VIDEHA ISSN 2229-547X  ·  First Maithili Fortnightly eJournal  ·  Since 2000  ·  www.videha.co.in
विदेह — प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका
Twitter / X Facebook Archive

विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका

विदेह

Videha

प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका — First Maithili Fortnightly eJournal

विदेह नूतन अंक
वि दे ह विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly ejournal विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका नव अंक देखबाक लेल पृष्ठ सभकेँ रिफ्रेश कए देखू। Always refresh the pages for viewing new issue of VIDEHA.


 

हितनाथ झा- मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-२१

हितनाथ झा

(मैथिलीमे ग्रामगाथा विधाकेँ नव जीवन देनिहार, पाठकीय विधाक अगुआ। संपर्क-9430743070)

'प्रभात'क नवम्बर 1934 अंक (वर्ष-2,अंक-11)मे प्रकाशित कोइलख (पुबारिटोल)क पं. श्रीनन्दन झाक निबन्ध जे अत्यन्त महत्वपूर्ण अछि। पं. जीक अनेक लेख अधिकांश अंकमे विविध विषयपर संस्कृतमे प्रकाशित छनि। मैथिलीमे सेहो चारि-पाँच निबंध प्रकाशित छनि। हिनक एक निबन्ध स्त्री-शिक्षा आ नारी सशक्तीकरणपर पूर्वमे विदेहमे प्रकाशित अछि, जे देल गेल लिंकपर तारानाथ झाक मैथिली साहित्यमे योगदान-09 मे देखल जा सकैछ। हिनक निबन्धमे सामाजिक सकारात्मक परिवर्तनपर विशेष जोड़ रहैत छलनि। हिनक निबन्ध सभमे आगाँक सोच परिलक्षित होइत छलनि।

एहि अंकक आलेखमे सेहो साहित्य-शक्ति बिनु समाजमे सुधार नहि भ' सकैछ आ एहि हेतु शिक्षा आवश्यक अछि, मिथिलाक लोककेँ तुलनात्मक उदाहरणसँ साहित्य-शक्तिक उपयोग क' विश्वमे अपन स्थान प्रतिष्ठा सङ्ग पयबाक लेल आह्वान कयलनि अछि, जे साम्प्रतिक समयमे सेहो ओतबहि महत्वक अछि। पंडित जी सभठाम मिथिलाकेँ देश कहलनि अछि, आ देश कोना उत्थान करत ओकर उपाय बतौलनि अछि, भाषा और साहित्यक महत्व जनौलनि अछि आ समृद्धि साहित्ये अहाँकसर्वांगीण उन्नतिक मार्ग प्रशस्त करत। आजुक दिनमे ई आलेख ओहिना महत्वपूर्ण अछि, जहिना आइसँ करीब सय वर्ष पूर्व छल। वास्तवमे वैह साहित्य कालजयी होइत छैक, जे कोनो समयमे ओतबहि ध्यानसँ पढ़ल जाइत अछि आ सभ दिन पढ़ल जायत।

वास्तवमे 1933-34मे कोइलखसँ श्री तारानाथ झाक सम्पादकत्वमे प्रकाशित प्रभातमे अनेक कालजयी रचना सभ अछि जे अद्यावधि विदेहमे 20 अंकसँ धारावाहिक छपल अछि आ आगाँ अंकमे सेहो महतवपूर्ण रचना सभ प्रकाशित होयत। ई क्रम एखन जारी रहत। सुधी पाठकसँ निवेदन जे अपन पूर्वजक अर्जित साहित्यिक धरोहरकेँ अधिकसँ अधिक पाठक धरि पहुँचयबाक प्रयास करथि, जाहिसँ आर अनेक महत्वपूर्ण धरोहर सभ अपनालोकनिक समक्ष आबि सकत। पिछला अंकक लिंक आलेखक नीचाँमे देल गेल अछि।

