
इच्छा मृत्यु: स्वतंत्र भारतक पहिल वैध उदाहरण
इच्छा मृत्यु केर माने एहन मृत्युसँ लगाओल जाइत छै जाहिमे आदमी अपन इच्छासँ इच्छित दिन, स्थान, मूहूर्त वा परिजनक सानिध्यमे मृत्युक वरण कऽ सकए। प्राचीन कालमे इच्छा मृत्युकेँ दैवी एवं अलौकिक वस्तु मानल जाइत छलै। इच्छा मृत्युकेँ शक्तिक रूपमे वर्णन छै माने ओहन लोक जकरा लग इच्छा मृत्युक शक्ति छै। एहन लोक प्राचीन कालमे अतिरिक्त आदरक पात्र होइत छलाह। भारतीय संदर्भमे भीष्म पितामह एकर नीक उदाहरण छथि जिनका इच्छा मृत्यु वरण करबाक वरदान भेटल छलनि। मुदा सभकेँ ने इच्छा मृत्युक वरदान भेटि पाबै छलै आ ने सभ लग ई शक्ति छलै। तँइ बादमे एकर अन्य रूप आनल गेलै।
भारतमे वानप्रस्थ वा जैन धर्मक संथारा हमरा इच्छा मृत्युक एकटा बदलल प्रारूप लगैए। वानप्रस्थकेँ आदमी जीवनक चारिम भाग माने एकदम अंतिम भाग मानल गेलैए जाहिमे लोक अपन पारिवारिक-सामाजिक दायित्वपूर्ण कऽ घर छोड़ि दैत छलाह एवं भिक्षाटन कऽ शेष जीवन बिता मरि जाइत छलाह। तहिना संथारामे जैनीकेँ बूझल रहै छै जे आब हमरा कम भोजन करबाक अछि आ क्रमशः हरेक दिन कम करैत जेबाक अछि। एक समयक बाद भोजन बंद भऽ गेलाक कऽ मृत्यु भऽ जाइत छलै। आनो प्राचीन धर्म सभमे एहन उदाहरण भेटत मुदा लेख नमहर करब हमर अभीष्ट नहि। आधुनिक कालमे ने वानप्रस्थक काज छै आ संथारापर सरकार सभ बैन लगेने छै।
इच्छा मृत्यु एवं आत्महत्या
ऊपरसँ देखबामे इच्छा मृत्यु एवं आत्महत्या एकै लागै छै मुदा दूनूमे भेद छै। इच्छा मृत्यु संपूर्ण पारिवारिक ओ सामाजिक दायित्व पूरा भेलाक बाद प्रयोगमे आनल जाइत छलै तँइ इच्छा मृत्युकेँ दैवीय एवं सम्मानीय मानल गेलै, मुदा आधुनिक कालमे इच्छा मृत्युकेँ सेहो पाप मानल गेलै। जखन कि आत्महत्या जीवनक असफलता, हताशा, अथवा क्षणिक आवेगमे कएल जाइत छै तँइ आत्महत्याकेँ पाप ओ अपराधक श्रेणीमे राखल गेलै से प्राचीन एवं आधुनिक दूनू कालमे।
सतीप्रथा, गंगालाभ एवं इच्छा मृत्यु
सतीप्रथाक कोनो संबंध इच्छा मृत्युसँ नहि छलै। मुगलसँ पराजय भेलाक बाद ओकरासँ बलत्कृत हेबाक बदला राजपूतानी सभ जौहर (आगिमे स्वतः जरि कऽ मरि जाएब) चुनलक मुदा बादमे ई कुप्रथा बनि गेल आ स्त्रीक विधवा बेलाक बाद बिना ओकर इच्छाक ओकरा चितापर जरा देल जाइत छल। बादमे ई सतीप्रथा संगठित ओ सामूहिक खून कऽ देबाक उदाहरण बनि गेल, जकरा बंगालक समाज सुधारक राजा राममोहन राय खत्म करबेलाह। मिथिलामे एहने एकटा कुप्रथा भऽ गेल छलै 'गंगालाभ' नामसँ। ई प्रथा सरदीमासमे बूढ़ा-बूढ़ीकेँ धर्मक नामपर गंगामे डुबकी लगा-लगा कऽ मारि देल जाइत छलै। एहि कुप्रथाक असरि देखियौ जे 'हुनका गंगा-लाभ भऽ गेलनि' वाक्यसँ बुझा जाइत छलै जे अमुक लोक नहि रहलाह। बादमे क्रमशः ईहो कुप्रथा कम भेल। अंग्रेजक समयमे एवं स्वतंत्र भारतमे एहि सभ तमाम कुप्रथापर रोक लगलै आ इच्छामृत्यकेँ अवैध मानल गेलै। मुदा अवैध रूपें सही हमर अनुमान अछि जे इच्छा मृत्यु चलैत रहलै। ई कोना चलैत रहलै से जनबासँ पहिने आधुनिक युगमे इच्छा मृत्युक परिभाषा जानि लेब उचित। प्राचीन कालमे इच्छा मृत्यु लोक अपने निर्णय लैत छल। ओकरा बदला आन कियो नहि। मुदा आधुनिक युगमे लोक अपने लऽ सकैए, संगे परिवारक लोक सेहो लऽ सकैए मुदा कोर्टक आदेशक संग, पूर्ण रूपे कानूनी तरीकासँ। अन्यथा एकरा खून मानल जेतै। मुदा अनुमान अछि जे बहुत बेर असाध्य बेमारीक कारणे परिवारक सहमति आ किछु बेसी फीस देलासँ हास्पीटलमे इच्छा मृत्युक काज अवैध रूपे भऽ जाइत छै। तँइ हम शीर्षकमे लिखलहुँ "पहिल वैध उदाहरण"।
हरीश राणा
बर्ख 2013 मे हरीश राणा चंडीगढ़क एक यूनिवर्सिटी सँ सिविल इंजीनियरिंग पढ़ाइ कऽ रहल छलाह, एवं जाहि घरमे रहै छलाह तकर चारिम तल्लासँ खसि पड़लाह। परिवारक कहब छलनि जे आन छात्र सभ धक्का देलकै। मुदा ओहि घटनामे ओ कौमामे चलि गेलाह माने जिंदा तऽ छलाह मुदा ने चेतना छलनि आ ने अपन काज करबाक शक्ति। भोजन पाइप द्वारा देल जाइत छलनि। परिवार लगातार इलाज करबेलकनि मुदा सभ ठाम कहल गेलनि जे आब ई ठीक नहि हेताह।
बर्ख 2024 मे हरीशक परिवार दिल्ली कोर्ट पहुँचलाह हरीशक इच्छा मृत्यु लेल मुदा कोर्ट मना कऽ देलकनि, तकर बाद सुप्रीम कोर्ट सेहो मना कऽ देलकनि। बर्ख 2025 मे दू मेडिकल बोर्ड गठित भेलै जाहिमे एकटा बोर्ड एम्स केर छलै। ई दूनू बोर्ड निर्णय देलक जे हरीश राणा कहियो ठीक नहि भऽ सकताह। आ तकर बाद फेरो परिवार सुप्रीम कोर्ट पहुँचल आ एहि बेर 11 मार्च 2026 केँ सुप्रीम कोर्ट हरीशक इच्छा मृत्युक निर्देश देलक एम्सकेँ। आ एम्सक निगरानीमे हरीशक सभ दवाइ बंद कएल गेलै, लाइफ सपोर्ट सिस्टम बंद कएल गेलै, भोजन बंद कएल गेलै आ 24 मार्च 2026 केँ हुनक निधन भेलनि एहि तरीकासँ।
सोशल मीडियामे ई केस
सुप्रीम कोर्टसँ एहि आदेशक बाद सोशल मीडियापर बहुर रास बात देखलबामे आएल जाहिमे एकटा छल जे कि कोर्ट परिवारकेँ खर्चा नहि दऽ सकैत छल। एहने सन बात। मुदा बात एकटा हरीश राणाक नै छै, एहन केस बहुत छै कोर्टमे। आ हरीश राणासँ पहिनेहो कोर्ट लग एहन केस गेल छलै मुदा हरीश राणामे मेडिकलसँ साबित भेलै जे आब ई ठीक नहि हएत तँइ ई देल गेलै। दोसर बात जे भारतीय मानस कोनो सुविधाक बहुत गलत प्रयोग करैत छै। आइ जँ कोर्ट एकटा लेल खर्चक व्यवस्था कऽ दितै तऽ फेर अगिले दिनसँ ओकरा लग एहन हजारो फर्जी केस आबि जइतै जाहिमे बेमार आदमीक सेहो सहमति रहितै। तँइ कोर्ट हरीश राणाक परिवारकेँ खर्चा नहि दऽ नीक केलकै।
कोर्टक निर्णय एहि लिंकपर पढ़ल जा सकैए- https://www.verdictum.in/pdf_upload/harish-rana-v-uoi-verdictum-1773761.pdf
निधनक बाद एम्स केर पुष्टि-

अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ।