
संतोष कुमार राय 'बटोही'
माए (कविता) [मदर्स डे पर]
स्मृतिशेष
रहि गेल छथि
माए ।
अइ जनम मे
आओर दोसर
जनम मे
पुन: तूहीं होइहैं
माए हमर
हे गै माए !
बड़ यत्न सँ
खून अपन जरा कऽ
अपन पेट काटि कऽ
पोषलीहि हमरा
कोशिश केलही
बौआ केँ पेट कखनहुँ
खाली नहि रहैए दाना सँ
माए !
तूँ फेर नहि एबही?
हमर माथ नहि सहलेबही ?
मोन खराब भेला पर
करूआ तेल सँ नहि ससारहबही ?
इस्कूल सँ एला पर
धिपल-धिपल सोहारी
के बना कऽ हमरा देतै ?
माए !
तोहर हाथक नोन आओर मिरचै
अलू केँ चटनी
रहरियाक आओर मटरक गोदिला
सभ हमरा मोन पड़ैत अछि
मूरही आओर बथुआ साग
माए !
तोरा याद छौ
तूँ बेमार पड़ि गेल छेलीह
पूरा गाम निरैछ देने रहउ
'घंघौरवाली आब अइ दुनिया सँ'
बिदा भेलीह सभ कहैत रहै
परञ्च तूँ हमरा लेल
फेर जीव गेलीह
माए !
आब नहि एबही ?
जखन अइ भवसागर मे
हम अकेला भऽ गेलहुँ
संग छोड़ि तूँ कतऽ
नुका रहलीह आब ?
जखन भीखमंगा अबैत छेलैह द्वार पर
अपन नुञा सँ हमरा
नुका कऽ ओकरा भगवैत छेलीह
माए !
तूँ दिल्ली मे रहि गेलीह ?
तेखण्ड के अशमशान मे ?
की यमुना नदी मे ?
एक बेर फेर तूँ एबही ?
हम तोहर साँरा पर
जुड़ि शीतल मे
डाबा नहि टांगलियौ
तुलसी नहि रोपलियौ
पानि नहि देलियौ !
मुइला बाद
हम जल चढ़ा कऽ
की करबौ तोहर साँरा पर
माए !
तूँ अबीहैं नीन मे ।
गप एकटा रहि गेल छै
पूछवाक अछि तोरा सँ
स्वर्ग लोक ऊपर छै
या नीचा मे ?
-कवि - संतोष कुमार राय 'बटोही'; ग्राम - मंगरौना
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