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VIDEHA ISSN 2229-547X  ·  First Maithili Fortnightly eJournal  ·  Since 2000  ·  www.videha.co.in
विदेह — प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका
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विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका
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गजेन्द्र ठाकुर

चारिटा मूल संस्कृत एकनट नाटक (भाण) १.श्री शूद्रक केर मूल संस्कृत- पद्मप्राभृतकम् [कमलक भेंट]; २.ईश्वरदत्तक मूल संस्कृत- धूर्तविटसंवादः [धूर्त आ दलालक विचार-विमर्श]; ३.वररुचिक मूल - उभयाभिसारिका [परस्पर प्रेम-पलायन] आ ४.महाकवि श्यामिलक केर मूल संस्कृत- पादताडितकम् [लात]

(संस्कृतसँ मैथिली अनुवाद- गजेन्द्र ठाकुर द्वारा)

[भरत प्रहसन आ भाणकेँ उचिते एक प्रवृत्तिक मानैत छथि। भाण भेल एकालाप, माने एक्केटा पात्र द्वारा अभिनय।]

कमलक भेंट

श्री शूद्रक केर मूल संस्कृत एकनट नाटक (भाण)- पद्मप्राभृतकम् (संस्कृतसँ मैथिली अनुवाद- गजेन्द्र ठाकुर द्वारा)

[नान्दी पश्चात् सूत्रधारक प्रवेश]

सूत्रधार:

ओहि भगवान् रुद्रक जय हो, जे क्रोध अथवा कृपासँ स्त्री-विलासक मूर्ति कामदेवकेँ आओर अधिक उज्ज्वल देहबला बना देलनि।

आओर—

कुरबकक फूल उज्जर भऽ गेल अछि। कोयल कूजि रहल अछि। सुन्दर अशोकक फूलक संग कोँपल डोलि रहल अछि। भँवराक गुंजार आ आमक गन्हसँ महमह करैत हवा बहि रहल अछि। आइ धनुष धारण कएने कामदेव वनमेँ विचरण कऽ रहल छथि।

आओर की— चिड़ैक चहचहाहटकेँ वाद्य बना प्रेमरससँ मातल कोयलीसभ गीत गा रहल अछि। वनक अन्तःपुरक कामिनीरूपी लता आचार्य वायुक उपदेशपर अभिनय कऽ रहल अछि। गाछसभ अपन फूलक उल्लासमेँ पल्लवरूपी अँगुरीसँ ओहि लताकेँ फुसला रहल अछि। श्रीमान् वसन्तक अबितहि हार-जकाँ उज्जर तुषार क्षणेमेँ बिलाए गेल।

जड़िसँ, बीचसँ, शिखरसँ, अंकुरसँ—चारू कातसँ अशोकक फूल दुष्टक हृदयमेँ भेद जकाँ फूटि-फूटि निकलि रहल अछि।

अहा! ई—

मत्त कोयलक कूजनसँ भरल, सिन्धुवार, कुन्द आ सहकारसँ सुशोभित, उद्धत कामदेव आ वायुसँ परिपूर्ण, युवजनक प्रिय ऋतु अछि।

[विटक प्रवेश]

वाह! कतेक अद्भुत! शिशिररूपी बुढ़ापासँ जर्जर संवत्सररूपी विटक सुन्दर वसन्ती जवानी हिमरूपी रसायन खा कऽ फेर लग आबि रहल अछि। एहि समय तँ—

हिलैत कोँपलसँ नाचैत गाछ आ फुलायल लतासँ लपटायल वन यौवन प्राप्त कऽ रहल अछि। तिलक गाछपर बैसल कोयल जूड़ा जकाँ लगैत अछि, आ कुन्दक फूलपर बैसल भँवरा कामिनीक कटाक्षक काज कऽ रहल अछि। कतहु नव-उभरल छोट स्तनबाली कन्या जकाँ कमलिनी साँवली कलिसँ शोभित अछि। कतहु वसन्तक वायुसमूह रतिक्लान्तिक पसेनासँ भीजल स्त्रीक पीन स्तनक स्पर्श करबाक धूर्तता करैत बहि रहल अछि।

कामबाणक मारिसँ सन्ताप देबामेँ कठोर ई वसन्तकाल निश्चये बलवान अछि; कारण, देवदत्ताक संग सुरत द्वारा अपन यौवनोत्सव भलीभाँति मना चुकलाक बादो कर्णीपुत्रक कामरूपी भँवरा देवसेनारूपी ओहि आमक डारि लेल भूखल छटपटा रहल अछि, जे बाल्यावस्था छोड़ि यौवनागमसँ कोमल भऽ गेल अछि आ काममञ्जरी जकाँ फुला रहल अछि। अथवा कर्णीपुत्रक भूखल रहबामेँ आश्चर्य की? घी-चिनीसँ बनल तरमाल अचार-चटनी अर्थात् सोपदंशक संग आओर स्वादिष्ट लगैत अछि। हमरा बुझाइत अछि, तेँ देवदत्ताक संग सुरतरूपी मधुपानसँ तृप्त भऽ चुकलोपर ओ बालसुन्दरी षोडशी चण्डालिका देवसेनाक संग आओर आनन्ददायक सुरतक ओहन गजक चखए चाहैत अछि, जाहिमेँ बालपनक भोली-भाली आवभगत, चुहलबाजी आ छेड़छाड़ भरल हो।

अहो! कामरोग छोट देखाइत होइतो बड्ड भारी होइत अछि; ई अनेक शास्त्रक अचूक ज्ञाता, समस्त कला आ विद्याविदग्ध, युवतीक कामरूपी ताना बुननिहार सूत्रधार कर्णीपुत्रकेँ सेहो एहि दशामेँ पहुँचा देलक।

अनिद्रासँ ओकर आँखि कनेक बेसी अलसायल आ लाल अछि। ओकर मुख भोरक चन्द्रमा जकाँ पीयर पड़ल अछि। चिन्तासँ देह दुबर भऽ गेल अछि। ओ जँभाइ लऽ रहल अछि। ओकर समस्त इन्द्रिय जरि रहल अछि। चन्द्रमा, वसन्त, मालाग्रथन, संगीत, सुगन्धि आदि जे सुन्दर वस्तु सोझाँ रहितो पहिने ओकरा आनन्द दैत छल, से सभ एखन ओकरा सन्ताप दऽ रहल अछि।

अथवा देवसेनाक कारणेँ ई सभ भेल हो, तँ एहिमेँ आश्चर्य नहि; कारण ओ नवयौवना मनचाहा कामभाव उत्पन्न करएबाली अछि। ओकर पूर्ण यौवनसँ उपजल लावण्य कर्णीपुत्रकेँ उन्मत्त बना रहल अछि, ई उचिते अछि।

ओकर चञ्चल कटाक्ष, अशर्फी झरबैत अखण्ड अधर, गाल आगाँ कएने मुख, छातीपर नव उठल स्तनाङ्कुर, कोमल बाहुलता, पेटपर कनेक-कनेक झलकैत रोमावली, नजानि कतयसँ आबि भरि उठल नितम्ब आ उन्मुक्त स्वभावबला चतुर प्रेमभाव—ई सभ ककरा उन्मत्त नहि बना देत?

[घुमैत] देवसेनासँ उपजल कामरोगक छटपटाहटमेँ ओ एखन हार, पङ्खा आ चन्दनक सहायतासँ देहक ताप घटबैत, ओकरासँ भेटक आशापर प्राण धारण कएने, खाट पकड़ि कोनो तरहें जी रहल अछि। आइ भोरहि देवदत्ताक पुष्पाञ्जलिक नामक सेवक नम्रतापूर्वक कर्णीपुत्र लग जा कऽ कहलक—‘आर्यपुत्र, आर्या देवदत्ता कहैत छथि—काल्हि हमर नहि आबि सकलासँ आर्यपुत्र हमरा प्रति अपन आदरभावमेँ उपेक्षा नहि आनथि। हमर छोट बहिन चण्डालिका कनेक अस्वस्थ अछि; ओकरा प्रति स्नेहवश हम रुकि गेलहुँ। एखन तुरन्त आबि रहल छी।’ तखन ओकर कथनक उत्तर दऽ पुष्पाञ्जलिककेँ विदा कएला बाद कर्णीपुत्र स्नेहपूर्वक हमरा कहलक—‘सखे शश, तोँ सेहो सुनलह जे ओ एतय आबि रहल छथि। ई उचित अवसर अछि। ओतय पहुँचि कुशल-क्षेम पूछबाक बहाना सँ पूर्ण विश्वास जगाकऽ देवसेनाक मन टटोलि ओकर दुखक कारण बुझि लह। ई हमर प्रणाम। देवसेना चलाओल आ हमर हृदयक अन्त धरि पैसल ई कामबाण भाग्यवान अहाँ मात्र कोनो उपायसँ निकालि सकैत छी।’ एहिपर हम हँसैत विदाक समय ओकरा कहलहुँ—‘ठीक अछि, धूर्ताचार्य! की तोँ दिनमेँ दीप जरबैत छह? अहाँ दुनूक आँखि-मिलान हम नहि बुझैत छी, जे चुपचाप अहाँक मनोभाव प्रकट करैत अछि? आ हम मूलदेवक सखा वएह शश छी; ओकर पूरा समाचार लेने बिना नहि घुरब।’ ई कहि हम चलि पड़लहुँ। फेर राजपथपर मित्रसभसँ गप्प करैत समय बिताबी आ चण्डालिका लग तखन पहुँचि जाबी जखन ओ देवदत्तासँ अलग हो, एहिमेँ हानि की?

अहा! वसुन्धरारूपी वधूटिक अजम्बूद्वीपरूपी मुखक कपोलपर पत्रलेखा जकाँ उज्जयिनीक अनुपम शोभा अछि; ई नगर नाना प्रकारक भाण्डसँ भरल-पूरल अछि।

एतय वेदक पवित्र अभ्यास; हाथी, रथ आ घोड़ाक निनाद; धनुषक प्रत्यञ्चाक टंकार; नाटक, काव्य आ विद्वानक शास्त्रार्थ; दोकानमेँ आनल चारू समुद्रक मालक लेन-देन; गीत, वाद्य, जुआ आ हँसी-ठट्ठा; कतहु विटक गप्प, कतहु समस्त कला—सभ किछु अछि। घरक पाँति पोसल चिड़ैक चहचहाहटसँ मुखर आ असंख्य कङ्कण-करधनीक झनझनाहटसँ भरल अछि। [घुमैत] एखन हम अपन मनोरथ सिद्ध होयबाक कोनो शकुन देखी।

[देखि] अहा, ई काव्यव्यसनी, कात्यायनगोत्रीय शारद्वतीपुत्र सारस्वतभद्र अपन घरक दुआरिपर खड़ियाक रङ्गमेँ अँगुरी सानने, सोचल बात स्मरण भऽ अयबाक आनन्द आँखि-भौँह नचाकऽ जनबैत, चकडोरक खेल खेलि रहल अछि। एहने समय बहैत प्रतिभाक स्रोत तोड़निहार प्रिय मित्रपर सेहो कविगण बिगड़ि उठैत छथि। मुदा सरस्वतीरूपी लतासँ उपजल वचनरूपी फूलकेँ कर्णपूर बनौने बिना आगाँ बढ़ि जाऊँ तँ घाटेमेँ रहब। पहिने एकरासँ भेंट कऽ ली। [लग जा कऽ]

मित्र कात्यायन, बिना चाराक जुगाली कऽ रहल छह की? की कहैत छह—‘काव्यक पिशाच माथपर चढ़ि हमरा हाँकि रहल अछि’? अरे पुरान काव्यपदक टुकड़ा गाँठनिहार मोची, छिन्न-भिन्न भऽ गेल गाइक खोज करनिहार जकाँ नव पद खोजि रहल छह की? मित्र, कोन विषयपर श्लोक रचलह? की कहैत छह—‘सोझाँ देखाइत एहि छबीला वसन्तपर श्लोक रचलहुँ’? हम सुनि सकैत छी? की कहैत छह—‘भीतपर लिखल अछि, पढ़ि लिअ’? कतय अछि? अरे, ई रहल— मधुर पवन, कठोर आ प्रचण्ड कामदेवसँ युक्त ई वसन्तकाल नव, विवश आ छरहरि बालाकेँ कामुकक लग पहुँचेबाक जे काज कऽ सकैत अछि, से खुशामदमेँ चतुर हजारो दूती नहि कऽ सकत।

शाबास! ई शकुन कार्यसिद्धिक अछि। मित्र, पुत्रलाभ जकाँ तोहर ई श्लोक यशदायक हो। तोँ काव्यालोचनाक शिकार नहि हो। अरे, के हँसल? [देखि] अरे, ई तँ पीठमर्द दर्दरक अछि। दर्दरक, एहिमेँ हँसबाक की बात? की कहैत छह—‘निश्चये अहाँ बृहस्पतितुल्य कविजीक वचनसँ पूजा कऽ मानो समुद्रपर पानि छिड़कि रहल छी’? एना नहि कह, मूर्ख! वसन्तमासक पूजामेँ फूलक भेंट नहि चढ़ाओल जाइत अछि की? आ की तोँ पहिने नहि सुनने छह—दीपसँ सूर्यक पूजा होइत अछि, पानिसँ समुद्रक पूजा होइत अछि, आ वसन्तक पूजा फूलसँ होइत अछि। हमहुँ वचनसँ महाकविक पूजा कऽ रहल छी। ठीक, तोँ पीठमर्दक स्वभाव देखौलह। बस, तोहरासँ भेंट भऽ गेल। आओर—ई वसन्तकाल कोयलक मदमत्त कूजनसँ सुहावन अछि; तोँ सेहो एहने हो। हम चली। [घुमैत आ देखैत]

अरे, ई दोसर विपुलामात्य आबि रहल अछि। कामदत्तारूपी प्राकृतकाव्यक सँभालमेँ चतुर छल, मुदा एखन वेशिकवृत्तिक मामिलामेँ मुँहक खा कऽ, मुँह लटकौने चलि रहल अछि। बुझलहुँ—मूलदेव देवदत्ताक प्रेममेँ फँसि गेलाह, तेँ विपुलाक अपमानकेँ अपन अपमान मानि ई भलमानुष मानक गर्वसँ फुलायल अछि। होअए—हँसीक डुबकी लगा एकर गहिराइ नापब। [इशारा कऽ] ‘अरे, मित्ररूपी कुमुदकेँ खिलौने बिना दिनक चन्द्रमा जकाँ हमरा सभकेँ छोड़ि कतय जा रहल छह?’ तोहरासँ किछु पूछबाक अछि—‘कला-विज्ञानसँ भरल, सदिखन गर्वमेँ मत्त तोहर विपुल बुद्धि निश्चये अत्यन्त धीर छल, जे खिन्न नहि भेल।’ [दोसर अर्थ] अहाँ जनैत छी की, कलाक प्रयोगज्ञानसँ युक्त, गर्वित स्वभावबाली ओ विपुला अन्त धरि धीर नहि रहि सकल, तेँ खेदग्रस्त भऽ गेल?

की कहैत छह—‘अहाँक व्यङ्ग्यक अर्थ हम बुझि गेलहुँ। गुरु मूलदेवक चतुराई प्रसिद्ध नहि अछि की?’ नहि, बात एहन नहि। देवदत्ताक संग हृदय लगल रहितो हुनकर मन विपुलामेँ अटकल अछि। की कहैत छह—‘ई सेहो मूलदेवक धूर्तते अछि’? ठीक, अहाँ अपन सीधी-सादी शिष्या विपुलाकेँ उलाहना—

—किएक नहि दैत छी, जकर प्रेमजनित रूसलापन दूर करबाक लेल कर्णीपुत्र आयल छल?

बरखामेँ गदला गेल नदीकेँ निर्मल करबाक लेल शरद्काल जकाँ ओ आयल छल; मुदा जाड़मेँ ताड़क पङ्खा जकाँ अपमानपूर्वक फेकि देल गेल।

की कहैत छह—‘कतय, कोना?’ मित्र, सुन। किछु दिन पहिने कर्णीपुत्र हमरा संग विपुलाकेँ मनएबाक लेल गेल। ओकर ड्योढ़ीपर ठाढ़ भऽ क्रोधक गहिराइ बुझबाक लेल ओ पहिने हमरा स्नेहपूर्वक भीतर पठौलक। हम मधुर वचन बजैत ओकरा लग गेलहुँ। डाहसँ जरैत ओ सलोनी हमरा देखितहि ‘एतेक परिश्रम किएक?’ कहि मुँह घुमा लेलक। तखन हम हँसैत कहलहुँ—तोरा के की कहलक? ई उत्तर कोन बातक अछि? हे वनिते, कनेक हमर दिश घुमि अपन चन्द्रमुखसँ फेर कह। तोरा प्रसन्न देखि हमर प्रीति असीम भऽ जाइत अछि। नागिन जकाँ रोषसँ भरल तोहर ई भृकुटि हमरा डरा रहल अछि। तकर बाद ओकर सखी अवन्तिसुन्दरी कहलक—भृकुटि टेढ़ कऽ, क्रोधसँ मुख लाल कऽ, निःश्वाससँ अधर झरका कऽ, मित्रक आगमनपरो किएक नहि बजैत छह? गर्वसँ फुलायल तोँ अपन सौभाग्यसँ वैर कऽ रहल छह। हे मानिनि, मान छोड़; सभ वस्तु बेसी तानलासँ शीघ्र टूटि जाइत अछि।

‘मन-मिलानक बैठक सदिखन नीक होइत अछि’—ई मानि कर्णीपुत्र सेहो ओतय पहुँचि गेल। ओकरा नमल देखि विपुला रोषपूर्वक झटकि कऽ कहलक—तोँ ओतयसँ छुट्टी पाबि आयल छह, वा निश्चये ओ तोरा निकालि बाहर कऽ देलक? चुहलभरल गप्पसँ मन बहलेबाक लेल तोँ हमरा अपन थाकनि मेटएबाक विश्रामगृह बुझने छह? बुझायल अभिलाषाबला हमर मोनकेँ जरा कऽ की लाभ? कड़ुआ औषधि पीबिसँ की फल? जेना भलमानुष बनि आयल छह, ओहिना घुरि जा।

की कहैत छह—‘जँ एहन बात अछि, तँ पहिने ओहि उजड्डीक लग जा कऽ डाँट-डपट करैत छी’? जा, ओकरासँ मनमाना गप्प कर। एखन हम चली। [घुमैत]

हा धिक्! हमर बाटक दोसर देहधारी विघ्न आबि गेल। दन्दशूकक पुत्र पाणिनीय वैयाकरण दत्तकलशि ठीक सोझाँ उपस्थित अछि। एखन एकर वाग्जालसँ सकुशल बचि निकलनाइ अछि। एकरा घबरायल देखैत छी। निश्चये कतहु वाद-विवादमेँ रगड़ायल अछि। वैसे सेहो, कलहक खुजलीसँ भरल एकर वाणी कनेक छुबितहि मन्दिरक घण्टा जकाँ टनटना उठैत अछि। ई भलमानुष गणिकाप्रिय अछि आ अपन प्रियतमा केँ नूपुरसेनाक पुत्री रशनावती कहैत अछि। हा! ऊँटक गरदनमेँ लटकल वीणा जकाँ ओहि बेचारी रशनावती लेल खेद अछि। ई हाथ उठा हमरा दिशेँ किछु कहि रहल अछि।

की कहलह—‘सखे, सुखसँ सुतलह?’ एखन एकरासँ बचबाक कोन उपाय? नीक, एकर स्वागत करी। अक्षरसभसँ भरल कोठारक स्वागत! मित्र दत्तकलशि, तोरा घबरायल देखैत छी; कुशल तँ छह? की कहलह—‘मरल मांस खाएबला डोम-कौआ जकाँ कातन्त्र वैयाकरणसभ हमरा ऊपर टूटि पड़ल अछि’? हाय! कौआ-उल्लूमेँ युद्ध मचि गेल। मित्र, बधाइ जे तोरा बिना नोचायल देखि रहल छी। की कहैत छह—‘एहि दुष्ट कातन्त्र वैयाकरणसभकेँ हम बुझैत की छी?’ अहाँ जेना छी, ओहिना रहू; हम चली।

की कहैत छह—‘कतय चललह? सञ्चिचीषु! एखन ठहर; एहन दौड़-धूप किएक?’ हाय, हमरा क्षमा कर। एहि प्रकार लाठीक मार जकाँ कठोर वाक्यबाणसँ हमरा नहि कूट। भरल सभामेँ मनुखक चलित भाषा बाज। ऊँटक बलबलाहट जकाँ अशोभन, कानमेँ विष जकाँ टपकएबाली वैयाकरणक ई किटकिटाहटसँ हमरा बचा। की कहैत छह—‘अनेक बकबकी तार्किकक बेलभिड़न्तसँ उपजल आ अनेक धातुसँ ढारल शतघ्नी जकाँ गड़गड़ाएबाली शैली छोड़ि हम एकरा स्त्रीक सुकुमार देह जकाँ कोना बनाबी?’ अहो, तखन तँ तोँ अनाथ छह।

गप्प-सप्पमेँ, स्त्री आ मित्रक खातिरमेँ, अदालती अर्जीदावामेँ आ कहावतमेँ दाँततोड़ शब्द आ अक्षरक की मेल—जेना फूलक सेहरा आ काँटक मेल?

की कहलह—‘निश्चये ओ कुलटा अछि, जे हमर एहन मधुर वाणीसँ सेहो रूसि गेल।’ ई कुलटा के भेल? की कहैत छह—‘ओकरा प्रिया कोना कहल जाय?’ [सोचि] हँ, बुझि गेलहुँ। रशनावती एहने योग्य अछि; कारण आमक वनमेँ विचरण करएबाली कोयल स्वभावे काँटेदार बेलक गाछपर बैसि गेल—एहिसँ पैघ दुःख दोसर नहि। हाय, एहि दुखमेँ सेहो बड्ड आनन्द अछि। तखन ओकर आनन्द लिअ। मित्र दत्तकलशि, तोहर-जकाँ मधुरभाषी भलमानुषसँ ओ स्त्री कोना विमुख भऽ गेल? ई सुनबाक हमरा बड्ड इच्छा अछि। सभ बात खोलि कह। की कहलह—‘निश्चये ओ कुलटा अछि। काल्हि साँझक समय वेश्यापुरीक अलिन्दमेँ मदमत्त भऽ, हम जखन हवन कऽ रहल छलहुँ, तखन मानो हमरा अँकवारैत ओ लग आबि बैसि गेल।’

एहिपर हम ओकरा कहलहुँ—‘अरी दोगली, होम करैत हमरा नहि छू।’ हाय, एकरे बिगड़ल भेंट कहल जाइत अछि! कामिनीकेँ अपन बनएनाइ सेहो नाजुक काज अछि। ई छूआछूत किचकिचक जड़ि अछि। अरे नादान, प्रेम करएबाली कामिनीकेँ दुत्कारि तोँ नीक नहि कएलह। कठोर शब्दसँ निर्दय बनल आ व्याकरणक चिनगारीसँ भरल अपन वचनसँ तोँ स्त्रीसभकेँ सेहो चिहुँका दैत छह। की तोँ पहिने ई नहि सुनने छह—

जे एकान्तमेँ कामभावसँ भरल, सुकुमारचित्त, सहज मधुर वचनसँ दुलार करबाक योग्य अनुरक्त स्त्रीकेँ कान फोड़एबाली वाणीरूपी लुअठिसँ छूबैत अछि, ओ मानो जरैत काठसँ वीणा बजबैत अछि।

निश्चये रशनावती टेढ़ काज साधनिहारि अछि, जे एहि-जकाँ ठूँठसँ प्रीति करैत अछि। अथवा ई ओकर लेल पूरा अभिशाप अछि। मित्र दत्तकलशि, तोँ कानमेँ जे अमृत टपकौलह, से सुनि लेलहुँ। तोहर कल्याण हो; हम जाइत छी।

[घुमैत]

मनुखक ई दोसर जमघट उपस्थित अछि। ई धमोसनिकक पुत्र पवित्रक नामक गुप्त व्यभिचारी—पवित्रताहीन होइतो वैष्णव कहबैत—राजपथपर अपरिचित लोकक मानो छूत बचबैत, भीजल वस्त्र समेटि समूचा देह सिकोड़ने, अँगुरीसँ दुनू नाकक छेद दबौने, चौबटियापर शिवलिङ्गक सहारा लऽ ठाढ़ अछि। निश्चये ई बेचारा हास्यक पात्र अछि; कारण सुनल जाइत अछि जे मत्तकाशिनीक पुत्री वारुणिका नामक टकहिया अर्थात् बन्धकी वेश्यापर आसक्त अछि। एहि समय ई एतेक घबरायल किएक अछि? चलू, एकर आवारागर्दीक पोथीक पेटी खोली।

अरे पवित्रक, धूप सेकैत कछुआ जकाँ गरदनि बाहर-भीतर करैत किएक ठाढ़ छह? की कहलह—‘राजपथपर आबए-जाएबला अपरिचित लोकक स्वाभाविक छूत बचा रहल छी’? ओहो! अपरिचितक छूतसँ दूर भागैत छह, मुदा वारुणीक जघनस्थलक पात्र की गड़हाक घाट जकाँ बड्ड पवित्र अछि? की कहैत छह—‘एहन बात नहि अछि’? ग्वालक घरमेँ घोर बेचैत छह की? बादुरकेँ उलटि लटकबाक शिक्षा दैत छह की? बदमाशक संगो बदमाशी देखबैत छह।

की कहैत छह—‘क्षमा करू बाबा, अहाँक गुप्तचर-दृष्टि बड्ड चौकस अछि’? केकर गुप्तचर? कतयक गुप्तचर? सूर्य दीप लऽ अन्हारमेँ नहि पैसैत अछि। हमरा जासूसक आवश्यकता नहि; एहन बातमेँ हम सहस्रनेत्र छी। तेँ बदमाशीक बाना उतारि फेक। केवल मुखाकृतिसँ भलमानुष, तोँ ढोंगसँ नम्र बनल छह। अरे सज्जनक सहपाठी आ विटक सेवक, छुआछूतक भूत आ वेश्याप्रसङ्ग दुनू परस्पर विरुद्ध अछि—जेना विरुद्ध आहार। आओर, छुआछूतक ढोंगमेँ बान्हल रहि ओकरासँ जुटैत छह, मानो सँड़सीसँ नेवारी चुनैत हो। की कहैत छह—‘एखन हम ई रपकपना छोड़ि देलहुँ’? खीर खा कऽ उपवास करबाक बातपर के विश्वास करत? की कहैत छह—‘जँ अहाँ हमरा ऊपर एतेक कृपालु छी—

—तँ हमरा अपन शिष्य बना लिअ’? बधाइ, तोँ सत्पथपर आबि गेलह। जँ विट बनबाक निश्चय कएने छह, तँ वेश्याक प्रणय लेल कीलदार लाठी जकाँ घातक मिथ्या आचारक बाना शीघ्र उतारि फेक आ गुण्डईक हुंकार भर। की कहलह—‘हम अहाँक आज्ञाकारी छी’? तखन तोरा मनमाना खुलि खेलबाक पुरस्कार दैत छी। एखन हमर ई आशीर्वाद लह—

छिड़िआयल आ छुटल पात्रबाली, ढील करधनीबाली, खुजल नीवीबाली, घबरायल, हाथपर हाथ चढ़ा स्तन, त्रिवली आ नाभिप्रदेश नुका लजाइत बैसल, ‘नहि, नहि, हमरा छोड़’ कहि चिचियाइत स्त्रीकेँ शय्यापर लऽ जा सुरत-सम्मिलनक पहिल फसल काट।

की कहैत छह—‘अहाँ उपकारक ढेरी लगा देलहुँ; हम भला-चङ्गा भऽ गेलहुँ’? जँ एहन अछि तँ एखन हमरा आचार्य-दक्षिणा भेटबाक चाही। की कहलह—‘प्रणाम उपस्थित अछि’? अरे, एतेक भारी फजूलखर्ची! नीक, आइ सँ हम शिष्यबला—

—तँ भऽ गेलहुँ; मुदा तोँ पूरा गुरु छह, शिष्य नहि। अकड़ि कऽ मनमाना मौज कर। हम चललहुँ। वसन्तक दुपहरियामेँ घूमनिहार लोकक पसेनाक स्पर्शसँ शीतल, मालाक दोकान आ घरक बीच रुकि-रुकि बहैत बाजारक हवा मानो प्रतिहारी जकाँ आगाँ बढ़ि हमरा भेटि रहल अछि। [फूल-बाजार देखि] नाना प्रकारक फूलक ढेरीसँ अङ्ग-प्रत्यङ्ग सजौने ई पुष्पवीथि वसन्तवधू जकाँ देखाइत अछि। ई—

फुलायल कमलरूपी सुन्दर मुखबाली, उज्जर फूलक कलि जकाँ दाँतबाली, नव नीलकमलरूपी आँखिबाली, रक्ताशोकक गुच्छा जकाँ फरकैत ओठबाली, भँवराक गुंजाररूपी मधुर वाणीबाली, सुन्दर पुष्पगुच्छ जकाँ स्तनबाली, फूलक सेहरारूपी आभूषणसँ सुशोभित, गूँथल उज्जर फूलक वस्त्र पहिरने, उज्जर मालारूपी मेखलासँ युक्त—फूलसँ सजल ई पुष्पदोकान वसन्तक गृहिणी जकाँ, पुष्पाभूषित स्त्रीक शोभा देखबैत अछि। आह! असंख्य पुष्पसमूहक गन्हमेँ हमर हृदय फँसि गेल; तेँ एहि पुष्पवीथिकेँ छोड़ि जाएब हमरा बड्ड कठिन भऽ रहल अछि। [घूमि] ई दोसर हँसीक बाजार उपस्थित भेल। मृदङ्गवासुलक नामक पुरान नाटकक ई विट—जकरा वेश्यालोकनि ‘भावजरद्गव’ नाम देने छथि—सुरीला गायक आर्य नागदत्तक घरसँ बाहर आबि रहल अछि। खिजाब, स्नान आ अनुलेपनक चटक-मटकसँ ई अपन बुढ़ापा मानो छँगोटसँ झाँपने अछि। ई भलमानुष सभक मित्र अछि; एकरासँ बिना बजने जाएब सम्भव नहि। कनेक हँसी-ठट्ठा करी। [इशारा कऽ]

अरे भावजरद्गव, एहि बुढ़ौतीमेँ सेहो तोरा सुकाल अछि की? की कहलह—‘अहाँ सुधि नहि लेलहुँ, तेँ बूढ़ साँप जकाँ केंचुल छोड़ि रहल छी’? बुझाइत अछि तोँ प्राणो छोड़ि कायाकल्प कऽ रहल छह; तेँ फेर जवान भऽ गेलह। बनाव-चुनावसँ जवानी साधबामेँ तोँ सिद्ध छह। तोहर—

—माथ खिजाबसँ उपजल नकली जवानीक सूचक केसक ओलतिसँ झाँपल अछि—अर्थात् बीचमेँ टकला—आ मुख मूँछक पाकल रोमकेँ चिमटीसँ उखाड़ि सफाचट दाढ़ीबला अछि। प्रयत्नपूर्वक कएल मरम्मतक बलपर जेना पुरान जर्जर घर ठाढ़ रहैत अछि, ओहिना अङ्गक लीपापोतीसँ सँवारल तोहर जवानी अछि।

की कहैत छह—‘पुरान मदिरा बेसी नशीली होइत अछि’? जँ तोहर ई इच्छा अछि तँ त्रिफला, गोखरू आ लोहाक चूर्णसँ बनल खिजाब द्वारा तोहर सभ प्रकारक वृद्धि हो। हम चली। [घुमैत]

अरे, हमरा सहसा आबि गेलापर केओ एखन जुआघरक ड्योढ़ीक खम्भाक पाछाँ अपनाकेँ नुका ठाढ़ भऽ गेल। [देखि] ठीक, चिन्हि लेलहुँ—ई शेषिलक अछि। हमरा सँ नुकेबाक कारण की? मालतिकाक दूतीकेँ पकड़ि रखबाक बेहूदगीक विषयमेँ की एकरा शङ्का अछि? ठीक, हँसीक गोता लगा एकर थाह लेब।

अरे ब्राह्मणपुत्र, मित्र भेटलापर अपनाकेँ नुका छतरीसँ चानन रोकबाक जकाँ व्यर्थ काज किएक करैत छह? ई बाहर निकलि हँसि रहल अछि। की कहैत छह—‘सुहृत्कर्णधारक स्वागत’? भलमानुष, हमर सुहृत्कर्णधारता कतय, जखन तोँ अपन दोहरा रतिप्रणयसँ हमरा दूर रखने छह?

की कहलह—‘नहि, एहन बात नहि’? अरे सुरतक टुकड़खोर, हमरा सँ एना नहि कह। सभकेँ ज्ञात अछि जे शेषिलकक पड़ोसमेँ बौद्ध भिक्षुणी रहैत अछि। कामभाव उपजलापर मालितक बेटी मालतिका ओकरा तोहर लग दूती बना पठौलक। ओहि दूतीक शृङ्गारविहीन रूप, यौवन आ लावण्यमय देहपर मांस जकाँ ललचा तोँ तुरन्त ओकरेपर आँखि गड़ा देलह, भविष्यमेँ भेटएबालीक लेल नहि ठहरलह। की कहलह—‘मित्र, ई सत्य अछि जे भविष्यक सुखक आशामेँ प्राप्त सुख छोड़ब पुरुषार्थ नहि; तेँ हम ओहिना कएलहुँ। दीपसँ आगि नहि खोजल जाइत अछि।’ अरे, नीके कएलह। जँ विस्तारसँ नहि कहबह तँ रहस्य बेमजा रहत। तेँ ई बात विस्तारसँ सुनबाक योग्य अछि। तोँ—

—की कहलह—‘के स्वयं अपन बेहूदगीक पचड़ा खोलैत अछि? तथापि संक्षेपमेँ सुनू।’

जखन ओ अपनापर बलात्कार होइत देखलक, तखन हमरा कहलक—‘एतेक विश्वास दिआ कऽ—

—अरे बदमाश, तोँ हमरा ठकि रहल छह? हम प्रतिष्ठित स्त्री छी। अरे चपल, एहि काजक लेल आयल स्त्रीक संग एहन व्यवहार उचित नहि। दोसरक सुनसान घरमेँ पहुँचि हमरा बलपूर्वक रोकि लेल गेल अछि। एना नहि कर; हमरा ऊपर दया कर; छोड़, केओ आबि रहल अछि।’

वाह! मृदङ्ग बिना नाटकक अङ्क समाप्त भऽ गेल। एहि प्रकार सुरतक नियम तोड़ि, हे वशिष्ठपुत्र, तोँ ‘विट’ शब्दक जड़ि जमा देलह—अर्थात् दूतीक संग एना कऽ पक्का विट सिद्ध भेलह। मित्र, तोहर मिलन शुभ हो; हम चली। [घुमैत] लिअ, सुरतक पाहुनक बस्ती—वेश्यापुरी—आबि गेल। ई वेश्यापुरी—

गणिकाक ई वेश कामक आवेश, बदमाशीक उपदेश, मायाक कोष, ठगीक अड्डा आ निर्धनकेँ भीतर नहि घुसए देबाक लेल बदनाम अछि। एतयक दुःखो रसपूर्ण होइत अछि। एकर प्रवेश सभक लेल सुलभ हो।

[घुमैत] मैल चादरसँ देह झाँपि, शरीर सिकोड़ने, वेश्याक आङनसँ शीघ्र बाहर निकलैत ई के अछि? ध्यानसँ देखैत छी—हड़बड़ीमेँ खसल गेरुआ वस्त्रक छोर देखाइत अछि। आ, ई तँ एही विहार—धर्मारण्य—मेँ रहनिहार दुष्ट बौद्ध भिक्षु सङ्घिलक अछि। अहो, बुद्धक शासन कतेक पवित्र अछि, जे एहि प्रकार व्यर्थ माथ मुँड़ौने दुष्ट भिक्षुकसभक आघात सहितो दिन-दिन पूजल जा रहल अछि। अथवा कौआक जूठसँ सेहो तीर्थक जल अशुद्ध—

—नहि होइत अछि। ओ हमरा देखि लेलक, तेँ अपनाकेँ नुका भागि रहल अछि। ठीक, जँ हमर वचनबाणसँ छुबि गेल तँ बिना चोट खएने नहि निकलत। चलू, एकरासँ गप्प करी। [इशारा कऽ]

अरे विहारक भूत, उल्लू जकाँ दिनमेँ डरि कऽ किएक चलैत छह? की कहैत छह—‘एखन विहारेसँ चलि आबि रहल छी’? भदन्तक विहारशीलताक सत्यता हम नीक जकाँ जनैत छी। बदमाश, वेश्यावीथिक बावड़िसँ निकलैत बगुला जकाँ सहमल तोँ कतय जा रहल छह? सुरतरूपी पिण्डपात अर्थात् भिक्षाक खोजमेँ छह की? की कहैत छह—‘माताक मृत्युसँ दुःखी सङ्घदासिकाकेँ बुद्धवचनसँ सान्त्वना देबाक लेल आयल छी’? तोहर मुँहसँ निकलल बुद्धवचन एहन लगैत अछि, जेना मदिराक भ्रममेँ आचमन कएल गेल हो। हाय—

मूर्खतावश वा संयोगेसँ जँ कोनो भिक्षु वेश्याक आङनमेँ प्रवेश करैत अछि, तँ दत्तकसूत्रमेँ ओंकार जकाँ ओ शोभा नहि पबैत अछि।

की कहैत छह—‘हमरा सभकेँ समस्त प्राणीपर दया देखेबाक चाही’? ठीक, नित्य प्रसन्न रहनिहार भदन्त तृष्णाक नाशसँ परिनिर्वाण प्राप्त करताह—अथवा ‘नित्यप्रसन्ना’ नामक मदिरा जमेबाक बाद तोँ पिआस मेटा मातल भऽ जाएबह। ओ हाथ जोड़ैत अछि—अर्थात् अँजुरी भरि पीबैत अछि। की कहैत छह—‘ठीक अछि, हम मुक्त भऽ जाई’? ठीक, अपन परिश्रम व्यर्थ नहि कर; मोक्ष तोहर लेल सर्वथा दुर्लभ अछि।

की कहैत छह—‘हम जाइत छी; अकालभोजनसँ बचबाक चाही’? वाह, वाह! तोँ बाँकी सभ नियम पूरा कऽ चुकल छह। पंचशील नहि छोड़निहार एहि भिक्षुक लेल मात्र एतबे बाँकी अछि जे उचित समयपर भोजनक नियम भङ्ग नहि हो। जा, रुम्बा पड़! केश मुँड़ौलाक कारण माथपर दादक चित्तीसँ लजा रहल छह? जा, तोँ पूरा बुद्ध छह। नीक भेल ई दुष्ट बिलाए गेल। एहि गन्हाइत बौद्ध भिक्षुकेँ देखिसँ मलिन भेल अपन दृष्टि कतय धोई? [घुमैत]

अरे वाह! गुण्डालोकनिक आँखि शीतल करएबाली वस्तु आबि गेल। वसन्तवतीक पुत्री वनराजिका, वनराजि जकाँ रूपवती, मानो अपन देहेपर फूलक समाज रचि, इच्छित देवपूजा आ सम्मान कऽ, कामदेवक मन्दिरसँ उतरि रहल अछि। ओ पूर्ण सावधानीसँ पुष्पशृङ्गार द्वारा देहकेँ भव्य बनौने अछि। बुझाइत अछि, अपन प्रियजनक लग जा रहल अछि। मधुर गप्प करैत ओकरा लग पहुँची। [इशारा कऽ] भद्रे वनराजिके, वसन्तक फूलक पहिल उपहार लैत कतहु पाहुनकेँ बिसरि तँ नहि गेलह? की कहलह—‘आर्यक स्वागत, प्रणाम’? तोहर दाक्षिण्यक ई पल्लव स्वीकार कएलहुँ। निश्चये हालहि आयल वसन्त तोहर देहमेँ पैसि गेल अछि। की कहलह—‘कोना?’ तखन सुन—

वासन्ती आ कुन्दक पुष्पक संग मिलल कुरबकक फूलसँ तोहर जूड़ा सजल अछि; चोटीक छोरमेँ अशोक लागल अछि; स्तनतट सिन्धुवारक उपहारसँ सजल अछि; नव आम्रमञ्जरी आ हिलैत कोँपलसँ कर्णपूर बनल अछि। हे सुमुखि, अँजुरीमेँ फूल भरने तोँ मूर्तिमान वसन्तकेँ धारण कएने छह।

की कहैत छह—‘ई अहाँक लेल उपहार अछि’? ठीक, तोँ स्वयं एहि धरोहरकेँ राख; समय अयलापर हम लऽ लेब। तोहर कल्याण हो; हम चली। [घुमैत]

अरे, ई इरिमक रखैल ताम्बूलसेनाक घर अछि। भलमानुष प्रतिदिन एतय जमैत अछि। की हम भीतर जाउ? [सोचि] बिना गप्प केने जाएब उचित नहि।

तखन भीतर चली। [प्रवेश कऽ] अरे मित्रक घरमेँ केओ अछि, जे शशक आवभगत करए? अरे, ई ताम्बूलसेना हमर सम्मान लेल शीघ्र डेग भरैत, घबराहटमेँ खसल चादर घीचैत, बाहरी दुआरिपर स्वागत करबाक लेल पहुँचि गेल अछि। निश्चये ई अतिरिक्त आवभगत अछि। बुझाइत अछि, हमर भीतर प्रवेश ओकरा नीक नहि लगल; तेँ बाहरहि हमरा निपटएबाक लेल निकलि आयल अछि। एकर ताजा सुरतचिह्नसँ बुझाइत अछि जे एखनहि रतिक्रीड़ासँ निवृत्त भेल अछि। निश्चये इरिम दिवासुरतक मल्लयुद्धक अनुभव कएलक। ई भलमानुष सुरतक बड्ड लोभी अछि। होअए, एकरासँ कनेक मजाक करी। अरी ताम्बूलसेने, एतेक आवभगत किएक खर्च कऽ रहल छह? रतिजनित थाकनिक कारण उखड़ल निःश्वाससँ टूटल अक्षरमेँ ‘प्रिय मित्रक स्वागत’ कोना कहि रहल छह? अरी सदा प्रेममेँ पगलि, पहिने एकटा पङ्खा लह। सत्ये, ताम्बूलसेना व्यायाम—सुरतश्रम—कऽ चुकल अछि। अरी चोटी, शक्ति सेहो बढ़बैत छह वा—

—नहि? की कहैत छह—‘हम किछु नहि बुझैत छी’? [हम देखैत छी] प्रियजनक संग आलिङ्गनक कारण एकर स्तनतटक चन्दन मेटा गेल अछि। तखन पूछी। अरी सुरततृष्णाक सदिखन पिआसल, रातिभरि विहार करएबला इरिमकेँ दिनोमेँ विश्राम नहि करए दैत छह? भोर-साँझ दुनू समय होम चलैत अछि की? की कहैत छह—‘दोसरक मजाक उड़ेनाइ अहाँक सदिखनक आदति अछि’? बात—

—एहन नहि। अरी चतुरे, की नहि सुनने छह जे रूप नुकेलासँ सेहो रूप प्रकट भऽ जाइत अछि? की कहैत छह—‘अहाँ कोना बुझलहुँ’? अरी चोटी, हम कोना नहि बुझब? जेना—

मेटायल विशेषक, पोंछल रोलीक टीका, कपोलपर छिड़िआयल लट, खसल कर्णोत्पल, दन्तक्षतसँ लाल अधरबला मुख आ अलसायल आँखि सूचित करैत अछि जे तोहर प्रेमी दिवासुरतक लोभी अछि।

की कहैत छह—‘एखन हम सुति कऽ उठल छी; अहाँ किछु दोसर शङ्का करैत छी’? ठीक, हम बुझि गेलहुँ। एखन तोहर सूक्ष्मसँ सूक्ष्म भेदो हमरा लेल अनजान—

—नहि रहल; मुदा—

बुझाइत अछि, तोहर देहपर ई नखक्षत आ दन्तक्षत स्वप्नक अन्तमेँ भऽ गेल अछि। हे सुन्दरि, तोहर दहिना काँधपर ई वस्त्रचिह्न की पितरकेँ ‘स्वधा’ कहि प्रसन्न करबाक कारण बनल अछि? आओर, हड़बड़ीमेँ तोँ ई देखब बिसरि गेलह जे ओ गँवार मोची तोहर दुनू पएर लेल बाम जुत्ते बना देलक। अरी चोटी, चोरीक मालक संग पकड़ायल तोँ एखन बचि कऽ कतय जाएबह? ओ भीतरक घरमेँ जा अपन रमणक संग जोर-जोरसँ हँसि रहल अछि। [कान लगा कऽ] ई इरिम कहि रहल अछि—‘हे धूर्ताचार्य, भीतर आउ।’ मित्र, सुरतरथमेँ जोतल बरदक जुआ के काटत? तोहर ई सुरतक टहल बेरोकटोक चलैत रहय। हे गार्गपुत्र, हम चली। [घुमैत] अरे, बाहरी दुआरिक देहरीपर देवताकेँ बलिक उपहार दैत ई के अछि? निश्चल मुख, शोकक थाकनिसँ भरल, बिना काजरक आँखि, मैल वस्त्र, बिना तेलक लटकैत घन केस, ढील कङ्कण, फूल फेकलासँ खसल अँगूठी—ई छरहरि तरुणी आओर दुबर भऽ गेल अछि।

ई भाण्डीरसेनाक पुत्री कुमुदवती अछि। हा, खेद! ई बेचारी कठिनतासँ चिन्हाइत अछि। के अछि, जकर लेल ई वेश्यापुरीक रीति-विरुद्ध, विरहमेँ पतिव्रता जकाँ व्रत करैत अछि? हँ, स्मरण भेल। सुनल जाइत अछि जे ई ओहि मौर्यकुमार चन्द्रोदयमेँ अनुरक्त अछि। ओ भलमानुष सामन्तसभकेँ दबएबाक लेल सेनाक संग गेल अछि। हा, चन्द्रोदयक विरहमेँ कुमुदवती श्रीहीन भऽ गेल अछि। ई तँ कुलवधूसभकेँ सेहो पराजित कऽ देलक। अपन घरक अटारी—वलभीपुट—पर बैसल, बलिक लोभसँ आयल कौआकेँ स्वागतवचनसँ अभिनन्दन कऽ रहल अछि—

हे अटारीक गोखक तिलक, हे श्राद्धमेँ देल बलिभोजनक अतिथि, तोहर कल्याण हो। की हमर जीविते सदिखन प्रवासमेँ रहनिहार हमर प्रियतम घुरि आएत? जँ ओ अबैत हो, तँ जा आ दोसरक दुआरक तोरणपर बैस। दुःख बीतलाक बाद प्रियतमसँ मिलि हम तोरा दही-भात खुआएब।

वाह, एकर प्रेम निश्चये छल-कपटहीन अछि। राजाक योग्य ई रत्न हँसी उड़एबाक वस्तु नहि। कोनो राजमहिषीक हाथसँ एकरा वधूभावक अवगुण्ठन प्राप्त हो। एखन हम असगरे चलब। [घुमैत]

अरे, दहिना दिस बगैचामेँ आभूषणक झनकारसँ उड़ल चिड़ैक मुखर ध्वनिसँ मिलल-जुलल कोनो शब्द सुनाइत अछि। ठीक, एहि वृक्षवाटिकाक दुआर खुलल अछि; देखी। [देखि] हा-हा, कतेक सुन्दर! एतय तँ आँखिक उत्सव सजल अछि। ई पाञ्चालदासीक पुत्री प्रियङ्गुयष्टिका अछि। जघनभाग भरि उठलासँ ओकरामेँ यौवनोचित ठसक आबि गेल अछि। यौवनक नव राज्य ओकरा मोहित कऽ रहल अछि। अनेक विलास, हाव, भाव आ दाक्षिण्यसँ युक्त, सखीसभसँ घेरायल, ओ गेन्द खेलि रहल अछि। ई—

मूँगा जकाँ लाल अँगुरीबला हाथसँ मैनसिल रङ्गक गेन्द पकड़ने, नीचाँ-ऊपर लचकैत ओहि कदम्बलताक शोभा पाबि रहल अछि, जे अपन पल्लवक टोकसँ कोनो फूलपर टहोका मारि रहल हो। एकरा देखनाइए अमूल्य लाभ अछि। ठीक, तृप्त मनुखो अमृतसँ नहि अघाइत अछि। चलू, एकरासँ किछु गप्प करी। [लग जा कऽ] प्रियङ्गुयष्टिके, गेन्द खेलबाक बहाना सँ तोँ सखीसभक नृत्यकौशलकेँ सेहो किएक पराजित कऽ रहल छह? कनेक मुस्की दऽ उत्तर देतहि ओ खेलिते जा रहल अछि। ओकर दासीसभ गेन्दक उछाल गनि रहल अछि। बुझाइत अछि, सखीसभक संग बाजी लगौने अछि। वाह! बाजीक कारण एकरामेँ कतेक उत्साह भरि गेल अछि। आइ संयोगहि हमरा ई दृश्य देखबाक भेटल—ओकर नीचाँ-ऊपर होयब, घूमब, उछलब, पाछाँ हटब, दौड़ब आदि अनेक प्रकारक अङ्गसञ्चालन सभ भाँति सुन्दर अछि। बहुत कहब की? घूमबाक, पाछाँ हटबाक आ कुदबाक समय ओकर फुलायल वस्त्रक भीतर पैसबाक इच्छुक हवा सेहो कामुकतासँ ओकर पाछाँ दौड़ि रहल अछि। हमरा भय अछि जे मुट्ठीमेँ आबि जाएबाली, यौवनक भारसँ लदल स्तनक कारण नमल, स्वभावे पतली एकर कमर कतहु टूटि नहि जाए। तेँ एकर उपेक्षा सम्भव नहि। एकरासँ गप्प करी—अरी यौवनमत्ते, अपन सुकुमारताक विरुद्ध ई की कऽ रहल छह? ठहर, ठहर; हम तोरेसँ कहि रहल छी। एकर उल्लास तँ बढ़िते जा रहल अछि। अहो, एखन हम एतबे कामना करैत छी—

अरी चपले, गेन्दक पाछाँ तोँ पूर्णतः उन्मत्त भऽ गेल छह। तोहर कानक कुण्डल जोर-जोरसँ हिलि रहल अछि। दुनू भुजा चमकि रहल अछि। छिड़िआयल अलकसँ खिलल फूल झरि रहल अछि। तोहर करधनी चक्कर लगेलासँ ऊपर उछलैत आ—

—फेर वेग बढ़लासँ चमकैत आ क्षुब्ध होइत अछि। थरथराइत स्तनक भारसँ नमल तोहर कमर मात्र सकुशल रहय।

पूरा सएह उछाल भऽ गेल, तेँ ओ रुकि गेल। भद्रे प्रियङ्गुयष्टिके, सखीसभसँ बाजी जीतलापर बधाइ। की कहैत छह—‘आर्यक स्वागत; विजयक आधा भाग उपस्थित अछि, स्वीकार करू’? भद्रे, तोरा देखनाइए हमरा लेल अमूल्य लाभ अछि। हमर स्मरण राखिह; हम चली। [घुमैत]

अरे, मित्रक मनोरञ्जनक ई दोसर अड्डा आबि गेल। ई चन्द्रधरक सुरतिन नागरिकाक पुत्री शोणदासीक घर अछि। भीतर प्रवेश करी; बिना बजने आगाँ नहि बढ़ि सकैत छी। [प्रवेश कऽ देखैत] अरे, शोणदासी किछु सोचैत बाहरी दुआरिक देहरीपर बैसल अछि। ई की बात जे आभूषण एक दिस राखि, अपन स्वाभाविक लावण्यसँ सुन्दर लगैत, मैल चादरसँ आधा देह झाँपि, ललाटपर लाल चन्दन लगा, उज्जर दुकूलक पट्टी माथपर लपेटि, चन्द्रमुख नीचाँ नमौने, कोरामेँ पड़ल वीणाकेँ अँगुरीसँ कनेक झनकारैत, मन्द मधुर काकलीस्वरमेँ कौशिकक सहारासँ तान लगा बैसल अछि?

निश्चये ई उत्कण्ठिता अछि। कौशिकक सहारासँ गाएब रोदनक दोसर नाम अछि। की चन्द्रोदयसँ पहिनहि हम ई वृत्तान्त नहि सुनने छलहुँ जे एहि दुनूक बीच प्रणयकलहरूपी विवाद भऽ गेल? प्रियतमक संग झगड़ा कऽ ई पछता रहल होयत। ठीक, एकरासँ कनेक हँसी करी।

अरी शोणदासि, वेश्यापुरीमेँ रहनिहारि कोनो तपस्विनीक स्वाँग किएक रचने छह? भद्रे, निश्चये चन्द्रधरसँ कोनो अपराध भेल अछि की? नोर बहबेनाइए तोहर उत्तर अछि? नोर रोक आ हमरा स्थिति कह। की कहैत छह—‘केवल मान करएबामेँ निपुण हमर सखी हमर सर्वनाश कऽ देलक’? अरी शोणदासि, जाहि सखीकेँ सभसँ अधिक मानैत छह, ओकरेसँ विद्रोह भऽ गेल? की कहैत छह—‘ओकरे खराब परामर्शसँ ई विपत्ति सहि रहल छी’? तोँ नादान छह। ओकरा एना कहबाक चाही छल—

हे दूति, प्रियतमक प्रति प्रायः शीत रहनाइए हमर अपराध छल; मुदा एखन हम एक क्षणो हुनकासँ मान नहि कऽ सकैत छी। अरी अनार्ये, हमरा कामक कठोर तराजूपर चढ़ा कऽ एखन प्रसन्न छह? केवल मानक लेल उकसाएबाली आ मान-मनौवलविहीन तोहर बातमेँ आबि हम एहन काज कऽ देलहुँ, जकर कारण बेसी ढील भऽ गेल अपन करधनीकेँ स्वयं दुनू हाथसँ सम्हारए पड़ि रहल अछि।

की कहैत छह—‘कामदेव हमर सभ मान शान्त कऽ देलनि; मुदा सौभाग्यक घमण्डमेँ तोहर ओही मित्र एखन हठी बनल छथि’? तखन अभिसार किएक नहि करैत छह? अरी मुग्धे, एहन लज्जा छोड़।

आँखिमेँ नोर भरि, मुख नीचाँ कऽ, लम्बा निःश्वास लैत मोनमेँ की चिन्ता कऽ रहल छह? यद्यपि तोँ सौभाग्यवती छह, मुदा एखन शिथिल आभूषण स्वयं सम्हारए पड़त। तटस्थ सखीक वचन छोड़ आ प्रियतमकेँ अनुनय-विनयसँ मना। व्यर्थ कठोर बनल रहिसँ की लाभ? अरी मूर्खे, जखन प्रणय बड्ड बढ़ि गेल हो, तखन अत्यधिक मान कऽ बैसल रहनाइ अपमान बनि जाइत अछि।

की कहैत छह—‘स्त्री पुरुषकेँ मनाबय, ई कोन सच्चा पुरुषार्थ अछि’? अरी एना नहि सोच। हे अभिमानिनि, गङ्गा समुद्रक लग नहि जाइत छथि की? लज्जासँ मुक्ति लह। अथवा तोहर इच्छा पूर्ण हो; चन्द्रधरकेँ हम स्वयं मना देब। बेसी कहब की? दीर्घ विरहमेँ बन्द पड़ल तोहर मदनाग्निहोत्रकेँ आइए—

—फेर प्रज्वलित करब। नोर रुकबासँ पहिने ई मुस्की किएक देलक? मानो बरखामेँ चानन देखाइ देलक। हे सुन्दरि, कानब बन्न कर; एखन सुखक समय आबि गेल। की कहैत छह—‘एखन अहाँ अपन वचन सत्य करू’? भोरमेँ जानि जाएबह। नीक, रोदन रुकि गेल। हम चली। [घुमैत] अहो, शृङ्गारक ई दोसर विषय उपस्थित भेल। शरदक निर्मल चन्द्रमा जकाँ मुखबाली ई नागरिकाक पुत्री मगधसुन्दरी नामक गणिका अछि। एकर केस कारी, कोमल, घुँघराल, चिक्कन आ सुगन्धिसँ महमह अछि; चञ्चल नेत्र खिलल नीलकमल जकाँ सुन्दर अछि। दाँतक बाहर अबैत किरण मूँगा जकाँ चटकीला लाल अधरक सम्पर्कसँ लालिमायुक्त भऽ रहल अछि; दाँत कुन्दकली जकाँ उज्जर, समान आ सटल अछि। कपोल, स्तन आ जघनभाग भरल अछि। बाहरी दुआरिक किवाड़क पाछाँ देह नुका, दहिना हाथक दू अँगुरीसँ परदाक छोर पकड़ि ठाढ़ अछि; बाम पएरक एक भागसँ भूमिपर ताल दैत, सुरीला मधुर तारस्वरमेँ ‘वल्लभा’ नामक चौपदी गुनगुना रहल अछि। ओ गीत शुद्ध वर्णबला, अलङ्कारयुक्त, कानकेँ सुख देनिहार आ षड्जग्रामपर आधारित अछि। नेत्र आ भौँहसँ मोनमेँ उमड़ैत सकाम भाव प्रकट करैत कोनो रईसक प्रतीक्षा कऽ रहल अछि। अरे, इन्द्र जकाँ भाग्यशाली ओ के अछि, जकरा सुरतयज्ञ लेल आह्वान कएल जा रहल अछि? ठीक, एकरेसँ पूछी। अरी वेश्यापुरीक मेघराशिक बिजुरी, तोहरासँ किछु पूछए चाहैत छी—

हे चन्द्रमुखि, श्वेत भाग, कारी पुतली, कोनमेँ लालिमा आ कटाक्षसँ युक्त एहि खुलल दृष्टिसँ तोँ बाहर दिस कोन भाग्यवानक लेल देखि रहल छह? हा! भयभीत मृगछौनी जकाँ डरायल आँखिसँ ओ हमरा दिश देखि रहल अछि। बुझाइत अछि, एकर मोनमेँ फेर रङ्ग भरि गेल। की कहैत छह—‘एहन बात—’

—नहि अछि। हम वसन्तमेँ ब्रह्मचारिणी रहि उपवास करैत छी’? ई विश्वासयोग्य बात अछि! मुदा तोहर अधरपर ई ताजा दन्तक्षत की कहि रहल अछि? की कहैत छह—‘अन्तिम पाला जकाँ कठोर वसन्ती पवनक ई चिह्न अछि’? ओहिना सही; हम बुझि गेलहुँ।

दन्तक्षतसँ जर्जर अधरबाली भऽ कऽ सेहो तोँ जे अपन नियमाचार कहि रहल छह, ताहिसँ स्पष्ट अछि जे अपन व्रतक अनुरूप चुम्बनक चान्द्रायण करैत छह—चान्द्रायण-व्रतक आहार जकाँ चुम्बनकेँ घटबैत-बढ़बैत रहैत छह।

वाह! किवाड़क पाछाँ मुख नुका कऽ हँसए लागल। तोहर एहि तपक वृद्धि हो। हम चली। [घुमैत]

वाह! कोनो तरहें वेश्यालोकनिक संग गप्पक कड़ी तोड़ि हम देवदत्ताक घर आबि पहुँचलहुँ। सम्भवतः देवदत्ता बाहर गेल छथि। ककरासँ पूछी? [देखि]

वाह! बगैचाक कातक दुआरसँ प्रिय नाट्याचार्य गन्धवेदत्तक शिष्य, दर्दरक नामक नटीपुत्र अर्थात् नाटेरक बाहर निकलि रहल अछि। ओकरेसँ पूछैत छी। [इशारा कऽ]

अरे दर्दरक, तोँ कतयसँ आबि रहल छह? जनैत छह, देवदत्ता की कऽ रहल छथि? की कहलह—‘देवदत्ता आर्य मूलदेवकेँ देखबाक आ कुशल-मङ्गल पूछबाक लेल गेल छथि। हमर आचार्य हमरा देवसेनाकेँ देखबाक लेल पठौलनि’? कोन कारणेँ? की कहैत छह—‘आचार्य कहलनि—प्रकरण नाटकमेँ कुमुद्वतीकेँ जे अभिनय करबाक अछि, ओकर लिखल पत्र ओकरा दऽ आउ’? ओ लिखल पत्र लेलक? की कहैत छह—‘आचार्यक रोबसँ पत्र तँ लऽ लेलक, मुदा कातमेँ बैसल सखीक हाथमेँ दऽ देलक। फेर कुमुद्वतीकेँ प्रणाम कऽ कहलक—“हम एहि समय स्वस्थ नहि छी।”’ अहो, हमहुँ अपन अनुमान लेल प्रसिद्ध छी। ई स्पष्ट करैत अछि जे ओ पूर्णतः कामभावमेँ निमग्न अछि। अरे दर्दरक, एहि पत्रमेँ की लिखल अछि? की कहैत छह—‘स्वयं पढ़ि लिअ’? [पत्र लऽ पढ़ैत]

रागवती किशोरीसभ जघनस्थलपर नखक्षतरूपी गुप्त सम्भोगचिह्न धारण करैत रहथि। ओ चिह्न कामदेवक मनोहर फूल, स्तनक लग हारमेँ झूलैत चन्द्रलेखाक आकार, प्रेमरूपी गाछक नव पात, शय्यायुद्धमेँ लागल घाव, सुरतरूपी रथयुद्धमेँ थाकल बरदकेँ हाँकबाक अङ्कुश आ विलासक अद्भुत नमूना अछि।

वाह! स्त्रीरूपी ओहि हठीली बछेड़ीकेँ साधबाक लेल निकललापर हमरा कार्यसिद्धिक सूचक ई शकुन देखाइ पड़ल। अरे दर्दरक, तोँ ई सेहो जनैत छह जे देवसेना कतय अछि? की कहैत छह—‘बगैचामेँ गेल अछि’? हँ, तखन—

—तँ कामदेवक कारखानामेँ अछि। ठीक, तोँ जा। हम भीतर प्रवेश करैत छी। [प्रवेश कऽ] अरे, ई तँ देवसेने अछि—

दुबर, फिक्का, पीयर, कान्तिहीन—भोरक क्षीण चानन जकाँ ओ कामरोगक असाधारण गुप्त वेदना सहि रहल अछि, जे केवल मधुर उपचारसँ दूर कएल जा सकैत अछि।

अहो, एहि कारण ओ समस्त गुप्त रहस्य जाननिहारि आ अत्यधिक स्नेहसँ सखीरूपमेँ स्वीकार कएल अपन प्रियवादिनिका नामक दासीक संग, सभकेँ हटा, एकान्तमेँ हवा खा रहल अछि। ठीक, एहिसँ ओकर एकनिष्ठ आसक्ति सेहो प्रकट होइत अछि। सभ कामी एकान्त पसन्द करैत छथि। एखन ओ हमर पहुँचमेँ अछि; चलू, ओकरा लग जाउ। [जा कऽ]

बालिके देवसेना, तोहर निजक गुप्त गप्पमेँ हस्तक्षेप करनिहार हमरा सँ क्रुद्ध नहि हो। की कहैत छह—‘अहाँक तँ स्वागत करैत छी’? तोहर ई शिष्टाचार स्वीकार कएलहुँ। अरे, उठबाक कष्ट नहि कर। की कहलह—‘बैसू, ई आसन अछि’? नीक, बैसैत छी। भद्रे, प्रेमीक लेल सन्ताप करबाक कारण आँखिसँ नहि देखाइत, भीतर नुकायल कसकबला, स्वयं लगाओल आ आरम्भमेँ असगरे अबैत ई कोन रोग अछि? की कहलह—‘किछु नहि’? अरी सुघड़े, हमरा टारब छोड़। तोँ सदिखन हमरा लेल प्रिय बालिका छलह, जे खेलौना आदि अनबाक लेल हमरा कहैत छलह। हम वही मूलदेवक मित्र शश छी। मोनक बात कह। ई दुख ककर कारण अछि—

बिना रोगो तोँ रोगिणी छह। तोहर कनपटी कमल जकाँ हथेलीपर टिकल अछि। पुतली ध्यानमेँ एकटक अछि। हृदय जड़ भऽ गेल अछि। जँभाइ आबि रहल अछि। रङ्ग बदलि गेल अछि। अरी चोटी, कह—ई कोन नव रोग तोरा लागल अछि, जकर कारण श्वास लेबो कठिन अछि, कतहु शान्ति नहि, इन्द्रियसभमेँ दाह अछि आ तोरा मात्र एक वस्तुक इच्छा अछि? ई एहन निःश्वास किएक लेलक? एकर कामाग्नि धधकि उठल अछि। ठीक, एखन एकर मोनक बात बुझि सकब। जँ हम तोहर विश्वासक पात्र नहि छी, तँ प्रसन्न रह; हम अपन काजपर चली। की कहैत छह—‘अहाँ एतेक चपल छी’? हँ, बुझि गेलहुँ। [मनमेँ] ई मर्मक बात कहए चाहैत अछि। [प्रकट] तोहर एहन दशा देखि हम धैर्य कोना राखी? आ विलम्ब कएलासँ दोसर काज उपस्थित भऽ जाइत अछि।

तेँ शीघ्र अपन सन्तापक कारण कह। की कहैत छह—‘अहाँसँ हमर किछु नुकेल नहि अछि। वसन्तक स्वभावे एहन अछि जे पैघ लोकक कठोर शिक्षासँ वशमेँ राखल मोनकेँ सेहो बिना कारण उचाट कऽ दैत अछि’? ठीक, ई रोगसँ इनकार—

—नहि करैत अछि। अरी चोटी, की तोँ जनैत छह जे देवसेना सचमुच युवती भऽ गेल अछि! हे बालिके, जँ बात एतबे अछि, तँ एहि रोगकेँ आगाँ नहि बढ़ा। ऋतु बदललापर तोँ स्वस्थ भऽ जाएबह। ई लजा किएक गेल? प्रियवादिनिके, तालपत्रपर की लिखल अछि?

की कहैत छह—‘नाटकमेँ पात्रक भूमिका अछि’? देखी तँ। [लऽ पढ़ैत] ‘कुमुद्वती’ प्रकरणमेँ शूपकपर आसक्त राजपुत्रीकेँ ओकर धाय असगरेमेँ उलाहना दैत अछि—

अरी नासमझे, एखन तोहर छाती सेहो नहि उभरल, ने रोमावली फूटल अछि। अरी अनाड़ी, एखन तोहर बुद्धि अपरिपक्व अछि। जवान स्त्री जकाँ पतिक संग मिलबाक ई साध छोड़। तोहर चतुर सखीसभ सदिखन तोरा अविनयक पोथी पढ़बैत रहैत अछि। अरी, तोँ बालपनेमेँ पाकि गेलह। कामसङ्ग्रामक लेल किएक तत्पर छह? देवसेना की कहलक—‘ई तँ हमहुँ पहिने नहि सुनने छलहुँ’? अहो, एखन एकर अपन भाव खुजल। एकर अर्थ भेल—‘हमहुँ एहने करए चाहैत छी।’ देवसेना की कहैत अछि—‘अहाँ हमरा चरित्र बुझैत छी’? भद्रे, हमरा टारब छोड़। मेघमेँ नुकायल चन्द्रमाकेँ सेहो कुमुदिनीक खिलब प्रकट कऽ दैत अछि। अरी पुरुषकेँ उन्मत्त करनिहारि, चल; तोहर ऊपर ई विपत्ति आयल अछि।

अरी गुमसुम भाव नुकेनिहारि, ‘हम प्रेम नहि करैत छी’—एना अनेक बेर कहने छह। अरी चोटी, फेर कह जे स्वभावसँ छरहरि तोँ आओर दुबर किएक भऽ गेलह? तोहर कङ्कण ढील किएक पड़ि गेल? कपोल हाथपर किएक रखने छह? लम्बा निःश्वाससँ तोहर मुखक रङ्ग फिक्का किएक भऽ गेल?

अरी शठतासँ भरल, कह—जखन ई जन एहि प्रकार मदनव्याधिसँ पीड़ित अछि, तँ एतेक धैर्य किएक धारण कऽ रहल छह? प्रियवादिनिके, तोँ की कहैत छह—‘कामतन्त्र-प्रकरणमेँ प्रवृत्त हमर स्वामिनी कोनो साधारण मनुखमेँ नहि, एक विशिष्ट पुरुषमेँ अनुरक्त छथि’? तँ एहि अवन्तीनगरमेँ ‘पुरुषविशेष’ शब्द ककरा लेल लागू होइत अछि? की कहलह—‘अहाँक अनुमान की अछि’? दोसर के भऽ सकैत अछि? कर्णीपुत्रे होयत। ओ—

उत्तम कुलमेँ उत्पन्न, विद्वान्, कोनो बातसँ चकित नहि होनिहार, हँसैत बजएबला, चतुर, ईर्ष्याविहीन, प्रियभाषी, रूप-यौवनसँ युक्त आ धनुषविहीन साक्षात् कामदेव अछि।

देवसेना माथ नीचाँ कऽ किएक रहि गेल? अरी चपले, दुकूलक आँचर गुंथब बन्न कर आ कह तँ सही। जँ ई हमरा विश्वासपात्र मानैत अछि, तँ चुप किएक अछि? लज्जा स्त्रीक—विशेषतः मुग्धा स्त्रीक—विश्वासक दहेज अछि; फेर ओ स्वयं कोना कहत? अतः ‘पुरुषविशेष’ ई असाधारण शब्द यद्यपि कर्णीपुत्रेपर लागू होइत अछि, तथापि जाबत एकर पूरा थाह नहि पाबी, धैर्य राखि एकरे मुँहसँ एकर भेद कहाएब।

भद्रे देवसेने, दोसरक भेद सुनिसँ हमरा की प्रयोजन? हम तटस्थ छी; केवल तोरा परामर्श दैत छी। कर्णीपुत्र सेहो पाटलिपुत्रसँ दूर रहबाक कारण अपन स्वजनसँ मिलबाक उत्कण्ठामेँ अधिक अस्वस्थ छथि। ओ आइ वा काल्हि चलि देताह। तोहरासँ फेर भेंट होयत; मुदा आशा अछि, ताबत तोँ स्वस्थ भऽ जाएबह। हमर स्मरण राखिह। [उठि चलैत, फेर शीघ्र घुरि] अरे, के कहलक—‘हा, एखन हम मरि गेलहुँ’? अरे देवसेना, किएक कानि रहल छह? भद्रे, की बात? कानब बन्न कर। नीक, बुझि गेलहुँ। तोरा बधाइ—तोहर मनोरथ योग्य पात्रमेँ गेल अछि। कर्णीपुत्रकेँ सेहो तोहरे रोग अछि; तखन अहाँ दुनू एक-दोसरक उपचार करू। की कहैत छह—‘अहाँ एतेक विश्वाससँ कोना कहि रहल छी? अहाँ तँ दोसरक दुखसँ पघिलनिहार छी’? बस, एखन कष्ट सहिसँ की लाभ?

हे सुन्दरि, दक्षक पुत्री तारिकासभ मिलि कऽ एकमात्र चन्द्रमाक भोग नहि करैत छथि की? अथवा एकहि जड़िसँ फूटल दू लता एकहि सहकार गाछपर नहि चढ़ैत अछि की?

की कहैत छह—‘तखन एहन युक्ति करू जाहिसँ दुनूक रक्षा हो’? अरे, ई तँ कएल-करेल अछि। काल्हि तोहर बहिन सदिखन जकाँ आचार्यक एतय अपन नृत्यक पारी पूरा करबाक लेल जायत। तेँ हे सुभगे, एखन जखन तोहर अन्तःकरण विश्वस्त भऽ गेल, तँ कर्णीपुत्रक कुशल पूछबाक बहाना सँ ओतय चलि जइह; अथवा ओ एतय आबि जाएत। अरे, सोच-विचारक झूलापर किएक झूलए लगलह? प्रियवादिनिका की कहैत अछि—‘आर्यपुत्रक एतय अयब उचित नहि बुझाइत अछि; स्वामिनीकेँ ओतय जाएबाक चाही। गणिकाजाति एहन अछि जे एक-दोसरक चुगलीक उपहार लऽ तत्पर रहैत अछि। तेँ हम एहन उचित व्यवस्था करब जे नृत्यक पारी पूरा करबाक लेल जाइत देवदत्ता स्वयं हमर स्वामिनीकेँ सेहो आर्य मूलदेवक लग कुशल-प्रश्न पूछबाक लेल लऽ जेतीह।’ वाह प्रियवादिनिके, सचमुच तोहर नाम सार्थक अछि। एकर ओतय जाएबहि उचित। मुदा एकरा भली-चङ्गी देखाए पड़बाक चाही। देवसेना की कहैत अछि—‘अरे, अहाँकेँ देखितहि हम भली-चङ्गी भऽ गेलहुँ’? हम प्रसन्न भेलहुँ। कामदेवक ई काज हम पूरा कऽ देलहुँ। कर्णीपुत्रक प्राण बचेबाक लेल किछु स्मृतिचिह्न दह। की कहैत छह—‘की दी’? एहिमेँ सोचबाक की अछि? ई तँ—

हे रक्तपद्मसदृश सुन्दरि, हुनका लेल अपन सुरतप्रयत्नक उपहाररूप एकटा लाल कमल पठा। ओ तोहर दाँतसँ कनेक कुतरल, स्तनसँ रगड़ि मसलल, देहक पत्रलेखाक छापसँ अङ्कित, नाकक लग लऽ गेलापर गहिर निःश्वाससँ कनेक म्लान, देहक चन्दनरसक घर्षणसँ फिक्का पड़ल केसरबला आ दुनू हाथमेँ नाल पकड़ि घुमेलासँ मसलायल हो। मानो रातिभरि तोँ ओकर संग रमण कएने हो आ भोरमेँ ओ पूर्णतः तोहर निर्माल्य बनि गेल हो।

मानो आँखि नीचाँ कऽ ओ एहि प्रस्तावक अनुमोदन कऽ देलक। अहो, ई उपहार नहि—सुरतक सौदाक बयाना भेटि गेल! एखन एहि औषधिसँ कर्णीपुत्रमेँ नव शक्ति सञ्चार कऽ सकब। [लऽ, उठि, फेर ठहरि] हम चली। तोहर कल्याण हो। हे भाग्यवती, हमर ई आशीर्वाद लह—

हाथमेँ प्रबल विषयाभिलाषक आयुध धारण कएने कामदेव स्वयं संग भऽ तोरा गुप्त सुरत लेल ओहि अभिसारपर लऽ जाथु, जाहिमेँ भयवश शीघ्र डेग रखितो करधनी आ नूपुरक झनकार नहि सुनाइ, नीवी बाटेमेँ उससि कऽ खुजि जाए आ शङ्कासँ आलिङ्गन शीघ्र शिथिल भऽ जाए।

[विटक प्रस्थान।] श्री शूद्रक केर एकनट नाटक (भाण) पद्मप्राभृतकम् समाप्त।

 

 

 

 

 

 

 

 

धूर्त आ दलालक विचार-विमर्श

ईश्वरदत्तक मूल संस्कृत एकनट (भाण) नाटक- धूर्तविटसंवादः (संस्कृतसँ मैथिली अनुवाद- गजेन्द्र ठाकुर द्वारा)

[नान्दी पश्चात् सूत्रधारक प्रवेश]

सूत्रधार:

विद्यासँ पसरल ख्याति, सज्जनक आराधना लेल धन, आ हुनक प्रसन्नतासँ धर्म—एही उद्देश्यसँ हमर ई आरम्भ अछि।

तेँ उपस्थित जनक प्रीतिक लेल कोनो नाटक खेलबाक चाही। आउ, एहि वर्षाऋतुमेँ हृदय हुलसाबएबला कोनो गीत गाउ—ई धनिकक प्रीति बढ़बैत अछि, मुदा यौवनपीड़ित निर्धन अभागाक शोक बढ़ा दैत अछि; कुमुद, कुवलय, कल्हार, कमल, निचुल, केतकी, कुटज आ कदलीक वनखण्डसँ ई ऋतु सुशोभित अछि। ई एहन समय अछि—मेघक खिजाब अर्थात् नील लेप लगाएने, बिजुरी चमकलासँ थरथराइत देहबला, फुलायल कुटजक वस्त्र पहिरने वर्षाक मौसम विट जकाँ सुहावन लगैत अछि।

[बाहर जाइत] स्थापना। [विटक प्रवेश] विट—ई ठीक कहल गेल।

मेघ धनिकक घरमेँ निपुण मृदङ्गवादक जकाँ मूसलाधार पानिक धारा बहा रहल अछि। बिजुरी क्रोधमयी स्त्रीक बाँकी भौँह जकाँ चमकि रहल अछि। शीतल वर्षाती हवा गाढ़ आलिङ्गन दैत बहि रहल अछि। कामदेव कामिजनक हृदयपर कान धरि धनुष तानि दृढ़ बाण चला रहल छथि।

आओर—

ओ लोकनि अचेत छथि, जे विदेश जाइत छथि, वा विदेश जा वर्षाऋतुमेँ कामसँ प्रेरित भेलो पर नहि घुरैत छथि। ओ लोकनि भोला छथि, जे मानिनीकेँ नहि मनबैत छथि, वा बहुत काल धरि रोष कएने रहैत छथि। धन्य छथि ओ, जे अपन प्रियाक वशमेँ छथि, वा जिनकर वशमेँ प्रिया छथि। ई वर्षाकाल मेघरूपी नगाड़ासँ मानो संसारमेँ एही घोषणा कऽ रहल अछि।

वाह! बरखामेँ रसिक लोकक हृदय पकड़एबाली नाना बातक की कहब! एखन पानिभरल मेघसँ नुकायल सूर्यक किरण, भीजल आङन, आ बहुत पहिने बीतल वृत्तान्त जकाँ फिक्का पड़ल दिन देखाइत अछि। कुटजपुष्पक गन्हसँ खिंचायल भँवरा मँडरा रहल अछि, मोर नाचए लागल अछि, आ शीतल पानिसँ तर मैदान घूमबाक योग्य भऽ गेल अछि। रेंगत बीरबहुटी आ नव हरियर दूबक अङ्कुरसँ भरल वनभूमि पएरमेँ अलता लगाएल युवतीक विचरण लेल उपयुक्त भऽ गेल अछि। गदला पानिसँ भरल आ घाट नहि देनिहार नदी पार करब कठिन भऽ गेल अछि—जेना रजस्वला होयबाक समय गुप्त घाटबाली धूर्त स्त्रीक मर्म पाब कठिन होइत अछि। आओर—

कदम्बक गन्ह लेने, वनक भीतरसँ निकलैत, मेघजलसँ शीतल हवा मानो सौगात लऽ आबि रहल अछि।

ई समय बड्ड सुहावन अछि; एहिमेँ कामक उत्कण्ठा अवश्य होइत अछि।

जखन हवा बहैत हो, कदम्बक गन्हसँ वन महमहाइत हो आ मेघ छाएल रहबाक कारण दिन अन्हार हो, तखन सुखी लोकक मोनो कामक लेल उत्कण्ठित भऽ उठैत अछि। उत्कण्ठा दू प्रकारक होइत अछि—सकारण आ अकारण। कारणसँ उपजल उत्कण्ठाक उपचार भऽ सकैत अछि, मुदा बिना कारणक उत्कण्ठा जखन उपजैत अछि, तखन खवासिन अर्थात् कुम्भदासीक बनौटी कानब जकाँ निरुपाय होइत अछि। हमहुँ एहि दिन बरखाक कारण एतय-ओतय नहि जा सकलासँ बड्ड अनमनायल छी। अपन गृहिणीक मधुर कण्ठक तानसँ तृप्त रहितो एखन हमरा घूमब-फिरब नीक लगैत अछि। [देखि]

