प्रणव कुमार झा
आदमी
छैक नै,
मुदा कतेक नांगइर डोलाबै अछि आदमी
भुरभुर माटि पर अट्टालिका बनाबै अछि आदमी।
भीतर से धूसर अछि बाहर से मोती सन
,
झूठक बुलडोजर से सच के गिराबै अछि आदमी।
भाषणक आँधरि में मुद्दा बिला जाय अछि,
टूटल सपना पर महफ़िल जमाबै अछि आदमी।
नारा गूँजय अछि
“विकास,
विकास!” टीवी पर,
आर राति में किछु भूखल रह जाय अछि आदमी।
सब रोज होइत रहय छैक कोनो ने कोनो हादसा,
गिनती मात्र बनिकऽ कत्तहु मरि जाय अछि आदमी।
कागज़ पर बनैत शहर,
सुनहरा सपना के नक्शा,
माटिक झोपड़ी में अन्हरिया पाबै अछि आदमी।
नीक दिनक गूंज में दबि जाय अछि ओकर कराह,
खाली बर्तन बजाकऽ चुप रहि जाय अछि आदमी।
छैक नै,
मुदा कतेक नांगइर डोलाबै अछि आदमी,
अपनहि हारि केर जश्न मनाबय अछि आदमी।
सत्ताक गलियारा में झुकि के सलाम करय अछि,
अपनहि स्वार्थ मे अपनाके भरमाबै अछि आदमी।
वायदाक मोटरी कंधा पर लादने फिरय अछि,
सभ दिन नव मुखौटा लगाबै अछि आदमी।
एकटा रोटी के लेल दर-दर भटकय अछि ओ
,
मंच पर बैठल ओकरा “डेटा”
बताबै अछि आदमी।
छैक नै,
मुदा कतेक नांगइर डोलाबै अछि आदमी,
पैरक नीचा के ज़मीन अपने सरकाबै अछि आदमी।
स्कूल में टूटल छत,
अस्पताल में रेलमपेल,
अछि खोखला मुदा हल्ला मचाबै अछि आदमी।
आश्वासनक अम्बार मुदा परिणाम शून्य,
हर बेर गैले गीत गाबय अछि आदमी।
जे सवाल से डेराय नै छल काल्हि तक ओ,
आई चुप्पी के ही धर्म बताबै अछि आदमी।
झूठक सीरक में लपेटायल अछि सुकून से,
सचक सीटल हवा से काँपय अछि आदमी।
आर जखन आईना सामने ठाढ़ होइत अछि,
अपहि नज़र से नज़र चोराबय आदमी।
-प्रणव कुमार झा, राष्ट्रीय परीक्षा बोर्ड, नई दिल्ली
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