VIDEHA ISSN 2229-547X  ·  First Maithili Fortnightly eJournal  ·  Since 2000  ·  www.videha.co.in
विदेह — प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका
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विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका

विदेह

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प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका — First Maithili Fortnightly eJournal

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गजेन्द्र ठाकुर

परमेश्वर कापड़िक कथा-खिस्साकआलोचनात्मक समीक्षा

भारतीय रस-ध्वनि-वक्रोक्ति सौन्दर्यशास्त्र  •  नव्य-न्याय (गंगेश उपाध्याय)  •  विदेह समानान्तर इतिहास

भूमिका: परमेश्वर कापड़िक कथाकार-रूप

परमेश्वर कापड़ि- जनकपुरधाम निवासी, मैथिलीक वरिष्ठ साहित्यकार- मुख्यतः नाटककारक रूपमे जानल जाइत छथि। मुदा हुनकर रचना-संसारमे कथा-खिस्साक एक समृद्ध संसार अछि जे आइधरि समुचित आलोचनात्मक ध्यान नहि पओलक अछि।

कापड़िक कथा-संसार मुख्यतः चारि धारामे विभक्त अछि:

(क) शुद्ध लोककथा- जाहिमे 'लछमिनिञा कनिञा' आ 'हनुमान नाम स्मरणके महिमा' उत्कृष्ट अछि।

(ख) पौराणिक कथाक नव-व्याख्या- 'यज्ञ-सीता', 'छौंड़ी-छौंड़ा सुद्युम्न', 'लक्ष्मी-बलि', 'तप आ सत्संग', 'हृदयबासी ईश्वर'।

(ग) बोधकथा (Didactic Tale)- 'शिक्षा आ दीक्षा', 'नम्बर'।

(घ) कथा-खिस्सा- 'कुत्ता-बिलाइ-मूस', 'गोनूबाबू घरेपर'।

(ङ) कथा-काव्य- 'दाम' (दीर्घ काव्यकथा, साक्षी)।

हुनकर सभ कथाक केन्द्रमे दूटा बात अछि- मैथिली लोकभाषाक जीवन्तता आ मैथिलीक सामाजिक-सांस्कृतिक यथार्थ। अहि दुनूक मेल हुनकर कथाकेँ एक विशिष्ट भौगोलिक आ सांस्कृतिक पहचान दैछ।

कथा-समीक्षा

१. 'हनुमान नाम स्मरणके महिमा':

१.अ. कथावस्तु: रावणक लंकामे नवग्रह देवता बन्दी अछि- शक्तिहीन, दीन-दुखी। हनुमानजी लंका-दहनक प्रसंगमे हुनका सभकेँ देखै छथि, पुछै छथि आ बन्धन तोड़ि मुक्त करै छथि। नवग्रह हनुमानसँ वर माँगैले कहै छथि, मुदा हनुमान कहै छथि- 'प्रभु राम छथिन्ह, कोनो वर मांगैके आवश्यकता नहि।' तैपर नवग्रह स्वयं वचन दै छथि: जे हनुमानक नाम जपत, तिनका नवग्रह कोनो दुख नहि देता।

१.आ. भाषा-विश्लेषण: ई रचना मैथिलीक उत्कृष्ट नमूना थिक। 'रहए', 'हइ', 'अइ', 'अएला', 'हुनकासबके', 'ओकरासबके'- ई सभ मैथिलीक स्वाभाविक रूप थिक जे भारतक दरभंगा-मिथिला मैथिलीसँ किछु भिन्न नै अछि।

'लंकामे अगिलग्गीक', अगराही–पसाही लगबैत जाइत जे रहए, त' ओत' हनुमानजीके शक्ति सामर्थहीन, मुइल–विलाइ भेल, नवग्रह सब देखाइ देलकनि।'

'अगिलग्गी', 'अगराही-पसाही', 'मुइल-विलाइ'- ई शब्द-गुच्छ मैथिलीक जीवन्त प्रमाण थिक। 'मुइल-विलाइ' (मरल-विलाएल)- यएह द्विपदी समास मैथिलीक व्याकरण-सम्पदाक उदाहरण थिक।

१.इ. रस-विचार: एहि कथामे भक्ति-रसक प्रधानता अछि। परन्तु मात्र भक्ति नहि- नवग्रहक दीनताक करुण रस आ हनुमानक वीरता (रावणक बन्धन तोड़ब)- एहि दुनूक मेलसँ एक सम्मिश्र रस-अनुभव होइछ। आनन्दवर्धनक ध्वनि-सिद्धान्तक अनुसार, रचनाक मुख्य ध्वनि थिक- 'ईश्वर-कृपा माँगएसँ नहि, स्वयं-समर्पणसँ भेटैछ।' ई ध्वनि वाच्यार्थसँ परे व्यञ्जनास्तरपर स्थित अछि।

