VIDEHA ISSN 2229-547X  ·  First Maithili Fortnightly eJournal  ·  Since 2000  ·  www.videha.co.in
विदेह — प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका
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विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका

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प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका — First Maithili Fortnightly eJournal

विदेह नूतन अंक
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प्रीति कुमारी

चरित्र चित्रण : सूर्य पुत्र कर्ण एक अद्वितीय योद्धा

मैथिली'क उपन्यासकार श्री आर.एन. मिश्र जीके २० गोट उपन्यासमे सँ टटका पोथी 'सूर्य पुत्र ' धार्मिक ऐतिहासिक उपन्यास छन्हि। जाहि मैथिली भाषा'क पोथीक' केन्द्रीय पात्र सूतपुत्र कर्ण छथि। इ नाँउ बलशाली ( जैविक पुत्र - माय कुन्ती आ पिता सूर्य देव) कर्ण केँ जगजीयार भेलन्हि, मुदा पाल्यपिता शहिस अधिरथ आ माय राधेए पुकारू नाम रखलन्हि वसुषेण। महाभारतके कौरव पक्ष सँ पाण्डव पक्षके विवाद'क प्रसंगके चर्चा होइतहि एक बीर पुरुषके रुपमेँ दूर्योधन जीक परम मित्र कर्ण'क विरूदावली विज्ञ व्यासपीठ दिशसँ होइत आबि रहल अछि। प्रवचन सभामंच पर अनेको महाज्ञानी प्रवाचक सँ कथाक माध्यम श्रधालू श्रोतागणक बीच ; जीवनभरि विष पिबिकय उदारताक अमृत बँटैत रहय बालामे कर्ण जीक मादे व्याख्यान पाठक अवश्य सुनने हेयब। कर्ण सदिखन शत्रु केँ सेहो उचित सम्मान देबाक धर्मक निर्वाह कयनिहार भेलाह। कर्णक जन्म एक भावुक क्षणके रहस्य ,माय द्वारा शिशुक परित्याग आ तत्कालीन समाजक पक्षपातपूर्ण व्यवहार सँ हुनकर आत्मा पर अनन्त घावो उत्पन्न करैत रहल। युगानतक कथा पाठमे श्री मिश्रजी आरो एक मुख्य बात कहैत छथि - "तथापि ओ घाओ सभ हुनकर शौर्य आ पुरुषार्थ केँ दुर्वल नहिँ कऽ सकल ,अपितु तेज, तप आ संकल्पक प्रतीक बनि गेल।" कुलीन कुमारि कुन्तिक कोरामे जे नवजात शिशु हुनक राजभवनक एकान्त कक्षमे रहैन,ताहि बालककेँ जन्मेसँ कानमे कुण्डल आ देहमे कवच रक्षार्थ विद्यमान रहैक। अतिशय तेजस्वी मुखाकृति रहितो पुत्र मोहक त्याग करबा लेल लोक लज्जवश कुन्ती अपन धायक सहयोग सँ गोपनीय पूर्वक एक काज रताराति कयलीह। से उकरू काज रहैक काठक बाकसमे हस्तिनापुर लगेक अश्व नदीमे भसाएब। बाकस छोटछीन नाहे जहाँति नदी'क धारामे प्रवाहित होइत भासिया गेलैक। बच्चाके बेर - बेर दुलार आ स्वयंके दूध पियेनाई पुन: नहिं करा सकबाक कुहैन कुन्ती केँ जीवन पर्यन्त हुक जेकाँ उठैत रहलन्हि। ओहि जन्मौटी बच्चाक कानब बंद बाकसमे अधिरथ - राधा सुनैते मातैर भगवान - भगवतीकेँ धन्यवाद दैत मनचाहा फल बुझि बरखा बिहारि कम भेलापर सुरक्षित अपना ओहिठाम आनि मनोयोग सँ पालन- पोषणमे नि: संतान दम्पति लागि जाइए। वसुषेण क्रमशः पैघ होईत जाईत छथि आ हुनकर स्वाभाविक रुचि अश्त्र -शस्त्रमे होइत जाइछ। से हुनक पाल्यपिता आ माता अत्यंत हर्षित भऽ बुझि- गमि अपनामे विमर्श करैत छथि। वसुषेण उर्फ कर्णक ईच्क्षा अनुसारे अधिरथ अपन मित्र हस्तिनापुर'क राजा धृतराष्ट्र जी ओतय पठेबाक पकिया नियार भास करैत छथि । से मायके पुत्रक वियोग यशोदा जेकाँ होय छन्हि,जहन नन्दजी लग सँ कन्हैया गेल रहथि। मुदा धृतराष्ट्र जीक ओहिठामक आश्रित गुरु द्रोणाचार्य आचार्य लग प्रस्थान करय दूनू बापुत पंडितक ताकल दिनमे परिबारक पारंपरिक परिधान पहिरने रथ सँ जाइत छथि। ओहि आचार्य जीके ख्याति विश्व स्तर पर महान् विद्वानमे होइत रहनि , जिनका सँ अस्त्र - शस्त्र विद्या हासिल करबाक परम सौभाग्य प्राप्त भेलन्हि; संगहि पाण्डव आ कोरव आदि गुरूकुलक राजपुत्र सभक संगति भेलन्हि। आचार्य जीके पुत्र अश्वत्थमाक शिक्षण- प्रशिक्षण सेहो ओहिठाम भेलैक। अर्जुन सबसँ प्रिय विद्यार्थिमे सँ आचार्यक रहनि,अपनों बेटा सँ बेसी बढ़िकऽ हुनका मानैत छलाह। सुतपुत्र बूझि ओतय कर्णक अनदेखी आचार्य करथि से बात दुर्योधनोंकेँ बुझयमे आबैक। अर्जुन सँ आगू बढ़ैत प्रखर तेजस्विता देखि दूर्योधनकेँ खूशी होइन,आ कर्ण सँ मैत्रीभाव राखथिन।
पाँचो पाण्डव - कौरव सहित विद्यार्थीगण आचार्य द्रोणाचार्य सँ शिक्षा प्राप्त करैत युद्ध कौशलमे निपुण होइत जाई गेलाह। एकदिन प्रदर्शन सँ औअलि (औबल) चुनय लेल सबहक प्रतियोगिता होइत छैक,ताहिमे दर्शक रूपेँ भीम,द्रोण, कृपाचार्य, विदूर आ महाराजा लोकनि जुमल छलथि। प्रथमत: भीम - दुर्योधनक' संग गद्दायुध्द शिर्षस्थ धरि पहुँच जाईछ। आखिरमे आचार्यक संकेत पाबि अश्वत्थामा मध्यस्थता कय दूनूकेँ छोरेलनि। अन्तमे अर्जून अपन करतब करैत,अस्त्र - शस्त्र भांजैत सर्वश्रेष्ठता पाबय चाहैथि; ताहि बीच तीर- धनुष संग कोनहु सँ भूचाल मचबैत कर्णक हटात् प्रवेश होईछ। आ कर्ण चुनौती दैत राजा - महराजाक बीच सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर देखेलथि से कृपाचार्यक घोषणा सँ जे ई रंगमंच राजपरिवार'क शिष्य लेल अछि। एहिक द्वंद्व युद्ध बीच कर्णक अपमान होईत देखि दुर्योधन जी अंगदेशक राजा घोषित करैत अपन मित्र कर्णक लेल उदारता देखेलन्हि। ऐ दृश्य केँ कुन्तीजी सेहो अवलोकन करैत सभागारमे मोनेमन असह्य दुखी छलीह। आचार्य जी कर्णक प्रतिभा सँ परेशान रहथि आ कर्ण कंसोह लैत अर्जून - द्रोणजीक शिक्षा केँ स्वत: ग्रहण कऽ लैथ। मुदा ब्रह्मास्त्र देवय आचार्य उचित नहिं बूझलन्हि। तेँ अगिला योग्य गुरु करय ओतय सँ कर्ण रातिमे बाहर चलि जाइ छथि । ओ एकलव्य जेकाँ अपन हाथक औंठा कटबय नहिं चाहैत छथि। अपन जाति आ वंश तँ कर्णकेँ बदलब पार नहिं लागैय छन्हि। मुदा ओ जतबे वीर ,ततबे दृढ़ संकल्पी रहथि। परशुराम जीके गुरुकुल पहुँचते कर्णक ललाटक आभा देखि गुरुवर अपन सब गुण सिखाएब उचित बुझैत अंक लागाबैत छन्हि। वनमे एक गायके बछरू केँ कर्णक धनुष वाण अभ्यास सँ अवघात पहुँच गेलैक ,से क्षमा याचना लेल गोउपालक छली ब्राह्मण माफी नहिं करैत श्राप दैत छन्हि। आचार्य हृदय फोलिकय आशिर्वाद देनहार शिष्यक उदासी हरैले फल खुआबैत रीझाबैत छन्हि। एहि क्रममे ओ कर्णक पलथामे माथ रखैत आलस पाबि निसभेर नींनमे सुति रहैत छथि। ता एकटा वीषकीट आबि कर्णके जांघमे भुर करैत शोणीतक फव्वारा बहा देलकैक। परंच शिष्य अपन गुरुक आराममे बाधा नहिं आबय दैत असीम कष्ट स्वंय भोगथि। अकस्मात् गुरुवरके नींन टुटला सँ रक्तधार चलैत देखि ,अचम्भित होइत शिष्य सँ कड़ा सबाल दागैत छन्हि। ओ आक्रोशमे बजैत छथि -" तोँ ब्राह्मण नहिं छें! बाज तोहर कुल मूल गोत्र की थीकौक ? ब्राह्मण तँ एतेक पैघ कष्ट सहन नहिंयेटा करत! हम श्राप दैत छियो, ब्रह्मास्त्र गुण तोरा शिथिल रहतौ। तैयो पुनः शेष गुण देलाक आशिर्वाद प्राप्त कयलाह अछि। जकरा डरे पराजित भऽ कृष्ण मथुरा छोड़िकय द्वारका परा चुकल रहथि, ताहि जरासंध सँ दूर्योधन केर अटूट मित्र श्री कर्ण केँ पछरा पड़ला पर हुनको सँ एक राज़ 'मालिन' उपहारमे पाबैत छथि। कलिंग देशक राजा अपन बेटी कनिकादेवी'क स्वयंवर विश्व स्तर पर आयोजित कयने रहैछ। ताहिमे दूर्योधनके लेल कर्ण बलपूर्वक उठा अपना रथ पर बसाबैत भरल सभा सँ आबि मित्रक धूमधाम सँ वियाह देखैत छथि। धरि अपने आजीवन अविवाहित रहलाह अछि। मित्रक आकांक्षा पुरा करय लेल महाभारत युद्धमे कृष्ण क' गप्प कर्ण नहिं मानलन्हि आ ने कुन्तीक बात मानलनि। मुदा सब जगह हिनका वीरता केँ डंका बजैत रहल आ ध्वजा फहराइत रहल। नियमवध्द कुरूक्षेत्रमे दूनू दलक सेनापति क' नेतृत्वमे घमासान युद्धमे सेना सहित योध्दा लोकनि मरल ,संगहि अश्वत्थामा नामक हाथी सेहो शंख ध्वनिकाल मुइल रहैक। एक समय एहन आबि जाईछ जे दूनू दल हिनका सेनापति मानैय लेल अपना - अपना पक्ष सँ लड़ाय जीतबाक उद्देश्यमे प्रस्ताव दैत रहल। विधिके लिखल आ समय अयलापर भाग्यमे दूनू दलक समर्थन सँ कर्ण महाराजा बनि जाईत छथि। सब प्रजा कर्णके श्रेष्टता लेल जय-जयकार कय उठल छल।
- प्रीति कुमारी, बी.ए., बीएड.

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