हरिजीवन मिश्रक कृति- पालाण्डुमण्डन प्रहसनम् [संस्कृतसँ मैथिली अनुवाद- गजेन्द्र ठाकुर]
हरिजीवन मिश्रक कृति- पालाण्डुमण्डन प्रहसनम् [संस्कृतसँ मैथिली अनुवाद- गजेन्द्र ठाकुर]
पात्र-परिचय
(उपस्थितिक क्रममे पात्र)
प्रजापति देव, पण्डित, समारोहक सूत्रधार (व्यवस्थापक)।
लिङ्गोजी भट्ट, एक पण्डित।
चिञ्चा, लिङ्गोजीक दोसर पत्नी। (इमली)
त्र्यम्बक भट्ट, लिङ्गोजी भट्टक साढू। (नारिकेल)
क्वथिका, त्र्यम्बकक पत्नी। (उसिनल तरल व्यञ्जन)
पूर्णपोलिका, लिङ्गोजीक पहिल पत्नी। (एक प्रकारक मीठ पूआ, पोली)
लशुन पन्त, त्र्यम्बक आ क्वथिकाक जेठ बेटा। (लहसुन)
गृञ्जनाद्रि, लशुनक छोट भाइ। (प्याज—छोट किसिम)
पालाण्डुमण्डन, एक अतिथि। (प्याज—पैघ किसिम)
चित्तपावन, दोसर अतिथि। महाराष्ट्री ब्राह्मण।
रक्तमूलिका, पूर्णपोलिका आ लिङ्गोजीक बेटी। (एक लाल खाद्य कन्द)
आरणाल भट्ट, एक अतिथि। (माँड़/कांजी)
मिथ्याकूट भट्ट, एक अतिथि। [एक महाराष्ट्रीय व्यञ्जन—दहीमे पिसल चाउर, दाल, राइ आ मेथी मिला कऽ]
दाक्षिणात्य-१, दक्खिनी पण्डित-१
पेरम् भट्ट, एक पुरोहित, आन्ध्रवासी
कलङ्काङ्कुर, दोसर पुरोहित। (कुकुरमुत्ता)
झल्लरि—झङ्कार आ भेरि-भङ्कार भट्टाचार्य, अतिथि। बंगाली पण्डित।
शिष्य, उपर्युक्तक शिष्य
दाक्षिणात्य-२, दक्खिनी पण्डित-२
पुरुष, राजकर्मचारी।
सिपाही। (पादातयः)
अन्य ब्राह्मण पण्डित आ अन्य लोक।
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'शिव, जे विश्वक स्वामी छथि, सभ लोकमे गौरवशाली छथि! ओ बहुत रसक आनन्द लैत छथि आ सभ प्रकारक खाद्य-पेय भोग करैत छथि। ओ लोकक सांसारिक जीवनक बुराइकेँ दूर करैत छथि आ धर्म-पालन, इच्छापूर्ति आ धनोपार्जनक विषयमे कहैत छथि। ओ प्रचुर धन कमौने छथि आ पार्वतीक प्रिय स्वामी छथि।' (१)
(मंगलाचरणक अन्तमे)
सूत्रधार— बेसी नहि बजू। आह! ई तँ लिङ्गोजी भट्टक पत्नीक गर्भाधान-संस्कारक अवसर थिक। एहि उत्सवमे पालाण्डुमण्डन आ अन्य अतिथि भूखल छथि, कारण एकटा वैवाहिक सम्बन्धक चर्चा चलि रहल अछि। जखन एहि अतिथिक इच्छा पूर्ण नहि होयत तखन ओ आशीर्वाद कोना देताह? आर, बिनु भीतरी संतोषक ओ वैदिक शब्दक सही उच्चारण कोना करताह, जखन कि उत्तर भारतीय बहुत चालाक आ बहुविध कुशल छथि? एहि लेल दर्शकक तीव्र भावने सफल होउ! (हवामे प्रसन्नतासँ सुँघैत) आह, हमर इच्छा पूर्ण होयबाक अछि, ओहि प्याजक तेज गन्धसँ जे सभटा गन्धकेँ दबा देने अछि। (अपना मने) एहिना होउ। हम अपन पत्नीकेँ बजा कऽ लोक जुटायब। (चारू दिस ताकैत) आर्ये, एतय, एतय आउ!
(प्रवेश करैत)
नटी— स्वामी, जल्दी कहू। हम आन काजमे लागल छी आ व्यस्त छी।
सूत्रधार— आर्ये, कोन काज अछि जे अहाँकेँ एना हड़बड़ीमे राखने अछि?
नटी— स्वामी, आइ पालाण्डुमण्डन आ हुनकर दलकेँ आमंत्रित कएल गेल अछि। हुनका आदरसँ स्वागत करबाक लेल हम घरकेँ धूपसँ सुगन्धित कऽ देने छी आ एहि बीच एतय आबि गेलहुँ। अहूँ ओतय जा कऽ अपन उत्तरीयक आँचरसँ हुनका स्वागत करू।
सूत्रधार— आर्ये, की अहाँ घरकेँ कारी अगरुक धूपसँ बिगाड़ि देलहुँ?
नटी (मुस्कुराइत)— स्वामी, की अहाँकेँ नहि बुझल अछि जे ई तँ पैघ प्याजक गन्ध थिक?
सूत्रधार (चारू दिस सुँघैत)— बड़ नीक, बड़ नीक, पालाण्डुमण्डन आ अन्य लोक आब संतुष्ट भऽ गेल होयताह। तँ आउ, हम हुनका आदरसँ सम्मानित करी। एतेक अबेर किए?
(मंचक बाहर सँ)
पालाण्डुमण्डन आ अन्य लोक, गलीमे छिटल पैघ प्याजक छिलकाक ढेर देखि कऽ, प्याज-सम्पन्न घरमे जेबाक इच्छासँ एम्हर-ओम्हर घुमि रहल छथि। प्रजापति देव एहि बातकेँ लिङ्गोजी भट्टकेँ सूचित करबाक लेल एतय आबि रहल छथि।
सूत्रधार (सुनैत)— की भेल जे पालाण्डुमण्डन आ हुनकर दल भ्रमित छथि? ओ कतय जा रहल छथि? आउ, हम सभ हुनका लग जाइ छी।
(दुनू गोटे प्रस्थान करैत छथि।)
प्रस्तावना
(तखन प्रजापति देवक प्रवेश।)
प्रजापति देव— वेश्या आ यारक पुत्र, दुष्टक राजा लिङ्गोजी भट्ट कतय गेलाह? कारण पालाण्डुमण्डन आ हुनकर दल, क्रुद्ध भऽ, कतहु आन ठाम जा रहल छथि। आह! हमरा नीक जकाँ मोन अछि! कदाचित पालाण्डुमण्डन आ अन्य अतिथि-पण्डित साढू त्र्यम्बक भट्ट आ लिङ्गोजी भट्टक बेटा-बेटीक विवाहक चर्चाक हेतु जुटल कैक प्रमुख कुटुम्बीक उपस्थितिसँ नाराज भऽ कऽ चलि गेल छथि। जे होउ। हम स्वयं जा कऽ हुनका आनब।
(परदाक पाछाँ, हल्ला-गुल्ला)
सभ गणक स्वामी आ सूर्य, चन्द्रमा, प्रसन्न देवताक समूह; (पञ्च-तत्त्वक) समूह—जल, वायु, अग्नि, आकाश आ पृथ्वी; बहुतरास कीमती रत्न आ मंत्र, तथा सिद्ध ज्ञानमे निपुण ब्राह्मण—ई सभ अहाँ सभकेँ आशीर्वाद दिअथि! (२)
प्रजापति (ध्यान सँ सुनैत)— आह, शुभ मुहूर्त आबि गेल! ब्राह्मण-भोजन आ अन्य कार्य तुरंत होउ!
(परदाक पाछाँ, वैदिक स्वरमे)
“एकटा प्रजापति छलाह, चूहा। हुनका दूटा दाँत छलनि। हर दाँतसँ ओ गड्ढा खुनैत छथि, बर्तनकेँ फोड़ैत छथि आ हवि निगलि जाइत छथि। यजमान जखन ओ 'कुम्-कुम्' सुनबैत छथि तँ ओकरा मारैत छथि। तखन यजमान स्वर्ग पहुँचबामे समर्थ होइत छथि। जे ई जनैत छथि—!”
प्रजापति (आदरसँ सुनैत)— आह! वैदिक उच्चारण! सभ अतिथि आबि गेला की? हम पेरम् भट्ट आ कलङ्काङ्कुराचार्यकेँ संग लऽ, यज्ञीय ताम्रपात्र लऽ कऽ फेर एतय आयब।
(एना कहि ओ प्रस्थान करैत छथि।)
(तखन वाद्य-संगीतक संग चिञ्चा, लिङ्गोजी भट्टक हाथ पकड़ने प्रवेश करैत छथि। हुनकर अंग हरदीसँ रंगल अछि, ओ माला आ आभूषणसँ सजल छथि, आ अपन उत्तरीयक चुनरीकेँ कसि कऽ आ विशेष ढंगसँ पहिरने छथि। ओ स्वादसँ पान-सुपारी चबा रहल छथि। हुनकर शुभ आ आकर्षक रूप अछि, ओ सुसज्जित (वा सुगन्धित) छथि आ प्रेमसँ दीप्त छथि। हुनका संग क्वथिका सेहो त्र्यम्बकक हाथ पकड़ने प्रवेश करैत छथि।)
लिङ्गोजी आ त्र्यम्बक भट्ट (हाथ जोड़ैत)— हमर प्रणाम! ब्राह्मण सभ आबऽमे किएक अबेर कऽ रहल छथि?
(दुनू सारी एक-दोसराकेँ चोरि-चोरि देखैत छथि।)
क्वथिका (अपन ननदि चिञ्चासँ)— अहाँक सौतिन पूर्णपोलिकाक बेटी रक्तमूलिका नीक छथि की?
चिञ्चा— अहाँक आशीर्वादसँ ओ नीक छथि। आब अहाँक बेटा गृञ्जनाद्रि नीक छथि की?
क्वथिका— हँ, दिन-रात, ई साहसी छौड़ा अहाँक बेटीक सुन्दरताक विचारमे लागल रहैत अछि।
चिञ्चा (मुस्कुराइत)— एहि तरहेँ रक्तमूलिका सेहो सुगठित गृञ्जनाद्रिक सुन्दरताकेँ बेर-बेर मोन पाड़ि कऽ अपनाकेँ बहलबैत छथि।
(दुनू गोटे एक-दोसराक हाथ पकड़ैत छथि।)
लिङ्गोजी भट्ट— अरे, अरे, त्र्यम्बक भट्ट! हमरा स्मृतिक ओहि कथनसँ डर लागैत अछि जे जुआन बेटीकेँ बियाहमे देनिहार पुरुष स्वर्ग नहि पहुँचैत छथि। एहि लेल हम अपन बेटी रक्तमूलिका, जे नव अमक बौर सन सुन्दर छथि, हुनकर विवाहक व्यवस्था बहुत जल्दी करय चाहैत छी।
त्र्यम्बक— अहाँक भेंट तँ अपन भागिन गृञ्जनाद्रिसँ भऽ गेल हैत।
लिङ्गोजी— अरे त्र्यम्बक, जे होउ। हम अपन पत्नीसँ पूछब। (हुनका दिस ताकैत) पूर्णपोलिका, एतय, एतय आउ!
पूर्णपोलिका— की बात अछि, आदरणीय लिङ्ग?
लिङ्गोजी— प्रिये, अहाँक बेटी रक्तमूलिकाक विवाह धनी त्र्यम्बक भट्टक बेटा, अहाँक भागिन गृञ्जनाद्रिक संग विचार भऽ रहल अछि।
पूर्णपोलिका— माननीय, ई तँ बड़ नीक विचार अछि, मुदा कठिन एहि लेल अछि जे लशुन पन्तक मृत्यु जल्दी भऽ सकैत अछि।
लिङ्गोजी— प्रिये, ई सही अछि। मुदा फेरो गृञ्जनाद्रि जुआन छथि। ओहि बूढ़ (अर्थात् लशुन पन्त) क की उपयोग? पहिने एहि विवाहक सम्बन्धमे तुरत मौखिक सहमति भऽ जाय।
पूर्णपोलिका— एहिमे की सन्देह अछि? (चारू दिस ताकैत) अरे, अरे, क्वथिका, ई रक्तमूलिका अहाँक जिम्मामे अछि।
क्वथिका— हम तँ धन्य भऽ गेलहुँ। की गृञ्जनाद्रि अहाँक बेटा नहि छथि?
त्र्यम्बक (सुनैत, हृदयसँ प्रसन्न भऽ)— छौड़ा आ छौड़ीक बीच मौखिक सहमति भऽ जाय।
(जखन कलङ्काङ्कुर एखनो नहि पहुँचल छथि, तखन लशुन पन्तक प्रवेश।)
लशुन पन्त— अरे, अरे, लिङ्गोजी भट्ट, दोसराक आशाकेँ तोड़निहार, हमरासँ स्वर्ग छिनि कऽ अहाँकेँ की मिलत? रक्तमूलिकाक जन्मसँ लऽ कऽ हमर जीवनक एकमात्र सहारा हुनकर हाथ प्राप्त करबाक इच्छा रहल अछि। गृञ्जनाद्रि निःसन्देह हमरासँ छोट छथि आ हमर सख्खा भाइ छथि। ओ अपन जीवनक बारेमे आशा राखि सकैत छथि। अहाँ किएक एतेक हड़बड़ीमे छी? की आइक गर्भाधानक बाद चिञ्चासँ अहाँकेँ एकटा बेटी नहि हैत?
पूर्णपोलिका (अपना मने)— ई बूढ़ हमर बेटीक प्रति दुष्टतापूर्ण छथि। जे होउ। हम एहिपर विचार करब।
क्वथिका (अपना मने)— लशुन पन्त बूढ़ छथि। एहि लेल विवाह तँ केवल धन-बलसँ सम्भव अछि।
(स्वर्ण-मुद्रा निकालि ओ देखबैत छथि।)
लिङ्गोजी— आब जे एतेक धन देखा रहल अछि, तँ वैवाहिक सम्बन्ध केवल लशुन पन्तेसँ होउ। गृञ्जनाद्रि जुआन तँ छथि, मुदा बस भेल।
चिञ्चा— अरे, अरे, अहाँ ठीक-ठीक राशिक शर्त राखू!
क्वथिका— हँ, अहाँकेँ दस कर्ष बराबर सोना भेटत।
लिङ्गोजी— प्राणीक आयुक कोनो निश्चय नहि होइत अछि। तँ एतेक मात्र सोनाक की उपयोग?
लशुन पन्त (सुनि, अपना मने प्रसन्न भऽ)— १२० वर्षसँ बेसीक पालाण्डुमण्डनक भाइक विवाह पिण्डमूलिकासँ केवल धन-बलसँ सम्पन्न भेल छल।
(जोरसँ) आह, लिङ्गोजी, की लहसुनसँ पोषित केओ कहियो मृत्युकेँ प्राप्त होइत अछि?
(एना कहि ओ जतेक चाही ओतेक सोना देखबैत छथि।)
लिङ्गोजी भट्ट— एहि सोनाक की उपयोग हैत? जे होउ।
पूर्णपोलिका (सोना दिस ताकैत)— आह, आह, बेटा लशुन पन्त, ई तँ बड़ नीक अछि। मुदा तखन अहाँ अपन अन्त्येष्टि-संस्कारक हेतु आब किछु धन किएक नहि देल जाइत?
लशुन पन्त (सोचैत)— जँ एना अछि, तँ हमर ई खेत, जाहिमे लहसुन आ प्याज उपजैत अछि, केना उपयोगमे आओत? (अपन खेत दिस देखबैत) हे नारी, जँ एहन किछु भऽ जाय, तँ एही खेत (क्षेत्र) मे एकटा स्मारक-चिह्न (लिङ्ग) स्थापित कऽ देल जाय। खेत बड़ उपजाउ अछि। आर की चाही?
पूर्णपोलिका (लिङ्गोजी दिस ताकैत)— हमर उद्देश्य पूर्ण भऽ गेल। वैवाहिक सम्बन्ध केवल लशुन पन्तेसँ होउ।
लिङ्गोजी भट्ट— हमहूँ एही तरहेँ सोचि रहल छी।
(तखन परदाकेँ हटा कऽ प्रवेश करैत)
गृञ्जनाद्रि— आह, सहायक स्वभावक लोकक आलोचक! की राजा विधवाकेँ मुफ्त भोजन नहि दैत छथि? ओहो, स्वामी, कतेक अद्भुत! केना, चुस्त तहबन्द आ कान्हपर चुनरी पहिरने, एम्हर-ओम्हर घुमैत मनुक्खसँ डरायल, अपन कपड़ामे बचल भोजन भरि कऽ आ मुफ्त पियाउमे मुट्ठी भरि पानि लोभसँ पीबैत लोक, धनक मात्र देखलासँ अपन क्षेत्रीय आचार-व्यवहार बिसरि जाइत छथि?
लिङ्गोजी (अपना मने)— एतय हमर करेजामे कांट गड़ि गेल! जे होउ। हम एकरा ठकब। (जोरसँ) अरे, अरे, गर्भाधानक समय आबि गेल। एहि लेल आमंत्रित ब्राह्मण सभकेँ तुरत भोजन परसल जाय!
(मंचक बाहरसँ)
अरे, अरे, शाप देबामे अगुआ, निन्दाक अंकुर, पागल कुकुर, कुकुरक पूँछ, वेश्याक पालतू, गुरुक पत्नी आ अपने पुतोहुक प्रेमी, नौकरानीक कुशल प्रेमी, मृत्युक स्वामी, मित्रक विनाशक, टूटल विश्वासक स्वामी, सम्पूर्ण संसारक ठग, नारायणकेँ सेहो कांट, तेज-मुँह, बदमाशक प्रधान, अखाद्य वस्तुक भक्षक, अहाँ सभ ओतहि रहू! भीतर जगहक कमीक कारणेँ, भोजनक हेतु आरामदायक बैसबाक व्यवस्था केवल गलीमे कएल जायत। प्रसिद्ध पालाण्डुमण्डन आ किछु अन्य लोक भीतर जा सकैत छथि।
(तखन पालाण्डुमण्डन, मिथ्याकूट आ किछु अन्य लोकक प्रवेश)
पालाण्डुमण्डन (चारू दिस देखैत)— हम कहियो चित्तपावनक संग एक्के भोजनमे नहि बैसल छलहुँ।
चित्तपावन— हा, हा, महाशय, की अहाँ काल्हिक बात भुला गेलहुँ? खण्डेरायक पूजाक अवसर पर, की अहाँ नाना प्रकारक प्याजसँ मसालेदार विशेष व्यञ्जन नहि निगलने रही?
पालाण्डुमण्डन (मुस्कुराइत चित्तपावनकेँ गरे लगबैत)— हा, हा, भाइ, की एतहू पैघ प्याजक उपयोग होइत अछि?
चित्तपावन— नहि तँ आर की उपयोग होइत अछि?
(पालाण्डुमण्डन घमण्डसँ ठाढ़ होइत छथि।)
गृञ्जनाद्रि— अरे, मात्र पैघ प्याजक की उपयोग? छोट प्याज बिना व्यञ्जन खुरधार पशुक घासक भोजन जकाँ बेस्वाद हैत।
लशुन पन्त— अरे, अरे, एहि बेस्वाद चर्चाक की उपयोग? जखन औषधीय जड़ीबूटीक स्वामी (चन्द्रमा) जकाँ लहसुनक कन्द उगैत अछि, तँ जुगुनू सन प्याजक किसिमक की जरूरत?
पालाण्डुमण्डन— हा, हा, भाइ, की पैघ प्याज लहसुनसँ बेसी श्रेष्ठ नहि थिक?
प्याजक प्रजातिक नीक संग्रह तारागणक समूह जकाँ चमकैत अछि। मोती, हीरा आ पुखराज एकर सयवाँ भागक बराबरो नहि भऽ सकैत अछि। एकरा देखितहि परम संतोष होइत अछि। खेतमे कन्दयुक्त प्याज दिनमे आकाशक चन्द्रमा जकाँ उज्जवल चमकैत अछि। (३)
लशुन पन्त (क्रोधित भऽ)— सत्यमे!
लहसुनक एकटा गुच्छा वायु-विकारसँ उत्पन्न असंख्य रोगकेँ नाश करैत अछि। लहसुनक तुलना कोनसँ भऽ सकैत अछि? एकर मात्र गन्धे देवता आ राक्षसक हेतु भोजनकेँ विशेष रूपसँ स्वादिष्ट बना दैत अछि। (४)
गृञ्जनाद्रि (दुनूकेँ अलग करैत)— हमर बात सुनू। छोट प्याज मसालाक सभसँ श्रेष्ठ थिक। मूँगाक चमक तँ एकर मात्र दासी थिक। मूर्ख लोक एकर वास्तविक स्वभाव नहि जनैत छथि। ओ एकर सूक्ष्मताकेँ कोना बुझि सकताह? (५)
(प्रजापति देवक फेर प्रवेश।)
प्रजापति देव— अरे, अरे, ब्राह्मण-भोजनमे किएक अबेर भऽ रहल अछि?
चिञ्चा— आह, प्रजापति देव, अबेर एहि लेल अछि जे उसिनल तरकारी आ साग प्याज आ लहसुनसँ छौंकल जा रहल अछि।
प्रजापति— एहिना होउ। हम पत्तरि लऽ आबैत छी।
(पत्तरि आनबाक अभिनय करैत छथि।)
(मंचक बाहरसँ)
आह, प्याज आ लहसुनक गन्धसँ तँ पूरा जगह स्वर्ग बनि गेल अछि! रे, रे, देखू, देखू, ई दुष्ट उत्तर भारतीय नाक ढाँकि कऽ किएक भागि रहल छथि? भाग्यशाली छथि दक्षिणी लोक जे नाना व्यञ्जनसँ उत्साहित छथि। एहि तरहेँ ओ स्पष्ट वैदिक उच्चारणसँ पद, क्रम आ जटा-पाठक प्रदर्शन कऽ रहल छथि।
लिङ्गोजी भट्ट— ई सभ कुटुम्बीक श्रेष्ठ, सभा-गृहकेँ सुशोभित करैत, किएक नहि बैसल छथि?
(तखन प्रवेश)
(पेरम् भट्ट आ अन्य लोक, अपन देहमे भस्म लगौने। ओ प्रसन्नतासँ पत्तरि, कमण्डलु आ अन्य वस्तु धारण करैत छथि। हुनकर पेट खाली अछि। सयटा टुकड़ीसँ जोड़ल हुनकर लाल-भूरा कपड़ासँ, ओ सहस्र-नेत्रधारी इन्द्रक शानदार भ्रम चारू दिस बना रहल छथि। (६))
(लशुन पन्त अपन प्रेम प्रदर्शित करैत उत्साहसँ खूब खाँसैत छथि आ सांस फूलबाक कारणेँ मूर्छित भऽ खसि पड़ैत छथि।)
पालाण्डुमण्डन— अरे, अरे, तुरत पैघ प्याजक रस आनू; नहि तँ लशुन पन्त बेसी दिन हमरा सभक संग नहि रहताह।
(गृञ्जनाद्रि छोट प्याजक रससँ दौगल आबैत छथि। आरणाल भट्ट माँड़क घैला आनैत छथि।)
त्र्यम्बक— भाइ लिङ्गोजी, हुनका शक्ति-वर्धक कोनो चीज दिअ।
(लिङ्गोजी भट्ट मुड़ी हिलबैत चारू दिस ताकैत छथि।)
चिञ्चा— प्रिय रक्तमूलिका, लाल मूलाक रसकेँ इमलीक रससँ मिला दिअ।
(रक्तमूलिका तुरत एना करैत छथि।)
मिथ्याकूट भट्ट (मिथ्याकूट तरल आनैत)— अरे, अहाँ मूर्ख सभ, देखू हम एहि चमत्कारकेँ कोना तुरत कऽ देखबैत छी!
(एना कहि ओ तुरत लशुन पन्तक मुँहमे देल जाइत छथि।)
(परदाक पाछाँसँ)
अरे, अरे, अहाँ जे नियमितरूपेँ अन्त्येष्टि-संस्कारक व्यवस्था करैत छी आ लशुन पन्तकेँ आन लोककेँ परलोक पठएबामे लागल छी! सूखल प्याज आ लहसुनक छिलकासँ बनल चिताकेँ फेकि दिअ! कारण, मृत्युक दूतगण लशुन पन्तक मुँहपर मूतरि कऽ भागि गेल छथि। एहि लेल ओ अवश्य आब जीवित छथि!
लिङ्गोजी— सचमुच ई दवाई बड़ प्रभावशाली अछि!
(तखन धरि लशुन पन्त जागि जाइत छथि।)
लशुन पन्त— अरे, अरे, कृपया लहसुनक गुच्छा आनू! कारण अधिक पित्तक कारणेँ हम मूर्छित भऽ गेल छलहुँ।
पालाण्डुमण्डन— बड़ नीक, बड़ नीक, महाशय, हमरो एहन बेर-बेर होइत अछि।
गृञ्जनाद्रि— हम मूर्खक समूहमे फँसि गेलहुँ। अरे, अरे, दुष्ट मूर्खो, मीठ रस बिना पित्तक रोग कोना ठीक भऽ सकैत अछि? एहि लेल छोट प्याजसँ बनल ई रस लिअ।
लशुन पन्त (मुस्कुराइत)— जँ लहसुन (रोग) दूर करय मे असमर्थ अछि, तँ छोट प्याजक की कहब? जँ सूर्य अन्धकारक मुख्य नाशक नहि भऽ सकय, तँ चन्द्रमाक की कहब? (८)
हे लहसुनक गुच्छा, सभ कष्टक नाशक, उच्च मार्ग (वा परलोकक मार्ग) पर दौड़निहार घोड़ा, महापापक चूरनिहार, सुगन्धक अभागल नाशक, तुरतमे सच्चा चमत्कार (वा पूर्ण ज्ञान) देनिहार, भूखलकेँ प्रसन्न करैबला रोटी, परम देवी, कृपा करू! (९)
(पूर्णपोलिका, अपन चुनरी ढील करैत, बामाँ हाथसँ लहसुनक गुच्छा उतारि लशुन पन्तक मुँहमे राखि दैत छथि।)
गृञ्जनाद्रि (मुस्कुराइत)— एहि मूर्ख लोक केतेक जिद्दी छथि? छोट प्याज मूँगा जकाँ लाल, अमृत जकाँ रसदार, प्रेमकेँ उगबैबला, आनन्द देबामे समर्थ अछि, आ एकरा देखितहि पवित्रता जागि उठैत अछि। मूर्ख लोक एकर शक्ति पर विश्वास नहि करैत छथि। (१०)
लशुन पन्त (आँखि खोलैत, लहसुनक स्वाद लैत, ओकरा 'हे लशुनपोतिके' आदि कहैत, श्लोक ९)— हा, हा, ई सत्य थिक जे एही तरहेँ देवगण (लहसुनसँ) रूपक समानताक कारणेँ चन्द्रमा (अमृत-किरण)केँ पिबैत छथि। आ चन्द्रमा स्वयं संसारमे लहसुनक फांकसँ समानताक कारणेँ पूजाक योग्य छथि। (११)
लिङ्गोजी भट्ट— अरे पूर्णपोलिका, ई व्यक्ति (लशुन पन्त) अहाँक पुण्यक बलसँ जीवित छथि। अहाँक बेटी सेहो भाग्यशाली छथि; कारण, अखने, हुनका एतेक धन भेटि गेल अछि जे ओ जीवन भरि, आ अपन पतिक जीवन मे सेहो, निश्चिन्त रहि सकैत छथि।
(तखन परदा हटा कऽ पुरोहित पेरम् भट्टक प्रवेश, ईंधन, कुश-घास, यज्ञीय चम्मच, घी आ यज्ञीय पात्रक संग।)
पेरम् भट्ट— हा, हा, पुतोहु सभक बीच बड़ भ्रम बुझना जाइत अछि। एहि लेल लहसुन आ प्याजक गन्धकेँ ढाँकि देल जाय। तेज हवाक कारणेँ गन्ध एतेक बढ़ि किएक गेल अछि? लहसुन-प्याजक छिलकासँ ढाँकल आकाश जेना अनामंत्रित वैदिक पुरोहितकेँ बजा रहल अछि! गर्भाधान समारोह प्रारंभ होउ।
(एना कहि ओ यज्ञ-वेदीकेँ कुश-घासक बदला लहसुन आ प्याजक छिलकासँ ढाँकैत छथि, तखन—)
(लिङ्गोजी भट्ट, चिञ्चा दिस ताकैत, इशारासँ अपन कामेच्छा सूचित करैत छथि।)
चिञ्चा (अपना मने)— की गर्भाधान संस्कार एतहि होयत?
(अपन पतिकेँ देखैत ओ लक्ष्मणा (एकटा जड़ी) निकालि खेबाक अभिनय करैत छथि।)
लिङ्गोजी भट्ट (अपना मने)— हम शक्ति प्राप्त करी। कारण, जे व्यक्तिक पौरुष हनुमानक चीत्कारसँ नष्ट भऽ गेल छल, ओ सेहो प्याज खएलासँ फेर पुरुष बनि जाइत अछि।
(एना कहि ओ हविक बाँचल अंश जकाँ लहसुन निगलबाक अभिनय करैत छथि। भस्म आदरसँ ग्रहण करबाक बहानाँ ओ भाँग (गाँजासँ बनल नशीली वस्तु) सेवन करबाक अभिनय करैत छथि। धुँआसँ बचबाक बहानाँ, गुप्त रूपसँ यज्ञीय अग्निमे तमाकुक पात चढ़बैत, ओ फूँकनीसँ तमाकु, भाँग आदिक धुँआ खिंचैत छथि।)
पूर्णपोलिका (क्रोधित भऽ)— एहन पारिवारिक रीति कतहु नहि देखल गेल अछि। हमरो गर्भाधान संस्कार भेल छल। अजगुत, अजगुत!
(एना कहि ओ चिञ्चाक हाथसँ लक्ष्मणा छिनि लैत छथि।)
गृञ्जनाद्रि (देखैत)— आब हमरा पहाड़सँ खसय पड़त वा पानिमे डूबय पड़त (आत्महत्याक हेतु)।
(एना कहि ओ हड़बड़ीमे पूर्णपोलिकाक समर्थनमे उठि ठाढ़ होइत छथि। गृञ्जनाद्रिक सहायतासँ, ओ जोरसँ रोबय लगैत छथि।)
कलङ्काङ्कुर (उठैत)— अरे, अरे, गृञ्जनाद्रि, अहाँ ई गर्भाधान समारोहकेँ किएक बिगाड़ि रहल छी?
क्वथिका (उठैत)— अरे, ई अहाँक लेल उचित नहि थिक, पूर्णपोलिका, जे पहिनहि लशुन पन्तसँ वचनबद्ध छी। दोसर दिस, की गृञ्जनाद्रि सदिखन अविवाहित रहताह?
(आपसी उलझनमे, पूर्णपोलिका आ क्वथिकाक चुनरी ढील भेलासँ, छोट-पैघ प्याज आ लहसुन चारू दिस बिखरि जाइत अछि।)
पालाण्डुमण्डन आ अन्य लोक (क्रोधसँ देखैत)— अरे, अरे, सचमुच कुलक्षिणी छथि ई (स्त्री सभ) जे अमृत जकाँ लहसुन आ आन कन्दकेँ बर्बाद करैत छथि!
मिथ्याकूट भट्ट (एहि विचित्र हड़बड़ीसँ भयभीत रक्तमूलिकाक बिगड़ल चुनरी देखैत)— अरे, अरे, रक्तमूलिका, अहाँकेँ (बहुतो लोक) देखि रहल छथि! अहाँ अपन पिताक बहुत लाड़ली छी। मुदा एतय द्वेषी उत्तर भारतीय आबि रहल छथि जे सभ दक्षिणीक मूल पोषक स्वादबला मिथ्याकूट व्यञ्जनक अपमान करैत छथि। हुनकर धारणा एकदम विपरीत हैत।
(मंचक बाहरसँ)
अरे, अरे, आब चाचाक बेटीसँ आपसी विवाह आदि विषयक उपहासकेँ टारल जा सकैत अछि। उत्तर भारतीय, जे दोसराक दोषकेँ व्यंग्यसँ उघारि सकैत छथि, आब आबि गेल छथि।
(तखन बंगाली पण्डित झल्लरि-झङ्कार आ भेरि-भङ्कार भट्टाचार्यक अपन शिष्यक संग, जे हाथमे माछ धेने छथि, प्रवेश।)
भट्टाचार्य (चारू दिस देखैत आ सुँघैत)— शिव, शिव, हाय! ई सभ निःसंतान लोकक काज थिक। हा, हाय!
पालाण्डुमण्डन
(सभ नाक ढाँकि कऽ रहि जाइत छथि।)
शिष्य— भट्टाचार्य, हमरा सभकेँ तुरत रसोइघर दिस देखाउ, कारण ई तीन दिनक पुरान माछ कखनहु सड़ि सकैत अछि।
भट्टाचार्य— अरे, अरे, हम सभ एकटा अशास्त्रीय घरमे फँसि गेलहुँ! एतय एहि बाँझ लोकक बीच भोजनक व्यवस्था कोना करब?
दाक्षिणात्य— रे, रे, हम सभ सड़ल माछक गन्धसँ मरि रहल छी; कतय जाइ?
भट्टाचार्य— अरे, अहाँ सभ धर्मक सीमासँ बाहर छी, अहाँकेँ धर्मक बारेमे प्रायः किछु नहि बुझल अछि। स्मृति कहैत अछि: “जे व्यक्ति देवता आ पितरक पूजाक बाद माँस खाइत अछि, ओ दूषित नहि होइत अछि।”
दाक्षिणात्य (हृदयसँ)— अरे, अरे, ई कोना भऽ सकैत अछि, कारण कलियुगमे सम्बन्धित स्मृति-भागमे माँस-भक्षण निषिद्ध अछि?
भट्टाचार्य (हँसैत)— ई “दुष्टकेँ संतुष्ट करबाक सिद्धान्त” सँ भऽ सकैत अछि। पहिने, अहाँक कथनक कोनो आधार नहि अछि। आर, माछ खएनाइ कतय निषिद्ध अछि?
दाक्षिणात्य— जँ एना अछि, तँ कतय एकर विधान अछि?
भट्टाचार्य— की कात्यायनाचार्य “परञ्च माछ दू मासमे” कहैत गलती केने छथि? आर, की मनु बकवास कऽ रहल छथि जखन ओ कहैत छथि जे पाठीन आ रोहित प्रजातिक माछ क्रमशः देवगणकेँ (हव्य) आ पितरगणकेँ (कव्य) अर्पण करबाक हेतु सभसँ उपयुक्त अछि?
(ई विचार कऽ कऽ जे झूठा आरोप बिना प्रतिद्वंद्वीकेँ हरायल नहि जा सकत, दाक्षिणात्य लोक अपना बीचसँ एक व्यक्तिकेँ बाहर पठबैत छथि। जाबे धरि ओ राजकर्मचारीकेँ पकड़ि कऽ ओतय नहि आनि लैत छथि, ताबे धरि ओ किछु गढ़ल कथनसँ अपन प्रस्तावकेँ स्थापित करैत छथि।)
पालाण्डुमण्डन
(तखन प्रधान राजकर्मचारीक प्रवेश, जे भट्टाचार्यकेँ बान्हि कऽ मारैत छथि।)
भट्टाचार्य— हमरा नहि बुझना जाइत अछि जे अहाँ हमरा किएक मारि रहल छी। हम निर्दोष छी।
राजकर्मचारी— अरे, अरे, अहाँ एहन व्यक्ति छी जे मृत्यु घटाबय लेल कोनो तान्त्रिक क्रिया कऽ रहल छी। (सिपाही दिस देखैत) जे होउ; एकरा फेर बेर-बेर मारू!
(सिपाही ओकरा मारैत छथि।)
भट्टाचार्य (दुःखसँ)— ओह, ओह, दक्षिणी भाइ सभ, की ई सत्य थिक? की अहाँ सभ एहि मामलामे प्रत्यक्षदर्शी नहि छी?
दाक्षिणात्य— हम सभे एकमात्र गवाह छी। एहिमे की सन्देह अछि?
भट्टाचार्य— तँ अहाँ सभ ई साफ किएक नहि कहैत छी?
दाक्षिणात्य— की हमर गवाह होयबाक कोनो प्रमाण अछि?
भट्टाचार्य— अहाँ सभ, वैदिक ज्ञानमे निपुण भऽ कऽ, अहाँक गवाह होयबामे की सन्देह अछि?
दाक्षिणात्य (राजकर्मचारी दिस मुड़ैत)— जँ एना अछि, तँ एहि भट्टाचार्यकेँ मारि देल जाय, कारण ई एकटा तान्त्रिक थिक!
(एना कहि ओ प्याज, लहसुन आ अन्यक छिलकाक ढेर देखबैत छथि। एकरा सत्य पाबि, राजकर्मचारी भट्टाचार्य आ हुनकर शिष्यकेँ बान्हि कऽ कूड़ाक ढेरक संग लऽ जाइत छथि।)
दाक्षिणात्य (एक-दोसराक हाथ पकड़ैत)— जगदीश हमर प्रतिद्वंद्वी पर कोना विजय पाओल? हमर मित्रगण एहन गौरव भोगथि!
पालाण्डुमण्डन
शत्रु पराजित भेल, बाधाक अन्धकार पूर्णतः दूर भेल; ज्ञानक जय-जयकार भऽ रहल अछि; मुदा एखनो कलियुगमे निषिद्ध खाद्य-सम्बन्धी अन्धविश्वास किएक दूर नहि भेल? (१२)
जे होउ। गर्भाधान संस्कार फेर कोनो आन शुभ मुहूर्त पर मनायल जाय। हम सभ चलैत छी।
लिङ्गोजी भट्ट— तखन हम सभ आन शुभ मुहूर्तक व्यवस्था करी!
(एना कहि सभ उठैत छथि।)
तथापि, ई अन्तिम आशीर्वचन होउ।
राज्य-प्राप्ति, सभ दिशामे विजय, आ कठिनाइक पार पयबाक कार्य निःसन्देह केवल शुभ मुहूर्तेमे होइत अछि। (१३)
(सभ प्रस्थान करैत छथि।)
पालाण्डुमण्डन नामक प्रहसन समाप्त भेल।
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