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VIDEHA ISSN 2229-547X  ·  First Maithili Fortnightly eJournal  ·  Since 2000  ·  www.videha.co.in
विदेह — प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका
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विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका
विदेह नूतन अंक
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पूजा कर्ण

बचाउ प्रभु!


प्रश्न तऽ अनेक छै...
मुदा उत्तर क की?

देवाल तऽ अनेक छै...
मुदा ओ मुक्त हवा क की?

कतहु पतझड़ छै, तँ कतहु हरियर संसार।
कतहु धरती सुखायल छै, तँ कतहु सुर्ख लालीक बहार।

कतहु भीड़क बीच बेबस लोक छथि,
तँ कतहु अनेक एकड़ जमीन पर एकटा मात्र मालिक छथि।

कतहु लोक कानैत-बिलखैत छथि,
तँ कतहु हँसी-ठिठोली चलि रहल अछि।
अपन अस्तित्व बचाबयक आड़ि मे
घृणा भरल होली खेलल जा रहल अछि।

मन बहुत कचोट रहल अछि ।
अपने के असहाय बुझए लागल छी।
एहन जीवनक कल्पना हम कखनो नहि केने रही,
जकरा आइ जीबय लेल विवश भेल छी।

केकरा कहू?
कतऽ जाऊ?
केकरा बुझाबी जे आब हमर दम घुट रहल अछि?

डर लाईग रहल अछि,
कहीं लोक ई नहि कहए लागय—
"ओहि पार चलि जाउ,
अहाँक एतय की काज?"

कोना बुझाबी
जे हमहूँ एहि माटिक सन्तान छी।
एतय जन्म लेने छी,
आ एहि माटिमे मिलि जायब—एहने अभिलाषा रखैत छी।

कोना बुझाबी
जे अहूँ हमर छी,
आ ओहो हमर छथि।
जेना अहाँक सुखमे हम प्रसन्न होइत छी,
तहिना हुनक दुःखमे हमर हृदय सेहो व्यथित भऽ जाइत अछि।

की एहन नहि भऽ सकैत अछि,
जे अहूँ किछु आगाँ बढ़ि हाथ बढ़ाबी,
आ ओहो आगाँ आबि
अहाँक हाथ थामि लेथि?

अहाँक मनक बात तऽ सभ सुनैत छथि,
एक बेर हुनको मनक बात सुनि लिअ।

केओ कतेको दिनसँ
भूखल-पियासल सड़क कात बैसल छै।
थोड़ेक करुणा देखाउ
ओहि बेबस मनुख पर।

गंभीर पीड़ामे, सुध-बुध बिसरल,
आँखिमे आस लऽ बैसल छथि—
जे कोनो तऽ आएत,
हुनकर बात सुनत,
हुनकर मनक पीड़ा बुझत,
अन्यायक विरोधमे ठाढ़ हएत,
आ किछु नीक करत।

कोनो तऽ राम बनि आएत,
एहि गहिर अन्हारमे
आशाक एकटा दीप जराएत।

हे प्रभु श्रीराम!
अहाँ सँ हमर विनती अछि—
किछु तऽ चमत्कार देखाउ।

मानैत छी जे कलियुग अपन चरम पर अछि,
मुदा त्रेताक शीतलता
फेर सँ एहि धरती पर बरसाउ, प्रभु।

केओ रामराज्य लेल
अपन प्राण अर्पित करय लेल तैयार अछि।

कोनो तरह
ओहि पागल "सोनम" के बचा लिअ, प्रभु।

बचा लिअ..
आब तऽ बचा ही लिअ, प्रभु।
-मैथिल डॉक्टर
-पूजा कर्ण, दरभंगा, शिक्षा- एम.कॉम., गृहणी।

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