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विदेह — प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका
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विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका

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गजेन्द्र ठाकुर

दीयरि: एक समग्र साहित्यिक मूल्यांकन

रा. ना. सुधाकरक मैथिली कथा-संग्रहक बहुआयामी समीक्षा

 

प्रारम्भिक टिप्पणी: पोथीक स्वरूप आ महत्त्व

 

रामनारायण सुधाकर (रा. ना. सुधाकर) लिखित "दीयरि" (मैथिली कथा-संग्रह) नेपालक विराटनगर केन्द्रित मैथिली साहित्यक एक महत्त्वपूर्ण दस्तावेज अछि। प्रकाशकीयमे उल्लिखित अछि जे लेखक लगभग साठि वर्षसँ लिखैत आबि रहल छथि, मुदा प्रकाशन आ प्रचार-प्रसारक अभावमे साहित्य जगतसँ ओझरायल रहलाह। ई संग्रह नेपाल विद्यापीठ मैथिली पाण्डुलिपि पुरस्कार-२०६५ सँ सम्मानित अछि। पोथीमे कुल बाइसटा कथा संकलित अछि।

 

भाग एक: संग्रहक संरचनात्मक विश्लेषण

१.१ संग्रहक भौगोलिक-सांस्कृतिक आधारभूमि

 

सुधाकरजीक कथा-विश्व मुख्यतः तीन भौगोलिक क्षेत्रमे केन्द्रित अछि:

क) बॉर्डर एरिया (जोगबनी-विराटनगर सीमा क्षेत्र): "संधि", "खुट्टी पर टाँगल ब्रा", "चा असोथकित अछि" न कथामे ई सीमान्त क्षेत्रक जटिल सामाजिक-आर्थिक परिवेश प्रस्तुत भेल अछि। लेखक स्वयं एहि "बॉर्डर एरिया"मे रहैत साहित्य-साधना कयलनि, से कथाक प्रामाणिकतामे झलकैत अछि।

ख) ग्रामीण मिथिला: "प्रदक्षिणा", "झखड़ल फूलक गाछ", "सुनगैत करेज", "थकुचल मासुक बुट्टी" आदि कथामे मैथिल ग्रामीण जीवनक विस्तृत चित्रण भेटैत अछि - पोखरि, ईनार, तुलसी चौरा, माटिक गंध, सरसोक फूल - ई सभ स्मृतिचित्र एकटा विस्थापित आत्माक नोस्टाल्जियाक अभिव्यक्ति थिक।

ग) शहरी परिवेश (विराटनगर): "दीयरि", "घरमुँहा", "चिल्होड़ि उड़ि रहल अछि", "नुक्का चोरी", "र्जखोर" - कथा सभमे औद्योगिक-शहरी जीवनक संघर्ष, आर्थिक दबाव, आ पारिवारिक विघटन केन्द्रमे अछि।

१.२ कालक्रम आ रचनाकाल

 

संग्रहक कथा सभक रचनाकाल व्यापक अछि: १९७६-७७ ई.

ई कालविस्तार (१९७६-२०२०, अर्थात् ४४ वर्ष) बतबैत अछि जे सुधाकरजीक लेखन-यात्रा कतेक दीर्घ आ निरन्तर रहल अछि। एकटा कथाकारक विकास-यात्रा एहि संग्रहमे दृष्टव्य अछि।

भाग दू: कथा सभक विस्तृत समीक्षा

२.१ "प्रदक्षिणा"- स्मृति, विस्थापन आ गामक मृत्यु

कथासूत्र: बाहर बारह वर्ष रहि गाम आयल एक पुरुष (बचनू) गामक पूर्णतः बदललाह स्वरूप देखि आघात पबैत अछि। गामक लोक अनचिन्हार भ' गेल, मित्र बिसरि गेल, पोखरि सूखि गेल, भालसरी गाछ उखड़ि गेल।

विस्तृत विश्लेषण:

एहि कथामे Thomas Hardyक "The Return of the Native" सन भावभूमि अछि - घुरल व्यक्ति आ बदललाह परिवेशक बीचक टकराव। मुदा सुधाकरजीक दृष्टि अधिक मार्मिक अछि। बचनू जे गाम छोड़लक से अर्थनैतिक विवशतासँ, आ जखन घूमि आयल तखन गामक आत्मा मरि गेल छल।

कथाक सर्वाधिक मार्मिक अंश - बचनूकेँ बुझेलै जेना ओकर गाम कतौ छुटि गेलै... ओकर मित्र कतौ भुतिया गेलै... आ भालसरीक फूल कतौ छिरिया गेलैए... आ स्वयं कोनो बियावानमे शनि गाछक टकुआ तान काँट जकाँ ठमकि गेल अछि।

पौराणिक स्तर: कथामे प्रदक्षिणाक प्रतीक महत्त्वपूर्ण अछि। हिन्दू परम्परामे गाम वा मन्दिरक प्रदक्षिणा मांगलिक होइत अछि, मुदा एहि कथामे बचनूक गामक प्रदक्षिणा एक शोकयात्रा बनि जाइत अछि- ओ अपन अतीतक प्रदक्षिणा करैत अछि जे ब अस्तित्वमे नहि रहल।

भारतीय साहित्यशास्त्रक दृष्टिसँ: करुण रस प्रधान एहि कथामे विप्रलम्भ श्रृंगार (बिछड़नक वेदना) सेहो अन्तर्धारा बनि प्रवाहित होइत अछि- बचनू आ ओकर बाल्यकालक मित्रमण्डलीक वियोग।

२.२ "दीयरि" - पारिवारिक दबावक बीच स्त्री-अस्मिता

कथासूत्र: एक मध्यवर्गीय परिवारमे बुढ़ा ससुर, पत्नी सुशीला (जे बीमार अछि), आ पतिक (कथाक प्रथम पुरुष वाचक) बीचक जटिल सम्बन्ध। बुढ़ा ससुर आर्थिक स्वच्छन्दता चाहैत छथि, सुशीला पीड़ामे जीबि रहली छथि, आ पति दुनू दिशाक दबावमे पिसाइत अछि।

विस्तृत विश्लेषण:

शीर्षक "दीयरि" (सागरमे दुनू दिशाक जल-प्रवाहसँ घेरायल रहैत अछि) एक सटीक रूपक अछि - पति दुनू दिशासँ आबैत दबावक बीचमे दीयरि जकाँ स्थित अछि।

कथाक सर्वाधिक मार्मिक अंश:

लालटेन भकभका रहल अछि, एक कात सुशीलाक आकांक्षाक महल, एम्हर बुढ़ाक वात्सल्यक टिम-टिमाइत दीप। ओही महलमे ओ दीप जरत? ने ओ महल बूढ़ाकेँ सोहाइत छनि आ नेहि दीपकेँ सुशीला पोसय चाहैत छथि।

मनोविश्लेषणात्मक दृष्टि: Sigmund Freud Oedipus Complex क परिप्रेक्ष्यमे देखल जाय तँ सुशीलाक ससुरसँ मनोवैज्ञानिक द्वन्द्व एक सूक्ष्म मनोवैज्ञानिक परत बनबैत अछि। मुदा सुधाकरजी एहि स्थितिकेँ कोनो रहस्यमय वा सनसनीखेज ढंगसँ नहि प्रस्तुत करैत छथि- वरन् सामान्य पारिवारिक जटिलताक रूपमे देखबैत छथि

स्त्री-विमर्श: सुशीला एहि कथाक केन्द्रीय शक्ति अछि, मुदा ओ मौन शक्ति अछि। ओकर रोग, ओकर निरुपाय स्थिति, आ पतिक असहायता - ई त्रिकोण एहि कथाकेँ स्त्री-यातनाक एक प्रामाणिक दस्तावेज बनबैत अछि।

२.३ "चोलिया मे चोर से गोरी" - ग्रामीण यौवन आ देह-भाषा

कथासूत्र: दू युवती (समतोलिया आ विलटा) घास काटैत-काटैत अपन प्रेम, ईर्ष्या, आकर्षण आ यौवनक उत्साहमे डुअछि

विस्तृत विश्लेषण:

मार्च १९८४मे "माटि-पानि" पत्रिकामे प्रकाशित एहि कथामे एकटा मुक्त कथानक अछि, जे बाशी नहि अछि। ई कथा D.H. Lawrence क ग्रामीण यौवन-चित्रण न मुक्त आ प्रकृतिसँ जुड़ल अछि।

कथाक सौन्दर्य एहि पंक्तिमे- एक कात दूर धरि सरिसक पीअर फूल सँ बाध गमकै छलै... दोसर दिस पाँच-पाँच हाथक पोरगर कुसियार रस सँ मातल-मदहोस भेल झुकि-झुकि कऽ बौरा रहल छलैक..

प्रकृति मात्र पृष्ठभूमि नहि, अपितु पात्रकेँ प्रभावित करएवाली शक्ति अछि- प्रकृतिक उर्वरता आ यौवनक उर्वरता एकात्म भ' जाइत अछि।

लोक-साहित्यक सन्दर्भ: कथा शीर्षक स्वयं एक लोकगीतक पंक्ति थिक। सुधाकरजी लोक-परम्पराकेँ आधुनिक कथामे सहजतासँ बुनैत छथि।

नारीवादी दृष्टि: विलटा आ समतोलियाक सम्बन्ध एक सशक्त female bonding (स्त्री-मैत्री) देखबैत अछि- जे पुरुष-केन्द्रित साहित्यमे प्रायः उपेक्षित रहैत अछि।

२.४ "खुट्टी पर टाँगल ब्रा"- बाजारवाद आ स्त्री-देह

कथासूत्र: बुचिया दोकानमे जाइत अछि। गंगबा (दोकानदार) विभिन्न वस्तु देखबैत-देखबैत अन्ततः एक ब्रा (ब्रसियर) बुचियाकेँ दैत अछि। बुचियाक मनोद्वन्द्व- ओकर आर्थिक विवशता आ शारीरिक आवश्यकता- कथाक केन्द्रमे अछि।

विस्तृत विश्लेषण:

अक्टूबर १९८४मे रचित ई कथा अपन रचनाकाल अत्यन्त साहसी कृति थिक। एहि विषयपर मैथिली साहित्यमे कोनो अन्य लेखक ओइ कालमे नहि लिखलनि।

बाजारवादक आलोचना: बाजारक आलोचना एहि कथामे दर्शाओल गेल अछि।

गंगबाक चरित्र बाजारवादक प्रतीक अछि- ओ स्त्री-देहकेँ व्यावसायिक दृष्टिसँ देखैत अछि।

Marxist दृष्टिकोण: स्त्री-शरीरक commodification (वस्तुकरण) एहि कथाक केन्द्रीय थीम थिक। बुचियाक आर्थिक विवशता ओकरा गंगबाक जालमे फँसबैत अछि। वर्गीय शोषण आ लैंगिक शोषण एक संग का करैत अछि।

Foucault: Michel Foucault कहने छलाह जे "power operates on the body" - एहि कथामे गंगबाक नजरि, ओकर "व्यावसायिक मुस्की", आ अन्ततः खूँटीपर लटकल ब्रा- ई सभ शक्ति-सम्बन्धक दृश्यमान अभिव्यक्ति थिक।

कथाक अन्तिम पंक्ति - .. ओकर नजरि ओ टाँगल ब्रेसियरपर ठमकि जाइत छै। ओकरा लगैत छै जे भीतरक बकुटलहा... ब्रेसियरक दुनु धोकरी मे भरि क ओ अपने हाथे लटका देने अछि.. - ई पंक्ति स्त्रीक निःसहाय अवस्था आ बाजारक निर्मम चरित्रकेँ व्यक्त करैत अछि।

२.५ "चान असोथकित अछि" - वृद्धावस्था, काम-भावना आ सामाजिक पाखण्ड

कथासूत्र: सुशील बाबू वृद्ध छथि, हाफी लगैत छनि, मुदा माया (ओकर देखभाल करनिहारि) ओकरा उत्तेजित करैत रहैत अछि। माया स्वयं यौन-असन्तोषसँ पीड़ित अछि- मनटूनमा (ओकर पति) नपुंसक प्राय अछि। सुशील बाबू अन्ततः मनटूनमाकेँ एक नव "सुतनाहर" (चौकीदार) राखि दैत छथि।

विस्तृत विश्लेषण:

ई कथा अत्यन्त जटिल मनोवैज्ञानिक भूमिमे स्थित अछि। "चान असोथकित अछि"- चन्द्रमा अशान्त/थाकल अछि- ई शीर्षक स्वयं एक कामुक व्यंजना थिक।

Simone de Beauvoir: माया एक अर्थमे de Beauviorक "second sex"क प्रतिनिधि थिक- ओ अपन शारीरिक आवश्यकताक लेल पुरुष-केन्द्रित व्यवस्थापर निर्भर अछि। ओकर उत्सुकता, ओकर छटपटाहटि- ई मानवीय अभिव्यक्ति थिक जे समाज दमित करैत अछि।

वृद्धावस्था आ काम-भावना: साहित्यमे प्रायः वृद्धजनक काम-भावनाकेँ हास्यास्पद वा निन्दनीय चित्रित कएल जाइत अछि। सुधाकरजी एहि विषयकेँ करुणा आ सहानुभूतिसँ देखैत छथि- सुशील बाबूक "हाफी" मात्र शारीरिक लक्षण नहि, अपितु वृद्धावस्थाक एक त्रासद अनुभव अछि।

नैतिक जटिलता: कथाक नैतिक ढाँचा सरल नहि अछि।   मायाआत्मत्याग आ.. दुनूकेँ कथाकार सुधाकर सहानुभूतिसँ देखैत छथि- निन्दाक दृष्टिसँ नहि।

२.६ "झखड़ल फूलक गाछ"- बहुविवाह आ स्त्री-वेदना

कथासूत्र: जीवछा, खनजनियाँ आ फुलियाजीवछाक सतमाय खनजनियाँ संगे अवैध सम्बन्ध राखैत अछि। दुनू स्त्री बीचक द्वन्द्व आ जीवछाक नैतिक पतन उद्घाटित होइत अछि।

विस्तृत विश्लेषण:

ई कथा १४.११.७६ मे रचित- रचनाकालक हिसाबसँ सुधाकरजीक प्रारम्भिक रचनामे सँ एकटा, मुदा विषयक साहस अतुलनीय।

खनजनियाँक चरित्र: खनजनिया कथाकेँ शक्ति दैत अछि। ओ कहैत अछि - "हमरा जीवछासँ दूर नहि करै... कोनो कोनमे हम पड़ल रहब।" ई पंक्ति एक स्त्रीक निरुपाय स्थिति उजागर करैत अछि- किएकि आर्थिक, सामाजिक आ मनोवैज्ञानिक निर्भरता ओकरा बान्हि कऽ राखने अछि।

बूढ़ी खनजनियाँक प्रतीकार्थ: बूढ़ी खनजनियाँ (जीवछाक सतमाय)- झखड़ल फूलक गाछ जकाँ फुलिया बड़ा बेदर्दीसँ उखाड़ि क आँगनमे फेक देलकैए।

शीर्षकक सार्थकता: "झखड़ल फूलक गाछ" वार्धक्य आ परित्यागक एक सुन्दर रूपक थिक।

२.७ "घरमुँहा"- शहरी एकाकीपन आ पारिवारिक विघटन

कथासूत्र: कथावाचक (पति) आ ओकर पत्नी विराटनगरक एक छोट कोठलीमे रहैत छथि। संघर्ष, आर्थिक विपन्नता, पत्नीक बीमारी, आ एहि सभक बीच पतिक मनोयन्त्रणा।

विस्तृत विश्लेषण:

एहिमे एकटा परिवारक सम्पूर्ण जीवन-संघर्ष मात्र कनिया बिम्बसभमे देखाओल गेल अछि।

 

चूल्हिक बिम्ब: कोठरीमे चूल्हिपर राखल भात-दालिक हंडी“ लोहियामे झाँपल आलू-अरिकोंचक तरकारी”  बेंचपर राखल थारी-कटोरी ई सभ वस्तुसूची मात्र विवरण नहि, ई एक जीवन-संघर्षक दृश्यमान चिह्न थिक।

पहचान-संकट: कथावाचक ने शहरी जीवन बुझि-गमि-रमि सकला ने अपन ग्रामीण माटिक सुगन्ध बिसरि सकला... ने माटिक लसफसी सँ उबरि सकला। ई विराटनगरमे बसल मैथिलजनक सार्वभौमिक अनुभव थिक।

२.८ "उपहार" - यशोधरा-प्रतीकमे आधुनिक स्त्री-यातना

कथासूत्र: यशोधराक पति गौतम घरसँ भागि गेल छलनि- आआरोप-प्रत्यारोप, परिवारक अपेक्षा, आ ओकर एकाकीपन चित्रित अछि।

विस्तृत विश्लेषण:

मिथकीय सन्दर्भ: सुधाकरजी यशोधरा आ गौतम-बुद्धक मिथककेँ आधुनिक सन्दर्भमे पुनर्व्याख्यायित करैत छथि। गौतम (आधुनिक पुरुष) अपन आदर्शक पाछाँ भागि जाइत अछि, पाछू छोड़ि जाइत अछि यशोधराकेँ- अपन राहुलकेँ।

विडम्बना: कथाक अन्तमे यशोधरा राहुल (बच्चा) केँ कोरामे उठबैत अछि- "गौतमक प्रथम आ अन्तिम उपहार।" ई पंक्ति एकटा व्यंग्य थिक - पुरुषक सर्वोच्च "उपहार" एक बच्चा अछि।

२.९ "चिल्होड़ि उड़ि रहल अछि" - बेरोजगारी, पत्नी आ मित्र-विश्वासघात

कथासूत्र: विनोद बेरोजगार अछि। चन्दाक व्यवहार ओकरा आहत करैत अछि। बेरोजगारीक समयमे  उपेक्षा, मित्रक विश्वासघात।

विस्तृत विश्लेषण:

आर्थिक नपुंसकता आ पुरुष-अस्मिता: पितृसत्तात्मक समाजमे पुरुषक पहचान ओकर कमाइसँ जुड़ल अछि। विनोदक बेरोजगारी मात्र आर्थिक समस्या नहि- ओकर पुरुष-अहंकार, ओकर सामाजिक प्रतिष्ठा, ओकर पत्नीक दृष्टिमे ओकर "मूल्य - सभ एकसंग खतरामे पड़ि जाइत अछि।

चन्दाक चरित्र: चन्दाक चरित्र एकआयामी नहि अछि। ओ कोनो खलनायिका नहि। ओकर फर्माइश, ओकर असन्तोष- ई मानवीय प्रतिक्रिया थिक एक एहन सिस्टमक प्रति जे स्त्रीक सपना आ आकांक्षाकेँ फजूल मानैत अछि। मुदा अन्ततः ओकर व्यवहार विनोदकेँ तोड़ि दैत अछि।

कथाक शीर्षक: "चिल्होड़ि उड़ि रहल अछि"- विनोदक जीवनक रूपक थिक, जे बिना कोनो सहाराक उड़ि रहल अछि।

२.१० "नुक्का चोरी"- वर्जित प्रेम आ सामाजिक बाधा

कथासूत्र: चन्दन आ विभा दू युवा छथि, ओ "पाहुन" सम्बन्धमे छथि आ पारिवारिक संरचना ओकर प्रेमकेँ "अवैध"बनबैत अछि।

विस्तृत विश्लेषण:

सम्बन्धक जटिलता: "पाहुन" जेहन सम्बन्धमे कोनो रोमाण्टिक भावना वर्जित मानल जाइत अछि। मुदा चन्दन आ विभाक आकर्षण बाधाकेँ पार करैत अछि।

चन्दनक द्वन्द्व: ई एकटा genuine emotional connection थिक जे सामाजिक संरचनाक विरुद्ध जाइत अछि।

रोमाण्टिक-यथार्थवादी सन्तुलन: सुधाकरजी एहि सम्बन्धकेँ ने महिमामण्डित करैत छथि, ने निन्दित करैत छथि। ओ मात्र दूटा मानवीय हृदयक छटपटाहटि देखबैत छथि।

२.११ "कर्जखोर"- ऋण-जाल आ मध्यवर्गीय यन्त्रणा

कथासूत्र: दास जी एक बेरोजगार मध्यवर्गीय व्यक्ति छथि जे कतेक लोकसँ कर्ज लेने छथि - ध्रुवजी १५००, गोपाल (तकिया, जाजिम, चादर) वीरेन्द्र ५००, उमाशंकरजी ४००, प्रदीप ५९०, हरिशंकरजी १७०० लगभग- ई कर्जसूची जीवनक कारुण्यकेँ व्यक्त करैत अछि।

विस्तृत विश्लेषण:

यथार्थवादी विवरण: कर्जक फेहरिस्त एकटा literary device (साहित्यिक उपकरण) थिक - कागज-कलम ल' ' बनाओल सूची एक व्यक्तिक पूरा जीवन-संघर्षक लेखाजोखा बनि जाइत अछि।

प्रदीपक प्रसंग: प्रदीप (महाजन जकाँ) आ दास जी बीचक सम्बन्ध मार्मिक अछि। प्रदीप कहैत अछि - "देखु दास जी, अहाँ लेते पाइ कोनो बड़का पहाड़ नहि छै... कनियो ध्यान देबै तँ इन्तजाम भ' जेतै।" ई पंक्ति एक जटिल power dynamic उजागर करैत अछि - जे कर्जदार हो ओकर dignity (प्रतिष्ठा) धीरे-धीरे क्षीण होइत जाइत अछि।

 

Marx: ऋण एक एहन chain (जंजीर) थिक जे पूँजीवादी समाजमे मध्यवर्गीय व्यक्तिकेँ बन्धुआ बनबैत अछि। दास जीक स्थिति "debt bondage"क एक साहित्यिक उदाहरण थिक।

२.१२ "रामपरी"- पत्र-साहित्य आ स्त्री-अन्तर्द्वन्द्व

कथासूत्र: कथाक वाचक "सूर्यमुखी" (एक युवती) रामपरी (ओकर सखी) केँ पत्र लिखैत अछि। पत्रमे अपन जीवनक उल्लेख।

विस्तृत विश्लेषण:

Epistolary Form (पत्र-विधा): ई कथा epistolary form (पत्रविधा) मे लिखल गेल अछि- जे मैथिली कथा-साहित्यमे दुर्लभ प्रयोग थिक। पत्रक भाषामे एक आत्मीयता आ अनौपचारिकता होइत अछि जे सोझ वाचनसँ अलग होइत अछि।

गीतक समावेश: कथाक मध्यमे एक गीत- एहि गीतक समावेश कथाकेँ एक अतिरिक्त भावात्मक आयाम दैत अछि। भारतीय साहित्यमे गीत-कथाक मिश्रण एकटा पुरान परम्परा थिक।

२८.८.७६ क तिथि: पत्रक अन्तमे "तोरे सूर्यमुखी (२८.८.७६)" - ई तिथि-उल्लेख कथाकेँ एक ऐतिहासिक दस्तावेज बनबैतअछि।

२.१३ "अस्तित्व" - तीन भाइ, एक बूढ़ बाप, आ सम्पत्ति-विवाद

कथासूत्र: तीन भाइ (श्रीकान्त, शशिकान्त, सुधाकान्त) आ बूढ़ बाप। बूढ़ बापक देखभाल, भानस-भात, आ पत्नी-केन्द्रित अलगाव-प्रवृत्ति।

विस्तृत विश्लेषण:

संयुक्त परिवारक विघटन: "अस्तित्व" संयुक्त परिवार व्यवस्थाक पतनक आख्यान थिक। तीनू भाइ अपन-अपन पत्नीक दबावमे अलग-अलग घर बनेबाक सोचि रहल छथि।

बूढ़ाक मार्मिक अवस्था: बूढ़ा सन्दूकपर पड़ल-पड़ल अचानक सचेत भ' जाइत छथि। एहि एक छोट विवरणमे एक बाप-बेटाक सम्पूर्ण मनोवैज्ञानिक सम्बन्ध व्यक्त भ' जाइत अछि।

व्यंग्यात्मक आलोचना: गु चाउर फाँकि रहल ई कथा एक व्यंग्यात्मक चित्र खींचैत अछि।

२.१४ "सुनगैत करज" - बालमनोविज्ञान आ वयस्क-संसार

कथासूत्र: महेशवा (एक छोट बच्चा) स्कूल छोड़ि गाछीमे खेलाइत अछि आदि आदि

विस्तृत विश्लेषण:

बाल-दृष्टिकोण: सुधाकरजी एहि कथामे बाल-मनोविज्ञानकेँ अत्यन्त संवेदनशीलतासँ उजागर करैत छथि। महेशवाक भूख, ओकर जिज्ञासा, ओकर "विद्रोह", बीड़ी पीनाइ- ई सभ बालकेँ एक सम्पूर्ण मानव-सत्ता प्रमाणित करैत अछि।

महादेवक सिक्का: महेशवा महादेवक लिंगपर राखल पाइ देखि ओकरा उठा लैत अछि। ई दृश्य गहींर प्रतीकात्मक अर्थ राखैत अछि।

२.१५ "थकुचल मासुक बुट्टी" - कला, यौवन आ समाजक हिंसा

कथासूत्र: ललनमा (एक प्रतिभाशाली बाँसुरी-वादक आ गायक) आ कथावाचक बच्चेसँ मित्र छथि। मुदा ललन आस्ते-आस्ते हिंसाक स्ता पकड़ि लैत अछि ।

विस्तृत विश्लेषण:

कलाकारक त्रासद नियति: ललनक बाँसुरी-प्रतिभा समाज द्वारा पोषित नहि, वरन् नष्ट क' देल जाइत अछि। ई कथा प्रश्न उठबैत अछि- कोन समाज अपन प्रतिभाशाली सन्तानकेँ हिंसक होइले विवश करैत अछि?

