
राजदेव मंडल
शरशय्या
अदृश्य शरशय्या पर हम छी पड़ल
असंख्य बाण अछि मन मे गड़ल ।
नित नव-नव बाण रहैत अछि - गड़ैत
एकबेर नहि कते बेर रहैत छी - मरैत
पुरना पीड़ा सॅं व्यथित अछि मन
पुनः नवका सॅं बेधल जाएत तन
अदृश्य बाण करैत सन-सन
नहि देखैत अछि कियो सुधीजन ।
कखनो मूल्यहीन कखनो मूल्यवान
मोसकिल मे फॅंसल अछि जान
एकेबेर लगैत असंख्य बाण
एकेबेर मे छुटि जाएत प्राण
रहि-रहि मारै छी आ जियाबै छी
बीख मे डूमाक अमृत पियाबै छी
जाधरि चलत शरशय्याक कथा
ताधरि चलत हमर ई व्यथा
यौ आबो सुझाउ कोनो युक्ति
जाहि सॅं भेटि जाए हमरो मुक्ति ।
-राजदेव
मंडल;
Mob:9199592920;
Gmail:mandalraj@gmail.com
अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ।