प्रणव कुमार झा
अविश्वासक चिकित्सा (लघु कथा)
नीमडीह गामक माटि के एकटा गुणी छलाह डॉक्टर रामनारायण बाबू। अपन क्लीनिक मे प्रेक्टिस करैत चश्माक मोट काँचक भीतरसँ जखन ओ मरीज के देखैत छलाह तँ आधा बेमारी तँ ओहिना भागि जाइत छल। गामक ओहि पुरान क्लिनिक में कखनो ताला नै लगैत छल। कोनो गंभीर मरीज अबैत छल तँ ओ ई नै कहैत छलाह कि बचबाक चांस 10 प्रतिशत अछि, बल्कि ओ मरीजक हाथ अपन हाथ में लैत कहैत छलाह अहाँ चिंता कियाक करैत छी? हम छी न!
ई शब्द कोनो कानूनी गारंटी नै छल, मुदा ई एकटा भरोसा छल जे मरीज आ परिजन मे आशाक एकटा उम्मीद जगेने रहय छल। मुदा ओ समय दसको पहिने बीत गेल। आजुक भारत में ई शब्द बहुत कम डॉक्टरक मुँह सँ निकलैत अछि, किएकि आजुक डॉक्टरक मुँह पर कानून आ कॉर्पोरेटक ताला लागल अछि।
रामनारायण बाबू के पोता आलोक आब दिल्लीक एकटा पैघ मल्टी-क्योर कॉर्पोरेट अस्पताल में इंटेन्सिविस्ट छैथ। आलोक अपन बाबाक आदर्श सुनिकेँ पैघ भेल छल, मुदा हुनकर ट्रेनिंग हुनका किछु औरे सिखौने छलैक। मेडिकल कॉलेज में ओकरा एनाटॉमी आ सर्जरीक संग-संग एकटा और चीज सिखाओल गेल छल - ब्रेकिंग बैड न्यूज़ (बुरा समाचार सुनायब)। मरीजक परिजन सँ बात करैत काल कखनो इमोशनल (भावुक) नै होएब। अहाँक आवाज सपाट होबक चाही। सांत्वना नै, प्रोग्नोसिस (पूर्वानुमान) दियौक। जेना कि कोनो मशीन खराब भऽ गेल होय।
आलोक केँ याद अछि ओ समय, जखन पीजी (Post Graduation) के दौरान ओकरा कम्युनिकेशन स्किलक क्लास देल जाय छल। ओतय सिखाओल जाय छल - परिजन केँ सबसे पहिने सभसँ खराब स्थिति (Worst-case scenario) बता दियौक, ताकि जँ मरीज मरि जाय तँ अहाँक माथ पर दोष नै आबय। ओतय हीलिंग (उपचार) नै, डिफेंसिव मेडिसिन (बचाव वला चिकित्सा) सिखाओल गेल छल।
विगत किछ दशक मे डॉक्टर मरीज आ परिजनकेँ एकटा इंसान नै, बल्कि एकटा पोटेंशियल लिटिगेंट (संभावित मुकदमा करय वाला) मानै लागल अछि आ मरीज सब हरेक डॉक्टर के संभावित लुटेरा मानय लागल अछि।। सुषेण वैद्य सूतल छलाह। हुनका सुतले मे खटिया सहित उठा कऽ आनल गेल, एकटा आपात स्थिति में, जखन लक्ष्मण जी मूर्छित छलाह। कते अजीब सलाह छलनि हुनकर - ओहि सुदूर पर्वत सँ चारि टा संजीवनी बूटी आनबाक। हनुमान जी ओकरा चीन्हि नै सकलाह