
गजेन्द्र ठाकुर
गोपाल झा 'अभिषेक'क 'आउ स्वप्न साझी करी': साहित्यिक अनुशीलन
मैथिली साहित्यक समकालीन परिदृश्यमे गोपाल झा 'अभिषेक' एकटा एहन सशक्त आ प्रखर हस्ताक्षरक रूपमे उभरल छथि, जिनका रचनामे गामक माटिक सोंधगर गंधक संग-संग वैश्विक चेतनाक प्रखर स्वर सुनाइत अछि। हिनक नवीन कविता-संग्रह 'आउ स्वप्न साझी करी' (२०२१) मैथिली काव्य-परम्परामे एकटा मीलक पत्थर थिक, जे पाठकक संवेदनशीलताकें झंकृत करैत ओकरा आत्म-मंथन लेल विवश करैत अछि। अनुप्रास प्रकाशन, मधुबनी द्वारा प्रकाशित एहि संग्रहमे संकलित कविता सभ मात्र शब्दक विन्यास नहि, अपितु अपन समयक विसंगति, मानवीय पीड़ा, राजनैतिक पाखण्ड आ भविष्यक स्वप्नक एकटा प्रामाणिक दस्तावेज थिक।
कविक व्यक्तित्व आ काव्य-दर्शन
गोपाल झा 'अभिषेक'क जन्म १५ अप्रैल १९६६ ई० कें मधुबनी जिलाक बिस्फी प्रखण्डक मुरलियाचक गाममे भेलनि। इतिहासक विद्यार्थी रहबाक कारणे हिनक काव्य-दृष्टिमे ऐतिहासिक बोध आ सामयिक यथार्थक सुंदर समन्वय पाओल जाइत अछि । 'आउ स्वप्न साझी करी' सँ पूर्व हिनक एकटा हिन्दी कविता-संग्रह 'एक आदिम गंध की तलाश' (२०११) आ मैथिली कविता-संग्रह 'कइएक अर्थमे' (२०१७) प्रकाशित भऽ चुकल छनि, जाहि सँ हिनक काव्य-शिल्पक परिपक्वता प्रमाणित होइत अछि ।
अभिषेकजीक काव्य-दर्शन 'मनुखताइ' कें केंद्रमे राखि कऽ चलैत अछि। हिनका लेल कविता कोनो आसनक वा महंथानक गुण-कीर्तन नहि, अपितु ओ प्रतिरोधी सम्प्रेषणक ओजार थिक। संग्रहक भूमिका 'लक्ष्य धरि पहुच'बैत अछि कविता' मे आलोचक मिथिलेश कुमार झा उचिते लिखने छथि जे अभिषेकजीक कविता पाठककें संवेदनशील बनबैत अछि, जाहि सँ सभ्यता आ संस्कृतिक बिचला खाम्ह 'मनुखताइ' कें बचा कऽ राखल जा सकय।
गोपाल झा 'अभिषेक'क प्रमुख कृति आ परिचय
विवरण जानकारी
जन्म स्थान मुरलियाचक, बिस्फी, मधुबनी
शिक्षा एम०ए० (इतिहास)
मैथिली कविता-संग्रह कइएक अर्थमे (२०१७), आउ स्वप्न साझी करी (२०२१)
हिन्दी कविता-संग्रह एक आदिम गंध की तलाश (२०११)
अप्रकाशित नाट्यकृति मुक्तिपर्व, रूपनगर, एकटा आर अग्नि परीक्षा
सम्मान आचार्य सुरेन्द्र झा 'सुमन' राष्ट्रीय शिखर साहित्य सम्मान (२०१८)
'आउ स्वप्न साझी करी': शीर्षकक सार्थकता