साहित्य शक्ति
श्रीनन्दन झा, साहित्यतीर्थ

सम्प्रति समस्त संसारमे सुधारक सनसनी सूनि पड़ैछ। जाही भाग दृष्टि-पात करू सर्वत्र " सुधार ! सुधार !!"क समयोपयोगी सरस एवं सुन्दर शब्दक साम्राज्य बूझि पड़त। अपना-अपना देशक शीघ्रातिशीघ्र उन्नति करबाक हेतु तद्देशीय, समस्त जनता नाना प्रकारक पवित्र प्रयत्न कय रहल अछि। समस्त संसार पर गम्भीरता पूर्वक दृष्टि-पात कैलासँ प्रायः एको टा देश एहन नहि भेटत जे अपन सुधार करबाक हेतु बद्ध परिकर नहि हो। जखन कोनो देशक सुधार करबाक आवश्यकता पड़ैत छैक तखन सर्व प्रथम शिक्षाक प्रश्न उपस्थित होइ छैक। कारण जे अवनतिक प्रधान कारण थिक शिक्षाक अभाव। ई सर्व-मान्य विषय अछि जे, कोनो देशक अवनति तखनहि हयबाक विशेष सम्भावना जखन ओहि देशमे शिक्षाक अभाव भै जाइछ। अशिक्षित देशक जनता केँ ई ज्ञान कदापि नहि भै सकैत छै जे --- हमरा देशक शोचनीय अवस्था अछि, अतएव एकर उन्नति करव हमरा लोकनिक प्रधान कर्तव्य एवं पवित्र धर्म थिक।आ सव तँ यैह लोकोक्ति अक्षरशः चरितार्थ करबामे अपन महान गौरव बुझैछ जे " भोदू भाव न जाने, पेट भरयसँ काम।" अतएव बिना शिक्षा प्रचार कयने कोनो प्रकारक देशोन्नतिक यत्न करब ओहिमे अकार्यक थिक जेहने महिसिक आगू वीणा बजायव। अतएव सर्वप्रथम शिक्षा प्रचार दिशि समस्त मैथिल-समाजक ध्यान आकर्षित हयब परमावश्यक।

यद्यपि सम्प्रति सुधार-सम्बन्धी नाना प्रकारक प्रश्न सव मिथिलहुमे उपस्थित भै रहल अछि।किन्तु ओहिसव सुधारक अंग प्रत्यंग पर पूर्ण विचार कैलासँ ज्ञान होइछ जे ई सव प्रकारक सुधारक नींव सुदृढ नहि रहबाक कारण एहि सवसँ सफलता प्राप्त हैब असम्भव नहि तँ कठिन अवश्य। अतएव एहि सव विषयपर, आंशिक प्रकाश राखब उचित बुझै छी। कारण जे, देशक वर्तमान वातावरणक अनुसार सुधारक प्रश्न एहन जटिल भै गेल अछि जे यदि एहि पर सात्विक दृष्टिसँ पूर्ण गम्भीरता पूर्वक बिचार नहि कयल जायत तँ सुधारक मार्ग अकण्टक हयब कठिन। जें हेतु सफलताक स्थानापन्न असफलतैक अधिक आशा। कारण जे सुधारक मार्ग सघन तीव्र कंटकाकीर्ण होइछ। सुधार करबाक कोनो एक मार्ग निश्चित नहि अछि। जिनका जे उचित बूझि पड़ै छन्हि, से ताही मार्गक अनुसरण कय सुधार करबा मे संलग्न देखि पड़ैत छथि।क्यो कहैत छथि जे जा पर्यन्त धार्मिक सुधार नहि हयत तापर्यन्त कोनो प्रकारक उन्नति कदापि नहि भै सकैछ, कारण जे हमर देश (मिथिला) धर्म-प्राण देश थिक, अतएव सनातन-धर्मक मर्यादा अक्षुण्ण रखलहि सँ उन्नतिक आकाशमे आनन्दित भै सकै छी। कोनो महानुभावक कथन छैन्ह जे सर्वप्रथम सामाजिक सुधार हैव अत्यावश्यक अछि। कारण जएं हेतु हमर सामाजिक संगठन शिथिल भै गेल अछि तेँ हेतु हमरालोकनि, यदि कोनो प्रकारक सामाजिक सुधार अथवा उन्नति करय चाहै छी, से कदापि नहि होइत अछि।अतएव समस्त समाजकेँ संगठनात्मक शृंखलाबद्ध कैलावाक अनन्तर हमरालोकनि सव प्रकारक उन्नति कय सकै छी। कारण जे काहलो जाइछ जे " सव सँ बड़ा समाज"। बहुतों महानुभाव लोकनिक-अटल सिद्धान्त छैन्हि जे बिना राजनैतिक उन्नति कयने कोनो आन प्रकारक उन्नतिक यत्न करब समय एवं शक्तिक सर्वथा दुरुपयोग करब थिक। कारण जे जखन हमरा लोकनि राजनैतिक सुधार द्वारा स्वतन्त्र भै जायब तखन सभ प्रकारक उन्नति हमरा सवाहि अनायास कय लेब, इत्यादि। परन्तु एहि सुधारक महानुभाव लोकनि सँ हमर विनीत प्रश्न ई अछि जे जापर्यन्त देशक जनता अशिक्षित रहत, जापर्यन्त जनताकेँ देशक प्रति कर्तव्याकर्तव्यक समुचित ज्ञान नहि हेतैक, तापर्यन्त अपने लोकनि की अपन-अपन अभिलाषा-पूर्ति कय सकैत छी। कदापि नहि। कारण जे धार्मिक, सामाजिक किंवा राजनैतिक सुधार करबामे जतेक कष्ट सहिष्णुता, दृढ़ निश्चय, त्याग एवं उत्साहक आवश्यकता छैक, तकर हैव विना शिक्षा प्रचारक असम्भव नहि तँ कठिन अवश्य अछि।ई सर्व-मान्य विषय थिक जे, जतबा उपकार देश के शिक्षित मनुष्य द्वारा भै सकैछ ततबा उपकार अशिक्षित मनुष्य द्वारा हयब असम्भव।इहो कहब प्रायः अप्रासंगिक नहि हैत जे अशिक्षित मनुष्य सँ देशक उपकारक स्थानापन्न अपकारे हैवाक सर्वथैव सम्भावना। अतएव समस्त सुधारक महानुभाव लोकनिसँ हमर करबद्ध प्रार्थना जे अपने लोकनि एकबेर समस्त संगठित शक्तिसँ सर्वप्रथम शिक्षा प्रचारमे सोत्साह निश्चयात्मक रूपेण संलग्न भै जाइत जाउ, तखन अनायास माता मिथिलाक कल्याणक सङ्ग-सङ्ग समस्त मैथिल समाजक सुकीर्ति पताका समस्त संसारमे अवश्य फहराय लागत, एहिमे विन्दु-विसर्ग मात्र संदेह नहि।

'शिक्षा' एक एहन व्यापक, विशाल एवं प्रभावोत्पादक पवित्र विषय थिक जाहिमे नाना प्रकारक शिक्षा सवहिक समावेश अछि। यदि एकर विशद व्याख्या कैल जाय तँ एहि क्षुद्र लेखकक कोन कथा, पैघ-पैघ प्रकाण्ड विद्वानहुँक चिरायु समाप्त भै गेनहुँ एकर विशद व्याख्या समाप्त नहि भै सकैछ। किन्तु ' शिक्षा' शब्दसँ हमर तात्कालिक अभिप्राय अछि- पठन-पाठन- प्रणालीक प्रचार।अर्थात साहित्यिक सुधार। शिक्षाक अनेकानेक अंग-प्रत्यंगमे साहित्यिक सुधार सेहो एक सर्वश्रेष्ठ एवं प्रधान अंग मानल जाइछ। साहित्यक प्रचार द्वारा जतेक शीघ्र सव प्रकारक शिक्षाक प्रचार भै सकैछ, ततेक आन कोनो साधन द्वारा नहि। साहित्य एक एहन अमूल्य रत्न थिक, जकर प्रचार द्वारा उन्नतिक समस्त साधन केन्द्रीय भूत भै समष्टि रूपसँ संगठित भै जाइछ। साहित्यमे एक एहन अकाट्य शक्तिक समावेश छैक जाहि द्वारा अवनति पंक-पतित देश अविलम्ब समुन्नति सिंहासनारूढ़ भै जाइत अछि। 

साहित्य एवं भाषामे परस्पर अप्रत्यक्ष विभिन्नता रहितहुँ तथापि दूनूमे घनिष्ठ अन्योन्याश्रय प्रत्यक्ष सम्बन्ध छैक। एकक अभावें दोसराक विकास हैव कदापि सम्भव नहि। अतएव हम साहित्यिक उन्नति करबहिमे भाषाक उन्नति बुझै छी। कारण साहित्य द्वारा भाषा परिमार्जित एवं सुसुंगठित भै ओकर जनतामे पूर्ण विकास होइत छैक।तेँ हेतु तद्देशीय - ज्योति जगमगाय लगैत छैक एवं नवजीवनक संचार भै जाइत छैक। जाहि भाषाक साहित्य नहि छैक, एकमात्र वजवा-भुकवाक व्यवहार मे अबैत अछि, ओ भाषा ग्रामीण किंवा असभ्य मानल जाइछ। ओहि भाषासँ देशक उपकार कदापि नहि भै सकैछ।कारण जे साहित्यिक भाषा व थिक जाहिमे पत्र-पत्रिका एवं पुस्तकादि प्रचुर परिमाणमे प्रकाशित हो। 

कोनो देशक अवनतिक प्रधान चिन्ह थिक, ओहि देशक भाषा,भेष एवं भोजनक प्राचीन परिपाटीमे परिवर्तन हैव।जाहि देशक भाषा, भेष एवं भोजन अन्यदेशीय परिपाटीक अनुसार भै गेल छैक ओहि देशक उन्नति हैव असाध्य नहि तँ कष्टसाध्य अवश्य। कारण जे भाषा, भेष एवं भोजनक समानता देशक हेतु सुदृढ़ एकताक परिचायक थिक। जाहि देशक ई तीनू वस्तुक क्रम स्वदेशक प्राचीन परिपाटीक अनुसार एक समान छैक, वैह देश सव प्रकारक उन्नति कै सकैछ। अथवा ओही देशक गणना उन्नतिशील देशमे भै सकैछ। प्रमाणार् बंगाल, पंजाब,गुजरात एवं महाराष्ट्र(मद्रास) हिकेँ राखू। एहिसव देशमे उपर्युक्त तीनू वस्तुमे अधिकांश समानता छैक, जै हेतु ओ देशसब उन्नति-प्रधान देश मानल जाइछ एवं शिक्षा तथा साहित्यक प्रचार सेहो अपना -अपना देशक अनुकूल पर्याप्त छैक। किन्तु अहू तीनू वस्तुमे सर्वप्रधान भाषा थिक। कारण जे जाहि-जाहि क्रमे भाषाक ह्रास किम्बा विकास भेल जेतैक ताहि-ताहि क्रमे भेष तथा भोजनहुक प्राचीन प्रणालीक ह्रास अथवा विकास भेल जेतैक। एहि तीनू वस्तुमे निर्बलता अवितहि सहसा एकताक अभाव भै जाइ छैक, एकताक अभाव होइतहि धार्मिक,सामाजिक, साहित्यिक, राजनैतिक, वैज्ञानिक, आध्यात्मिक एवं आर्थिक इत्यादि कोनो प्रकारक उन्नति अथवा विकास कदापि नहि भै सकैछ, ने कोनो प्रकारक शिक्षाहिक प्रचार हैवाक सम्भावना। कारण जे सब प्रकारक उन्नतिक प्रधान साधन थिक एकता तथा एकताक जननी थिक भाषा एवं भाषाक संगठित , सुव्यवस्थित एवं परिमार्जित रूपक विकासहिक नज़्म थिक साहित्य। जाहि द्वारा सब प्रकारक शिक्षा-प्रचार देशमे सुगमतापूर्वक शीघ्र भै सकैछ।

साहित्य-प्रचार द्वारा जतेक शीघ्र देशमे सजीवता,देश-प्रेम, कर्तव्याकर्तव्य-ज्ञान, एकता, त्याग, दृढ़-निश्चय, उत्साह, कर्तव्यपरायणता, कष्ट-सहिष्णुता एवं स्वावलम्बन इत्यादि समस्त आवश्यकीय गुणक आविर्भाव होइ छैक, ततेक शीघ्र प्रायः अन्य कोनो साधन द्वारा नहि।साहित्य द्वारा जाहि विषयक प्रचार देशमे करय चाही से सब सुगमता एवं सफलतापूर्वक अनायास भै जा सकैछ, एहिमे कोनो मेष-वृष नहि।

हम ऊपर कहि आयल छी जे देशक समस्त सुधार करबाक हेतु सर्वप्रथम शिक्षाक प्रचार करब आवश्यक, जाहिसँ अवश्यमेव देशक दुर्दशा दूर भै देशमे सुख-शान्तिक साम्राज्य स्थापित भै सकैछ। किन्तु शिक्षा प्रचार सेहो विना साहित्यक उन्नतिक हयब असम्भव। कारण जे हमरा जनैत सब प्रकारक शिक्षाक संदेश देशक समस्त जनताक सम्मुख पहुँचैबाक शक्ति साहित्यकेँ छोड़ि आन कोनो साधनकेँ नहि छैक। किन्तु साहित्यक प्रचारक प्रधान साधन थिक पुस्तकादि तथा पत्र-पत्रकादिक प्रकाशन। जापर्यन्त प्रचुर परिमाणमे समाचार-पत्रक प्रकाशन नहि होइ छैक, तापर्यन्त कदापि साहित्यक प्रचार नहि भै सकैछ, ने शिक्षित हैवाक ज्ञान देशक जनताकेँ भै सकैछ। कारण जे कोनो विषयक प्रचार करबाक जेहन शक्ति समाचार-पत्रकेँ छैक, तेहन शक्ति प्रायः अन्य कोनो वस्तुकेँ नहि। अतएव देशक दुर्दशा दूर करबाक हेतु सर्वप्रथम साहित्यक उन्नति करब असीम आवश्यक।

संसारक सम्मुख वैह देश सगर्व ठाढ़ हयबाक साहस कै सकैछ जाहि देशक साहित्य-भण्डार सर्वथैव परिपूर्ण होइक। जे देश साहित्य-शून्य अछि ओ देश कदापि सभ्य देशक समानता नहि कै सकैछ तथा तद्देशीय जनताक शिरपर एहि बातक अमिट कलंक-कालिमा लागि जाइत छैक, जे ओलोकनि स्वदेशक प्रेमी नहि, प्रत्युत मातृभूमिक पतित सन्तान थिकाह। कारण जे जाहि मनुष्यसँ देश, एवं जातिक कल्याण नहि भेलैक -,ओकर जन्म दुर्भगा स्त्री (हिजड़नी)क भरण-पोषण करबाक समान निरर्थक थिक। अस्तु --- 

मिथिलाक सम्प्रति जेहन दुःखद अवस्था अछि से प्रायः कोनो मैथिल सन्तानसँ अविदित नहि अछि।हमरा जनैत मिथिलाक दुर्दशाक प्रधान कारण थिक मैथिली साहित्यक उन्नतिक अभाव।कारण जे देश-हित-सम्बन्धी जे कोनो कार्य देशमे होमय लागल अछि ताहि सबमे प्रायः पूर्ण सफलता प्राप्त नहि भेल अछि। साहित्य भण्डार पूर्ण रहने देशोन्नतिक मार्ग सुगम रहैत छैक, जाहि सौं सर्वसाधारणकेँ देशक सुधार करबामे सुविधा भै जाइत छैक। अतएव हमर समस्त मैथिल समाजसँ एतबे प्रार्थना जे अपने लोकनि आव समस्त सुसंगठित शक्तिसँ मैथिली साहित्य भंडार भरवामे लागि जाइत जाउ तखन निश्चय जानल जाय जे निकट भविष्यमे अवश्य मिथिलाक सब प्रकारक उन्नति भै जायत। कारण जे देशक उन्नति करबाक हेतु जे कोनो आवश्यक साधन अछि,ताहि सभमे सर्वश्रेष्ठ एवं ब्रह्मास्त्र थिक " साहित्य-शक्ति "।

(प्रभात: संपादक-तारानाथ झा, वर्ष-2,अंक-11,1934)

लेखक-श्रीनन्दन झा, साहित्य तीर्थ

(कोइलख, पुबारिटोल)

२५.१०.१९३४

 

संपादकीय सूचना-एहि सिरीजक पुरान क्रम एहि लिंकपर जा कऽ पढ़ि सकैत छी-

मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-1
मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-2
मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-3
मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-4
मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-5
मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-6
मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-7
मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-8
मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-9
मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-10
मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-11
मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-12
मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-13
मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-14
मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-15
मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-16
मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-17
मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-18

मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-19

मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-20

अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ।