VIDEHA ISSN 2229-547X  ·  First Maithili Fortnightly eJournal  ·  Since 2000  ·  www.videha.co.in
विदेह — प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका
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विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका

विदेह

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प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका — First Maithili Fortnightly eJournal

विदेह नूतन अंक
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रबीन्द्र नारायण मिश्र

जयतु जानकी (धारावाहिक उपन्यास)

 

२९

 

वयोबृद्ध वाल्मीकि मुनिक सानिध्यमे आश्रमवासी संस्कार संपन्न बनैत छलाह। हुनकर मार्गदर्शनमे  निरंतर धर्मकार्यमे लागल रहैत छलाह। आश्रममे वनदेबीक आबि गेलाक बाद ओहिठामक हबे बदलि गेल। सभ केओ हुनकर सेवामे दिन-राति लागल रहैत छल। वाल्मीकि मुनि स्वयं नित्य प्रातः काल हुनकर दर्शन करैत छलाह,हुनका  नमस्कार करैत छलाह। तकर बादे आश्रमक काज शुरू करैत छलाह।

वनदेबी!वनदेबी! कहि कए आश्रमवासी हुनका कतेको बेर बजबैत रहैत छलखिन।आश्रममे कोनो छोटसँ-पैघ काज होइत तँ वनदेबी ओहिठाम रहबे करतीह,बेसीकाल हुनकर रुचिक अनुसार आश्रमक गतिविधि निर्धारित कएल जाइत छल। एहि तरहेँ वनदेबी वाल्मीकि आश्रममे रहि कए बहुत आनन्दमे समय बितबैत छलीह। कखनो काल दुपहर रातिमे हुनकर निन्न टूटि जानि। तखन एकान्तमे हुनकर ध्यान बलात राजारामपर चलि जानि, अपन गर्भस्थ संतानसभपर चलि जानि। मोनेमे चिंता होमए लागनि-

“कहि नहि एकर की भविष्य हेतैक? ई जीबिओ सकत की नहि?हमरा लग तँ किछु साधन नहि अछि। एकर शिक्षा-दीक्षा कोना हेतैक?”

एकदिन एहिना पटिआपर पड़ल हुनकर आँखि लागि गेलनि।

वनदेबी सपनाइत रहैत छथि

अपन भावी संतानक लेल

जकर पूर्वज  एहन प्रतापी

तकर संतान जन्मत जंगलमे

के करत ओकर छठिहार

के करत ओकर पालन-पोषण

शिक्षा-दीक्षाक नामपर

एहिठाम हम की करब ओरिआन

राज सिंहासनक बात छोड़ू

ओकरा तँ अपन पिताक दुलारो नहि भेटि सकतै

व्यर्थ अछि हमर जीनाइ

नहि,नहि

एना नहि सोची

वाल्मीकि मुनिक बातपर भरोसा करू

ओ छथि सर्वज्ञानी

देखि चुकल छथि दिव्यदृष्टिसँ सभ किछु

जे वनदेबीक संतान

होएताह यशस्वी

 करताह राज रामे जकाँ

हुनकोसँ बेसी शक्तिसंपन्न

एही बोल-भरोसपर

हम सहि रहल छी

रामक वियोगसँ उत्पन्न असह्य कष्ट

अयोध्यासँ निर्वासित हेबाक अपमान

मोनमे अछि एकटा विश्वास

जे समय पलटी लेत

हमरा संग भए सकत न्याय

हमर संतान पाबि सकताह अपन अधिकार

वनदेबी सपनेमे देखैत छथि जे एक्के संगे दूटा संतानक जन्म होइत छनि। दुनू अनमन राजाराम सन छथि। वाल्मीकि मुनि ओहि संतानसभक शिक्षाक व्यवस्था करैत छथि। ओ सभ बेर-बेर अपन पितासँ भेंट करेबाक आग्रह करैत छथि।एहि बातसँ जानकी बहुत दुखी भए जाइत छथि। बच्चासभपर तमसाइत छथि।एतबेमे  हुनकर निन्न टूटि जाइत छनि । ताबत भोर भए गेल छल। जानकी बाहर होइत छथि। कनीके फटकी  वाल्मीकि मुनि ठाढ़ देखेलखिन। वाल्मीकि हुनकर मोनक बात बुझि गेलखिन। ओ कहैत छथिन-

“वनदेबी अहाँ व्यर्थ चिंता करैत रहैत छी। हम भविष्यमे घटित होमए बला सभ बात रामायणमे लिखि चुकल छी।सभ किछु ओहिना होएत। जे भावी थिक सएह होएत।”

“की हम ओ रामायण देखि सकैत छी।”

“सभ किछुक समय होइत छैक। अखन तकर उपयुक्त समय नहि आएल अछि। समय अएलापर सभ किछु ओहिना प्रकट होमए लागत जेना कमलक पातसभ स्फुटित होइत अछि। अहाँकेँ प्रतीक्षा करबाक चाही।”-से कहि वाल्मीकि ओहुठामसँ बिदा भए गेलाह । वनदेबी बहुत प्रसन्न रहथि।वाल्मीकि मुनिक संदेश बहुत स्पष्ट छलनि। हुनकर कहबाक तात्पर्य छलनि जे वनदेबीक संतानक भविष्य उज्ज्वल हेतनि। एहि बातसँ कोनो माए प्रसन्न भए सकैत अछि। से ओ रहथि।

वनदेबीक मोनमे रहि-रहि कए अपन भविष्य,अपन संतानक भविष्य लए कए चिंता होइत रहैत छलनि। ओ कैक बेर रातिमे चेहा उठैत छलीह। हुनका एना डराइत देखि आश्रममे हुनका संगे रहैत स्त्री लोकनि हुनका घेरि कए बैसो जाइत छलखिन। नीक-नीक खिस्सासभ सुनबैत छलखिन। ईहो बुझबैत छलखिन जे हुनका बेसी चिंता नहि करबाक चाहिअनि । कारण तकर दुष्प्रभाव हुनकर भावी संतानपर पड़तनि। वनदेबीकेँ बुझा-सुजा कए  सभ सुति जाइत छलीह। वनदेबी कैकबेर मातृत्वक संभावित सुखमे आनन्दित रहैत छलीह,कैक बेर चिंतामग्न भए जाइत छलीह।मुदा जखन कखनहु ओ जंगल दिस जइतथि,नदीक कातमे टहलितथि,तखन हुनकर मोन प्रफुल्लित भए जाइत छलनि। ओ नवऊर्जाक संगे आश्रम वापस वापस अबैत छलीह।

एहि तरहँ वाल्मीकि आश्रममे वनदेबीक समय सुख-दुखमे बितैत छलनि।ओना आश्रमवासी अपना भरि हुनकर सेवामे जान लगओने रहैत छलथि। मुदा गुड़क मारि धोकड़े जनैत अछि। रहि-रहि कए हुनकर ध्यान राजारामपर चलि जाइत छलनि। चाहिओ कए ओ एक्को क्षण लेल हुनका नहि बिसरि पाबथि।हुनकर मोन ई कदापि मानबाक लेल तैयार नहि रहनि जे राजाराम हुनका छोड़ि देथिन। मुदा सत्य तँ ओएह छल। ओ राज-पाटसँ फराक जंगल-झाड़मे जीवन बितेबाक लेल विवश छलीह। ई तँ संयोगे कही जे लक्ष्मण हुनका वाल्मीकि आश्रम लग छोड़लथि आ वाल्मीकि मुनि हुनका प्रतिष्ठापूर्वक अपन आश्रममे शरण देलनि। मुदा एतेक पैघ राजक रानीकेँ एहन दिन देखए पड़लनि सएह ने बड़का अन्याय भेल। कैक बेर वनदेबीक मोनमे होनि जे लक्ष्मण राजारामक आज्ञा किएक मानलथि?कम सँ कम हमरा पहिने कहि दितथि? एना गुप्त रूपसँ किएक अनलथि आ जंगलमे छोड़ि कए चलि गेलथि? यदि ओ हमरा पहिने कहि देने रहितथि तँ हम रामकेँ अबस्स पुछितिअनि-

“हे रघुकुल तिलक राजाराम !

अहाँसभ तँ अपन वचनक पक्का छलहुँ,वचनेक कारण चौदह वर्ष वनबासमे रहलहुँ,तखन हमरा देल गेल वचन किएक ने पालन कए सकलहुँ? अछि किछु उत्तर अपने लग?जखन बिआहक समयमे सपथ खेलहुँ जे हम दुनूगोटे संगे रहब,संगे सभ किछु  करब,हमर सभक सुख-दुख एक रहत,तखन एना किएक केलहुँ? यदि राजाक कर्तव्य बाधा बनि गेल छल तखन छोड़ि दितहुँ राज,मुदा रखितहुँ हमरा अपना संगे। मुदा अहूँ लोकक संगे भसिआ  गेलहुँ। जे लोक बाजल से भए गेल ब्रह्म बाक,हम भए गेलहुँ अयोध्यासँ निर्वासित।तखन रहिए की गेल?”

ई सभ सोचिते रहतथि कि दोसरे क्षण मोनमे अबितनि-

“शांत वनदेबी,शांत। अहाँक कोखिमे जे संतान अछि से सभ किछु बुझि रहल अछि। ओकरा बाहर अएबाक अवसर तँ  दिऔक। ओ अहाँक दुख अबस्स दूर होएत।”

कैक राति इएहसब सोचैत ओ भोर कए देथि। कैक दिन गुम-सुम रहि जाथि। वाल्मीकि मुनिकेँ ई सभ पता लागनि। ओ तुरंत दौड़ल अबितथि,कहितथि-

“वनदेबी धैर्य राखू। अहाँक कल्याण अबस्स होएत।”

३०

 

चिरञ्जीवी निरंतर वनदेबीक सेवामे लागल रहथि। हुनकर अद्भुत सेवा भाव देखि ओ बहुत प्रभावित रहथि। हुनका कैकबेर पुछबो करथिन-“अहाँ एतेक मेहनति किएक कए रहल छी? अपनो ध्यान राखू।”

“हे वनदेबी!

 हम तँ अहींक लेल एहिठाम आएल छी। अहाँक कष्टक निवारण होअए,अहाँक भावी संतान स्वस्थ आ सुखी रहथि सएह हमर मनोकामना अछि।”

“मुदा अहाँ छी के? अहाँकेँ एहिठाम के पठओलक?”

“वाल्मीकि आश्रममे हुनकर इच्छा आ आज्ञा बिना के रहि सकैत अछि?”एहिसँ बेसी ओ किछु नहि बाजथि। बस भोरसँ साँझ धरि वनदेबीक सेवामे लागल रहथि। जखन हुनका जाहि वस्तुक प्रयोजन होनि से आनि देथि। वनदेबी हुनकर सेवासँ बहुत प्रसन्न रहथि। बेर-बेर हुनका आशीर्वाद देथि।

आश्रमवासी स्त्रीसभ आने दिन जेना ओहि दिन पूजा-पाठ कए वनदेबी लग आबि रहल छलीह कि चिरञ्जीवी रस्तेमे भेटि गेलखिन। हुनकासभकेँ देखितहि चिरञ्जीवी चिकरि उठलाह-

“जल्दी जाउ, वनदेबी बहुत कष्टमे बुझाइत छथि।”

“की भेलनि हुनका?”

“हमरा किछु नहि कहलनि,मुदा ओ बहुत परेसानी मे बुझेलथि।”

आश्रमवासी स्त्रीसभ जल्दीसँ वनदेबी लग पहुँचैत छथि। ओ प्रसवपीड़ासँ परेसान छलीह। जाबे ओ सभ किछु करितथि ताबे वनदेबी  बेरा-बेरी दूटा संतानक जन्म देलनि। एक्के संगे दूटा बच्चाक जन्मसँ आश्रमवासीसभ बहुत प्रसन्न रहथि। वाल्मीकि मुनिकेँ तुरंत सूचना देल गेलनि। ओ कहैत छथिन-

“हम तँ जनिते रही जे आइ कुश आ लव नामक दूटा बालक वनदेबीकेँ जन्म लेथिन। अहाँसभ ओतहि जाउ आ हुनकर नीकसँ देख-रेख करू।”

वनदेबीकेँ जौआँ बच्चा जन्मलेलाक बाद समस्त वाल्मीकि आश्रममे हर्षक माहौल छल।आश्रमवासी स्त्रीसभ सोहर गाबि रहल छलीह। केओ लड्डू बाँटि रहल छलीह। वाल्मीकि स्वयं अपन रामायणक अगिला दृश्यकेँ भूतलपर स्पष्ट होइत देखि अतिशय प्रसन्न छलाह। ओ फटकीएसँ वनदेबी आ हुनकर दुनू संतानकेँ बेर-बेर आशीर्वाद दए रहल छलाह। ऊपर आकाशसँ देवतालोकनि से पुष्पवर्षा कए रहल छलाह। ओमहर अयोध्यामे आइ भोरेसँ राजारामक दहिना आँखि बेर-बेर फरकि रहल छनि।

“किछु शुभ जरूर होमए बला अछि।”

“हमर जीवनमे आब तकर उम्मीद बाँकी अछि की?” -ई प्रश्न  स्वयं सँ ओ बेर-बेर पुछैत छलाह।

अपन कोरामे दुनू पुत्रकेँ देखि वनदेबीक प्रसन्नताकेँ तँ अंते नहि छलनि। ओ एकटक दुनूबच्चाकेँ देखि रहल छलीह। बेरा-बेरी दुनू बच्चाकेँ दूध पिआ रहल छलीह। हुनका लागि रहल छलनि जे एहि पृथ्वीक सभ सुख भेटि गेल। दुनू बालक अनमन राजाराम सन लागि रहल छल।

“राजाराम तँ अपन संतानसभकेँ देखिते बहुत प्रसन्न हेताह। सौंसे अयोध्यामे आनन्दक वर्षा होमए लागत। जकरा जे चाही से भेटतैक।मुदा हुनका पता कोना चलतनि?”-वनदेबी इएहसभ सोचैत रहैत छलीह। मुदा जखने बच्चासभपर ध्यान जानि सभ किछु बिसरा जानि।

जनमौटी बच्चाक लेल नव वस्त्र कीनबाक हेतु चिरञ्जीवी जा रहल छलाह कि मैथिलीपुत्र भेटि गेलखिन।

“की बात छैक? आइ बहुत प्रसन्न लागि रहल छी।”

“प्रसन्नताकेँ तँ बाते छैक।”

“की भेलैक?”

“कोन दुनिआँमे रहैत छी अपने? सौंसे आनन्द मंगल भए रहल अछि। आश्रममे रसनचौकी बाजि रहल अछि आ अहाँकेँ किछु बुझले नहि अछि?”

“कहबैक तखन ने बुझबैक।”

“वनदेबीकेँ दूटा पुत्रक जन्म भेलनि अछि।”

“बहुत सुखद समाचार। सभ गोटे स्वस्थ छथि ने?”