एहि संग्रहक शीर्षक 'आउ स्वप्न साझी करी' अपनामे एकटा आमंत्रण अछि। ई आमंत्रण छैक एकटा एहन समाजक निर्माण लेल, जतय दुःख-सुख सामूहिक होइक। स्वप्न देखब आ ओकरा साझी करब कविक दृष्टिमे भविष्यक प्रति आश्वस्त रहबाक प्रक्रिया थिक। जखन संसार हिंसा, स्वार्थ आ अलगाववादक अन्हारमे डूमल हो, तखन स्वप्न देखब एकटा बड़ पैघ प्रतिरोध अछि । 'वैह स्वप्न तँ अछि कविता' मे कवि स्पष्ट कहैत छथि जे कविता सपनाकेँ मरि जेबासँ रोकबाक एकटा उपक्रम थिक ।
कविता सभक विस्तृत साहित्यिक समीक्षा
संग्रहमे संकलित प्रत्येक कविता अपन कथ्य आ शिल्पमे विशिष्ट अछि। नीचाँ प्रमुख कविता सभक विस्तृत विवेचना कएल जा रहल अछि:
१. मानवीय संवेदना आ करुणाक स्वर
'अंतिम आस': ई कविता न्यूजीलैंडक प्रधानमंत्री जेसिंडा अर्डर्न कें समर्पित अछि। कवि एहिठाम नारीकें करुणाक अंतिम आश्रय मानैत छथि। जखन-जखन संसार ध्वंसक बाट पर चलल अछि, तखन नारीक उपस्थिति रक्षा कवच बनि कऽ सोझाँ आएल अछि। "अंतिम आस जँ जोगेलिऐ / अकारण तऽ नहिये"- ई पंक्ति वैश्विक स्तर पर नारीक नेतृत्व आ ओकर करुणाक महत्ता कें रेखांकित करैत अछि।
'कोना परतारब हे तथागत': मुजफ्फरपुरमे चमकी बोखार सँ मरल बच्चा सभक स्मृतिमे लिखल ई कविता गम्भीर दार्शनिक प्रश्न उठबैत अछि। कवि तथागत बुद्ध सँ पुछैत छथि जे जहिया सांत्वनाक एक मुट्ठी सरिसो कोनो काज नहि आबय, तहिया कोनो माएकें कोना बुझाएल जाय। ई कविता स्पष्ट करैत अछि जे मृत्युक विरुद्ध कोनो चमत्कार नहि, अपितु 'चिकित्सकीय अनुसंधान' आ 'यथोचित संसाधन'क आवश्यकता अछि। व्यवस्थाक पंगुता पर ई एकटा करुण प्रहार अछि।
'दोसरे दिन जकाँ': हैदराबादक प्रियंका रेड्डी हत्याकांडक पृष्ठभूमिमे लिखल ई कविता मानवक भीतर बसल 'भेड़िया'क चित्रण करैत अछि। कविक पीड़ा एहि बातमे अछि जे सभ दिन जकाँ निकलल एकटा लड़की कोना 'चतुर-चण्डाल'क जालमे फसि जाइत अछि। ई कविता मनुष्यताक लज्जित होयबाक क्षणक साक्ष्य थिक।
२. राजनैतिक आ सामाजिक विसंगति
'साहेब': ई कविता मिथिलाक समाजमे व्याप्त जातिवादी मानसिकता पर कड़ा व्यंग्य अछि। झा, मिश्र, पाठक, यादव, पासवान, ठाकुर आदि उपनाम सभक माध्यम सँ कवि ई दर्शबैत छथि जे कोना लोक अपन-अपन जातिक साहेबक मुँह ताकैत अछि। 'साहेब'क पसंद-नापसंद सँ निर्धारित होइत भाग्योदय पर कवि तीक्ष्ण कटाक्ष केलनि अछि।
'पाग': मिथिलाक मान-सम्मानक प्रतीक 'पाग' आजुक समयमे मात्र प्रदर्शनीक वस्तु बनि गेल अछि। कवि सुझाव दैत छथि जे एकरा संग्रहालयमे राखि देल जाय, कारण माथ पर ई आब बेसी काल नहि टिकैत अछि। परम्पराक खोखलापन पर ई एकटा गम्भीर टिप्पणी अछि।
