्तै बैसब।
शाण्डिल्य: गन्दा, गन्दा!
साधु: "बोन स्वच्छ अछि, धरती पवित्र अछि।"
शाण्डिल्य: मुदा जँ थाकलापर बैसऽ चाहै छी तँ सदिखन पुछै छी, स्वच्छ अछि वा गन्दा?
साधु: प्राधिकरण शास्त्र अछि, हम नै। किए? अपन आत्म-सम्मानसँ बताह लोकपर भरोस नै, जे कहैए जे खरापसँ नीक होइ छै- तिनकर प्राधिकरण मात्र सनकक सोंगर लेने अछि।
शाण्डिल्य: तेँ अहाँक बेसी बजला पर भरोस नै।
साधु: आबह, बेटा। किछु सीखह।
शाण्डिल्य: हम आब आर नै सीखब।
साधु: किए नै?
शाण्डिल्य: बेसी सीखबाक की फाएदा?
साधु: जे छात्र पाठ सीखैए से अन्तमे बुझिये जाइए। तेँ किछु सीखह।
शाण्डिल्य: आर तखन की होइ छै?
साधु: सुन: ज्ञानसँ विवेक बढ़ै छै, विवेकसँ आत्मनिग्रह, आत्मनिग्रहसँ तपस्या, तपस्यासँ योग, योगसँ भूत-वर्तमान-भविष्यक यथार्थक अन्तर्दृष्टि; आ ओइ अन्तर्दृष्टिसँ आठ गुणा प्रभुत्व प्राप्त होइ छै।
शाण्डिल्य: हे गुरु, अहाँ हमर विचार पढ़ि कऽ बजै छी; मुदा हम ओकरा नुका सकै छी! तेँ बिना पाप केने दोसराक घरमे घुसब की सम्भव?
साधु: माने?
शाण्डिल्य: माने बौद्ध भिक्षु लेल बनाओल स्वादिष्ट भोजन मठसँ खाएब।
साधु: तोहर सन पेटमधबा कोनो घड़ी नै मानि सकैए।
शाण्डिल्य: ऐलेल अहाँसभ सभक चानि उड़ल अछि! हमरा आर कोनो कारण नै बुझाइए।
साधु: एना नै बाजह!
योगक फल महान अछि,
सही, अडिग, अकल्पनीय, अक्षय,
उच्च-मनस्क ब्राह्मण द्वारा आदर देल,
देव आ दानव द्वारा अनुमोदित।
शाण्डिल्य: तखन अहाँ अपन योगकेँ भक्तिसँ सोचू, आ एकान्तमे रहू। हम भक्तिसँ खिच्चड़िक बिखयमे सोचब। मुदा श्रीमान्, अहाँ सन साधु ऐ योगक विषयमे बड़ सोचैए, आकि नै? ई अछि की?
साधु: सुनह
तपस्याक सार,
सभ ज्ञानक मूल, सत्यक परीक्षा,
सभ विरोधाभास दूर करय, आ प्रेम-घृणासँ रहित – वएह अछि योग!
शाण्डिल्य: धन्य पूज्य बुद्ध, जे भोजन छोड़ब, आ सभटा बौस्तु छोड़ब सिखाबै छथि!
साधु: शाण्डिल्य! एकर माने की?
शाण्डिल्य: श्रीमान्? मोन नै? हम पहिने जलखै लेल बौद्ध बनल छलौं।
साधु: मुदा अखन अहाँ किछु सिखलौं?