तँ ओ ल़ड़लाह नै, नै ई कहैत वापस अयलाह कि 'नीक जकां कियाक नै कहलहुँ' - ओ तँ पर्वतहि उठा कऽ आबि गेलाह। ओहि सामर्थ्यवान योद्धा सभक बीच एहि वैद्यक सलाह मानल गेल, पूरा सम्मानक संग कियाक तँ ओतय नीयत आ प्राथमिक प्रेरणा मरीजक भलाई छल। कोनो 'कंसेंट' नै, कोनो 'poor prognosis explanation' (खराब भविष्यक व्याख्या) नै - मात्र एक-दोसर पर अटूट विश्वास। मुदा प्राचीन काल से चलि आबी रहल चिकित्सक आ मरीज के बीच के ई विश्वास के कड़ी आब टूटि रहल अछि ।
आलोकक जीवन में एकटा एहन घटना घटित भेल छल, जे ओकरा भीतर तक झकझोरि देने छलैक। दू साल पहिने, इमरजेंसी वार्ड में एकटा युवक केँ लाओल गेल छल, जेकर एक्सीडेंट भेल छल। आलोक आ हुनकर टीम अपन जान लगा देने छल, मुदा बहुत खून बहि गेल छल, ओ बचि नै सकल। जखन आलोक बाहर निकलल आ धीमा स्वर में कहलक, हम सब कोशिश कयलहुँ, मुदा ओ नै रहल... तखन ओहि युवकक परिजन सांत्वना क अपेक्षा नै कयलनि। भीड़ में सँ एकटा आदमी चिचियायल ई डॉक्टर लुटेरा अछि! पाइयो लूटि लेलक आ जान कऽ मारि देलक!
अचानक भीड़ उग्र भऽ गेल। आलोक किछु समझितथीन, ओहि सँ पहिने एकटा भारी कुर्सी हुनक माथ पर बज्र खसल। हुनक चश्मा टूटि गेल, चेहरा लहू-लुहान भऽ गेल। ओही रात आलोक अस्पतालक बेड पर सुतल सोचि रहल छल डॉक्टर-मरीज के बीच नाता-रिश्ता में कड़वाहटक के की कारण भऽ सकय अछि। टोहैत टोहैत पेलखिन जे कारण एक नै, बहुत रास अछि, जइ पर पूरा एकटा थीसिस लिखल जा सकैत अछि। एहि में इलेक्ट्रॉनिक मीडिया आ निजी चैनलक बर्ताव सेहो एकटा मुख्य बिंदु छल,। टीआरपी के लेल संपादकक दबाब में खबरि खोजैत पत्रकार बिगड़ल चिकित्सकीय केस मे 'सॉफ्ट टारगेट' ताकैत अछि।
ओहि दिन सँ आलोक बदलि गेल छल। हुनका भीतरक दयालु डॉक्टर मरि गेल आ एकटा सावधान प्रोफेशनल जन्मि गेल छल। आब ओ कोनो मरीज केँ छुबैत छैथ तँ पहिने ई देखैत छैथ कि हुनकर सुरक्षा कते अछि। आब ओ मरीजक इलाज सँ बेसी फाइल पर ध्यान दैत छैथ । हुनका पता अछि जे मारि-पीट आ केस-मुकदमा के हालात मे कोर्ट में हुनकर नीयत नै, कागज़ देखल जायत। ओ अनगिनत जाँच (Tests) लिखैत छैथ - ओहनों जांच सभ जेकर जरूरत नै अछि - मात्र अपन बचाव लेल, ताकि बाद में केओ ई नै कहय कि ई जाँच कियाक नै कयलहुँ?