'कार्यकर्ता': राजनैतिक पतनक चित्रण करैत कवि पुछैत छथि जे आब कार्यकर्त्ता कतय छथि? आब तऽ मात्र नेता, दर्शक आ अन्धसमर्थक बचल छथि। "कार्यकर्त्ता माने एकटा लक्ष्य / एकटा संग्रामक समक्ष"- ई परिभाषा आब विस्मृत भऽ गेल अछि।
'सर्वसम्मति बनयबाक क्रममे': जनतंत्रमे सर्वसम्मतिक नाम पर जे वंचना होइत अछि, तकर कवि विरोध करैत छथि। ओकर मानब अछि जे सर्वसम्मति कखनो-कखनो जनतंत्रक कंठ मोकि देबाक एकटा कुटिल चालि थिक।
३. प्रतीक आ बिम्बक नवीनता
'ट्रान्सफर्मर': कवि आधुनिक बिम्बक प्रयोगमे सिद्धहस्त छथि। 'ट्रान्सफर्मर' कवितामे समाजक संतुलित समन्वय कें सुचालक आ कुचालकक माध्यम सँ बुझबैत छथि। चिनमाटिक साधारण कुचालक वस्तु (Insulator) कोना अवांछित प्रवाह सँ समाज कें सुरक्षित रखैत अछि, ई देखब कविक नवीन दृष्टि थिक।
'पहाड़ : एकटा संभावना': पहाड़ कें कवि मात्र एकटा अवरोध नहि, अपितु 'स्थापित प्रतिपक्षी' मानैत छथि। जखन कोनो बड़ पैघ विरोध सोझाँ होइत अछि, तखने ओकरा पार करबाक संभावना सेहो जन्म लैत अछि।
'फुकना': ई कविता लोकक खयाली पुलाव आ सपनाक टुटबाक प्रतीक थिक। जखन सभ कलाबाजी मात्र हवाक बले होइत अछि, तखन ओकर टुटब स्वाभाविक छैक।
४. गाम, प्रकृति आ भूगोल
'धार बसबैत रहलए गाम': मिथिलाक नदी आ ओकर धारक बदलबाक प्रक्रिया कें कवि जीवनक निरंतरता सँ जोड़ैत छथि। नदीक धार जतय गाम कें उजाड़ैत अछि, ओतय दोसर गाम सेहो बसाबैत अछि। "धार तँ बसबैत रहलए गाम / आ बसा विदा होइत रहलए" - ई पंक्ति मिथिलाक शाश्वत यथार्थकें उरेहैत अछि।
'पोखरि' (श्रृंखला ५-८): मिथिलाक प्राण पोखरि आब कूड़ा-करकट फेकबाक स्थान बनि गेल अछि। कवि एहि बात पर क्षोभ प्रकट करैत छथि जे प्रशासन आ जनता दूनू एकर प्रति चुप अछि। पोखरिक दुर्गति सँ गामक सभ्यताक अधोगतिक चित्रण कवि केलनि अछि।
'ई छोट-छिन गाछ': ई कविता भविष्यक प्रति कविक आश्वस्त रहबाक भाव अछि। जखन धरि गाछमे पात अछि, तखन धरि जीवनक चेन्ह सुरक्षित अछि।
५. वैश्विक आ दार्शनिक चेतना
'जेरुसलम': ई कविता वैश्विक संघर्षक प्रति कविक चिंता अछि। जेरुसलम ककर होयबाक चाही, एहि प्रश्न सँ ऊपर उठि कऽ कवि 'सभक हक लेल लड़बाक' बात करैत छथि।
'इतिहास कहलक' आ 'इतिहासक इजोतमे': इतिहास कें कवि कोनो रगड़ा वा झगड़ाक साधन नहि मानैत छथि। 'इतिहासक इजोतमे' ओ स्वीकार करैत छथि जे इतिहासक कठघरामे हमही ठाढ़ छी आ अपन गलती कें स्वीकार करब इतिहासक प्रति न्याय थिक।