गीत रुकलापर मृदङ्ग जकाँ मेघक गर्जन बन्न भऽ गेल अछि। बरखासँ घबरायल घरक मोर एखन प्रसन्नतासँ दुनू पाँखि पसारि महलक शिखरपर चढ़ि शोर कऽ रहल अछि। तूँबीक घुड़च बीचक खाँच छोड़ि देलासँ जकर तार अलग भऽ गेल अछि, ओहन वीणा हिमशीतल हवासँ सतायल कामिनी जकाँ धूप सेकि रहल अछि। महलक छत बचल बरखापानि पनालीक मुखसँ एना उगिल रहल अछि, मानो मोतीक माला हो। वर्षाक कारण धूमिल दर्पण पोंछि स्वच्छ कएल जा रहल अछि। आओर—

पैघ घरमेँ बन्द रहबाक खेदसँ अलसायल स्त्रीसभ खिड़कीसँ झाँकि रहल छथि। वर्षाक सीलसँ कठोर गाँठबाली सोनाक करधनी खोलि फेर बान्हल जा रहल अछि। कामी लोक वेश्याकेँ उपवनमेँ लऽ जेबाक लेल घुमा रहल छथि। कामिनीसभ नव घासपर विचरण लेल कामभाव जगबएबला अलता पएरमेँ लगा रहल छथि।

तखन एहि उत्कण्ठित मोनकेँ कतय बहलाबी—जुआघर अर्थात् द्यूतसभामेँ, वा वेश्यापुरीमेँ? [सोचि] जुआकेँ प्रणाम! एक धोती छोड़ि दोसर वस्त्रो हमरा लग नहि बचल। नीच कुलमेँ जन्मल रईस जकाँ पासासभ सदिखन सोझ मुँह नहि रहैत अछि। तखन वेश्यापुरिए चली; ओतय तँ—

सुन्दर अधमुँदल आँखि, हँसीसँ चटपटी मधुर गप्प, सटि बैसल भरल नितम्बबाली स्त्रीक संग कोमल आसन, आ स्नेह प्रकट करैत हाथक लचक—वेश्यापुरक शिष्टाचार जननिहार व्यक्ति, वेश्याक प्रेममेँ पड़ने बिना सेहो, ओतयक ई सभ रमणीय सुख प्राप्त कऽ लैत अछि।

[किछु देखि विट अपन स्त्रीसँ कहैत अछि] घरक द्वार बन्न कऽ लिअ। की कहलहुँ—‘तोहर घरमेँ बाम्बी जकाँ कतेको द्वार अछि!’ नगरक अधिकारीसभक आबए लेल बाट भिन्न अवश्य अछि, मुदा दोसरक घरमेँ घुसपैठ करबाक अभ्यासी भेलासँ ओसभ अपनहि द्वारकेँ लक्ष्य बना रहल अछि। प्रश्नोत्तर छोड़ू। हाय! विपत्ति तँ हमरहि माथपर अबैत देखाइत अछि। [घुमैत] कुसुमपुरक अनुपम कीर्ति समस्त पृथ्वीपर पसरल अछि। ताहि लेल केवल ‘नगर’ कहलासँ सामान्यतः एही नगरक बोध होइत अछि। एहि नगरमेँ अनेक उच्च-उच्च भवन अछि। बिकाउ वस्तुक प्रचुरता आ ओकरा लेल लोकक भीड़-भाड़सँ उत्पन्न नाना समृद्धि देखि लोक अचरज करैत अछि।

मुदा एहिमेँ अचरजक कोन बात? एहन समृद्ध नगर आओरो बहुत अछि। एकर जे असाधारण गुण अछि, से कहैत छी। जेना—

एतय दानी लोक बहुत छथि; कलाक आदर अछि; स्त्रीसभसँ लोक अनुकूल भावेँ मिलैत छथि; एतयक धनी मदमत्त होइतो ईर्ष्यारहित छथि; पुरुष विद्यासँ विनीत छथि; सभ लोक बातचीतमेँ शिष्ट, परस्पर गुणग्राही आ कृतज्ञ छथि। अपन स्वर्ग छोड़ि देवतासभ सेहो एतय पाटलिपुत्रमेँ सुखसँ रहि सकैत छथि।

[घुमैत]

अरे, ई निश्चय श्रेष्ठिपुत्र कृष्णिलक अछि, जे वेश्यापुरक संसर्गसँ अपन यौवन सफल कऽ हमर-जकाँ लोकक प्रियपात्र बनल अछि। कुटुम्बक सर्वनाशक भय सँ पिता एकरा यत्नपूर्वक रोकैत रहलाह, तथापि कोनो उपायसँ वेश्यापुर जा अपन प्रियाक उपभोगसँ देह सुन्दर बना ई वेगसँ एही दिस आबि रहल अछि। एकर अभिनन्दन अवश्य करबाक चाही। तेँ एकरा लग चली। [लग जा] अरे कृष्णिलक, एही तरहेँ अपन यौवनक पूरा आनन्द लैत रह। निश्चय तूँ माधवसेनाक घरसँ आबि रहल छह। की कहैत छह—‘अहाँ केना बुझलहुँ?’ एहिमेँ बुझबाक कोन बात? भगवान् कामदेव समान स्वभावक लोकक जोड़ी मिलबैत छथि। हम अहाँ लोकनिक काजसँ भिन्न थोड़े छी। अथवा, निरन्तर रतिक लेल तृषित कामिनीकेँ छोड़ि तूँ कतय जा रहल छह? की कहलह—‘ई सभ सेहो अहाँकेँ केना ज्ञात भेल?’ एहिमेँ कोनो पैघ सूक्ष्मता नहि अछि। केना—

तोहर हाथमेँ मुख पोंछलासँ आँखिक काजर लागल देखाइत अछि; चरणपर पड़लासँ माथक केश-विन्यास छिड़िआ ऊँच-नीच भऽ गेल अछि। बुझाइत अछि जे मोन ओकरहि लग राखि तूँ केवल देह छुड़ा अनलह। तेँ हवा थपेड़ासँ डगमगाइत जहाज जकाँ बड़ी कठिनाइ सँ बाट चलि रहल छह। की कहैत छह—‘आब हम पिताजीसँ अवश्य भेट करए चाहैत छी।’ की एहि वेशमेँ? ओ तँ तोरा पर टूटि पड़ताह। की कहैत छह—‘पिता हमरा एहि दशामेँ देखि लेलाह तँ सम्भव अछि अपन प्राणे त्यागि देथि।’ बेरोक रतिक तृष्णाबाली कामिनीकेँ तोहरासँ अलग करबाक लेल ओ की नहि करताह! पिता जवान लोकक लेल मूर्तिमान माथदुखि छथि। पिता जीवित रहला पर मनुष्यकेँ ओहन जुआक झलकियो नहि भेटैत अछि—

जाहिमेँ परस्पर ललकार आ डाँटसँ बाजीक रंग बढ़ैत अछि, गारि-गुफ्तारक समाँ बन्हैत अछि आ जे दिलेर पुरुषक परीक्षा लैत अछि। कमलक पाँखुरिबाली, आमक तेल मिलाओलासँ चित्ती पड़ल, कामिनीक श्वाससँ तरङ्ग उठैत मदिरा—मोरक नाचैत आकृतिबला प्यालामेँ भरल—तकर गन्हो ओ नहि पाबि सकैत अछि।

पक्षीयुद्धमेँ जखन गोष्ठी दू दलमेँ बाँटि अपन-अपन घेरा बना लैत अछि, गणिकासभ अपन मित्रक बगलमेँ सटि जाइत छथि, आ स्त्रीक संग रहलासँ बढ़ैत दाँवक कोनो चिन्ता नहि रहैत अछि, तखन एहन खेलक समय पिता बला मनुष्यकेँ खेलबाक तँ बाते की, मध्यस्थ बनबाको अवसर नहि भेटैत अछि। मातल हाथीक पछाँ दौड़ब—जखन ललनासभ खिड़कीसँ अपन भरल स्तन बाहर कऽ, उत्साहेँ अँगुरी नचा आदरसँ देखैत होथि—ई ओकरा लेल असम्भव अछि। जाँघिया पहिरि हाथमेँ नाङट तलवार लऽ, मित्रक बन्धन अर्थात् कारागार तोड़बाक वीरतापूर्ण तैयारीमेँ, जरैत मशालसँ पीयर भेल रातिमेँ राजमार्गपर धँसि पड़ब ओकर भाग्यमेँ नहि। उपकारक प्रतिदान देबाक भावसँ उन्मत्त भऽ, डीङ नहि हाँकि किछु कऽ देखेबाक साहस लऽ, केवल प्रत्युपकारक चर्चासँ दुःखी भऽ, मित्रक लेल सर्वस्व त्यागब ओकरासँ सम्भव नहि।

ई सभ तँ सहलो जा सकैत अछि। मुदा जेना दासीक बेटा होथि, एहन पितासभ स्वयं यौवनक आनन्द कखनहुँ नहि लेलनि, आ आब अपन धन-सम्पत्ति बचएबाक लेल वेश्यापुरीसँ अपन पुत्रकेँ अलग राखए चाहैत छथि। हुनका सभक लेल हमर मोन होइत अछि जेना कुठार लऽ क्षत्रियसभक संहार करनिहार परशुराम पृथ्वीकेँ क्षत्रियविहीन कएलनि, तहिना हमहुँ संसारकेँ पिताविहीन बना दी। अथवा, ई बूढ़सभ अपन यौवनमेँ भूखले रहि गेल। ई बेचारा सभ—

नहि जनैत अछि जे खिलल कमलसँ सुवासित जल जकाँ सुगन्धित आ अमृत जकाँ स्वादिष्ट वेश्याक मुखरस मरल मनुष्यकेँ सेहो जिआ सकैत अछि। आओर—

करधनीक झनकार, उघार भरल जाँघ, विश्वासपूर्वक चुम्बन, श्वाससँ थरथराइत आ हिलैत स्तनतट, भौँह सिकोड़े तिरछी दृष्टि, सीत्कारसँ विचित्र रोमाञ्च, आ बीच-बीचमेँ रोष—एहि सभसँ युक्त वेश्याक इच्छानुकूल रतिकेँ एहन के अछि जे मदमत्त भऽ कखनहुँ बिसरि सकत?

की कहैत छह—‘अहाँकेँ अपन दोसर कष्ट कहैत छी।’ से की? की कहैत छह—‘हमर पिता हमर विवाह करबाक निश्चय कऽ लेने छथि।’ धिक्कार अछि हमरा! अरे, एहन विपत्ति ककरो माथपर नहि पड़ए। हाय! हमरा ई बातो सुनए पड़ल। ई तँ हाथ उठा कानबाक बात भेल जे वेश्यापुरक चाकर राजपथ छोड़ि आब तूँ कुलवधूक साँकर गलीमेँ जाएबह। देख—

रतिक समय एकदम अन्हराइ जाएबाली, दीनमुखी, मुँहक भीतरहि बात दबा रखनेबाली, प्रसन्न मनुष्यकेँ सेहो दुःखी कऽ देनिहार, लज्जाक घोघसँ झाँपल, भोलेपनसँ स्वयं अपन जाँघो कखनहुँ नहि देखनिहार—एहन पशुतुल्य खूँटामेँ बान्हल भोली कुलवधूक सेवा-पूजामेँ मोन कदापि नहि लगेबाक चाही।

की कहलह—‘एहने हमर निश्चय अछि।’ जँ तोहर एहने निश्चय अछि तँ हमरा प्रसन्नता भेल। ई हमर सङ्गतिक अनुकूल अछि। आब जा। घर पहुँचला पर फेर तोरा बुझाएब। [घुमैत] भारी भीड़सँ भरल कुसुमपुरक ई राजमार्ग, छितराइत तरङ्ग-मण्डलबला समुद्र जकाँ, देखबामेँ भयङ्कर आ पार करबामेँ कठिन अछि। एतय—

जे हमरा देखैत अछि, से कतेको जल्दीमेँ रहओ, हमरासँ गप्प कएने बिना नहि जाइत अछि। भीड़-भाड़मेँ सेहो सभ लोक हँसैत-प्रसन्नतासँ हमरा बाट दैत अछि। काजमेँ बाधा पड़बाक भय सँ केओ हमरा बेसी काल नहि रोकैत अछि। एतयक लोकक व्यवहारकुशलता देखि हम बुझि सकैत छी जे एहि श्रेष्ठ नगरक यश कतेक स्थायी अछि।

[घुमैत] अरे, विटक बुद्धि जकाँ ई वेश्यापुर दिस जाएबाली गली अछि। एही बाटेँ चली—

एतय हम मारामारी कएने छी, एतय वेश्याकेँ उठा लऽ गेल छी, एतय भय सँ आँखि मुनि भागल छी—उठैत यौवनमेँ एतय जे आनन्द भोगलहुँ, से स्मरण कऽ उत्कण्ठासँ वेश्यापुर जा रहल छी। [घुमैत] वाह, प्राण घुरि आयल! हम वेश्यापुर पहुँचि गेलहुँ। [छन्दक अनुकरण करैत]—

अधमुँदल दृष्टि आ लहराइत लटबाली वेश्याक मुखक सेवन कए, माला आ आसवक गन्हसँ भरल ई हवा बहि आबि रहल अछि, मानो वेश्यापुरक श्वासवायु हो।

अहा! कैलास-शिखर जकाँ उच्च शिखरबला महल, वेश्याक स्तनतटसँ रगड़ाइत खिड़की, अगरु आ धूपक धुआँसँ वर्षामेघ-जकाँ बनल भवन, पुष्पोपहारसँ हँसैत पार्श्वद्वार, करधनीक झनकारसँ कामीजनमेँ उत्कण्ठा जगबैत आ नूपुरक रुनझुनसँ मानो गद्गद स्वरमेँ बाजैत—कामदेवक कार्यालयरूपी एहि वेश्यापुरक अपूर्व शोभा अछि। एतय बाँकी चितवन चलएबाक लेल तत्पर, खिलल हँसीसँ खुलल दन्तपङ्क्तिबाली, भौँह नचा बात सजाबएबाली, पीन स्तनपर एतय-ओतय लहराइत छोट चादरबाली, हड़बड़ीमेँ चादर उघड़ि गेलासँ इठलाइत, सुन्दर आ चपल गतिबाली परिचारिकासभ कामक विजयपताका जकाँ एतय-ओतय आबि-जा रहल छथि। सदिखन हँसीसँ सुशोभित मुखबाली, विस्मयरहित भऽ विस्मित आँखिबाली, स्निग्ध-सुकुमार, घुँघरायल, महीन, लम्बा आ कारी केशबाली, नितम्बक भारसँ मन्द गति, मातल हाथी जकाँ चालबाली, सुरतरूपी जलसँ पियास मेटाबएबाली प्याउ जकाँ एतय-ओतय ठमकि रहल नवयौवना गणिकादारिकासभ नखरा करैत विशेष रूपेँ देखाइत छथि।

आओर, निरन्तर बजैत मृदङ्गक ध्वनि आ घबरायल कपोत-युगलसँ भरल प्रासाद-पङ्क्ति मानो गाजि रहल अछि। प्रसिद्ध शिल्पीक भीड़सँ सुशोभित, प्रतिष्ठित सेवकसभ द्वारा फेकल पुष्पोपहारसँ भरल गृहद्वार एक-दोसरासँ होड़ कऽ रहल अछि। रतियुद्धक थाकनि मेटए लेल सुगन्धित तेल सजाओल जा रहल अछि। पीन स्तनपर लगाओल जाएबला उबटन पीसल जा रहल अछि। मनस्विनी लोकक हृदय जकाँ सुकुमार माला लेल जा रहल अछि। प्रियाक वचन जकाँ कानकेँ सुख देनिहार वीणाक झनकार सुनाइत अछि। प्रियजनक अधरपानक चखना चाखबाक अभिलाषिणी मदिरा चलि रहल अछि।

अधखुलल आँखि, बहानासँ उघारल स्तनतट, लजायल हँसी, कानकेँ सुख देनिहार बातक चुटकी, मन्द श्वास आ स्वभावतः मधुर तालबला गीतसँ वेश्यासभ कामदेवकेँ सदिखन धनुष चढ़ौने रहबाक लेल बाध्य करैत छथि।

[घुमैत] अरे, निश्चय ई मदनसेनाक परिचारिका वारुणिका अछि—यौवन-मदसँ स्तनपट्टक परवाह नहि करैत, झीना मलमलक वस्त्र पहिरने, जघनाभरण वा मेखलाकेँ नीवी बनौने, नखरासँ एक कानक गहना उतारने; भयभीत मृगछौना जकाँ चञ्चल आँखि, खूब भोगल फुलल ओंठ, मुनिक मोन सेहो कम्पित करए समर्थ, सहज हँसोड़ मुख। बामा हाथक अँगुरीकेँ कैंचीक रूप दऽ कर्णोत्पल छूबैत, कनेक एक भौँह तानि, हमरा देखि हँसैत ई आगाँ बढ़ि रहल अछि।

एहि विशाल-जघनबालीक कपोलपर रोमाञ्च उठि आयल अछि, मानो कर्णोत्पल चुपचाप चुम्बनक चोट कऽ देलक हो। एकर की साहस जे हमरासँ गप्प कएने बिना चलि जाए? एकरासँ बात करी। हे प्रिय वारुणिका, कनेक ठहरू; हमर बात व्यर्थ कऽ किएक चलले जा रहल छह? सुन्दरि, तोहर उपेक्षासँ सेहो हम प्रसन्न छी। हँसि किएक ठाढ़ भऽ गेलह? [लग पहुँचि] हाथ नहि जोड़। हम पूछि सकैत छी—हे क्षीण-कटि, तोहर एहि स्तनक प्रथम सुख के लेलनि? केवल ‘हँ’ कहि, लजाइत हमर दिस देखि, आधा बात कहि एतेक जल्दी किएक भागि रहल छह? ई सभ कामक चमत्कार अछि। [घुमैत] अरे, अपन घरक द्वारपर बैसल बन्धुमतिका बगलमेँ बैसल चतुरिकासँ गप्प करैत, भौँहपरसँ केश हटा, साँझक कमल जकाँ अलसायल आँखि बनाए, स्वयं अपन मेखला पिरो रहल अछि। अहा, यौवनक अनुरूपेँ काज! अहा, कतेक सुकुमार कार्य उठा लेने अछि! एकर एकाग्रता कतेक लोभनीय! मेखला सँजोएबाक ई प्रयत्न एकर देहक कसावट प्रकट कऽ रहल अछि। गर्वसँ रशनादाम सँजैत ई की नहि कहि देलक? विहारकालमेँ एकर चतुरता अवश्य पूजनीय अछि। एकरा लग जेबाक चाही। [पहुँचि] प्रिय, तोहर काज सिद्ध हो। हमर लेल आसन नहि चाही। हम तोहरासँ किछु पूछए चाहैत छी।

हे मानिनी, तोहर ई मेखला केना टूटि गेल? ई कामीजनक अँगुरीक प्रिय सखी अछि; नाभिरूपी सरोवरसँ बहैत उज्जर जलधारा अछि; नीला रेशमी वस्त्ररूपी मेघक छोरपर चमकैत बिजुरी अछि; पुरुषरूपी मल्लक संग व्यायाम अर्थात् पुरुषायित रतिक जननी अछि; कामदेवक धनुषक प्रत्यञ्चा अछि; क्षुद्र घण्टिकायुक्त नितम्बक ललित वाणी अछि; आ बेर-बेर प्राप्त रतिसुखक गणनाकर अक्षमाला मानो अछि।

अथवा, एहिमेँ जानबाक कोन बात?

हे ललछौँह आँखिबाली, शय्यापर विश्वासपूर्वक प्रियतम जेकर अंशुक हटा लेने छथि, जेकरा प्रेमसँ देखलनि, जे मातल हाथीक मस्तक आ देहक वप्रलीला जकाँ फैलल अछि—स्पर्श लेल व्याकुल आ हाथी-जकाँ गतिबला तोहर ओ जघनभागकेँ ई टूटल करधनी, तार टूटल वीणा जकाँ, बेरस बना देने होयत।

माथ नुका किएक बैसि गेलह? उत्तर किएक नहि दैत छह? हम जाइत छी।

की कहैत छह—‘नहि जेबाक चाही।’ तँ लिअ, मन्त्रसँ कीलल साँप जकाँ हम रुकि गेलहुँ। की, चली? लिअ, हम चललहुँ। [घुमैत आ कान दैत] अरे, रामदासीक घरमेँ स्त्रीक कानब जकाँ स्वर सुनाइत अछि। एकर अनेक कारण भऽ सकैत अछि। तखन ई कोन कारणसँ कानि रहल अछि?

रोषसँ कानबाक स्वर तीव्र, दीनतासँ कोमल, प्रणयसँ रुकि-रुकि, भय सँ बेरस आ हर्षसँ गद्गद होइत अछि। बुझाइत अछि ई प्रणयिनी क्रोध आ दीनता दुनूसँ भरल अछि, कारण आरम्भमेँ गला फाड़ि कऽ आ फेर रुकि-रुकि धीरे-धीरे कानैत अछि। हमर मोन कहैत अछि जे ई रामदासिए अछि।

तखन भीतर चली। [प्रवेश कऽ] ओही अछि। हमरा देखि ई आओर जोर सँ कानए लागल।

आँखिक कोरसँ रोषक ढेरी जकाँ खसैत एकर नोरक बूँद मानो प्रियक अपराधक गिनती कऽ रहल अछि। [लग जा] मानिनि, की बात अछि?—

ओ नोर पहिने नव कमलक शोभा हरएबला आँखिमेँ भरि, फेर अधरपर खसैत अछि; ओतयसँ सरकि कठोर स्तनतटपर अबैत अछि; मुदा ओतहु ठाम नहि पाबि, शोकसँ आगाँ बहैत, रोमावलीमेँ बिथुरैत, अन्ततः ओहि गहिर नाभिमेँ भरि जाइत अछि जाहिमेँ प्रियतम कखनो-कखनो अँगुरीक अग्रभाग घुसा आनन्द लैत छथि। कुञ्जरक अपन योग्य व्यवहार नहि केलक। की कहैत छह—‘दोसर युवतीक दाँतसँ चिह्नित ओंठ लेने ओ हमर लग आयल। हम उलाहना देलियैक तँ रूठबाक बहाना कऽ निकलि गेल, आ बहुत दिन बीति गेलो पर आइ धरि नहि आयल।’ हँ, हँ, हँ! वाह रे अपराधक ढेरी! एकहि अपराधसँ मनुष्य घरसँ निकालल जाए योग्य कठोर दण्डक भागी भऽ जाइत अछि, तखन एहि सभक जमघटक की कहब! तथापि मेघसँ घेरल बरसाती समय देखि हम ओहि दुष्टक अकड़ सहि रहल छी; कारण एहि समय आपसमेँ वैर राखनिहार राजो कलह छोड़ि दैत छथि, तखन शिरीष-पुष्प जकाँ कोमल-चित्त कामिनीक की बात! जँ हमर बात मानह तँ समयक विचार कऽ आइए अपन प्रियक लग अभिसार कर।

लटकैत मेघ जाहि महलक शिखर छूबि रहल हो, तकर ऊपरी भागसँ रातिमेँ नीचाँ उतरि ओहि बाटमेँ प्रवेश करिह, जतय महलक पनालीसँ बहैत पानिक छरछर ध्वनि गूँजैत हो। फेर अपन प्रियतम लग पहुँचि, बरखाक शीतल हवासँ काँपैत, ओहि कान्तकेँ आलिङ्गन करिह; हुनक मुखक चुम्बन लऽ जखन अपन ओंठक शीत मेटा लेबह, तखन रतिक बीच स्पष्ट स्वरमेँ हुनकासँ अपन बात कहिह।

तँ, रोमाञ्चित कपोल हमर बातक स्वीकृतिक सूचना केना दऽ रहल अछि? आब हम चललहुँ। [घुमैत] अरे, ई रतिसेना अछि। गर्भगृहमेँ रहबाक कारण पसेनासँ भरल, आध-मुँदल सुन्दर आँखि घुमबैत, गालपर पसरल केशबला मुखपर कनेक मदक आभा लेने ई एखने जागल अछि। खिड़की खोलि हवा खा रहल अछि। एकर ई दशा बड्ड सुहावन अछि। एकरासँ गप्प करी। [लग जा] प्रिय, सौभाग्यवती हो। अवशिष्ट मदक एहि अवस्थामेँ तूँ साँझक ललाई धारण कएने पश्चिम दिशा जकाँ सुहावन लगैत छह। धनुष उतारि चुकल कामदेवो तोरा देखि फेर व्याकुल भऽ जाएत, दोसरक की कहब!

तोहर चेतना नष्ट नहि भेल अछि; वाणीमेँ ओही कोमलता अछि; कमलरूपी आँखिक ललाई नहि गेल अछि; लज्जा सेहो दूर नहि भेल अछि; बीतल बात स्मरण पड़ला पर एखनो तोहर मुख हर्षसँ भरि जाइत अछि—एहि प्रकार मद अपन दोष छोड़ि तोहरामेँ गुण बनि ठहरल अछि। रतिसेना, तूँ हमरा टारए चाहह, मुदा हम तोहरासँ आरम्भ कएल बात अधूरा नहि छोड़ए चाहैत छी।

अरे, हँसि खिड़की किएक बन्न कऽ लेलह? लिअ, हमरा विदा कऽ देलह।

[घुमैत] एना ठकल गेलापर हम अवश्य कनेक अनमनायल छी। अरे, ई प्रयुम्नदासी अछि। एकर कपोल सुरतसँ मुरझायल अछि; आँखि फाड़ि देखैत अछि; विशेष तिलकसँ ललाट पीयर भऽ गेल अछि; छिड़िआयल लट शोभा दऽ रहल अछि; मुखपर मानो रतिक थाकनि भरल अछि। झीना अंशुकक भीतरसँ झाँकैत जघनपर नव नखक्षत एना देखाइत अछि, मानो निर्मल जलमेँ खिलल अशोकपुष्पक छाया हो। सुरतक रगड़सँ एकर शृङ्गार मेटा गेल अछि, जेना युद्धक अन्तमेँ हथिनीक सजावट अस्त-व्यस्त भऽ गेल हो। जेना आँधीक दीपकेँ झँझरीसँ झाँपल जाइत अछि, तहिना ई हाथसँ ओंठ झाँपने अछि। टहलाओल बछेड़ी जकाँ चहलकदमी करैत ई वेशमार्गक शोभा बढ़ा रहल अछि। हमरा ई रुचैत अछि। एकरासँ किछु परिहास करी।

[लग जा] प्रिय, प्रियतमक दाँतसँ काटल ओंठक सुन्दर रूपकेँ घायल योद्धाक सुन्दर देह जकाँ व्यर्थ किएक नुकबैत छह? ई किएक हँसल? अहा, हमर चुटकी एकर भूलक उपहास बना देलक। मुदा मन्द हँसीसँ सेहो एकर दन्तक्षतक शोभा बढ़ि गेल। केना—

सीत्कार कएलासँ एकर स्तन ऊपर थरथरा उठल; स्तनक किनार ऊपर उठलासँ उदर आओर भीतर धँसि गेल; भौँह तानलासँ चितवन बाँकी भऽ गेल; दन्तक्षतक पीड़ासँ कमलरूपी हाथक अँगुरी ओकरा सहलएबाक लेल चञ्चल भऽ उठल। जँ एहि प्रकार स्त्री हँसि दोसरक हृदय चञ्चल कऽ सकैत अछि, तँ दन्तक्षतपीड़ित अधरबला मुख धारण करनिहार कामिनीकेँ अवश्य हँसबाक चाही।

की कहैत छह—‘बहुत दिनक बाद अहाँ देखाइ देलहुँ।’ एहि बरखाक पाप हमरा घरेमेँ बान्हि रखने छल। आब कह, ककरापर रीझल छह? की कहलह—‘रामिलकक घरसँ आबि रहल छी।’ समान स्वभावक ई जोड़ी बनल रहए। वाह, रामिलक एकसरे कामदेवक करमुक्त अग्रहार पाबि लेलक। कतय—

हे कृशोदरी, ओकर यौवन आ विस्तृत हँसी सफल अछि, जे तोहर अर्धचन्द्राकार दन्तक्षतक शोभासँ युक्त मुखक पान अर्धचन्द्राकृति चषक जकाँ करैत अछि।

प्रिय, दुष्ट पक्षीसँ अपन अधरक रक्षा करिह। जा, हमहुँ चललहुँ। [घुमैत] अरे, एतय धूर्त विश्वलक आ सुनन्दा बटोहीक भय सँ कुम्भकर्णक मुख जकाँ अपन घरक द्वार सदिखन बन्न कऽ रहैत अछि। विश्वलक अपन सर्वस्व खा-पी, नग्न श्रमणक जकाँ केवल देह बचौने, गणिकाप्रिय भेलासँ धन नहि रहितो सुनन्दाकेँ नहि छोड़ैत अछि—जेना कौआ गामक सीमान नहि छोड़ैत अछि। सुनन्दो यौवन बीति गेलासँ दोसरक लेल अनचाही, वनक सुखायल नदी जकाँ, विश्वलकक पछाँ लागल रहैत अछि। एहि जोड़ीसँ गप्प कएने बिना जेब उचित नहि।

तेँ जोर सँ पुकारबाक चाही—एतय के रहैत अछि? [कान दैत]

अरे, दौड़ैत घोड़ाक टाप जकाँ पएर रखैत खड़ाउँक धमक सुनाइत अछि। तखन विश्वलक आयल होयत। हँ, ओही चिचिया रहल अछि। अरे, की कहैत छह—‘के गदहा जकाँ रेंकि रहल अछि?’ अरे, हम सुनन्दाक लेल आयल यमदूत छी। हमर आवाज चिन्हि किएक चुप भऽ गेलह? अरे, द्वार किएक नहि खोलैत छह? तोँ अपनाकेँ सम्हार। हम ई शापजल छोड़ैत छी।

कलह भेलापर लीलासँ उठल आ नूपुरक झनकारसँ मुखर विलासिनीक बामा पएर तोहर माथकेँ कखनहुँ प्राप्त नहि होअए। द्वार खुलि गेल। तखन भीतर चली। [प्रवेश कऽ] की कहलह—‘की हम अहाँक प्रिय नहि छी? एहन शाप देब उचित अछि?’ ठीक कहलह। एहन शाप ब्रह्मलोककेँ सेहो कम्पित कऽ दैत अछि, तखन तोहर की बात! एहि शापक प्रतिकार लेल ई प्रायश्चित्त अछि। की—

खिलल नव कमलाकार तिलकबाली आ ठमकि चललासँ चञ्चल गतिबाली अपन हृदय-कुटुम्बिनीकेँ तूँ एहन मदिरा पिआ, जाहिमेँ नव विकसित कमल-पात तरैत हो, तिलक चखनाक संग स्वाद भेटैत हो, आ हड़बड़ीमेँ ढारलासँ चञ्चल तरङ्ग उठैत हो।

तँ कनेक बैसू। [बैसि] अरे, पएर धुअब भऽ गेल। कुसुमपुरक राजमार्ग स्वच्छतामेँ महलक छतसँ बढ़ि कऽ अछि। हमर पएरक व्यर्थ लाड़ नहि कर। की कहलह—‘रामिलकक गोष्ठीमेँ विष्णुदास आदि सदस्यसभक परस्पर रोचक बहसक बीच कामतन्त्र सम्बन्धी किछु शङ्का उठल। जखन ओसभ ठीक समाधान नहि कऽ सकल, तँ हमर मत सुनएबाक आग्रह केलक। हमहुँ अपन मत कहलियैक। ओही बात भाव देविलककेँ सेहो सुनए चाहैत छी। फेर अहाँ जे कहब, से प्रमाण मानल जाएत। अपन बात कहबाक लेल अहाँक घर जेबाक इच्छा छल, मुदा अहाँ स्वयं दर्शन देबाक कृपा कएलहुँ। अहाँकेँ समय हो—

तँ कही। आज्ञा दिअ। हम सावधान छी; सामर्थ्य भरि उत्तर देब। दुलारसँ बिगड़ल बच्चा जकाँ हवा एहि कुटीकेँ नहि छोड़ि रहल अछि, तेँ बेसी काल नहि बैसि सकब। जँ तोरा पसन्द हो तँ चलैत-चलैत गप्प करब। गोष्ठीशाला पर्याप्त लम्बा-चाकर अछि। की कहैत छह—‘एहिमेँ कोनो बाधा नहि।’ [उठि] आब कह। की कहैत छह—‘जँ वेश्याक पुरुषसँ सम्बन्ध केवल धनक लेल होइत अछि, तँ ओकरामेँ उत्तम, मध्यम आ अधमक भेद केना जानल जाए?’ अरे, दान—

अरे, दान तँ संसारमेँ सभकेँ वश करैत अछि, विशेषतः वेश्याकेँ। तथापि हुनकामेँ भेद होइत अछि, जेना ऊँच-नीच बुझनिहार लोक कहैत छथि—

अधम वेशयुवती दानसँ प्रेम करैत अछि, अथवा बिनु कारणो प्रेम करैत अछि। मध्यमा भरल यौवन आ रूप देखि, वा दानसँ प्रसन्न होइत अछि। मुदा उत्तमा नारी दानी, निःस्पृह, युवा, रूपवान्, अनुकूल आ सुसज्जित पुरुषक सेवा करैत अछि।

की कहैत छह—‘कामातुर वेश्या केना चिन्हल जा सकैत अछि?’ कहैत छी—

सुन—सुन्दर अधखुलल चितवन, मुखक शोभा बढ़बैत हँसैत दृष्टि, भौँह, सङ्केत आ भावभङ्गिमासँ भरल छोट-छोट बात, बीच-बीचमेँ ताली पीटि बाजब, प्रकट होइतहि विलीन भऽ जाएबाली मुस्की, नाभि, बगल आ स्तन उघारब, मेखलाकेँ बेर-बेर छूब, आ हाँफैत कठिनाइ सँ श्वास लेब—ई सभ लक्षण कामबाणसँ पीड़ित कामिनीक सूचना दैत अछि।

की कहैत छह—‘वेश्याजन धोखा देबाक लेल वा अभिनय-कौशलसँ बहुत कामचिह्न देखबैत छथि; ताहिपर विश्वास केना कएल जाए? सच्ची कामवती केना चिन्हल जाए?’ सुन—

नोरसँ भरल निःश्वास, स्नेहसिक्त दृष्टि, कृशता, पसेनाक बूँद, धन नष्ट भऽ गेलो पर प्रार्थना—एहि सभसँ प्रेममयी कामिनीक भावशुद्धि बुझल जाइत अछि। [घुमैत] की कहैत छह—‘प्रथम समागम कोन कारणसँ हिचक उत्पन्न करैत अछि?’ सुन, प्रथम समागम कामिनीक लेल झिझकसँ भरल होइत अछि। ओहि समय अनुभवी धूर्तो गड़बड़ा जाइत अछि। आओर—

पहिने तँ बातक सूत्र जोड़बे कठिन अछि। बात आरम्भ भऽ गेल—

तँ उत्तर पाब कठिन अछि। मेलजोलसँ बहुत गप्प होअए लागल तँ परस्पर विश्वास होयब कठिन अछि। विश्वास भेलापर मोनमाफिक रति पाब कठिन अछि। आ सम्यक् रति भेटलो पर वेश्या प्रेम करत वा नहि—ई अनिश्चिते अछि।

राजाक समक्ष, विद्वानक सभामेँ आ युवतीक संग प्रथम समागममेँ हृदय भय सँ घबरा जाइत अछि, आ तेजस्वी वाक्शक्तियो लड़खड़ा जाइत अछि।

की कहैत छह—‘कोनो गुण नहि रहितो केवल देखलासँ प्रेम किएक भऽ जाइत अछि? झंझट करनिहार स्त्रीक संग कोन व्यवहार करबाक चाही?’ प्रत्यक्ष तथ्यक कारणपर विवाद करब निरर्थक अछि। कामक क्षेत्रमेँ ई पैघ सुविधा अछि जे निर्गुण होइतो जकरासँ प्रेम भऽ जाए, ताहिमेँ जे उपेक्षा करएबाली हो ओकरा तुरन्त छोड़ल जा सकैत अछि। कारण—

प्रिय-विरहक दुःख सात्त्विक प्रियतमक हो तँ सहलो जाइत अछि; मुदा प्रियजनक अनादरसँ टूटल हृदय फेर नहि जुड़ैत अछि।

की कहलह—‘स्त्री पुरुषकेँ चाहैत हो, मुदा पुरुष ओकर बेसी परवाह नहि करैत हो, तँ की एहन स्त्रीकेँ छोड़ि देबाक चाही?’ नहि, नहि, नहि। दोसर स्त्रीक प्रेमक रक्षा करैत आ अपन दाक्षिण्य सम्हारैत, ओकरा प्रति सेहो बीच-बीचमेँ प्रेमभाव देखेबाक चाही। केना—जे पुरुष गुणवती, यौवनवती आ प्रणयिनी स्त्रीक अनादर करैत छथि, हुनका किसानक गारिसँ जरल बरद जकाँ भारी फालबला हरमेँ जोति देबाक चाही।

[घुमैत] की कहैत छह—‘जकरा स्त्रीक प्रति सचमुच अपराध भऽ गेल हो, से ओकरा केना मनाओत?’ एहि विषयमेँ सन्देह उचिते अछि। विषम ज्वर जकाँ प्रणयिनीक रोषक उपचार कठिन अछि, तथापि ओकर क्रोध हटेबाक चाही। आइकाल्हिक युवकसभ पएर पड़बकेँ एकर औषध मानैत अछि; मुदा हम एकरा बहुत उत्तम नहि मानैत छी। जखन कठोर, सिकुड़ल पुरान कंकड़-जकाँ आकृतिबला, खड़ाउँक घर्षणसँ कड़ा आ पुरान घीक मालिशसँ गन्हाइत वृद्ध श्रोत्रियक पएरो छूएल जाइत अछि, तखन पल्लव जकाँ सुकुमार कामिनीक पएर पड़बामेँ कोन वीरता? मुदा एहू उपायमेँ दोष अछि।

पएर पकड़लासँ नोर बहत; प्रेमिकाक नोर बहलापर दीनता उपजत; आ दीनता उपजलापर काम कतय रहत? दोसर लोक कहैत अछि—‘सौगन्ध दिआ मनएबाक चाही।’ एहूसँ मेल नहि होइत अछि। कुलवधुओ कामीक शपथपर विश्वास नहि करैत अछि, तखन वेश्याक की बात! जँ विश्वासे कऽ लेलक तँ ओकरा मनएबाक आवश्यकता की? कहल गेल अछि—गाममेँ निवास, श्रोत्रियक उपदेश, परतन्त्रता, कृपणता आ भोली-भाली नारी—ई सभ पुरुषक कामभावक अन्त कऽ दैत अछि।

किछु लोक कहैत अछि—‘कोनो उपायसँ ओकरा हँसा देबाक चाही। हँसीसँ ओकर धैर्यक गहिराइ बुझि गेलापर नदी जकाँ ओकरा सहज पार कएल जा सकत।’ हमर कहब अछि—एना भऽ गेलो पर प्रियाक रूठि मान करबाक आनन्द नहि भेटत। केना—

लटकैत महीन वस्त्रकेँ कनेक खिंचि, अधरोष्ठ नचा, ओहि समय नीक लगएबाली कटु बात मधुर ढङ्गसँ सुना, नव कमल जकाँ कोमल बामा पएर जखन प्रियतमा माथपर राखैत अछि, तखन धूर्त लोक ओकरा रतिकलहक फल आ यौवनक स्वादिष्ट अर्घ्य मानैत अछि। तेँ हँसी-परिहासक प्रयोगसँ सेहो स्त्रीक क्रोध हटेबाक चाही। बड्ड ठीक। स्त्रीक रोष हटेबाक उपाय सोचलापर हमरा बुझाइत अछि जे बलपूर्वक लेल चुम्बन तुरन्त फल देनिहार अछि। केना—

बामा हाथसँ तीव्र धूपगन्धसँ सुवासित केश पकड़ि, ओकर दुनू हाथ अपन दहिना हाथमेँ किछु काल रोकि, प्रियाक चन्द्रमुखक पान कएलासँ जे हर्ष उत्पन्न होइत अछि, ताहिसँ तृप्त कामी पुरुष वृद्धावस्थामेँ सेहो क्षीण नहि होइत अछि।

की कहैत छह—‘जे असावधानीसँ प्रियाक समक्ष भूलवश दोसर स्त्रीक नाम लऽ लैत अछि, ओकर की उपचार अहाँ बतबैत छी?’ कामीक लेल दोसर स्त्रीक नाम लऽ लेब पैघ विपत्ति अछि। सर्पदंश जकाँ एकर उपचार कठिन अछि। एक क्षण ध्यान करए दिअ। [सोचि] ठीक, बुझि गेलहुँ—

ढिठाइ सँ समूची बातकेँ उज्जर झूठ कहि मुकरि जाएब; वा भयभीत जकाँ स्तब्ध भऽ जाएब; वा स्त्रीक प्रशंसाक पुल बान्हि देब; वा बातकेँ हँसी-परिहासमेँ उड़ा देब; वा चर्चा दोसर दिस मोड़ि ओहिसँ फेर नव विषय निकालि देब; अथवा एक नामक संग अनेक नाम लऽ देब—ई सभ भूलसँ नाम लऽ लेबाक रोगक उपचार अछि।

की कहैत छह—‘नखक्षत आ दन्तक्षत पीड़ा दैतहुँ आनन्द किएक दैत अछि?’ हा, हा, हा! बड्ड भोला प्रश्न पुछलह। देख, नखक्षत आ दन्तक्षत पीड़ादायक होइतो प्रेमीजनमेँ सुख उत्पन्न करैत अछि। केना—

जेना सारथि चाबुकसँ चलबैत अछि तँ घोड़ामेँ वेग अबैत अछि, तहिना रतिक समय दन्तक्षत आ नखक्षत दुनू हृदयकेँ एकरस बना दैत अछि। [घुमैत] की कहैत छह—‘वेश्या विरक्त अछि वा अनुरक्त, एकर चेष्टासँ केना बुझल जाए?’ अरे, एहिमेँ सन्देहक कोन बात? एहि विषयमेँ ई उपदेश अछि।

अनुरक्त स्त्रीसँ प्रेमक याचना कएल जा सकैत अछि। जेना कहल गेल अछि—महात्मा लोकनि सेहो अपन आकार नहि नुकाबि सकैत छथि; तखन कोमल हृदयबाली अनुभवहीन स्त्रीक की बात! हुनक भाव-भङ्गिमापर बेसी ध्यान देबाक चाही। की कहैत छह—‘केना?’

जे व्यर्थ ठहाका मारि हँसैत अछि, बिना कारण बाजैत अछि, वेगसँ उठि जाइत अछि, कहलापर नहि बुझैत अछि, स्त्रीसुलभ बाँकपन नहि देखबैत अछि, गाढ़ आलिङ्गन कऽ झट छोड़ि दैत अछि, आ पुरुष रतिमेँ प्रवृत्त भेलापर अस्थिरता देखबैत अछि—एहन स्त्री रागक अन्तमेँ कतेको चतुरता देखाओ, ओ बाँझ लता जकाँ अछि जाहिमेँ फूल तँ लगैत अछि, फल नहि।

की कहैत छह—‘विराग उत्पन्न भऽ जाए तँ की ओकर उपाय सम्भव अछि, वा प्रतिकार होइते नहि?’ सुन। प्रेम दू प्रकारसँ उत्पन्न होइत अछि—सकारण आ अकारण। कारणसँ उत्पन्न प्रेम कारणे सँ विरागमेँ परिणत होइत अछि; आ अकारण प्रेम अकारणे विरागमेँ बदलि सकैत अछि। एहि राग-विरागक कठिनाइमेँ की उपचार करबाक चाही? प्रेम शिथिल भेलापर जे उपाय उचित अछि, से कहैत छी—

दोसर स्त्रीक सेवन; कोनो कारणसँ रतिक भङ्ग; धीरता अर्थात् काममेँ पहिने बढ़ब, वा कलह; रतिक समय टालमटोल; संग बैसब; गप्पमेँ निपुणता; ओकर बन्धुजनक पूजा वा स्तुति; वेश्याक बहानासँ प्रवास; महानगरमेँ जेब; प्राण-जोखिमबला साहसिक कार्य; आ दान—ई सभ स्त्रीक शिथिल रागकेँ फेर उभाड़ि दैत अछि।

आओर सुन—

बाला बालसुलभ व्यवहारसँ, धनलोभी दानसँ, चतुर स्त्री चतुराईसँ, क्रोधिनी सान्त्वनासँ, गर्विनी सेवासँ आ अनुकूल स्त्री अनुकूलतासँ वशमेँ अबैत अछि। जेकाँ स्त्री हो, ओकर संग तहिना व्यवहार करबाक चाही। [घुमैत] की कहैत छह—

‘जे एक दिस कामचिह्न देखबैत अछि, मुदा बात नहि करैत अछि, “बस-बस” कहि लग नहि अबैत अछि आ ठीक समयपर हटि जाइत अछि—ओकरा केना वशमेँ कएल जाए?’

ठीक कहलह। पहिने कामीकेँ स्त्रीक स्वभाव जानबाक चाही। सम्भव अछि, एहनहि ओकर प्रकृति हो। मुदा जे गर्विनी अछि, से जीवन भरि उपाय बिना वशमेँ नहि आबि सकैत अछि। स्त्रीक रहस्य खोलैत छी।

जेना हाथी लताकेँ मर्दित करैत अछि, तहिना एकान्तमेँ स्त्रीकेँ पाबि जे ओकरा लऽ जाइत अछि; वा ओकरा मदमत्त बुझि मधुर वचनसँ ओकरापर अधिकार कऽ लैत अछि; वा नाना जाल पसारि ओकरा ठकि लैत अछि; अथवा अपन मनक बात नुका लैत अछि—ओकर ई चेष्टासभ निष्फल नहि होइत अछि, कारण स्त्रीसभ आँधी-जकाँ चालबाली होइत छथि। [घुमैत] की कहैत छह—

‘क्रोध शान्त भेलापर, प्रथम भेटमेँ, प्रवासपर जाइत समय आ फेर घुरलापर—एहि चार सुरतकेँ कामुक लोक मानैत छथि। अहाँ एहिमेँ ककरा सर्वाधिक महत्त्व दैत छी?’ हमर मत अछि जे प्रथम समागमक रति, स्त्रीक विश्वासक गहिराइ बुझने बिना, अगाध पोखरि जकाँ जोखिमसँ भरल अछि। प्रवासपर जाइत समयक सङ्ग सेहो हमरा—

रुचिकर नहि, कारण तखन शोकसँ अभिभूत कामिनीक राग कम भऽ जाइत अछि; आँखिमेँ नोर भरि अबैत अछि, हृदय उद्वेगसँ भरल रहैत अछि, तेँ सुरत बेरस आ करुण होइत अछि—मानो चन्द्रमाकेँ ग्रहण लागल हो। प्रवाससँ घुरलापर रति, प्रिया शृङ्गारहीन रहबासँ आ लज्जाक कारण राग कनेक कम प्रकट करबासँ, बरखाक महफिल जकाँ होइत अछि। मुदा मान-मनौवलक बादक सुरत देवता आ असुर द्वारा घुमाओल मन्दराचल-मथानीसँ क्षुब्ध, अनेक औषधिक रससँ ओजस्वी समुद्रक भीतरसँ निचोड़ल अमृतरसायनोसँ श्रेष्ठ होइत अछि, आ आयु तथा शक्तिकेँ स्थिर करैत अछि।

क्रोध शान्त भऽ गेलो पर हृदयसँ ओही भाव नहि छोड़निहार स्त्रीक संग सुरत, वेगसँ कएल नखक्षत आ दन्तक्षतसँ अत्यन्त प्रचण्ड होइत अछि। [घुमैत] की कहैत छह—‘वेश्याद्वारा ठकल मनुष्यपर धूर्त लोक हँसैत अछि। कामुक वेश्याक ठगीसँ केना बचत?’ अरे, वेश्या आ लिपिक—दुनू छिद्र देखि प्रहार करबामेँ समान अछि। लिपिक सेहो वेश्या जकाँ मुट्ठी गरम करबैत अछि, मुदा किछु काल चैनसँ बैसए दैत अछि; वेश्या वातरोग जकाँ बहुत खर्च करबैत अछि आ चैनसँ बैसहूँ नहि दैत अछि। जे हमर जकाँ चाल चलए जानैत हो, ओकरे वेश्यापुरमेँ पएर रखबाक चाही। हम—

ढलल यौवनबाली स्त्रीपर विश्वास नहि कएलहुँ; बालाकेँ खूब परखि तखन संग रहलहुँ; मायक अधीन रहनिहार वेश्याद्वारा मगरमच्छसँ भरल नदी जकाँ दूरहि रहलहुँ; अपमानित भेलापर क्रोध नहि कएलहुँ, आ प्रार्थना कएलापर आदरक अभिमानो नहि मानलहुँ; वेश्यापुरमेँ बूढ़ भऽ गेलहुँ, मुदा कनेको फिजूलखर्ची नहि कएलहुँ। [घुमैत] की कहैत छह—‘ककरो दू प्रेमिका हो आ दुनू एक सङ्ग आबि जाए, तँ ककर आदर करए आ ककरा छोड़ए—पुरान प्रेमिकाकेँ वा नवकेँ? अहाँ उत्तर दिअ।’ अरे, ई प्रश्न टेढ़ अछि। उत्तर कठिन बुझाइत अछि। तोहर की मत? की कहलह—‘हम किछु नहि बुझैत छी; प्रश्न बड्ड पेचीदा अछि। अहाँए उत्तर दिअ।’ तँ सुन—

नव युवतीक प्रति अधिक प्रेमवश अपन पहिल प्रियाकेँ छोड़ब उचित नहि। ओकर प्रसन्नताक लेल स्वयं आयल सकामा नव कामिनीकेँ छोड़बो उचित नहि। उपेक्षित भऽ क्रोधमेँ पुरानी चलि जाए तँ एकान्तमेँ दोसरकेँ पाबि ओकर मतसँ पहिलीक मनौवल करबाक चाही। [घुमैत] की कहैत छह—‘वेश्यापुरमेँ घूमैत केवल देखलासँ स्त्रीक कामभाव-निपुणता केना बुझल जा सकैत अछि?’ चतुरक लेल किछु अनजान नहि। पुरुष स्त्रीकेँ देखते पहिने ओकर दृष्टि बुझए—

कारण सभ भाव आँखिएमेँ भरल रहैत अछि। देख—

आँखि एँचब, हलुक पलक मारब, तिरछा देखब, चितवनमेँ राग भरब, नेत्र पसारि देखब, दृष्टिमेँ प्रगल्भता आ पुतलीक चञ्चलता—एहि प्रकारक दृष्टि सूचित करैत अछि जे स्त्री कामभावमेँ निपुण अछि।

जकर कपोल कनेक घुमाओल आ पातर हो, भौँह चञ्चल हो, चितवन तिरछा हो—एहन मुखबालीक संग रति कठिन होइत अछि। जकर अधरक कोन सिकुड़ल हो, देह नखक्षत आ दन्तक्षतसँ भरल हो, जे मन्द-मन्द हँसैत हो—ओकर संग निर्भय रति बुझबाक चाही। जकर बामा हाथ कटिपर राखल हो, दहिना हाथ बगलमेँ लताहस्त मुद्रामेँ लटकैत हो, आ जघनभाग एक दिस खिंचि ऊपर उभारल हो—एहन स्त्रीपर सेहो भरोसा कर; मुदा एहन स्त्री गर्वरहित नहि होइत अछि। जे अञ्चलक छोरसँ एक स्तन झाँपि, अपन घरक देहरिपर एक पएर अदासँ राखि, द्वारक पार्श्वमेँ देह नुका देखैत हो—ओ स्त्री नहि, पूरा फन्दा अछि। ओकर नखरेसँ ओकर अवस्था प्रकट भऽ जाइत अछि। जे किवाड़क ऊपरक बिलैया अर्थात् गोस्तनक किनार पकड़ि, दुनू भुजाकेँ अँगड़ाइ मुद्रामेँ उठा, नीवीक बन्ध ढील कऽ नाभि प्रकट करैत ठाढ़ हो—ओकर चेष्टासँ रतिक पूर्वरङ्ग स्पष्ट भऽ जाइत अछि; अनुमान लेल किछु शेष नहि रहैत अछि। एहि विषयमेँ बहुत कहल जा सकैत अछि, मुदा संक्षेपमेँ कहैत छी।

लाल हथेली आ अँगुरी, स्वच्छ नख, गालपर राखल हाथ, हाथ नचा गप्प करब, सुन्दर चाल, फड़कैत ओंठबाली मुस्की, चञ्चल चितवन, विश्वासपूर्ण मुखमुद्रा आ नाभिक नीचाँ नीवीबन्ध—जकरामेँ ई लक्षण हो, ओकरा पुरुष फँसएबाक जाल वा रतियुद्धक श्रेष्ठ वीराङ्गना बुझू। [घुमैत] की कहैत छह—‘स्त्रीक कामभाव दू प्रकारक होइत अछि—प्रकट आ गुप्त। एहिमेँ श्रेष्ठ कोन?’ अरे, प्रकट कामभाव केवल वेशवधूक योग्य होइत अछि, आ ओ बनावटी सेहो भऽ सकैत अछि। गुप्त कामभाव वेश्या आ कुलवधू दुनूमेँ होइत अछि। केवल अनुरागसँ उत्पन्न भाव अल्प दोषयुक्त भेलासँ विशेषतः वेश्यामेँ नीक लगैत अछि। पुरुष दुर्लभ भेलासँ कुलवधू कोनो-न-कोनो पुरुषकेँ चाहि लैत अछि, मुदा वेश्या सभकेँ नहि चाहैत अछि। किछु लोकक मत अछि—‘वेश्याकेँ ककरो संग रति कएलासँ दोष नहि लगैत अछि; तखन ओकरा गुप्तकाम होयबाक आवश्यकता की?’ हम कहैत छी—पुरान परिचित, राजाक साला, किछु धन देनिहार, आसक्त भक्त आ खिसियाइलो पर दाँत देखबैत चापलूस व्यक्ति—ई सभ वेश्याजननीक खुशामदमेँ रहैत अछि। वेश्या हुनका नहि चाहओ, तथापि हुनका लेल साध्य बनए पड़ैत अछि; अर्थात् इच्छा नहि रहितो वेशवधूकेँ एहि लोकक संग प्रेमक अभिनय करए पड़ैत अछि। किएक? स्वार्थक लेल। तेँ गुप्तकामबाली वेश्या जँ सचमुच ककरो चाहैत हो तँ ओ पुरुष जन्म आ जीवनक पूरा फल पाबि लैत अछि। आओर, जखन वेश्या ककरो विरहमेँ स्वयं दूती बनि पहुँचैत अछि आ गद्गद वचन कहैत अछि, तखन ओ पुरुषक लेल ई कोनो छोट सौभाग्य अछि? फेर ओ अवस्थाक कल्पना करू, जखन प्रेमीक ध्यानमेँ तल्लीन भऽ वेश्या रोगिणी जकाँ पीयर पड़ि जाए, चन्द्रोदयक समय ओकरा लेल नोर बहबए, राति-राति जागि आँखि लाल कऽ लए, ओकर कारण कामसँ कृश भऽ आभूषण उतारि राखि दे, आ एहन उलाहनाभरल वचन कहैत रहए—‘हे निष्ठुर, तोहर कल्याण हो; तोरे कारण हमर देहक ई दशा भऽ गेल अछि।’

अथवा ओ अवस्थाक कल्पना करू, जाहिमेँ पुरुष एहन सीत्कारपूर्ण वचन सुनैत अछि—‘हे कान्त, तोहरासँ एतबे माँगैत छी जे हमर देहपर दया कर।’ अथवा ओ स्थिति, जखन एहि सँ आगाँ बढ़ि वेश्या प्रियतमकेँ आलिङ्गन कऽ कखनो कहैत अछि—‘हे नाथ, जल्दी करू’, आ कखनो—‘बस करू, एना नहि करू’; आ उभरि-उभरि दन्तक्षत आ नखक्षत करैत अछि। तखन रसायनप्रयोगकेँ सेहो मात देनिहार एहन वचन सुनबाक सौभाग्य पुरुषकेँ भेटैत अछि—‘हे प्रियतम, हम तोहर लेल एहन भऽ गेल छी; हमर बातपर विश्वास करू; तोरा हमर सौगन्ध!’ एहन वचन दूतीक मुखसँ सुनि वा प्रत्यक्ष लक्षणसँ ओकर हाल बुझि जखन पुरुष सोचैत अछि—‘सचमुच हमर कारण एकर ई दशा भऽ गेल’—तखन ओकर चित्तमेँ करुणासिक्त जे प्रसन्नता उपजैत अछि, ओकर समान आनन्दक कोनो दोसर बात तूँ बता सकह तँ हम अपन धूर्तता छोड़ि वेदपाठी ब्राह्मण बनि जाउ। आओर—

मेखलापर हाथ राखि मन्द गति सँ चलैत पतली कटिबाली, कामातुर, भयभीत आ चञ्चलाक्षी प्रियाकेँ रातिमेँ सङ्केतानुसार क्षण भरि एकान्तमेँ पाबि जे ठाढ़े-ठाढ़ चुम्बन करैत अछि, ओहि भाग्यवानक माथपर हम अपन हाथसँ कमलक छत्र धारण करएबाक लेल प्रस्तुत छी।

आओर, जे स्त्री सकपकाइत कहैत अछि—‘हे कान्त, जल्दी करू’—एना आत्मनिवेदन करनिहार ओहि स्त्रीक लेल पुरुष प्राणक मूल्य चुका कऽ सेहो जड़-कीनल दास भऽ जाइत अछि।

[घुमैत] की कहैत छह—‘रूपवती आ अनुकूल—एहि दुनूमेँ अहाँ ककरा अधिक मानैत छी?’ दुनू स्त्रीक शृङ्गार अछि। जँ कुरूपामेँ अनुकूलता हो तँ ओ अन्हारमेँ नाच जकाँ व्यर्थ अछि; आ रूपो अनुकूलता बिना वनमेँ चाननी जकाँ कोन सुख देत? हमरा रूपसँ अनुकूलता अधिक महत्त्वपूर्ण बुझाइत अछि। केना? कुरूप स्त्रीकेँ सेहो अनुकूलता सजा दैत अछि, मुदा रूपवतीकेँ सेहो उद्दण्डता दूषित कऽ दैत अछि। देखल जाइत अछि जे पुरुष सुन्दरीकेँ छोड़ि कुरूप किन्तु अनुकूल स्त्रीमेँ रमि जाइत छथि। रूपवतीमेँ अकड़ होइत अछि, आ अकड़ कामक शत्रु अछि। कामक मूल अनुगमन अछि, आ से अनुकूल भाव अर्थात् दाक्षिण्यसँ सम्भव होइत अछि। जँ केवल रूपे तृप्तिक कारण हो तँ चित्रलिखित स्त्रीसँ सेहो प्रयोजन सिद्ध होए। अनुकूलतामेँ रूप छोड़ि सभ गुण समाओल अछि—ओ भावुक, बेसी काल नहि रूठनिहार, लालचरहित आ आज्ञाकारिणी होइत अछि। की कहलह—‘वेश्याद्वारा बनावटी शिष्टाचार कएलासँ ओ सज्जनक सङ्गतियोग्य नहि होइत छथि, एना कहल जाइत अछि। किएक?’ प्रयोजनसिद्धिक लेल विशेष व्यवहारकेँ उपचार कहल जाइत अछि। स्त्रीमेँ स्वाभाविक आ बनावटी दुनू प्रकारक उपचार होइत अछि। अपन प्रयोजन साधबे वेश्याक उपचारक हेतु अछि। किछु लोकक मत अछि—जतय शठतासँ व्यवहार हो, से बनावटी उपचार; मुदा ओहो दोषरहित भऽ सकैत अछि। केना? शठतासँ कएल उचित सत्कारो मन प्रसन्न कऽ दैत अछि; आ सरलतासँ कएल सत्कार जँ गलत ढङ्गसँ हो तँ ककरा प्रसन्न करत? काज सिद्ध करबाक विशेष चातुरीक नाम शठता अछि। अपन प्रयोजन साधनिहार स्त्रीकेँ अपन लेल विशेष पुरुष अवश्य खोजबाक चाही। जे स्त्री विशेष पुरुषकेँ चिन्हैत अछि, ओकरेसँ पुरुष प्रसन्न रहैत छथि। आओर—

विनय, मधुर वचन, क्षमा आ राति-दिनक परिश्रम—ई सभ गुण जँ शठताक संग रहि सकैत हो, तँ एहन शठताकेँ के अधम कहत?

की कहैत छह—‘इच्छाक विरुद्ध होयबहि शठताक सार अछि। मनविरुद्ध व्यवहार पाबि कामीकेँ प्रियासँ दुःख होइत अछि; एकर उपचार नहि।’ अरे, कारण भेटलापर सभ लोक प्रतिकूल भऽ सकैत अछि। जे ओहि कारणकेँ दूर नहि कऽ सकए, अपराध ओकर अछि। परस्पर प्रतिकूलता ओतहि दोष अछि जतय एक उद्देश्य लेल हुनक मेल भऽ नहि सकए। बहुत जोड़ी एहन देखल जाइत अछि, जे किछु बातमेँ प्रतिकूल रहितो दोसर बातमेँ खूब मेल-जोलसँ प्रसन्न रहैत अछि।

थरथराइत स्तन, नोरभरल आ मनक भेद कहैत चितवन, सुन्दर शब्दसँ भरल गुपचुप गप्प—ई सभ जँ शठतासँ सेहो कएल जाए, तथापि गुणे मानल जाइत अछि।

की कहैत छह—‘बहुत लोक कहैत अछि जे वेश्याकेँ देल सभ धन नष्ट बुझू। दत्तको कहलनि—काम पुरुषक धनक सर्वनाश अछि। एहि विषयमेँ अहाँक मत की?’ अर्थक प्रयोग केवल तीन प्रकारेँ होइत अछि—दान, उपभोग आ गाड़ि राखब। दान आ उपभोग श्रेष्ठ, गाड़ि राखब निन्दनीय। केना—

गाड़ि राखल धनक कोनो फल नहि होइत अछि। निष्फल रहला पर असन्तोष होइत अछि। फड़कैत घोड़ाक चाल जकाँ ठाम बदलनिहार धन केवल सञ्चयक लेल नहि होइत अछि। अर्थ आ धर्म देहकेँ सुख दैत अछि। मनोवाञ्छित शब्द, रूप, स्पर्श आदि विषयक प्राप्तिकेँ सुख कहल जाइत अछि; वेश्याक सङ्गसँ ओ भरपूर भेटैत अछि। सभ शब्दमेँ मधुर वचन विशेष सुखद अछि। मधुर वचन कहब केवल वेश्यासभ जानैत छथि, दोसर नहि। केना—

प्रिय बातकेँ प्रिय ढङ्गसँ, अथवा कटु बातो अवसरपर थोड़े शब्दमेँ प्रिय ढङ्गसँ कहब केवल वेश्यासभ जानैत छथि। दाक्षिण्यसँ भरल ओ सभ कखनहुँ कटु बात नहि कहि सकैत छथि, आ प्रिय बातो अप्रिय ढङ्गसँ नहि कहैत छथि। भरल गोल जाँघ आ नितम्बबाली, उघार अंशुक आ बान्हल मेखलाबाली वेश्याक जघनप्रदेशक स्पर्श जकरा प्रिय लगैत अछि, से ओकर लेल प्राणो दऽ दैत अछि, धनक की बात! सभ रसामेँ मदिरापान अत्यन्त निन्दित अछि, मुदा वेश्याक संग ओकरो प्रयोग आनन्द दैत अछि। देख—

हड़बड़ीमेँ ढारलासँ चषकमेँ उफनैत, पीबासँ बचल, वा पी कऽ कुल्ला कएल, आ पीबैत समय बीच-बीचमेँ अधरपानरूपी चखनाक स्वाद देनिहार मदिरा जे पीबैत अछि, ओही वेश्यापुरक असल आनन्द पबैत अछि।

जे वेश्याक अधखुलल नेत्र, फड़कैत ओंठ, लम्बा तानल भौँह आ पसेनासँ भरल कपोलबला मुख देखि चुकल अछि, ओकर आँखिक पूरा फल भेटि गेल।

आओर—

स्नानक बाद वेश्याक रूख केशान्त, फूलसँ सजल भारी जूड़ा, पहिरि छोड़ल वस्त्र, निःश्वासक सुगन्धिसँ सुवासित लाल अधर, मधुपानसँ खिलल मुख, अथवा चन्दनसँ भीजल देह—जे एकर गन्ह लेलनि, हुनक नासारन्ध्रसँ कामदेव निश्चय भीतर प्रवेश कऽ जाइत छथि।

धर्ममेँ हमर विशेष दखल नहि अछि, तथापि धर्म केना प्राप्त होइत अछि, से कहैत छी। एहि संसारमेँ कृतघ्नता सभ पापसँ भारी अछि। आ कृतघ्नसँ सेहो अधिक कृतघ्न ओ अछि, जे वेश्याद्वारा अनुपम आ मनचाहा सुख पाबि बदलामेँ हुनक भलाई नहि करैत अछि। जँ ओ कृतज्ञ अछि तँ स्वर्ग ओकर मुट्ठीमेँ अछि। तेँ स्वर्गसुख पाबए लेल निर्भय भऽ वेश्याकेँ धन देबाक चाही। की कहैत छह—‘कुलवधू अनुकूल होइतो ओकरामेँ वेश्याजकाँ सुख किएक नहि?’ सुन। कुलवधूक अनुकूलता एक प्रकारक, वेश्याक दोसर। कुलवधू जँ सरल हो तँ पहिने प्रिय बातो असमयमेँ कहैत अछि; फेर पतिकेँ अत्यन्त प्रिय मानि अप्रिय बातो कहि दैत अछि। ई बात सर्वत्र देखल जाइत अछि। काम एक विशेष इच्छा अछि, आ प्रार्थनो इच्छा अछि। नहि भेटलासँ प्रार्थना उपजैत अछि। वेश्या वशमेँ आयलो पर ओ प्रार्थना ईर्ष्यासँ भरल रहैत अछि, कारण वेश्यापर सभक अधिकार अछि। ईर्ष्यासँ लोभ उपजैत अछि; तेँ वेश्याक प्रति कामभाव हटैत नहि। काम रागक मूल अछि। आओर—

वेश्याक जघनरूपी रथपर चढ़ल एहन कोन चेतन प्राणी अछि जे कुलनारीक परवाह करत? रथ छोड़ि बैलगाड़ीक सवारी चाहनिहार कोनो पुरुष नहि।

की कहैत छह—‘वेश्यामेँ अनुरक्त पुरुष लोकक आदरक पात्र नहि होइत अछि; ओकर मतो लोककेँ प्रिय नहि लगैत अछि। जँ वेश्यागमनमेँ गुण अछि तँ—

फेर ओकरा अपनाओल किएक नहि जाइत अछि?’ बड्ड धूर्ततापूर्ण प्रश्न पुछलह। एक क्षण अवसर दिअ। [सोचि] एतय पूजा दू प्रकारक होइत अछि—एक फलदायिनी, दोसर निष्फल। निष्फल पूजा नग्नक चेष्टा जकाँ हास्यास्पद होइत अछि। जे वेश्यामेँ लागले नहि, ओकरा फल की भेटल? ककरो मत हो सकैत अछि—‘वेश्याप्रसङ्ग अपमानक कारण अछि।’ ई मानबाक योग्य नहि। सभ लोक सुखी पुरुषसँ द्वेष करैत अछि। जेना ‘परस्त्री अगम्या अछि’ सभ कहैत अछि, तहिना वेश्याक लेल नहि कहल जाइत अछि। ककरो मत हो सकैत अछि—‘स्त्रीप्रसङ्ग श्रेयस्कर नहि, आ वेश्यासभ स्त्री छथि।’ एहि पर हमर कथन अछि—जकर मोन स्त्रीमेँ लागल हो, ओकरा दोसरकेँ दोष नहि देबाक चाही। आओर—

[पूर्ववाक्यक विस्तार]

ढीठ स्वभाव, अपन स्थानक बहादुरी, हाजिरजवाबी, सुरुचि, स्वभावक तेज, मनक बात भाँपब, हँसी-खुशी, सुरतक उत्तम विधिक परिचय, अनुरक्त स्त्रीक सुख, चित्रादि कलाक प्राप्ति आ उत्तम आराम—जँ कामीकेँ वेश्यापुरमेँ ई सभ भेटैत अछि, तँ लोक ओहि वेश्यापुरक निन्दा किएक करैत अछि?

किएक करैत अछि?

[घुमैत] की कहैत छह—‘बृहस्पति, उशना आ दोसर स्मृतिकार कहैत छथि जे स्त्रीप्रसङ्ग नहि करबाक चाही। एहि विषयमेँ अहाँक मत की?’ अरे, ई कोरा उपदेश अछि। हमरा एहन केओ नहि देखाइत अछि जे स्त्रीप्रसङ्ग नहि करैत हो। सुनल जाइत अछि जे इन्द्रादि सेहो अहल्यादिक संग व्यवहार कएलनि। धर्म आ अर्थसँ विषयभोग श्रेष्ठ अछि, कारण एहिमेँ मनक इच्छा पूर्ण होइत अछि। विषयभोग स्त्रीक विशेषता अछि। जे वेश्याकेँ छोड़ि स्वर्गक दिव्य कामोपभोगक इच्छा करैत अछि, ओकरा हम ठकल मानैत छी।

एहि जन्म आ आगाँक जन्म दुनूमेँ एहि जन्मे श्रेष्ठ अछि, कारण एकर फल प्रत्यक्ष अछि। दोसर देह—जकर प्राप्ति सन्दिग्ध आ तपस्याक बाद बड़ी कठिनाइ सँ होइत अछि—ओहिमेँ तोरा कोन आनन्द देखाइत अछि? देख—मेघक कारण जाहिमेँ चन्द्ररूपी दीपकक प्रकाश मन्द हो, दुगुना अन्हारसँ भयङ्कर लगैत हो, अत्यन्त शीत हवा बहैत हो, पानि आ हवासँ चलब कठिन हो—एहन बरखाक अन्हरिया रातिमेँ कामबाणसँ सन्तप्त, एकाकी अभिसार करैत कामिनीक नूपुर-झनकारसँ जागल पुरुषकेँ अपन जीवन आ जन्मक पूरा फल भेटि जाइत अछि। की कहलह—‘नूपुर धारण करब अभिसारिकाक पैघ उपकार करैत अछि।’ हँ, ठीक। कारण प्रथम समागममेँ सकपकायल पुरुष आत्मनिवेदन केना कऽ पबितैत, जँ पएरक स्पन्दनसँ उठल नूपुरक झनकार नहि होइत? नूपुरक ध्वनिसँ जागि जँ एहन मुख चुम्बन लेल भेटए जकर विशेषक मेघजलधारासँ धुलल हो, आँखिक अञ्जन पसरल हो, अधर फड़कैत हो आ मधुपानक सुवास अबैत हो, तँ उल्टा माथ लटका अनेक कल्प धरि नरकक दुःख भोगबो युवतीसँ मन मिलाएल ओहि पुरुषकेँ प्रिय लगत। जाहि शरदमेँ मेघक घोघ हटि गेल हो, माथपर चन्द्रमाक तिलक हो, आँधीक चलब रुकि गेल हो, असन-वृक्षक टपकैत फूलसँ दिशा महमहाइत हो—ओहि समय सारसक बोली अनुकरण करैत मेखलाक झनकार आ बन्धूकक लाल फूल जकाँ दमकैत विशेषकसँ युक्त, चक्रवाकसँ प्रेमक रहस्य सीखल प्रियाक संग खिलल कमलबाली बावड़ीक जलमेँ जे विहार करैत अछि, ओकरा स्वर्गसँ की प्रयोजन?

अथवा जखन कुन्दपुष्पसँ मिश्रित फुलल लोध्रपुष्पक गन्हसँ भरल हवा बहैत हो, आ कामिनीसभ जूड़ामेँ प्रियङ्गु-मञ्जरी लगा इठलाइत होथि—एहन हेमन्तकालमेँ शीतक कोपसँ जकर ओंठ फाटल हो आ अधर बचए चाहितो चुम्बन लेल ललकारैत हो, एहन प्रियाक मुखक स्नेहपूर्वक आग्रहसँ पान करनिहारकेँ जे सुख भेटैत अछि, ओकर उपमा नहि देल जा सकैत अछि।

अथवा जतय कारी अगरु जरलासँ धुआँक मेघ छाओल हो, मोतीक फूल फरशपर बिछाओल हो, एहन गर्भगृहमेँ जखन पाला-जकाँ बून्द बरसबैत तीक्ष्ण हवा बहैत हो—ओहि शिशिरक अन्हरिया रातिमेँ प्रेममग्न प्रियाक पीन स्तनसँ अपन वक्षस्थल दबबैत, सुन्दर शय्यापर पड़ल, गाढ़ आलिङ्गनसँ उपजल पसेनाक बूँदसँ महमहाइत देह लिए रतिक अन्तमेँ मधुर झपकी लेनिहार पुरुष सचमुच की नहि पाबि लेलक? आओर—

फाटल अधरोष्ठकेँ चुम्बनसँ बचए चाहनिहार आ केश पकड़ि ऊपर खिंचलासँ बाँकी चितवन चलाबैत प्रियाक सीत्कारपूर्ण मुखकेँ पियासल भऽ अवश्य पीबाक चाही। जतय निन्दे नहि, ओहि स्वर्गमेँ ई सुख कतय भेटत? अथवा वसन्तक ओहि दिनमेँ जखन पसेनाक बूँदसँ तिलक मेटा जाइत हो, कोकिल बागमेँ भरि जाइत हो, स्त्रीसभ मणिमेखला गूँथैत होथि, आममेँ मोजर देखाइत हो आ पवन सुगन्धित हो—तखन मान छोड़ि प्रेमवश स्वयं आयल प्रिया अपन मान-मनौवल बिसरि जेकरा मनबए लागए, ओकरा दोसर सुखक इच्छा नहि करबाक चाही। अथवा जखन शिरीषपुष्प प्रियाक कानमेँ सजाओलासँ कपोल श्याम भऽ जाए, जलपात्र, मोतीक हार, चन्दन आ खसक पङ्खाक हवा आनन्द दे, सूर्यक किरण प्रचण्ड हो—एहन ग्रीष्ममेँ फूलक सेजपर लेटल, नवमालिकासँ सजल जूड़ापर हाथ राखल, चन्दनलेपसँ आर्द्र स्तनबाली प्रियाक संग ताड़क पङ्खाक हवा खाइत जे हवामहलमेँ दुपहरिया बितबैत अछि, अथवा जाहि हवादार घरक फरशपर सुगन्धित जल छिड़कि मौलसिरी, मल्लिका आ नीलकमल सजाओल हो, ओतय प्रियाद्वारा रोकल जाइत अछि—ओ अपन यौवनक पूरा आनन्द लऽ लेलक। आओर—

दन्तक्षतसँ अधर फड़कैत प्रियाक कमलसँ सुन्दर मुखमेँ जे रस भेटैत अछि, करधनीक प्रभासँ चमकैत जघनभागक वस्त्र हटेबामेँ जे आनन्द, अथवा पीन कपोलपर नखक्षतसँ जे शोभा—एहि सभ सुखमेँ फँसल मोन जन्मान्तरमेँ सेहो विरक्त नहि होए चाहैत अछि। ई बेचारा लोक चींटी जकाँ प्राण गमएबाक बाटमेँ एक-दोसरक पछाँ चलैत, स्वयं नहि देखल ‘स्वर्ग अछि, स्वर्ग अछि’क झूठ रटि, मृगतृष्णामेँ मोन लगा, वायुभक्षण, पर्वतसँ खसब, अग्निमेँ प्रवेश, घोर जप, होम, व्रत, नियमादिक ढोङ्गसँ स्वर्ग पाबए चाहैत अछि।

सत्य की अछि, एकर परीक्षा सेहो नहि करए चाहैत अछि। सुनल जाइत अछि जे स्वर्गमेँ प्रत्येकक लेल नियत स्त्री तैयार रहैत अछि। जँ एना हो तँ अनेक परस्पर-विरोधक बीच ओहि अप्सराक संग पुरुषकेँ कोन आनन्द भेटत? सदिखन सटल रहबासँ, जकर वियोग होइते नहि, ओ केना आनन्द देत? परस्पर अपरिचित रहबासँ सुरतक प्रकट सुखो ओहि स्त्रीक संग नहि भेटत।

स्वर्गमेँ सोनाक घर आ सोनाक गाछ सुनल जाइत अछि। ई देवताक पूँजी हुनक स्वभावगत कृपणतासँ जमा भेल होयत। जँ घर आ गाछ दुनू सोनाक अछि तँ स्त्रीकेँ ककरासँ सजाओल जाइत अछि? विशेषता की भेल? मकानक सोनाक किछु अंश तोड़ि की स्त्रीक शोभा बढ़ाओल जाएत? अपन हाथसँ पुत्र जकाँ पोसल आ सम्मानित गृह-उपवनक बालवृक्ष, जे युवतीक जूड़ामेँ सजए लेल फूल दैत अछि, तकर संग स्त्रीकेँ जे रम्य उपभोग भेटैत अछि, ओ सुख कठोर सोनाक गाछमेँ कतय? यौवनभरल कामक वशीभूत, परस्पर दर्शन लेल उत्कण्ठित, कोकिलक कूक सुनए लेल पियासल, आपसमेँ उलाहना देनिहार आ प्रेमक फल पाबए इच्छुक कामीजनकेँ जे सुख भेटैत अछि, ओ स्वर्गमेँ कतय, जतय स्त्रीसभ सदिखन शापक भय सँ डेरायल रहैत छथि? प्रेममेँ कामिनी रूठलापर तुरन्त ओकर इच्छा-अनुकूल सुन्दर मान-मनौवलक उपाय मित्रसभक संग सोचैत जकर लम्बा दिन बीतैत अछि, ओकर समान सुख ईर्ष्यारहित स्वर्गमेँ कतय?

भावसँ भरल अङ्गबाली प्रिया वक्षस्थलपर लेटि मौलसिरी-पुष्पसँ सुवासित निःश्वासवायुसँ प्राणेन्द्रिय तृप्त करैत जे निद्रासुखमेँ डुबा दैत अछि, ओ सुख निद्रारहित स्वर्गमेँ कतय? वारुणीक मदमेँ चूर स्त्रीक टूटल-फूटल, छलपूर्ण मधुर वचन जे प्रियतमसँ कहल जाइत अछि, ओ मदिरारहित स्वर्गमेँ कतय? रुचिकर सीत्कार आ श्वासक तीन गतिसँ युक्त नववधूक आलिङ्गनसँ भेटएबला रतिसुख स्वर्गमेँ कतय राखल अछि? अरे, हमरा तँ बूढ़ श्रोत्रियक संग बैसब नीक, अप्सराक संग नहि। सुनैत छी, ओ बूढ़ ठेढ़ी अप्सरासभ रोबसँ संस्कृत झाड़ैत छथि। जकरासँ वसिष्ठ, अगस्त्य आदि महर्षि उत्पन्न भेलाह, हुनकर की भरोस? देख—

शठता, झूठ, मद, ईर्ष्या, अपमान आ प्रेममेँ रूठब—ई सभ जहिना कामभाव उत्पन्न करैत अछि, तकर एको स्वर्गमेँ नहि। तेँ जकरा निर्बाध कामानुभवक इच्छा हो, ओकरा एतहि आनन्द लेबाक चाही—विशेषतः वेशवधूक संग।

जकरा मनएबाक लेल आँखिमेँ नोर भरि कुट्टिनीकेँ दूर धरि पछाँ-पछाँ आबए पड़ए, वा झूठ क्रोधसँ भागैत जकर अञ्चल पकड़ि प्रियाकेँ खिंचए पड़ए, अथवा सचमुच क्रोधित जकरा कान्ता कठिनाइ सँ मनाओ—एहन दुर्भागी पुरुष जँ प्रियापर क्रोधिते रहए, तँ ओ कामक ध्वजा फहरबैत अपन रथकेँ अपन हाथेँ तोड़ि-मसकि दैत अछि।

अरे, सुनन्दा अछि। की कहैत छह—‘हम सभ सुनि लेलहुँ।’ देख, हम अपन माल बेचि चुकल छी। प्रिय, तोरा धोखा नहि देबाक चाही। की कहैत छह—‘चानसँ अन्हार नहि टपकैत अछि।’ सुनन्दा, एही बात तोहर योग्य अछि, तेँ तूँ कहलह। आब भीतर चली। [प्रवेश कऽ] आब हम विदा चाहैत छी। सूर्य सुनहला कछुआ जकाँ धीरे-धीरे अपन पएर समेटि अस्त होइत अछि; स्त्रीसभ ढील मेखला बान्हि, एक बेर वारुणी पी, कान्तक करस्पर्श लेल उत्कण्ठित केशकेँ फूलसँ सजा, कर्वलम्बित मुद्रामेँ मेखलापर हाथ राखि ओकरा चितवनसँ देखैत छथि। की कहैत छह—‘तूँ एतयसँ आध पएरो नहि जा सकैत छह।’ अरे, जेबाक तँ पड़त। नहि तँ हमर स्त्री एहि चोलाक दोसर ढङ्गसँ स्वागत करत। तूँ—

की कहलह—‘हम ओकरा मना लेब।’ राजाक रहस्य जननिहार आ अनुनय नहि माननिहार दुष्ट जकाँ ओकरा मनाएब सम्भव नहि। अरे विश्वलकक संग तूँ हमर पएरमेँ किएक लिपटि रहल छह? हाय! एहि दुनू हमरा पङ्गु बना देलक। सुनन्दा—

जेना महासागर वेलाकेँ नहि छोड़ैत अछि, तहिना हम तोरा छोड़ि नहि जाएब। सागरक मेखलासँ अलङ्कृत एहि पृथ्वीक रक्षा राजा करथि।

[विटक प्रस्थान।] ईश्वरदत्तक एकनट नाटक (भाण) धूर्तविटसंवादः  समाप्त।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

परस्पर प्रेम-पलायन

वररुचिक मूल संस्कृत एकनट नाटक (भाण)- उभयाभिसारिका (संस्कृतसँ मैथिली अनुवाद- गजेन्द्र ठाकुर द्वारा)

[नान्दी पश्चात् सूत्रधारक प्रवेश]

सूत्रधार:

‘तूँ हमर के? हम तोहर के? अरे शठ, हमर अञ्चल छोड़। हमर मुँह की देखैत छह? हे सुभग, हम तोहर लेल व्याकुल नहि छी।’ [ठहाका मारि] ‘प्रियाक दाँतक चिह्नसँ अङ्कित तोहर ओंठ हम चिन्हैत छी। अरे चपल, हट। जे रूठल अछि ओही तोहर अछि, हम नहि। जा, अपन मोनमेँ बसल कामिनीकेँ मना।’ कामपीड़ित आ प्रणयकलहसँ कुपित वरस्त्रीसभ अहाँ लोकनिसँ एना कहथि।

ई हम अहाँ महानुभाव लोकनिसँ कहैत छी। अरे, कहबाक लेल उत्सुक छी, मुदा ई कोन शब्द सुनाइत अछि? वाह! देखैत छी। [नेपथ्यमेँ]—

वसन्तक आरम्भमेँ मुरझायल लोध्रवृक्ष मित्रक कार्यसँ घबरायल दीन विट जकाँ ठाढ़ अछि।

[तकर बाद विटक प्रवेश] विट—अहो, वसन्तक कतेक ठाठ! कोकिल, आम्र, अशोक, झल्ला, उत्तम मदिरा, चन्द्रमा आ वसन्तक विशेषतासँ बनल शोभा—ई कामदेवक मोनो विचलित कऽ सकैत अछि। अहो! कामीजन एक-दोसरक त्रुटियो सहि रहल छथि। अहो! दूतीसभ एहि समय अप्रतिहत शासनबाली भऽ आबि-जा रहल छथि। अहो! वसन्तऋतु अपन पूरा वैभवपर अछि। प्रवाल, मुक्ता आ मणिसँ गूँथल रशना, दुकूल, हलुक रेशमी वस्त्र, हार, हरिचन्दन आदिक आनन्द बढ़ि रहल अछि। सभ लोकमेँ काम उत्पन्न करनिहार, लोकरुचिकर एहि खिलैत वसन्तमेँ सागरदत्त श्रेष्ठिक पुत्र कुबेरदत्तक नारायणदत्तासँ किछु अनबन भऽ गेल अछि। ताहि कारण कुबेरदत्त अपन सहकारक नामक सेवक हमरा लग पठा कहलनि—‘भगवान् नारायण विष्णुक मन्दिरमेँ मदनसेनाद्वारा “मदनाराधन” नामक सङ्गीतकक रसानुसार अभिनय भऽ रहल छल। तखन हम तोरा छोड़ि ओकर प्रशंसा कएलहुँ। मदनसेनामेँ प्रेमक आशङ्कासँ क्रोधित नारायणदत्ता हमर पएर पड़लोकेँ उपेक्षा कऽ अपन घर चलि गेल। ओकर कारण कामातुर हृदयसँ ई राति हजार राति जकाँ नहि बितए, तेँ चाहैत छी जे एहि नगरक लेल सदिखन वसन्त जकाँ बनल वेश्यापर्वत अर्थात् वेश्यापुरमेँ अटल अहाँ हमर मेल ओकरासँ करा दिअ।’ ओकर बात सुनितहि किछु परिचयक कारण, आ किछु मदन-दुःख असह्य बुझि, हम आइ साँझे निकलि पड़लहुँ। मुदा हमर ढलैत वयसपर विश्वास नहि करैत आ केवल अपन यौवनक विचार करैत हमर गृहिणी दोसर शङ्का कएलक आ हमरा रोकए चाहलक। मुदा हम नारायणदत्ताक क्रोध हटएबाक प्रतिज्ञा कऽ चुकल छी, तेँ अवश्य जाएब। अथवा, एतय हमर प्रतिज्ञाक की आवश्यकता?

आओर—

सुन्दर रूप, अठखेली करैत यौवन, दान, अनुकूल स्वभाव, शान्ति आ मेलक बात—जकरामेँ ई सभ सद्गुण हो, कामिनीकेँ प्रसन्न करए लेल ओकरा दोसरक की आवश्यकता? [घुमैत] अहो! कुसुमपुरक राजमार्गक अपूर्व शोभा! एतयक गली सुगन्धित जलक छिड़काव, झाड़-पोंछ आ चारू दिस सजल फूलक ढेरीसँ एना लगैत अछि मानो दोसर घरक आगाँ वासगृह हो। नाना वस्तुक किनबेच करनिहार ग्राहकक भीड़सँ दोकानक अगिला भाग शोभायमान अछि। वेदाध्ययन, सङ्गीत आ धनुषक टंकारसँ भरल महलसभ मानो रावणक मुख जकाँ आपसमेँ गप्प कऽ रहल अछि। कतहु मेघरूपी प्रासादक खुलल गवाक्षमेँ कैलासक अप्सरा जकाँ गली देखबाक कौतूहलसँ बिजुरी-जकाँ चमकैत नवयौवना प्रमदासभ शोभा पाबि रहल छथि। आओर, पैघ हाथी, घोड़ा आ रथपर चढ़ि एतय-ओतय जाइत महामात्रक प्रधान कतेक भव्य लगैत छथि! युवकक आँखि चोरेबामेँ समर्थ, नखराभरल, यथास्थान आभूषण पहिरने जवान दासीसभ स्वर्गक युवतीक सौन्दर्यक उपहास करैत आबि-जा रहल छथि। सभ लोकक नेत्ररूपी भँवरा जकर मुखकमलक शोभा पीबैत अछि, एहन गणिकासभ मानो सड़कपर दया कऽ चहलकदमी करैत छथि। बहुत की—

निर्भय भऽ प्रसन्नतासँ नित्य उत्सवमेँ लागल, बहुमूल्य रत्न आ आभूषणसँ सजल, माला, सुगन्धि आ वस्त्रसँ लकदक, क्रीड़ाविलासमेँ मग्न, नाना गुणसँ प्रसिद्ध नागरिकसभक कारण पाटलिपुत्रक ई भूमि एहि समय स्वर्ग बनि रहल अछि।

[घुमैत] अरे, ई चरणदासीक पुत्री अनङ्गदत्ता अछि। रतिश्रमक थाकनिजनित आलससँ नपल-तुलल कोमल पएर रखैत, मानो सभक आँखिक अमृत बनल, एही दिस आबि रहल अछि। निश्चय एकर प्रियतम निर्दयतासँ एकर आनन्द लूटने अछि! केना—

एकर मुखमेँ दन्तक्षत-चिह्नित ओंठ अछि; चञ्चल आँखि निन्नसँ अलसायल अछि; रतिक्रीड़ामेँ छितरायल करधनीक लड़िसँ एकर जघनस्थल भरल अछि।

अरे, एकर दर्शनहि सँ हमर काज सिद्ध होयत। एँ, हमर दिस देखनहूँ बिना चलि गेल! तखन एकरासँ बात करब। अहा, स्वयं घुरि आयल। प्रिय, प्रणाम किएक नहि करैत छह? की कहैत छह—‘अहाँ देर सँ चिन्हलहुँ; हम अभिवादन कऽ रहल छी।’ तँ हमर आशीर्वाद सुन—

भद्रे, तोरा युवा, स्वतन्त्र, दानी, सुन्दर, धनाढ्य, सज्जन, कुशल आ रतिपरायण प्रियतम भेटओ। प्रिय, ई सभ छोड़—

कामदेव ओकर अनुचर छथि आ ओकरे जीवन सफल अछि, जे तोहर जकाँ वेशलक्ष्मीक संग एक राति बितौने हो। की कहैत छह—‘महामात्रपुत्र नागदत्तक घरसँ आबि रहल छी।’ भद्रे, ओकर वैभव तँ पुरान कथा भेल। स्पष्ट अछि जे तूँ अपन मायक इच्छाक विरुद्ध ओकरासँ मेल कएलह। लज्जासँ मुँह नुका ई किएक हँसल? वाह! हमर अनुमान ठीक। सुन्दरि, एना नहि कर। केना—

मायक लोभकेँ ठुकरा तूँ रतिसुखमेँ मोन लगेलह, आ बहुत फलदायी वेश्यापुरक नियम—जकर त्याग वेश्याक लेल कठिन अछि—छोड़ि अपन प्रेमीक घर चलि गेलह आ ओकर संग रसपूर्ण रङ्गरेली कएलह। एहि गुणसभसँ तूँ सभ वेश्याकेँ अपन पएरक नीचाँ कऽ देलह।

अरे, तोहर लाज उचिते अछि। सौगन्ध खेबासँ की? तोहर घर जा तोहर माकेँ मना लेब। तूँ वेश्याक स्वभावक विरुद्ध काज कएलह। आब जा सकैत छह। की कहैत छह—‘अभिवादन करैत छी।’ सुभगे, हमर ई आशीर्वाद सुन—

तोहर गुण तोहरामेँ रहि सद्गुण भऽ गेल अछि; ओकर प्रशंसा की करब? लोककेँ मोहित करनिहार तोहर यौवन स्थिर रहए। ई चलि गेल। हमहुँ चली। [घुमैत] अरे, ई विष्णुदत्ताक पुत्री माधवसेना अछि। अपन परिजन पछाँ-पछाँ आबि रहल छथि, तकर परवाह नहि कऽ, बाघसँ पछुआएल मृगछौनी जकाँ वेगसँ पएर बढ़बैत एही दिस आबि रहल अछि। स्पष्ट अछि जे मायक लोभसँ अनचाहा पुरुषक संग मिलनासँ दुःखी अछि। कारण—

न तँ मुख उतरायल अछि, न केशविन्यासक फूल झड़ल; न ओंठक सुकुमार शोभा दन्तक्षतसँ बिगड़ल। गाढ़ आलिङ्गनरहित स्तनतटपर चन्दनचूर्ण जकाँ-तकाँ अछि। श्रोणीपर मेखला रागपूर्ण रतिसँ न ढील पड़ल, न अस्त-व्यस्त भेल।

अरे, अनचाहा पुरुषक संग मिलनक भय सँ ई हमरा देखनहूँ बिना चलि गेल। ठीक, लग जा दुःखक कारण बुझब। वाह, स्वयं घुरि आयल। की कहैत छह—‘हम अहाँकेँ नहि देखलहुँ।’ प्रिय, तोहर दोष नहि; क्लेशसँ घबरायल लोकक बुद्धियो घबरा जाइत अछि। की कहैत छह—‘अभिवादन करैत छी।’ तँ हमर ई आशीर्वाद लिअ—

तोहर प्रियजन धनवान् होथि आ अनिष्टजन निर्धन। मायक लोभमेँ पड़ि अनिष्ट पुरुषक संग तोहर समागम नहि होअए। प्रिय, कतयसँ आबि रहल छह? की कहैत छह—‘धनदत्त सार्थवाहक पुत्र समुद्रदत्तक घरसँ।’ अहा! नीक कएलह। ओ तँ आइकाल्हिक कुबेर अछि। लम्बा निःश्वास लऽ, अधरक पल्लव फड़का, टेढ़ भौँहबाली आँखिसँ ई मुख किएक घुमा लेलक? हाय! हमर अनुमान सही—

हे बाले, स्पष्ट अछि जे रातिमेँ दुःखी भऽ शय्यापर जा तूँ बनावटी रति कएलह आ दिन उगबाक प्रतीक्षा करैत रहलह। ओहि समय तोहर सभ चेष्टा भावहीन छल; कठिनाइ सँ चुम्बन लेल अधर देलह; न मधुर बात, न हँसी-परिहास; जँभाइ आ गरम निःश्वास लैत रहलह; भुजाक आलिङ्गनो ढील छल, रागक तँ नामो नहि।

प्रिय, विषाद नहि कर। रूपहीन धनी सेहो गम्य अछि, एना कहल गेल अछि। सुन—

अनचाहा हो वा प्रिय—दुनूमेँ पूर्ण प्रेम उत्पन्न कऽ धन कमेबाक चाही; शास्त्रक एही नियम अछि।

की कहैत छह—‘अहाँ सेहो हमर मायक जकाँ विचार रखैत छी।’ अरे, से बात नहि; एहिमेँ किछु कारण अछि। आब जा। तोहर घर आबि शास्त्रक असल मर्म बुझाएब। अहो! बिना अभिवादन चलि गेल। एकर शिक्षामेँ त्रुटि अछि, अथवा बेचारीक उद्वेग कारण होयत। हमहुँ आब अपन काजपर चली। [घुमैत] अरे, विलासकौण्डिनी नामक परिव्राजिका नखरासँ धीरे-धीरे पएर रखैत एही दिस आबि रहल अछि। एकर रूप आँखिक अमृत अछि। एकर पटवासक गन्हसँ उन्मत्त भँवरासभ आमक शिखर छोड़ि एकरापर मँडरा रहल अछि।

तँ एकरासँ गप्प करी आ अपन आँखि-कानक कौतूहल शान्त करी। भगवति, वेशिकाचलमेँ अहाँकेँ अभिवादन। की कहैत छी—‘हमरा वेश्यापुरमेँ अटल व्यक्तिसँ प्रयोजन नहि; वेशेषिक शास्त्रमेँ दृढ़ व्यक्तिमेँ रुचि अछि।’ एकर कारण तँ अछि। केना—

तोहर विशाल सुन्दर आँखि एक ठाम नहि ठहरैत अछि; ग्लानिसँ आओर सुन्दर, रतिश्रमयुक्त फुलल अधरबला मुख आ श्रमसँ अलसायल चाल तोहर सुरतोत्सवक सङ्केत दऽ रहल अछि। हे सुभगे, स्पष्ट अछि जे तोहर प्रिय तोरा ‘रति मात्र नित्य पदार्थ अछि’—एही शास्त्र पढ़ौने छथि।

की कहैत छी—‘अरे कामक दास, तूँ अपन रुचिक अनुसार कहलह।’

हे सुभगे, जकरा तोहर चरणकमलक दास्य भेटल, ओ धन्य। हे वरतनु, हमर जकाँ पापीकेँ ईहो कतय सुलभ!

की कहैत छी—‘षट्पदार्थ नहि जननिहारक संग गप्प करब हमर गुरु निषिद्ध कएने छथि।’ भगवति, ई उचिते अछि। केना—गुण अछि; तोहर यौवन सामान्य अर्थात् सभक लेल अछि; युवकजन तोहर गति अर्थात् कर्मक प्रशंसा करैत छथि। हे आर्ये, लोक तोहर संग नित्य सम्बन्ध अर्थात् समवाय चाहैत अछि—

कारण तोहर आ सभसँ नित्य भेद अर्थात् विशेष अछि। मनचाहा तरुणसँ तूँ योग अर्थात् सम्बन्ध करैत छह, आ अनचाहा पुरुषसँ मोक्ष अर्थात् छुटकारा पाबि लैत छह।

अरे, केवल हँसि ई हमर बातक उत्तर देलक। हमर अनुमान ठीक। की कहैत छी—‘साङ्ख्य कहैत अछि जे पुरुष निर्लेप, निर्गुण आ क्षेत्रज्ञ अछि।’ वाह! अहाँ तँ हमर मुँह बन्न कऽ देलहुँ। हमर एहि गप्पसँ अहाँ उत्कण्ठित भऽ गेलहुँ बुझाइत अछि। युवकक संग सुरतमेँ बाधा देब उचित नहि। आब अपन काजपर जाउ। ई चलि गेल।

तँ हमहुँ चली। [घुमैत]

अरे, ई चारणदासीक माता रामसेना अछि। वृद्धा होइतो विलासपूर्ण चितवन, चाल आ हँसीसँ युवतीक नकल करैत उपस्थित अछि। अरे, ई अचरजक वस्तु—

प्रेमदत्त मनचाहा भोग भोगि, अपन गुणसँ प्रेमीक सार निचोड़ि, युवकक वैर आ सङ्घर्षक कारण बनि, निश्चय आब अपन पुत्रीक प्रेमीकेँ दुहए जा रहल अछि। हाय! कामीजनक मृत्यु बोलाबएबला एकर बुढ़ौतीक नखराक आनन्द ली। कामुकजनक लेल एहि महावज्रकेँ प्रणाम करी। अरी कमसिन रामसेना, अपन पुत्रीकेँ अपन यौवन आ सौभाग्य दऽ आब कोन कामीक घर उजाड़बाक लेल जा रहल छह? अरे, एकर शास्त्रमेँ सौगन्ध खेबे उत्तर अछि। की कहैत छह—‘तोहर शील स्वयं तोरा कोसि रहल अछि।’

अरे, बेसी गप्पसँ की लाभ? कोन प्रयोजनसँ जा रहल छह, से कह। की कहैत छह—‘हमर पुत्री चारणदासी काल्हि धनिकक घर गेल छल। सङ्गीतक अर्थात् महफिलक बहानासँ ओकरा ओतयसँ हटा अनए जा रहल छी।’ अरे, ई तँ चारणदासीक असावधानी अछि। केना? कामीजनक सभ धन हड़पबामेँ कुशल, ओकर सार पी कऽ सीटी जकाँ फेकि देबामेँ चतुर तोहर जकाँ स्त्रीक पुत्री होइतो बेचारी शास्त्रक उपदेश बिना शोचनीय रहि गेल! केना—

एक समय ओकरा गम्यरूपमेँ पाबि, ओकरासँ पर्याप्त धन उपजा, आब ओकर निर्धनता जनितो प्रेममेँ फँसल ओ ओकरा छोड़ए नहि चाहैत अछि।

एहन स्त्रीकेँ शास्त्रक मर्मक उपदेश देब व्यर्थ अछि।

की कहैत छह—‘महफिलक बहानासँ ओकरा घर लऽ आएब। अहाँ घुरैत ओतय आबि ओकरा शास्त्रज्ञान सिखा दिअ।’ ठीक। मुदा हमर मित्रक काज जल्दी करबाक अछि। से पूरा कऽ तोहरो काज करब। आब जा। हमहुँ अपन काजपर जाइत छी।

अरे, वेश्याक हृदय विश्वासयोग्य नहि होइत अछि। केना—

स्निग्ध आ चिमटि जाएबाली क्रीड़ासँ लाड़ देखाबि, कामीक सभ धन साफ कऽ, निर्दयी आ लोभी वेश्यासभ दोसरक संग आनन्द लेल पहिल प्रेमीक प्रति विरक्त भऽ ओकरा एना छोड़ि दैत छथि जेना आत्मा शरीरकेँ।

अहो, वेश्याजननी कामीक लेल एहन विपत्ति अछि जकर उपचार नहि। भगवान् कामीजनकेँ हुनकासँ बचबथि। कामुकक सर्वस्व हरबामेँ कुशल आ गणिकारूपी अमोघ शस्त्र चलएबामेँ निपुण वेश्याक माताक सर्वनाश हो। [घुमैत]

अरे, राजमार्गक कलङ्क सुकुमारिका नामक नपुंसक एही दिस आबि रहल अछि। एकर भेटसँ आब कुशल नहि। ठीक, बिना गप्प कएने कपड़ाक ओट दऽ एकरासँ बचि निकलि जाउ। [तहिना करैत] अरे, ई तँ हमर पछाँ दौड़ि रहल अछि! आब हमर की दशा होयत? अरे, काल बड्ड बलवान। मधुर बात कऽ बाघक मुँहमेँ फँसल अपनाकेँ छुड़ाबी।

की कहैत छह—‘अभिवादन करैत छी।’ प्रिय, अविधवा रह आ बहुत पुत्रवती हो।

आओर—

भौँह तानि, आँखि नचा, ओंठ फड़का, बाहु फटकारि, सुन्दर चाल आ नखराभरल हँसीसँ तूँ स्त्रीक नखराकेँ मात कऽ देलह। तोहर लम्बा-चाकर नितम्बपर करधनी अस्त-व्यस्त भऽ स्पष्ट नीचाँ झूलि रहल अछि। कह, रतिसँ अतृप्त भऽ ककर घरसँ आबि रहल छह?

की कहैत छह—‘राजाक साला रामसेनक घरसँ।’ ओकर जीवन सफल। सुभगे, चक्रवाक-युगल जकाँ आब ओकरासँ वियोग भऽ गेल? की कहैत छह—‘राजदरबार जाइत गणिकापरिचारिका रतिलतिकाक चतुर-मधुर हँसीयुक्त कामचेष्टा आ स्नेहपूर्ण ललित कटाक्षक जलसँ अपन हृदय सींचि, रोमाञ्चसँ कामविकार प्रकट करैत, ओ माथ नुका ओकर अनुराग स्वीकार कएलक। ई सहन नहि भेला पर हम डाँटलियैक, तँ ओ हमर पएरपर पड़ि गेल। तथापि ईर्ष्यासँ अभिभूत भऽ हम क्षमा नहि कएलियैक। तखन ओ बलपूर्वक हमरा अपन घर आनि पलङ्गपर बैसा हमर संग बैसल। फेर ओ मदमत्त हमरा रातिमेँ कामवेगक खेदसँ सुतल छोड़ि ओकरे घर चलि गेल आ कतेको दिनसँ घुरल नहि। हम ओकर मनौवल अस्वीकार कऽ पश्चात्तापमेँ जरैत अहाँक लग आयल छी। अहाँकेँ ओहि प्राणप्रियसँ हमर मेल कराबए पड़त।’ प्रिय, ई रामसेनाक भूल अछि। केना—

सुरतमेँ जखन तूँ ओकरा गाढ़ आलिङ्गन करैत छह, तखन स्तन बीचमेँ बाधा—

नहि बनैत अछि। हे सुभगे, प्रत्येक मास रागनाशक ऋतु अर्थात् मासिक धर्म तोरा नहि होइत अछि; रूप, श्री आ यौवनक शत्रु गर्भ तोरा नहि रहैत अछि। तोहर जकाँ गुणवतीकेँ जँ ओ छोड़त, तँ ओकरा रतिक उत्सवे छोड़ए पड़त।

एखन ठहर। मानिनि, तूँ ओकर घर जा हमर बाट देख। हमरा अपन मित्रक काज जल्दी करबाक अछि। से पूरा कऽ, अपन बहिन अर्थात् राजपत्नीक सौभाग्यसँ फुलायल आ तोहर जकाँ सुकुमार युवतीक भाव बुझबामेँ अयोग्य ओहि पुरुषकेँ तोहर घरमेँ तोहर पएरपर प्रणाम कराएब। आब जा।

ई चलि गेल। हमहुँ जाइत छी। हा! बड़ी कठिनाइ सँ एहि असल नमूनाक स्त्री—

अर्थात् नपुंसक—सँ प्राण बचा सकलहुँ। आब अपन काज करी। [घुमैत]

अरे, ई के आबि हमर अभिवादन करैत अछि? तोहर कल्याण हो। बहुत दिनक बाद देखाइ देलह। तूँ पार्थक सार्थवाहक पुत्र धनमित्र छह ने? सेवक, याचक, सम्बन्धी आ मित्रक दरिद्रतारूपी अन्हार हटबएबला, युवतीक हृदयकमल खिलबएबला, कुसुमपुरक आकाशक पूर्णचन्द्र—तूँ एहि विपत्तिरूपी ग्रहणमेँ केना फँसि गेलह? की बहुत लाभक लोभमेँ पूरा कुटुम्बक धनसँ माल कीनि विदेश जाइत चोरसभ लूटि लेलक? अथवा राजाक निन्दा कएलासँ राजा तोहर सर्वस्व छीनि लेलनि? वा पलक झपकिते कुबेरक सर्वस्वो हरए समर्थ जुआ तोरा नष्ट कऽ देलक? बहुत की—

बढ़ल नख आ केश, मैलसँ भरल देह, चिन्तासँ अभिभूत, पीयर-सुखायल मुख, खुरदरा, पुरान, गन्दा आ फाटल कपड़ा पहिरने तूँ कोनो दिव्य मुनिक शापसँ पीड़ित जकाँ लगैत छह।

की कहैत छह—‘रामसेनाक पुत्री रतिसेनापर हमर गाढ़ प्रेम भऽ गेल आ ओकरो हमरापर। ई सभ अहाँ जनैत छी। अपन मायक लोभ जनितो ओ हमरा नहि छोड़त—एना बुझि, मित्रसभक रोकलापर सेहो हम अपन सभ धन एकहि बेर ओकर घर पहुँचा देलहुँ। सभ किछु लऽ किछु दिन बीतलापर ओ स्नानक बहानासँ नहएबला साड़ी पहिरा हमरा अशोकवनक बावड़ीपर पहुँचा देलक। द्वार बन्न भेलापर अशोकवाटिकाक रक्षक सच्ची बात बुझि हमरा चोरद्वारसँ बाहर निकालि देलक। आब एही नगरमेँ प्रतिष्ठासँ रहि दीर्घ दरिद्रता केना सहब—ई सोचि वनक बाटेँ जा रहल छलहुँ, तखन अचानक अहाँ भेटि गेलहुँ। ई सभ गुप्त बात अहाँकेँ निवेदन कऽ देलहुँ। आब अहाँक कहल अनुसार अपन भलाई सोचब।’ अहो, वेश्यापुरमेँ लोभक कतेक पकड़! अहो, वेश्याक स्वभावक कतेक कुटिलता! आउ, पहिने छातीसँ लगा ली। बधाई जे तोरा जीवित देखैत छी। केना—

महौषधिक बलसँ सर्पक विषो धीरे-धीरे शान्त भऽ जाइत अछि; वनमेँ मातल हाथीक मस्तकसँ अपनाकेँ छुड़ाएब सम्भव अछि; समुद्रमेँ ग्राहक मुखसँ सेहो कदाचित् छुटकारा भऽ सकैत अछि; मुदा वेश्यारूपी बड़वानलमेँ पड़ल मनुष्य फेर उठैत नहि देखाइत अछि।

अरे भलामानुस, तोहर दुःखक कारण रतिसेना अछि वा ओकर माता? की कहैत छह—‘हम झूठ किएक बाजब? रतिसेना तँ हमरा प्रेमे करैत अछि; वेश्याजननीक दुष्टतासँ ई भेल। जँ ओकर माकेँ किछु जनौने बिना अहाँ हमर समागमक प्रयत्न कऽ दिअ तँ हमर प्राण घुरि आएत।’ ओकर तोहरापर प्रेम हम जनैत छी; दोसरासँ सेहो सुनने छी। हा, ई तँ कानि रहल अछि! अरे, अपन दुःखक कथा रोक। हमरा एखन मित्रक छोट काज तुरन्त पूरा करबाक अछि। से कऽ घुरि तोहरो काज करब। आब जा। अहो, वेश्याक चतुराई! केना—

जेना कुटिल राजा अपन कुकर्मक दोष मन्त्रीपर दऽ दैत छथि, तहिना शठ आ धूर्त वेश्यासभ अपन दुष्टताक दोष अपन मापर दऽ दैत छथि।

लुच्चाक गुरु ई ढोङ्गी चलि गेल। हमहुँ अपन काजपर जाइत छी। [घुमैत]

अरे, वसन्तक वनकोकिल जकाँ स्निग्ध-मधुर स्वरमेँ के हमर नाम पुकारि रहल अछि? [देखि] अरे, प्रियङ्गुसेना अछि। हम आबि रहल छी। की कहलह—‘अभिवादन करैत छी।’ प्रिय, हमर आशीष लिअ—

शय्यापर बामा हाथक कोमल प्रहारसँ अपन प्रियकेँ हटबैत आ प्रबल रतिवेगसँ मर्दित भऽ, तूँ अपन विपुल जघनक संग सुखी रह।

प्रिय, अत्यन्त थाकल जघनकेँ हुलसाबएबला नाना गन्धसँ सुवासित तेल अपन अङ्गमेँ ककरासँ मलएबाक कृपा कएलह? हे भद्रमुखि, घण्टा, साङ्कल आ पट्टा उतारल राजाक खास हथिनी जकाँ आभूषण उतरलापर स्वाभाविक सौन्दर्ययुक्त तोहर मनोरम रूप जे नहि देखलक, ओकरा ठकल बुझबाक चाही। केना—

मोतीक आभूषणसँ सजल, नखक खरोचसँ भरल, सुगन्धित तेल आ अङ्गराग लगौने, ललछौँह आँखिबाली, हँसमुख, यौवनक उष्णतासँ उभरल स्तनबाली, महीन जाँघिया पहिरने, करधनी उतारने, चाकर नितम्बबाली तोहर जकाँ सुन्दरीकेँ देखि कामदेवक मोनो डगमगा जाए। की कहैत छह—‘अहाँक बात प्रिय अछि।’ अरे, ई खुशामद अछि? लजा नहि। हमरा पुकारबाक कारण कह। की कहैत छह—‘सुनू।’ प्रिय, हम सावधान छी। की कहैत छह—‘भगवान् अप्रतिहतशासन कुसुमपुर-पुरन्दर अर्थात् पाटलिपुत्रक राजाक महलमेँ “पुरन्दरविजय” नामक सङ्गीतक रसानुसार अभिनीत करबाक लेल देवदत्ताक संग हमरो अग्रिम निमन्त्रण भेटल अछि। हमर एहि अभ्युदयक कारण अहाँ छी।’ अरे, से बात नहि। पूर्णचन्द्रसँ खिलखिलाइत चाननी रातिकेँ दीपकक आवश्यकता नहि; बलवानकेँ दोसरक सहायता नहि चाही। तूँ स्वयं एहि सम्मानक कारण छह। एही कारण तोहरापर हृदयगत अनुराग रखनिहार रामसेन हमर खुशामद करैत अछि। भौँह नचा, आँखि आ गाल कनेक सिकोचि, भीतरी उल्लास प्रकट करैत, फड़कैत अधरबला मुख घुमा, प्रियङ्गुसेना अपन परिजनकेँ देखि हँसि पड़ल। बस, रामसेनकेँ सेवाक फल भेटि गेल। वाह रे देवदत्ताक मूर्खता, जे तोहरासँ टक्कर लैत अछि! रूप, श्री, नवयौवन, कान्ति आदि गुणक सम्पत्ति; चारू प्रकारक अभिनयमेँ सिद्धि; बत्तीस प्रकारक हस्तप्रचार; अठारह प्रकारक निरीक्षण; छह स्थान, तीन गति, आठ रस, गीत-वाद्यक तीन लय आदि नृत्याङ्ग—तोहर आश्रय पाबि स्वयं तोहरामेँ शोभित होइत अछि। अथवा, एही वेशमेँ हम तोरा देव, असुर आ महर्षिक मन-नयन चोरेनिहार अप्सराकेँ सेहो पछाड़बामेँ समर्थ देखैत छी। आओर—

अपन छलपूर्ण चेष्टासँ तूँ सदिखन लोकक मन आ नेत्र नचबैत रहबह। हे सुभगे, नाचक की आवश्यकता? तोहर सुन्दर लीलामात्र पर्याप्त अछि।

अरे, लजा गेल! वाह, एहि लज्जारूपी आभूषणक सौगात दऽ हमरा विदा कऽ देलक। तँ चली। [घुमैत]

अरे, ई निश्चय नारायणदत्ताक दासी कनकलता अछि। अपन कठोर स्तनकेँ चूर्णसँ सुवासित कए, जूड़ामेँ नाना फूल सजा, हँसी-खुशीसँ, मदविलासक कारण डगमग पएर रखैत एही दिस आबि रहल अछि।

एकरासँ बात करी। लग आबि हमर अभिवादन किएक करैत छह? प्रिय—

की कहैत छह—‘अभिवादन करैत छी।’ प्रिय, अपन प्रियक प्रिय हो। अपन चरणकमलक विन्याससँ बाटपर किएक कृपा करैत छह? की कहैत छह—‘हम अनुगृहीत भेलहुँ।’ ई सभ छोड़। चक्रवाक-युगल केना अलग भऽ गेल?

की कहैत छह—‘ईर्ष्यासँ भरल, स्नान, शयन, भोजन आ अलङ्कार छोड़ने, अशोकवनिकामेँ अशोकक छोट गाछक नीचाँ शिलातलपर बैसल हमर स्वामिनीकेँ नव चन्द्रमण्डल देखलासँ, भँवराक गुंजार आ वसन्तपुष्पक गन्धसँ कठोर भेल दक्खिनी हवासँ सन्ताप भऽ रहल छल। सखीसभ मधुर वचनसँ सान्त्वना दऽ रहल छलीह। तखन सोझाँसँ कोनो पुरुष अशोकवनिकाक लगसँ कामदंशित जकाँ अस्पष्ट काकली स्वरमेँ वीणापर मूर्छना छेड़ैत, वक्र आ अपवक्र छन्दमेँ ई गीत गाबैत निकलि गेल—

ओ पुरुषक रूप, यौवन आ वैभव निष्फल अछि, जे प्रियाक संग वसन्तमेँ क्रीड़ा नहि करैत अछि।

आओर—

निर्मल चन्द्रमा देखि वा कोकिलक प्रिय बोली सुनि जे प्रियजनकेँ नहि मनबैत अछि, संसारमेँ ओकर जीवन व्यर्थ अछि।

ओहि गीतसँ मान शिथिल भेलापर हमर स्वामिनी आयुष्मानक आगमनक बाटो नहि जोहि, हमरा बजा पएरे मालिकक घर चलि गेलीह। ओही प्रकार हमर मालिक वसन्तागमनसँ अधीर भऽ कोनो उपायसँ स्वामिनीकेँ मनएबाक लेल वीणाचार्य विश्वावसुदत्तक घरक द्वारपर हुनकासँ भेटि गेलाह। दुनूक दाँव नहि लगैत देखि अचानक बाहर निकलल विश्वावसुदत्त हुनका अपन घरमेँ लऽ गेलाह। भोरमेँ स्वामिनी कहलनि—“वेशिकाचलकेँ लऽ आउ।” तेँ अहाँ चलू।’ वाह! कानकेँ सुख देनिहार बात कहलह। हम तोहर दोसर कोन भलाई करी? हमर ई आशीर्वाद लिअ—

तोहर यौवनश्री नित्य बनल रहए; तूँ सदिखन अपन प्रियक प्रिय रह; तोरा निरन्तर उचित आ मनोवाञ्छित उपभोगक सुख भेटैत रहए।

तूँ आगाँ चल। [घुमैत] कनकलता की कहैत अछि—‘एहि घरक भीतर चलू।’ ठीक, चलैत छी। [प्रवेश कऽ] अरे, घबराउ नहि। युगलजोड़ी विराजमान रहए।

अपन गुणसँ वसन्त जेना अहाँ दुनूक समागम करा देलक, तहिना सभ ऋतु कलहक समय कामीजनक मेल कराओ। अपन गुणपर गर्वित वसन्त हमरा सेहो ठकि लेलक, कारण अहाँ दुनूक समागम हमर बिना भऽ गेल। आब हम की करी? एहिमेँ वसन्तो अपराधी नहि। केना—

[पूर्ववाक्यक विस्तार]

सुन्दर उद्यान, चाननी राति, सुरीली वीणा, गोष्ठी, दूती, विचित्र बात आ नाना ऋतु—ई सभ कामीजनक मिलनक असल कारण नहि। कारण अछि परस्परक अकृत्रिम गुण चिन्हलासँ प्रेमक उत्कर्ष।

तेँ दोसरामेँ दुर्लभ, परस्परक गुणाधिक्यसँ संवर्धित, आत्मगुणसँ उत्पन्न, कामशास्त्रक सार आ कुसुमपुरमेँ प्रसिद्ध अहाँ दुनूक प्रेम हमरा ठकि लेलक—अर्थात् अहाँकेँ मिला देलक, हमर आवश्यकता नहि पड़ल। की कहैत छी—‘हम दुनूक प्रेम सेहो अहाँक प्रयत्नहि सँ उत्पन्न भेल; तेँ अहाँए हमर समागमक कारण छी। एहि समय समस्त पाटलिपुत्र जकर बातमेँ आनन्द पबैत अछि, कामीजनक वचन ओकर महिमा पूर्ण रूपेँ केना कहि सकत?’ रतिक पियासल कामी-युगलक मिलनमेँ बेसी गप्प कऽ बाधा नहि देबाक चाही। आज्ञा दिअ, हम जाए चाहैत छी।

खिलल कमल जकाँ कान्त, मदमय मधुर बात कहनिहार आ झलकैत शोभासँ सुन्दर अपन युवती प्रियाक मुख देखि जेना अहाँ आइ प्रसन्न भेलहुँ, तहिना धान्यसँ भरल, समुद्ररूपी मेखलाबाली, मेरु आ विन्ध्यरूपी स्तनसँ सुन्दर, अधिक गुणवती सम्पूर्ण पृथ्वीक पालन करैत नरेन्द्र प्रसन्न रहथि।

[विटक प्रस्थान।] वररुचिक एकनट नाटक (भाण) उभयाभिसारिका समाप्त।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

लात

महाकवि श्यामिलक केर मूल संस्कृत एकनट नाटक (भाण)- पादताडितकम् (संस्कृतसँ मैथिली अनुवाद- गजेन्द्र ठाकुर द्वारा)

[नान्दी पश्चात् सूत्रधारक प्रवेश]

सूत्रधार:

शिवक नेत्राग्निमेँ अपन देहक आहुति दऽ जे हुनक क्रोधक मान राखलक; जकर आज्ञाकेँ इन्द्रसहित देवता मालाक जकाँ अपन माथपर धारण करैत छथि; जे वनिताक विस्तृत नेत्रक बाँकी चितवनसँ अपन धनुष बनबैत अछि; जकर विषयरूपी बाण मुनिक मोनो पीड़ित आ विदीर्ण करैत अछि—ओ कामदेव अहाँ सभक रक्षा करथि।

आओर—

देवीक स्तनपर हाथ राखि, भौँह नचा, हँसैत हुनका देखैत, भय सँ चुप भेल गणनायकसहित नन्दीद्वारा वन्दित, वृषपतिक काँधपर हाथ राखि ठाढ़ शिव क्रोधित भऽ जकर शरीर नष्ट कएलो पर प्रभाव नहि मेटा सकलाह—ओ कामदेव अहाँक रक्षा करथि।

आर्यमिश्र लोकनिक आगाँ माथ नुका कहैत छी—हम सभ आर्य श्यामिलकक रचित ‘पादताडितक’ नामक भाणक अभिनयक आयोजन कऽ रहल छी। कविक परिश्रम ध्यानपूर्वक सुनबाक चाही। केना—

‘एतय ई पद नहि होबाक चाही; ई पद एना हो; ई पद ठीक नहि बनल; ग्रन्थमेँ एहि अर्थक अद्भुत चमत्कार उपजल अछि’—एहि प्रकार काव्यरचना पूर्व कविक मनमेँ जे श्रम होइत अछि—

ओहि श्रमकेँ सहृदय रसिकक आँखिमेँ भरल नोर आ पुलकित देह दूर कऽ दैत अछि।

बगुला आ बिलाइ जकाँ चाल चलनिहार राजमन्त्री आ सन्तसभ रफूचक्कर होथि; डिडिक, विट आ परिहासकुशल लोक ठहरल रहथि; धूर्तक गोष्ठी निर्बाध मदिराक पियासल बनल रहए। केना—

यति कानि-धो कऽ मोक्ष नहि पबैत छथि। जँ आगाँ स्वर्ग भेटएबला हो, तँ हँसी-ठट्ठासँ ओहिमेँ बाधा नहि पड़त। तेँ बुद्धिमानकेँ मुँह बिगाड़बाक आदत छोड़ि निश्चिन्त मोनसँ हँसबाक चाही। हम एना कहि रहल छी, तखन ई दोसर आवाज कोन? [कान दैत] आह, बुझलहुँ—ई विटसभक मण्डप अछि। गञ्जा श्यामिलक घण्टा बजा घोषणा कऽ रहल अछि।

कामिनी आ कामीक मिलनसुख तोड़निहार, दिन उगबाक सूचक, डुगडुगीक दादा—एकर घण्टानादक बराबरी भोरमेँ जोर-जोरसँ रेंकैत गदहो नहि कऽ सकैत अछि।

ई की घोषणा कऽ रहल अछि? [कान लगा] [नेपथ्यमेँ]

प्रियतमपर चलाओल विलासिनीक ओहि चरणक जय हो, जे अलता आ झनझनाइत नूपुरसँ सजल कामक ध्वजा अछि, आ जकर आगाँ माथ नुका सत्कार करबाक चाही। [जाइत अछि]

ठीक कहल गेल अछि—‘सए वर्ष बीति जाओ, कखनो-न-कखनो मनुष्यकेँ जीवनक आनन्द भेटिए जाइत अछि।’ तेँ विष्णुनागो सभ सच्चा कामीकेँ भेटएबला चरणताडन नामक अभिषेक माथपर पाबि लेलक। की कहैत छह—‘अरे, ओकर एहन भाग्य कतय जे एहन प्रेमकलहक आनन्द लऽ सकए! वेश्यादेवीक देल एहि सम्मानकेँ ओ अपमान मानि, क्रोधसँ आँखि लाल कऽ, फड़कैत भौँहसँ ललाट तानि, माथ हिला, दाँतसँ ओंठ काटि, ताली पीटि आ लम्बा निःश्वास लऽ कहलक—हे अनाड़ी वेश्या, तोरा धिक्कार! तूँ हमर ओहि माथपर—

जाहिपर माता सधल हाथसँ यत्नपूर्वक चोटी गूँथने छलीह; जकरा पिता चरणमेँ प्रणाम करैत देखि ‘कतेक भोला बच्चा’ कहि सूँघने छलाह; आ जाहिपर ब्राह्मणसभ फूल चढ़ा शान्तिजल छिड़कने छलाह—गर्वसँ पएर राखि देलह आ ओकर गौरवक कनेको परवाह नहि कएलह!’ विष्णुनागक एना डाँटलासँ, श्वासक ललाई फिक्का पड़ल राति जकाँ ओकर रंग उतरि गेल। भोरक चन्द्रमा जकाँ ज्योतिहीन मुख लिए—

एकर मद उतरि गेल आ साज-शृङ्गार छिड़िआ गेल। ‘हमरासँ ई की भऽ गेल’—एहि दुःखसँ समस्त देह पसेना-पसेना भऽ गेल। भय सँ सभ शोभा नष्ट भऽ गेल, माथमेँ गूँथल फूल छितरा गेल। ‘फेर एना कखनहुँ नहि होयत’ कहैत ई ओकर पएरपर पड़ि गेल।

दीनतासँ झुकलो पर ओ डाँटि कहलक—‘चण्डि, हमरा नहि छू। एना गड़गड़ करैत पेट लऽ हमर लग नहि आउ!’

बड्ड दुःखक बात जे कोकिल उल्लूक पछाँ लागल अछि। मदनसेनिका सेहो ओहि कायर आ नपुंसक पुरुष-वेतालक पछाँ जाइत अछि—ई हमरा अचरज लगैत अछि। सम्भवतः कारण ई जे ओ महामात्रक पुत्र आ राजकीय शासनाधिकारी अछि; तेँ धन वसूलबाक इच्छा सँ ई ओकर उपेक्षा नहि करैत अछि। वेश्यासभ बातक चटोरी होइत छथि। कहल जाइत अछि, कामक मूलमेँ अनेक प्रयोजन रहैत अछि। की कहैत छह—‘बातसँ पहिरन-ओढ़नक साधन जुटैत अछि, तेँ बातक चटोरीकेँ बातक चाट पड़ि गेल अछि।’ ओ बेचारी—

लज्जासँ तिरछा झुकल बरौनिसँ, बहैत नोरसँ मुख, अधर आ स्तन धोइत, अचानक गरजैत नवमेघसँ राजहंसी जकाँ घबरा अपन अङ्गमेँ सिमटि गेल। ई सुनब कोनो आश्चर्य नहि। हमर जकाँ पण्डितसँ सेहो आब किछु पूछब शेष नहि। फेर? की कहैत छह—‘हम ओकरा फटकारि कहलियैक—अरे टकहिया वैयाकरण, फूलकेँ मूसलसँ नहि कूट, वीणाकेँ जरैत काठसँ नहि बजा, वचनरूपी छुरीसँ मदमत्त गुलाबी वेश्याकेँ नहि काट। हमर एना कहलापर ओ हमरा झिड़कि विटसभक चौधरी भट्टिजीमृतक घर चलि गेल। बेचारी अपन सुकुमार हाथपर मुख आ गाल राखि कानए लागल। ओकरा उठा हम कहलियैक—सुन्दरि, बानर पाग पहिरबाक योग्य नहि, न गदहाकेँ उत्तम सवारीमेँ जोतल जाइत अछि। कानब बन्न कर। ई बेचारा तँ हँसीक पात्र अछि; ओकर माथ एतेक पैघ सत्कारक योग्य नहि।

ओ कामी कोन, जकर केश पकड़ि मातल अबला तङ्ग नहि करए, वा मेखलासँ नहि बान्हए, वा कानक फूलसँ नहि मारए? काम ओकरे साथ दैत अछि, आ ओही भाग्यवानक यौवन उत्सवसँ भरल होइत अछि, जकर संग छबीली स्त्री लज्जा छोड़ि दासी जकाँ एकान्तमेँ अठखेली करैत अछि।’ ई सुनि ओ मुस्की आ चितवनसँ हमर बात स्वीकार कऽ, माथसँ पएर धरि वस्त्र पहिरि शय्याकेँ अलङ्कृत कएलक। हमहुँ कामीजनमेँ दुर्लभ ओहि पुरुषक दुश्चरित्रक विचार करैत, राजद्वारक प्रभातीसँ जागि नित्यकर्मसँ निवृत्त भऽ, मानो खराब सपना देखबाक फल हटएबाक लेल ब्राह्मणक बैठक अर्थात् पीठिकापर पहुँचलहुँ। ओतय देखलहुँ—छिड़िआयल केशबला विष्णुनाग पहिनेसँ पहुँचि गिड़गिड़ा कहि रहल छल—‘हम एहन निकृष्ट काज कएलहुँ जे हमर माथपर वेश्याक लात लागल। हे त्रैविद्यवृद्धजन, हमरा बचाउ।’ ओकर एना कहलापर गाल पिचका हँसीक आभास दैत ब्राह्मणसभ एक-दोसरकेँ देखि क्षण भरि सोचि कहलनि—‘हे साधु, हम मनु, यम, वसिष्ठ, गौतम, भरद्वाज, शङ्ख, लिखित, आपस्तम्ब, हारीत, प्रचेता, देवल, वृद्धगर्ग आदि मनीषीक धर्मशास्त्र देखलहुँ, मुदा एहि प्रकारक महापापक प्रायश्चित्त हमहूँ नहि जनैत छी।’ ई सुनि दुःखी मुखसँ दुनू हाथ उठा ओ चिचिया उठल—‘अरे भूलोकक देवगण, हमरा शूद्र बुझि त्यागू नहि। कारण—

हम आर्य छी, शुद्धचरित्र छी, कुलीन छी, व्याकरण आ न्यायशास्त्र पढ़ने छी, राजाक शासनाधिकारी छी; कोनो अछूत नहि। हमरा दुःखीकेँ बचाउ, हम शरणागत छी।’ सभामेँ ओकर एना कहलापर—

किछु लोक कोहनी चला एक-दोसराकेँ ठेहुनिया मारि कहलनि—‘पूरा बरद अछि!’ किछु हँसि ठाढ़ भऽ देर धरि ओकरा देखि कहलनि—‘पागल अछि!’ केओ बीचमेँ तिनका राखि ‘कामपिशाच अछि’ कहि धिक्कारलक। किछु ओहि स्त्रीकेँ अपराधिनी मानि दुःख प्रकट केलक।

सभाक ई दशा, ब्राह्मणक किंकर्तव्यविमूढ़ता आ प्रायश्चित्त लेल विष्णुनागक चीत्कारक बीच शाण्डिल्यगोत्रीय भवस्वामी नामक ब्राह्मण—स्वभावसँ हँसोड़, आचार्यपुत्र आ स्वयं आचार्य, आन्वीक्षिकी, दण्डनीति आ अन्य विद्याक पारङ्गत, कलाकुशल आ वाग्मी—अपन शिष्यमण्डलीक बीच दहिना हाथ उठा हँसीभरल स्वरमेँ परिषदकेँ सम्बोधित कएलनि—‘अरे विष्णुनाग, भय नहि कर। शोक छोड़। धर्मशास्त्रक वचन अछि जे देश, जाति, कुल, तीर्थ आ समयानुसार धर्म, वेदविरोधी नहि हो तँ प्रमाण मानल जाइत अछि। तेँ विटसभक पंचायत बजा, विटे सँ प्रायश्चित्त पूछ। ओ तोरा एहि पापसँ मुक्त करत।’ हुनक एना कहलापर सभामेँ साधुवादक संग उठल अँगुरीसभ नाचए लागल। ई सुनि विष्णुनाग स्वयंकेँ अनुगृहीत मानि चलि गेल। तेँ तोरा विटसभक सभा बजएबाक लेल नियुक्त कएल गेल अछि।

की कहैत छह—‘अहाँक मतमेँ मुख्य विट के-के छथि?’ निश्चय सभसँ अग्रणी विट तूँए छह। की कहैत छह—‘हम विट शब्दसँ केना अनुगृहीत भेलहुँ?’ एहिमेँ सन्देह की? सुन—

महाजन अर्थात् व्यापारीसभक संग दिन भरि झगड़ि, दिन ढललापर कोनो मित्रक घर माल खा, रातिमेँ वेश्याक संग रमण आ पटेबाजी करनिहार, जकर अपन घरमेँ पानियो नहि, तथापि जे डीङ हाँकैत फिरैत अछि—

ओ विट नहि तँ के? की कहलह—‘जँ अहाँ हमरा विटमेँ गनबाक कृपा करैत छी, तँ अहाँ अवश्य विटपंचायत जुटा सकब। एहि बीच हम अहाँसँ विटक लक्षण सुनए चाहैत छी।’ पहिल लक्षण सुन—

जे प्राणक परवाह नहि कऽ शत्रु आ मित्र दुनूक आपत्तिमेँ रक्षा करैत अछि; सङ्कटक समय जकर अपन भुजदण्ड तलवार लऽ स्वयं रक्षक बनैत अछि; प्रणयकलहसँ मदनातुर वेश्यासभ जकर खोज करैत छथि; आ जे याचककेँ खुलल हाथसँ धन दैत अछि—ओकरा विट बुझू। आओर—

सुन्दरीक दुनू चरणकमलसँ अपन माथ पूजित देखि जे एना प्रसन्न होइत अछि मानो मुकुट राखल गेल हो, आ जकर धन पियासल लोक पानि जकाँ दुनू हाथसँ हरि लैत अछि—विटगुणज्ञ ओकरे सच्चा विट मानैत छथि।

की कहैत छह—‘विटक लक्षण तँ कहलहुँ, आब हुनक नामो कहू—जयनन्दक, मौद्गल्य, दयितविष्णु आदि जतेक सम्भव हो सभकेँ सभामेँ एकत्र करब।’ की कहैत छह—‘सभ ठीक, मुदा दयितविष्णुओ अहाँक मतमेँ विट अछि?’ सन्देह की? की कहैत छह—‘ओही जे राजाक बलाधिकृत पारशव कवि अछि?’ निश्चय। की कहैत छह—‘ई नहि भऽ सकैत—

राजाक प्रेम रहितो जे संकोच करैत अछि; हँसी-खुशीसँ सुतैत-जागैत अछि; देवपूजासँ जकर वस्त्र गुग्गुलक गन्धसँ सुवासित अछि; आ जकर ललाट आ दुनू ठेहुनमेँ तीन गट्टा पड़ल अछि—

आओर—

जे देवकुलसँ राजकुल आ राजकुलसँ देवकुलक फेरा करैत अछि, आ जकर दिन एहि दुनू कुलक सेवामेँ चिमटल बीतैत अछि—

की ओहो विट अछि?’ हँ, अवश्य। ई सभ ओकर विटत्वमेँ बाधा जकाँ अछि, मुदा—

पहिने अवन्तीमेँ वेश्यापुरक झगड़ामेँ जकर अँगुरी कटि गेल; पद्मनगरमेँ शत्रु जकर कूल्हाक हड्डीमेँ दू बाण घोंपि देलक; विदिशामेँ यन्त्रचलित बाणसँ जकर बाहु कटि भूमिपर खसि गेल; आ जे वाजीकरण लेल आइयो वैद्य-ओझाकेँ धन दैत रहैत अछि—

ओ वेश्याकेँ धन चटबैत अछि; देहक निज सामर्थ्य कमजोर होइतो रतिक गप्पमेँ आनन्द लैत अछि। एहि कारणसँ हम ओकरा विटपुङ्गवक शिखरपर रखैत छी। रईसक रङ्गीन स्वभावे मोहित करैत अछि, हुनक सामर्थ्यसँ की प्रयोजन? ओ विट केना नहि? की कहैत छह—‘जँ एना अछि, तँ ओ अवश्य विटसभक अग्रणी अछि।’ एही कारण हमहुँ ओकरा विटक शिरोमणि रखलहुँ। तूँ जा। तोहर कल्याण हो। हमहुँ चली। [घुमैत]

हम नगरक सड़कपर आबि गेलहुँ। वाह, जम्बूद्वीपक तिलक, अनेक युद्धमेँ अजित विभूतिसम्पन्न सार्वभौम सम्राटक निवासस्थान एहि ‘सार्वभौम’ नगरक अपूर्व शोभा!

सङ्गीत, स्त्रीक आभूषणक झनकार, पालतू पक्षीक चहचहाहट, स्वाध्यायक ध्वनि, धनुषक टंकार, कसाइखानामेँ छुरीक खरखराहट, महलक कक्षमेँ पात्रिकाक स्वर आ पालतू सारसक गूँजैत आवाजसँ उज्जर भवनक रङ्गल पङ्क्ति मानो मिलिजुलि गप्प कऽ रहल अछि।

आओर—

पर्वत, द्वीप, समुद्रतट आ मरुभूमिसँ सैकड़ो राजा एतय आबि प्रत्येक दिशामेँ बसल छथि। पहिने अनसुनी विचित्र कथा जकाँ विधाताक विविध रचनामयी सृष्टिकेँ मनुष्य एतय एकहि ठाम प्रत्यक्ष देखि सकैत अछि। चोल, पाण्ड्य आ केरल—एहि तीनू देशक निवासीसभसँ भरल ई नगर सर्वत्र आनन्दमय अछि। [देखि] अरे, बिना ओहारक उज्जर पालकीपर चढ़ल ई के, कोनो रईसजादी विधवाक ठाठक नकल करैत एही दिस आबि रहल अछि? [सोचि] ठीक, चिन्हि गेलहुँ। बेंतक दण्ड आ कुण्डीसँ चिन्हाइत चोखा भागवत अमात्य विष्णुदास अछि। न्यायाधीशक दायित्वपूर्ण पदपर नियुक्त होइतो ध्यान-अभ्यासक चक्करमेँ पड़ि उपेक्षाविहार करनिहार भिक्षु जकाँ बेचारा राजकार्य ठीकसँ नहि निपटा पबैत अछि। आओर—

न्यायालयमेँ ओकर संग अर्धासनपर बैसल साथी हाथसँ ठेहुन हिला ओकरा जगबैत छथि; सोझाँ ठाढ़ अदालती कार्यकर्ता चिचिया, माथ नुका, ओकर पएर खिंचि सङ्केत करैत छथि; मुदा ओ हाटक बरद जकाँ ऊँघैत-सुतैत रहैत अछि।

एकर भेट विटक लेल विघ्नरूप अछि, तथापि धर्मोपदेशक एकरा लग जेब उचित। लग चली। ओ तँ दूरसँ हमरा देखि पालकी रोकबा उतरि रहल अछि। अरे, अहाँ रहू। हमर आवभगतक कष्ट कऽ अपनापन देखेबाक आवश्यकता नहि। की कहैत छथि—‘अहाँक सत्कार लेल नहि, हम अपन आचार निभा रहल छी।’ ठीक, जखन अहाँ उपचारक एतेक पक्षधर छी, तँ प्रणयाभिमुखी अनङ्गसेनाकेँ ओहि प्रकार विमुख करब उचित अछि? की कहैत छथि—‘की हम ओकर प्रेमानुकूल सत्कारमेँ कमी कएलहुँ? देखू—

ओ वन्दना कएलक तँ हम स्वस्तिवचन देलियैक। जखन बैसल—

तँ योगक अनुशासन अर्थात् जुटबाक आदेश माँगलहुँ। वायुसँ सूजि गेल आँखि देखि कहलहुँ—ले बेटी, घी पी।’

तखन हम ओकर सत्कार केना नहि कएलहुँ?’ अहो! ओहि नाजनीक अवश्य उत्तम खातिर कएलहुँ। ई मुस्करा, भागवतद्वारा देबाक योग्य पवित्र निम्बू देखा, हमरा प्रसन्न करए चाहैत अछि। अरे, हम तँ तोहर शिष्य छी। एहन पैघ काजमेँ केवल बिलैया-दण्डवतसँ हमरा टारब उचित नहि। आब शीघ्र तिरोहित हो। हमहुँ चललहुँ। [घुमैत]

ई सार्वभौम नगरक बाजार आबि गेल—अनेक देशक स्थल आ जलसँ आयल उत्तम-अधम मालक किनबेच लेल स्त्री-पुरुषक भीड़सँ भरल दोकान। अरे, एकर की कहब!

जेना बसेरास्थलमेँ पक्षी आ चरागाहमेँ गायक झुण्ड, तहिना एतय लेनदेनक स्थानमेँ मनुष्यक भीड़सँ पैघ शोर उठि रहल अछि।

जेना—

लोहारी दोकानमेँ टन-टन भऽ रहल अछि; खरादपर चढ़ल काँसा कुरर पक्षीक बोली जकाँ आवाज दऽ रहल अछि; चूड़ी काटए लेल शङ्खपर राखल लोहेक औजार घोड़ाक श्वास जकाँ साँय-साँय करैत अछि; चारू दिससँ लोक किनबेच लेल आबि रहल छथि।

आओर, एहि समय—

दोकानसभमेँ शोभासँ मानो हँसैत फूलक माला बिकि रहल अछि; पानागारसभमेँ प्याला चलि रहल अछि आ मदिरा पिअल जा रहल अछि; हाथमेँ सरकण्डाक मुठ्ठी लेने मांस बेचयबला लोक ओहि पक्षीसभकेँ कनखीसँ देखि रहल छथि, जे भितरक देवालपर छुरीसभ सजल ओहि कसाइखानापर झपटि रहल अछि।

आओर—

काँधसँ काँध भिड़ा आपसमेँ तर्क करैत, किनैत आ अबैत-जाइत लोकक ई भीड़ खेतमेँ रोपल बिरबाक पाँति जकाँ लगैत अछि। जुआरीसभ जुआमेँ किछु माषक जीतलाक बाद फूल, पुआ, मांस आ आसव हाथमेँ लेने परिचारकसभक संग वेश्यालय-पथ दिस बढ़ि रहल छथि।

तँ धक्का-मुक्की करैत भीड़सँ चलब कठिन एहि बजारक बाट छोड़ि, फूलक गल्लीक बीचसँ होइत, पानागारसभकेँ दहिना छोड़ैत, पूर्णभद्र-श्रज्ञाटक पार कऽ मकररथ्या गल्लीसँ वेशमार्गमेँ पहुँचब।

माषक जमा कएने बिना वेशमेँ प्रवेश करब, बिना हथियार युद्धमेँ उतरबाक जकाँ व्यर्थ अछि आ केवल बदनामी तथा अनर्थक कारण बनैत अछि। मुदा मित्रक लेल हम अवश्य ओकर भ्रमण करब। वेशमेँ विटसभक पूरा जमघट भेटत। [घुमैत]

अरे, ई के अछि जे रोहतकक मृदङ्गीसभक झाँझ आ बाँसुरीक संग यौधेय लोकक बाङ्गड़ गीत गबैत, एक गालपर कुरण्टक फूलक शेखर लटकौने, दहिना काँधपर फड़फड़ाइत किनाराबला भीजल उत्तरीयकेँ नीचाँ नहि सरकय देबाक लेल ऊपर समेटैत, बेर-बेर कूल्हि मटकबैत, बाम हाथमेँ मद्यपात्र उठा नचैत अपानमण्डपकेँ हँसा रहल अछि? [देखि] हँ, चिन्हि गेलहुँ। ई वैह बाप्प नामक बाह्लीकपुत्र अछि, जे बेचारा सभक हँसीक पात्र बनि वेशक मुरगा जकाँ भऽ रहल अछि। सच, हम एकरा कहियो बिना नशा अथवा बिना पिअने नहि देखने छी; दोसर दिस, एकर हाथमेँ कहियो अधेला धरि नहि रहैत अछि।

तखन एकर गुजर-बसर केना होइत अछि? [सोचि] हँ, बुझि गेलहुँ। ई निर्लज्ज दुष्ट सभक हितैषी बनबाक बहाने सभकेँ चूसनिहार भऽ गेल अछि।

गोल बाँधि पिअनिहारसभक बीच गजकक मुठ्ठी लेने ई बाप्प नट, नटी, चेट आ साइससभक बीच घुसि पड़ैत अछि।

पीबाक साधन जुटेबामेँ एकर कौशल कतेक अद्भुत अछि! आब एकरासँ गप्प करब व्यर्थ। [घुमैत] विटजनक ई दोसर चलैत-फिरैत पुरान भण्डार आबि गेल। कामदेवक मन्दिरमेँ देवताक पूजा कऽ घुरैत, फुलायल कासलता जकाँ उज्जर आ छितरायल केशकेँ काँधपर सम्हारैत, रातिमेँ धोएल वस्त्र पहिरने, एक काँधसँ खसल उत्तरीयकेँ फेर यथास्थान राखैत, बूढ़ पुंश्चली सारणिगुप्ता कामदेवायतनक मकरयष्टिक परिक्रमा कऽ रहल अछि; मुदा कनखीसँ बलिपर झपटैत कौआसभसँ घेरायल नचैत मोरोकेँ देखैत जा रहल अछि। सचमुच, एकर देहपर बचल विलास-चिह्न एकर बीतल जवानीक चुलबुलाहट कहि रहल अछि। एखनहुँ—

लटकल स्तन नखक्षतक उज्जर चिह्नसँ भरल अछि। पहिने बेर-बेर चूसल अधर किनारासँ लटकि बीचमेँ गाँठिल भऽ गेल अछि। आइयो पुरान अभ्यासवश भौंह मटकब एकर भीतरक लालसा प्रकट करैत अछि। बुढ़ापा बलपूर्वक एकर रूप तँ हरि लेलक, मुदा नखरा नहि हरि सकल।

एकरासँ गप्प कएने बिना जाएब कठिन अछि। ई हमर प्रिय मित्र मृदङ्गी स्थाणुमित्रकेँ अपन प्रिय कहैत अछि; ताहिसँ स्पष्ट अछि जे एकर क्रोध-शमन औषधि खेनाइ सफल भेल। एकरासँ केना बात करी? [सोचि] ठीक, उपाय भेटल। आइ सँ तीन दिन पहिने बेचारा स्थाणुमित्र एकर संग गाढ़ चुम्बनक बीच अत्यन्त घिनौन अनुभव कएलक। धिक्कार एहन चिमड़ल प्रेमकेँ—

चुम्बनमेँ आसक्त एकर दाँत जड़िसँ उखड़ि ओकर मुँहमेँ जा पड़ल; जीहसँ लगितहि ओ झट दऽ थूक देलक।

एहि कारण वेशमेँ घुसबाक इच्छुक हम जँ एहि घाटकेँ छोड़ि देब—

तँ ठकाइ जाएब। अथवा स्थाणुमित्रक मुँहमेँ एकर दाँत खसबाक बात पसैर गेल होएत। तखन एकर सोझाँ जा फेर लज्जित करब उचित नहि। एकरा दूरसँ नमस्कार। आब हम चली। [घुमैत]

हम वेशमेँ पहुँचि गेलहुँ। अहा! एकर अपूर्व शोभा! एतय अलग-अलग बनल सुन्दर वप्र, नेमि, साल, हर्म्य, शिखर, कपोतपाली, सिंहकर्ण, गोपानसी, वलभीपुट, अट्टालक, अवलोकन, प्रतोली, विटङ्क आ प्रासादसभसँ भरल, चाकर आँगनबला, अलग-अलग भागमेँ बाँटल, सुगढ़ बनावट आ निर्मल जलसँ भरल सुन्दर परिखासँ युक्त महलसभ अछि। कतहु जल-छिड़कावसँ शोभित, कतहु नलक फूँकसँ साफ, कतहु पलस्तर कएल, चित्रित, सूक्ष्म आ स्थूल उभारबला अनेक प्रकारक नक्काशी सँ सजल; बन्ध-सन्धि, द्वार आ निकसल वेदिकाबला छज्जासँ युक्त; बीचक आँगनमेँ कतहु एक, कतहु दू, कतहु तीन गाछसँ अलङ्कृत; गृह-उद्यानयोग्य गाछ, साग-सब्जी, फल आ मालाक फूलक अलग-अलग क्यारीसँ मण्डित; उज्जर कमलसँ छिटकायल वापीक निर्मल जलसँ शोभित; वापीक लग बनल काठक पर्वत, भूमिगृह, लतागृह आ चित्रित कमलक पूर्ण-विकसित फूलसँ सुन्दर; सौभाग्यसूचक वैजयन्ती पताकासँ युक्त प्रधान वेश्याक भव्य महल पृथ्वीसँ आकाश दिस उड़ैत जकाँ देखाइत अछि। एतय—

वेशक बाहर कर्णीरथ ठाढ़ अछि। ओकर चक्काकेँ नखसँ खरोचैत आवन्तिक पुरुष ओकर सहारा लेने बैसल-ऊँघल छथि। दुनू कात वर्दी कसने किरात धुरीसँ सटि पहरा दऽ रहल छथि। ओतहि कम्बोजदेशक घोड़ा आ हथिनी ठाढ़ अछि; महावतसभ निन्नमेँ ऊँघैत अलसाएल छथि, आ पीठपर पड़ल पालान आ कालीन मोड़ि दोहरा कऽ देल गेल अछि। ई सभ सूचित करैत अछि जे हुनकर धनी रईस आ अधिकारी अपन वाहन बाहर छोड़ि वेशमेँ गेल छथि।

आ एही ठाम—

एक दिस जाहि आँखिक नोरसँ जाइत लोककेँ विदा कएल जाइत अछि, दोसर दिस ओही उमड़ैत नोरसँ आएल लोककेँ घर घुरा देल जाइत अछि। रईससभक खुशामद होइत अछि, आ धन गमा कऽ घुरल प्रेमीकेँ खाला धिक्कारि भगबैत अछि।

[घुमैत]

ई अपन रूसल प्रेमीकेँ मना रहल अछि। ई प्रियक अनुनयसँ प्रसन्न भऽ रहल अछि। ई सप्ततन्त्री वीणाकेँ नखसँ झनकारैत, उत्कण्ठित भऽ, सुन्दर काकलीक पञ्चम स्वरमेँ प्रिय गीतक बहाने रोइ रहल अछि।

दर्पण लग राखि ई कामिनी अपन प्रेमीसँ सजाओल जा रहल अछि। ई अपन प्रेमीक चोटी बाँधि रहल अछि। ई मैना केँ बोल सिखा रहल अछि। ई मातल मोर आमक मञ्जरीसँ डाँटल जा नाचि रहल अछि।

ई बहुत काल गेंद खेलि अपन पातर कमर कतेक लचका रहल अछि! ई प्रियक संग बैसि पासा खेलि रहल अछि। ई प्रौढ़ा मनोरञ्जन लेल स्वयं चित्र बना रहल अछि, आ ई कथा पढ़ि रहल अछि।

अरे, आवभगत भऽ गेल। भद्रे, वासु, बैस। बहुत दिनक बाद देखाइ पड़ल छह। की कहैत छह—‘आइ ओकरे सँ पूछिह, जे हमरा भोलीकेँ एना ठकि लेलक।’ हमर दिससँ तँ तूँही मनाओल जाए योग्य छह। मुदा ओ जेकाँ अछि, तोहर लेल भल बनल रहय। लह, हम चली।

कांकायनगोत्रीय वैद्य ईशानचन्द्रक पुत्र हरिश्चन्द्र चन्द्रमा जकाँ कुमुदवापीरूपी वेशवाटिकाकेँ उज्ज्वल करैत एही दिस आबि रहल अछि। एतय एकर की प्रयोजन? [सोचि] स्मरण भेल। ई अपन पुरान प्रणयिनी यशोमतीक बहिन प्रियङ्गुयष्टिकाकेँ चाहैत अछि। हमरासँ सेहो ई भेद नुकबैत अछि। आब एकरासँ भेट कएने बिना जाएब सम्भव नहि। तखन एकरा लग चली।

[लग पहुँचि] अरे, वेशरूपी कमलवनक एकमात्र चकवा, कतयसँ आबि रहल छह? की कहलह—‘तोहर प्रिय सखी यशोमतीक छोट बहिन प्रियङ्गुयष्टिकाकेँ औषधि दऽ कऽ आबि रहल छी।’ बुझाइत अछि, सुरतक भिखमङ्गी ओकर कामाग्नि एहि रोगोमेँ नहि मिझाएल अछि। तूँ ओकरा आओर भड़काबऽक सीख दऽ एलह। की कहैत छह—‘परिहास छोड़। ओकर माथक पीड़ा अत्यन्त भयानक अछि।’ मित्र, की सचमुच एहन अछि? की कहैत छह—‘एहिमेँ सन्देह की? ओ बड़ी कठिनाइसँ नीक होएत।’ ठीक, माथक दुखाइ वेश्याक लेल लाखों रोगक दहेज अछि। देख—

ललाटपर लाख जकाँ लाल चन्दन लगा, मृणाल, कमल-पात आ कमलसँ खेलैत; भौँह नचा नखरासँ कुशल पूछनिहार प्रेमीसभसँ गप्प करैत—विरक्त हो वा अनुरक्त, गणिका माथक दुखाइ कहिए दैत अछि।

की कहैत छह—‘अहाँ आरम्भे सँ अपन कठोर परिहास लेल प्रसिद्ध छी। ओकरा औषधि पिया आबि रहल छी।’ ठीक अछि। निःसन्देह—

कङ्कणसँ सजल हाथ मरोड़ैत, भूमि पर पएर पटकैत, नाभिसँ नीचाँ सरकैत करधनीयुक्त अंशुककेँ हाथसँ सम्हारैत ओहि विशालनेत्रा स्त्रीक केश पकड़ि मुख अपन दिस घुमबैत तूँ ओकर अधररस पीलह, वा अपन अधररूपी औषधिक तलछट ओकरा पिऔलह?

की कहैत छह—‘मित्र, एहन काज तँ तूँही कऽ सकैत छह।’ रे चोर, एखनो जँ तूँ अपन भेद हमरा नहि कहबह तँ...। मुदा आइ सभ विटक मुखिया भट्ट जीभूतक घर कोनो काज लेल विटसभक जमघट होएत। तेँ मित्र, समयपर अवश्य आबिह। की कहैत छह—‘विटसभकेँ पहिनहि ज्ञात अछि जे विष्णुनागक प्रायश्चित्त निश्चित करबाक लेल तेसर पहर पहुँचनाइ अछि। तूँ जा, हमहूँ अबैत छी।’ ठीक, तोहर कल्याण हो। हम चली। [घूमि] सभ विटकेँ एहि बातक समाचार केना भेटि गेल? एहिसँ हमर परिश्रम घटि गेल। आब वेश्या आ मित्रसभक सङ्गमेँ समय बिताओल जाए। अरे, घोड़ा नहि रहितो घोड़ा-जकाँ सजाओल ई ककर चितकबरा बछेड़ा अछि, जे पाटलिपुत्रक पुष्पदासीक दुआर खोलि रहल अछि? [चिन्हि] हँ, बुझलहुँ। ई सेनापति सेनकक सुन्दर पुत्र भट्टिमघवर्मा अछि, जे सौराष्ट्र-विजयक समय काठक उज्जर कुण्डलसँ गाल चमकबैत लाटदेशक डिण्डिसभकेँ पकड़ि मँगौने छल; ओसभ हाथ जोड़ि कहैत छल—‘हमरा सभपर ई अभियोग जे प्रत्यक्ष अपराधी नहि रहितो चिन्हायल बदमाश छी, सत्य नहि अछि।’ एहिसँ गप्प कएने बिना चलि जाएब सम्भव नहि; चलि गेलहुँ तँ स्नेहक फिक्का पड़नाइ प्रकट होएत।

तेँ ओकर लग चली।

[लग पहुँचि] अरे, मित्रक घरमेँ केओ अछि? [कान दऽ] ई तँ स्वयं भट्टिमघवर्मे हमरा बजा रहल अछि। की कहैत अछि—‘मित्र, एहि नव प्रतीहारसभकेँ सेवामेँ देखि आइयो हमरा राजा बुझैत छह? हमर-तोहर बीच ओ राजभाव बहुत पहिनहि बीति गेल। क्षणभर ठहर, हम अबैत छी।’ बालुपर भारी-गम्भीर चालिसँ साँढ़ जकाँ नापि-नापि डेग उठबैत आ कक्षाकेँ शोभित करैत भट्टि एम्हर आबि रहल अछि। एकरा मौजक पुरान अभ्यास अछि; वेश मौजक स्थान, तेँ एकर ई रूप उचिते अछि। आओर—

बाहु झुलबैत ई आबि रहल अछि; एकर छाती आ काँध सुडौल आ उन्नत अछि; नखरासँ भौँह मटकबैत आ बेर-बेर कनखीसँ देखैत अछि। राजमहलमेँ एकर एहन चहलकदमीसँ प्रवेश देखिते बुझाइत अछि जे वीणा-मृदङ्ग बिना एकल-अभिनयबला भाण प्रस्तुत भऽ रहल हो।

तेँ एहिसँ गप्प करी। भट्टिमघवर्मा, बहुत दिन एतय मौज करैत मित्रसभकेँ अपन वियोगमेँ उत्कण्ठित किएक रखने छलह? मुहूर्तभर लेलहुँ तोहर दर्शन भऽ जाए तँ कल्याण। ई हँसैत, दहिना काँधपर लहराइत उत्तरीयसँ शोभित, हाँफैत अक्षरमेँ हाथ जोड़ि हमर स्वागत कऽ रहल अछि। मुदा एखनहि तँ ई कहने छल जे आइ पुष्पदासी ऋतुमती अछि; तइयो ई ओकरासँ केना जुटि गेल? [सोचि] लाटदेशक ई डिण्डिसभ पिशाचसँ कोनो कम नहि। कोना? लाटदेशक लोक भीड़मेँ नाङ्गटे पानिमेँ नहाइत अछि, स्वयं वस्त्र पछाड़ैत अछि, लम्बा केश फटकारि छोड़ैत अछि, पएर धोने बिना पलङ्गपर सुतैत अछि, बाट चलैत जे मोन हो खा लैत अछि, फाटल वस्त्र पहिरबामेँ सङ्कोच नहि करैत अछि, आ दोसरक विपत्तिमेँ ओकरापर चोट कऽ कऽ सेहो अपन बड़ाइए बघारैत रहैत अछि।

अथवा, ई अपन देशक रीति अनुसार काज कएलक।

तखने तँ बेलक फलक चिन्ता नहि कऽ तूँ फूलहि नोचि लेलह।

की कहैत छह—‘कोना?’

रजसँ सनल अपन ई उत्तरीय देख।

की कहैत छह—‘हमरा बुझाइत अछि, खाटसँ लटकैत ई पानक पीकमेँ सनि गेल।’ एना नहि कह। छिटकल छोट मोती जकाँ पसेनाक बूँदसँ भरल तोहर ई ललाट की कहि रहल अछि? ई कात भऽ जोर-जोरसँ हँसि रहल अछि। रे नीच, अधम कामुक, की तूँ ओकरासँ छल कएलह? की कहैत छह—‘छलक बात केहन? ओ तँ हमर हृदये पकड़ि लेलक। सुन—’

घुँघरायल केशक अगिला भाग सजा जमा देलासँ जकर ललाट विस्तृत देखाइत अछि; अर्धोरुक पहिरलासँ जकर भरल जघनभाग मनोहर लगैत अछि; सोझाँक आभूषण उतारि देलासँ जकर देह उघार-जकाँ बुझाइत अछि—एहन स्त्रीलता पुष्पवती रहितो की अस्पृष्ट छोड़ल जा सकैत अछि?

आओरो सुनबाक योग्य अछि—

पार्श्व दिस आँखि घुमा, नखक खरोंच देखैत, माथ किछु नुका, अपन घरक छायामेँ बैसल ओकरा जखनहि हम देखलहुँ, ओ दुनू हाथसँ काँपैत कठोर स्तन पकड़ि घरमेँ घुसि गेल आ हाथसँ देहरी ठेलि दुआर बन्न कऽ लेलक। तखन हमहूँ झटपट भीतर घुसि—

जखनहि ओकर केश पकड़ि घीँचलहुँ, ओ विशाल आँखिसँ हमरा दिस तकय लागल। तखन, हिलैत स्तनबाली ओ ‘की करैत छी? नहि-नहि’ कहिते रहल, आ हम ओहि विलासिनीकेँ चुमिए लेलहुँ।

वाह, पहिल भेंट केहन अद्भुत भेल! हम ओकरासँ पूछब। ठीक, फेर की भेल? की कहैत छह—‘सखे—’

करधनी हटि गेलासँ उघरल जघनभागपर हमरा आबि गेल देखि ओ लाजसँ हमर आँखि बन्न कऽ देलक। धिक्कार छह! तूँ नीच, घृणित आ आर्यजन लेल निन्दनीय छह।

की कहलह—‘एना कहियो अहाँ हमरा अनुगृहीत कएलहुँ। की अहाँ महाभारतमेँ पहिने नहि पढ़ने छी—’

जकर बहुत शत्रु नहि, जकरासँ लोक नहि डरैत अछि, आ जुटि कऽ जकर निन्दा नहि करैत अछि—हे पार्थ, ओ पुरुष नहि, पुरुषाधम अछि। असलमेँ ईएह तँ डिण्डित्व अछि। हम तोहर एहि डिण्डित्वपर पूर्ण प्रसन्न छी। तूँ विटसभक एकछत्र राजा होएबाक योग्य छह। ई हमर आशीर्वाद लह—

की कहैत छह—‘हम सावधान छी।’ तँ सुन—

भोर भेलापर लगमेँ सुतल तोहर पीठकेँ बाहुमेँ भरि, निर्भीकतासँ अपन उघरल एक जाँघ तोहर पार्श्वपर राखि, केश घीँचि तोहर मुखकमल अपन दिस घुमबैत प्रिया तोहर अधररस पिबय आ अपन अधररस तोरा पियाबय।

‘हम अनुगृहीत भेलहुँ’ कहि ई निकलऽ चाहैत अछि। तँ अहाँ ‘भगवान्’केँ हमर प्रणाम। हमहूँ चली।

[घूमि] अरे, ई के अपन घरक झरोखापर विमानमेँ अप्सरा जकाँ साजि रहल अछि? ई काशीक प्रमुख वेश्या पराक्रमिका पिच्छोलासँ खेलैत, रूप-लावण्यक अठखेलीसँ आँखिक तृष्णा शान्त कऽ रहल अछि।

सोनाक वैकक्ष्यकसँ स्तन कसि, अर्धोरुक पहिरि नितम्ब स्पष्ट उभारैत, कामीसभक चित्त मथैत वेशवल्लीक चञ्चल किसलय जकाँ ओ झूमैत चलि रहल अछि।

आओर—

एक कातक कनपटीपर लटकल जड़ाउ कुण्डलक मणिक आभासँ ओकर मुख चमकि रहल अछि। दीर्घ अभ्यासक कारण ठोढ़ीक नीचाँसँ ‘ई-ई’ करैत फूँक निकालि अधरपर राखल पिच्छोला मधुर स्वरमेँ बजा रहल अछि। ओहि ध्वनिमेँ बेङ्गक टर्राहट बुझि घरक मोर गर्दनि घुमा-घुमा चक्कर काटि रहल अछि।

एकर घरसँ इन्द्रस्वामीक रहस्यसचिव हिरण्यगर्भक हड़बड़ा कऽ निकलैत एम्हरे आबि रहल अछि। एहिमेँ आश्चर्य की? इन्द्रस्वामी आ हिरण्यगर्भक वेशमेँ भेटथि—ई तँ गरमक संग गरमक मेल भेल। ई हाथ जोड़ि प्रणाम कऽ रहल अछि। अरे हिरण्यगर्भक, तूँ एहि वेशरूपी देवालयकेँ अपरान्तक पिशाचसभसँ ध्वस्त किएक कराबऽ चाहैत छह? की कहैत छह—‘हमर स्वामीकेँ परदेशी माल चखबाक चस्का अछि, ताहि लेल ई काज हमरा सौंपने छथि। पहिने ओ पाँच सय स्वर्णमुद्रा गनि लैत छल; आब एक हजारोपर खुशामद कऽ ओकरा राजी करब कठिन अछि। ओकर भाव ठहराबयमेँ हमर सहायता करू।’

तूँ भोलेपनकेँ सेहो मात दऽ देलह। लाख देलोपर ककरो प्राण नहि भेटैत अछि। की कहैत छह—‘अहाँ हमरा सभकेँ ओकर प्राणक संकट का कारण किएक बुझैत छी?’ सभकेँ ज्ञात अछि जे भर्तृस्वामी अपन चामरधारिणी कुटङ्गदासीक संग जुटि गेल छलाह, तेँ ओकर प्राणे संकटमेँ पड़ि गेल छल। की कहैत छह—‘मारियो देथु, मुदा सत्य ईएह अछि।’ अरे, असत्यक आश्रय लेबऽ पड़य तँ ले, मुदा स्वामीकेँ एहन बात नहि कहिह। की कहैत छह—‘हमर स्वामीक ई पुरान आदत अछि।’ हुनकासँ छुड़ेनाइ सम्भव नहि। मुदा बात एतेक खराबो नहि। देख—काङ्कणक स्वामी ओ दाक्षिणात्यकेँ कोन वेश्या नहि चाहत, जँ ओ सज्जन जकाँ ओकरा संग सहवास करथि।

आओर—

भारतयुद्धमेँ मत्त हाथी घुमबैत भगदत्त जकाँ, वेश्याक आँगनमेँ हाथी नचबैत ओ इन्द्रदत्तकेँ देख। स्तनपर अपन करकमल रखने वेश्यसभ ओकरा एना देखैत अछि जेना भयभीत हरिणी बाघकेँ। आ ई स्त्री, हमर स्वामी अधिराज इन्द्रदत्तक साला पारशव कौशिक सिंहवर्माकेँ अपन मित्र कहि लग बजबैत, सभ कामीकेँ अँगूठा देखा निराश कऽ दैत अछि। की कहैत छह—‘ओ बहुत कामी अछि, तेँ ई ओकरासँ छुटकारा चाहैत अछि।’ अति-सेवन तोहर देशक रीति अछि। की कहैत छह—‘देशक रीति वा अरीति हम नहि बुझलहुँ; स्पष्ट कहू।’ तोहर एहन शिष्ट व्यवहार देखि हम केना नहि कहब? सुन—

काकली-रतिमेँ ओकर पएरक नख कान लग आबि खरोंच करैत अछि; तखन ओ अङ्कुशक चोट खाएल जङ्गली हाथीक बच्चा जकाँ ओकर उघरल जघनस्थलपर एना टूटि पड़ैत अछि, जेना साँढ़ बछियापर।

की कहैत छह—‘आब हम ईएह सौगात लऽ मालिक लग जाएब।’ जँ एना अछि तँ इन्द्रस्वामीकेँ कहिह—

दन्तक्षतसँ चित्रित नितम्बबाली, प्रियक माला केँ मेखलाक जकाँ धारण कएनिहार ओ स्त्री, तोरा छोड़ि दोसरक लेल हजारों मुद्रा गनौलोपर अपन जघन नहि उघारैत अछि। तोहर कल्याण हो, हम चली।

[घूमि] अरे, ई के शूर्पारकक वेश्या शमदासीक घरसँ निकलि, डिण्डिकसभसँ घेरायल, वेशकेँ प्रकाशित कऽ रहल अछि? [देखि] ई तँ उदीच्य, बाह्लीक, कारूष आ मलद देशक स्वामी महाप्रतीहार भद्रायुध अछि, जे विटसभक चलैत-फिरैत तीर्थ अछि।

केशक जूड़ा बान्हि, कानमेँ काठक बनल पैघ उज्जर कलश पहिरि, साथीसभक बीच ‘ज-ज-ज’ करैत गप्प करैत ओ गुजरातीक नकल कऽ रहल अछि।

लाटदेशक लोकपर एकर एतेक कृपा किएक?

लाटदेशक मनुष्य दुनू बाहुपर उत्तरीय लपेटि, बटल पटुकासँ कमर बान्हि, सोझाँ अबिते ‘श-श-श’ करैत टेढ़ काँधबला कुबड़ा जकाँ पएरपर खसैत आबैत अछि।

आओर—

छातीपर दुनू हाथसँ कपोतक आकृति बना, ‘य’क स्थानपर जोर-जोरसँ ‘ज-ज-ज’ करैत हकलाइत अछि। दुइरङ्गी बटल पटुकासँ बीचमेँ कमर कसि ओ एना बचि-बचि चलैत अछि, जेना ओकर अँगुरीसभ कीचड़मेँ सनि रहल हो।

दोषरहित ऐश्वर्य कतय? अथवा, विदेश आबि मौज-मजाक असगरे एकरे शोभा दैत अछि। कोना?

जे अपरान्त, शक आ मालवक राजासभक माथपर अपन दुनू पएर राखि हुनका नुका देलक; इच्छानुसार विहार कऽ किछु काल बाद अपन माता आ माँ गङ्गाक देश घुरि, मगधराजकुलक लक्ष्मीकेँ संसारमेँ प्रकट कएलक।

आओर—

समुद्रतटसँ बहैत पवनक हलुक थपकीसँ बिथुरल केशबाली अपरान्तदेशक उत्कण्ठित रमणीसभ महासागरक तटपर हिन्तालक कुञ्जमेँ वृक्षलताकेँ नुका ओकर विजयचरितक गान करैत छथि।

ओ गीत की अछि—

मनुष्यता आ अस्त्रविद्या—एहि दुनूमेँ भद्रायुधक बराबरी केओ नहि कऽ सकैत अछि। ओकर सफलता सुनि जे ओकर समान होएबाक इच्छा करय, ओ मानो सूअरक भोजन करैत अछि।

[घूमि]

एतय केओ प्रद्युम्न अर्थात् कामदेवक देवालयक ध्वजा चित्रित कऽ रहल अछि। ई कोनो डिण्डिकक काज होएत। ई डिण्डिकसभ बानरसँ बहुत कम नहि होइत अछि। भला, चित्रक कोन विशेषता डिण्डिकसभकेँ प्रिय होइत अछि? सुन—

ई डिण्डिकसभ बनल चित्रमेँ अपन दिससँ किछु लीप-पोत कऽ ओकरा बिगाड़ि दैत अछि; घरक पोतल देबालपर कूचीसँ स्याही लगा गन्दा करैत अछि; आ तीक्ष्ण नोकदार टाँकी लऽ महलक भागसभमेँ घुनक कटल जकाँ खरोंच बना दैत अछि।

ई की चित्र बना रहल अछि? [देखि] अरे, ई तँ ‘निरपेक्ष’ अछि। एकर नाम उचिते अछि। ठीक कहल गेल अछि—धन शील हरण कऽ लैत अछि। ताहि कारण ई भरल-पुरल मनुष्य हमर ओहि प्रिय सखीप्रति उदासीन अछि, जकर कारण ओ वेशमेँ तपस्विनीक व्रत धारण कऽ दुबराइत जा रहल अछि।

ओ बेचारी त्रिवली-प्रदेशमेँ बाँकी रोमावली प्रकट करैत तीन वस्तुक भार तीन ढङ्गसँ उठा रहल अछि—नेत्रजलकेँ बाँक, सघन, कारी बरौनीक अग्रभागपर; मुखकेँ हाथपर, जकर कङ्कण नोरक बूँदसँ भीजि रहल अछि; आ भारी शोककेँ हृदयपर।

तेँ एहि पर किछु फब्ती कसि। अरे भागवत निरपेक्ष—अथवा भागवतसभसँ कतराएनिहार—तूँ करुणामय भगवान् बुद्धक मैत्री अनुसार आचरण करैत छह।

तखन कामशास्त्रक मुद्रासँ चिह्नित ओहि स्त्रीप्रति तोहर ई उपेक्षा-विहार उचित अछि? की कहैत छह—‘हम एहि कटाक्षक अर्थ बुझलहुँ। आब हम उपासक भऽ गेल छी। तथागत कहने छथि—ईएह संसारक धर्म अछि।’ अरे, एना नहि कह। तथागतक वचन केवल ओकरे लेल लागू अछि, दोसर ठाम नहि? की कहैत छह—‘कहू, कतय आ कहिया तथागतक वचन हमरा लेल प्रमाण नहि अछि?’ अरे, तोहर एहन प्रतिज्ञा? की कहैत छह—‘एहिमेँ सन्देह की!’ भलमानुस, सुन—

भागबाक श्रमसँ जकर जीह लटकैत अछि, जे माथ उठाए ऊपर दिस ताकि रहल अछि, जकर हृदयमेँ निष्ठुरतासँ बाण धँसाओल गेल अछि—शिकारमेँ सोझाँ आएल एहन हरिणक दुःखपर तूँ ध्यान नहि दैत छह, मुदा तथागत बुद्धक ध्यान करब जानैत छह।

अरे, ई ठहाका मारि हँसल। की कहैत अछि—‘तथागतक शासनपर शङ्का नहि करबाक चाही।’

शास्त्र एक बात अछि, मनुष्यक स्वभाव दोसर; आ हमहूँ वीतराग नहि छी। जँ बात एहन अछि तँ ओहि दशामेँ पड़ल स्त्रीकेँ... की कहैत छह—‘आज्ञा, प्रणाम; प्रसन्नतासँ विदा दीअ।’ अर्थात् कोनो तरह पिण्ड छूटय! तोहर लेल मोक्ष सर्वथा असम्भव अछि। तइयो हमर आशीर्वाद लह—

बाहरसँ आबि उत्कण्ठित आ नतमुख प्रियाकेँ अपन कोरामेँ बैसाबह; काँधपर माथ राखि कानैत ओकरा फेर सान्त्वना दह; महिसिक सीङ जकाँ बान्हल ओकर विषम वेणी खोलह; आ प्रियाक गरम नोरसँ भीजल लम्बा अलक स्वयं अपन हाथसँ सुलझाबह। ओ दाँत देखबैत चलि गेल। हमहूँ चली। [घूमि] अरे, ई के एम्हरे आबि रहल अछि—

मैला चीवरक चिथड़ासँ गुप्ताङ्ग ढाकने, बकरा-जकाँ मुखबला, पीयर, रूई-जकाँ रोआँबला, भरल काँधबला, बानर-जकाँ कञ्जी आँखिबला, मूली खाइत ई कोनो दाशेरक आबि रहल अछि—सचमुच, एहि रूपमेँ ई पिशाचे नहि हो!

अच्छा, चिन्हलहुँ। एकरा हम अपन बन्धु वा मित्र दाशेरकाधिपतिक पुत्र गुप्तकुलक घरमेँ कहियो देखने छी। एकर एतय की काज? ई हाथ जोड़ैत हमर दिस आबि रहल अछि। की कहैत अछि—‘गुप्तकुल आज्ञा देने छथि—तूँ नुकाइ कऽ देख। हम एकमुष्ट पाँच पण देब। की कोनो गणिका एतेक बयाना पर सन्तुष्ट होएत? नगरवीथिमेँ ठसाठस भरल गणिकासभमेँ जँ एहन कोनो देखाइ पड़य तँ हमहि ओकरा ई बयाना दऽ देब। तेँ स्वामीक आज्ञा स्मरण करैत आ किछु अपन स्वार्थो सँ हम मूल्यकेँ चौगुना धरि बढ़ा कऽ कहि देलहुँ। मुदा एहि समय गणिकासभ, यद्यपि कामसँ भरल छथि, कुलकन्या जकाँ कामक बाते नहि करैत छथि। जँ जा कऽ ई उलटा समाचार कहब तँ दण्ड भेटत। सभ धनिक एके रंगक होइत छथि।’

वाह! देश, वेश, भाषा आ दाक्षिण्यक गुणसँ युक्त युवराज गुप्तकुलक मदनदूत वेशमेँ ठाढ़ रहितो वेशक ओहि दोकानक पता पूछैत अछि जतय ई माल बिकैत अछि। एहन रत्नकेँ ठीक बात बता झट दऽ विदा कऽ देब उचित नहि। ई एहेन बनल रहय। तेँ एकरा एना कही।

अरे भाइ, राजवीथिमेँ छलावणिकापण अर्थात् नूनक दोकानसभपर जा कऽ गणिका खोज। ई प्रसन्नतासँ प्रणाम कऽ चलि गेल। हमहूँ चली।

[घूमि] आब दाशेरकक दर्शनसँ धूरि भरल आँखि कतय धोई? [देखि] ठीक, देखाइ पड़ल। ई हमर पुरान प्रणयिनी शूरसेनसुन्दरीक घर अछि। बगलक दुआर केना खुजल अछि? भीतर चली। [प्रवेश कऽ] कतय बैसि पैदल चलबाक थाकनि दूर करी? ठीक, बुझलहुँ। ई प्रियङ्गुक वीथी अपन शीतल चबूतरापर बैसबाक लेल प्रियाक कोरा जकाँ हमरा बजा रहल अछि। एतय बैसी। [देखि] एतय की लिखल अछि? [पढ़ैत]

हे सखी, प्रथम समागममेँ कलहक अवसर नहि अबैत अछि; तोहर ओ प्रियतम रूसल, सेहो नहि सुनल; न ओकर रोगक समाचार भेटल। दीर्घ अभिलाषाक बाद भेटल ओहि युवकक लगसँ तूँ अङ्गरागक रचना मेटेने बिना किएक घुरि अएलह?

[सोचि] ई प्रेममेँ ठुकराओल कोनो स्त्रीक दुर्भाग्यक घोषणा अछि। ककरासँ पूछी? [कान दऽ] अरे, पएरक आभूषणक झनकारसँ बुझाइत अछि शूरसेनसुन्दरी एम्हरे आबि रहल अछि। ई पल्लव-जकाँ कोमल एक हाथसँ सुन्दर छत्रक डाँड़ी धएने अछि; दोसर हाथसँ चञ्चल मणिसँ गुँथल करधनीबाली सरकैत नीवीक छोर पकड़ि खिसकैत रेशमी वस्त्र सम्हारि रहल अछि। आभूषणक चमकसँ झिलमिल करैत अङ्गयष्टिक संग मुस्कुराइत ई एना आबि रहल अछि, मानो चन्द्रमा, नक्षत्र आ पक्षीक कलरवसँ शोभित रातिक अधिदेवता हो।

अरे, सचमुच एकर तेज हमरा सेहो उठबाक प्रेरणा दऽ रहल अछि। हाथ जोड़ने हमर दिस आबि रहल अछि। अरे, एहि औपचारिक स्वागतसँ हमरा निपटाउ नहि। की कहलहुँ—‘बहुत दिन बाद स्वामी अएलाह, तेँ उपचार द्वारा ई सेविका अपनेकेँ अनुगृहीत करऽ चाहैत अछि।’ बस-बस, बहुत उलाहना भऽ गेल। तोहर लेल योग्य हमर कोराक एहि आसनपर कृपा कर। ‘अहाँक आज्ञा माथपर’ कहि ओ आधा पटियाकेँ अपन नितम्बसँ घेरि बैसि गेल। अरे, तोरा एतय नहि बैसबाक चाही।

की कहलहुँ—‘किएक?’ एतय कोनो ठुकरायल प्रेमिकाक चरित केओ श्लोकमेँ अपन बदनामीक रूपमेँ लिखने अछि; हम देखलहुँ। [ई हाथसँ किएक मेटाबऽ लागल?] चोरनी, एकरा मेटेनाइ सम्भव नहि; ई तँ हमर हृदयमेँ लिखाए गेल। किएक नुका रहल छह?

की कहलहुँ—‘अहाँ तँ सभ जानैत छी जे हमर सखी कुसुमावतिका अहाँक प्रिय मित्र चित्राचार्य शिवस्वामीप्रति गम्भीर कामोन्मादमेँ अछि।’ खूब जानैत छी; ईहो जे कुसुमावतिका अपन आगमनसँ ओकरा अनुगृहीत कएलक। की कहलहुँ—‘कामविकल स्त्रीहृदयक ईएह स्वभाव; ओ स्त्रीसुलभ चपलता देखौलक।’ विचित्र बात! हम पूछी। अरी, तोहर दुनूक जे विश्वास हमरा प्राप्त अछि, ताहि कारण पूछैत छी, परक भेद जानबाक कौतूहलसँ नहि। कह, दुनूक दीर्घ-अभिलषित कामोत्सव सुखपूर्वक सम्पन्न भेल? की कहैत छह—‘सुनू।’ हम सावधान छी। तूँ कहलह—‘वारुणीक नशा चढ़लापर जखन ओ शिवस्वामीकेँ अनुगृहीत करऽ चाहलक, तखन अहाँक मित्रक ई दशा भेल—’

अपन अरुचिकर कुश्तीक कथा कहैत-कहैत ओ पहिल पहर बितौलक। दोसर पहर तिलकुट, गुड़ आदिक निरर्थक चर्चामेँ बीति गेल। तेसर पहर बकराकेँ पुष्ट बनाबक उपाय कहैत-कहैत समाप्त कऽ देलक। ओकर बाद जे भेल, ओ अहूँसँ नहि कहब पड़य तँ नीक। सुन्दरी, तोरा एहि सभक समाचार कतयसँ भेटल? तूँ कहलह—‘ओकरे मित्रक घरसँ आएल प्रतीहार पद्मपालसँ समाचार पाबि हम ई श्लोक कुशल-प्रश्न करनिहारक हाथ पठा देलहुँ। तखन ओ ओहि परिचारकक संग आबि लजाइत हँसि हमरा कहलक—“तोहरासँ भेद नुका तोरा परेशान नहि करऽ चाहैत छी। तेँ ई नव घटना सुन।” तखन ओ हमरा अपन बीतल सत्य घटना कहलक। अहूँ एहि श्रवणामृतमेँ भाग लिअ।’ ई ताली पीटि हँसैत कहि रहल अछि। सुन्दरि, की कहैत छह—‘हमर सखी जे हमरा कहलक, आब सुनू। ओ कहलक—“हे प्रिय सखी—”’

हम ओकर आलिङ्गन कएलहुँ, चुम्बन लेलहुँ; ओकर नितम्बपर नखक्षत बनौलहुँ आ रतिक लेल उकसौलहुँ। मुदा जखन ओ काठ जकाँ जड़ रहि हमरा संग नहि मिलल, तखन हम खिसिया खाटुक पाटीसँ लिपटि पड़ि रहलहुँ।

तखन हम कहलहुँ—‘तूँ बहुत कष्ट सहलह। की हम एतेको नहि...’

तखन हम कहलहुँ—‘तूँ बहुत कष्ट सहलह। की हम एतेको नहि बुझैत छी?’ ओ उसास लऽ हमरा कहलक—‘हम अपन दिससँ सभ उपाय कएलहुँ, तइयो ओ हमर प्रति अपन काम नहि जगा सकल। तखन अचानक अपन सभ जुगति निष्फल देखि आ अपन दुर्भाग्य बुझि हम छाती पीटि कानऽ लागलहुँ।’

तखन कनैत हमरा कोरामेँ लऽ बेर-बेर निरर्थक चुम्बन आ आलिङ्गनसँ सान्त्वना दैत ओ स्वयं खूब थाकि गेल। हम कहलहुँ—‘हाथसँ छूने की होएत?’ तखन लज्जा आ घबराहटसँ पसेनासँ तर, सुखाइत मुखसँ ओ दबा कऽ किछु शब्द कहलक—

हे अनिन्दिते, अपन सौभाग्यक निन्दा नहि कर। एतेक पैघ निधि सोझाँ रहितो हमर आँखि फुटि गेल! चरबी घटेबाक लेल जे पहिने गुग्गुल सेवन कएने छलहुँ, सैह तोहर संग मिलनक अमृतसुखकेँ मारि रहल अछि।

तखन हम सोचलहुँ—

चरबी घटेबाक लेल पिओल गुग्गुल जँ इन्द्रियशक्तिक जड़ एना काटि दैत अछि... हम दुनू दीर्घकालसँ अभिलषित सुरतक असफल भऽ गेलापर सोचि रहल छलहुँ जे आब की करी, तखने—

राति बीतबाक सूचना देनिहार राजकीय नगाड़ाबला घड़ियाड़ी जोर सँ घण्टा बजा स्तुतिमङ्गल पढ़लक। अनुकूल मित्र जकाँ ओ हमरा ओहि सङ्कटसँ मुक्त कऽ देलक। तखन ओ कामी लज्जासँ मुहूर्तभर संग चलि हमरा छोड़ि देलक। हम जखन घर घुरलहुँ, ओहि समय कुशल पूछबाक दूत पठा तूँ मानो हमर उपहास कएलह।

तेँ हम तोरा पूरा वृत्तान्त कहि देलहुँ। आब ओ निरर्थक रतजगाक थाकनि दिनमेँ सुति कऽ दूर करब। एना कहि ओ विदा भेल। ओकर बाद अएलहुँ अहूँ सभ सुनि लेलहुँ।’ तँ महाशय शिवदत्तक पुत्र ई शिवस्वामी अपन पुरुषार्थक जे झूठ यशरूपी गम्भीर समुद्र बना रखने अछि, तकर थाह परिहासक नावसँ लेब। देख—

हे चण्डि, जे चरबी बढ़लापर गुग्गुल पिबैत अछि, ओकर चरबी शीघ्र घटि जाइत अछि; मुदा ओ जवान स्त्रीसभक लेल चित्रमेँ बनल यक्ष जकाँ केवल देखबामेँ सुन्दर रहि जाइत अछि।

ओ हँसि उठल—‘आब हम जाएब।’ अरे, प्रणामक आवश्यकता नहि।

हमहूँ चली। [घूमि]

मृणालसहित कमलक झाड़ी जकाँ जकर शोभा अछि; जे अपन मुखकमलयुक्त ग्रीवा ऊपर उठौने छथि; जकर रंगबिरङ्गी चितवन खुजल अछि; जे छातीपर हाथ राखि एक-दोसराकेँ घुरबाक सङ्केत कऽ रहल छथि; आ जे गेंद, पिच्छोला-बाजा, गुड्डा-गुड़िया आ खेलौनासँ विराम पाबि वेशक गल्लीमेँ भवनक छायामेँ ठाढ़ छथि—एहन वेशकन्यासभक समूह ई की देखि रहल अछि? अरे, ई की अछि?

की ई पैघ कुण्डा उछलैत आबि रहल अछि, वा केओ मशक घिसिआइत आनैत अछि? अथवा कबन्ध उठि ठाढ़ भऽ गेल, वा दुइटा कोठी चलि रहल अछि? ई कोन आश्चर्यमय वस्तु? अच्छा, आब बुझलहुँ—ई तँ उपगुप्तक तोंदबला शरीर लुढ़कैत आबि रहल अछि। एकर रूप देखि बुझाइत अछि जे धूर्तमण्डलीमेँ उपनाम ठीकहि देल जाइत अछि—

सरकारी माल नुकाइ गटकि जाएनिहार कोतल-गणक हरिकृष्ण कारी जङ्गली भेँड़ा अछि; हरिभृति पूरा महिसि; आ दत्तिगुप्त हवासँ फूलल मशक।

ई की बात जे बेचारी गङ्गा-यमुनाक चामरधारिणी, पुस्तकवाचिका मदयन्ती, हमर प्रिय मित्र ओहि त्रैविद्य-वृद्ध पुस्तकवाचककेँ छोड़ि उपगुप्तमेँ अनुरक्त भऽ गेल? ओ तँ अपन कोमल बाहुसँ ओकर नीक जकाँ आलिङ्गन करैत छल। मुदा ओ बेचारीकेँ आलिङ्गनमेँ कोनो रस नहि; रजःप्रवाह सूखि गेलासँ ओ कामतन्त्रसँ वञ्चित भऽ चुकल अछि। आब केवल परिवार पोसबाक लेल गप्प-बातसँ चुहल करैत अछि। ओकर लेल ई उचिते अछि। दत्तकक अनुयायी कहैत छथि—पौरुषशक्तिसँ रिक्त व्यक्ति गप्पे सँ काज निकालऽ चाहैत अछि। [देखि] ई किछु उद्विग्न किएक देखाइत अछि?

हँ, बुझलहुँ।

एकर सासु धनक कारण एकरा अधिकरणमेँ घसीटने अछि—एहन समाचार हमरा वेशमेँ भेटल। तँ सासु-जमाइक विवाद भेल अछि। ई खूब मनोरञ्जक बात। एहिसँ बचि अपनाकेँ घाटामेँ नहि राखब। लग चली। [लग पहुँचि] अरे जनानिए हाँड़ी, वेशवीथीक यक्ष, तूँ एतय कतय? पैदल चलने अल्पहि मेँ थाकि, हाँफैत आ लड़खड़ाइत स्वरमेँ प्रणाम कऽ ठाढ़ भऽ गेल। तोहर कल्याण हो। की कहैत छह—‘ओहि बूढ़ी हरजाईक संग विवाद लेल कुमारामात्यक अधिकरणसँ आबि रहल छी।’ तँ तोरा विजयक बधाइ दी, वा जुर्मानाक राशि देबामेँ सहायता करी? की कहलह—‘विजय आ दण्ड कतय? केवल क्लेश भेटल।’ किएक? की कहैत छह—

अधिकरणक दशा ई अछि जे विष्णुदास ध्यानस्थ जकाँ बैसल रहैत अछि; ओकर भाइ कोङ्क वसूली लेल हमरा धमकौने छल आ एखनहि पिटबा चुकल अछि। विष्णुदास उलटा हमरे डाँटैत अछि, आ अधिकरणमेँ बैसल-बैसल ऊँघैत अछि।

आओर—

ओतय अधिकारीसभ घूस माँगैत छथि; पुस्तपाल आ कायस्थ सेहो माँगिते रहैत छथि। काष्ठक महत्तर अर्थात् कचहरीक प्यादासभ बहुत देर धरि माँगि आब हमरा पकड़िए लेल। ओतयसँ हमरा ई अनुभव भेल—

गणिका आ कायस्थ, कायस्थ आ गणिका—एहि दुनू पर विचार करिते बुझाइत अछि जे गणिकाकेँ धन देनाइ नीक, कारण ओकरासँ कमसँ कम आनन्द तँ भेटैत अछि।

बधाइ जे कायस्थक जालमेँ फँसियो तोरा सुरक्षित बाहर आएल देखैत छी। तूँ पूरा उस्ताद छह। हमर ई आशीर्वाद लह—

शय्यापर मधुर स्वरमेँ गुनगुनाइत, मदालसा आ कामोन्मुख मुख्य वेश्या वक्त्र आ अपरवक्त्र मुद्रामेँ तोहर सत्कार करय। ओ ताली पीटि हँसैत चलि गेल। हमहूँ चली। [घूमि] अरे, ई दोसर के अछि—

झुर्री पड़ल देहपर गुजराती ढङ्गक विचित्र खौर बना, मातल आँखि आ पिचकल गालमेँ दबल हँसी लऽ ई के, कोन कारण एहि वेशरूपी स्वर्गमेँ आबि रहल अछि?

ठीक, चिन्हलहुँ—

ई शकरपालक घरमेँ तृणपिशाच चर्मकार कीरसँ डाइन कोङ्कचेटीकेँ जन्मल पिजन्ना अछि।

आओर—

ओ शकरपाककेँ अपन पिता आ निरपेक्षकेँ भाइ कहैत अछि। प्रायः दोकड़हा कुलक लोक पाखण्डक संगहि जन्म लैत अछि।

[घूमि] अरे, एहिसँ की पूछी? देशमेँ एकर की प्रयोजन?

अरे, बूढ़ विट भट्टिरविदत्त एम्हरे आबि रहल अछि। तेँ एकरे सँ पूछी। अरे भट्टिरविदत्त, एहि पुरुष-वेतालक चकलेमेँ आएबाक अर्थ तूँ जनैत छह? की कहैत छह—‘अहाँही जानू।’ तँ जा। [घूमि] मनुष्यसभक एहि बीहड़मेँ फँसि थाकल मोनकेँ कतय बहलाई? ठीक, बुझलहुँ—

ई हमर प्रिय मित्र रामक घर अछि, जे वेश्यारतिसँ कहियो विश्राम नहि लैत अछि—

आ मित्रसभक आबि जाएबाक भय सँ घरमेँ भीतरसँ साँकल लगा रखने रहैत अछि।

तखन भीतर कोना जाई? [कान दऽ]

नूपुरक झनकारसँ मिलल मेखलाक झनझन सुनाइत अछि; कङ्कणक खड़खड़ाहट मुक्का चलबाक सूचना दैत अछि; घरक भीतरसँ अबैत सिसकारी आ उसास निश्चयपूर्वक कहैत अछि जे रामक स्त्री रामक संग विपरीत-रतिमेँ रमि रहल अछि।

तेँ एतय प्रवेश उचित नहि। सुरतरथक चलैत धुराकेँ के तोड़त? हमहूँ चली। [घूमि] अरे, दोसर—

की ई जरल सेमरक गाछ अछि, जकर फुनगीपर किछु डाढ़ि बचल अछि? वा कारी, लम्बा विटरूपी बगुला? अथवा वेशरूपी पोखरिकेँ झुलसाबऽ आएल मरुभूमिक भूत?

ठीक, चिन्हलहुँ—ई सोपारक तौण्डिकोकि सूर्यनाग अछि। एकर एतय की प्रयोजन? हमरा देखि उत्तरीयसँ मुख ढाकि कामदेवक मन्दिरकेँ दहिना छोड़ि चुपचाप किएक निकलि रहल अछि? आइ सँ तीन दिन पहिने बहिःशिविक महल्लाक छप्परबला कुटङ्गागारमेँ रहनिहार पताका-वेश्यसभ एकरापर अभियोग लगौने छल। म्लेच्छ आ श्वपच श्रावणिक जखन एकरा मुकदमा लेल अधिकरणमेँ घसिटि अनलक, तखन बलदशक स्कन्धकीर्ति ‘ई हमर स्वामी विष्णुक साहू अछि’ कहि बड़ी कठिनाइसँ छुड़ौने छल—मित्र विष्णुनाग हमरा एना कहने अछि। फेर ई आब वेशमेँ आएबासँ लजाइ किएक अपना नुकबैत अछि?

[सोचि] राजकुमारक पार्श्ववर्ती भेलासँ एकरा अपन एहि हरकतपर लज्जा होइत अछि। आश्चर्य! गुणवानक सङ्गतियो गुणकारी होइत अछि; ताहिसँ एकर जकाँ लोक सेहो गुण दिस आकृष्ट भऽ गेल। बिना परिचय प्रकट कएने एकर इच्छा पूर्ण नहि होएत। हमहूँ दहिना दिससँ चक्कर काटि सोझाँ पड़ल एकरापर परिहासक आक्रमण करी। [घूमि] हमरा सोझाँ देखि ई हँसल। अरे जनानिया सूर्यनाग, मित्रकेँ बिना खबर देने वेशमेँ अपन एहि नव आगमनकेँ अन्हारक नाच जकाँ निष्फल किएक करैत छह? की कहैत छह—‘हमर एतय आएबाक की अर्थ? कारागारमेँ बन्न अपन मामा मौद्गल्य पारशव हरिदत्तक पूर्व प्रणयिनीक रोगक समाचार लेबाक लेल पठाओल गेल छी। तूँ किछु दोसर बुझैत छह?’ आश्चर्य, मित्रक काजमेँ तोहर एहन दृढ़ता, आ आपत्तिमेँ पड़ल पूर्वप्रेमीप्रति एहि वारमुख्याक एहन आस्था! तखने तँ—

जे वर्णानुकूल उज्ज्वल वेश पहिरैत अछि आ कामीसभसँ अपन भेद नुका कऽ रखैत अछि, एहन वेश्या अरूप वा कुरूप रहितो चित्रपटपर बनल लक्ष्मीक मूर्ति जकाँ कामीसभकेँ प्रिय होइत अछि।

आओर हम ओकरा कठिन काज साधनिहार बुझैत छी। कोना? निःसन्देह ओ—कारागारमेँ बन्न रहितो जकर वर्ण फिक्का नहि पड़ल, देवपूजासँ जकर ललाटपर गाँठ पड़ि गेल, लम्बा झबरा दाढ़ीसँ जकर मुख ढाकल अछि—ओहि मुखकेँ पुरान हड्डी जकाँ चबाइत अछि।

की कहलह—‘ताहि लेल हम ओकर आदर करैत छी।’ तोहर ई आदर एहेन बनल रहय। हम तोरा अपन मित्रक सच्चा अनुरागी बुझैत छी। अरे, ‘स्वामी, कृपा करू’ कहि ई हमर पएर पकड़ि रहल अछि। की कहैत छह—‘हमर वेश-प्रवेशक बात कतहु नहि कहब।’ रे मित्र, चाँदनीकेँ के नुका सकैत अछि? जखनसँ तूँ रूपदासीक परिचारिका ओहि कुबड़ीसँ प्रेम जोड़लह, तखने सँ एहि प्रदेशमेँ पानिमेँ तेलक बूँद जकाँ तोहर यश पसरि गेल। एना नहि—

आलिङ्गन करैत ओ अपन वक्ष आगे बढ़बैत अछि तँ पाछाँ कूबड़ो बढ़ि जाइत अछि। कमरक त्रिकभाग टेढ़ भेलासँ कामवती रहितो जघनभाग आगे नहि ला सकैत अछि। पलङ्गपर सुतल ओ टिड्डी जकाँ देखाइत अछि। नीचाँ मुखकमलबाली ओहि कुबड़ीक संग तूँ कोना रमण करैत छह?

की कहैत छह—‘अरे, पाप शान्त हो, अनिष्ट दूर हो! अहाँक एहि यथार्थ व्याख्याक स्वागत अछि। कृपा कऽ देखू—’

जखन ओ ठमकि कऽ चलैत अछि तँ ऊँटक चालिसँ मेल खाइत अछि। बेर-बेर झूमैत हाथसँ पानिमेँ तैरैत जकाँ लगैत अछि। मुख उठबैत अछि तँ आकाशक तारा गनि रहल जकाँ बुझाइत अछि। कीड़ासँ रोगी लता जकाँ ओकरा कोन बुद्धिमान छूबऽ चाहत?

अरे दुःख! तोहर जकाँ धर्मज्ञक लेल एना नीक स्त्रीक निन्दा करब उचित नहि।

आओर—

मित्र, कुब्जा नरकट जकाँ पातर आ कुबड़ी हो, तइयो झूठक प्रीति जकाँ देखबामेँ मुखसँ तँ सुन्दर अछि।

आ फेर, सीमा-प्रदेशमेँ रहनिहार पताका-वेश्यसभसँ तँ खराब नहि। की कहैत छह—‘ककरासँ?’ की नहि जनैत छह—

जे मातल छथि, जकर भाड़ा केवल एक काकिणी, जे नीच लोकसँ सेवित, जकरा नियम-कानूनसँ मर्यादामेँ राखऽ पड़ैत अछि—लोकसँ नुकाइ आ प्रबल कामेच्छासँ तूँ बाहर जा ओहि टकहीसभसँ मिलैत छह।

की कहैत छह—‘ई सभ अहाँकेँ कतयसँ ज्ञात भेल?’ एहन बात खोजबामेँ हम हजार आँखिबला छी। तूँ सीढ़ी-दर-सीढ़ी ऊपर चढ़ैत जाएब? मित्र, रूपाजीवाकेँ छोड़ि तूँ कुबड़ीकेँ चाहैत छह; कुबड़ियो छोड़ि कोनो दिन ओकर स्वामिनीक लग पहुँचि जाएब। ई हँसि चलि गेल। हमहूँ चली। [घूमि]

अरे, ई दोसर के, जे सिंहलद्वीपक मयूरसेनाक घरसँ निकलि एम्हरे आबि रहल अछि? काँधपर वस्त्र, हाथमेँ चमकैत तलवार लएने दाक्षिणात्य अङ्गरक्षकसभसँ घेरायल अछि। अपन सुन्दर छापदार, पातर मलमली उत्तरीय समेटैत आन्ध्रदेशमेँ बनल लौहकवच पहिरने अछि। देहपर केसरक खौर, हाथमेँ पानक बीड़ा सम्हारने। ठीक, चिन्हलहुँ—ई विदर्भदेशवासी तलवर हरिशूर अछि। अरे, कावेरीपर अनुरक्त भऽ ई जखन ओकर पएर पकड़लक, तखन खुशामद कएलोपर ओ एकरा एना कहलक—

ओकरे लग जा; हमरासँ तोरा की प्रयोजन? जखन चाँदनी खिलल अछि तँ दीपकक की आवश्यकता? एक हाथमेँ दुइटा बेलफल एक संग पकड़ब छोड़।

तखन एकर मनौलासँ ओ केना मानत? अनुरक्त स्त्रीकेँ छोड़ि दोसराकेँ खुलेआम चाहैत अछि—ई चकलेभरि ज्ञात अछि। अपन दुर्भाग्य आ बदनामीपर ई प्रसन्न अछि। अथवा स्त्रीसभ अपन चहेताकेँ चाहैत अछि। मयूरसेनाक टक्कर एहि स्त्रीस्वभावसँ भेल; वा खर्चक तङ्गी पड़लापर खाला स्वयं मयूरसेनाकेँ एकर वशमेँ कऽ देत। एहिसँ सभ पूछी। [लग पहुँचि, हाथ जोड़ि]

हे मनुष्यसिंह, जेना सिंह अपन गुफा छोड़ैत अछि, तेना द्रमिलदेशक कावेरिकाक संग सुरतक अभिलाषासँ ओहि सुन्दरी सिंहलिकाकेँ छोड़ि तूँ उचिते कएलह।

की कहैत छह—‘मयूरसेनाकेँ हम मना लेलहुँ। ताहि लेल ओकरे घरसँ आबि रहल छी।’ कह, टूटल मेल फेर कोना जुड़ल? की कहैत छह—‘आइ सँ तीन दिन पहिने वेश्याध्यक्ष प्रतीहार द्रोणलिकक घर प्रेक्षामेँ बजाओल गेल छलहुँ। बुझाइत अछि, ओतय जानि-बुझि मयूरसेनाक नृत्यक बारी रखल गेल छल। बाजा बजलाक बाद पहिने देवतामङ्गल भेल।

फेर गीतक आरम्भक संग नर्तकी नृत्य आरम्भ कएलक। पहिल प्रदर्शनहि मेँ मयूरसेनाक नृत्यमेँ प्रयोगदोष देखाओल गेल।’ अरे, मयूरसेनाक नृत्यमेँ प्रयोगदोष पकड़ा सकैत अछि—ई सम्भव नहि। अरे, एना कहैत के माथक बल खसल?

की कहैत छह—‘एकरा महारानी वारुणीक पतन बुझू।’ ठीक, प्रतीहारक घरमेँ भगवती सुरादेवी सदा रहिते छथि। ई नशाक उन्माद ककर माथ चढ़ल? की कहैत छह—‘तोहर मित्र लासक उपचन्द्रकक।’ एहिमेँ अनुचित की? ओ तँ एहन बातक अभ्यस्त अछि; मुदा विषयक ज्ञातो अछि। की कहैत छह—‘उपचन्द्रकक पक्षमेँ सभ सामाजिक छल; हम मयूरसेनाक पक्ष लेलहुँ।’ शाबास मित्र, देश-काल अनुसार काज कएलह। फेर की भेल? की कहैत छह—‘बुद्धिसँ हुनका नहि हरा सकलहुँ। सभासद नहि मानलाह, तइयो प्राश्निकक सम्मतिमेँ शास्त्रीय आधारपर हमर पक्ष उचित ठहरल।’ बधाइ मित्र, बहुत असाधारण मूल्यपर ओकरा किनलह।

तकर बाद?

की कहैत छह—‘सभ गणिकाक सोझाँ जखन मयूरसेनाकेँ पारितोषिक भेटल, ओ मुस्कान बिखेरि बाँकी चितवनसँ हमरा प्रसन्न कऽ देलक। ईर्ष्याक ज्बलासँ उठि जाइत कावेरिका मुख बना मानो हमरा ताना मारलक। दुनूक कोप आ प्रसाद प्रकट भेला बाद हम दुनू किनारसँ चूकल नाव जकाँ सन्देहक धारामेँ बहैत, कोनो तरह ओहि सङ्कटसँ पार भऽ घर पहुँचलहुँ। एहि दुनूमेँ के की करत—एहि संशयक झूलापर बैसि झूलऽ लागलहुँ। तकर बाद अचानक हमर प्रिया आबि हमर आँखि मूनि देलक। तखन हम हँसि कहलहुँ—’

अरे आँखि मुनबामेँ निपुण चोरनी, नुकाइ हँसने की लाभ? तोहर हाथक अनुपम स्पर्श तँ तोरा प्रकट कइए दैत अछि। एना कहलापर सुगन्धित साँस छोड़ैत, मदसँ लड़खड़ाइत अक्षरमेँ ओ कहलक—‘कह, हम के छी?’ तखन हम कहलहुँ—

रोमाञ्चसँ कठोर भेल हमर कपोल तोहर प्रश्नक उत्तर दऽ चुकल अछि।

तइयो हे मुग्धे, जँ तूँ पूछैत छह तँ तूँही कह—‘तूँ के छह?’

तखन हमर आँखिपर सँ हाथ हटा ओ कहलक—‘एहि रोमाञ्चक ठगविद्यासँ तँ तूँ हमरा खीँचि लैत छह।’ एना कहि चुम्बन कऽ चलऽ लागल। तखन हम कहलहुँ—

चुम्बनक संग हृदय चुरा तूँ कतय चललह? चोरनी, तोहर दुनू पएर अपन माथपर रखैत छी—कोनो तरह ठहर। एना कहलापर ओ शय्यापर जा बैसल। तखन हम स्वयं ओकर दुनू पएर धोएलहुँ। ओ कहलक—‘चरणामृत लऽ चुकलह; आब आ। सचमुच तूँ पूरा धूर्त छह।’ तकर बाद मालतीलताक खिलल मुकुलजाल जकाँ हँसी बिखेरि, सरकैत करधनी आ साड़ी एक हाथसँ सम्हारलक। पलङ्गपर देह घुमौलासँ दोहरी भेल कमर आ बाहुसहित त्रिकभागक मोड़सँ ओ आओर सुन्दर लगय लागल। मध्यभाग घूमलासँ त्रिवली ऊँच-नीच भऽ गेल, नाभि नुकायलासँ रोमावली बाँकी भऽ गेल। हार एक स्तनक ऊपरसँ आ दोसर स्तनकलशक बगलसँ ढुलकऽ लागल; कुण्डल गालपर लटकलासँ मकराकृति विशेषक आओर खिलि उठल। एना तिरछ काँधक मोड़-मुरकसँ लजायल कामप्रिया रति जकाँ रूपवती भऽ एक भौँह तानि कटाक्षसँ मानो जलपर नीलकमल बिछबैत हमरा कहलक—‘लह, अपन मनचाहा कर।’

ओकर दृष्टि आलता लगाबऽमेँ लागल छल। जखन ओ एड़ी, गुल्फ आ नूपुर उठबैत जाँघ ऊपर कएलक, तखन कलफदार रेशमी साड़ी नव रहबाक कारण टाँगमेँ चिपकल नहि छल, अपन तहदार मोड़क निशानपर मुड़बाक लेल सिमटि गेल। जवान हाथीक दाँतक बीचक अधर जकाँ सुन्दर आ केलाक गाभा जकाँ उज्जर ओकर भीतरी उरुभाग हमरा देखाइ पड़ल। हमर दृष्टि हटबैत ओ कहलक—‘एहन समय जे नेत्रसंयम चाही, ओ तूँ नहि सीखलह।’ एना कहि पएर घीँचि हमर छातीपर मारलक। हमरा रोमाञ्च भऽ गेल आ कवच जकाँ कठोर त्वचाबला भऽ हम कहलहुँ—‘राग पूरा कएने बिना हमरा हटेनाइ तोरा उचित नहि।’ ओ कहलक—‘अच्छा, आँखि मूनि राग पूरा कऽ लह।’ तकर बाद हम आँखि मूनि ओकर पएरमेँ आलता लगाबऽ लागलहुँ, तँ ओ हमर केश घीँचि अधर चुमि लेलक।

हमरा एना रोमाञ्चित देखि ओ कहलक—‘तूँ अशोक जकाँ पादाघातसँ फुलैत छह; तोहर एहि शठतासँ हम हारलहुँ।’ एना कहैत हमरा आलिङ्गन कऽ शय्यापर चलि गेल। फेर की भेल, देवताक प्रिय लोक स्वयं बुझथि। जँ एना अछि तँ तूँ सेहो तौण्डिकोकि विष्णुनागक प्रायश्चित्त निर्धारित करबाक लेल जुटल विटसभक सेवामेँ उपस्थित हो। की कहैत छह—‘हा, एना नहि कहू! ओ अपन चरणकमलक ताड़नसँ हमर माथोकेँ अनुगृहीत करय—ईएह हमर प्रायश्चित्त।’ जँ एना अछि तँ जेना यमुनाक दहमेँ रहनिहार कालिय नाग कृष्णक चरणचिह्न माथपर धारण कऽ गरुड़सँ अवध्य भऽ गेल छल, तेना तोहरोपर कोनो विटक वश नहि चलत। ई हाथ जोड़ि हँसैत चलि गेल। आब हमहूँ विटसमाजमेँ चली। अरे, मित्रसभसँ गप्पमेँ बीतल समयक पता नहि चलल। एखन तँ—

देखू, सूर्य अस्त भऽ रहल अछि। विदा होइत ओकरा मुनैत कमल उत्कण्ठासँ देखि रहल अछि। झुटपुट अन्हार घरक चोटीपर चढ़ि ओकर धूप हटाबि रहल अछि। बगिचाक ऊपर उठल डाढ़िसभकेँ बहुत देर धरि किरणसँ छू सूर्य ओकरे बीच नुका रहल अछि। अटारीपर बैसल कपोत ओकर दिस तकि ओकर लाली अपन आँखिमेँ भरि रहल अछि।

आओर एहि समय—

पक्षीक तीव्र कलरवसँ सचेत बिलाड़ि झरोखासँ महलक चारदीबारीपर कूदि रहल अछि। मोर घरसँ हटि अपन परिचित बसेरापर जा रहल अछि। सुतबाक लेल ऊँघैत हरिण चबूतरापर चढ़ाओल साँझक फूलो छोड़ि रहल अछि। हंस पानिसँ निकलि भवनक पोखरि लगक चबूतरापर आश्रय लऽ रहल अछि।

[घूमि]

झरोखासँ निकलि महलक ऊपरी अटारीमेँ भरल घनगर धुआँ उड़ैत स्फटिकधूलि जकाँ बुझाइत अछि। गल्लीमेँ ऊपर धरि भरल सुगन्धित स्नानजलपर भँवरा मँडरा रहल अछि। अहो, एहि समय वेशक महापथक केहन अनुपम शोभा! बाहरी तोरणक बाहरक पैघ आँगन झाड़ि-बुहारि जलसँ सीँचल गेल अछि, आ ओतय फूलक ढेरी सजा देल गेल अछि। परिचारक साँझक उपचारमेँ लागल छथि। देश, वय आ वैभव अनुसार वेश्यसभ सिङ्गार-पटार कऽ रहल छथि। मदनदूतीसभ एम्हर-ओम्हर ठमकैत वेशकेँ शोभित कऽ रहल छथि। मातल विटसभ चुटीला दिल्लगीक व्यङ्ग्यक रस लऽ रहल छथि। नहा-धो, इत्र-फुलेल लगा, पी-कऽ हृष्ट तरुणसभ चौक आ तिराहापर पसरल छथि। एतय—

सवारी लेल सजाओल हथिनी पीठपर चढ़ाओल जाइत समय धीरेसँ चिंघाड़ैत अछि। दुआरपर ठाढ़ पालकीमेँ कोनो स्त्री बैसि रहल अछि। नूपुर-मेखलाक झनकार आ हिलैत कुण्डलबाली वेश्याक नितम्बभारसँ दबि घोड़ा मानो केवल दुलकी चालि चलि पा रहल अछि।

आओर एतय—

कतहु भवनक गवाक्ष दीपकक किरणजालसँ भरल अछि; कतहु देबालपर मोरक गर्दनि जकाँ नील अन्हार छा गेल अछि। चूनासँ पुतल घरक देबाल अत्यन्त सुन्दर लगैत अछि, मानो ताहिपर तमाल आ हरितालक लेपसँ पत्रावलीक लता रचल गेल हो।

[घूमि] चन्द्रोदयक शोभासँ युक्त प्रदोष नामक ई सार्वजनिक उत्सव केहन सुन्दर अछि! एखनहि भगवान् चन्द्र सभक आँखिमेँ रसायन भरैत आ वापीक कुमुदफूलकेँ हँसबैत आबि रहल छथि।

मदिराक चषकमेँ अपन प्रतिबिम्ब राखि, नीलकमलक गोल पातक बीच-बीचसँ की तूँ हमर चुम्बन लेबऽ चाहैत छह? कह, की तोहर प्रिया रोहिणी तोरा नहि देखैत छथि? सात्त्विक भावसँ उत्पन्न देहक ई कम्प दूर कर। मातल स्त्रीसभक मधुपानक समयक परिहासपूर्ण गप्प सुनबाक लेल मानो उदित चन्द्रमा हुनकर कुण्डलक कोरमेँ अपन प्रतिबिम्ब राखि रहल छथि।

[घूमि]

कतहु कोनो स्त्री अपन प्रियक संग एकान्तमेँ मधुर स्वरमेँ गा रहल अछि; कतहु झंकारैत वीणा बजि रहल अछि; कतहु महलक छतपर चन्द्रोदयक समय गोष्ठी जमा मदिरा पिओल जा रहल अछि।

आ एहि समय भगवान् चन्द्रमा—

कतहु अपन किरणसँ गृहदीर्घिकाक जलपर आर-पार सेतु बान्हि रहल छथि; कतहु कदलीक झाड़ीमेँ पैसैत रश्मिसँ ज्योत्स्नाक स्तम्भ रचैत छथि; कतहु चूनासँ पुतल महलपङ्क्तिकेँ फेर अपन किरणामृतसँ रङ्गि रहल छथि; कतहु किसलयसँ बूँदक मर्मर वर्षा करा मानो मोती बरसा रहल छथि। [घूमि] अहो, चन्द्रक किरणसँ झरैत चाँदनीरूपी जल संसारमेँ एना भरि रहल अछि, मानो क्षीरसागरक पानि तट लाँघि अपन लहर दूर-दूर धरि पसारि रहल हो। एखन तँ—

घोड़ा, हथिनी, कर्णीरथ आ पालकीपर चढ़ल युवकसभ युवतीक आलिङ्गन आ मर्दन पबैत आकाशमेँ गन्धर्व-सिद्धक युगल जकाँ आबि-जा रहल छथि।

[घूमि]

नशामेँ ललित चेष्टा करैत युवककेँ पाछाँ घोड़ाक पीठपर बैसल प्रमदा स्तनसँ गाढ़ आलिङ्गन दैत अछि; ओहो घुमि प्रियाकेँ चुमैत अछि। घोड़ाकेँ घरक बाटक एहन अभ्यास अछि जे सोझे चलैत आबि रहल अछि, बहकैत नहि। ई के, जे चाँदनी रहितो अन्हार जकाँ वेशक गल्लीमेँ गर्भगृह-समान भोग करैत निर्लज्जता देखबैत अछि? ठीक, चिन्हलहुँ। ई सौराष्ट्रिक शककुमार जयन्तक अछि, जे एहि घटदासी बबेरिकापर अनुरक्त अछि। समूचा वेश्यापत्तनमेँ एकरे भीतर ई कोन वेशोचित गुण देखलक? तखन किछु—

अन्हारक देवी जकाँ, दाँतसँ उज्जर आ आँखिसँ कारी, ओ बबेरिका अष्टमीक चन्द्रमायुक्त राति जकाँ लगैत अछि।

अथवा, सौराष्ट्रक लोक, बानर आ बर्बर—एहि तीनूक एके राशि अछि।

तेँ आश्चर्य की?

गोरी बबेरिकापर जँ एकर आँखि अटकल अछि, तँ एकर अलसायल मातल आँखिक कारण ई चाँदनीयो अन्हार जकाँ बुझाइत अछि।

बस, एकर बाट एतहि समाप्त। हम चली। [घूमि] ई दोसरि के—

एहि लाटदेशीय स्त्रीक दुनू कानमेँ सोनाक तालपत्र लटकैत अछि; वेणीक अन्तमेँ मणि-मोतीक सोनाक गुच्छा अछि; कूर्पासक अर्थात् चोली स्तन आ बाहुमूल ढाकि नीवीक छोर धरि पहुँचि रहल अछि।

[सोचि] चिन्हलहुँ। ई राका अछि, जे राजाक साला, दुर्दशाग्रस्त मयूरकुमारकेँ—जे नाचैत मोर जकाँ अपना देखाबि रिझबैत अछि—चन्द्रशालाक सोझाँ आलिङ्गन करैत वेशबजारमेँ अपन सौभाग्य देखाबि रहल अछि। ओकर सच्चाइ देख ओ बेचारा मानो किनाए गेल।

ओ गोरी, मोट स्त्री ओहि दुबर, साँबला मयूरकुमारकेँ मानो सोझाँ पड़ल अपन छाया जकाँ छातीसँ लटका लऽ जा रहल अछि।

[घूमि] ई दोसरि के? [सोचि] ई यशस्वी शार्दूलवर्माक पुत्र हमर प्रिय मित्र वराहदासक प्रियतमा यवनी कर्पूरतूरिष्ठा अछि। तीन अँगुरीसँ मधुपात्र पकड़ि मुख दिस उठा रखने अछि; दोसर हाथसँ कानक चन्द्राकार कुण्डल पकड़ने अछि, जकर प्रतिबिम्ब गालपर पड़ि रहल अछि। कुण्डलक छिटकैत किरणसँ ओकर काँधपर सेहो मानो चन्द्रमा खेलि रहल छथि।

चकोर-जकाँ केश आ आँखिबाली यवनी मधुपात्रमेँ अपन प्रतिबिम्ब देखैत, नखसँ लम्बा लट बिखेरैत, महुआक फूल जकाँ उज्जर कोमल गालपर उभरल मदिराक लालीकेँ आलता बुझि पोछि रहल अछि।

यवनी आ गणिका, बनरिया आ नर्तकी, मालव आ कामुक, गायक आ गदहा—गुणमेँ हम एहि सभकेँ एकसमान मानैत छी। जोड़ी मिलाबऽमेँ ब्रह्मा निश्चयहि निपुण छथि।

जेना खैरक गाछपर आत्मगुप्ता लता आ नीमपर परवलक लता पसरैत अछि, तेना जँ यवनी मालवपर अनुरक्त हो तँ अद्भुत जोड़ी बनैत अछि।

ई हमर परिचिता अछि, मुदा गप्प नहि करब। वेशक यवनीक स्वयं कहल बात—जे बनरियाक खाँव-खाँव जकाँ चीत्कारयुक्त अनजान व्यञ्जनसँ भरल, किछु सङ्केतक संग केवल तर्जनी हिला अभिप्राय बतबैत अछि—के सुनत? हम बाज अएलहुँ। [घूमि] ई दोसर के—

जे पवनक विपरीत फड़फड़ाइत अलक आ दुपट्टाबाली प्रियाकेँ हथिनीपर बैसा लऽ जा रहल अछि, जेना उदयन वासवदत्ताकेँ लऽ गेल छलाह!

[सोचि] चिन्हलहुँ। ई ईशभ्यपुत्र अर्थात् धनिकक पुत्र अछि, जकर विट प्रवाल डिण्डिकसभमेँ खूब परिचित अछि। फेंटा कसि सुरतयुद्धमेँ उतरनिहारसभक ई गुरु अछि। हमर नेनी ओहि वेशसुन्दरीक कामफन्दामेँ फँसि माता-पिताक आज्ञाक परवाह नहि कऽ अनुरक्त भऽ गेल। निश्चय ई डिण्डिकसभक उस्ताद अछि। ससुर बनि गेलासँ एकर सोझाँ हमरो बकार बन्न। तेँ गप्प नहि करब; हाथ जोड़ि एतयसँ निकलि जाई। [घूमि] आब हम विटसमाजमेँ पहुँची। वेशमहापथमेँ निरर्थक चक्कर काटैत हम विटसभक मुखिया भट्टिजीमूतक घर आबि गेलहुँ। बाहरी दुआरक सोझाँक खुला मैदानक चारू दिस बजाओल गेल विटसभक हजारों सवारीक भीड़ जुटल अछि। तोरण लग चाँदीक घड़ामेँ पएर धोबाक पानि उठा परिचारक ठाढ़ छथि। ठीक कहल गेल अछि—बड़ लोकक बात बड़। एखन एतय पाँचरङ्गा फूल छिटाओल जा रहल अछि; गुँथल माला लटकाओल जा रहल अछि; धूप घुमाओल, दीप जलाओल, स्वागत-वचन कहल जा रहल अछि; सवारी खोलि छोड़ल जा रहल अछि; दौड़धूप, गीत-सङ्गीत, आगन्तुककेँ हाथक सहारा, मधुर वचन, प्रेमपूर्ण आलिङ्गन, एक-दोसराक देहक सहारा, अत्यन्त विनम्र प्रणाम, पीठ थपथपेनाइ, भौँह चढ़ा चटकारी मारनाइ, छेड़ भेटलापर माथ झुकबेनाइ—सभ चलि रहल अछि। केओ नखरासँ ठाढ़, केओ अदासँ बैसल। चन्दन बाँटल, वर्णक पोतल, अङ्गराग लगाओल, सुगन्धित पटवासचूर्ण उड़ाओल जा रहल अछि। विट परिहास करैत छथि, वेश्यसभ प्रत्युत्तर दैत छथि। बहुत कहब की—

अन्तःपुरमेँ परिचारकक काज करनिहार बौना लोकनिक पएर ठेहुन धरि फूलमेँ धँसल अछि, ताहि कारण कठिनाइसँ चलि पा रहल छथि। आँखि मटकबैत गणिकादारिकासभ पएरमेँ लागल केतकीक पाँखुरी ‘सी-सी’ करैत निकालि रहल छथि।

आ ई सभ—

धनिकक पुत्र आ प्रमुख विट आधा आसनपर बैसल अपन सहेलीसँ चतुर शब्दमेँ एहन दिल्लगी करैत छथि जे हृदयपर चोट नहि करय। वेशमेँ एना निर्भय घूमैत छथि, जेना खुला साँढ़ ऋतुमती बछियासभक संग चरागाहमेँ घूमैत हो।

एहि सभाभवनक आकाशभाग वा छतपर शतचन्द्र अलङ्कार मानो स्त्रीसभक सैकड़ो मुखचन्द्र रूपमेँ अछि। भवनक चारू कात स्त्रीसभक चितवनरूपी शताक्षी अलङ्कारसँ शोभित। युवकसभक एक-दोसरासँ रगड़ाइत बाहु भवनक चारू दिस घुमाओल परिघ जकाँ; चन्दनसँ भीजल वक्षस्थल सभाभवनक शिलापट्टयुक्त कुट्टिम जकाँ।

आ एतय—

वेश्यसभ लेल कल्पवृक्ष जकाँ, काम लेल तत्क्षण तैयार, अपन समस्त पूँजी छोड़बाक लेल सन्नद्ध ई वीरसभ अछि; जकर बाल्यकालक नकली काठक लड़ाइकेँ बूढ़ लोक सुयोधन आ वृकोदरक युद्ध जकाँ बखानैत छथि।

मित्रक आज्ञारूपी पाग माथपर बान्हि हमहूँ भगवान् कामदेवकेँ प्रणाम करैत, हुनकर आदेशसँ एहि कर्तव्यकेँ आगाँ राखि श्रीमान् तौण्डिकोकि विष्णुनागक प्रायश्चित्त लेल विटसभसँ निवेदन करी। [घूमि] अरे-अरे, समस्त पृथ्वीसँ आएल, कलहमेँ रुचि रखनिहार आ कलहक वृत्तान्त कहनिहार धूर्तजन, अहाँ सभ सुनू-सुनू—

ओ भगवान् कामदेवक जय हो, जे तपस्वीसभपर अधिकार चाहैत छथि; जे सभक चित्तक स्वामी आ इन्द्रियरूपी घोड़ाक शासक छथि; जकर आज्ञा पैघ-पैघ प्राणियो चूड़ामणिसहित माथ नुका मानैत अछि।

[घूमि] जकर खिलखिलाहट गाललगक कर्णपूरपर छिड़िआइत अछि, एहन विलासिनीक यौवनमदक जय हो; हुनकर डगमग चालि आ चञ्चल चितवनक जय हो; आ तकर बाद हुनकर यौवनक अठखेलीक जय हो।

प्रधान वेश्याक चरणरजसँ अपन माथ पवित्र कऽ ओहि माथकेँ धूर्तमिश्रसभक चरणमेँ नुका निवेदन करैत छी। कहबाक बात की? सुनू—

ई विष्णुनाग प्रायश्चित्त लेल साँप जकाँ पृथ्वीपर छाती रगड़ैत छटपटा रहल अछि। अहाँ सभकेँ एकर प्राणरक्षा करबाक चाही।

अहाँ सभ पूछैत छी—एकर अपराध की? सुनू—

आँखिपर खसल लट ऊपर फेकि, क्रोधसँ भौँहक कोर तानि, अधरोष्ठ काटि, दाँतक किरण बिखेरि, काँपैत मुखसँ, नूपुर झनकबैत ओ मदमाती प्रिया सरकैत रक्तांशुक हाथसँ खीँचैत अपन नूपुरसज्जित चरण एकर माथपर राखि देलक।

की, अहाँ सभ कहैत छी—‘पुरुषक भेद बुझबामेँ अनाड़ी ओ कोन गणिका, जकर लापरवाही एहि बदनामीक रूपमेँ सोझाँ आएल?’

ओ सौराष्ट्रक श्रीमती मदनसेनिका अछि। ‘सौभाग्य जे एतय दोसर केओ नहि’—एहन भावमेँ ई विटसभ किछु घबरायल देखाइत छथि।

हाथ हिलबैत, हँसी नुका, धिक्कारैत, मुखपर गम्भीरता आनैत धूर्तसभ मानो दयालु भऽ एक-दोसराक मुख देखैत विचारमेँ डूबि गेल। बैसल विटसभक मुखिया विटमहत्तर भट्टिजीमूत करुणासँ अत्यन्त व्याकुल भऽ उठलाह।

‘केहन दुःख, केहन दुःख!’ कहैत ओ थाकल हाथी जकाँ उसास छोड़ि, बादल जकाँ आँखिसँ पानि बरसा रहल छथि। हमरा बजा रहल छथि। हम आबि गेलहुँ। भट्टिक की आज्ञा?—‘पहिने सुनने छी, तूँ फेर कहैत छह जे एहन प्रायश्चित्त लेल ब्राह्मणसभक लग जाएबाक चाही। ताहि लेल हम बैसल छी। ताबत तूँ विटसभकेँ शपथ दऽ तैयार कऽ लह।’ भट्टिक जे आज्ञा। अरे, अहाँ सभ सुनू-सुनू—

आइ एहि सभामेँ जे अण्ड-बण्ड कहय, ओ जुआमेँ कहियो बाजी नहि जीतय; मायक आज्ञाकारी बनय; विनयसँ पिताक पएर छूअय; केवल उसनल दूध पिबय; मोहमेँ लड्डू खा तृप्त रहय; आ ब्याहल स्त्रीसँ सन्तुष्ट रहय।

आओर—

गुरुक सेवा करय; विटगोष्ठीसँ बाहर भऽ जाए; जवान रहितो बूढ़ जकाँ विनीत हो; बुढ़ापा आएलापर शान्त भऽ जाए—जे एतय बैसि अण्ड-बण्ड कहय।

[घूमि देखि] धावक अनन्तकथ—जे मगजपच्ची करैत रहैत अछि—अचानक उठि हमरा बजा रहल अछि। की कहैत अछि—‘प्रणय नहि बुझनिहार ओकरे दोष, तौण्डिकोकिक नहि। सुनू—’

जकर स्पर्शसँ अशोक असमयमेँ फुलैत अछि; जतय स्वयं कामदेव बाण चढ़ा निवास करैत छथि—अपन एहन चरण जे सुन्दरी भूलसँ एहि पशुक माथपर राखि देलक, दीर्घकाल धरि प्रायश्चित्त ओहि चपलेकेँ करबाक चाही। तूँ ठीक कहलह, कारण—

ओ एहि गदहाक सोझाँ वीणा बजौलक; एहि बानरक सोझाँ श्लोकमयी प्रशस्ति पढ़लक; आ महिसिक अधफाटल दूधमेँ सहकारक रस टपकौलक।

तइयो दुःखीकेँ ढाढ़स देबाक लेल प्रायश्चित्त होइत अछि। आर्त भऽ ई आएल अछि, तेँ अहाँ सभकेँ एकरापर कृपा करबाक चाही। ई गादर बेलक नाती के, जे मातलपनसँ हिलैत माथकेँ एक हाथसँ रोकि ‘एकर प्रायश्चित्त सुनू’ कहि हमरा पुकारैत अछि? ओकर लग जाई। विटसभ ओकरापर बिगड़ि रहल छथि—‘विटभाव बिगाड़निहार ई मुखबला के, जे अपनेकेँ अगुआ विट बुझि परिषद्मेँ उठि प्रायश्चित्तक उपदेश देबऽ चलल अछि?’ अरे जनानिया मल्लस्वामी, सुनलह ई सभ की कहैत अछि? की कहैत छह—‘किएक नहि तूँ एहि सभकेँ बता दैत छह—’

पिताक स्वर्गवासक पाँच राति बादहि, जखन मित्रसभ दुःखी आ सगा-सम्बन्धी कनैत-पीटैत छल, एकटा बिलखैत बालककेँ अलग राखि दासीक संग हम मधुपानक आनन्द लेलहुँ। फेर हम विट नहि तँ के? जँ एना अछि तँ सभ मानैत अछि जे तूँ विटसभक मुखिया छह। बैस। की कहैत छह—‘ओहि मदनसेनिकासँ प्रायश्चित्त कराओल जाए।’ अच्छा, फेर घोषणा करैत छी। अरे, ई शिबिदेशक कवि आर्य रक्षित हाँफैत भाषामेँ पुकारि कहैत अछि—‘निश्चय ई प्रायश्चित्त उचित नहि।’ ई भलमानुस सेहो पैघ विट अछि, कारण—

ओ श्रोत्रियक घर जा एक प्याला मदिरा लेल अपन काव्य बेचि अबैत अछि; शिबिकुलमेँ जन्मल आ भृ-स्थानमेँ बूढ़ भऽ गेल।

आओर—

जँ कवि काव्य बेचैत छथि, तँ ओ काव्यो एहेन अछि जे मदिराक चषकक संग तैयार होइत अछि। काशी, कोसल, भग्ग जनपद आ निषादनगरसभमेँ ईएह दशा अछि।

तेँ एकर लग चली। सखे, हम आबि गेलहुँ। तूँ की कहैत छह—

जेना बन्द कमलमेँ भँवरा भरल रहैत अछि, तेना जे मधु कामिनीक गालमेँ भरल रहैत अछि; जे ओकर मुखसँ निकलि बकुलक डाढ़िकेँ फुला दैत अछि; जे आँखिमेँ विलास भरि दैत अछि; आ जाहिमेँ ताजा सहकाररस मिलाओल जाइत अछि—एहन सीधु-गण्डूषसँ सीँचल जाएबाक पात्रता एहि नरपशु तौण्डिकोकि विष्णुनागक माथमेँ कतय? ई दोसर भवकीर्ति हाथ जोड़ि प्रायश्चित्त कहबाक लेल हमरा बजा रहल अछि। ई ब्राह्मणबालको अत्यन्त विट अछि, कारण—

ई दुष्ट ओहि मुण्डित, बूढ़, पुरान गेरुआ वस्त्र पहिरनिहार, भिक्षा लेल निःशङ्क घरमेँ आएल, भयभीत आ फड़फड़ाइत भिक्षुणीकेँ भूमिपर पटकि कामक कुकर्म कऽ बैसैत अछि।

तेँ एकर लग चली। की कहैत छह—‘एकर प्रायश्चित्त ई अछि—’

ओ स्त्री पहिने एकर केश पकड़ि घीँचैत अपन मेखलाक डोरीसँ एकरा बान्हि दे। फेर जखन ओ शयन करय, तखन ई ओकर पएर दबाबय।

ईहो एकर लेल पर्याप्त नहि। ई रईसजादा गान्धर्वसेनक—जकर नाम सभ चेटक जीहपर अछि—हाथ उठा हमरा बजा रहल अछि।

एकर हाथक अँगुरी तीन प्रकारक बाजापर अनेक हस्तमुद्रामेँ दौड़ल अछि। जेना लाल कमलक पाँखुरीक वर्षा होइत हो, तेना वीणाक तारपर एकर लाल अँगुरी पसरल रहल अछि। वीणा बजबैत ई धनिक घरक अन्तःपुरसुन्दरीसभक पार्श्वमेँ बैसि, हुनकर श्रोणितटपर वीणा राखि, हुनकर नखक्षतक आनन्द लेने अछि।

तेँ एकर लग चली। की कहैत छह—

जघनरूपी रथक पार्श्वमेँ फहरैत पताका जकाँ, सुरतयुद्धमेँ परस्पर मिलन लेल उकसाबऽबाली झंकारैत वीणा जकाँ वेश्यसभक मणिमेखला कतय, आ एहि दुर्गन्धित गदहाक पएर कतय! [घूमि] आब दक्षिणदेशसँ आएल कवि आर्यक प्रायश्चित्त कहि रहल अछि। की कहैत छह—

नखरासँ भरल चितवनसहित ओ मातल अपन कर्णोत्पलसँ एकर माथपर बेर-बेर प्रहार करय। गान्धारदेशसँ आएल हस्तिमूर्ख एकरो कथन व्यर्थ कऽ देलक। तूँ—

की कहैत छह—

जे उत्पल हस्तिनखपर उत्कीर्ण कऽ बनाओल गेल अछि; जे स्त्री कानमेँ धारण कएने अछि; आ जे ओकर अपाङ्गव्यापी चितवनसँ शबलित भेल अछि—ओहिसँ जँ एहि नरपशुक माथ छूअल जाए, तँ प्रायश्चित्त की होएत? उलटा ओकर सुगन्धित रजसँ ई पवित्र भऽ जाएत।

एकर राय उचित अछि। प्रमुख विटसभ सेहो ईएह कहैत छथि। [घूमि] ई दुनू हमरा बजा रहल छथि।

एके आसनपर बैसल गुप्त आ महेश्वरदत्त—ई दुनू मित्र महाकवि वररुचिक काव्यप्रतिभाक अभ्याससँ प्रतिभाशाली छथि।

तेँ हुनकर लग चली। [लग पहुँचि] अरे जनानिया मुकुन्दगुप्त, तूँ की कहलह—

ओकर पएरक धोवनसँ एकर माथ धोओल जाए। वृद्धसभ एकर निषेध करैत छथि। मित्रमण्डलीमेँ प्रिय नामबला महेश्वरदत्त राय दैत अछि—ओकर पएरक धोवन पिबऽ योग्य सेहो ई नहि। ई दोसर हमर मित्र, सौवीरदेशक बूढ़ विट, स्वाभाविक मुस्कानयुक्त वाणीसँ हमरा बजा रहल अछि। तूँ की कहलह—

जखन अङ्गक आभूषण उतारि देलासँ ओकर देह स्वाभाविक कान्तिसँ आओर सुन्दर लगैत हो; स्नानक बाद गील लट जघनस्थलपर बिथुरल हो—ओहि दशामेँ हम ओकरा एतय अनब। तखन ई अपन दर्पण ओकर सोझाँ लऽ ठाढ़ रहय; ओ केश सँवारैत दर्पणक गोल भागकेँ अपन नेत्रप्रभासँ शबलित करय।

दाशेरक कवि रुद्रवर्मा एकर निषेध करैत अछि। तूँ की कहैत छह—

ई विद्वान् उच्च कुलमेँ जन्मल अछि आ राजाक मन्त्राधिकारक सचिव अछि। वेश्याक पएर लगबाक कारण धूरिसँ सनल केश एकरा—

नहि रखबाक चाही। तेँ एकर माथ मूड़ि दिअ।

‘अहाँक कृपा भेल’ कहि विष्णुनाग विनती करऽ लागल—‘केश कटेबासँ पहिने हम अपन ई सदा नतमस्तक आ दासीक लातिसँ अपमानित माथे काटि देबऽ चाहैत छी।’ ओकर एहि बातक उत्तर विटमहत्तर भट्टिजीमूत एना दऽ रहल छथि—

बाँकी भौँहबाली सुन्दरीसभक सरकैत कङ्कणक झनकारयुक्त, नखक किरणसँ जड़ित, अँगूठीक शोभासँ युक्त आ किसलय जकाँ कोमल हाथसँ कोनो सुन्दरी एकर केश नहि सँवारय; ई एहेन रूख केश धारण कएने रहय।

ओहि मदनसेनिकाक लेल सेहो प्रायश्चित्त सुनू—

मदसँ घूमैत आँखिबाली ओ स्त्री नितम्बपर एक हाथ राखि मेखला सम्हारैत, आलतासँ रङ्गल नूपुरयुक्त चरण हमर माथपर राखि हमरा अनुगृहीत करय, आ ई तौण्डिकोकि विष्णुनाग टुकुर-टुकुर तकैत रहय। ‘ईएह उचित प्रायश्चित्त’ कहि सभ विट साधुवाद दैत भट्टिजीमूतक अनुमोदन कऽ रहल छथि। ‘आब हम सर्वथा अनुगृहीत भेलहुँ’ कहि तौण्डिकोकि विष्णुनाग चलि गेल। विटमहत्तर भट्टि हमरा बजा रहल छथि। हम आबि गेलहुँ। अहाँ की कहैत छी—‘ई सभ तँ भऽ गेल। आब अहाँ सभक कोन प्रिय काज करी?’

ओहो सुनू—

नोक-झोंकक बातमेँ चतुर कुट्टिनीसभक कल्याण हो; धूर्तसभक सैकड़ो आमदनी अक्षुण्ण रहय—ओसभ निश्चिन्त माल काटथि; एहि नगरमेँ विटसभक सुखद गोष्ठी जुटैत रहय; आ साँझमेँ वारविलासिनीक प्रेमपूर्ण जलसा होइत रहय।

[विटक प्रस्थान] उदीच्य कवि विश्वेश्वरदत्तक पुत्र आर्य श्यामिलक केर रचित एकनट नाटक (भाण) पादताडितकम् समाप्त।

 

 

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