आलोक केँ कॉर्पोरेट अस्पतालक असली चेहरा तखन देखय लेल भेटल जखन हुनकर अपन संबंधी बीमार भेल। बीमा कंपनीक लोक सियार सन बैठल छल। प्रीमियम भरैत काल जे मक्खन सन गप्प बाजय छल, ओ क्लेम के समय टेक्निकल एररक छुरी लऽ कऽ ओहि मक्खन के काटय पर आतुर भेल छल। अस्पतालक मैनेजमेंट कहैत अछि - रेवेन्यू बढ़ाऊ। बीमा कंपनी कहैत अछि पेमेंट काटू। आ एहि चक्की में पिसैत अछि असहाय मरीज आ डरल-सहल डॉक्टर।
किछु दिनक बाद, आलोक गाम गेल। बाबाक देहांतक बाद हुनकर गामक क्लिनिक बंद भऽ गेल छल। गामक लोक सब अपन गामक पुराण डॉक्टर के पोता से किछ किछ चिकित्सकीय सलाह लेल घेर लेलक। कोनो बुढ़िया अपन पोता केँ लैत एलैक -बाबू, देखू ने चारि दिन से ई बोखार सँ काँपैत अछि। आलोकक संग हुनकर लैपटॉप नै छल, हुनकर कागजी कारवाई वला फॉर्म नै छल। ओ अपन बाबा के पुरान बेंतक कुर्सी पर बैसल छल। ओ नाड़ी टटोललक। ओ देखलक कि बुढ़ियाक आँखि में वैह भरोसा छल, जे सुषेण वैद्य केँ देखि कऽ लक्ष्मणक पक्ष में वानर सेनाक आँखि में भेल हेतैक। ओकर आङ्खि केँ देखि आलोकक भीतरक डॉक्टर जागि उठल। ओ अपना लग से सैम्पल वला दवाई देलक आ कहलक - दादी, चिंता नै करू, हम छी न! ओहि चारि शब्द सुनैत बुढ़िक चेहरा पर जे चमक आएल, ओ आलोक केँ बड्ड संतोष देलक। हुनका लागल कि असली हीलिंग 'हॉस्पिटैलिटी' में नै, 'ह्यूमैनिटी' में अछि।
गाम सँ दिल्ली वापस आबि आलोक देखलक कि हुनकर अस्पताल में एकटा नब तमाशा भऽ रहल छल। एकटा पत्रकार अपन कैमरा लैत चिचिया रहल छल - देखू एहि लुटेरा अस्पताल केँ! गरीब केँ इलाज नै कऽ कऽ ओकरा मरि जाय लेल छोड़ि देलक! आलोक ओहि पत्रकार केँ देखलक। ओ पत्रकार एकटा टीवी कार्यक्रम के लेल रिपोर्ट क रहल छल जेकर हेडिंग छल - "डॉक्टरक लापरवाही सँ गेल जान"। ई सॉफ्ट टारगेट छल। पत्रकार टीवी चैनल के मालिक के दबाब में अछि, अस्पताल मुनाफाक दबाब में अछि, आ एहि सबक बीच डॉक्टर-मरीजक पवित्र रिश्ता मृतप्राय भऽ रहल अछि।
आलोक अंततः अपन बाबाक गामक ओहि क्लिनिक केँ पुनर्जीवित करबाक निर्णय लेलक। हुनक मति मे ई आबि गेल छल कि जँ छोटे-छोटे क्लिनिक आ पारिवारिक डॉक्टर खत्म भऽ जेतय, तँ आम आदमी अनाथ भऽ जायत।
सरकार, पत्रकार आ समाज - सब सँ हुनकर एकटा बिनती छल - डॉक्टर केँ भगवान नै, इंसान रहय दियौक। ओकरा कंसेंट फॉर्म कऽ पाँज में एहन नै दबा दियौक कि ओ मरीजक आँखि में देखब छोड़ि कऽ बस फाइल में मुड़ी गोतने रहय। आजुक समाज केँ सेहो तय करबाक पड़त जे ओकरा प्रोफेशनल हेल्थकेयर प्रोवाइडर चाही या ओ डॉक्टर, जे माथ पर हाथ राखि कऽ कहि सकय - अहाँ चिंता नै करू, हम छी न!
-प्रणव कुमार झा, राष्ट्रीय परीक्षा बोर्ड, नई दिल्ली
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