ललन-कथावाचक: आँजुरमे भुज्जा आ गीत।

२.१६ "खण्डित लोक" - पीढ़ी-संघर्ष आ परम्परा-आधुनिकताक टकराव

कथासूत्र: लालचन बूढ़ा आ ओकर परिवारक बीचक पीढ़ीगत संघर्ष। बूढ़ा प्रेमचन्द-शरतचन्द-जयशंकर प्रसादक आदर्शवादसँ जीवन जीलनि, मुदा परिवार ओकर मूल्यकेँ नकारि देलक।

विस्तृत विश्लेषण:

माँछक प्रसंग: बूढ़ा मछरी किनि आनैत छथि। बूढ़िया कहैत छथि - "धौर! आब एत' मुनहारि साँझमे के बनेतै माँछ?"- ई एक साधारण घरेलू प्रसंग थिक, मुदा एहिमे दुटा पीढ़ीक दुटा दुनिया टकरा जाइत अछि।

आदर्शवाद आ यथार्थवाद: वएह ओकर पाथेय छल- बूढ़ाक साहित्यिक आदर्शवाद। मुदा ई गमकौआ आदर्श कि ने बुझनाहर। आधुनिक वास्तविकता। दुनूक बीच बूढ़ा एकाकी अछि।

२.१७ "छागर" - बहुसम्बन्ध आ स्त्री-प्रतिरोध

कथासूत्र: चन्दन आ रूपम/ रूपाक विवाह भेलनि अछि। चन्दनक माय (सासु) निरन्तर रूपमकेँ प्रताड़ित करैत रहैत छथि। रूपम अन्ततः अपन प्रतिरोध व्यक्त करैत अछि।

विस्तृत विश्लेषण:

"छागर" शीर्षक एक व्यंग्यात्मक प्रतीक थिक - जे छागर (बकरी) बलि देबाक लेल पोसल जाइत अछि, से रूपा सासुरक लेल बलिपशु जकाँ थिक।

सासु-बहूक सम्बन्ध: भारतीय साहित्यमे ई सम्बन्ध बारम्बार आयल अछि। मुदा सुधाकरजी विषयमे नहि तँ सासुकेँ खलनायिका बनबैत छथि, नहि रूपाकेँ एकमात्र पीड़िता। चन्दन (पति) कतहु बीचमे अछि - मुदा ओकर मौन सेहो एक प्रकारक सहयोग थिक शोषणमे।

२.१८ "परिवेश" - राजनीति, व्यक्तिगत महत्त्वाकांक्षा आ नैतिक पतन

कथासूत्र: बच्चा भाइ (एक गाँवक प्रभावशाली व्यक्ति) आ मनोहरक पढ़ल-लिखल परिवार। चन्द्रकान्त (एक युवक) एहि झगड़ामे पड़ि जाइत अछि। चन्द्रकान्तकेँ बच्चा भाइक पक्षक लोक पिटैत अछि।

विस्तृत विश्लेषण:

राजनीतिक व्यंग्य: "जनकपुरसँ प्रकाशित संकेत मे, जनवरी, १९९१" मे प्रकाशित कथाक पृष्ठभूमि नेपालमे लोकतान्त्रिक परिवर्तनक पूर्वकाल थिक। बच्चा भाइक सत्ता-भोग, ग्रामीण राजनीतिक षड्यन्त्र- ई सभ एहि ऐतिहासिक काल-खण्डक दर्पण थिक।

२.१९ "छाहरि तरक काँट"- भाइचारा, स्त्री-प्रश्न आ न्याय

कथासूत्र: शशिकान्त आ हेमकान्तक बीचक सम्बन्ध। सुमित्रा (शशिकान्तक पत्नी) आ श्यामा (हेमकान्तक पत्नी)- दुटा स्त्री। एक सम्पत्ति-विवाद, एकटा थापड़।

विस्तृत विश्लेषण:

खीराक रूपक: खीराक गाछ - दूटा खीरा एके बिया, एके माटि, एके बाँसक सहारापर बढ़ैत-बढ़ैत छीपधरि पहुँचि गेल- मुदा । भाइचाराक टुटबाक मार्मिक विवरण

२.२०. ”संधि“- बोर्डर एरिया, दुनू बेकतीमे अट्ठाबज्जर।

रसिया आदमी कबीरदासक बोली बाजैत अछि से दुनू बेकतीमे अट्ठाबज्जर खसलैए। दुनू कमाइए। मुदा सत्तैसमे दिन मेल भऽ गेलै। भारत नेपालक सन्धि टुटना २९ दिन भऽ गेल छै।

 

२.२१. "स्वप्न-भंग" - प्रेम, कल्पना आ यथार्थक संघर्ष

कथासूत्र: श्रीकान्त पद्माक प्रति अनुरक्त छथि। हिनक Diary सन आन्तरिक एकालाप।

विस्तृत विश्लेषण: ई कथा सर्वाधिक Romantic (स्वच्छन्दतावादी) शैलीक अछि। "स्वप्न-भंग" नाम स्वयं Romantic आन्दोलनक एक महत्त्वपूर्ण थीम थिक।

२.२२. "कोनो एक दिन" - कोविड-महामारी आ मानवीय एकाकीपन

कथा ३ अक्टूबर, २०२०क रचित- कोविड-कालक लकडाउनक पृष्ठभूमिमे एक पति-पत्नीक रात्रि-वार्तालाप।  पुरान स्मृति, वर्तमानक असन्तोष।

विस्तृत विश्लेषण:

 

संग्रहमे ई एकमात्र कथा अछि जे महामारी-कालक अनुभवकेँ दर्ज करैत अछि। अन्तमे- पूर्णिमा छलै ओइ दिन.. - ई पंक्ति भूतक स्मृतिक वर्तमानमे पुनरागमनकेँ व्यक्त करैत अछि।

भाग तीन: गंगेश उपाध्यायक नव्य न्यायक प्रकाशमे विश्लेषण

३.१ नव्य न्यायक मूलभूत प्रत्यय

गंगेश उपाध्याय (१२-१३शतीक मिथिला-दार्शनिक) रचित "तत्त्वचिन्तामणि" नव्य-न्याय दर्शनक आधारभूत ग्रन्थ थिक। एहि दर्शनमे:

व्याप्ति (Pervasion/Universal relationship)

अनुमान (Inference/अनुमान)

शब्द (Verbal testimony)

प्रत्यक्ष (Direct perception)

उपाधि (Condition/qualifier)

सभ प्रमुख ज्ञान-माध्यम छथि।

३.२ "दीयरि"क नव्य न्यायिक विश्लेषण

व्याप्ति (Universal Relation) क सन्दर्भमे: नव्य न्यायमे व्याप्ति अर्थात् कारण-कार्यक सार्वभौमिक सम्बन्ध - जेना "जतऽ धुआँ, तऽगि।" सुधाकरजीक कथामे एक व्याप्ति स्पष्ट दृष्टव्य अछि:

तऽ आर्थिक विपन्नता, तऽ पारिवारिक विघटन।

"र्जखोर", "घरमुँहा", "दीयरि", "चिल्होड़ि उड़ि रहल अछि"- एहि सभ कथामे ई व्याप्ति सुसंगत रूपमे प्रकट होइत अछि। नव्य न्यायक दृष्टिसँ ई "व्यापकता" सुधाकरजीक साहित्यिक जगत्-दर्शनक आधार थिक।

अनुमान (Inference) क सन्दर्भमे: नव्य न्यायमे त्रिविध अनुमान होइत अछि- केवलान्वयी, केवलव्यतिरेकी आ अन्वयव्यतिरेकी। सुधाकरजीक कथामे पात्रसभ अनुमानक आधारपर निर्णय लैत छथि, मुदा ओ अनुमान प्रायः भ्रमपूर्ण होइत अछि - अनुमान कखनो काल त्रुटिपूर्ण निकलैत अछि। [कथा- परिवेश]

उपाधि (Condition) क सन्दर्भमे: नव्य न्यायमे "उपाधि" अर्थात् शर्त जे कोनो व्याप्तिकेँ सीमित करैत अछि। "नुक्का चोरी"मे चन्दन-विभाक प्रेमपर सामाजिक "उपाधि" लागि गेल अछि- जे ओकर प्रेमकेँ "अवैध" घोषित करैत अछि। ई उपाधि-मूलक बन्धन सुधाकरजीक कथामे बारम्बार अबैत अछि।

भाग चारि: विदेह समानान्तर इतिहास-फ्रेमवर्कक सन्दर्भमे विश्लेषण

४.१ विदेह-परम्परा आ मिथिला-साहित्य

"विदेह" मिथिलाक पुराना नाम थिक। राजा जनकक विदेह साम्राज्य मिथिला-सभ्यताक प्रतीक थिक। एहि "विदेह इतिहास-फ्रेमवर्क"मे नेपाल-तराईमे बसल मैथिलजनक समानान्तर इतिहासकेँ देखबाक प्रयास होइत अछि - ओ इतिहास जे आधिकारिक राष्ट्र-इतिहासमे प्रायः उपेक्षित रहैत अछि।

४.२ सुधाकरजीक कथा आ विदेह-इतिहास

सुधाकरजी जन्मतः नेपालक मलहनी, कलैया (वीरगंज) केर निवासी, परन्तु विराटनगरमे बसि गेलाह। ई "प्रवासी-मैथिल" अनुभव एक समानान्तर इतिहास थिक:

क) भारत-नेपाल सीमाक मैथिल पहचान:

"संधि" कथामे नेपाल-भारत तेल-सन्धिक प्रसंग - ई मात्र एक कथा-तत्त्व नहि, ओइ मैथिल समाजक जीवन्त इतिहास थिक जे दुनू देशक बीच "दीयरि" जकाँ स्थित अछि। [बॉर्डर एरिया]

ख) नेपालक राजनीतिक परिवर्तन आ मैथिल:

"परिवेश" आ "खण्डित लोक" कथामे नेपालक लोकतान्त्रिक आन्दोलन आ माओवादी संघर्षक छाया स्पष्ट अछि। ई मैथिल समाजपर राजनीतिक उथल-पुथलक प्रभावकेँ दस्तावेज करैत अछि।

ग) भाषाई पहचान:

मैथिलीमे लेखन स्वयं एक राजनीतिक कार्य थिक - जतऽ मैथिली उपेक्षित रहल। सुधाकरजीक ६० वर्षक लेखन-साधना एहि "भाषाई प्रतिरोध"क एक अध्याय थिक।

भाग पाँच: भारतीय, चीनी आ पाश्चात्य सिद्धान्तक दृष्टिसँ समग्र मूल्यांकन

५.१ भारतीय साहित्यशास्त्रक दृष्टि

रस-सिद्धान्त (भरत मुनि ~ ३०० ईसा पूर्व):

कथा  प्रमुख रस

प्रदक्षिणा  करुण + बीभत्स

दीयरि  करुण + शान्त

झखड़ल फूलक गाछ  करुण + रौद्र

चोलिया मे चोर बसे गोरी  श्रृंगार

उपहार  करुण + वीर

र्जखोर  करुण

थकुचल मासुक बुट्टी  करुण + रौद्र

सुधाकरजीक कथामे करुण रस सर्वाधिक प्रबल अछि। भरतक नाट्यशास्त्रमे करुण रसक स्थायी भाव "शोक" थिक। अभिनवगुप्त कहने छलाह जे करुण रस तखनहि सम्भव होइत अछि जखन वाचक/दर्शक साधारणीकरणक माध्यमे पात्रक वेदनामे स्वयंकेँ देखैत अछि। सुधाकरजीक कथामे ई साधारणीकरण अत्यन्त सफल अछि - पाठक दासजी, विनोद, बचनू, आ ललनक पीड़ामे स्वयंकेँ देखि सकैत अछि।

ध्वनि-सिद्धान्त (आनन्दवर्धन ~ ९वीं शती):

सुधाकरजीक कथामे व्यंजना (ध्वन्यार्थ) अत्यन्त शक्तिशाली अछि। "दीयरि" शीर्षक स्वयं एक ध्वन्यर्थ थिक- नदीक दीयरि, पतिक स्थिति, स्त्री-अस्मिताक अनिश्चितता- ई सभ एक संग व्यंजित होइत अछि।

"खुट्टी पर टाँगल ब्रा"- शीर्षकमे एक ध्वन्यार्थ अछि जे "बाजारू सभ्यता" आ "स्त्री-देहक वस्तुकरण"- दुनूकेँ एकसंगे व्यंजित करैत अछि।

वक्रोक्ति-सिद्धान्त (कुन्तक ~ १०वीं शती):

कुन्तकक "वक्रोक्ति" (बाँक/विशिष्ट भाषाप्रयोग) सुधाकरजीक भाषामे स्पष्ट दृष्टव्य अछि। ओ "पदवक्रता" (शब्द-स्तरपर), "वाक्यवक्रता" (वाक्य-स्तरपर) आ "प्रबन्धवक्रता" (रचना-स्तरपर) तीनू स्तरपर वक्रोक्तिक प्रयोग करैत छथि।

५.२ चीनी साहित्यिक सिद्धान्तक दृष्टि

Liu Xie (४६५-५२१ ई.) क "Wenxin Diaolong"- "साहित्यक हृदयक ड्रैगन":

Liu Xie क दृष्टिमे उत्कृष्ट साहित्य - (Qiáng, भावना) आ (Lǐ, तर्क/सिद्धान्त)- दुनूकेँ एकसंग समेटैत अछि।

सुधाकरजीक कथामे दुनू तत्त्वक सुन्दर समन्वय अछि:

Qiáng: ओकर पात्रसभक भावनात्मक प्रामाणिकता

Lǐ: सामाजिक समस्याक तार्किक चित्रण

Su Shi (सु शि, १०३७-११०१) क सौन्दर्यशास्त्र:

सु शि कहने छलाह - साहित्यक सत्य प्रकृतिसँ प्रकट होइत अछि।" सुधाकरजीक कथामे ई "प्राकृतिक सत्य" अत्यन्त स्पष्ट अछि। ओ कृत्रिम भाषा आ ओझरी कथातन्त्रसँ दूर रहि, सीधे जीवन-सत्यकेँ पकड़ैत छथि।

Bi Xing- चीनी काव्यशास्त्रक रूपक-सिद्धान्त:

Bi अर्थात् उपमा/रूपक आ Xing अर्थात् भावोत्तेजन- ई दुनू सुधाकरजीक कथामे प्रबल रूपमे उपस्थित अछि:

"दीयरि" (Bi) ” सागरक बीच दीयरि = पति/स्त्रीक स्थिति

"झखड़ल फूलक गाछ" (Bi)- उखड़ल गाछ= परित्यक्ता बूढ़िया।

"सुनगैत करज" (Xing)- सुलगैत कर्ज भावनात्मक उत्तेजना जगबैत अछि

५.३ पाश्चात्य सिद्धान्तक दृष्टि

Mikhail Bakhtin (बाख्तिन, १८९५-१९७५)क "Dialogism" आ "Polyphony":

बाख्तिन कहने छलाह जे महान उपन्यासमे (आ साहित्यमे) बहुस्वर (polyphony) होइत अछि- जतय लेखकक एकमात्र स्वर नहि, वरन् विभिन्न पात्रक विभिन्न आवाज एक संग गूँजैत अछि।

सुधाकरजीक कथामे ई बहुस्वरता स्पष्ट अछि:

"दीयरि"मे तीन स्वर- बुढ़ा, सुशीला, कथावाचक पति- तीनूक दृष्टिकोण वैध अछि

"अस्तित्व"मे तीन भाइक तीन स्वर

"घरमुँहा"मे घरेलू जीवनक अनेक अप्रत्याशित स्वर

Georg Lukács (लुकाच, १८८५-१९७१)क "Critical Realism":

लुकाच "Critical Realism" (आलोचनात्मक यथार्थवाद)क सिद्धान्त देलनि- जे बुर्जुआ समाजक विरोधाभासकेँ सत्य कलात्मक अभिव्यक्तिक माध्यमसँ उद्घाटित करैत अछि।

सुधाकरजी अर्थमे Critical Realist छथि। ओ ने Socialist Realism (समाजवादी यथार्थवाद) क प्रोपेगण्ड करै छथि, हिये पलायनवादी छथि। ओ मैथिल मध्यवर्गक विरोधाभासकेँ- एकटा कुशल शल्य-चिकित्सक जेकाँ- उघाड़ैत छथि।

Antonio Gramsci (ग्राम्शी, १८९१-१९३७)क "Hegemony" आ "Organic Intellectuals":

ग्राम्शीक "Hegemony" (सांस्कृतिक वर्चस्व) आ "Organic Intellectuals" (कार्बनिक बुद्धिजीवी)- सुधाकरजी एक organic intellectual छथि जे श्रमजीवी वर्गक भीतरसँ ओकर अनुभवकेँ साहित्यमे अभिव्यक्त करैत छथि।

ओ विराटनगरक औद्योगिक क्षेत्रमे काज केनिहार- ओकर जीवन-संघर्ष ओकर लेखनकेँ organic authenticity (जैविक प्रामाणिकता) दैत अछि।

Homi Bhabha (भाभा, जन्म १९४९) क "Third Space" Hybridity:

Bhabha कहने छलाह जे उपनिवेशवाद (आ विस्थापन) एक "Third Space" उत्पन्न करैत अछि- नहिये पूर्णतः पुरान पहचान, ने पूर्णतः नव पहचान।

नेपाल मैथिल सुधाकरजी एहि "Third Space"क निवासी छथि। ओकर पात्रसभ “ बेचना ("प्रदक्षिणा"), कथावाचक ("घरमुँहा"), कथावाचक ("संधि") - सभ  hybrid identity (संकर पहचान)सँ पीड़ित छथि। ने शहरी जीवनक उद्वलनमे शामिल हो'बाक समय के पकड़ि सकलहुँ... ने अपन ग्रामीण माटिक सुगन्ध हम बिसरि सकलहुँ - ई Bhabha Third Space क साहित्यिक अभिव्यक्ति थिक।

भाग छः: भाषा-शैली आ तकनीकक विश्लेषण

६.१ मैथिली भाषाक प्रयोग

सुधाकरजी नेपाली मैथिलीक एक विशिष्ट प्रकारक प्रयोग करैत छथि। एहि भाषामे अछि:

- मैथिलीक पूर्वी उपभाषा

- नेपाली भाषासँ प्रभावित कतिपय शब्द

- विराटनगरी बाजारी बोलीक प्रभाव

- ग्रामीण मिथिलाक लोक-बोली

६.२ विवरण-शैली

सुधाकरजीक कथाक विवरण कम शब्दमे अछि।" उदाहरण: चुल्हि पर राखल भात-दालिक हाँड़ी... चिनमार पर दूधक टोपिया... लोहियामे झाँपल आलू-अरिकोंचक तरकारी आ ओकर गंध... बेंच पर राखल थारी-कटोरी आ गिलासक गेंट... सिलौट पर पीसल-थोपल टमाटर, मिरचाइ आ धनीक चटनी आ सबसँ ऊपर जरैत दीप जनाँ शमशानक एकांतमे ककरो चिता सँ लहरि उठि रहल हो।

ई विवरण imagist (बिम्बवादी) प्रभाव देखबैत अछि।

६.३ संवाद-शैली

सुधाकरजीक संवाद अत्यन्त स्वाभाविक आ जीवन्त अछि। ओ अनावश्यक "literary" नहि होइत अछि। उदाहरण - "कर्जखोर" मे ई संवाद एक साधारण मैथिल परिवारक वार्तालापक सटीक प्रतिलिपि थिक।

भाग सात: समग्र साहित्यिक मूल्यांकन

७.१ सुधाकरजीक शक्ति-पक्ष

क) प्रामाणिकता: सुधाकरजीक सबसँ बड़ शक्ति ओकर प्रामाणिकता थिक। ओ लिखैत छथि जे ओ जीलनि, देखलनि, आ अनुभव कयलनि। ई "lived experience" (जील अनुभव) ओकर कथाकेँ एक literary manufactured fiction सँ अलग आ श्रेष्ठ बनबैतअछि।

ख) सामाजिक प्रतिबद्धता: ओ सामाजिक असमानता, स्त्री-शोषण, आर्थिक विपन्नता - सभ विषयपर लिखैत छथि बिना कोनो वैचारिक दुराग्रहक। ओ ने "communist" propaganda लिखैत छथि, ने "Hindu conservative" moral lecturing। ओ मात्र मनुष्यकेँ ओकर सम्पूर्ण जटिलतामे देखैत छथि।

ग) स्त्री-चरित्र चित्रण: सुधाकरजीक स्त्री-पात्र अत्यन्त सशक्त आ बहुआयामी छथि। सुशीला, खनजनियाँ, माया, रूपा, यशोधरा, समताली, विभा- ई सभ real women (वास्तविक स्त्री) छथि - ने ideal देवी, ने fallen woman (पतिता नारी)।

घ) भाषाई माटि: भाषामे मैथिलीक माटिक गंध अछि। प्रदर्शनकारी "शुद्ध मैथिली"क बदला ओ जीवन्त मैथिलीमे लिखैत छथि।

७.२ सुधाकरजीक सीमा-पक्ष

क) कथानक-संरचना: कतिपय कथामे (जेना "स्वप्न-भंग") कथानकक संरचना शिथिल भ' जाइत अछि। डायरी-फार्मेट कहियो-कहियो एकाकार नहि होइत अछि

ख) पुरुष-वाचक केन्द्रियता: अधिकांश कथामे कथावाचक पुरुष अछि। जखनकि ओकर स्त्री-पात्र अत्यन्त शक्तिशाली छथि।

ग) resolution (समाधान)क अभाव: किछु कथामे (जेना "कर्जखोर") कथा बिनु सोझरेने छोड़ि देल जाइत अछि। ई यथार्थवादी दृष्टिसँ उचित अछि, मुदा पाठककेँ कहियोकाल निराश करैत अछि।

भाग आठ: तुलनात्मक परिप्रेक्ष्य

८.१ मैथिली साहित्यक परम्परामे स्थान

सुधाकरजीक रचना परम्परा हरिमोहन झा (व्यंग्य), ललित (उपन्यास/ कथा), राजकमल चौधरी (आधुनिक गद्य) आ मणिपद्म (यथार्थवादी कथा) सँ प्रभावित देखाइत अछि, मुदा ओ अपन मौलिक स्वर विकसित कयलनि।

नेपाली मैथिली कथा-परम्परामे ओकर स्थान अनन्य थिक - कियाकि ओ विराटनगरक "बॉर्डर एरिया"क ओहि अनुभवकेँ साहित्यमे आनलनि जे अन्यत्र उपलब्ध नहि।

८.२ हिन्दी साहित्यसँ तुलना

प्रेमचन्द (१८८०-१९३६) सँ तुलना कयल जा सकैत अछि - दुनू ग्रामीण-शहरी संक्रमणकालक साहित्यकार, दुनू सामाजिक-आर्थिक समस्याक प्रति संवेदनशील। मुदा सुधाकरजी यौनिकताक प्रश्नपर प्रेमचन्दसँ अधिक साहसी छथि।

मोहन राकेश (१९२५-१९७२) सँ तुलना - शहरी मध्यवर्गक असन्तोष, पारिवारिक विघटन - ई थीम दुनूमे अछि। मुदा सुधाकरजीक भाषा राकेशसँ अधिक माटिसँ जुड़ल अछि।

उपसंहार: एक समग्र निर्णय

"दीयरि" मैथिली साहित्यक एक बहुमूल्य निधि थिक। रा. ना. सुधाकरजी छः दशकक लेखन-यात्रामे एहन साहित्य-जगत् निर्मित कयलनि जे अछि:

- प्रामाणिकतामे - मिथिलाक माटिसँ जुड़ल

- सामाजिक-दायित्वमे - विपन्न, उपेक्षित, आ शोषित वर्गक पक्षमे

- स्त्री-चेतनामे - अपन काल (१९७६-२०२०) सँ आगाँ

- भाषाई सौन्दर्यमे- जीवन्त आ ताजा

नव्य न्यायक व्याप्ति-दृष्टिसँ- "जतऽ सुधाकरजीक कथा, तऽ मनुष्यक सत्य।" विदेह-परम्पराक इतिहास-दृष्टिसँ ई संग्रह नेपाल-तराईक मैथिल समाजक जीवन्त दस्तावेज थिक। भारतीय रस-सिद्धान्तक दृष्टिसँ- करुण रसक ई प्रबल साधना। चीनी Qing-Li सिद्धान्तक दृष्टिसँ- भावना आ सत्यक सुन्दर संयोग। आ पाश्चात्य Critical Realism-क दृष्टिसँ - एक organic intellectual- सत्य

एहि कथा-संग्रहक समानान्तर मैथिली साहित्यमे व्यापक स्वागत कएल गेल अछि। ई स्वागत हेबाक चाही - ने केवल मैथिली पाठकद्वारा, वरन् भारत-नेपालक समग्र साहित्य-परिवारद्वारा।

"दीयरि" -सागरमे दूनू दिशाक हिलकोरक बीच स्थित- सुधाकरजीक साहित्य सेहो ओहिना अछि- परम्परा आ आधुनिकताक बीच, ग्राम आ नग्रक बीच, मैथिली आ नेपाली दुनियाक बीच- मुदा अपन मौलिकतामे अटल।

[सैद्धांतिक विवेचन लेल देखू- मैथिली समीक्षाशास्त्र- गजेन्द्र ठाकुर]

 

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