
रबीन्द्र नारायण मिश्र
स्त्रीक अधिकार
बहुत सताओल गेल छै
जुग-जुगसँ
समाजक सभटा प्रतिबंध
सहैत रहि गेल छै
आर तँ छोड़ू
पहिने तँ हाल ई छल
जीबिते मृत पतिक संग
जराओल जाइत छल
एहनो कहीं भेल अछि
जे जीबिते व्यक्ति
धधरामे पड़ि कए
चिकरतै नहि
प्रतिरोध करतै नहि
से ओ करै
जरूर करै
चिकरै,भोकरै
मुदा ओकर स्वरकेँ
दाबि देबाक लेल
प्रचंड शंखनाद करै
महिलाकेँ मृत पतिक संग
तेना ने गतानि देल जाइ
जे ओ नहि भागि सकए
प्राणक रक्षाक लेल
प्रयत्नशील चुट्टिओ रहैत छै
मुदा ओ ताहूसँ वंचित
कए देल जाइत छलि
जरि कए जखन खाक
भए जाइत छलि
तखन ओकरा नामपर
सतीमाता कहाइत छल
सती मंदिरमे लोकक
ढबाहि लागि जाइत छल
समय-साल बदललै
सती प्रथा बंद भेलै
की अत्याचार खतम भेलै?
नहि,नहि
नव-नव रूपमे
बढ़िते गेलै,पसरिते गेलै
कानूनसँ भेटल अधिकारो
दुर्लभ भेल छै
माए-बाप,भाइ
छिनि लैत छै
एहनो कही भेलै अछि?
आन नहि,बापे कहै छै
जे बिआहल बेटी नैहरमे
किएक घुरिआइ छै?
बेटीक अधिकारपर
अखनो बहुत बात छै
जकरे देखू सएह
करैत वज्रपात छै
समाज मूक दर्शक
बनल लाचार छै
अहीं कहू बराबरीक
कहाँ विचार छै?
की गाम की सहर
मचल अत्याचार छै
समाचार पढ़ि मोनमे
होइत हाहाकार छै
दुर्घटना तेहन-तेहन
होइत वारंबार छै
समानताक बातसभ
झूठक प्रचार छै
मनुष्यता बिलाएल छै
केहन समय -साल छै
असुरक्षित घरोमे
बेटीक जानमाल छै
यद्यपि समाजमे
भए रहल सुधार छै
बेटीओ लेल इस्कुलक
खुलि गेल द्वारि छै
अखनहु बेटीक लेल
समस्याक पहाड़ छै
बेटा-बेटीमे भेद मिटै
तकर दरकार छै।
२९।८।२०२३
रबीन्द्र नारायण मिश्र
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