
डॉ. योगानन्द झा
अभिनव पद्यविधा : इतिहास-काव्य
इसवी सन् 1801 मे विदेशी विद्वान एच.टी कोलब्रुक भाषाक रूपमे सर्वप्रथम
मैथिल किंवा तिरहुतिया शब्दक प्रयोग कयलनि। मुदा अज्ञानतावश हुनक भ्रान्त
अवधारणा विज्ञापित भेल जे ई भाषा ने तँ विस्तृत क्षेत्रमे प्रयुक्त अछि आ
ने कोनो उत्कृष्ट रचनाकारे एकर संपोषण कयने छथि, जखन कि कोलब्रुकक ई
अवधारणा सर्वथा निरस्त करबा योग्य छल। वस्तुत: मैथिली नहि केवल मिथिला
अपितु नेपालो तराइक विस्तृत क्षेत्रक भाषा रहल अछि। एकर विराट अस्तित्व
आठमे शताब्दीसँ बनल रहलैक अछि। एहि भाषामे विद्यापति , जगज्ज्योतिर्मल्ल सन
-सन अनेक वरेण्य कविलोकनिक विराट ओ निरन्तरगामी श्रृंखला वर्तमान रहल अछि।
अवश्ये मिथिला भूमि संस्कृत विद्याक केंद्र रूपमे प्रख्यात रहल अछि आ एहि
ठामक पंडित समाज अपन मातृभाषा साहित्यकेँ गौरवक वस्तु नहि बुझैत रहलाह,
एकरा उपेक्षणीय दृष्टिसँ देखैत रहलाह तथा एकरा केवल लोकरंजनक वस्तु बुझैत
रहला, रसिक सहृदय मात्रक वस्तु बुझैत रहलाह। परिणामत: 1854 ईसवीक एजुकेशनल
डिस्पैचमे जखन अन्यान्य जनपदीय भाषासब लोकशिक्षणक भाषाक रूपमे स्वीकार्य
भेल ,मिथिला जनपदमे मैथिलीक स्थान हिन्दी लऽ लेलक।
परवर्ती कालमे खास कऽ युगप्रवर्तक चन्दा झाक आविर्भावक पश्चात् मैथिली
भाषा-साहित्यक सञ्चयन-संवर्धन एकटा आन्दोलनक रूप धारण कयलक जकर
परिणामस्वरुप आइ मैथिली समकालिक भारतीय भाषा सबहिक समकक्ष ठाढ़ भऽ सकल अछि
आ संविधान-सम्मत भाषाक रूपमे समादृत अछि।मैथिलीक एहि अभ्युन्नतिमे आवासी
-प्रवासी सकल मैथिली भाषी समुदायक निरन्तरगामी इच्छाशक्ति ओ कार्यशक्तिक
अवदान रहलनि अछि। एहन अवदानी लोकनिमे मातृभाषानुरागी ओहू वर्गकेँ नहि
अवडेरल जा सकैत छनि जे सभ वृत्या मैथिलीसँ सम्पृक्त नहियों रहलाक बाद अवसर
पबैत देरी मातृभाषा भक्तिक भुम्हुरकेँ प्रज्वलित अग्निमे परिवर्तित कऽ
अनुपम अवदान प्रदान करैत कृतार्थ भेलाह अछि। एहने किछु विशिष्ट अवदानी
लोकनिक मध्य श्री राज किशोर मिश्रक नाम अत्यन्त आदरक संग लेल जा सकैत छनि
जनिक लगभग दू दर्जन मैथिली ओ एक दर्जन हिन्दी कृति प्रकाशित छनि आ असीम
ऊर्जा सम्पन्न ई प्रतिभा सदिखन मिथिला-मैथिल-मैथिलीक संगहि अखिल मानवताक
हित -चिन्तनमे व्यस्त देखि पड़ैत छथि।
श्री मिश्र मूलत: कवि थिकाह । यद्यपि हिनक लेखन कर्म बहुआयामी छनि, तथापि
पद्य-विधामे हिनक डेढ़ दर्जन पोथी हिनक कवित्व प्रतिभाक परिचायकक रूपमे
क्रमश: समक्ष अबैत रहलनि अछि। हिनक रचनावलीक ई अन्यतम विशिष्टता छनि जे ओ
नहि केवल लोकरंजनक सीमाटाक स्पर्श करैत अछि, अपितु प्रचुर लोकशिक्षणक साधनक
रूपमे सेहो प्रस्तुत होइत रहल अछि। बानगीक रूपमे हिनक ' प्रलय -पाश , जँ जग
जल नहि होइत, सभ्यताक भ्रम, ऊर्जस्विता' आदिकेँ परेखल जा सकैछ। आचार्य
चाणक्य पर हिनक ऐतिहासिक विषयाधारित खण्ड-काव्य आबि चुकल छनि।सम्प्रति ई
'श्री मिथिला ' काव्य पोथी लऽ कऽ प्रस्तुत भेल छथि जाहिमे मिथिलाक
इतिहासकेँ वस्तु रूपमे ग्रहण कऽ रचना कयल गेल अछि । एहि ग्रन्थकेँ ई
इतिहास-काव्य विधाक अन्तर्गत रखलनि अछि जकरा हिनक नव्यता ओ भव्यताक अन्वेषण
दिसुक प्रयत्न कहल जा सकैत छनि। वस्तुत: एहि पोथीक द्वारा श्री मिश्र एकटा
अभिनव पद्यविधाक स्थापनाक दिशामे पदक्षेप करैत देखि पड़ैत छथि। श्री मिश्रक
ई प्रयत्न परवर्ती रचनाकार लोकनिक हेतु मार्गदर्शक भऽ सकैत छनि, से अपेक्षा
कयल जा सकैछ।
'श्री मिथिला'मे वस्तुत: मिथिलाक संक्षिप्त इतिहासकेँ पद्यबद्ध कयल गेल
अछि। रचनाकार स्वयं कहने छथि जे 'एहि पोथीमे मिथिलाक विविध आयामकेँ
संक्षिप्त, समेकित ओ समग्रतासँ पद्यविधामे प्रस्तुत कयल गेल अछि। इतिहास,
दार्शनिक सम्वाद, शास्त्रार्थ, संस्कृति ,समाज, लोकगीत, लोकगाथा एहि सभ
विषयपर एकसंग संक्षेपमे ,साङ्गोपाङ्ग काव्य -रचना करब चुनौतीपूर्ण लागल। ई
काव्य-यात्रा वैदिक युगसँ चलि डिजिटल युग धरि आएल अछि। पोथीक विषय-वस्तुकेँ
तीन काल-खंडमे
बाँटल गेल अछि : प्राचीन काल, मध्य काल ओ आधुनिक काल। तदनुकूल सतरह गोट
अध्यायमे विषय सभकेँ समावेशित कयल गेल अछि। ' ई लेखकीय वक्तव्य समीचीन
होइतो एकर अनेक अंशपर असहमतिक संभावना बनैत अछि, तथापि एतबा तँ सर्वथा सत्य
अछि जे रचनाकार मिथिला-मैथिल ओ मैथिलीक प्रति पूर्ण आस्थावान ओ गौरवान्वित
छथि। द्रष्टव्य अछि हिनक किछु पाँती ,यथा -
'सीरध्वज सन शासक जतय,
याज्ञवल्क्य विधि-निर्माता,
गौतम सन नैयायिक, गार्गी
नहि रचलनि फेर विधाता।'
'दू परम ज्ञानीक संवादसँ,
जगत् पाओल बड़ ज्ञान,
सौभाग्य छल एहि भूमिकेँ,
जे एहन-एहन विद्वान ।'
'धन,बल,पौरुष, सम्पदा,
मिलि सब असुर-समाज,
डिगा सकल नहि सीताकेँ,
नारी जातिक ओ नाज। '
एहि काव्यक प्रथम खंड प्राचीन काल नओ अध्यायमे विभक्त अछि जाहिमे क्रमश:
विदेह ; गार्गी-याज्ञवल्क्य-संवाद ;
मैत्रेयी-याज्ञवल्क्य-संवाद; अष्टावक्र; अष्टावक्र-जनक-सम्वाद ; वैदेही ;
दर्शन, समाज, संस्कृति ओ अर्थतंत्र ; वज्जिमहाजनपद, मौर्य-वंश, गुप्तकाल,
पाल-वंश, गुर्जर-प्रतिहार, चन्देल तथा अंतिम मंडन-शंकराचार्य-शास्त्रार्थ
अनुस्यूत अछि।
रचनाकार पहिल अध्यायमे इतिहास ओ कल्पनाक आधार पर विदेह जनपदक निर्माण ओ
वैशिष्ट्यक परिचय प्रस्तुत कयने छथि। दोसर ओ तेसर अध्यायमे क्रमश: गार्गी ओ
मैत्रेयीक संग
याज्ञवल्क्यक संवादक विवरण प्रस्तुत कऽ तत्कालीन ब्रह्मवादिनी मैथिलानी
लोकनिक दृष्टांत प्रस्तुत भेल अछि। चारिम अध्यायमे अष्टावक्रक परिचय ओ
पाँचम अध्यायमे अष्टावक्र-जनक-सम्वादक माध्यमे स्थितप्रज्ञता ओ आत्मतत्त्वक
परिचय प्रदान कयल गेल अछि। छठम अध्यायमे मिथिलाक प्राकृतिक सौंदर्य,
लोकवेद,जानकीक जन्म ओ अपूर्व शौर्य, जनकक प्रतिज्ञा, राम द्वारा धनुर्भंग ओ
सीताराम विवाह, रामक वनगमन, सीताक पतिपरायणता आदिक अति संक्षिप्त विवरण देल
गेल अछि। तत:पर सीताहरण, अशोकवाटिकामे रावण-सीता -संवाद, रावणक नाश, सीताक
अग्निपरीक्षा ओ अयोध्या प्रत्यागमन ,सीताक पुन: वनवास, लव-कुश प्रसंग ओ
जानकीक पाताल प्रवेश धरिक कथाकेँ समाहित कऽ लेल गेल अछि। सातम अध्यायमे
मिथिलामे प्रचलित तद् युगीन दर्शन, सामाजिक व्यवस्था , धर्म, अर्थ-तंत्र
आदिक परिचय प्रदान कयल गेल अछि। आठम अध्यायमे प्राचीन कालमे मिथिलाक शासन-
पद्धति ओ शासक वर्गक परिचय प्रदान कयल गेल अछि। एहि खण्डक अंतिम
अध्याय'मंडन-शंकराचार्य-शास्त्रार्थ'मे रचनाकार 'शंकर दिग्विजय'क सर्वथा
अनुकरण कऽ लेलनि अछि।
मध्यकालक वर्णन सात अध्यायमे विभक्त अछि। तकर पहिल दशम अध्यायमे कर्णाट
वंशक प्रशस्तिवाचन,राजा हरिसिंहदेवक नेपाल पलायन, हुनका द्वारा प्रचारित
पञ्जी-व्यवस्था ओ हुनक वंशज लोकनिक समयमे कृत साहित्यिक-सांस्कृतिक कृति
आदिक विवरण प्रस्तुत भेल अछि। एगारहम अध्यायमे ओइनवार-वंशक विरुदावली ,राजा
शिवसिंहक पलायन एवं तदवधिमे रचित महाकवि विद्यापतिक किछु प्रमुख रचनाक
उल्लेख भेलनि अछि। बारहम अध्याय विद्यापतिकेँ समर्पित छनि।कवि सहर्ष
गर्वोन्नत भऽ उद्घोष कयने छथि -
'महाकविकेँ हम की आँकब?
बाँसक लग्गीसँ हिमालय नापब?'
एहि अध्यायमे विद्यापतिक ज्ञान-गरिमा ,रचनावली आदिक उल्लेख करैत तत्कालीन
मिथिलाक कतोक
सामाजिक-सांस्कृतिक पक्षकेँ निरावृत कऽ प्रस्तुत कयल गेल अछि। तेरहम अध्याय
लोकगाथामे गाथा-चक्रक उपयोगिता, ओकर शिल्प-विधान, सम्बद्ध वाद्य- यंत्र
,परिगणना,वर्णित वस्तु विशेष आदिक उल्लेख भेल अछि। चौदहम अध्यायमे खण्डवला
कुलक राजप्राप्तिक कथाक संगहि एहि कुलक प्रमुख राजा लोकनिक विरुदावलीक
सांकेतिक गायन भेल अछि।
पन्द्रहम अध्यायमे मध्यकालीन मैथिल लोकनिक संस्कृति ओ संस्कार,,धर्म ओ
उपासना,सामाजिक
रीति-कुरीति ,शिक्षा-व्यवस्था ,महाजनी प्रथा,अर्थतंत्र, लोकनृत्य, लोकगीत,
ओ विभिन्न ऋतुक वर्णन भेल अछि जे कविक संवेदनशीलताक अभिव्यंजक अछि। एहि
खण्डक अंतिम सोलहम अध्यायमे कवि मैथिली भाषाक संक्षिप्त ऐतिहासिक विकास
मार्गक निदर्शन प्रस्तुत करैत आधुनिक मैथिली लेखकक प्रति संतोष अभिव्यक्त
करैत देखि पड़ैत छथि ,यथा -
'खूब लेखन भऽ रहल अछि,
ओजस्वी ओ बहुआयामी,
कतेको साहित्यकार लोकनि
छथि यशस्वी आओर नामी।'
कविक उपरलिखित आकलन संख्याक दृष्टिएँ सत्य मुदा गुणक दृष्टिएँ सर्वथा
शोचनीय कहल जा सकैत अछि।
पोथीक अंतिम सतरहम अध्यायमे आधुनिक कालक मिथिलाक वर्णनक लाथे मिथिला जगतमे
होइत क्रमिक विकासक एकटा चित्र उरेहल गेल अछि तथा मैथिलीक विभिन्न समस्यापर
सेहो दृष्टिपात करबाक प्रयास भेल अछि। एहिमे डिजिटल युगक लाभ-हानि तथा
प्रगति-पथपर अग्रेषित मिथिलाक प्रति उल्लासक वर्णन भेल अछि।संगहि एहिमे
वैज्ञानिक युग ओ पाश्चात्य संस्कृतिक अन्धानुकरण जन्य विकृति सब पर सेहो
ध्यान आकृष्ट कयल गेल अछि।
एहि तरहेँ समग्रतामे ई पोथी मिथिलाक राजनीतिक, आर्थिक, सांस्कृतिक ओ
साहित्यिक इतिहासकेँ सहेजने अछि आ से पद्य काव्यक माध्यमक कारणे अभिनव
आस्वाद प्रदान करैत अछि। ओना घटना-उपघटनाक विवरण तँ प्रबंधकाव्यक अनिवार्य
अंश रहिते अछि तथापि ई काव्य एहि लऽ कऽ विशिष्ट कहल जा सकैत अछि जे एहिमे
शास्त्रीय विषयकेँ अत्यन्त रोचक ढंगसँ प्रस्तुत कयल गेल अछि।
श्री मिश्रक ई ध्वनिकाव्य थिकनि जकर लक्ष्य अछि मिथिलाक लोकजीवनमे अपन
पूर्व पुरुष लोकनिक आदर्शक संरक्षण ओ संवर्द्धनक दिशामे उत्प्रेरण।
मात्रिक छंदमे आबद्ध एहि काव्यक प्रत्येक पद यति ,गति सँ समन्वित अछि।
अवश्ये कतोक ठाम छन्दत्रुटि अखरैत अछि तथापि शब्द लालित्य ओ आलंकारिता एकरा
श्रेष्ठ काव्यमे परिगणनीय बनौने अछि यथा -
'घोघ उठा कऽ चलथि जे नारी ,
लाजे मुँह अड़हुल समान ।
लागनि मुख जनु उगल नभमे ,
संग-संग दिनमणि ओ चान ।।'
मिथिलाक सम्पूर्ण इतिहासक विस्तीर्ण फलक पर रचित ई काव्य रचनाकारक निरन्तर
चिन्तनक अवक्षेपण थिक। श्री मिश्र मिथिलाक गौरवशाली परम्परा दिस इंगित करैत
अपन ओहि धरोहरक रक्षाक निमित्त आह्वान तँ करबे कयलनि अछि , संगहि आधुनिक
सौविध्यपूर्ण जीवनमे अनायास प्रवेश करैत विकृति सभ दिस सेहो चिन्तन
प्रस्तुत कयलनि अछि।ई हुनक नैसर्गिक प्रतिभा ,असाधारण व्युत्पत्ति ओ निर्मल
अध्ययन- अनुभूतिसँ ओत-प्रोत काव्य-रचना थिकनि जे मिथिलाक प्रति राष्ट्रीय
भावनाक उद्दीपनक लाथेँ भारतीयताक प्रति एकात्म भक्तिभाव ओ लोकमंगलक
कामनापरक सिद्ध अछि। द्रष्टव्य अछि हिनक किछु समाजसापेक्ष ओ सुधारवादी
पंक्ति जाहिमे ओजस्विता ओ सत्साहित्यक भाव -दर्शन विवेच्य काव्यक
उत्कृष्टताक प्रतीक कहल जा सकैछ, यथा -
'साझी सँ एकल परिवार।
भेल जा रहल ओहो भार।।
टूटि रहल अछि वैवाहिक-संबंध।
पाश्चात्य संस्कृति तँ अछिये अन्ध।।
गामक जिनगीमे छल दुलार।
इरखा दिस संतुलन भेल उलार।।
विज्ञान बढ़ल आ पढ़ल समाज ।
मुदा, कला, संस्कृतिक अछि काज।। '
कवि आधुनिक वैज्ञानिक प्रगतिजन्य मानव जीवनमे आयल सुख -समृद्धि ओ सौविध्यक
प्रति आश्वस्तिक संगहि ओकरासँ उत्पन्न दुष्प्रभावसँ सेहो परिचित करबैत चलैत
छथि आ मानव मात्रकेँ सावधान करैत गुनलनि अछि -
'हमसभ आब ओहि युगमे छी
लागल छै सुविधाकेँ अम्बार,
मनुक्ख तकनीकक बलपर अछि
रचने अपन कृत्रिम संसार। '
एहि कृत्रिम संसारमे मानव जीवन सरल ओ संरक्षित तँ भेल बुझना जाइछ मुदा
प्रकृतिक निरन्तर दोहनक कारणे क्रमश: असंतुलन बढ़ले जा रहल अछि । लोककेँ
वायु-प्रदूषण , जल-प्रदूषण, जलाभाव,जंगली जानवरक प्रकोप आदि सहबा लेल बाध्य
होमऽ पड़ि रहल छनि । संचार क्रांति सकल विश्वकेँ एकटा गाम तँ बना देलक मुदा
औपचारिकता बढ़ैत गेल अछि,
मनुक्ख-मनुक्खक बीच आपकता घटैत चल गेल अछि। 'एआई' प्रत्येक काजक हेतु
उपयुक्त तँ भऽ गेल अछि मुदा ओकरामे ओ संवेदना कोना भेटतैक जे मानव-मानवक
बीच व्यवहारसँ सहजे भेटि जाइत छलैक।
एहि तरहेँ कवि मानव मात्रक भविष्यक चिन्तनमे लीन बुझना जाइत छथि।
कविक ई कृति महत् काव्यक अंतर्गत परिगणित नहि कयल जा सकैछ। एहिमे महत्
काव्यक सदृश विराट चिन्तन तँ छैक, मुदा केंद्रीय बिन्दुक अभावे जकाँ छैक।
लक्षणानुसारी महत् काव्यक छाँह-छूँह एहि काव्यमे यत्र-तत्र आकर्षणक कारण
बनल अछि यथा - एहि काव्यक आरम्भमे तँ नमस्क्रिया किंवा मङ्गलाचरणक उद्योग
तँ नहि भेल अछि मुदा अन्तमे भरत वाक्यक अनुगुम्फनक प्रयास देखल जा सकैछ-
'सभसँ ऊपर देश अपन थिक
भारत अप्पन सबहक प्राण ,
नहि अछि जगमे कोनो देश एहन
होअए जे एकर समान।
देशक प्रगतिमे ककरोसँ कम
नहि रहय मिथिलाक अवदान,
संस्कृति समुन्नत, अर्थ उन्नत
तकनीक बढ़य, बढ़य विज्ञान। '
अन्तमे एहि लोकशिक्षणपरक काव्य रचनाक हेतु श्री मिश्रक सम्वर्द्धना करैत
छियनि आ हिनक स्वर्णलेखनीक अजस्र रसधारक प्रति आश्वस्ति अभिव्यक्त करैत
हिनक स्वस्थ, समृद्ध ओ कर्मयोगीक व्यस्त सारस्वत जीवन-पद्धतिक याचना सकल
ब्रह्मांडनायकसँ करैत छियनि ।
-योगानन्द झा, ग्राम -कबिलपुर (प.), वार्ड संख्या -46 (द. न. नि), पो.
-लहेरियासराय, जि.-दरभंगा (बिहार), पिनकोड-846001; मो. 9334493330
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