“आनन्द,आनन्द।”

“बहुत प्रसन्नताक बात कहलहुँ। बहुत दिनक बाद जानकीक जीवनमे किछु शुभ घटित भेलनि अछि। हमरो लोकनिक लेल ई बहुत प्रसन्नताक बात थिक।”

चिरञ्जीवी जल्दीमे छलाह,  चलि जाइत रहलाह। एमहर मैथिलीपुत्र जानकीकेँ दूटा पुत्र जन्मक समाचार जानकीधुजावाहिनीकेँ  शिविरमे जा कए देलनि। कहि नहि सकैत छी जे ओसभ एहि समाचार पाबि कए कतेक प्रसन्न भेलथि। तुरंत गीतनाद शुरू भए गेल।

वाल्मीकि आश्रममे बच्चासभक जन्मसँ छठिहार दिन धरि उत्सवक माहौल छल। वाल्मीकि मुनि बेर-बेर बाजथि-

“वनदेबीक दुनू संतान बहुत प्रतिभाशाली हेताह। ओ सभ इतिहास रचताह आ वनदेबीक प्रतिष्ठाकेँ फेरसँ अयोध्यामे स्थापित करबामे सफल हेताह।”

वनदेबीक जेठ पुत्रक नाम कुश आ छोटक नाम लव राखल गेल। वनदेबी भोरेसँ दुनू संतानक सुश्रुखामे लागि जाथि।हुनकासभकेँ दुग्धपान कराबथि। हुनका संगे आश्रमवासी सेहो बच्चासभक सेवामे लागल रहथि। दुनू बच्चाक जन्मक बाद वनदेबीकेँ एकटा लक्ष्य भेटि गेल छलनि । ओ सभ किछु बिसरि अपनाकेँ ओहीमे लगा देलनि।

३१

 

वनदेबीकेँ जौंआ बच्चा जन्म लेलकनि। वाल्मीकि मुनिक आश्रममे बच्चासभक जन्मसँ छठिहार धरि उत्सव मनाओल गेल।बच्चासभक कुश आ लव नाम राखल गेल। सभ किछु भेल। मुदा ने अयोध्यासँ केओ आएल ने जनकपुरसँ । पता नहि राजारामकेँ बच्चासभक जन्मक सूचना भेटलनि कि नहि? जखन बच्चासभक जन्म भेल तखन शत्रुघ्न वाल्मीकि आश्रमेमे ठहरल रहथि। ओ रातिएमे बच्चासभकेँ देखबो केलनि। प्रातःकाल ओ वाल्मीकि आश्रमसँ लबण बध करबाक हेतु  बिदा भए गेलाह।

वनदेबीकेँ रहि-रहि कए एहि बातक बहुत कचोट होनि। रामसन प्रतापी राजाक संतानक जन्म भेल होअए आ तकर उत्सव अयोध्यामे नहि होइ से  कतहुसँ सही नहि कहल जा सकत। मुदा वनदेबी की  करथि? हुनका तँ चारूकात अनेक प्रश्नचिन्हसभ ठाढ़ छलनि। पहिने तँ स्वयंकेँ निर्दोष सिद्ध  करथि। फेर अपन संतानकेँ  सही सिद्ध करथि। एही बातपर तँ हुनका अयोध्यासँ बाहर कए देल गेलनि। कोन-कोन कष्ट ने ओ सहलनि। कोखिमे संतान छलनि तखनो अपन घरसँ निर्वासित कएल गेलीह। जंगलमे वाल्मीकि आश्रममे रहि कहुना कए अपन जीवनक रक्षा केलीह। जाहिसँ हुनकर संतान बाँचि जाथि आ राजारामकेँ अपन उत्तराधिकारी भेटनि। आब जखन दुनू संतानक जन्म भए गेलनि अछि तखन ओ की करथि?कोना हुनकासभक रक्षा करथि,कोना शिक्षा-दीक्षाक जोगार करथि?

वाल्मीकि मुनि निरंतर वनदेबीक मनोबल बढ़बैत रहैत छलाह। वनदेबीकेँ चिंतित देखि  कहबो करथिन-

“अहाँ बहुत चिंतित  रहैत छी।एकर किछु फएदा नहि अछि। जे हेबाक अछि से हेबे करत। सभ किछु ओहिना भए रहल अछि जे हम रामायणमे लिखि चुकल छी। अहाँक संतान प्रतापी हेताह,अपन वंशक कीर्तिकेँ  अबस्स आगू बढ़ेताह। मनुक्ख अपन भाग्य लिखा कए अबैत अछि। तेँ ओहि विषयसभपर बेसी घमरथन उचित नहि। फेर हम स्वयं एहि परिस्थितिसभकेँ देखि रहल छी। अहाँक मनोकामना अबस्स पूर्ण होएत वनदेबी। तेँ हमर आराधना स्वीकार करू आ निश्चिन्त भए अपन संतानक पालन-पोषण करू। माएक लेल एहिसँ सुखकर की भए सकैत अछि?”

वनदेबी वाल्मीकि मुनिक आश्वासन सुनि कए  प्रफुल्लित भए जाथि। अपन संतानसभक सुरक्षित भविष्यक बात सुनि मोनमे बहुत उसास होनि। ओ मोने-मोन सोचथि-

“ कोनो बात नहि। हमरा जे लिखल छल से भेल। कम सँ कम हमर संतानसभ तँ सुखी रहताह। वाल्मीकि मुनिक वचन व्यर्थ नहि जा सकैत अछि। तेँ हमरा सभ किछु बिसरि दुनू बच्चाक पालन-पोषणपर ध्यान देबाक चाही।”

ओमहर जानकीधुजावाहिनी  शिविरमे जानकीक चर्चा निरंतर होइत रहैत छल। हुनकर दुनू संतानक जन्मक बाद ओ सभ कैकदिन भरि उत्सव मनओने रहथि। गीत-नाद गओने रहथि। मुदा ओ सभ एहिसभसँ संतुष्ट नहि छलाह। छठिहारक प्राते मैथिलीपुत्र हुनका लोकनिसँ भेंट करए गेल  रहथिन। तखन ओ सभ अपन मोनक बात हुनका सामनेमे खोलि कए राखि देलथि-

“हमसभ जानकीक संतानक जन्मक उत्सव तँ मनओलहुँ,मुदा हुनका लोकनिक भविष्यक की हेतनि?की राजारामकेँ बच्चासभक जन्मक बारेमे जानकारी छनि  कि नहि? यदि नहि छनि तकर जिम्मेबार के अछि?जखन हुनका बुझल छलनि जे जानकी गर्भिणी छथि, तखनहु हुनका जंगल पठा देलनि।केओ हुनका संगे नहि रहलनि। तकर बादो ओ कहिओ हुनकर खोज-खबरि नहि लेलनि। अयोध्यावासी की बजलाह,हुनका की पता लगलनि ताहिसँ हमरासभकेँ की लेना-देना?”

“जहिना अहाँ छी,तहिना हम छी। अयोध्यामे की भेल वा अखन की भए रहल अछि तकर हमरा कोनो जानकारी नहि अछि। ने हम हुनका लोकनिकेँ कोनो आदेश दए सकैत छिअनि।हमसभ मिथिलावासी छी,जानकीक शुभचिंतक छी,हुनके लेल अपन गाम-घर छोड़ि  एहिठाम धरि आएल छी ।”

“यदि सएह हालति थिक तखन कथीक बाट ताकि रहल छी? हमसभ शीघ्र अयोध्या चली  आ हुनका लोकनिकेँ सही रस्तापर आनी ।”

“एतेक अगुताउ नहि। एहि बातकेँ नहि बिसरू जे जानकी आब वाल्मीकि मुनिक आश्रममे छथि। ओ अपार शक्तिसंपन्न छथि। भूत,वर्तमान आ भविष्यक जानकारी रखने छथि। ओ रामायण लिखि चुकल छथि । जानकीकेँ वाल्मीकि आश्रम अएबासँ पहिने ओ अपन रामायणक रचना पूर्ण कए चुकल छथि। कहबाक माने जे हुनका भविष्यक घटनाक जनतब छनि। अस्तु, जरूरी थिक जे हमसभ हुनकासँ संपर्क करी।  हुनकर मार्गदर्शनक बादे आगूक रस्ता निर्धारित करी।”

“बात तँ उचित कहि रहल छी अपने। मुदा जनक की कए रहल छथि? की हुनकर कर्तव्य नहि छनि जे जानकीकेँ मदति करथि?”

“से जानकी चाहथिन तखन ने?”

ई चर्चासभ भइए रहल छल कि शक्तिस्वरुपा ओतए प्रकट भए गेलथि।

३२

 

 

शक्तिस्वरुपाकेँ सामने अबितहि लागल जेना सैकड़ों बाटकेँ बिजली चमकि गेल होइक। हुनकर ओज फटकीएसँ देखा रहल छल।आत्मविश्वास आ शक्तिसँ परिपूर्ण ओ बाजि उठलीह-

“अहाँसभ जानकीकेँ जनैत छिअनि। हुनकर शक्तिसँ पूर्ण परिचित छी। अहाँसभकेँ ई बात बहुत नीकसँ बुझल अछि जे जानकी जे चाहतीह से कए लेतीह। यदि  चाहितथि जे अयोध्येमे रही तँ हुनका के मना कए दैत?के  हुनकर विरुद्ध जाइत? मुदा ओ सभ किछु सहि रहल छथि?सोचियौक किएक?अपन दुनू संतानक लेल,अपन आत्मसम्मानक लेल।अहाँ शक्तिसँ एहि दुनिआपर राज तँ कए सकैत छी,मुदा ककरो हृदयपर राज नहि कए सकैत छी।जानकी अयोध्यामे रहथु कि नहि ,मुदा ओ अखनहु राजारामक हृदयपर राज कए रहल छथि। जानकीकेँ जंगल पठा राजारामक की हाल छनि?की ओ सुखी छथि?की ओ दोसर कनिआँ ताकि लेने छथि?की हुनकर मोनमे केओ आर बसि रहल छनि? नहि,नहि,नहि।तखन तँ ई बुझबाक काज अछि जे जानकीक असल शत्रु केओ आर छथि। ओ के छथि? पहिने तकर पहिचान होअए,तखने ने हमसभ हुनका परास्त करबाक बात सोचि सकब।”

शक्तिस्वरुपा!

 हमसभ अहाँक बातसँ अभिभूत छी। हमसभ कहाँ कहि रहल छी जे राजारामकेँ जानकीसँ सिनेह नहि छलनि कि नहि छनि। समस्या तँ ई अछि जे राजारामक जानकीसँ एतेक अथाह प्रेम रहितहुँ ओ हुनकर रक्षा नहि कए सकलाह। हुनका अपना संगे नहि राखि सकलाह। आइ जे कष्ट जानकी भोगि रहल छथि से किएक?एकर कोन औचित्य छल?ओ राजारामक राजमहलमे अपन संतानसभक संग निचेन रहितथि। राजाराम अपन राज-काज करितथि। अपन परिवारक उचित देख-रेख करबो तँ हुनके कर्तव्य छलनि। यदि परिस्थिति एहने भए गेल जे ओ हुनका संग राखि राजकाज नहि कए सकैत छलाह,तखन तँ हुनका जानकीकेँ संग देबाक चाहैक छलनि।छोड़ि दितथि राजाक पद। इएह अन्याय ओ केलनि जाहि कारण आइ जानकी रने-बने बऔ रहल छथि।सभ किछु अछैतो बेलल्ल भेल छथि।”

“खबरदार! जे बजलहुँ से बजलहुँ। जानकी कखनहु बेलल्ल नहि छथि, ओ सर्वशक्तिमान छथि।एक क्षणमे संसारक विनाश कए सकैत छथि। इतिहास बताओत जे जानकी एहि दुखद परिस्थितिकेँ केना आ किएक सहलथि?केना हुनकर दुनू तेजस्वी संतान अपन शौर्यसँ जानकीक सम्मानकेँ पुनर्स्थापित  केलथि।”

“हमहूसभ तँ ओही लेल परेसान छी। आब अहीं कहू जे वर्तमान परिस्थितिमे  हमसभ की करू?”

“युद्ध कोनो समस्याक समाधान नहि अछि।  युद्धमे विजेता आ पराजित,दुनू पक्षकेँ क्षति निश्चित अछि। फेर अयोध्या होअए कि मिथिला,समाजमे मतान्तर सभ ठाम अछि। नीक-बेजाए लोक सभ ठाम अछि। समाजमे बहुत तरहक विकृतिक प्रसार भए गेल अछि। परिणामतः नीको लोककेँ परेसानी होइत छैक। घुन संगे  सातुओ पिसाइत अछि। असल युद्ध तँ लोकक मोनमे लड़ल जाइत अछि। यदि मोनकेँ शुद्ध कएल जाए,विचार सात्विक होअए तँ बहुत रास समस्या हेबे नहि करत आ यदि किछु बात भइए जाएत तँ ओकर समाधानो निकलबे करत।

अखन समस्या जानकीकेँ भेलनि अछि। काल्हि जा कए अनको भए सकैत छैक। अस्तु,जरूरी अछि जे लोकक संस्कार बदलैक,सोचबाक तरीका बदलैक। तखने जा कए न्याय भए सकैत अछि। हमर अपेक्षा रहत जे जानकीधुजा वाहिनी वाल्मीकि आश्रमक लगीच रहि कए  एहि काजमे नीकसँ प्रशिक्षित होथि आ समाजमे सद्विचारकेँ विकीर्ण करथि। हुनकर एहि प्रयासक जुग-जुग धरि मोन राखल जाएत । रहल जानकीक बात तँ ई नीकसँ बुझि लिअ जे वाल्मीकि मुनि स्वयं एकर चिंता कए रहल छथि। राजारामक जीवनमे भविष्यमे की होएत से ओ लिखि चुकल छथि। जखन बीज बाओग कएल गेल अछि तँ फसिल हेबे करत। उचित समयक प्रतीक्षा कएल जाए।

अहाँसभ अपन प्रयासमे धैर्यपूर्वक लागल रहू। कखनहु उदास नहि होउ। लव-कुशकेँ बढ़ए दिअनु। अहाँसभक मनोकामना अबस्स पूर्ण होएत।”-एतेक बाजि शक्तिस्वरुपा लुप्त भए गेलीह। मैथिलीपुत्र सहित जानकीधुजावाहिनीक  ध्यान अचानक वाल्मीकि आश्रमसँ आबि रहल मधुर संगीतपर चलि गेलनि।

वाल्मीकि आश्रममे भोर-साँझमे संकीर्तन होइत छल। जहिआसँ लव-कुशक जन्म भेलनि ,आश्रमक माहौल आनन्दमय रहैत छल। समस्त आश्रमवासी दिन-राति वनदेबी  आ हुनकर दुनू संतानक सेवामे लागल रहैत छलाह। वाल्मीकि मुनि दैनिक पूजा-पाठक बाद स्वलिखित रामायणक गायन सुनैत छलाह। आश्रमवासी लोकनि ओकर गायनमे प्रबीण भए गेल रहथि।क्रमशः लव-कुश पैघ होइत गेलाह। जेना-जेना ओ सभ बढ़थि तेना-तेना हुनकरसभक शिक्षा-दीक्षाक प्रति वाल्मीकि मुनि सजग होइत गेलाह। आश्रमवासी बहुत छगुन्तामे छलाह जे ई बालकसभ एतेक जल्दी केना सभ किछु सिखने जा रहल छथि। नित्य नित्य सायंकालक वाल्मीकि लिखित रामायणक सस्वर गायन होइत छल।लव-कुश नियमित तकर अभ्यास करैत छलाह।हुनका लोकनिकेँ एतेक नीक रामायण गायन करैत देखि  वनदेबीक प्रसन्नताक अंते नहि छल।

“जुग-जुग जीबथु लव-कुश। हमर सम्मानक रक्षा ओ सभ कए सकताह एहिमे कोनो सक नहि।”-वनदेबी मोने-मोन सोचथि।

वाल्मीकि आश्रमसँ दस कोस फटकी बनल अड्डामे जानकीधुजावाहिनी  अपन संघर्षमे लागल रहैत छलाह। बीच-बीचमे शक्तिस्वरुपा हुनका लोकनिक मनोबल बढ़बैत रहैत छलखिन। जखन ओ सामने आबि जइतथि तखन के उदास रहि सकैत छल? सभ गोटेमे शक्तिक अपार संचार होइत छल।सभ फेरसँ उत्साहित भए जाइत छल।जाबे जानकी सुखी नहि हेतीह,अपन  राजधानीमे फेरसँ ससम्मान वापस नहि जेतीह ताबे ओ सभ निचेन कोना हेताह?ओ सभ सभ तरहेँ तैयार रहथि। बस आदेशक काज छल। देखा चाही ओ समय कहिआ अबैत अछि,अबितो अछि कि नहि।

समय-समयपर जानकीधुजावाहिनीक  सदस्यसभ जरूरी काजसँ मिथिला जाइत रहैत छलाह। ओहिठामक हाल-चाल लैत रहैत छलाह। यदि ओ सभ ओमहर जइतथि तँ जनकपुर अबस्से जइतथि,जानकीधाम सेहो जेबे करितथि। ओहिठामक लोकक जानकीक जिज्ञासा देखि ओ सभ चकित भए जाइत छलाह।

“एतेक दिन बीति गेल। मुदा अखनहु मिथिलावासी जानकीकेँ नहि बिसरि सकलाह।”

33

 

जानकीक वर्तमान परिस्थितिसँ जनक नीकसँ परिचित छलाह। परंतु ओ किछु कए नहि सकलाह। जखन रामकेँ वनबास भेलनि तखन तँ ओ सेना सहित चित्रकुट धरि चलि गेल रहथि। मुदा एहि बेर जखन जानकीकेँ वनबास भेलनि तँ ओ मूकदर्शक बनल रहि गेलाह। साइत ओ सोचने हेताह जे राजाराम स्वयं जानकीकेँ हुनका लग पठा सकैत छलाह,किंवा जानकी अपने नैहर आबि सकैत छलीह। मुदा से सभ किछु नहि भेल। ने राजाराम जानकीकेँ नैहर पठओलखिन ,ने जानकी स्वयं ताहि लेल किछु प्रयास केलथि।असलमे ओ मिथिलाक कन्या छलीह जतए परंपरा रहल अछि जे विवाहित बेटी एक बेर सासुर गेल तँ गेल। सासुरे ओकर सभ किछु  भए जाइत छलैक। जानकीधुजावाहिनीक सदस्यसभ जखन कखनहु अपन गाम घर लौटथि तँ जानकीक समाद सेहो अपना संगे लेने जाथि। लोकसभ बहुत उत्सुकतासँ जानकीक हाल-चाल पुछनि। एहि तरहेँ मिथिलामे घर-घर सभकेँ पता चलि गेल रहैक जे जानकीकेँ जौआँ पुत्र जन्म लेलकनि अछि आ ओ सभ स्वस्थ छथि आ वाल्मीकि आश्रममे मे शिक्षा प्राप्त कए रहल अछि।

लोक तँ लोके होइत अछि चाहे अयोध्याक होइक वा मिथिलाक। गाहे-बगाहे ओ सभ आपसमे चर्च करबे करए-“सएह कहू। हे राम एहन भए गेलाह जे ककरो कहलापर जानकीकेँ घरसँ निकालि देलनि ,परंतु जनक तँ हुनकर पिता छलखिन,सभ तरहेँ संपन्न छलखिन। ओ किएक ने हुनका अपना संगे राखि लेलखिन।”

“राखि कोना लितथिन। हमरा तँ केओ कहलक जे जनक एहि लेल बहुत प्रयास केलथि,अपन दूत वाल्मीकि आश्रमोमे पठओलनि। मुदा जानकी अड़ि गेलखिन। कोनो हालतिमे नैहर जेबाक लेल तैयार नहि भेलखिन।”

“से अहाँ कोना जनैत छी?”

“एहिसभ बातक की प्रमाण देल जा सकैत अछि। जनक कोनो मामूली आदमी तँ छथि नहि। एहिठामक राजा थिकाह,प्रकांड विद्वान थिकाह। ओ यदि किछु केनहु हेताह तँ मर्यादापूर्वके । लोककेँ ढोल बजा कए की कहितथिन?”

“से जे बात होइक,मुदा जानकी संगे तँ भेलनि अन्याये। ने राजाराम सन प्रतापी पति काज देलखिन ,ने राजा जनक सन पिता। भए सकैत अछि जे ओहि समयमे राजा सभक छिज्जा एहने रहल होएत।”

“राजाराम चाहे जे करथु,राजा जनकक विचार जे रहल होनि,मुदा हमसभ जानकीकेँ अपन घरमे रखबाक लेल तैयार छी। मिथिलाक सैकड़ों घर हुनकर अपन घर छनि।ओ निःसंकोच आबथु,  हमरासभकेँ जुड़ाबथु।”

“जानकीधुजावाहिनी  गेले अछि। मैथिलीपुत्र हुनकासभक नायक छथि। हुनकर सभक इएह संकल्प छनि। देखा चाही जे ओ सभ कहिआ धरि अपन लक्ष्यमे सफल होइत छथि।”

एहि तरहेँ जानकी प्रसंगक मिथिलावासीसभ आपसमे चर्च करैत रहैत छलाह।

ओमहर वाल्मीकि आश्रममे जानकी लव-कुश संगे रमि गेलथि। दुनू बच्चाकेँ पालन-पोषणमे अपन समस्त शक्तिकेँ लगा देने रहथि। मुदा कैक बेर दुपहर रातिमे हुनकर निन्न टूटि जानि। ओतेक रातिमे केओ आर हुनका लग तँ छल नहि जकरा संगे अपन दुख-सुख बँटितथि। ओ अपन दुनू संतानकेँ निहारितथि,किछि-किछु बड़बड़इतथि-

राजाराम भेलथि केहन कठोर

जे अपन संतानक जन्मो पर

उत्सव नहि मनाओलाह

नहि देखलनि जनमौटी बच्चाक मुँह

कहू तँ ओकरसभक कोन दोष छल

ओ सभ तँ राजकुलक संतान अछि

अयोध्याक उत्तराधिकारी अछि

आइ समस्त अयोध्यामे बजैत रसनचौकी

घर-घर होइत नाच-गान

मुदा किछु नहि भेल।

केओ पुछारी नहि केलक

हमर नैहरसँ जरूर आएल समाद

आबि जाउ हमर दुलारी बेटी

रहू हमरे राजमे

कोनो कमी नहि होएत

लव-कुश रहताह राजा जकाँ

मुदा हमरे साहस नहि भेल

मिथिलाक लोकक मुँह कहिआ धरि बंद रहतनि

की पता ?

आइ ने काल्हि

ओहोसभ अलापथि ओएह राग

ओ तँ आओर अपमानजनक होएत

एहिसभसँ बहुत नीक अछि

वाल्मीकि आश्रम

जतए नहि अछि केओ अपन

बेसक हम एहिठाम अपरिचित छी

वनदेबी कहाइत छी

मुदा हम एतए सम्मानित छी

वाल्मीकि स्वयं  रखै छथि आदर भाव

नित्य करैत छथि प्रणाम

तखने करैत छथि पूजा-पाठ

लव-कुश सेहो पाबि रहल छथि

उत्तम संस्कार

हुनके सानिध्यमे

समय-समयक बात छैक

हमरो दिन पलटतै

लव-कुश अबस्स प्राप्त करताह

अपन जन्मसिद्ध अधिकार

जेना सिंघक संतान

ककरो दयापर नहि

अपितु, अपन पुरषार्थसँ छिनि लैत अछि

अपन अधिकार

आ करैत अछि राज

तहिना लव-कुश जरूर बनताह

सामर्थय संपन्न

आर अंत होएत हमर यंत्रणाक

हमहूँ जीबि सकब

गरिमामय जीवन

अपन समाजमे।

एहि तरहेँ जानकीकेँ कैक राति टकटकी लागि जानि। ओ ओछाओनपर एहि करोटसँ ओहि करोट करैत रहि जाथि,हारि कए कुर्सीपर बैसि जाथि,दुनू संतानकेँ देखैत भोर कए लेथि।

३४

 

अपन दुनू संतानक प्रतिभा आ तेजस्विता देखि जानकीक प्रसन्नताक अंते नहि छल। कोना भोर होइक  साँझ भए जाइक से ओ नहि बुझि नहि पाबथि। राजाराम द्वारा लंका विजयक बाद ओ किछु दिन सुखसँ बितओलीह।लगलनि जे ओ सचमुचकेँ राजपरिवारमे बिआहल गेल छथि। मुदा ओ समय बेसी दिन नहि ठहरि सकल। जानकी फेर दुखमय जीवन जेबाक लेल विवश भए गेलथि। मुदा अधलाह संगे किछु-ने-किछु  नीको नुकाएल रहिते छैक। सएह भेलनि हुनका संगे वाल्मीकि आश्रममे। एक तँ वाल्मीकि मुनि दोसर पिता भए ठाढ़ भए गेलखिन। ओ शुरूएमे अपन योगबलसँ हुनका नीकसँ चिन्हि गेल रहथिन,बुझि गेल रहथिन जे जानकी सभ तरहेँ निर्दोष छथि,हुनका अनेरे अयोध्यावासीसभ परेसान केलकनि अछि । यद्यपि राजाराम सेहो ई बात जनैत छलाह।

दू-दूटा संतानक संग जानकी आश्रममे समय बिता रहल छथि। हुनकर संतानसभ अपन-अपन प्रतिभासँ हुनका आनन्दित केने रहैत छनि। जे किछु वाल्मीकि मुनि सिखबैत छथिन से ओ सभ तुरंत सिखि लैत छथि।नान्हिटा बच्चासभ बहुत तेजीसँ शक्तिसंपन्न भेल जा रहल छल,ताहि बातसँ जानकीक करेजा मजगूत भेल जा रहल छलनि। कोनो माएकेँ एहन संतानपर गर्व हेबे करितैक,हेबेक चाही।

जानकी भोरे उठितथि। दुनू बच्चाकेँ पराती सुनबितथि। हुनका सभकेँ नीक-नीक भजन सभ सुनबितथि। तकर बाद स्नान कए दुनू बच्चा वाल्मीकि मुनि लग पठा दितथि। ओहिठाम अनेक प्रकारक शास्त्र आ शस्त्रक शिक्षा वाल्मीकि मुनि हुनकासभकेँ  देथि। ओहिठामसँ थाकल-झमारल लव-कुश जानकी लग अबितथि। जानकी अपना हाथे हुनकासभकेँ भोजन करबितथि। फेर दुनू बच्चा आपसमे खेलैतथि। बीच-बीचमे जानकी संगे किछु-किछु चौलो करितथि।

जेना-जेना ओ सभ छेटगर होइत गेलाह,तेना-तेना हुनकासभकेँ अपन पिताक प्रति जिज्ञासा  बढ़ैत गेलनि। असलमे आश्रममे हुनकालोकनिक संगे पढ़ि रहल अन्य विद्यार्थीसभ अपन परिचयमे पिताक नाम लेथि,मुदा जखन लव-कुशक बेर अबैत तखन ओ सभ चुप रहि जइतथि।

“हमसभ वाल्मीकि मुनिक शिष्य छी,वनदेबीक संतान छी। इएह थिक हमर परिचय।”- ओ सभ ई बात बेर-बेर दोहरबितथि।

 मुदा मोनमे कचोट तँ भइए जानि। आश्चर्य होनि जे माता हमरासभकेँ पिताक परिचय किएक नहि कहैत छथि,किएक ने हमरासभकेँ अपन परिवारक बारेमे बताओल जाइत अछि? एहन कोनो अवसर भेलापर जानकी एतबे कहितथिन-

“अहाँसभकेँ पिता अबस्स भेटताह। पहिने अपन शिक्षा तँ पूर्ण कए लिअ।”

जानकीक बात मानि लव-कुश अपन काजमे लागि जाथि। मुदा समयक संग हुनकर सभक जिज्ञासा बढ़िते गेलनि। आखिर एकिदन ओ सभ वाल्मीकि मुनिसँ पुछिए देलखिन-

“गुरुजी एकटा प्रश्न पुछू।”

“की?”

“आश्रमवासी सभ शिष्यसभ अपन-अपन परिचयमे पिताक नाम बताबैत छथि। मुदा हमदुनू भाइ किछु नहि कहि पबैत छी।”

“अहाँ सभ हमर लिखल रामायणक नियमित गायन करैत रहू। अहाँसभक प्रश्नक  उत्तर भेटि जाएत।”

“जे आज्ञा गुरुवर!”

तकर बाद लव-कुश भोर साँझ वाल्मीकि रचित रामायणक नियमित गायन करए लगलाह। हुनकर सभक रामायण गायन अद्भुत  छल। जे सुनैत से सुनिते रहि जाइत।लगपासमे लोकसभक मेला लागि जाइत। वाल्मीकि स्वयं सभ किछु छोड़ि हुनकरसभक रामायण गायन सुनैत रहितथि। एहिमे हुनका अपन प्रयासक सफलता देखाइत छलनि। जानकीकक  प्रसन्नताक तँ अंते नहि छल।

जानकीक मार्गदर्शनमे लव-कुश उत्तम शिक्षा प्राप्त कए रहल छलाह। नीकसँ नीक संस्कार हुनका प्राप्त भए रहल छलनि। जानकी हुनका लोकनिक आत्मसम्मानकेँ सदति जगओने रहबाक प्रेरणा दैत रहैत छलीह। लव-कुश शक्ति संपन्न होथि,आत्मनिर्भर होथि, ताहि लेल जानकी दिन-राति तत्पर रहैत छलीह। निस्सन्देह ओ सभ बच्चा छलाह मुदा हुनकरसभक उपलब्धि अतुलनीय छलनि।दुनू बच्चा ओजसँ भरल छलाह। वाल्मीकि रचित रामायणकेँ ओ सभ कंठाग्र कए चुकल छलाह। एहि तरहेँ जानकीक जीवन वाल्मीकि आश्रममे बहुत नीकसँ कटि रहल छलनि। जेना-जेना लव-कुश पैघ होइत गेलाह,तेना-तेना हुनकर आनन्द बढ़ैत गेलनि। आब हुनका कोनो बातक चिंता नहि होनि।

एकदिन शिविरमे  जानकीधुजावाहिनी आपसमे चर्चा  कए रहल छलाह कि शक्तिस्वरुपा मैथिलीपुत्रकेँ बजओलखिन।

“किछु सुनि रहल छिऐक?”

“हँ,हँ केओ बहुत मधुर संगीत गाबि रहल अछि।”

“ओ केओ आर नहि अछि। जानकीक संतान लव-कुश छथि। ओ सभ वाल्मीकि मुनिक रामायण गाबि रहल छथि।”

“ई तँ बहुत आनन्दक बात अछि।”

“एकदिन हुनकासभक कार्यक्रम अपन शिविरोमे राखल जाए।”

“सही विचार अछि। आखिर हमहूँसभ तँ हुनकेसभक प्रतीक्षामे छी।”

“बढ़िआँ होएत जे चिरञ्जीवीकेँ एहि लेल संपर्क कएल जाए।”

“अबस्स।”

३५

 

 

जानकीधुजावाहिनी  अपन प्रतिज्ञापर अड़ल छल।मैथिलीपुत्र निरंतर हुनका लोकनिक मार्गदर्शन करथि। बीच-बीचमे शक्तिस्वरुपा सेहो ओतए आबथि । हुनका अबितहि जानकीधुजावाहिनीमे प्रबल शक्तिसंचार भए जाइत छल। ओ सभ उत्साहमे किछु करबाक लेल उत्तेजित भए  जाइत छलाह। ओ सभ भावुक भए जाइत छलाह-

कखनो-कखनो जानकीक मोनमे

उठै छनि लहरि

होइत छनि जे करी  विद्रोह

अन्याय सहबोक होइत छैक सीमान

 एक बेर दू बेर

नहि सहल जा सकैत अछि

बेर-बेर पक्षपातपूर्ण व्यवहार

केओ कहाँ कहलकनि रामकेँ

जे ओ देथि अपन निष्ठाक प्रमाण

बेसक जानकी रहलीह वनबास

मोन मे जे  भेलनि

से करैत  गेलाह

सोनाक जानकी गढ़ि लेलनि

अश्वमेध यज्ञ करबाक छलनि

जाहिसँ बनि सकताह महाप्रतापी राजा

हद भए गेल

केहन छल बेदर्द अयोध्याक लोक-वेद

केओ तँ कहितनि

जखन जानकी जीवित छथिहे

हुनका मानिते छिअनि अर्धाङ्गिनी

तखन ई की कए रहल छी?

किएक जीवित जानकीकेँ छोड़ि

मुरुतकेँ पुजि रहल छी?

कहू ई कोन बात भेलैक

ओ मुरुत ने बाजि सकैत अछि

ने कानि सकैत अछि

नहि कहि सकैत अछि

अपन मोनक बात

ने अहाँक संग

 बाँटि सकैत अछि सुख-दुख

तथापि ओ पसिंद अछि

सद्यः जानकी नहि चाही

हुनका देने छी वनबास

से किएक?

मुदा अहाँ राजा छी

पुरुष छी

के टोकारा देत?

एकतरफा जानकी सहथु सभटा अन्याय

यौ पाहुन!

ई मिथिला छै

हमसभ तँ अहाँक

आदर करबाक लेल

प्रतिवद्ध छी

अपन संस्कारसँ

परंपरासँ बान्हल छी

मुदा नीक जकाँ सुनि लिअ

 आब कोनो जानकी

नहि देतीह फेरसँ अग्निपरीक्षा

नहि सहतीह अन्याय एकतरफा

हे मिथिलावासी उठू

जानकीक कष्ट हरबाक लेल

हुनकर प्रतिष्ठाक लेल

कतेक दिन मौन रहब

आब बहुत भए गेल

किछु करहि पड़त

जाहिसँ बाँचि सकत

जानकीक आत्मसम्मान

तखन मैथिलीपुत्र हुनका सभक भाव बुझि कहलखिन-

“अहाँसभ जानकीक सिनेहमे  अपन सभ किछु त्यागि एहिठाम धरि पहुँचि गेल छी। ई कोनो मामूली बात नहि अछि । मुदा सभ किछुक समय होइत छैक। अहाँसभ धैर्य बनओने रहू। जानकीक विजय अबस्स हेतनि  हेबे करतनि।”

हुनकर बात सुनितहि केओ बाजल-

“असलमे राम केबो केलनि बहुत अन्याय । अन्याय कोनो जानकीएटासँ भेलनि से बात नहि छैक। ई तँ समस्त मिथिलाक अपमान भेल,मिथिलाक संस्कृतिक अपमान भेल।एहन तँ कहिओ नहि सुनल गेल जे अछैत पतिकेँ ओकर स्त्री एकांतबास लेल विवश कएल जाए सेहो ओकरे द्वारा। ई तँ हद भए गेल। जानकीकेँ कम सँ कम संतान हेबा धरि तँ मोहलति देबेक चाहैत छलनि। कोनो मान्यता मनुष्यतासँ ऊपर नहि भए सकैत अछि। हमसभ पहिने मनुक्ख छी तखन किछु आर। मुदा से ने राम बुझलनि ने अयोध्यावासी। जकरा जे फुरेलनि से बजैत रहलाह। जे मोन भेलनि से करैत रहलाह।”

उपरोक्त कथनकेँ जानकीधुजावाहिनी कस्वरसँ समर्थन केलनि।

हुनकालोकनिकेँ उत्तेजित देखि मैथिलीपुत्र कहैत छथि “

”शांत होइत जाउ। देखिऔ के आबि रहल छथि।“

सामनेसँ वाल्मीकि मुनि जानकी,हुनकर दुनू संतान लव-कुश आ चिरञ्जीवी आबि रहल छथि। वाल्मीकि मुनिकेँ संगे जानकीकेँ सद्यः देखि जानकीधुजावाहिनी  अत्यन्त प्रफुल्लित रहथि। जानकी लव-कुशक आंगुर पकड़ने बीचमे चलि रहल छथि।ओसभ एकस्वरसँ बाजि उठलथि-

”जानकीक जय होअए!

 लव-कुश अमर रहथु!

अमर रहथु वाल्मीकि मुनि!“

वाल्मीकि मुनि इसारासँ हुनका लोकनिक अभिवादनक उत्तर दैत छथि।जानकीक प्रसन्नताक तँ अंते नहि अछि। ओ पुछैत छथिन-

”ई सभ के छथि? एहि जंगलमे ई सभ की कए रहल छथि?“

”माते! ई सभ अहींक बंधु छथि। अहाँक कष्टक समाचार सुनितहि मिथिलासँ सभ किछु छोड़ि एहिठाम धरि आबि गेल छथि। मैथिलीपुत्र हिनकर सभक नायक छथि। ई सभ अहाँक समाचार सुनि अहाँक जन्मस्थान जानकीधाममे उपस्थित  भेल रहथि  ओतहि संकल्प केलनि जे अयोध्या जेताह आ अहाँकेँ वापस नैहर लेने अएताह। मुदा नियतिवश ई सभ एतए आबि गेलाह आ तखनसँ एतहि छथि।“- चिरञ्जीवी बजलाह।

”से किएक?“

”हिनकर सभक कहब छनि जे जाधरि अहाँ अयोध्यामे अपन राजपर नहि लौटब,जाधरि अहाँक सम्मान नहि वापस होएत,ताधरि  सभ निचेन नहि हेताह। ।“

से सुनितहि जानकी जोरसँ अट्टहास केलनि। फेर  बजैत छथि-

”अहाँसभ दिनेमे सूर्यकेँ डिबिआ देखाबए लेल आतुर छी। अहाँकेँ बुझबाक चाही जे हम अपन सम्मानक रक्षाक लेल  स्वयं शक्तिसंपन्न छी। हमर दुनू संतान वाल्मीकि मुनिसँ उत्तम शिक्षा प्राप्त कए रहल छथि। ओ सभ निश्चित रूपसँ हमर स्वप्नकेँ साकार करताह। अपन जन्मसिद्ध अधिकारकेँ अबस्स  प्राप्त करताह। हमरा आर चाही की?किछू नहि।हम तँ ओही दिनक प्रतीक्षामे जीबि रहल छी।“

जानकीकेँ एना बजैत देखि वाल्मीकि मुनि  बजैत छथि-

”हे मिथिलावासी!

 अहाँसभ धन्य छी। अहाँसभक जानकीक प्रति अनुराग देखि हम आह्लादित छी।हम तँ सभ किछु पहिने लिखि चुकल छी। लव-कुश ओहि रामायणकेँ सस्वर गाएब सिखि चुकल छथि। जल्दीए ओ एहि मधुर संगीतक माध्यमसँ जानकीक बात जन-जन धरि  पहुँचेबामे सफल हेताह। ई युद्ध अस्त्रसँ नहि शास्त्रसँ जितल जाएत। एहिमे ककरो कनीको सक नहि हेबाक चाही जे जानकी  हुनकर दुनू संतान राजारामक विचारमे परिवर्तन करबामे सक्षम हेताह।हुनकर विजय हेबे करतनि।“

एतबा बाजि वाल्मीकि मुनि ओहिठामसँ प्रस्थान कए गेलाह।हुनका पाछू लागल जानकी,लव-कुश आ चिरञ्जीवी सेहो चलि  गेलाह।

३६

 

 

ओहिदिन  जंगलमे जानकीधुजावाहिनीक  उत्साह देखि जानकी अचंभित रहथि। हुनकर नैहरक लोकक हुनका प्रतिए सिनेह देखि बहुत प्रसन्नता भेलनि । धन्य छथि मिथिला ,धन्य अछि ओकर संस्कृति।

जानकी अपन मोनोभाव चिरञ्जीवीकेँ कहलखिन-

”हमरा एहि बातक बहुत प्रसन्नता अछि जे हमर नैहरक सैकड़ों युवक हमरा लेल अपन गाम-घर छोड़ि कए एहिठाम धरि आबि गेल छथि। हुनका लोकनिक हमरा प्रति सिनेहक जतेक प्रशंसा कएल जाए ततेक कम। मुदा कतबो व्यक्ति मिलि कए हमर भाग्य नहि बदलि सकैत छथि।हमरा की नहि छल? राजाराम सन पति,अयोध्याक राज,दसरथ सन ससुर,कौशल्या सन सासु। मुदा किछु काज आएल? नहि आएल। ई ककर दोष?हमर नियतिए इएह छल।नहि तँ हम राजाराम संग जंगल की करए जइतहुँ। यदि ओतए गेबो केलहुँ तखन लक्ष्मण सन दिओरक ऊपर अनेरे सक कए हुनका अपन रक्षासँ नहि हटबितहुँ। हमरे कहलापर सोनक हरिणक सिकार लेल जेबासँ पहिने  राजाराम तँ अपना भरि सभ ओरिआन कए गेल रहथि। हमही हुनका सोनक मृगाकेँ पकड़ि अनबाक लेल वाध्य केने रहिअनि। ओ तँ मना करैत छलाह। आखिर हमरा रावण हरि लेलक। तकर बाद तँ जे भेल से इतिहास थिक। दोष हमर तँ छलहे। तेँ बहुत विचारक प्रश्न अछि। एहि ठामक माहौल बहुत गड़बड़ लागि रहल अछि। अहाँ जाउ,मैथिलीपुत्रसँ गप्प करू जाहिसँ जानकीधुजावाहिनी  सीमाक अधीन रहथि,मर्यादाक पालन करथि। हमर सम्मानक आब कोन चिंता अछि। लव-कुश अपन अधिकार पाबि जाथि। हमरा लेल तँ माता पृथ्वी  छथिहे। हमर मोन आब फाटि गेल अछि। कतबो केओ प्रयास करत हमर  जीवनमे आब ओ भाव नहि आबि सकैत अछि। हमरा लेल ने अयोध्याक राज कोनो माने रखैत अछि ने मिथिला। हमर स्थान पूर्वनिर्धारित अछि। से वाल्मीकि अपन रामायणमे लिखि चुकल छथि।“

”चिंतामे तँ हमहूँ छी। हमरा लेल तँ दूध आ माछ दुनू बाँतर अछि। हम ने रामक विरुद्ध जा सकैत छी ने अहाँक। हम तँ अहाँ दुनूक चाकर छी। ऊपरसँ चिरञ्जीवी हेबाक आशीर्वाद सेहो अहाँसँ भेटि चुकल अछि। हम की समाद देबनि भविष्यक पीढ़ीकेँ।  सभ तँ पुछबे करताह -अहाँ की केलहुँ? किएक ने रोकि सकलहुँ ई अनर्थ। एहन हालतिमे अहीं कहू जे हम की करू?“

”अहाँ बेसी नहि सोचू। जे हम कहैत छी से करू। हिनकासभकेँ अपना संगे अयोध्या लेने जइअनु। ओहिठामक हालति एक बेर अपने आँखिए देखि लेताह ने तखन अपने सही रस्ता पकड़ि लेताह।समाधान एहन नहि हेबाक चाही जे समस्या आर गहींर भए जाए। अपितु,विचारशील व्यक्तिक कर्तव्य थिक जे ओ अपन आचरणसँ एकटा सुंदर भविष्यक रचना करए। भावी पीढ़ीक जीवन सुगम करए। एकटा बात नीकसँ बुझि लिअ जे युद्ध कोनो समाधान नहि अनैत अछि,अपितु,ओ नव-नव समस्या उत्पन्न कए दैत अछि।“

”जे आदेश माते!

 हम तुरंत मैथिलीपुत्रसँ एकांतमे भेंट करैत छी  अहाँक मनोभावसँ हुनका अवगत करबैत छी। सत्य पुछैत छी तँ हमहूँ बहुत दुबिधामे छी।कखनो काल होइत अछि जे दीर्घजीवन एकटा अभिशापे थिक। बहुत नीक होइत जे राम राज्याभिषेकक बाद हमहूँ चलि गेल रहितहुँ।“

”फेर ओएह बात। कालक गति महान अछि। जे हेबाक छैक से हेबे करतैक। ओकरा केओ बदलि नहि सकैत अछि,टारि नहि सकैत अछि। अहाँ वा हम निमित्त मात्र छी। मुदा मनुक्खकेँ अपन कर्तव्य तँ करबेक छैक।अहाँ आगू बढ़ू जाहिसँ कोनो नव अनर्थ नहि भए जाए से सुनिश्चित करू।“

जानकीक आज्ञा पाबि चिरञ्जीवी मैथिलीपुत्रसँ भेंट करबाक लेल बिदा भए गेलाह।

३७

 

वाल्मीकि आश्रमसँ कनीके फटकी तमसा नदीक कातमे चिरञ्जीवीक मैथिलीपुत्रसँ भेंट होइत छनि। शक्तिस्वरुपा सेहो हुनका लोकनिक चर्चामे सामिल भए जाइत छथि। जानकीधुजावाहिनीक  आब की करए? अचानक हुनका लोकनिकेँ मिथिला वापस गेनाइ संभव नहि अछि। ओ सभ सालक-साल ओहि दिनक प्रतिक्षामे कष्ट सहि रहल छथि,शक्ति संचय कए रहल छथि जाहिसँ जानकीक रक्षा होनि,हुनकर ससम्मान अपन घर वापसी होनि। मुदा जानकीसँ मुखापेक्षी भेलाक बाद ओ सभ चिंतामे पड़ि गेल छथि। जानकीसँ भेल चर्चक अनुसार चिरञ्जीवी कहलखिन-

”जानकीधुजावाहिनीक  ऊर्जाकेँ सकारात्मक दिशा देब जरूरी अछि। ओ सभ युद्ध-युद्ध चिचिआ रहल छथि। मुदा युद्ध करताह ककरासँ? एहिठाम तँ विचारक युद्ध अछि। खराप के छथि? केओ नहि। राजाराम स्वयं एहि घटनासभसँ बहुत दुखी छथि। सुनैत छी जे ओ जानकीक वियोगमे राति-राति भरि जगले रहि जाइत छथि,माटिपर पटिआपर पड़ल औनाइत रहैत छथि। हुनकर व्यक्तिगत जीवन नितांत दुखमय भए गेल छनि। ओ दिन-राति पश्चातापक आगिमे जरि रहल छथि। आब अहीं कहू जे हुनकासँ की कहल जा सकैत अछि। रहल बात अयोध्याक नागरिकक । से तँ कोनो एक गोटेक बात तँ छैक नहि। ओतहु पक्ष-विपक्ष अछि। समाजमे तरह-तरहक विचार चलि रहल अछि। सुनैत छी जे  ओ सभ जानकीक प्रश्नपर आपसेमे लड़ि जेबाक क्रममे छलाह। बहुत मोसकिलसँ हुनका लोकनिकेँ रोकल जा सकल। अयोध्यामे व्यक्ति-व्यक्तिक विचार अलग अछि। ओहिठामक समाजमे अखनहु राजारामक बहुत आदर छनि। तकर माने ई नहि जे हुनका सभक मोनमे जानकीक प्रतिए अनुराग नहि छनि। मुदा कोनो समाजमे सर्वसम्मति  होएब संभव नहि अछि। मुदा राजाराम तँ सर्वजन हितायक सिद्धांतक पक्षधर छथि। तेँ एहन घटना  भेल। जानकी स्वयं अयोध्या वापस जेबाक लेल उत्सुक नहि छथि। अखन हुनकर एकमात्र प्राथमिकता लव-कुशक पालन करब छनि। ओ सभ स्वस्थ रहथु, योग्य बनथु,शक्तिवान होथि,सएह हुनकर एकमात्र उद्येश्य छनि। ओ एहि लक्ष्यसँ कनीको एमहर-ओमहर जेबाक लेल तैयार नहि छथि। बुझलिऐक ने।“

”तखन कएल की जाए?“

”जानकीधुजावाहिनीकेँ  अयोध्या लेने जइअनु। ओ सभ अपने राजारामक हालति देखताह,ओहिठामक समाजसँ,लोक-वेदसँ मुखातिब हेताह। ओहिठामक परिस्थिति देखलाक बाद हुनकर सभक तामस अपने  कम भए जेतनि। तखन ओ सभ समस्याक भाग नहि बनताह,अपितु समाधान लेल प्रयास करताह।“

”एहिमे समाधान की हेतैक?जखन जानकी ओतए वापस जेबे नहि करतीह तखन केओ की कए लेत?“

”सभ किछु अखने किएक सोचि रहल छी? वाल्मीकि मुनि रामायणमे सभ किछु  लिखि चुकल छथि,भविष्यमे जे घटित होमए बला अछि तकरो वर्णन कए चुकल छथि। हमसभ अनेरे परेसान नहि रही। लव-कुश ओएह रामायणक गायन करए निकलि रहल छथि। हमहूँसभ ओहि रामायणक गायन सुनब। सभ किछु अपने स्पष्ट भए जाएत।“

चिरञ्जीवी  मैथिलीपुत्रकेँ आपसी चर्च शक्तिस्वरुपा बहुत ध्यानसँ सुनि रहल छलीह। ओ हिनका लोकनिक मार्गदर्शन करैत कहैत छथि-

”मिथिलावासीक भावनाक हम आदर करैत छी। हुनका लोकनिक भावनाक सम्मान  होनि से हमहूँ चाहैत छी,मुदा ताहि लेल धैर्य जरूरी अछि। कारण एक गलती दोसर गलतीक औचित्य नहि भए सकैत अछि। अस्तु,सभ किछु बिसरि अहाँसभ हिनका लोकनिकेँ अयोध्या लए चलू।“

”मुदा एतेक गोटे जेताह कोना?“

”हम सदति अहाँसभक संगे रहब। कोनो प्रकारक दिक्कति नहि होएत।“

”अखन धरि जे किछु भेल अछि से अहींक बले भेल अछि। आगूओ अहींक उम्मीद अछि ।“

”अहाँसभ निश्चिन्त भए आगू बढ़ू। हम छी ने।“

शक्तिस्वरुपाक आश्वासन पाबि मैथिलीपुत्र बहुत आश्वस्त रहथि। समस्त मुक्तिवाहिमीक संगे ओ सभ ब्राह्मी मुहुर्तमे अयोध्याक लेल प्रस्थान कए देलनि। ओहिठामसँ बिदा होएबासँ पूर्व ओ सभ जानकीक सम्मानमे प्रार्थना केलनि,वाल्मीकि मुनिकेँ स्मरण केलनि। बिदा होएबासँ पूर्व सभ गोटे  एकस्वरसँ बाजि उठलाह-

”जयति जानकी!“

” जय मिथिला!“

सैकड़ों जानकीधुजावाहिनीक  काफिला चलि पड़ल। ओ सभ बहुत उत्साहमे छलाह। तरह-तरहक गीत-नाद कए रहल छलाह। ओहि गीतसभक प्रतिध्वनि जानकीक कान धरि पहुँचलनि-

”एतेक भोरे एतेक मधुर गीत  के गाबि रहल अछि? एहिमे हमर नाम,राजारामक नाम बेर-बेर लेल जा रहल अछि।“

”ई सभ अहींक नैहरक लोक छथि । सालोंसँ एहि जंगलमे बाट ताकि रहल छलथि ओहि शुभ क्षणक जखन अहाँ फेर अयोध्याक रानी बनब। लव-कुश से अपन अधिकार प्राप्त करताह।“

”हम फेर रानी बनब? “- से बाजि जानकी  जोरसँ अट्टहास करए लगलीह। ओ  कहैत छथि-

” लव कुश ककरो मदतिक मुखापेक्षी नहि छथि। ओ सभ अपन अधिकार प्राप्त करबामे सक्षम छथि। फेर वाल्मीकि मुनिक आशीर्वाद  हुनका संगे छनिहे।“

”अबस्स,अबस्स।लव-कुश जे चाहताह से कए लेताह। एहिमे कोनो सक नहि।“-चिरञ्जीवी बजलाह।

ओमहर जानकीधुजावाहिनी  अपन यात्रामे आगू बढ़ैत रहलाह। अयोध्या जेबाक क्रममे ओ  सभ फेर गोमतीक कातमे आबि गेल रहथि जाही बाटे ओसभ  गेल रहथि। साँझ पड़ि रहल छल। अस्तु,मैथिलीपुत्र कहलखिन-

”आजुक राति हमसभ एतहि विश्राम करब।“

३८

 

मैथिलीपुत्रक नेतृत्वमे सैकड़ों जानकीधुजावाहिनी  भोरे गोमती नदीमे स्नान केलथि,पूजा-पाठ केलथि,किछु जलखै केलथि आ  भजन-कीर्तन करैत अयोध्या दिस बिदा भेलाह । ओसभ आनन्दमे छलाह जे अयोध्यामे राजारामसँ भेंट हेतनि । हुनका तँ एक्के बेरमे मना लेथिन , जानकी जल्दीए वापस अयोध्या लौटि जेतीह। राजाराम तँ हुनकर अपने छथिन तखन समस्या कथीक? अयोध्यासँ दस कोस फटकीए ओ सभ छलाह कि लोकक अपार भीड़ देखेलनि। सौंसे रस्ता लोकेसभ भरल छल। नाना प्रकारक वाहनसभमे लोकसभ नचैत-गबैत जा रहल छलाह। जकरे देखू सएह राजारामक प्रशंसामे जयगान कए रहल छलाह। मैथिलीपुत्रकेँ बुझेबे नहि करनि जे बात की छैक? एतेकगोटे सड़कपर कतएसँ आबि रहल छथि , कतए जा रहल छथि? ओना ओ सड़क तँ अयोध्ये  जा रहल छल। मुदा अयोध्यामे एहन कोन बात भेल जे ओकर आसपास एतेक लोक उपस्थित  भए रहल छथि?की राजाराम दोसर बिआह कए रहल छथि? कोन ठेकान?आखिर  राजा थिकाह । राज चलेबाक हेतु शांत मोन चाही,जीवनमे स्थिरता चाही। दिन-राति अशांत परिवेशमे रहनिहार राजा अपन जनताकेँ की सुख देत? भए सकैत अछि जे सलाहकारलोकनि हुनकापर  हाबी भए गेल होनि। अन्यथा,राजाराम तँ एहन नहि छथि।अछैत जानकीकेँ ओ दोसर बिआह करताह से विश्वास नहि भए रहल अछि। तखन समयक कोन ठेकान?ककर मोन कोन दिशामे पलटी लेत के जनैत अछि?

मैथिलीपुत्र चिरञ्जीवी संगे विचार-विमर्श करैत छथि-

”की बुझा रहल अछि?अयोध्याक लगपासमे एतेक भीड़ किएक अछि?“

”बात तँ सही कहि रहल छी। मुदा एहि प्रश्नक सही उत्तर के देत?“

”ओएहसभ कहि सकैत अछि।“

”सभ तँ नाच-गानमे मस्त अछि।ककरो होस छैक जे किछु बाजत,कोनो प्रश्नक उत्तर देत?“

”सभटा अपने किएक सोचि लैत छी?एक बेर पुछि कए तँ देखिऔक।“

”सही कहलहुँ।“

मैथिलीपुत्र सामनेसँ जा रहल लोकसभकेँ प्रणाम करैत छथि । फेर  विनयपूर्वक पुछैत छथिन-

”अहाँसभ कतए जा रहल छिऐक?“

”सएह कहू। अहाँकेँ एतबो नहि बुझल अछि?एकर माने अहाँसभ अयोध्याक नहि छी।“

”सही अनुमान लगओलहुँ।हमसभ मिथिलावासी थिकहुँ,जानकीक नैहरसँ आबि रहल छी।“

”ओह तखन तँ अहाँसभ अत्यन्त आदरणीय पाहुन थिकहुँ। हमसभ अपनेलोकनिक कोन तरहेँ स्वागत करी से नहि बुझा रहल अछि?“

”पहिने ई तँ बुझिऐक जे बात की छैक?हमसभ तँ घरबैए छी। स्वागतक कोन बात भेलैक।हमरसभक बहिनोइकेँ पता लगतनि तँ ओ अपने दौड़ि जेताह।“

”अहाँ हमरालोकमनिकेँ लज्जित नहि करू।हमसभ एहिठाम छी तखन राजारामकेँ किएक परेसानी हेतनि।हमहीसभ अपनेकेँ हुनका लग लए चलब। मुदा ओ तँ “,”

“कहू,कहू ।ओ की कए रहल छथि,कतए छथि?इएह तँ हमसभ जानए चाहैत छी।”

“राजाराम अपन अनुजलोकनिक संगे अश्वमेध यज्ञ कए रहल छथि। हमहूँसभ ओतहि जा रहल छी।सड़कपर जे असंख्य जनसमुदाय अपनेसभ देखि रहल छी से सभ ओमहरे जा रहल अछि।”

“मुदा हमसभ ओहि स्थानपर केना पहुँचि सकब? हमसभ छीहो बहुतगोटे । प्रहरीसभ अनठिआ बुझि कहीं रस्तेमे ने रोकि लिअए।”

“अहाँसभ तकर चिंता नहि करू। बस हमरासभक संग भए जाउ।”

“बहुत नीक बात कहलहुँ।”

तकर बाद मैथिलीपुत्र आ चिरञ्जीवी  जानकीधुजावाहिनीक संगे  अश्वमेध यज्ञ मण्डप दिस बिदा भेलाह। मोने-मोन आश्चर्य होनि जे अयोध्याक लोकसभमे जानकीक प्रतिए एतेक अनुराग अखनहु छनि।तेँ ने हमरासभकेँ एतेक आदर कए रहल छथि। हमसभ अनेरे अनुरंजित छलहुँ। की की ने  सोचि रहल छलहुँ। नीके भेल जे हमसभ अयोध्या आबि गेलहुँ। एहिठामक तँ हबे बदलल लगैत अछि।

अयोध्यासँ थोड़बे फटकी विशाल पण्डाल लागल छल। पण्डाल की छल ,अपना-आपमे ओ एकटा नगर छल। अनेक द्वारसँ तरह-तरहक लोकसभक आवागमनक सुविधा छल। ऋषिलोकनिक लेल फराके एकटा विशाल पण्डाल लगाओल गेल छल। सभकेँ  सुविधा संपन्न अलग-अलग कोठरी देल गेल छल। ऋषिलोकनि ब्राह्मी मुहुर्तमे उठि कए वेदमंत्रोच्चार करए लगैत छलाह। ओहिठामक वातावरण संस्कार आ भक्तिसँ भरल छल। अनेक देशक राजालोकनि अपन-अपन आबासमे सुव्यवस्थित छलाह।

व्यवस्थापकलोकनिकेँ जखने पता लगलनि जे मिथिलासँ सैकड़ों लोकसभ अश्वमेध यज्ञस्थलीपर उपस्थित छथि तँ हुनका लोकनिक बहुत स्वागत केलकनि। सभ गोटे के रहबाक लेल पृथक पण्डाल लगाओल गेल। ओहिठामसँ मुख्य यज्ञस्थली ठीक सामनेमे छल।

यज्ञमण्डप लग पहुँचि जानकीधुजावाहिनी चिंतामे पड़ि जाइत छथि-

 हो रामा!

ई की देखि रहल छी?

चारूकात सजल-धजल अयोध्या नगरिआ

नचैत-गबैत लोक-वेद

नगरमे चारूकात बजैत अछि बधैआ

अश्वमेध यज्ञ कए रहल छथि

चक्रवर्ती राजाराम

मुदा जानकी बना देल गेल छथि

सोनाक मुरुत

हाय हो राम

ई की  देखि रहल छी

किए केने छी

एहन अन्याय हे राजाराम

छगुन्तामे अछि प्राण

हमसभ मिथिलासँ

 ई देखबा लेल

नहि आएल छलहुँ

मोनमे आशा छल

जे कतहु ने कतहु प्रेमक विजय होएत

राजारामक हृदयमे सदति विराजित छथि जानकी

से अश्वमेध यज्ञोमे

बामाँ दिस रहतीह विद्यमान

हे विधाता !

नहि बुझि सकलहुँ

अहाँक विधान

जानकी जीविते बनल छथि

मुरुत समान

“ई की देखि रहल छी? जानकीक सोनाक मुर्ति राजारामक बामाँ भागमे लगाओल गेल अछि। की जानकी यज्ञोमे नहि बजाओल जेतीह ?-मैथिलीपुत्र पुछलखिन।”

“देखैत रहिऔक ने ,आगू की की होइत छैक। सामने दहिना कातक पण्डालमे वाल्मीकि मुनि देखा रहल छथि। देखा चाही ओ की करैत छथि?”

“वाल्मीकि मुनि सेहो आएल छथि?”

“हँ यौ। ऊपर दिस आउ ने।अपने देखबनि।”

“आ जानकी,लव-कुश?की ओहोसभ आएल छथि?”

“धैर्य राखू।अखन बहुत किछु देखबाक अवसर भेटत।”

३९

 

जानकीकेँ वाल्मीकि आश्रममे रहैत बारह वर्ष बीति गेलनि।लव-कुश आब छेटगर भए गेल छथि। वाल्मीकि मुनिक असीम कृपासँ ओ सभ सभ तरहक विद्यामे निपुण भए गेल छथि। संगीत गायनमे सेहो हुनकालोकनिकेँ महारत प्राप्त भए गेल छनि। वाल्मीकि मुनि स्वयं दुनू भाइकेँ साँझमे रामायण गायनक प्रशिक्षण दैत छलाह।परिणामतः संपूर्ण वाल्मीकि रामायण हुनकासभकेँ कंठाग्र भए गेल छनि। ओ सभ जखने रामायण गायन शुरू करैत छथि कि चारूकातक लोकसभ निःशब्द भए ओकरा सुनैत छथि। सभक आँखिसँ धाराप्रवाह अश्रु प्रवाह होमए लगैत छनि। केओ अपना वशमे नहि रहि जाइत छथि। वाल्मीकि रामायणमे रामक भविष्यक जीवनक वर्णन सेहो कएल गेल अछि। वाल्मीकि मुनि अपन दिव्यशक्तिसँ तकरा अपन शब्दमे रामायणमे उतारि देने छथि। अस्तु,जानकीक जीवनमे जे किछु घटित भए रहल छनि,किंवा राजारामक संगे भविष्यमे जे किछु होमए बला छनि से वाल्मीकि मुनि बुझि रहल छथि। आब बस लोकसभकेँ ओकरा बुझबाक छैक। तेँ ने वाल्मीकि मुनि दुनू बालककेँ रामायण गायनमे निपुण केलनि अछि।

वाल्मीकि मुनिकेँ राजाराम द्वारा आयोजित अश्वमेध यज्ञक निमंत्रण भेटि चुकल छनि। ओ एहि अवसरक उपयोग किछु विशेष रुपमे करबाक योजना बना चुकल छथि। एहि विषयमे वाल्मीकि मुनि वनदेबीकेँ सूचना दैत छथि।परंतु,हुनका एहि यज्ञमे जेबाक कनीको मोन नहि होइत छनि।ओ वाल्मीकि मुनिसँ कहैत छथि-

“जखन राजाराम स्वयं हमरा नहि बजओलथि तखन हम ओहिठाम आर अपमानित हेबाक लेल किएक जाउ?”

“आब प्रश्न अहाँक मान-सम्मानक नहि अछि वनदेबी। लव-कुश छेटगर भए चुकल छथि।  सभ तरहेँ सुयोग्य छथि। उचित अछि जे राजाराम हुनका अपन संतानक रुपमे  स्वीकार करथि आ हुनकासभकेँ अपन अधिकार देथि। ताहि लेल हमरा जनैत ई बहुत उपयुक्त अवसर अछि। ओहिठाम अनेक ऋषि-मुनि आएल छथि। वशिष्ठ मुनि सहित अनेक विद्वान लोकनि सेहो उपस्थित छथि। हमरो निमंत्रण भेटि चुकल अछि।  हम जेबो करब। उचित अछि जे लव-कुश अहाँ संगे ओतए चलथि।”

“मुदा यदि हमरा संगे सम्मानजनक व्यवहार नहि भेल तखन?”

“हम छी ने अहाँक संगे। हमरा रहैत अहाँकेँ के किछु कहि सकत?”

“तखन अहाँ जे कही।”

“हमरा जे कहबाक छल से कहि चुकल छी।काल्हि भोरे हमसभ यज्ञस्थली लेल बिदा होएब। लव-कुश रस्ते-रस्ते रामायणक गायन करैत रहताह। देखबैक की हाल रहैत छैक। हिनकर सभक रामायण गायनमे से जादू अछि जे समस्त अयोध्याक लोक अहाँक दंडवत भए जेताह।”

“यद्यपि अपनेक विचार उत्तम अछि,अपने हमरसभक कल्याण चाहैत छी,मुदा हमर मोन अखन अयोध्या जेबाक लेल तैयार नहि होइत अछि। अहाँ लव-कुश संगे जाउ। यदि ओतए गेलाक बाद हमर अएनाइ उचित बुझाए तखन हमरा समाद पठा देब। हम चिरञ्जीवीक संगे ओतए आबि जाएब।”

वाल्मीकि मुनि  लव-कुशकेँ आदेश करैत छथि-

“अहाँ दुनू भाइ यज्ञस्थलीपर जाउ आ राजारामकेँ हमर रामायण सुनाउ।”

“जे आज्ञा आचार्यवर!”

४०

 

वाल्मीकि मुनि लव-कुशक संग यज्ञमे भाग लेबाक लेल अपन आश्रमसँ प्रस्थान  कए चुकल छथि। जानकी हुनकासभक संगे नहि गेलीह,नीक नहि लगलनि अयोध्या जाएब ,ओहो एहि हालतिमे। आइ ओ महारानी बनि राजारामक बामाँ भागमे विराजित रहितथि। से जानकी कोन मुँहे ओतए जेतीह। ओ तँ ओहिठामसँ निर्वासित कए देल गेल छथि। जानकीक अयोध्या छोड़ला बारह वर्ष बीति गेल। तकर बाद सँ केओ ओहिठामसँ हुनकर हाल-चाल नहि लेलक। एहन परिस्थितिमे जानकी ओहिठाम कोना जइतथि। बितल बातसभ सोचि-सोचि  जानकी अखरे चौकीपर पड़ल-पड़ल कानि रहल छथि। चौकी नोरसँ भिजि गेल अछि। हुनकर ई दशा देखि आश्रमवासी स्त्री लोकनि परेसान भए गेलथि। की करथि से बुझेबे नहि करनि।लव-कुश लगमे रहथिन तखन तँ ओ दिन-राति हुनकेसभमे लागल रहैत छलीह। मुदा ओहोसभ चलि गेल छथिन। वाल्मीकि मुनि से चलि गेल  छथि। अन्यथा भोर-साँझ हुनकर आश्रमक आरती आ तकर बाद होमए बला भजन-कीर्तनमे जानकीक मोन बहटि जाइत छलनि। मुदा अखन तँ हुनका एकदम सुन्न लागि रहल छनि। स्वाभाविक रुपसँ ओ आत्मलीन भए गेल छथि। बिसरल बात सभ एक-एक कए मोन पड़ि रहल छनि।

“केना राम संगे प्रथमे दृष्टिमे हुनका प्रेम भए गेलनि। कतेक नीक हुनकर व्यवहार छलनि। केना ओ स्वयंवरमे देखिते-देखिते शिव धनुषकेँ तोड़ि देलनि। जे धनुष रावण सन प्रतापी राजा उठा तक नहि सकल छल तकरा राम तर दए खंड-खंड कए देलनि। इएह तँ ईर्ष्याक कारण बनि गेल छल। रावण अवसर भेटितहि तकर बदला लेलक आ पंचवटीसँ जानकीकेँ छलपूर्वक हरि लेलक। तहिआसँ रावणक मृत्यु पर्यंत जानकी ओकर अधीन रहलीह। कुल एगारह महिना चौदह दिन लंकामे बिताओल गेल समय हुनका लेल सैकड़ों साल लगैत छलनि। एक-एक दिन बिताएब मोसकिल भए गेल रहनि। रावण हुनकर मनोबल तोड़बाक कोनो कसरि नहि छोड़ने छल। ओ साफे कहि देने रहनि-

”नीकसँ सुनि लएह। यदि साल भरिक भीतर सहर्ष हमरा संगे बिआह नहि करबह तँ ई राक्ष्सीसभ तोरा खंड-खंड कए तोहर माउसकेँ उसनि कए खाएत। कोनो हालतिमे तूँ बचि नहि सकबह। तेँ यदि अपन नीक चाहैत छह तँ यथाशीघ्र हमरासँ बिआह कए लएह आ लंकाक रानी बनि जेबाक सौभाग्य प्राप्त करह।“

मुदा जानकी तँ जानकी छलीह। ने जानक परिबाह छलनि ने रावणक राजक। हुनकर तँ बस एकमात्र आराध्य कही,प्रेमी कही,पति कही सभ राजा रामे छलाह आ छथिहो। ओ अपन विचारपर  अड़ल रहलीह । आखिर रावण मारल गेल। ओकर समस्त परिवार नष्ट भए गेल। राजारामक सहयोगी  रहबाक कारण मात्र विभीषण बाँचि सकलाह। राजाराम द्वारा लंका विजयक बाद ओएह राजा भेलाह। जानकीकेँ ई शुभ समाचार भेटलनि। हुनकर प्रसन्नताक तँ अंते नहि छल। आखिर राजारामसँ भेंट हेबाक समय आबि गेल। जानकीकेँ मोन पड़ रहल छनि ओ बात सभ।ओ फेर जोर-जोरसँ कानए लगैत छथि। लगपासमे ठाढ़ आश्रमवासी स्त्री लोकनि गुम्म छथि। की करथि की नहि से फुरा  नहि रहल छनि। ओ सभ जानकीकेँ थोड़े काल एकांतमे  छोड़ि देलनि जाहिसँ ओ शांत भए सकथि।

जानकीकेँ मोन पड़लनि ओ क्षण जखन विभीषण अनेक सहयोगीक संगे हुनका सजा-धजा कए रामक सामने रथ सँ लए जेबाक ओरिआन केने छलाह  मुदा राजाराम कहलखिन-

”जानकीकेँ हमरा लग पैरे अनिअनु जाहिसँ अधिक सँ अधिक  लोक हुनका देखि सकनि। ओ सभ हुनकर दर्शन लेल व्याकुल छथि।“

राजारामक इच्छानुसार सभ तरहेँ सजल-धजल जानकी पैरे-पैरे राजारामक लगीच पहुँचैत छथि। जानकीक प्रसन्नता  अवर्णीय छल। हुनका एक-एक क्षण बिताएब मोसकिल भए रहल छलनि। आब राजाराम बहुत लगीच आबि गेल छलखिन कि ओ कहैत छथिन-

”हम ई युदध अहाँ लेल नहि केलहुँ। अपितु,हमर लक्ष्य छल अपन आत्मसम्मान आ रघुकुलक प्रतिष्ठाक पुनर्स्थापित  करब। रावणक मृत्यु आ लंका विजयक संग से हम प्राप्त कए चुकलहुँ। आब अहाँ स्वतंत्र छी। अहाँ जतए चाही जा सकैत छी।“

सोचिऔ, हमरा लेल राजारामक ओ शब्दसभ केहन घातक लागल छल। होअए जे तुरंत जहर-माहुर खा ली। आब जीबिए कए की करब,ककरा लेल जिअब? हम जिनका लेल एतेक दिनसँ सभ तरहक कष्ट सहलहुँ सएह राजाराम की कहि रहल छथि? खैर! ओहिठाम उपस्थित सभ गण-मान्य लोकनि राजारामकेँ मनओलखिन । तथापि,ओ हमर अग्निपरीक्षाक लेल अड़ि गेलथि। हम सेहो मानि लेलहुँ। हम सभ तरहेँ सही रही,सभ दिन राजारामकेँ समर्पित रही ,तेँ हम ओहि परीक्षोमे सफल भेलहुँ। हम सभ अपमान सहि गेलहुँ। भेल जे राजाराम सहज मानवीय त्रुटिक सिकार भए गेल छथि,कालांतरमे ताहि भावसँ उबरि जेताह। हुनका एकटा अवसर देल जेबाक चाही। बात यदि एतबे सँ बनि जाइक तँ हमरा मानि लेबाक चाही।”

अग्निपरीक्षामे सभ तरहेँ शुद्ध घोषित भेलाक बादे हम राजारामक संग वापस अयोध्या अएलहुँ। हुनकर राज्याभिषेकक बाद हुनकर रानी बनलहुँ। मुदा दुर्भाग्य फेर हमर पछोड़ केलक। तकर बाद तँ जे भेल से देखिए रहल छी।“

४१

 

अयोध्या सहर आइ नवकनिआँ जकाँ सजल अछि । चारूकात अनेक प्रकारक सामिआना लगाओल गेल अछि। सामिआनासभमे  तरह-तरहक चित्र सभ उकेरल गेल अछि। यज्ञस्थल दिस जा रहल मार्गसभपर गलैचा ओछाओल गेल अछि। रस्ताक दुनू दिस सुंदर सुगंधित फूलसभ मह-मह कए रहल छल। अयोध्या आ लगपासक वातावरण राममय भए गेल अछि। जतहि देखू,जकरे देखू से राजारामक प्रशंसामे गीत गाबि रहल अछि,हुनकर जयगान कए रहल अछि। ऋषि,मुनि लोकनि मंत्रोच्चार कए रहल छथि। राजाराम अपन तीनू भाइ,गुरु वशिष्ठ आ अन्य वरिष्ठ ज्ञानीलोकनिक संग यज्ञस्थलीमे विद्यमान छथि। ओही समयमे दूटा बालक वाल्मीकि रामायणक सस्वर पाठ करैत यज्ञस्थलीमे प्रवेश करैत छथि। हुनकर सभक गायन ततेक मधुर छनि,ततेक अर्थपूर्ण छनि जे यज्ञस्थलीमे उपस्थित लोकसभक  ध्यान तुरंत घिचि लैत छनि। ओहि समयमे चारूकात शांति पसरि जाइत अछि। जे जतहि अछि ओतहि मुरुत जकाँ ठहरि जाइत अछि। राजाराम स्वयं बहुत ध्यानसँ ओहि गीतकेँ सुनैत छथि। गीत सुनैत-सुनैत ओ मोनमे विचारैत छथि-

”एहि गीतमे तँ हमरे जीवनक कथा कहल गेल लगैत अछि?“

”ई बालकसभ के छथि?हिनका ई सभ के सिखओलकनि?“

”ई सभ तँ हमर जीवनकेँ अक्षरसः उकेरि कए राखि रहल छथि।“

”अहाँसभ के छी?एहिठाम कोना अएलहुँ?एहि गीतक रचनाकार के छथि?हमरा से सभ विस्तारपूर्वक बताउ।“-राजाराम पुछलखिन।

”मान्यवर! अपनेक जय होअए। हमसभ वाल्मीकि मुनिक शिष्य छी। वनदेबी हमर माता छथि। हमर इएह परिचय थिक । आर किछु नहि। हम जे गीत गबैत छी तकर रचयिता गुरुदेव वाल्मीकि स्वयं छथि। ओएह हमरासभकेँ एकरा गेबाक अभ्यास करओलनि।  हुनके आज्ञासँ हमसभ आइ अपनेक सामने एकरा गाबि रहल छी।“

”हम अहाँसभक गायनकलासँ,अहाँक प्रतिभासँ बहुत प्रभावित भेलहुँ । हम अहाँसभकेँ किछु पुरस्कार देबए चाहैत छी। अहाँ एकरा सहर्ष स्वीकार करू।“

राजारामक इसारा पाबि सोनासँ भरल झोरा हुनकासभक हाथमे देल जाइत छनि। मुदा लव-कुश ओहि झोराकेँ छुबितो नहि छथि।

”नहि,नहि। हमसभ  तँ जंगलमे रहैत छी,ओहीठामक फल-फूलपर जीबैत छी। हमरा सभकेँ एकर कोन काज?अपने एकरा वापस लेल जाओ।“

लव-कुशकेँ एना बजैत सुनि राजाराम चकित छलाह। हुनका बुझबामे देरी नहि भेलनि जे वाल्मीकि रामायण हुनके जीवन प्रसंगपर आधारित अछि। एहिमे हुनकर  जानकीक सेहो चर्च अछि। एहिसभ बातपर विचार कए ओ वाल्मीकि मुनिकेँ समाद पठबैत छथि। समदिआ वाल्मीकि मुनिकेँ हुनकर पण्डालमे भेंट करैत छथि आ विनयपूर्वक राजारामक समाद कहैत छथि-

ऋषिवर!

सादर प्रणाम!

यज्ञस्थलीमे लव-कुशक रामायण गायनसँ राजाराम बहुत प्रभावित छथि।  अपनेक रचित रामायणक मर्म बुझि गेल छथि। ओ जानि गेल छथि जे रामायण वस्तुतः हुनके जीवनीपर आधारित  अछि। जानकी लेल हुनका मोनमे बहुत आदर छनि। मुदा लोकलाजोक किछु महत्व होइत छैक। अयोध्यावासीक आपत्ति उठओलेपर राजाराम जानकीकेँ निर्वासित करबापर विवश भेल रहथि। ताहि बातक दुख हुनका मोनमे बहुत छनि। ओ तहिआसँ पश्चातापक आगिमे जरि रहल छथि। हुनका लगैत छनि जे ओहि निर्णयक समीक्षाक लेल उपयुक्त समय आबि गेल अछि। राजारामक इच्छा छनि जे जानकी यज्ञशालामे आबथि आ सभक सामनेमे अपन सुचिताक लेल सपथ खाथि जाहिसँ ओ हुनका फेरसँ स्वीकार कए सकथि।

”कोनो हरजा नहि। पतिक इच्छाक सम्मान करब पत्नीक धर्म थिक। जानकी राजारामक आज्ञाक अनुसार काल्हि भरल सभामे उपस्थित हेतीह।“-वाल्मीकि मुनि बजलाह।

समदिआ हुनका प्रणाम कए चलि जाइत रहल। ओ सोझे राजाराम लग पहुँचैत अछि। ओ हुनका वाल्मीकि मुनिसँ भेल सभटा बात हुनका एकांतमे कहैत छनि। ओ समदिआक बात सुनि कए बहुत प्रसन्न छथि।

यज्ञशालामे लव-कुशक वाल्मीकि रामायणक मधुर गायन सुनि राजाराम विचार मग्न भए गेलथि। ओ वाल्मीकि मुनिकेँ निस्संदेह समाद पठा देलखिन ,लव-कुशकेँ अपना भरि प्रोत्साहितो केलखिन,मुदा बात ने एतबे रहैक ने राजाराम ओतहि रुकल छलाह। ओ राति भरि जगले रहि गेलाह,करोट बदलैत रहि गेलाह,जेना हुनकर इएह नियति होनि। ओ बुझि गेल छलाह जे लव-कुश के छथि,मुदा जानकीकेँ कोना मनाओल जा सकत से मूल प्रश्न छल। कारण जाहि तरहेँ हुनका बिना विश्वासमे लेने जंगल पठा देल गेलनि से ओ कोना बिसरि सकैत छलीह? ओहो कोनो मामूली स्त्री नहि रहथि। जनकक बेटी मिथिलाक सम्मानित बेटी छलीह। फेर हुनकर कोनो दोष नहि छलनि। ओ तँ सभदिन राजारामकेँ मोनसँ चाहैत रहलथि,हुनकेटा मानलथि। मुदा परिस्थिति कहिओ संग नहि देलकनि। पराधीन रहितहुँ ओ अपन निष्ठा आ आत्मसम्मानकेँ बचओने रहलथि। मुदा लोक के की कहि रहल अछि तकर ओ की करितथि? राजारामक निर्णय कतहुसँ न्यायपूर्ण नहि लगैत छलनि। तखन  कोन मुँहे जानकीसँ निवेदन करितथि?

ओमहर वाल्मीकि मुनि चिरञ्जीवीकेँ सभ बात बुझा कए वनदेबी लग आश्रम पठबैत छथि। चिरञ्जीवी वाल्मीकि मुनिक समाद लए जानकी लग पहुँचैत छथि। ओ जानकीकेँ वाल्मीकि मुनिक समाद कहैत छथिन। मोनमे हुनको यज्ञ देखबाक इच्छा रहबे करनि । ओहिठाम लव-कुश द्वारा गाओल गेल रामायणक बारेमे नीकसँ बुझबाक उत्सुकता रहबे करनि। ऊपरसँ ओ आश्रममे एसगरि बहुत परेसान भए गेल रहथि।  ओ वाल्मीकि मुनिक आदेश मानि लेबेमे उचित बुझलनि।

वाल्मीकि मुनिक आग्रहपर जानकी अहल भोरे चिरञ्जीवीक संग राजारामक यज्ञस्थली लेल बिदा भेलथि। जानकी आइ बहुत दिनक बाद एतेक नीकसँ सजल छथि। बहुत दिनसँ पेटीमे राखल गहनासभ पहिरि लेने छथि। लंकासँ अयोध्या अएलाक बाद जे साड़ी पहिरने रहथि सएह आइओ पहिरि लेने छथि। यज्ञस्थलीसँ कनीके फटकी बनल पण्डालमे वाल्मीकि मुनि ठहरल छलाह। जानकी चिरञ्जीवी संगे ओतए पहुँचैत छथि। वाल्मीकि मुनि जनाकीकेँ एहि-तरहेँ सजल-धजल देखि प्रसन्न होइत छथि। ओ जानकीकेँ सादर प्रणाम करैत छथि।

जानकी वाल्मीकि मुनि संग हुनकर पण्डालमे रहैत छथि। हुनकर एतए आगमनक जनतब ककरो नहि देल जाइत छनि। वाल्मीकि मुनिक पण्डालमे जानकी चुपचाप बैसल छथि। एहन परिस्थितिमे एकांतमे जानकीक मोनमे तरह-तरहक प्रश्न-प्रतिप्रश्न उठि रहल छनि।

”आइ हमरा एहि यज्ञमे राजारामक बगलमे बैसल रहबाक छल। मुदा हमरा बदलामे हमर सोनाक मुरुत बना कए राखल गेल अछि। कहू ई केहन बात भेल? जीबैत आदमीक बदला ओकर मुरुतक पूजा कएल जाएत? ई तँ घोर अन्याय थिक।“

”हमरा एहिठाम अएबेक नहि चाहैत छल। भने पड़ल छलहुँ जंगल-झारमे। मुदा वाल्मीकि मुनि हमरा एहिठाम बजा लेलनि। हमहूँ अपन संतानक मोहमे मना नहि कए सकलिअनि। जानकीक आब की बाँचले रहि गेल छनि। तखनतँ लव-कुशकेँ हुनकर न्यायोचित स्थान भेटि जानि। बस हमर दायित्व समाप्त भए जाइत। सएह सोचि सभ बातकेँ बिसरि बाल्मीकी मुनि बात मानि हम एहिठाम धरि आबि गेल छी। देखा चाही नियति की चाहैत अछि।“

 

 

 

 

४२

 

 

यज्ञशालाक मध्यभागमे बनल मंचपर  राजाराम अपन तीनू भाइलोकनिक संग विराजमान छथि। हुनकालोकनिक दुनूकात प्रतिष्ठित ऋषि मुनि लोकनि आसन ग्रहण केने छथि। मुनि वशिष्ठ,विश्वामित्र सहित रघुकुलसँ जुड़ल अनेक संत-महात्मा अपन-अपन स्थानपर बैसि गेल छथि। मिथिलासँ आएल सैकड़ों जानकीधुजावाहिनी  मैथिलीपुत्रक संगे मंचक ठीक सामने बनल पण्डालमे बैसि गेल छथि। राजारामक सामने कनीके फटकी छोटसन मंच बनाओल गेल अछि जाहिठाम ठाढ़ भए लव-कुश रामायण गायन करताह। हुनकर पाछू वाल्मीकि मुनि ठाढ़ छथि। वाल्मीकि मुनिक पाछू जनकनन्दिनी जानकी मुँह नीचाँ केने ठाढ़ि छथि। सभ गोटे केँ एहि तरहेँ आएल देखि राजारामक सचिव हुनकासँ आज्ञा लैत छथि-

”अपनेक आज्ञा होअए तँ  आजुक कार्यक्रम प्रारंभ कएल जाए।“

”आज्ञा अछि।“

सभामे सभक सहमति देखि वाल्मीकि मुनि वक्तव्य प्रारंभ केलनि-

”मंचपर विराजमान राजाराम,हुनकर भाइ लोकनि, ऋषि,मुनि सहित एतए उपस्थित समस्त श्रोतालोकनि ध्यानसँ सुनथि। हम अपन जीवन भरिक तपस्यासँ अर्जित पुण्यकेँ साक्षी मानि सपथपूर्वक कहैत छी जे जीवनमे हम कहिओ झूठ नहि बजलहुँ,जे हम जे किछु कहए जा रहल छी से परम सत्य अछि । एहि तरहेँ सपथपूर्वक हम कहैत छी जे लव-कुश राजारामक संतान छथि। ओ सभ हुनकर उत्तराधिकारी छथि।  राजाराम हुनका एहि तरहेँ सहर्ष स्वीकार करथि।

हम ईहो स्पष्ट करैत छी जे जनकनन्दिनी जानकी परम पवित्र छथि। हम अपन दिव्यशक्तिसँ सभ तरहेँ जाँचि लेलाक बाद आ ई आश्वस्त भेलाक बादे जे जानकी सभ तरहेँ पवित्र आ निष्कलंक छथि,हुनका अपन आश्रममे रखने छलिअनि। ओ सभ तरहेँ राजारामकेँ समर्पित रहलीह आ छथिहो। हुनकर राजारामक प्रतिए निष्ठा अक्षुण छनि।राजाराम निश्चित रुपसँ हुनका अपन पत्नीक रुपमे ग्रहण करथि।“

वाल्मीकि मुनिकेँ एहि तरहेँ स्पष्ट रुपसँ जानकीक आ लव-कुशक समर्थनमे अपन बात रखलाक बाद सौंसे सभागार जय जानकी ! जय जानकी!क नारा लगबए लागल। जानकीधुजावाहिनी एकस्वरमे बाजि उठलाह-

”जानकीक सम्मानक रक्षा कएल जाए। हुनका ससम्मान सोनाक जानकीक मुरुतकेँ हटा कए राजारामक बामाँ भागमे मंचपर बैसाओल जाए। तखनहि ई यज्ञ सफल मानल जाएत।“

यज्ञस्थलीमे उपस्थित अयोध्यावासी सेहो जानकीक समर्थनमे उच्च स्वरसँ बाजि उठलाह-

”हमसभ सेहो जानकीक ससम्मान अयोध्या वापसी चाहैत छी। ओ  हमरसभक रानी थिकीह । जहिना राजाराम तहिना जानकी सेहो आदरणीया छथि। हुनका तुरंत अपन स्थान भेटनि। लव-कुश हमरसभक युवराज बनथु। आब बहुत भए गेल। हुनकासभकेँ आर कष्ट देब कतहुसँ उचित नहि होएत। जानकी संगे बहुत अन्याय केलथि अयोध्यावासी। अपन व्यवहार आ विचारमे उचित परिवर्तन आनि ओ सभ  जल्दीसँ एहि कलंकसँ मुक्ति होथु।“

राजाराम सभक बात सुनलनि। बहुत गंभीरतासँ ओहि बातसभपर विचार केलनि। कखनहु अपन भाइसभ दिस देखथि तँ कखनहु मंचपर विराजमान ऋषि-मुनि दिस । मुदा किछु बाजि नहि पाबथि।

ओमहर जानकीक मनोदशा बहुत चिंताजनक भेल जा रहल छलनि। जखनसँ ओ यज्ञस्थलीमे पैर धेलीह आ राजारामकेँ सामने देखलीह तखनेसँ हुनका जेना लकबा मारि देलकनि। ओ आश्चर्यचकित छलीह जे राजाराम हुनका देखिओ कए मौन किएक छथि,किएक ने मंचसँ उतरि हुनका संगे लेने जाइत छथि। हुनकर मोनमे कतेक प्रश्नसभ हिलकोर दैत रहलनि ,मुदा उत्तर हुनका लग नहि रहनि,ने राजाराम किछु समाधान करथि। चारूकात जकरा जे मोन होइक से बजने जा रहल छल। निस्संदेह बेसी लोकसभ  जानकीक पक्षधरे बुझाइत छलाह। मुदा ई विवादे व्यर्थ छल,अनावश्यक छल। अश्वमेध यज्ञ कएले गेल छल रघुकुलक प्रतिष्ठाक लेल। से प्रतिष्ठा माटिमे मिलि रहल छल। भरल सभामे जानकी लज्जित,अपमानित ठाढ़ि छलीह,राजारामक आदेशक प्रतीक्षा कए रहल छलीह। हुनकर यंत्रणाक तँ अंते नहि छल।

सभाक बीचमे सैकड़ों लोकक समक्ष ऋषि वाल्मीकि द्वारा सपथपूर्वक लव-कुशकेँ राजारामक संतान घोषित केलाक बाद आ जानकीकेँ सभ तरहेँ निर्दोष,निष्कलंक  प्रमाणित केलाक बादो राजारामकेँ चुप देखि यज्ञशालामे उपस्थित लोकसँ चकित छलाह। वशिष्ठ मुनि समेत अनेक श्रेष्ठ मुनिकेँ फुरेबे नहि करनि जे  ओ की करथि। सभक मोनमे एक्के बात उचरैत छलनि-

”जखन वाल्मीकि मुनि सन अंतर्यामी,रामायणक रचनाकार सद्यःसपथपूर्वक कहि रहल छथि तखनहु राजाराम की चाहैत छथि?किछु   बाजि किएक नहि रहल छथि?“

सभामध्य वाल्मीकि मुनिक पाछू ठाढ़ि जानकीकेँ तँ हाल-बेहाल छलनि। ओ ने किछु सुनि रहल छलीह ने सोचि पाबि रहल छलीह । जानकीक  सोनाक मुरुत मंचपर राजारामक बामाँ दिस विराजमान छल आ  दोसर जीबैत मुरुत सभामध्य ठाढ़ि छलीह। ककरो किछु नहि फुराइक,केओ किछु नहि बाजए। राजाराम तँ जेना बौक भए गेल रहथि। एहन परिस्थितिमे लक्ष्मणकेँ नहि रहल गेलनि । ओ एकाएक  जोरसँ चिकरि उठलाह-

”आदरणीय भैया!

यज्ञशालामे एतेक महापुरुषलोकनिक उपस्थितिमे  बहुत अनर्थ भए रहल अछि। जे किछु भए रहल अछि से  कोनो तरहेँ रघुकुलक मर्यादाक अनुकूल नहि अछि। वाल्मीकि मुनि अत्यंत आदरणीय छथि,सत्य आ धर्मक प्रतीक छथि। ओ जे किछु कहलनि अछि से स्वयं प्रमाण अछि। तकरा तुरंत स्वीकार कएल जेबाक चाही। हम आब जानकीकेँ एहि हालमे एक्को क्षण नहि देखि सकैत छी। हमरा लगैत अछि जे अहाँ उचित निर्णयमे विलंब कए  सर्वनाशकेँ आमंत्रित कए रहल छी।“

मंचपर विराजमान भरत,शत्रुघ्न सहित अनेक ऋषि,मुनि लोकनि लक्ष्मणकेँ शांत करैत छथि-

”अहाँ अगुताउ नहि। राजाराम सभ किछु सुनि लेने छथि। ओ स्वयं भुक्तभोगी छथि। जानकीक कष्टसँ हुनका बेसी कष्ट छनि। हुनका विचार करबाक उचित समय देल जानि।“

ओमहर मंचक ठीक सामने बैसल सैकड़ों जानकीधुजावाहिनी  तनतना रहल छलाह। ओ सभ मैथिलीपुत्र दिस इसारा कए रहल छलाह। तात्पर्य जे अहाँ आदेश करू तँ अखने हिसाब-किताब भए जाएत। आब बात  बरदास्तसँ बाहर भए रहल अछि। परंतु परिस्थितिए तेहन छल जे मैथिलीपुत्रो की करितथि? राजारामक निर्णयक प्रतीक्षा करब उचित बुझेलनि। अस्तु,हुनकालोकनिकेँ शांत रहबाक हेतु इसारा केलखिन। माहौल अत्यन्त उत्तेजित लागि रहल छल। लगैत छल जे कखनहु किछु भए जाएत।

४३

 

जनाकीक मनोदशा देखि जानकीधुजावाहिनी उत्तेजनामे अपन-अपन स्थानपर सँ उठि गेलाह। ओ सभ मंच दिस बढ़बाक प्रयास करए लगलाह। मैथिलीपुत्र हुनका सभकेँ बुझेबाक बहुत प्रयास करथि,मुदा ओ सफल नहि भए रहल छलाह। ओ दौड़लाह चिरञ्जीवी लग। मुदा ई की भेल? ओ जतेक जोरसँ हुनकर लगीच जेबाक प्रयास करथि,ओ ततेक फटकी चलि जा रहल छथि। अंततः चिरञ्जीवी ठामहि बिला गेलाह। अखने तँ ओतहि छलाह। मैथिलीपुत्र चारूकात दृष्टि घुमबैत छथि,मुदा ओ कतहु देखा नहि रहल छथिन। अचानक ओ जानकीक पाछू दिस तकैत छथि।

”ई की देखि रहल छी?

चिरञ्जीवीकक तँ रंग-ढ़गे बदलि गेल छनि। हुनकर एहन रौद्र रूप तँ कहिओ नहि देखने छलहुँ? हुनका हाथमे एतेकटा गदा कतएसँ आएल? की ओ“? ओ तँ कहिओ कोनो प्रकारक अनुभव  नहि होमए देलनि।सभ दिन सामान्य व्यवहार करैत रहि गेलाह। आइ पहिल बेर हुनकर एहन विकट,बिकराल रूप देखि रहल छी।

”हे भगवान! पता नहि की होमए जा रहलअछि? हमर बामाँ आँखि एतेक किएक फड़कि रहल अछि?“

चिरञ्जीवी इएहसभ सोचिते रहथि कि शक्तिस्वरुपाकेँ भयाओन रूप बनओने देखलथि। ओ राजारामक मंचक ठीक पाछू दुर्गाक अवतार लगैत छलीह। हाथमे चमकैत तरुआरि ,भाला ,बरछी आ कहि ने की की छलनि? लगैत छलैक जे ओ कखनहु ककरो छोपि देथिन। मैथिलीपुत्रकेँ तँ चारूकात प्रलयक दृश्य देखा रहल छलनि। ओ जोर-जोरसँ चिचिआ रहल छथि-

”जानकीधुजावाहिनी !

 शांत होउ। अहाँसभकेँ अखन बहुत किछु करबाक अछि। जानकीक स्मृतिकेँ हुनकर संघर्ष गाथाकेँ, जुग-जुग धरि मिथिलाक घर-घर पहुँचेबाक अछि। अखन अहाँ सभ नियतिकेँ अपन काज करए दिऔक,अनेरे अयशक भागी नहि बनू। ई राजारामक दरबार छनि। यदि ओ न्याय नहि कए सकताह,ओहो अपन धर्मपत्नीक संगे, तखन आर के की करत?

लव-कुश रामायण गायन केने जा रहल छथि। मंचपर राजाराम सुनैत जा रहल छथि। ओहिमे जानकीक भविष्य तँ कहि देल गेल । आब राजारामक भविष्य गाओल जाएत। सभ चुपचाप ओहि गीतकेँ सुनैत जा रहल छथि। गीतक मर्म बुझि राजारामकेँ तँ ठकबिदोर लागल छनि। की करथि?की बाजथि?

अचानक लागल जेना ठनका खसि रहल अछि। भयाओन अन्हड़ उठि गेल अछि। राजारामक मंच कोनो क्षण धारासायी भए जाएत। लव-कुशक गायन एहन प्रलयंकारी सिद्ध होएत से संभवतः वाल्मीकि सेहो नहो सोचने रहल हेताह।

४४

 

 

यज्ञस्थलीमे सैकड़ों संत,महात्मा,विद्वानलोकनिक उपस्थितिमे राजाराम अपन मौन तोड़ि कहैत छथि-

“एहि ठाम उपस्थित समस्त महानुभावलोकनि  सुनथु। अपने सभ गोटे  लव-कुशक वाल्मीकि रचित रामायणक गायन सुनलहुँ। वाल्मीकि मुनिक लव-कुश आ जानकीक संबंधमे देल गेल स्पष्टीकरण सेहो सुनलहुँ। एहि बातमे कोनो सक नहि रहि गेल अछि जे लव-कुश हमर संतान छथि। हुनका लोकनिक स्वागत छनि। ओ सभ निश्चय रघुकुलक भविष्य छथि,हमर उत्तराधिकारी छथि । रहल जानकीक बात से हम स्वयं जनैत छी जे ओ निष्कलंक छथि,हमरासँ बेसी हुनका के चिन्हि सकैत छनि। हम हुनका चलि गेलाक बाद जे कष्ट सहलहुँ,जेहन नारकीय जीवन जीलहुँ तकर की वर्णन करू?तखन अहाँ कहब जे हम एना किएक केलहुँ?ई जनितहुँ जे जानकी निर्दोष छथि,हुनकर हमरा प्रतिए निष्ठापर कोनो प्रश्नचिन्ह नहि लगाओल जा सकैत अछि,तथापि हम एकटा धोबीक बातपर  हुनका वनबास दए देलिअनि। मुदा हम की करितहु?हम तँ एहि राज्यक नीति आ नियमसँ बान्हल छी। हम मात्र तकर अनुसरण केलहुँ। हम नीकसँ जनैत छी जे आबए बला पीढ़ी हमरासँ पुछबे करत?हमरा जे से कहत। मुदा ओकरा तत्कालीन समाजक जनतब रहतैक तखन हमरो विवशतापर सोचत?एहि सभ बातपर बहुत विमर्श भेल अछि आ होइत रहत। हम व्यक्तिगत रूपसँ कहिओ जानकीक विरुद्ध ने छलहुँ ने अखनो छी। प्रश्न तँ अयोध्यावासी उठओने छलाह।एकर समाधानो ओएह करताह। जानकी एहि सभामे सभक सामने अपन निष्ठाक सपथ खाथु जाहिसँ ओ सभ हुनका बारेमे अपन मंतव्य बदलबाक लेल विवश होथि।”

राजारामकेँ एना बजैत देखि जानकीक देहमे आगि लागि गेलनि। हुनकर क्रोधक अंत नहि छल।ई तँ हुनकर अपमानक पराकाष्ठा भए गेल । ओ एक बेर लव-कुश दिस देखलनि जरूर,मुदा मोन वितृष्णा भावसँ भरि गेल छलनि। भेलनि जे आब एहि दुनिआँमे रहिए कए की करब?व्यर्थ थिक एहन अपमानित जीवन जिअब। एक्के आदमी एक्के बातपर बेर-बेर यंत्रणा सहए,अपनाकेँ सही सिद्ध करैत रहए,ई कोन न्याय थिक? राजाराम सम्हारथु अपन राजगद्दी,पोषथु अपन संतानकेँ। हम आब चलब।

 हे शक्तिस्वरुपे! हमरा क्षमा करब। हमर देह आब नहि रहत। मुदा राजारामक प्रतिए हमर प्रेम भाव बनले अछि ,हुनका प्रतिए हमर सिनेह ओहिना अछि। अस्तु, हमर प्रार्थना अछि जे अहाँ फेरसँ हुनकामे समाहित भए जाउ ,हुनका शक्तिवान बनल रहए दिअनु जाहिसँ ओ यशस्वी होथि, एहन यज्ञ बेर-बेर  करैत रहथि।“

 

जानकीकेँ झहरि रहल छनि नोर

केहन अभागलि  भेलहुँ

सभ किछु  रहितहुँ

छी अनाथ

एहि यज्ञशालामे

 के नहि छथि

वशिष्ठ मुनि जे छथि

रघुकुलक सभदिनसँ

माननीय आचार्य

सेहो  छथि गुमसुम

वाल्मीकि कहि गेलाह

सभटा खेरहा

सपथ पर्यन्त खेलथि

जे लव-कुश छथि

निस्सन्देह अहींक संतान

हे श्री राम सुनू

जानकी छथि परमपवित्र

निष्ठावान

छथि अहींक समर्पित

करिअनु हुनकर सम्मान

कहि ने

विवशता की रहनि

राजाराम नहि कए सकलाह न्याय

लव-कुश गबैत रहि गेलाह

वाल्मीकि रामायण

जाहिमे लिखल छल

रामक भविष्य

से सुनैत रहि गेलाह

हुनका अखने चाहिअनि

जानकीक सपथ

सभहक सामनेमे ओ गछथु

कहथु जे ओ छथि निर्दोष

जानकी नहि सहि सकलथि

 एतेक अपमान

एहन अन्याय

सोचै छथि

लव-कुश छलाह हमर भार

ओ कहुना बाँचि गेलथि

भए  गेलथि शक्तिसंपन्न

आब की?

बहुत भए गेल

आब चली

छोड़ी एहि कुटिल संसारकेँ

फाटह हे धरती

अंत होअए हमर त्रासदीक

ई सभ सोचैत-सोचैत  जानकी आँखि मुनि लैत छथि। माता पृथ्वीकेँ स्मरण करैत छथि । मोने-मोन कहैत छथि-

”हे माता पृथ्वी! हमर असली माए तँ अहीं छी। हम अहींक कोरमे  जन्मल रही। हम सभदिन रामक प्रतिए निष्ठावान रहलहुँ। हुनका छोड़ि कहिओ ककरो क्षणो भरि अपन मोनमे स्थान नहि देलहुँ । यदि ई सत्य होइक तखन  हमरा फेरसँ अपन कोरामे बैसबाक अवसर प्रदान करू। हमरा अपनेमे समाहित कए सभ दुखसँ मुक्त करू।“

जानकीकेँ एतेक बजितहि भयंकर विस्फोट भेल। चारूकात पृथ्वी काँपि रहल छल। लगैत छल जेना भयाओन भूकंप भए रहल अछि। जानकी जतए ठाढ़ि छलीह ताहिठाम दरारि फाटि गेल। देखिते-देखिते जानकी ओहि दरारिमे विलीन भए गेलीह। जानकीकेँ ओहि पृथ्वीमे  प्रवेश करितहि ओ स्थान फेरसँ ओहिना भरि गेल जेना किछु भेले नहि होइक। तकर बाद जानकीक किछु अता-पता नहि रहि गेलनि।

लव-कुश गबैत रहथि रामायण

ताबतमे भेल हाहाकार

फाटि गेल धरती

पता नहि कतए आ कोना

 बिला गेलीह जानकी

सभ देखितहि रहि गेलाह

अत्यन्त दुखी राजाराम

मुरी नीचाँ केने

कनैत रहि गेलाह

जानकी बेसक चलि गेलीह

मुदा अखनहु

मिथिलाक समस्त नर-नारी

छथि हतप्रभ

गाबि रहल छथि

दुखसँ भरल गीत

जानकीक वियोगमे

हुनकर स्मृतिमे

बनल अछि गामे-गाम

जानकी स्थान

हे जनकसुता क्षमा करू

हमसभ की कए सकब प्रतिकार

से की कहू

मुदा नहि करब बिआह  अगहनमे

अपन कोनो बेटीक

नहि करबै ककरो बिआह ओमहर

अहाँक स्मृति

समस्त नारीक आत्मसम्मानक लेल

बनि जाएत दृष्टान्त

जुग-जुग धरि।

४५

 

जानकीक रसातल गमनक पश्चात राजाराम,लव-कुश,वाल्मीकि,वशिष्ठ आ ओहिठाम उपस्थित अनेक श्रेष्ठलोकनि जानकी दिस दौड़लाह। राजाराम चिचिआ उठलाह-

”हे जानकी! एना नहि करू । हमरा क्षमा करू। हम अपन वचन वापस लैत छी। अहाँ वापस आबि जाउ। “

 राजाराम बड़बड़ाइत रहि गेलाह। जानकी आब अपन माएक कोरामे समाहित भए गेल छलीह। ओ मुक्त भए गेल छलीह समस्त कष्टसँ, दुबिधासँ आ अयोध्यावासीक छल-प्रपंचसँ।

मीथिलीपुत्र चिरञ्जीवीक संगे जानकीधुजावाहिनी  लग जाइत छथि। ओ सभ  हतप्रभ रहथि,बहुत उदास रहथि। हुनकर सभक मनोरथ माटिमे मिलि गेल छलनि। हुनकासभकेँ होनि जेना जानकी असगरे नहि अपितु समस्त मीथिलावासीक संगे रसातलमे विलीन भए गेलथि। एतेक दिनसँ सभ किछु छोड़ि ओ सभ जानकीक चिंतामे लागल रहथि। हुनकर सभक प्रयास व्यर्थ भए गेल छलनि। मोन टूटि गेल छलनि। आब की करताह?  हुनकर सभक मनःस्थितिकेँ बुझैत मैथिलीपुत्र कहैत छथिन-

”वंधुगण!

हमरा सभक आब एहिठाम रहब अर्थहीन भए गेल अछि । जानकी अपन नश्वर शरीर छोड़ि चुकल छथि। मुदा तेँ की? हम सभ चैनसँ नहि बैसब। आत्मसम्मान आ निष्ठासँ जीबाक हुनकर सनेसकेँ आबए बला पीढ़ीकेँ पहुँचबैत रहब। ताहि लेल हमसभ जानकी  धाम  वापस चली। ओतए जानकीक स्मृतिमे भव्य मंदिरक निर्माण करी जाहिसँ भावी पीढ़ी हुनकर त्याग आ निष्ठासँ  प्रेरणा लए सकत। जानकीधुजावाहिनी   हुनकर बात मानि जानकीधाम  वापस आबि जाइत छथि ।

 कहल जाइत अछि जे अखनहु माता जानकी मिथिलावासीक हृदयस्थलीमे ओहिना विद्यमान छथि आ हुनका लोकनिक प्रेरणा श्रोत बनल छथि। जानकी सन  केओ ने भेल ने होएत । ओ मिथिलाक नारीक आत्मसम्मानक प्रतीक छथि। सभ तरहेँ पूजनीया छथि।

 

४६

 

अचानक एहन घटना घटि जाएत,देखिते-देखिते जानकी एना पृथ्वीमे समाहित भए जेतीह  से के सोचि सकैत छल? भावी प्रबल होइत अछि सएह मानए पड़त। कालक प्रभावसँ के बाँचल अछि,राजा रामो नहि। ओ तँ स्वयं जानकीक हालतिसँ बहुत दुखी छलाह। जहिआसँ जानकी वनबास गेलीह ,हुनकर हृदय खंड-खंड भए गेल रहनि। तकर बाद सालक-साल ओ सुति नहि सकलाह, नहि भोगि सकलाह राज सुख। ओ मात्र अपन कर्तव्यक निर्वाह करैत रहि गेलाह। तीस वर्ष छओ मास धरि अयोध्याक राज केलाक बाद आब सभ किछु जबाब दए देलकनि। माथ-हाथ सभ किछु बैसि गेलनि। काल से आबि कए कानमे किछु कहि गेलनि-

“आब कतेक कष्ट सहब एहि देहमे। अहाँक काज पूर्ण भए गेल अछि । चलू अपन धाम । विष्णुलोक अहाँक स्वागत करबाक लेल आतुर  अछि।

लक्ष्मण द्वारिपर रखबारी कए रहल छलाह। राजारामक आदेश रहनि “ ”अखन केओ भीतर नहि आएत,यदि से भेल तखन अहाँकेँ मृत्युदंड होएत।ओही समयमे दुर्वासा मुनिक आगमन भेलनि। ओ तुरंत राजाराम लग जेबाक लेल अड़ि गेलाह,अन्यथा श्राप देथिन, रघुकुलकेँ बरबादीक। लक्ष्मण सोचलाह-”दुर्वासाक श्रापसँ रघुकुलकेँ बचाएब बेसी जरुरी थिक,भने हमरा मृत्युदंड भए जाए।“  ओ राजारामक आदेशक विरुद्ध दुर्वासाकेँ राजाराम लग जेबाक अनुमति दए देलखिन। तकर स्वाभाविक परिणाम भेल  लक्ष्मणकेँ राजाराम द्वारा मृत्युदंड। राजाराम एहि घटनाक्रमसँ बहुत परेसान भए गेलाह। ओ परामर्श लेल वशिष्ठ मुनि लग जाइत छथि।

 ”राजाराम लक्ष्मणसँ फराक रहताह। आब नहि  हेतनि हुनका लोकनिक आपसी  भेंट। तकरे मृत्युदंड मानल जाएत।“-वशिष्ठ कहलखिन। तकर बाद राजाराम लक्ष्मणक त्याग कए देलनि।

”रामसँ पृथक रहि हमर जीवनक कोनो अर्थ नहि अछि।“- लक्ष्मण सोचलाह । तकर बाद ओ सरयू कातमे प्राणायाम कए अपन प्राणत्याग कए देलनि। राजारामकेँ लक्ष्मणक मृत्यु असह भए गेलनि। ओ तँ पहिनेसँ परेसान रहबे करथि। तकर बाद जे भेल से की कहू?राजाराम, भरत आ शत्रुघ्न समस्त अयोध्यावासी समेत सरयू नदीमे समाहित भए गेलाह। गाछ-बिरछी,पशु-पक्षी,सभ किछु  राजारामक अनुसरण करैत सरयूमे विलीन भए गेल। नहि रहल अयोध्यामे किछू बाँचल। राजारामक दुनू पुत्र आ भातिज सभ अपन-अपन  राजधानी अयोध्या छोड़ि अन्यत्र बनओलथि। अयोध्यामे रहि की गेल?मात्र एकटा दुखद स्मृति।”

राजारामक दुखान्त जीवनमे सुखद मोड़ आएल हुनकर मृत्योपरांत। विष्णुलोकमे राम विष्णुक अवतारमे रहथि। ओतहि जानकी लक्ष्मीक रुपमे भेटलखिन-प्रफुल्लित,प्रसन्न आ सभ तरहेँ संतुष्ट।

जयतु जानकी!

(समाप्त)


लेखक परिचयः
नाम : रबीन्द्र नारायण मिश्र

पिताक नाम : स्वर्गीय सूर्य नारायण मिश्र
माताक नाम : स्वर्गीया दयाकाशी देवी
जन्म तिथिः२ जनबरी ‍१९५४(प्रमाण पत्र)
२४ अगस्त ‍१९५२(जन्मपत्र)
पैतृक ग्राम : अड़ेर डीह
मातृक : सिन्घिआ ड्योढ़ी
वृति : भारत सरकारक उप सचिव (सेवानिवृत्त)/
स्पेशल मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट, दिल्ली(सेवानिवृत्त)
शिक्षा : चन्द्रधारी मिथिला महाविद्यालयसँ बी.एस-सी. भौतिक विज्ञानमे प्रतिष्ठा : दिल्ली विश्वविद्यालयसँ विधि स्नातक
श्री रबीन्द्र नारायण मिश्रक प्रकाशित कृति :मैथिलीमे:-
प्रकाशन वर्ष:२०१७
१. “भोरसँ साँझ धरि” (आत्म कथा), २. “प्रसंगवश” (निवंध), ३. “स्वर्ग एतहि अछि” (यात्रा प्रसंग),
प्रकाशन वर्ष:२०१८
४. “फसाद” (कथा संग्रह) ५. `नमस्तस्यै“ (उपन्यास) ६. विविध प्रसंग (निवंध ) ७.महराज(उपन्यास) ८.लजकोटर(उपन्यास)
प्रकाशन वर्ष:२०१९
९.सीमाक ओहि पार(उपन्यास)१०.समाधान(निवंध संग्रह) ११.मातृभूमि(उपन्यास) १२.स्वप्नलोक(उपन्यास)
प्रकाशन वर्ष:२०२०
१३.शंखनाद(उपन्यास) १४.इएह थिक जीवन(संस्मरण)
१५.ढहैत देबाल(उपन्यास) १६.पाथेय(संस्मरण)
प्रकाशन वर्ष:२०२१
१७.हम आबि रहल छी(उपन्यास) १८.प्रलयक परात(उपन्यास)
प्रकाशन वर्ष:२०२२
१९.बीति गेल समय(उपन्यास) २०.प्रतिबिम्ब(उपन्यास)२१.बदलि रहल अछि सभकिछु(उपन्यास)22. राष्ट्र मंदिर(उपन्यास) २३. संयोग(कथा संग्रह) २४. नाचि रहल छलि वसुधा ( उपन्यास)
प्रकाशन वर्षः२०२३
२५.दीप जरैत रहए(उपन्यास) २६.ठेहा परक मौलायल गाछ(उपन्यास) २७.पटाक्षेप(उपन्यास)
प्रकाशन वर्षः२०२४
२८ माटि बजा रहल अछि(यात्रा प्रसंग) २९ जयतु जानकी(उपन्यास)
३० यज्ञसेनी(उपन्यास)
प्रकाशन वर्षः२०२५
३१.कथा अखन बाँकी अछि(संस्मरण) ३२. गाछ बजैत छैक(कथा संग्रह) ३३.सूर्यपुत्र(उपन्यास)
प्रकाशन वर्ष ;२०२६
बिसरि जाएब जरूरी छै(कविता संग्रह)

In English: -
Year of publication:2018
1. The Lost House (Collection of short stories)
2. Life is an art
3.The Ganges Whispers (English translation of my Maithili Novel,Ham Aabi Rahal Chhee (हम आबि रहल छी)
हिन्दी में ”
प्रकाशन वर्ष:२०१९
१.न्याय की गुहार



 

 

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