प्रणव कुमार झा
तेलचट्टा* के जिनगी जिबैत लोक
हम देखैत छी सगर रोज, तेलचट्टा के जिनगी जिबैत लोक
रासन के, भाषण के, कथित सुशासन के लाइन मे लगैत लोक
परीक्षा परिणाम लेल, रोजगार लेल, लाठी खाइत छाती पिटैत लोक
हम देखैत छी सगर रोज, तेलचट्टा के जिनगी जिबैत लोक।
सड़कक गड्ढा मे, हत्ता मे, अवैध नाव पर डूबि मरैत लोक
दूषित पानि पीबि, तड़पैत, प्राण छोड़इत ‘घंटा’ खबर बनैत लोक
मिलावटी, भोजन, मिलावटी दवाई के सेवन से दम तोड़इत लोक
हम देखैत छी सगर रोज, तेलचट्टा के जिनगी जिबैत लोक।
मेला के, ठेला के क्रिकेट, सिनेमा के भीड़ मे पिचाइत, दबैत लोक
रेलक गाड़ी, बसक सवारी मे, जड़इत, मरइत, बचैत गाम पहुंचइत लोक
ढोंगी मुल्ला-बाबा के दरबार मे, तन-मन-धन खपत करैत लोक
पेट पर लात खाइत, कर्मक लेख बुझि सब सहन करैत लोक
हम देखैत छी सगर रोज, तेलचट्टा के जिनगी जिबैत लोक।
रिल्स के नशा मे नचनियाँ पर लाइक कमेन्ट करैत लोक
पाँच किलो अनाजक झोरा लय, सगरो जग ढ़ोल पिटैत लोक
जाम मे फसैत, टॉक्सिक वर्ककल्चर से खिसियैल घर घुरइत लोक
नगरक दूषित हवा मे चैन केर सांस लेल हाँफैत लोक
हम देखैत छी सगर रोज, तेलचट्टा के जिनगी जिबैत लोक
बच्चा के भविष्य बेचि, मंचक मदारी लेल ताली पिटैत लोक
गाँव मे लगल होई आगि, मुदा अपन घर मे सुरक्षित सुतैत लोक
अन्याय देखि आंखि मुनिने, हमरा की लेब-देब कहि बचैत लोक
रौशनी से मतलब नै रखलक, गंद अनहरियाके जिनगी बुझैत लोक
हम देखैत छी सगर रोज, तेलचट्टा के जिनगी जिबैत लोक।
*सनकिरबा
-प्रणव कुमार झा, राष्ट्रीय परीक्षा बोर्ड, नई दिल्ली
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