
रबीन्द्र नारायण मिश्र
रामक जल समाधि
राजा राम बिदा छथि
लेता जलसमाधि सरयूमे
भरत आ शत्रुघ्न अड़ल छथिन
हमहूँसभ लेब जल समाधि
अहींक संग
जखन नहि रहता राम
तखन जीअब कथी लेल?
अयोध्याक समस्त नर-नारी
पशु-पक्षी समेत
पाछू-पाछु बिदा छथि
वशिष्ठ पढ़ि रहल छथि अग्निहोत्र
राम आगू बढ़ि रहल छथि
पाछू-पाछू छनि
लोकक हुजुम
छथि मौन
सोचि रहल छथि
की की ने देखलहुँ
जे कहिओ ने सोचलहुँ
से कष्ट भोगलहुँ
जीवन एहन बनि जाएत
जे जानकी सन अर्धाङ्गिनी
सेहो छुटि जाएत
राम सोचिते जा रहल छथि
जानकी चलि गेलीह रसातल
हमरा सामनेमे
किछु नहि कए सकलहुँ
ओहि समयमे
पृथ्वीएटा नहि फाटल
हमर छाती सेहो विदीर्ण भए गेल
लोक हाहाकार कए उठल
व्यर्थ थिक सभकिछु
अछि आब मोसकिल
हुनका बिना
रहब एक्को क्षण
सहैत रहि गेलाह सभ किछु
चोटपर-चोट
पड़िते गेलनि
लक्ष्मण सन प्रिय भाइ
नहि रहलनि
स्वेच्छासँ केलथि प्राणत्याग
जखन राम नहि रहताह संग
जीवन अछि अर्थहीन
से बाजि
चलि जाइत रहलाह
राम नहि सहि सकलाह
ई आखरी चोट
असह भए गेलनि
जीवन अछिए क्षणभंगुर
जे आएल अछि से जाएत
कहि गेलनि काल
जे समय पूर्ण भेल
एहि पृथ्वीपर
से तँ ठीक छै
मुदा अयोध्यामे
एहन विनाश होएत
से के जनै छल
सौंसे अयोध्या भए गेल बिरान
केओ नहि बाँचल
गाछो-विरीछ नहि
मुदा भावी प्रबल
समयक चक्र पूर्ण भेल
जीवन भरि किछु ने किछु
घटना-दुर्घटना होइते रहल
मर्यादापुरुषोत्तम श्रीराम
सोचिते जा रहल छथि
जल्दीसँ शरण दिअ
हे कालपुरुष
तत्काल डुबकी देलनि
सरयूमे
छोड़ि गेला पाछू
दुखद गाथा
जे लोक गबैत रहत
जुग-जुग धरि
-रबीन्द्र नारायण मिश्र [१
।८।२०२४];
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