शाण्डिल्य: किछु? हम आब बहुत किछु जनै छी।
साधु: ठीक अछि। सुनाउ।
शाण्डिल्य: सुनू, श्रीमान्। "आठ कारण अछि, सोलह उत्पाद, मुदा आत्मा पाँच-वायुक अछि, मन तीन-सूत्रक, आ ओ भटकैए आ विलीन होइए।" ई पवित्र बुद्ध पिताका-ग्रन्थमे कहल गेल अछि।
साधु: शाण्डिल्य! ई बौद्ध धर्म नै! ई सांख्य अछि।
शाण्डिल्य: क्षमा करू, भूखमे हम खिच्चड़िपर ध्यान देलौं, तेँ एक बात सोचलौं आ दोसर कहलौं। आब सुनू, श्रीमान्। "आज्ञा अछि जे भिक्षु अदत्त वस्तु अस्वीकार करए। आज्ञा अछि जे भिक्षु प्राण हत्या नै करए। आज्ञा अछि जे भिक्षु बक-बक नै करए। आज्ञा अछि जे भिक्षु काम वासनासँ दूर रहए। आज्ञा अछि जे भिक्षु असमयक भोजन अस्वीकार करए। बुद्धक शरण जाइ छी, धर्मक शरण जाइ छी, संघक शरण जाइ छी!"
साधु: शाण्डिल्य, अपन धर्म छोड़ि दोसर नै अपनाउ!
अन्हार छोड़ू, लाल रंग छोड़ू,
श्वेत रंग संग आ सतर्क रहू।
शीघ्र ध्यान धरू,
कारण ओ सभ ज्ञान आनत!
शाण्डिल्य: आब अहाँ भक्तिसँ योगक चिन्तन करू, श्रीमान्। हम ओतबे भक्तिसँ खिच्चड़िक चिन्तन करब।
साधु: ई संवाद बन्न करू।
आत्माक बन्धन लेल, ऐ संसारकेँ स्थगित करू!
इन्द्रियकेँ आत्मामे बान्हू!
ज्ञानक सहायतासँ सत्य ताकू;
पूरा आत्मासँ, सम्पूर्ण आत्मा ताकू!
(एकटा वेश्या आ दूटा परिचारिका प्रवेश करैत छथि।)
वेश्या: छोटकी मधुमाछी, प्रिये, छोटका प्रेमी कतय गेला?
परिचारिका: मालकिन, "हम आइ छी," ओ कहलनि, आ फेर अहाँक प्रेमी नग्र चलि गेला!
वेश्या: हे प्रिय, आब की?
परिचारिका: नृत्य-मण्डप दिस दौगू आर की?
वेश्या: आइ नृत्य-मण्डप नै बैसैए।
परिचारिका: मालकिन, अहाँ एकदम सही कहलौं। मुदा नृत्य-मण्डप एकटा मदिरालये अछि आ महिला सभ, कतेको शालीन होथि, नशामे माति हँसै छथि!
वेश्या: तखन तोँ जल्दी जाह!
परिचारिका: आ अहाँकेँ सेहो जेबाक अछि, मालकिन! (प्रस्थान करैत।)
वेश्या: छोटकी कोइरी, प्रिये, हमसभ कतऽ बैसब?
परिचारिका: थोड़ेक काल ऐ पाथरक आसनपर बैसू। देखू, एकटा मोजरल आमक ठाढ़ि सँ सजाएल अछि, मुँह परहक सजावटि सन! आ तखन, मालकिन, अहाँकेँ एकटा गीत गेबाक चाही!
वेश्या: छोटकी कोइरी, प्रिये, हम सएह करब।
(दुनू बैसैत आ गाबैत छथि।)
दुनू:
आह, काम स्वयं एतय अछि!
हम सुनै छी
कोइरी आ भौंराक धनुषक डोरक गायनसँ
आ आमक ठाढ़ि बाजि रहल अछि-
आ अवश्य एक द्रष्टाक
मन ललचाइत अछि!
शाण्डिल्य: (सुनैत) आह, कोइरीक अबाज! नै, एकदम कोइरीक अबाज नै। नै, ई एकटा गीत अछि। (अनुमान लगबैत) मधुर गीत, जेना चीनीक दूधमे मक्खन! ठीक अछि, एकबेर देखै छी। (थोड़ेक चलि कऽ ऊपर देखैए।) ओह, ओह, ओह! ई कोन शुद्ध सौन्दर्य अछि जे कोनो नृत्यालयमे नुकायल नै अछि, वरन् हमर कलमकेँ अपन उपस्थितिसँ सुशोभित कऽ रहल अछि?
परिचारिका: मालकिन!
शाण्डिल्य: ओह, ओह, ओह! एकटा वेश्या! धन्य छथि धनिक लोकनि!
परिचारिका: एकटा आर गीत गाउ, मालकिन!
वेश्या: हम गाएब। (फेर गाबैत।)
आह, काम फेर आयल अछि!
आ बसन्त अपन गर्व उठेने अछि
आ प्रेमिकाक दृष्टि ओकरा संग जाइत अछि!
आह, काम फेर प्रेम जगाबैत अछि!
आ प्रिय नवविवाहिताक हृदय सेहो
ओकरा फेर फूलसँ गँथने अछि!
शाण्डिल्य: कतेक मधुर गीत ओकर कण्ठसँ उठैए! सुनू, श्रीमान्!
साधु: नै, कान सुनबाक लेल बनल अछि। हम एतेक दूर नै जाएब जे सुनी।
शाण्डिल्य: जाउ ओतेक दूर, जँ खर्च करबाक पाइ हुअय, हा हा!
साधु: जाह, तोँ। अपन व्यवहार ठीक करह।
शाण्डिल्य: आब तामस नै करू। साधु लोकनिकेँ ई नै करबाक चाही, बुझै छी।
साधु: हम मौन पालन कऽ रहल छी।
शाण्डिल्य: हँ, की ई सोनहुल मौन नै अछि!
(मृत्युक दूत प्रवेश करैत अछि।)
दूत:
आ हम आयल छी! हमरा
ओ पठौलनि जे सभ प्राणीकेँ ल' जाइ छथि
भाग्यसँ आहत, ओ जे देखै छथि
नीक आ अधला काज, भगवान यम,
शान्ति-दाता, आ आब हमरापर आरोप अछि
हुनका मृत्यु देबाक,
जइपर हुनकर अटल अधिकार अछि।
तेँ, धरतीक सभ राज्य, धार, बोन आ पर्वत देखैत, वर्षाक बोझसँ निहुरल मेघसँ छाह भेल, हम वायुसँ हिलायल कुहेससँ भरल अकाशसँ भेल आयल छी, आ आब यम जइ ठाम पठौलनि से तर्कादिवाह नग्र पहुँचलौं! ओ कतय अछि! (चारू दिस देखैत) ओ रहल! ओ चमकैत अछि, ओइ सुन्दर सोन जड़ल अशोक गुच्छमे नुकायल, संध्याक रुद्र बादलक बीच अर्धचन्द्र सन सुन्दर! ठीक अछि, ओकर थोड़ेक कर्म बचल अछि, तेँ हम थोड़े काल प्रतीक्षा करब।
परिचारिका: मालकिन, ई अशोकक फूल कतेक सुन्दर अछि? हम तोड़ब।
वेश्या: नै नै नै, हम स्वयं तोड़ब!
दूत: एकरा चुट्टी काटबाक आब समय अछि। हम आब सर्प बनि अशोकक डाड़िपर बैसि एकर प्राण लेब। जाइ छी, आ ऐ पिण्डश्याम, मनोरम-मुखी, सुकुमार-वाणी, उदार-वक्षा, सुगन्धित, लाल-कमल-आँखिवाली, हमर दृष्टिकेँ चोरबयवाली पर आब कूदब आ एकरा अपन स्वामी लग लऽ जाएब।
(वेश्या फूल तोड़ैत।)
दूत: आब कटबाक समय!
वेश्या: आह, किछु काटि लेलक!
परिचारिका: (डारि देखैत) मालकिन! ओइ डारिपर एकटा साँप अछि!
वेश्या: साँप? ओह! (ओ खसि पड़ैए।)
शाण्डिल्य: आब एतऽ की भऽ रहल अछि?
परिचारिका: श्रीमान्, हमर मालकिनकेँ नाग काटि लेलक!
शाण्डिल्य: ओह, ओह, ओह! गुरु, एकटा वेश्याकेँ नाग काटि लेलक।
साधु: ठीके, समयकेँ थाम्हऽ पड़ैत अछि। कोनो शंका नै,
लोक मात्र अपन समय पूरा करैले जनमैत अछि;
जँ समय पूरा भेल, ओ सेहो पूरा भेल।
परिचारिका: समयकेँ के रोकि सकैत अछि?
वेश्या: हम देह झमारि कऽ खसैबला छी। साँस फूलि रहल अछि। हमरा पड़बाक अछि।
परिचारिका: शान्तिसँ पड़ि रहू, मालकिन।
वेश्या: मायकेँ हमर प्रणाम पहुँचा देबै, प्रिये।
परिचारिका: ओह नै! अहाँ स्वयं जा कऽ प्रणाम करब!
वेश्या: आ छोटका प्रेमीकेँ हमरा लेल आलिंगन करब। (ओ चेतनाहीन खसि पड़ैत छथि।)
परिचारिका: आह! मालकिन मरि रहल छथि!
दूत: ठीक अछि, ओकर प्राण लऽ लेलौं आ आब रस्ता पकड़बाक अछि। अखनो गंगा पार करबाक अछि, आ विन्ध्य पर्वत, आ नर्मदा नदीक शुभ प्रवाह, सह्या, गोलेई, कृष्णवेणा, आ भगवान शिवक पवित्र नगर कांचीपुरम। आ तखन कावेरी, ताम्रपर्णी, मलय पर्वत आ अन्तमे समुद्र, जाधरि हम, वायुवेगसँ, लंकापर उड़ि मृत्युलोक नै पहुँचि जाइ। (प्रस्थान।)
परिचारिका: आह! हमर मालकिन मरि गेली!
शाण्डिल्य: गुरु! वेश्याक जान गेलनि?
साधु: लोक अपन जान नै हेरबै अछि मूर्ख! जिनगी हुनका लेल बड़ मूल्यवान अछि। कहू जे जिनगी तिनका छोड़ि गेलनि!
शाण्डिल्य: छि:, अहाँमे दया नै, प्रेम नै एक्कोरत्ती। कठोर हृदय, दुष्ट विलासी! क्रूर ठक बेलछिल्ला!
साधु: एकर माने की?
शाण्डिल्य: थम्हू, हम अहाँक हजार नाम शुरु मात्र केने छी!
साधु: हमरा रोकैले विवश जुनि करह।
शाण्डिल्य: श्रीमान्, हम शोकमे छी।
साधु: कइ लेल?
शाण्डिल्य: ओ हमर सम्बन्धी छली।
साधु: सम्बन्धी?
शाण्डिल्य: ओ कोनो साधु सन अछि; जकरामे प्रेम नै।
साधु: हँ, ई ठीक! आस्ते-आस्ते प्रेम करी, हम उच्च उद्देश्यसँ प्रेम करै छी। वास्तवमे, हम जे निःस्वार्थ रूपसँ मोक्षक पथपर समर्पित छी आ शास्त्रक निर्धारित मार्गपर चलै छी, हम मात्र साधारण स्नेहसँ मुँह मोड़ै छी आ हमर हृदय मात्र सद्गुणकेँ देखैए।
शाण्डिल्य: श्रीमान्, हम अपनापर काबू नै राखि सकै छी, हम घिसिया कऽ ओकरा लग जाएब आ कानब!
साधु: ओह नै, से नै करह!
शाण्डिल्य: तामस नै करू! साधुकेँ नै करबाक चाही। (वेश्याक लग जाइत) हे मालकिन! एतेक प्रेमी छल, एतेक नीकसँ झूमै छलौं!
परिचारिका: श्रीमान्, अहाँकेँ की भेल?
शाण्डिल्य: प्रेम, आर किछु नै।
परिचारिका: (मन मे) ठीके; सन्त सभमे सभक लेल करुणा होइ छै।
शाण्डिल्य: मालकिन, हमरा स्पर्श करऽ दिअ।
परिचारिका: अहाँमे शक्ति अछि, श्रीमान्।
शाण्डिल्य: ओह हँ! (ओ पएर छुबैए।)
परिचारिका: पएर नै छुबियौ!
शाण्डिल्य: ओह हँ, हम बड्ड भ्रमित छी। ऊपर-नीचाँ किछु पता नै। आह, ई रहल, नारिकेर सन दृढ़, केसर आ चन्दनसँ अनुलिप्त, ऊर्ध्वमुखी, हमर मालकिनक दिव्य वक्ष जे दुर्भाग्यसँ जीवित रहला पर हमरा कखनो उपलब्ध नै भेल।
परिचारिका: (मन मे) सएह हमरा करबाक चाही। (जोरसँ) श्रीमान्, थोड़े काल प्रतीक्षा करू जाधरि हम ओकर मायकेँ लऽ आनै छी।
शाण्डिल्य: देरी नै करिहह। माय विहीन सभक लेल हम माय छी।
परिचारिका: (मन मे) ई दयालु ब्राह्मण हमर मालकिनकेँ नै छोड़ि कऽ जाएत; हमरा जेबाक चाही। (प्रस्थान।)
शाण्डिल्य: ओ गेली। आब मोन भरि कऽ कानि सकै छी। ई बेचारी वेश्या जे एतेक नीकसँ चलै छली! (कानैत।)
साधु: शाण्डिल्य, ई नै करह!
शाण्डिल्य: जाउ, प्रेमहीन! अहाँ बुझै छी जे हम अहाँ सन छी।
साधु: आउ, बेटा, थोड़ेक सीखह।
शाण्डिल्य: श्रीमान्, ई बेचारी स्त्री केना ठीक हेती?
साधु: कोनो दवाई जनै छह?
शाण्डिल्य: पाप अछि अहाँक योगक फल!
साधु: (मन मे) ई बेचारा अखनो नै बुझैए जे साधु हएब माने नै बुझब जे की करबाक अछि। एकटा निअम छै जे महान शैव योग-आचार्यकेँ प्रकट कएल गेल छै: "शिष्यक करुणा आसक्तिकेँ प्रबल करै छै।" तखन हम एकरामे एकटा अन्तर्दृष्टि उत्पन्न करब। ठीक, ई सही योग अछि। ऐ योगसँ हम ऐ वेश्याक शरीरमे प्रवेश करब।
(वेश्या मुर्दासँ जिन्दा भऽ उठैत अछि। साधु अरड़ा कऽ खसि पड़ै छथि)
वेश्या: शाण्डिल्य, शाण्डिल्य!
शाण्डिल्य: (प्रसन्नतासँ) हँ! मालकिन, अहाँ जीवित छी, अहाँ पुनर्जन्म पेलौं! हम एतऽ छी, मालकिन!
वेश्या: गन्दा हाथसँ हमरा नै छुबह!
शाण्डिल्य: मुदा हम बहुत साफ छी!
वेश्या: आबह, बेटा, थोड़ेक सीखह।
शाण्डिल्य: एत्तहु सीखहे पड़त! ठीक अछि, एतऽ हम अहाँकेँ श्रेष्ठतासँ नम्रतासँ सम्पर्क करै छी। (साधुक शव लग जाइए।) श्रीमान्, दुखी छी, अहाँ मरि गेलौं। क्षमा करू, बक-बकिया, अति-योग-मनस्क गुरु! क्षमा करू, अध्यापक। ऐ तरहक प्रतिभाशाली सेहो मरैत अछि।
(वेश्याक माय आ परिचारिका प्रवेश करैत छथि।)
परिचारिका: ऐ रस्तासँ, माय।
माय: हमर प्रिय कतऽ अछि?
परिचारिका: ओ एतऽ अछि, ऐ कलममे, नागसँ काटल।
माय: आह, हम बरबाद भऽ गेलौं!
परिचारिका: शान्त होउ, माय, शान्त होउ! मालकिन ठीक छथि!
माय: केना ठीक हेती? (लग जाइत) वसन्तसेना, हमर बेटी! की भऽ रहल अछि?
वेश्या: छुबू नै, बुढ़िया!
माय: अरे! एकर माने की?
परिचारिका: बिख-माहुर माथमे पैसि गेल हएत।
माय: फुर्तीसँ वैद्यकेँ बजाउ!
परिचारिका: हँ, मालकिन!
(परिचारिका जाइत अछि। छोटका प्रेमी आ दोसर परिचारिकाक प्रवेश।)
परिचारिका: अहाँकेँ बेशी शक्ति भेटय, छोटका प्रेमी! हमर मालकिन अहाँकेँ नै देखि कऽ तड़पै छथि।
छोटका प्रेमी:
आ हम सेहो ओइ मधुर गाबैबला, विशाल-आँखिबला मुँह देखऽ चाहै छी। ई मधुमाछीक प्रतिज्ञा छैक जे फुलायल सुन्दर कमलसँ पीबय। (लग जाइत) की! ओ हमरा देखि मुँह फेरै छथि! (ओ ओकर आँचर पकड़ैत।) हे वक्रांगी, अपन मुँह घुमाउ, पोखरिमे लहरिसँ थोड़ेक हिलायल कमल सन। अहाँक कहियो काल देखाइ दैत मुँह एहन प्रसन्नकारक अछि जेना हाथमे लेल अछिञ्जल।
वेश्या: दुष्ट! हमर आँचर छोड़ू!
छोटका प्रेमी: ई की अछि?
परिचारिका: साँप काटलाक बाद सँ ओ असंगत बोल बाजि रहल छथि।
छोटका प्रेमी:
ओकर मन सत्ते बौरा गेल छै। बेचारी स्त्री शून्यमे डूमल, कोनो पवित्र मोनबला एकर शरीरकेँ अतिक्रमित केने बुझाइ छै।
(वैद्य आ परिचारिकाक प्रवेश।)
परिचारिका: ऐ दिस, श्रीमान्, हँ!
वैद्य: (प्रवेश करैत) ओ कतऽ छथि?
परिचारिका: हे ओ रहली।
वैद्य: ओ अपनामे नै छथि। सत्ते ओ नाग द्वारा आक्रमण आ काटल गेल छथि।
परिचारिका: अहाँ केना बुझलौं?
वैद्य: जेना कहल जाइए, "माहुर-बिखसँ बड्ड फर्क पड़ै छै।" एकरा एतऽ आनू। हम माहुर-बिखक शास्त्रमे पारंगत छी। (बैसैए आ इशारासँ घेराबा बनबैए।) छोटका घेराबा, तोँ जे कानक झुमका सन स्वामिनीकेँ राखै छह, ऐ जादूबला घेराबामे प्रवेश करह, जादुबला घेराबामे! ठाढ़, साँपक बेटा, ठाढ़! शान्त-शान्त! (वेश्या दिस आंगुर देखबैत) हम एकरासँ खून बहार करब। हमर छोटकी हाँसू कतऽ अछि?
वेश्या: मूर्ख, अपन काज बन्न करू!
वैद्य: आह! पित्त सेहो। वायु, पित्त वा कफ, सभ ठीक करब।
छोटका प्रेमी: प्रयत्न करू, श्रीमान्। अहाँ हमरा कृतघ्न नै पाएब।
वैद्य: हम एकटा बिख-झारनहारकेँ आनब जे बड़ सुन्दर गोली रखैत अछि। (प्रस्थान।)
(मृत्युक दूतक प्रवेश।)
दूत:
वाह, यम हमरा छाउर नै बना देलनि! "ई वसन्तसेना नै!" ओ गरजला। "तुरन्त ओकरा आपस आनू! दोसर वसन्तसेना, जकर जिनगी खत्म भेल अछि, आनू, आ जल्दी!" ठीक अछि, जाधरि शरीर जरल नै हो, हम ओकरा पुनर्जीवित करब। (चारू दिस देखैत) ओ तँ पहिनहिये उठि कऽ घूमि रहल छथि! उठि कऽ घुमि रहल छथि, मुदा ओकर जिनगी हमर हाथमे छल, एहन चमत्कार केना? (सभ दिस देखैत) ओह! ई कियो आन नै, महान योगी अपन खेल खेला रहल अछि। हम वेश्याक आत्माकेँ साधुक शरीरमे राखब, आ तखन वेश्याक जिनगी सही ठाम प्रवेश कराएब। (तहिना करैए।)
देखू! स्त्रीक जीवनशक्ति
ऐ पुण्यात्माक शरीरमे प्रवेश
ऐ साधुकेँ खराप कऽ देत
चरित्र, नैतिकता आ यशमे।
साधु: (उठैत) छोटकी कोइरी!
शाण्डिल्य: ओह, ओह, ओह! श्रेष्ठ फेर जी उठला! हम सदिखन सोचलौं ई बदमाश कखनो नै मरत।
साधु: छोटका प्रेमी, तोँ कतऽ छह, कतऽ छह?
छोटका प्रेमी: छोटका प्रेमी, हमर आलिंगन करू!
शाण्डिल्य: जाउ ओइ गुलाबक झोँझक आलिंगन करू!
साधु: हे हमर छोटका प्रेमी, हम कतेक मूर्ख! हम मातल छी!
शाण्डिल्य: नै, अहाँ सोझे बताह छी!
छोटका प्रेमी: अहाँक पवित्रता, अहाँक वाणी अहाँक पद लेल अनुचित अछि।
साधु: चलू एक बेर आर पीबी।
शाण्डिल्य: जाउ, माहुर खाउ। ठीक अछि, हम बुझि लेलौं जे प्रहसन की होइ छै। ने साधु, नहिये वेश्या, ओकरा साधु-वेश्या कहि सकै छी। ठीक छै।
साधु: छोटकी कोइरी, छोटकी कोइरी, हमर आलिंगन करू!
परिचारिका: दूर भागू!
माय: बेटी वसन्तसेना!
साधु: हम एतऽ छी, माय। नमस्कार, माय!
माय: मुदा श्रीमान्, की भऽ रहल अछि?
साधु: माय, अहाँ हमरा ठोकरा रहल छी! छोटका प्रेमी, अहाँ आइ बड्ड सुस्त छी।
छोटका प्रेमी: श्रीमान्, हम नपुंसक!
शाण्डिल्य: ठीक अछि, ठीक अछि!
(वैद्यक प्रवेश।)
वैद्य: हमरा आठटा गोली आ किछु जड़ी-बूटी भेटल। ई ठीक-ठीक जनै छी, ई या तँ तुरत्ते जीवन देत वा तुरत्ते मृत्यु। कियो पानि आनू, पानि! (परिचारिका लग जाइत।)
परिचारिका: ई लिअ पानि।
वैद्य: हम गोली पीस रहल छी। ओह, एकरा काटल नै गेल छै; ई वशमे अछि।
वेश्या: मूर्ख, तोँ बड़ देरी सँ बूढ़ भेलह। अहाँके ईहो नै बूझल अछि जे के मरि रहल अछि। स्वीकार करू, हमरा साँप नै काटलक।
वैद्य: तखन एतेक हल्ला किए?
वेश्या: अहाँ लग पाठ्यपुस्तक अछि ने?
वैद्य: अछि, कम सँ कम पाँच सय।
वेश्या: तखन ओ सभ सुनाउ!
वैद्य: मालकिन, सुनू। "वायु, पित्त आ कफ- कफ-" ओह ओह! एकटा पुस्तक, एकटा पुस्तक!
शाण्डिल्य: आह, एकटा ठेठ वैद्य। ओ पहिनहिये बिसरि गेला। ठीक अछि, सहयोगी, एतऽ अछि पुस्तक।
वैद्य: मालकिन, सुनू। "वायुजन्य, पित्तजन्य आ कफजन्य रोग, तीनू निकलैए माहुरसँ, चारिम अज्ञात अछि।"
वेश्या: खराप भाषा। कहबाक चाही "तीनू उत्पन्न होइत अछि।" सदिखन कर्ता पहिले राखू।
वैद्य: ओह, हम एकटा व्याकरणज्ञसँ काटल गेलौं!
वेश्या: साँप दंशक कए टा लक्षण होइ छै?
वैद्य: सए।
वेश्या: नै, सात होइत अछि, जेना: "रोइयाँ ठाढ़ हएब, मुँह सुखाएब, थरथरी, पीअर पड़ब, हिचकी, तीव्र श्वास आ बेहोशी- ई साँप दंशक सात लक्षण अछि।" जे व्यक्ति ऐ लक्षणसँ परे चलि गेल हो ओकरा अश्विन सेहो ठीक नै कऽ सकत। जँ कोनो जवाब देबाक हो, बाजू।
वैद्य: हम बिसरि गेल छी। शुभ विदा, मालकिन, हम जा रहल छी।
(मृत्युक दूतक प्रवेश।)
दूत:
हँ, हम फेर आयल छी।
देखू कोना मनुष्य सभ दौगैत अछि
हमरा भेँट करय लेल - गर्भपात,
फोका, बुखार, कान दर्द,
पेट, हृदय, नेत्र रोग
बेमारी आ साधारण माथ दर्द,
आ आन मिश्रित रोग:
देखू ई प्रसन्न मनुक्ख सभ कोना दौगै जाइए!
आब हमर स्वामीक आदेश। (वेश्या लग जाइत।) श्रीमान्, ओ शरीर उतारू।
वेश्या: खुशीसँ।
दूत: से हम आत्माक अदलाबदली कऽ सकै छी आ जे पहिने करबाक छल से करै छी। (एना करैत प्रस्थान करैए।)
साधु: शाण्डिल्य, शाण्डिल्य!
शाण्डिल्य: हे, श्रेष्ठ बारम्बार जीबि उठै छथि।
वेश्या: छोटकी कोइरी! छोटकी कोइरी!
परिचारिका: आब ओ ठीकसँ बाजि रहल छथि।
माय: बेटी वसन्तसेना!
छोटका प्रेमी: आह, ओ होशमे आबि गेल छथि! मधुर वसन्तसेना, ऐ दिस!
(वेश्या, छोटका प्रेमी, परिचारिका, अनुचर आ मायक प्रस्थान।)
शाण्डिल्य: श्रीमान्, की भेल?
साधु: ई नम्हर खिस्सा अछि, घर जा कऽ कहब। (अकास दिस देखैत) दिन गेल।
सूर्ज अकासक कोर सँ बिला भेल,
सोनाक ढेर चोरक नजरिसँ बिला गेल,
ओकर आभा चलैत मेघकेँ लाल करैए,
अकास अग्निक गर्भसँ अछि गर्भवती।
(दुनूक प्रस्थान।)
सभ चलैबला प्राणी सुखी रहए,
आ हम एक-दोसरक भाग्यसँ प्रेम करी।
सभ पापक विनाश हुअए।
आ जगतमे सभठाम सुख रहए।
समाप्त
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