'नैतिकताक देहरिपर': आधुनिक तकनीक आ मशीनी आँखि (CCTV आदि) कोना मानवक नैतिकता कें ताख पर धऽ देलक अछि, तकर चित्रण एहि कवितामे अछि। मशीनादि लग नैतिकताक कोनो प्रश्न नहि रहि जाइत अछि।
६. आपत्काल आ विस्थापनक व्यथा
'एहि आपत्कालमे' (१-२): ई कविता कोरोना कालक प्रवासी मजदूरक पीड़ाक महाकाव्य थिक। जखन महानगर सभ अपन निर्माता कें 'दूधक माछी' जकाँ निकालि देलक, तखन मजदूरक पएर अपन माटिक लेल कते क्लेश सहि कऽ चलल, तकर मार्मिक वर्णन अछि। "घरे रहू! / घरे रहू! घरे रहूके मंत्र" ओहि लोक लेल कतेक व्यंग्य छल जकर घर महानगरक 'खोली' छल जे किराया नहि देबाक कारणे धकिया देल गेल।
'हमहु रहब एतहि': ई कविता मानवक संग-संग अन्य जीव-जंतुक सेहो एहि धरती पर अधिकारक बात करैत अछि। विकासक नाम पर प्रकृति कें उजाड़ब अपन विनाश कें आमंत्रण देनाइ थिक।
शिल्प, भाषा आ बिम्ब-विधान
गोपाल झा 'अभिषेक'क काव्य-शिल्प अपन कथ्यक अनुरूप अछि। हिनक भाषा 'अकृत्रिम' अछि, जाहिमे कोनो पांडित्य-प्रदर्शनक प्रयास नहि अछि । ओ गामक आम बोलचालक शब्द सभकें एहन ढंग सँ प्रयोग करैत छथि जे ओ विशिष्ट बनि जाइत अछि।
भाषाक वैशिष्ट्य:
पक्ष विशेषता
शब्द चयन अकृत्रिम, प्रचलित आ गामक शब्दावलीक सुंदर प्रयोग 1
छंद अधिकांश कविता मुक्त छंदमे अछि, जे आधुनिक संवेदना कें व्यक्त करबा लेल उपयुक्त अछि
बिम्ब ट्रान्सफर्मर, फुकना, सड़कक खधिया, मेनहोल आदि नवीन बिम्बक प्रयोग
व्यंग्य सामाजिक आ राजनैतिक विसंगति पर तीक्ष्ण आ मारक व्यंग्य
अभिषेकजीक कविताक एकटा बड़ पैघ विशेषता अछि ओकर 'सम्प्रेषणीयता'। ओ जटिल सँ जटिल विषय कें बड़ सरलता सँ पाठक धरि पहुँचैत छथि। हिनक कवितामे 'प्रसाद गुण'क प्रधानता अछि, जे पाठक कें झटपट अपन प्रभावमे लऽ लैत अछि।
कविता संग्रहक विषयगत वर्गीकरण
संग्रहक कविता सभकें अध्ययनक सुविधे लेल नीचाँ देल गेल श्रेणीमे बाँटल जा सकैत अछि:
श्रेणी प्रमुख कविता सभ
मानवीय संवेदना अंतिम आस, कोना परतारब हे तथागत, दोसरे दिन जकाँ, प्रद्युम्न
सामाजिक यथार्थ पाग, साहेब, जाति, भिन्ने बथान, व्यथा-कथा
राजनैतिक चेतना लाक्षागृह, कार्यकर्ता, सर्वसम्मति, अंतिम चरणक चुनाव
प्रकृति आ भूगोल धार बसबैत रहलए गाम, पोखरि, ई छोट-छिन गाछ
प्रेम आ गृहस्थी ताहि बीच, प्रेम संग, गृहस्थी, अहाँक बहन्ने
आधुनिकता आ विसंगति ट्रान्सफर्मर, दिल्ली दर्शन, नैतिकताक देहरिपर, सड़क-संवेद
गम्भीर दार्शनिक आ वैचारिक विन्दु
'आउ स्वप्न साझी करी' संग्रह मात्र कविताक संकलन नहि, अपितु एकटा गम्भीर दार्शनिक विमर्श सेहो अछि।
१. प्रतिरोधक कविता: अभिषेकजीक कविता अन्यायक विरुद्ध 'प्रतिरोधक दृढ़ स्वर' अछि। ओ अन्याय कें सहबाक पक्षमे नहि छथि। 'कोनो देवासुर संग्रामक नहि बनब साक्षी' मे ओ स्पष्ट कहैत छथि जे ओ कोनो थोपल गेल युद्धक हिस्सा नहि बनताह, अपितु केवल 'न्याय-अन्याय' क निकष पर अपन समर्थन तय करताह।
२. स्त्री-चेतना: कवि अपन कवितामे नारीक विचार जानबाक आ ओकर भागीदारी सुनिश्चित करबाक आह्वान करैत छथि । 'एक बेर पूछि तँ लिऔ' कविता नारीक निर्णय-शक्ति कें सम्मान दैत अछि।
३. इतिहास बोध: इतिहासक विद्यार्थी रहबाक कारणे कवि जानैत छथि जे अतीतक गौरव मात्र सँ काज नहि चलत। 'तकरे हो जीर्णोद्धार' मे ओ अनुपयुक्त परंपरा सभ कें त्यागबाक आ उपयुक्त कें सँजोबाक बात करैत छथि।
४. लोकतंत्रक चिंता: 'जनता-फोरम' आ 'अंतिम चरणक चुनावसँ पहिने' जकाँ कविता सभ लोकतंत्रमे होयबाक चीरहरण आ लाक्षागृहक निर्माण पर कवि कें चिन्तित दर्शबैत अछि।
मैथिली साहित्यमे अभिषेकजीक योगदानक मूल्यांकन
मैथिली साहित्यक वर्तमान कालखंडमे गोपाल झा 'अभिषेक' एकटा एहन कवि छथि जे अपन भाषा कें वैश्विक चिन्ता सँ जोड़ैत छथि। जहिआ मैथिली कविता पर आरोप लागल जे ई मात्र गामक दलान आ पोखर धरि सीमित अछि, तहिआ अभिषेकजी जेरुसलम, न्यूजीलैंडक प्रधानमंत्री आ वैश्विक तकनीक कें अपन विषय बनेलनि।
हिनक कविताक शैली विवरणात्मक अछि आ ओ सम्बद्ध विषयमे नीक जानकारी दैत अछि। हिनक पर्यवेक्षण-दृष्टि स्पष्ट छनि आ गामक अराजक स्थितिक सेहो ओकरा गम्भीर परिचय छनि। भाषाक स्तर पर ओ बड़ सजग आ सावधान छथि, जाहि सँ हिनक कवितामे एकटा 'आधुनिक दृष्टि' आ 'विश्व दृष्टि' पाओल जाइत अछि।
उपसंहार
'आउ स्वप्न साझी करी' कविता-संग्रह मैथिली कविताक एकटा उज्ज्वल पक्ष कें सोझाँ अनैत अछि। ई संग्रह कविक संवेदनशीलता, वैचारिक दृढ़ता आ भाषाई कुशलताक परिचायक थिक। अभिषेकजीक कविता सभमे जतय वर्तमानक विसंगति पर कड़गर प्रहार अछि, ततय एकटा नीक भविष्यक लेल स्वप्न देखबाक आ ओकरा साझी करबाक संकल्प सेहो अछि।
'आउ स्वप्न साझी करी': दार्शनिक आ भाषाई मीमांसा
गोपाल झा 'अभिषेक'क ई कृति मात्र संवेदनामक उच्छवास नहि, अपितु शब्द आ अर्थक एकटा जटिल 'संसर्ग' थिक, जतय मिथिलाक स्थानीयता आ वैश्विक चेतना एके ठाम 'समानान्तर' रूप सँ प्रवाहित होइत अछि ।
१. गंगेशक नव्य न्याय आ 'अवच्छेदकता'क निकष पर समीक्षा
गंगेश उपाध्याय (१४अम शताब्दी) द्वारा प्रतिपादित नव्य न्यायक मुख्य उद्देश्य छल भाषाक अस्पष्टता कें दूर कऽ ओकरा 'परिष्कृत' करब।
स्वप्नक अवच्छेदकता: संग्रहक शीर्षक 'आउ स्वप्न साझी करी' मे 'स्वप्न' मात्र एकटा काल्पनिक 'विषयता' (contentness) नहि अछि। न्यायशास्त्रक दृष्टि सँ देखल जाय तऽ एहि ठाम स्वप्न 'कर्तृत्व-अवच्छिन्न' (agency-limited) अछि। कविक लेल स्वप्न ओहि 'साध्य'क रूप मे अछि जे 'मनुखताइ' (humanity) रूपी हेतु सँ व्याप्त अछि । जखन कवि कहैत छथि जे "आउ स्वप्न साझी करी", तखन ओ 'स्वप्न' कें वैयक्तिक संकीर्णता सँ मुक्त कऽ ओकरा 'सामूहिकता-अवच्छिन्न' (limited by collectivity) बना दैत छथि।
'ट्रान्सफर्मर' आ 'संसर्गता': अभिषेकजीक कविता 'ट्रान्सफर्मर' मे समाजक संतुलन कें सुचालक आ कुचालकक माध्यम सँ बुझाओल गेल अछि। नव्य न्यायक 'संसर्गता' (relationship) सिद्धांतक अनुसार, समाजक अस्तित्व ओहि 'विशिष्ट' संबंध पर निर्भर अछि जतय 'कुचालक' (साधारण लोक) अवांछित 'प्रवाह' कें रोकबाक 'प्रतियोगी' (counter-positive) बनैत छथि। एहि ठाम उर्जान्वित समाजक 'विशेष्यता' ओहि संतुलित समन्वय मे निहित अछि।
२. हरिमोहन झाजीक 'भाषाई विश्लेषण' (Linguistic Analysis) फ्रेमवर्क
प्रो. हरिमोहन झाक अनुसार शब्दक तीनटा शक्ति होइत अछि: अभिधा, लक्षणा आ व्यंजना।
लक्षणाक प्रयोग: 'साहेव' आ 'पाग' सन कविता मे देखल जा सकैत अछि । जखन कवि 'पाग' कें संग्रहालय मे राखबाक बात करैत छथि, तखन 'पाग' अपन मूल 'अभिधा' (शिरोवस्त्र) कें त्याग कऽ अपन 'लक्ष्यार्थ' (अतीतमुखी जडता) कें प्रकट करैत अछि।
व्यंजनाक प्रखरता: 'अंतिम आस' कविता मे न्यूजीलैंडक प्रधानमंत्रीक प्रसंग मे नारी कें "अंतिम आस" कहब 'प्रयोजनवती लक्षणा' थिक, जाहि सँ 'व्यंजना' ई निकलैत अछि जे वैश्विक संकट मे करुणा एकमात्र रक्षक अछि । हरिमोहन झाजीक 'शाब्दिक बोध'क सिद्धांतक अनुसार, एहि ठाम शब्दक 'शक्ति' पाठक मे एकटा नूतन 'संस्कार' (impression) जागृत करैत अछि।
३. विदेह समानान्तर इतिहास फ्रेमवर्क (गजेन्द्र ठाकुर)
'विदेह'क फ्रेमवर्क साहित्य कें 'सत्ता' आ 'वंचित'क बीचक विचारधारात्मक संघर्षक रूप मे देखैत अछि।
वंचितक स्वर: 'एहि आपत्कालमे' कविता श्रृंखला कोरोना कालक प्रवासी मजदूरक 'समानान्तर इतिहास' कें उरेहैत अछि । जखन मुख्यधाराक इतिहास 'आँकड़ा' लिखैत छल, तखन अभिषेकजीक कविता ओहि 'वंचित'क पीड़ा कें 'वास्तविक शब्दशास्त्र' (actual philology) मे परिवर्तित कऽ रहल छल।
इतिहास बोध: 'इतिहास कहलक' आ 'इतिहासक इजोतमे' कविता मे कवि इतिहास कें कोनो 'झग्गड़क साक्ष्य' नहि, अपितु एकटा 'पुनरुत्थानक नव अध्याय' मानैत छथि। ई 'विदेह'क ओहि दृष्टिक अनुरूप अछि जे मानैत अछि जे ज्ञान आ सत्य 'बनाओल' जाइत अछि (Foucaultian perspective) आ कविता ओहि सत्य कें नव रूप दैत अछि।
४. भारतीय आ पाश्चात्य समीक्षा सिद्धांतक समन्वय
भारतीय काव्यशास्त्र (रस आ ध्वनि): अभिषेकजीक कविता मे 'प्रसाद गुण' प्रधान अछि, जे पाठक कें सहजहि 'अर्थोपलब्धि' करबैत अछि । 'कोना परतारब हे तथागत' मे 'करुण रस' अपन चरमोत्कर्ष पर अछि । पाश्चात्य 'ट्रेजेडी'क विपरीत एहि ठाम करुणा केवल शोक नहि, अपितु 'चिकित्सकीय अनुसंधान'क तार्किक माँग करैत अछि, जे भारतीय 'न्याय' आ पाश्चात्य 'वैज्ञानिक तर्कवाद'क सुंदर मेल थिक।
आधुनिकता बनाम परम्परा: पाश्चात्य समीक्षाक 'मॉडर्निटी' (modernity) अभिषेकजी लग कोनो नकल नहि, अपितु एकटा 'जीवन दृष्टि' थिक । 'पहाड़ : एकटा संभावना' कविता मे पहाड़ कें 'स्थापित प्रतिपक्षी' कहब हेगेलियन द्वंद्वात्मकता (Dialectics) कें भारतीय दर्शनक 'धैर्य' सँ जोड़ब थिक ।
निष्कर्ष
'आउ स्वप्न साझी करी' काव्य-संग्रह अपन 'शाब्दिक बोध' मे 'अखंड वाक्य स्फोट' जकाँ अछि, जतय प्रत्येक कविता अलग होइतहुँ एकटा पूर्ण 'मनुखताइ'क विमर्ष ठाढ़ करैत अछि । नव्य न्यायक सूक्ष्मता, हरिमोहन झाजीक भाषाई गहनता आ विदेहक समानान्तर ऐतिहासिक दृष्टि एहि पोथी कें मैथिली साहित्यक एकटा 'कालजयी' दस्तावेज सिद्ध करैत अछि।
ई संग्रह मात्र मैथिली पाठक लेल नहि, अपितु कोनो सेहो साहित्यक अनुरागी लेल पठनीय अछि । अभिषेकजीक कविता अपन कथ्य सँ पाठक कें सहजहि जोड़ि लैत अछि आ ओकरा चिंतन करबा लेल बाध्य करैत अछि । संक्षेपमे कहल जाय तऽ 'आउ स्वप्न साझी करी' एकटा एहन 'साक्षी' थिक जे अपन समयक सत्य कें निर्भीकता सँ कहैत अछि।
Works cited
1. बेनीपट्टी परिसरक लेखन-1 : : मिथिलेश कुमार झा - Maithil Manch, accessed on May 6, 2026, https://www.maithilmanch.in/
२. विदेह पोथी - विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका, accessed on May 6, 2026, https://www.videha.co.in/
[सैद्धांतिक विवेचन लेल देखू- मैथिली समीक्षाशास्त्र- गजेन्द्र ठाकुर]
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