१.ई. वक्रोक्ति: कुन्तकक वक्रोक्ति-दृष्टिसँ देखने, कथाक सर्वाधिक वक्र उक्ति थिक- 'हुनका अछैतमे अहाँसबस' हमरा कोनो वर मांगके आवश्यकता नहि।' भक्त जखन वर माँगे, प्रभु देथि- ई सामान्य भक्ति-तर्क थिक। परन्तु एत' हनुमान उनटे भक्तिकेँ परिभाषित करै छथि- 'वर माँगनाइ भक्तिक कमजोरी थिक।' ई वक्रता सामान्य कथाकेँ दार्शनिक ऊँचाइ दैछ।

१.उ. नव्य-न्यायिक दृष्टि: गंगेशक 'शब्द-प्रमाण' (आप्त-वाक्य) सिद्धान्तक अनुसार, नवग्रहक वचनवद्धता- 'जे हनुमानक नाम जपत तिनका दुख नहि'- एक आप्त-वाक्य थिक। नव्य-न्यायमे आप्त-वाक्यक प्रमाण-मूल्य अछि कारण वक्ता (नवग्रह) प्रामाणिक छथि। कापड़ि लोककथाक माध्यमसँ एहि शास्त्रीय तर्ककेँ सुलभ बनबै छथि।

१.ऊ. विदेह फ्रेमवर्क: मैथिली साहित्यमे हनुमान-कथाक परम्परा बहुत पुरान अछि। परन्तु कापड़ि एहि कथाकेँ एक नव भौगोलिक-सांस्कृतिक लोकेशनमे प्रस्तुत करै छथि। नेपालक जनकपुरधामक मैथिली-कथाकार जखन राम-रावण-हनुमानक कथा कहै छथि, तखन ओकर लोकस्वर आ दृष्टि अपन होइत अछि।

२. 'लछमिनिञा कनिञा': परमेश्वर कापड़िक सर्वश्रेष्ठ लोककथा

२.अ. कथावस्तु: एक गाममे बुढ़बा-बुढ़िया रहैछ। बुढ़ियाक पुतौह (बहू)- 'लबकनिञा', 'छोटखुटिया भुटिया'- परन्तु 'काज-धन्धा आ बुइध-गियानमे बड़ चौतरी।' एक रातिमे नढ़िया (गीदड़-सियार) बजैछ- बहू पशुभाषा जनैछ। नढ़िया बतबैछ जे नदीमे बहल लाशक जांघमे जोड़ा लाल (माणिक) अछि। बहू साहस क' नदीसँ लाल निकाललक, लाशकेँ नढ़ियाके दैत घर घुरल। साउस नहि बुझलक- सोचलक बहू लाश खाइत अएल। उपद्रव भेल, बहूकेँ नैहर पठएल गेल। रास्तामे एक कौआ बाजल- कौआ-भाखाक ज्ञान बहूकेँ। कौआ बतेलक- आयके दिन साँप-दूध पियाओ त' साँप हीरा-मोती देखाओत। बहू ससुरकेँ बुझेलक। ससुर मानि गेल। साँपकेँ दूध-लावा पियाओलक, हीरा-मोती पेलक। घर धन-धाम भरि गेल। साउस-पुतौह मिलि-व्यवहरि सुख-आनन्दसँ रहए लागल।

२.आ. लोककथाक संरचना-विश्लेषण: रूसी लोककथा-सिद्धान्तकार व्लादिमीर प्रोप (Vladimir Propp)क 'मोर्फोलॉजी ऑफ फोकटेल' (1928) क अनुसार, लोककथाक एक निश्चित संरचना होइछ। 'लछमिनिञा कनिञा' एहि संरचनाकेँ सटीक रूपसँ पालन करैछ:

(अ) प्रारम्भिक अभाव-स्थिति (Initial Lack): गरीबी, बहूक अपमान।

(आ) दानदाता (Donor): नढ़िया आ कौआ- जे बहूकेँ विद्या दैछ।

(इ) सहायक तत्त्व (Helper Function): पशुभाषा-ज्ञान- बहूक विशेष शक्ति।

(ई) संकट-परीक्षण (Test/Challenge): रातिमे नदीमे जेबाक साहस।

(उ) अन्तिम विजय (Victory): हीरा-मोती, पारिवारिक मेल।

परन्तु मैथिली-मिथिला परम्पराक एक विशेषता अछि जे ई साँप-दूध प्रसंग अन्तमे जोड़ैछ- यएह मैथिली लोककथाक अपन रचनात्मक अतिरिक्त विशेषता थिक।

२.इ. भाषाक असाधारण सम्पदा: 'लछमिनिञा कनिञा' रचनाक सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण पक्ष थिक हुनकर लोकभाषाक शब्द-सम्पदा। निम्नलिखित शब्द-गुच्छ मैथिलीक अनमोल निधि थिक जे मैथिलीमे जीवन्त अछि:

'लबकनिञा', 'हड़हड़ही खटबनरी', 'छोटखुटिया भुटिया', 'छगुनाए', 'धतपताए', 'गुनधुनाए', 'पनिआए', 'लोभाए', 'झिसि-बुन्नीबला', 'बिकराल राइत', 'हुआं-हुआं', 'जुमुस बान्हिक'', 'हबक्का मारि', 'लत्तोपतो', 'हठि-बरदम', 'ढुक्का-फड़की', 'धीपल आइग-बाउल', 'छबकल दबकल', 'पिठिया-ठोक धमक्का', 'नङटिनिञा रकमसनी', 'ओधबाधक'', 'लोहछि झंटियाक'', 'पछमुड़िया कनडेरिया', 'हपैस-लपैकक'।'

ई शब्दसभ मैथिली लोकभाषामे जीवन्त अछि। कापड़ि ई सहेज-समेटि एकरा साहित्यिक प्रतिष्ठा दै छथि- इएह हुनकर सभसँ पैघ योगदान अछि।

२.ई. स्त्री-चरित्रक विशेषता: बहू 'लबकनिञा, छोटखुटिया भुटिया' थिक- देखएमे साधारण। परन्तु पशुभाषाक दुर्लभ ज्ञान हुनका लग अछि। ई ज्ञान- लोक-परम्परामे 'पशु-सिद्ध' कहल जाइछ- बहूकेँ असाधारण बनाबैछ। ओ एकाएकी रातिमे नदी जाइछ- साहस। लाशसँ लाल निकाललक- कर्मठता। साउसक क्रोधमे नहि टूटल- धैर्य। कौआक भाखा बुझिकऽ ससुरकेँ बुझेलक- बुद्धि। ई चरित्र मिथिलाक 'लछमिनिञा'- साहसी, बुद्धिमान, धनलक्ष्मी- स्त्री-आदर्शक प्रतीक थिक।

२.उ. भक्ति-रस आ करुण-रसक समन्वय: कथाक मध्यमे बुढ़ियाक क्रोध (रौद्र रस) आ बहूक असहायता (करुण रस)- दुनूक सम्मिश्रण। परन्तु अन्तमे शान्त-रसमे परिणति- 'तेकर बाद त' साउस-पुतौह सबगोटे मिलि-व्यवहरिक' सुख आनन्दस' रह' लागल।' ई मैथिली लोककथाक परम्परागत 'सुखद अन्त' थिक जे गृहस्थ-जीवनक आदर्शकेँ प्रतिष्ठित करैछ।

२.ऊ. तुलनात्मक दृष्टि: 'लछमिनिञा कनिञा' मैथिलीक 'सुनरी-बहुरिया' कथाक परम्परासँ जुड़ल थिक। परन्तु ओहि परम्पराक बहुसंख्य कथामे बहू केवल निष्क्रिय प्राप्तकर्ता होइछ- जादू अपने होइछ। एत' बहू स्वयं साहस करैछ, स्वयं बुद्धि लगाबैछ। ई अन्तर महत्त्वपूर्ण थिक- कापड़ि बहूकेँ 'एजेन्ट' (कर्ता) बनाबै छथि, केवल 'पेशेन्ट' (भोक्ता) नहि।

३. 'यज्ञ-सीता': पुराण-कथाक साहसी पुनर्पाठ:

३.अ. कथावस्तु: जहियासँ राजा राम यज्ञ करै छथि, स्वर्णमयी सीता-प्रतिमा निर्माण होइछ। एहि यज्ञ-सीताक एक समूह राम-निवासमे जमा भ' जाइछ। ओसभ दुखित, उपेक्षित। एकदिन सभ मिलि रामलग जाइछ- स्वीकार माँगैछ। राम एकपत्नी-व्रताक तर्क दै छथि- 'हम मिथिलाधिपति जनकक पुत्री सीताक पाणि-ग्रहण कएने छी।' यज्ञ-सीता प्रश्न करै छथि- 'यज्ञमे सहयोग देलहुँ, जीवनमे किएक नहि?' अन्ततः राम समाधान दै छथि- द्वापरमे कृष्णावतारमे ई सभ गोपी बनि ..। 'ओ सबहेटा यज्ञ-सीता ब्रजमे गोपीसब बनलथि।'

३.आ. साहित्यिक साहस: ई कापड़िक सर्वाधिक साहसी रचना थिक। मैथिली लोक-परम्परामे राम-सीता पवित्र- ओहिमे प्रश्न करब असामान्य थिक। परन्तु कापड़ि मिथिलाक सीता-केन्द्रित दृष्टिकोणसँ (जनक-पुत्री, मिथिलाक बेटी) राम-सीता-सम्बन्धकेँ पुनर्विचार करै छथि।

'यज्ञ करैत काल हम परमावश्यक रहलेटा छी ! / हमरा बिनु अपूर्णे छी ! / यज्ञाधिकारी यज्ञकर्ता हमरे सबके संगस' ने?'

ई तर्क शास्त्रीय दृष्टिसँ अटूट अछि। यज्ञमे अर्धाङ्गिनी अपरिहार्य- ई वैदिक विधान थिक। कापड़ि यज्ञ-सीताक मुखसँ ई शास्त्रीय तर्क राखि रामकेँ उत्तर देबएले बाध्य करै छथि।

३.इ. लोक-स्त्रीवाद: ई रचना मैथिली लोक-साहित्यमे स्त्री-अधिकारक विमर्शक श्रेष्ठ उदाहरण थिक। यज्ञ-सीता केवल 'अबला' नहि- ओ तर्क करैछ, माँग राखैछ, अपन अधिकार बुझैछ। 'एहनमे अपनाके आदर्श मर्यादापुरुषोत्तम कहबैत छी?'- ई प्रश्न नेपालक मैथिली साहित्यमे एकटा नव अध्याय खोलैछ।

३.ई. ध्वनि-विश्लेषण: रचनाक वाच्यार्थ-स्तर थिक- यज्ञ-सीताक कथा। परन्तु व्यञ्जनास्तरपर कापड़ि एक गहन सन्देश दै छथि: 'जे समाज अपन स्त्रीकेँ काजमे उपयोग करैछ, परन्तु अधिकार नहि दैछ- ओ असन्तुलित थिक।' आनन्दवर्धनक दृष्टिसँ, ई ध्वनि रचनाक 'आत्मा' थिक।

३.उ. पुराण-पुनर्व्याख्याक परम्पराक सन्दर्भमे: मैथिली कवि विद्यापति (ज्योतेरीश्वर पूर्व विद्यापतिसँ भिन्न) 'भूपरिक्रमा' आ 'पुरुषपरीक्षा'मे पौराणिक कथाकेँ नव दृष्टिसँ देखने छलथि। कापड़ि ओहि परम्पराकेँ आगू बढ़बै छथि- परन्तु नव सामाजिक चेतनाक सँग। ई विदेह समानान्तर इतिहासक महत्त्वपूर्ण पक्ष थिक।

४. 'छौंड़ी-छौंड़ा सुद्युम्न'- लिङ्ग-परिवर्तनक पौराणिक कथा

४.अ. कथावस्तु: राजा विवस्वान् मनु आ रानी श्रद्धाक पुत-कामना। रानी पुतकरन यज्ञ करबैछ- परन्तु कहैछ 'जब होए तब बेटिए।' ऐ कामनाक प्रतापसँ बेटी जन्मैछ- इला। बेटी पाँच-सात वर्षमे मरदनमी व्यवहार। जाँच कएलापर पता लगैछ जे यज्ञमे पुरहितक जपसँ बेटा होएबाक छल- रानीक कामनाक कारण बेटी भेल, मुदा मरदनमी रहि गेल। वशिष्ठ तप-बलसँ बेटीकेँ लड़का (सुद्युम्न) बनेलक। सुद्युम्न जंगलमे जाइछ- शिव-पार्वतीक केलि-विहारसँ ओ वनमे स्त्री बनि जाइछ। बुध ऋषि प्रेम कएलक- पुरुरवा पुत्र भेल। वशिष्ठ देवीभागवत सुनाकऽ स्थायी पुरुष बनेलक। राज्याभिषेक भेल।

४.आ. लिंगभेद-विमर्श: ई कथा श्रीमद्देवी भागवत महापुराण (अध्याय ३)क आधारपर अछि। परन्तु कापड़ि एहि पौराणिक कथाकेँ मैथिलीक अपन लोकभाषामे पुनर्प्रस्तुत करै छथि। कथामे लिंग-परिवर्तन (Gender fluidity) क प्रश्न अछि- जे आधुनिक लिंगभेद-विमर्ससँ जुड़ल अछि। रानीक 'जब होए तब बेटिए'- ई कामना समाजक पुत्र-पक्षपातकेँ उलटाबैछ।

४.इ. भाषाक सजीवता

'ओकरा इला बेटी चारि–पांच बरखके भ' गेलै त' ओकर सबटा चालि–ढालि, बगय–बानि मरदनमी लगै! रहै छौंड़ी आ उ बेसी काज बात करै छड़ा जिका।'

'बगय-बानि', 'छड़ा जिका'- ई मैथिलीक अपन शब्द थिक। 'बगय-बानि' माने चाल-ढाल आ 'छड़ा जिका' माने लड़कापन जकाँ- ई शब्द मानक मैथिलीक शब्दकोशमे नहि भेटत।

४.ई. नव्य-न्यायिक दृष्टि: गंगेशक 'व्याप्ति' सिद्धान्तक अनुसार, कथामे एक तर्कशृंखला अछि: (अ) देवी भागवत सुनबासँ (हेतु) (आ) सुद्युम्नक स्थायी पुरुष-रूप (साध्य)। परन्तु कापड़ि ऐ व्याप्तिकेँ अन्तिम सत्य नहि मानै छथि- कारण पुरुरवाजी (सुद्युम्नक पुत्र) माता-मातृत्वक प्रमाण थिक। ई नव्य-न्यायक 'व्याप्ति-खण्डन' तकनीकक नाट्यीय उपयोग थिक।

५. 'हृदयबासी ईश्वर'

५.अ. कथावस्तु: सृष्टिक आरम्भमे ईश्वर मनुष्यकेँ विशेष बुद्धि-ज्ञान देलखिन। मुदा मनुआ प्रत्येक छोट-बड़ समस्यामे ईश्वरकेँ खोजऽ लागल। ईश्वर परेशान- जंगल-पहाड़, खोला-कन्दरामे नुकाइथ, तैयो मनुआ खोजिए लैथ। अन्ततः ईश्वर एहन ठाम नुकएलथि जत' मनुआ खोज' नहि जाओत- हुनकर अपन हृदयमे।

५.आ. वेदान्त-लोक: तीनू परम्पराक मेल: ई कथाक बीजविचार तीन परम्परामे अछि: (अ) वेदान्त- 'तत् त्वम् असि', ब्रह्म अपन भीतर। (आ)  मैथिली लोककथा- ईश्वरकेँ खोजैत-खोजैत हृदयमे पाबब। परन्तु कापड़ि ऐ तत्त्वज्ञानकेँ शुष्क दर्शन नहि, हास्यात्मक कथाक रूपमे प्रस्तुत करै छथि। 'घैहर गरजु, हेहर-थेथर मतलबी लोक'- ई ईश्वरकेँ खोजैत परेशान मनुआक चित्र हास्यरसक सुन्दर उदाहरण थिक।

५.इ. भाषाक खेल

'ईश कतबो चोरा–नुकाक' औढ़ कातमे चलि जाथि, घैहर गरजु, हेहर–थेथर मतलबी लोक हिनका ताकिए लनि।'

'औढ़ कात' (एकान्त कोना), 'घैहर गरजु' (अत्यन्त आग्रही), 'हेहर-थेथर' (हठी-जिद्दी)- ई शब्द-समूह मैथिलीक जीवन्तताक प्रमाण थिक। 'घैहर' आ 'हेहर'- दुनू ध्वन्यात्मक शब्द जे सुनितहि अर्थ स्पष्ट करैछ।

५.ई. हास्य-दर्शन: ईश्वर परेशान छथि- ई मानवीय छवि (Anthropomorphism) लोककथाक विशेषता थिक। परन्तु कापड़ि ऐ परेशानीकेँ दार्शनिक बनाबै छथि: ईश्वर जतए सहज उपलभ्य- हृदयमे- ओत' मनुआ कहियो नहि खोजैत। ई वक्रोक्ति (Irony)- लोककथाकेँ दर्शनक स्तरपर उठाबैछ।

६. 'लक्ष्मी-बलि खिस्सा' (रक्षाबन्धन-प्रसंग)

६.अ. कथावस्तु: विष्णु राजा बलिक द्वारपर दरबान छथि- वचनबद्धता चलते। लक्ष्मी प्रतीक्षित, चिन्तित। नारद कारण बतबै छथि- वामन-बलि प्रसंग। लक्ष्मी भेख बदलि राजा बलि ओहिठाम जाइ छथि, राखी बान्है छथि। बली दान देबए चाहै छथि। लक्ष्मी माँगै छथि- 'उ दरबान हमरा द’ दा'।' बली दैछ। तहिएसँ रक्षाबन्धन भाइ-बहिनक पावनि।

६.आ. कथाक लोक-पौराणिक सम्मिश्रण: ई कथा विष्णु-पुराण आ भागवत-परम्पराक आधारपर अछि। परन्तु कापड़ि एहिमे मैथिलीक लोकभाषाक जीवन्तता भरि दै छथि। 'अहर ताकय, पहर ताकय', 'बटजोहीमे आंइख खिया', 'तलबल-तलबल लाढ-दुलार', 'हलसल लहालोट'- ई सभ मुहावरेदार प्रयोग कथाकेँ सजीव बनाबैछ।

'लक्ष्मीजीके चालि–ढालि, बगय–बानिसब बलीके बड नीक लगलनि। हुनको उत्सुकता बढ़लनि आ हपसि–लपकिक', दुलारस' हुनका कहलकनि- हे ऐ, बौआ! अहां के छी?'

'हपसि-लपकिक''- मैथिलीक ई मुहावरा (प्रेमभावसँ आगू झपटब) बहुत सटीक अछि। लक्ष्मीक बहिन-रूप- ई प्रेमक सहज अभिव्यक्ति थिक।

६.इ. स्त्री-शक्ति-विमर्श

ऐ कथामे लक्ष्मी निष्क्रिय नहि छथि- ओ स्वयं योजना बनबैछ, भेख बदलैछ, बलिकेँ जोड़तोड़ करैछ, विष्णुकेँ मुक्त करबैछ। धन-देवी स्वयं अपन पतिकेँ मुक्त करए मे सक्षम- ए एक सशक्त नारी-आख्यान थिक।

७. 'तप आ सत्संग'

७.अ. कथावस्तु: विश्वामित्र आ वशिष्ठक बीच विवाद- 'तप श्रेष्ठ या सत्संग?' ब्रह्मा आ विष्णु दुनू फेरी-फन्नामे नहि पड़ैछ। अन्ततः शेषनागक परीक्षा- पृथ्वीक भार उठायब। विश्वामित्र अपन समस्त तपसँ उठाबए गेल- नहि उठा सकल। वशिष्ठ 'एक दिनक सत्संगक पुण्य' दैत बजलाह- पृथ्वी अत्तमे लटकि गेल। तप हारल, सत्संग जीतल।

७.आ. दार्शनिक कथाक रूप: ई 'दार्शनिक-तर्क कथा' (Philosophical Fable) थिक- जाहिमे एक गूढ़ दार्शनिक प्रश्नकेँ कथाक रूपमे हल कएल जाइछ। 'तप' आ 'सत्संग'- ई व्यक्तिगत साधना आ सामाजिक-आध्यात्मिक सामुदायिकताक प्रश्न थिक।

कापड़िक हास्य-दृष्टि सेहो जागृत रहैछ- 'बड बढिञा, बड नीक बात। शेष भगवान हिनका दुनूके सोहरदे आङे कहलखिन'- ई 'सोहरदे आङे' (सामनेसँ)- हास्यात्मक ढंगसँ शेषकेँ न्यायाधीशक भूमिकामे राखैछ।

७.इ. लोकभाषाक प्रयोग

'ई सुनि, ऋषि विश्वामित्रके ईख बिख लागि गेलैन आ पिनकले, फनकि बजलाह- एह, हमरा भुते ई एतनीटा भार केना नै उठत!'

'ईख-बिख लागब' (ईर्ष्यासँ जलब), 'पिनकले-फनकि' (क्रोधसँ गर्म होकऽ)- ई दुनू मुहावरा मैथिलीक अनमोल निधि थिक।

८. बोधकथा- 'शिक्षा आ दीक्षा' आ 'नम्बर'

८.अ. 'शिक्षा आ दीक्षा'

गुरुकुल-परम्परामे एक गुरु राजकुमारकेँ विदाइसँ पूर्व जनसमक्ष अकारण मारैछ। अगले दिन कारण बतबैछ- 'अन्यायक अनुभव कराबए ले। राजा बनबापर न्याय करबाक काल अन्यायपीड़ितक वेदनाक ज्ञान होएतह।'

ई बोधकथा भारतीय 'नैतिक-कथा' परम्पराक निकट थिक। परन्तु शिक्षाक ई 'experiential learning' (अनुभव-आधारित शिक्षा) पद्धति आधुनिक शिक्षाशास्त्रक सिद्धान्तसँ मेल खाइछ। 'ओहिस' सबके भितरका आंइख खुइज गेलनि'- ई वाक्य कथाक दार्शनिक सार थिक।

८.आ. 'नम्बर'

रातिमे एक सेठ भटकि मन्दिरमे जाइछ। एक दुखित लोककेँ पैसा दैछ- अपन नम्बर-कार्ड सेहो दैछ। ओ लोक कहैछ- 'हमरा नम्बर बुझल छह।' सेठ अचम्भित- ओ कहैछ 'भगमानक नम्बर, जे अहाँकेँ हमरापास पठेलक।'

ई कथा एक उत्कृष्ट 'twist ending' (चमत्कारी अन्त) बला बोधकथा थिक। मात्र एक पन्नाक रचना- परन्तु गहन दार्शनिक सन्देश। ईश्वर-विश्वासक ई चित्रण मैथिली बोधकथाक श्रेष्ठ उदाहरण थिक।

९. 'कुत्ता-बिलाइ-मूस' खिस्सा

९.अ. कथावस्तु: कुत्ता-बिलाइ-मूस- तीन मित्र। कुत्ता तीर्थयात्रापर जाइछ, सभ कागज-पत्र बिलाइकेँ देइछ। बिलाइ मूसकेँ राखएले देइछ। मूस खा-ओढ़ि नष्ट करि दैछ। कुत्ता फेरि आबएपर- कागज नष्ट। बिलाइ मूसकेँ मारए उद्यत होइछ। मूस भागैछ- बुझैछ नहि किएक सभ खेहारि रहल अछि। 'तहिएस' आइधरि कुत्ता बिलाइकेँ, बिलाइ मूसकेँ देखितेँ दौड़ैछ।

९.आ. आद्य-कथाक चरित्र: ई 'aetiological tale' (आद्य-कथा) थिक- जे कोनो सामान्य घटनाक मूल कारण बतबैछ। 'किएक कुत्ता बिलाइकेँ आ बिलाइ मूसकेँ खेहारैछ'- ऐ प्रश्नक मजेदार लोक-उत्तर। ई कथा-प्रकार विश्वक सभ लोककथाक परम्परामे थिक। 'जस्ट सो स्टोरीज' (Rudyard Kipling)- ई पाश्चात्य समकक्ष थिक।

९.इ. न्याय-विमर्श: मूस 'बुझबे नै करए जे सभ किएक खेहारि रहल अछि'- ई वाक्य गहन थिक। ओ कागज खाइत आ ओढ़ैत छल- ओकरालेल ई जरूरत थिक। परन्तु एकर परिणाम- सभक हानि। ई 'अनजान-कुकृत्य'क परिणामक कथा थिक। नव्य-न्यायक दृष्टिसँ, मूसक 'ज्ञान-अभाव' (absence of knowledge) हुनकर कर्मकेँ नैतिकतः अपराध नै बनाबैछ।

१०. 'गोनूबाबू घरेपर' खिस्सा

१०.अ. कथावस्तु: गोनूझा- 'धूर्तोमे धूर्त, महा चुस्त-चलाक।' दीर्घकाल बाहर रहि गाम घुरलखिन। सभ पुछैछ- 'कत' गेल छलिऐ?' उत्तर- 'बुझू, गामेपर।' सभ अकचकाइत। असल कारण: आसिन-कातिक महिनामे लोक सभ 'माँग-खाँग'पर आबैछ। एहन महिनामे घर नहि रहि गामसँ निकइल गेल छल। घुरलापर भी- 'बुझू, गोनूबाबू घरेपर।'

१०.आ. गोनूझा-परम्परामे स्थान: मैथिलीक 'गोनूझा' एक विशिष्ट लोक-नायक थिक- चालाक, व्यंग्यकार, अपन लाभ बुझनिहार। अन्य भाषाओंमे ई 'नसरुद्दीन होजा' (तुर्की), 'अकलतम' (हिब्रू), 'बीरबल' (हिन्दी)- जेहन चरित्र थिक। कापड़ि एहि परम्पराकेँ जीवन्त रखै छथि।

'बुझू, गोनूबाबू घरेपर'- ऐ वाक्यक बहुस्तरीय अर्थ अछि: (अ) शाब्दिक- 'हम गामेपर छी।' (आ) व्यंग्यार्थ- 'कत' गेल छलहुँ से नहि बतेबै।' (इ) निहित- 'मांग-खाँग-बला लोकसभसँ बचए गामसँ भागल छलहुँ।' ई तीन स्तर कुन्तकक 'वक्रोक्ति' थिक।

१०.इ. सामाजिक व्यंग्य: 'ऐ महिनामे आबि, केहनो घरेके कोठी, भम्ह भइए जाइछ'- ई आसिन-कातिकक आर्थिक तंगीक सटीक चित्रण थिक। गोनूझाक चालाकी एक जीवन-रणनीति थिक- हँसीमे थिक, तथापि यथार्थ थिक। मैथिल समाजक ग्रामीण आर्थिक चक्रक ई दर्पण थिक।

समग्र आलोचनात्मक मूल्यांकन

१२.अ. कापड़िक कथाकार-रूपक विशेषता

मैथिलीक खाँटी स्वरूपक संरक्षण

कापड़िक सभसँ विशिष्ट योगदान थिक- समानान्तर धाराक खाँटी मैथिली केँ साहित्यिक प्रतिष्ठा देनाइ। 'लबकनिञा', 'हड़हड़ही', 'छगुनाए', 'धतपताए', 'हपसि-लपकिक'', 'पछमुड़िया', 'हठि-बरदम', 'घैहर गरजु', 'हेहर-थेथर'- ई सभ शब्द यदि कापड़ि नहि लिखितथि त' साहित्यमे नहि अबितए।

पशु-भाषा परम्पराक पुनरुद्धार

'लछमिनिञा कनिञा'मे पशुभाषा-ज्ञान, हनुमान नाम स्मरणके महिमा'मे दिव्य-बुद्धि- ई दुनूमे कापड़ि मैथिली लोककथाक प्राचीन 'पञ्चतन्त्र-जातक' परम्पराकेँ जीवन्त रखै छथि। आधुनिक मैथिली कथामे ई परम्परा लगभग लुप्त भऽ गेल छल।

पौराणिक कथाक नव-पाठ (Counter-reading)

'यज्ञ-सीता'मे राम-सीता-सम्बन्धक प्रश्न, 'छौंड़ी-सुद्युम्न'मे लिंग-परिवर्तनक कथा, 'हाय राम!'मे रामक 'मर्यादा'पर प्रश्न- ऐ सभमे कापड़ि पौराणिक कथाकेँ आँखि बन्द कऽ स्वीकार नहि करै छथि। ओ 'critical engagement' (आलोचनात्मक संवाद) करै छथि- इएह हुनकर आधुनिकता थिक।

हास्य-व्यंग्यक कुशल प्रयोग

'गोनूबाबू घरेपर', 'नम्बर', 'तप आ सत्संग', 'हृदयबासी ईश्वर'- सभमे हास्य-व्यंग्य अछि। परन्तु ई हास्य सरल मनोरंजनसँ आगू अछि- दर्शन आ सामाजिक टिप्पणी।

१२.आ. सीमा

(क) कथाक लम्बाइ: अधिकांश कथा अत्यन्त संक्षिप्त (फेसबुक-पोस्ट आकारक)- गहन चरित्र-विकास सम्भव नहि होइछ।

(ख) पुनरावृत्ति: दोहराओल विषय बहुत अछि- सम्पादन-अभावक परिणाम।

(ग) कथाक व्यापकता: सभ कथा धार्मिक-पौराणिक या लोकनीतिक अछि। समकालीन सामाजिक यथार्थपर आधारित कथा (जेना 'लछमिनिञा' जेहन) बहुत कम अछि।

१२.इ. मैथिली लोककथाक इतिहासमे स्थान

मैथिली लोककथाक इतिहासमे- मैथिली परम्परामे कापड़ि विरल छथि जे ग्रामीण मैथिलीकेँ साहित्यिक कथाक माध्यम बनाबै छथि।

विदेह समानान्तर इतिहासक दृष्टिसँ- 'What the Canon Left Out'- कापड़िक कथा मुख्यधारा मैथिली साहित्य-इतिहाससँ 'छोड़ल गेल' अछि। नेपालक मैथिली कथाकारकेँ साहित्य-अकादेमी-केन्द्रित इतिहासमे ठाम नहि भेटैत छल। एहि समीक्षाक माध्यमसँ विदेह ओहि अन्यायकेँ सुधारए चाहैए।

रचनाकारक प्रति समर्पित: परमेश्वर कापड़ि- मैथिलाक माटि-पानिक सच्चा सेवाधर्मी

 

[सैद्धांतिक विवेचन लेल देखू- मैथिली समीक्षाशास्त्र- गजेन्द्र ठाकुर]

 

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