VIDEHA ISSN 2229-547X  ·  First Maithili Fortnightly eJournal  ·  Since 2000  ·  www.videha.co.in
विदेह — प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका
Twitter / X Facebook Archive

विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका

विदेह

Videha

प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका — First Maithili Fortnightly eJournal

विदेह नूतन अंक
वि दे ह विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly ejournal विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका नव अंक देखबाक लेल पृष्ठ सभकेँ रिफ्रेश कए देखू। Always refresh the pages for viewing new issue of VIDEHA.


आचार्य रामानंद मंडल
 

समरसता बनाम समानता

समरसता एकटा बर्चस्ववादी शब्द हय।अइ शब्द मे मिठास हय।ठकपाना हय। धूर्तता हय। बर्चस्ववादी प्रवृत्ति हय। समरसता मूलतः विषमता के पर्याय हय। असंवैधानिक हय।खास कर के असंवैधानिक लोग एकर ज्यादा प्रयोग करैत हय।समाज मे विषमता के अक्षुण्ण रखेवाला एकर प्रयोग करैत हय।अइ के कारण समाज में आजादी के बादो सामाजिक विषमता कायम हय। संविधान सामाजिक समानता के बात करैय छैय। समरसता अर्थात सभ समान । अर्थात समाज मे उच्च -नीच, छुआछूत, साधु -असाधु, इमानदार -बेइमान, चरित्रवान -चरित्रहीन सभके समायोजन, अलग अलग कानून। अर्थात मूह देखके मूंगवा देनाइ। एकता में अनेकता। परंच समानता के अर्थ भेल कानून के नजर मे सभ बराबर। भाषा,जाति,धर्म, स्थान,विचार, रूप रंग, लिंग भेद आदि के आधार पर कोनो भेद न कैल जात। अनेकता मे एकता। प्राचीन समाज समरसता के सिद्धांत पर चलैत रहय।जैमे एकता में अनेकता रहय। परंच आधुनिक समाज समरसता में छूपल विषमता के देखैत भारतीय संविधान वा विश्व संविधान समानता के सिद्धांत अपलैनक। अनेकता मे एकता एकर सूत्र अपनैलक। वर्तमान में मिथिला के कथित विद्वान समरसता में विषमता के हवा दे रहल हय।हिनकासभ के भारतीय संविधान पर विश्वास न हय। संविधान के उद्देश्यिका में अंकित सामाजिक न्याय से अंजान छतन आ सामाजिक समानता के सूत्र वाक्य से अनभिज्ञ।  आवश्यकता अइ बात से हय कि पौराणिक समरसता के सिद्धांत के छोड़ के संवैधानिक समानता के सिद्धांत के अपनायल जाय।

 -आचार्य रामानंद मंडल, सीतामढ़ी।

 अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ।