हितनाथ झा- मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-२४

(मैथिलीमे ग्रामगाथा विधाकेँ नव जीवन देनिहार, पाठकीय विधाक अगुआ। संपर्क-9430743070)
प्रभातमे प्रकाशित श्री बालादत्त झाक विभिन्न अंकक प्रेरणास्पद कथा, निबन्ध, आचार-विचार संबंधित आ विपदापन्न मिथिलाक प्रति मैथिललोकनिक कर्तव्यक निर्वहन हेतु शास्त्रीय विवेचन, जाहिमे तीनू पक्ष( प्राचीन सभ्यता, नवीन सभ्यता आ प्राचीन नवीनक द्वंद्वक तत्कालीन समयक ध्यानमे रखैत उचित कर्तव्यपर चलबाक उदाहरण सहित प्रस्तुत अछि, विपदापन्न मैथिल कोना अपनाकेँ उबारि सकैत अछि। विद्या भलें संस्कृत रहौ वा अंग्रेजी, ओकर अर्जन पर जोड़ देलनि अछि, जाहिसँ गरीबी तँ दूर होयबे करतैक, स्त्रीशिक्षाक मार्ग प्रशस्त हेतैक आ स्त्री लोकनि सेहो विद्यार्जन करतीह, ताहिसँ मिथिलाक सर्वांगीण विकास हेतैक। एक कथामे ब्राह्मणमे अर्थोपार्जनक शिथिलता आ वर्तमानमे जीनाइ आ बनियाँक अर्थोपार्जन आ भविष्यक सोचपर नीक जकाँ बुझयबाक प्रयास अछि। प.बालादत्त झा संस्कृतक पण्डित रहितहुँ परम्पराक निर्बहन आ आधुनिकताक पाठ सेहो पढ़यबाक सेहो प्रयत्न कयलनि अछि। निम्नांकित रचनाक अतिरिक्त एक आर खण्डित रचना छनि, जकर मात्र पहिल अंकक उपलब्ध छैक, बाँकी अंक अनुपलब्ध अछि।
(पण्डित बालादत्त झा कोइलख(पुबारिटोल)क निवासी छलाह आ श्यामा मन्दिर, वाराणसीमे कार्यरत छलाह। हिनक पिता प.खुद्दी झा प्रख्यात पण्डित एवं कलकत्ता विश्वविद्यालयक मैथिलीक पहिल प्राध्यापक छलाह।) ---हितनाथ झा
सकलुच्ची
श्री बालादत्त झा
एक राजा रहथि, हुनक 'दरबार'मे परम ढहलेल सकलुच्ची नामक भृत्य छलैन्ह जे एक दिन राजा 'साहब'क टाकाक सन्दूक चोराए अपन घर लय गेल। विषय बूझि ओकरा माए कहलकैक जे रे अभगला तोहरा आव राजा फाँसी देथुन्ह।
सकलुच्ची-राख राख, राजाक कोन डर। एतवा कथा सूनि ओ वेचारी गुप्त स्थानमे कतहु राखि, बेटाकेँ कहलक जे रे बौआ! तों बाहरहिमे आइ राति सूति रह, आकाश सँ बतासा खसतैक बीछि-बीछि खैहें।
सकलुच्ची भारी बुद्धिमान छलाहे, ताहि कथा केँ सत्य मानि घरक ओसारा पर ओछाओन कय सूति रहलाह। दुइ पहर रातिमे हुनक माए थोड़ेक बतासा लय आड•नमे फेंकय लगलीहि, इहो बेचारे धड़फड़ कै उठि बिछि बिछि खाए गेलाह। सकलुच्ची बहुत दिन बितला पर एक दिन राजाक कन्याकेँ लय जाए कोनो ढहल ढनमनाएल अप्रसिद्ध इनारमे फेंकि देलकन्हि, ई कथा घर आबि अपन माएकेँ कहलक जे सुनि ओकर माए माथ हाथ दै विकलिभै बैसि कानए लागलि।
दरबारमे किछुकाल राज कन्या केँ लोक नहि देखि चिन्तित भय एम्हर-ओम्हर ताकै लगलैन्हि। राजकन्या तँ इनारमे खसि डूबि मरि गेल छलीहि, ओ कतहु भेटथि ? समस्त ड्यौढ़ीमे हलचल भय गेल।थोड़ेक कालमे राजहुकेँ वार्ता भेलन्हि तँ समस्त नगरक गल्ली, कुच्ची, पोखरि, इनारमे सिपाही, जमादार, घोड़सवार, सभ तकलक, कतहु नहि भेटलथिन्ह,आब हुनका भेटवाक कोन सम्भव।
पश्चात राजा अपनहुँ ओही सकलुच्ची महोदय केँ संग लय विदा भेलाह, तकैत-२ ओही इनार पर गेलाह। विचित्र रूपक इनार देखि सकलुच्ची केँ देखि कहलथिन्ह जे एहि इनारमे पैसि ताक।
"आयू रक्षति मर्माणि" ( एहि घटना सँ पूर्वहिं सकलुच्चीक माए एक बकरी केँ मारि ओही इनारमे फेकि देने छलैक।) आब सक लुच्ची थरथर कपैत इनारमे पैसि हथौड़े लागल, थोड़ेक कालपर एक बकरी भेटलैक, राजा काँ इनारहि सँ कहलकन्हि- करुणानिधान ! राजकन्या केँ दुइ टा सिंह छनि। शोकसन्तप्त राजा कहलथिन्ह, बड़ भारी बूड़ि छें, मनुष्यकेँ कतहु सिंह होइत छैक। पुनि किछु कालें ओ भृत्य कहलकन्हि जे सरकार ! जे सरकार अपनेक कन्या काँ चारि पैर अछि ! राजा- रे गदहा ! मनुष्य केँ चारि टा पैर नहि होइत छैक। पुनि थोड़ेक कालक पश्चात सकलुच्ची -श्रीमन, राजकुमारीकेँ बकरीक सन मूँह ओ पूछ छन्हि। एहि बेर शोकाकुल राजा क्रोधित भय कहलथिन्ह- रे बूड़ि ! जे छै से बहार कर, एतबा सुनि प्रसन्न भय सकलुच्ची हँसैत बकरी केँ पकड़ने बाहर भेल।
राजा बकरी केँ देखि कन्याक आशा त्यागि ड्यौढ़ी चल गेलाह, की करथु, एहि संसारमे गेनिहार केँ रखनिहार क्यो नहि, सकलुच्ची महाशय पूर्वहि जकाँ राजाक समीप मे रहय लगलाह, कतेको निरपराधी सभ राजभवन सँ निकालल गेल ओ कतेको दण्ड पौलक।
" भाग्यम फलति सर्वत्र न विद्या न च पौरुषम" । एहिठाम हमर अभिप्राय ई अछि जे अदृष्ट प्रबल अवश्य, किन्तु-
" उद्योगिनं पुरुष सिंहमुयैति लक्ष्मीरदैवेन देयमिति का पुरुषा वदन्ति। दैवं निहत्य कुरु पौरुषमात्म शक्त्या यन्ते कृते यदि न सिद्धयति कोsत्र दोषः "।
एहि नीति वाक्य केँ स्मरण कै हमरा सवहि काँ सर्वदा उद्योग करैक थिक, विशेषतः विद्याक हेतु।
आइ काल्हि बहुत गोटे एहनो कहनिहार छथि जे संस्कृत विद्या पढ़ि शरीर दुर्बल कै फल कोन भेटत ? पश्चात खेतो कमैवाक सामर्थ्य नहि रहत जे जीवन निर्वाह करब। एकरा हमहुँ मानैत छी किन्तु आँखि पसारि ताकब तँ जतेक संख्या निरक्षर भट्टाचार्य लोकनिक दरिद्रमे भेटत, ततेक विद्वानक नहि।
देश-विदेश सर्वत्र जे क्यो उच्च पद केँ लाभ कयलक अछि , तेँ कोनो विद्या रहौ, एतवा अवश्य कहि सकैत छी जे संस्कृत के अपेक्षा सम्प्रति अंग्रेजी विद्याक आदर अधिक अछि, तेँ की , ई तँ कालक दोष गुण थिक। इति
लेखक:-
विद्वनमण्डलीक लघु सेवक
श्री बालादत्त,
आचार ओ विचार
श्री बालादत्त झा
जाहि प्राचीन कालमे दिव्यदृष्टा मुनिक आदेशसँ 'मिथिला' नाम नगरी प्रतिष्ठिता भेलीहि, ताही समयमे हुनकहि सभहिक पुण्य प्रतापसँ 'सुमिति' -ओ आबि अवतीर्ण भेलीहि। अतएब अति प्राचीन कालसँ ज्ञानशास्त्रक खानि मिथिला देश कहहि पड़त।
ताहि ठामक आचार ओ विचार केहन ? मिथिलाहिक राज जनक विदेह जीवन्मुक्त क्षत्रिय छलाह, ततःपर अन्तिम राजा ' हरिसिंह देवो' क्षत्रिये छलाह, जनिक आज्ञासँ बनल केवल क्रियाधार मैथिल वंश नियमावली ' पंजीप्रवन्ध' अद्यावधि चलि रहल अछि।
किन्तु सपरिताप कहय पड़ैछ जे सम्प्रति नव्य भव्य सभ्यगण्यक पंजर फेरिसँ विचारक डॉड़मे किछु झोंक पड़ि गेल छन्हि, पयर तँ फँसल छन्हिएँ, संभव जे नूज ने भय जाथि।तावता ततेक हानि नहि, हमरा सवहिकेँ नूजो विचार सँ काज चलि सकैछ, किन्तु'आचार' धरि स्थिर रहथि, से यदि आँखि पसारि तकैत छी तँ अपना केँ धिक्कारय पड़ैछ।
'आचार' किएक शिथिल करब ? नहि बनैत अछि, ई कहब ? सुनल जाय- आचारक अर्थ ई नहि कहैत छी जे पूर्व समयमे कोकटी नूआक व्यवहार छल, जे जोलहा, ततमा, खतबै इत्यादि अछोपहिसँ बुनल जाइत छल, एम्हरक टा सँ बनल देशान्तरीय, अतःपर सम्प्रति बाभनहुक बुनल भेटत, तँ से आचार विरुद्ध कहब ? नहि, नहि, प्राचीन समयमे ब्राह्मण मात्र तपस्यामे निरत रहथि, तथापि द्रोणाचार्यक विद्याक प्रभाव केहन छलन्हि ? क्षत्रिय वीरमण्डलमे हुनकहु किछु आचारक संकोच भेले होएतन्हि, जे प्रायः नीति शास्त्रहुमे तकने भेटत, कहबाक तात्पर्य जे ओढ़ब पहिरब ततेक मर्मस्पर्शी नहि, जतेक प्रतिष्ठित कुलज विदित भय प्रतिष्ठित शिरोमणिक समीप पावि अस्पृश्य, अपेय तथा अखाद्यक दिशि व्यर्थ कुनडरी देव तथा जनौ पहिरिने लोक मे ब्राह्मण कहाय अपन परम संसर्ग सब देश भरिकेँ पतित बनाएब।
क्रुद्ध हयबाक हेतु हमर परिश्रम नहि अछि किन्तु ध्यान दय विचार करबाक हेतु । हे गुप्तानाचार प्रवण सभ्याभास ! अपने मनुष्य भय पृथ्वीक परम पवित्र भारत वर्षमे उत्पन्न लेल, से हो जहिं वेद मानैत छी तहिं एखनहुँ धरि समाजक सटारि मेढ़ा मे लेलो छी।अहा ? ओहू ब्राह्मणक कुलानुगत संस्कारमे अनेक प्रकारक व्यय भेल, अक्षर शून्य नहि, प्रत्युत अक्षरपिशाच, ओहो मैथिल ? भला ! कहल त जाव जे अपेय मे कोन स्वाद भेटैछ ? जँ कहब जे उन्मत्तता , तँ से कतेक व्यवहृत वस्तुअहु सँ होएत की ताहि सँ अपनेक मनोरथ पूर्ण नहि ? हमर मैथिल समाजमे मुइला उत्तर मुखवन्ती देल जाइछ, किन्तु विचार डंड़ झोका आचार फेरहा लोक ' जीवतहिं आगि मुँह दय ठुसै, नृपति वश्य कय सवकेँ दूसै " कय रहल छथि!!! अपने सवहिक हेतु दिव्य तेहेन खाद्य पदार्थ सव आइ काल्हि प्रस्तुत होइछ जाहिसँ कुलोचित मर्यादा रहैत सव निवहि जाएत। असद्व्यवहार सँ शरीर विगड़त, व्यय अपर्याप्त वशक हानि, लोक(समाज)मे अप्रतिष्ठता अतःपर अन्तिम परिणाम " हाथ आएल शून्य" । सवदिन एक रङ्ग दिन ककरो नहि रहैछ, तैं कोनो दिन एहनो आओत जे अपनहु लोकनिक दिन दोसर सन बुझल जाएत, ताहि दिन इएह बुझब जे एहि तरंगमे रहि जँ कोनो इष्ट साधन केने रहितहुँ तँ आइ क्यो कहाबितहुँ, से केवल सर्वाशी भय कलांकिये टा भेलहुँ और किछु नहि, इत्यादि विचारि दुरभ्यासक मात्रा केँ घटाओल जाय, जाहिसँ पुनः हमरा ई लिखबाक अवसरक प्राप्ति नहि हो।
इति शम।
लेखक
विद्यावतामनुचरः श्री बालादतः ,
(प्रभात 1933 अंक 6 जून )
विपदापन्ना मिथिलाक प्रति हमरालोकनिक कर्तव्य
श्री बालादत्त झा
जे मिथिला देश प्राचीन भारतवर्षक सर्वप्रधान अंग छल, जे तपोभूमि छल, जतय धर्मचर्चा दिवारात्रि होइत छल, जे शिक्षा एवं विद्या विषयमे अग्रगण्य छल, जतक सामाजिक जीवन शान्तिदायक एवं सुखवर्द्धक छल, जाहि स्थानक लोक द्रव्याभावहुमे जीवन धारणक आवश्यकता थोड़ रहने अर्थकष्टसँ क्लेशित नहि छलाह आइ वैह मिथिला देश मिथिला शिथिलाsधुना के चरितार्थ कय रहल अछि। की ई परमशोचनीय विषय नहि अछि ? की नेत्रवन्द कयने आवो कार्य्य चलि सकैत अछि ?
आव मैथिलक पसार केवल पञ्च कोशहिमे नहि अछि, केवल दरभंगा, मुजफ्फरपुर, भागलपुर आदि जिला धरि नहि अछि अपन विद्वताक प्रभावसँ मैथिल लोकनि बिहार प्रान्तक कोन कथा बंगाल प्रान्त, मध्यप्रान्त,संयुक्त प्रान्त तथा नेपाल देशहुमे अधिक संख्यामे तत्तदेश वासी भय गेल छथि। सर्वप्रथम हमरालोकनिक ई कर्त्तव्य अछि जे निस्सहाया मिथिलाक विछुड़ल पुत्रकेँ संगठन शक्ति द्वारा एकत्रित कय अनाथ, जीर्णशीर्ण शोकाकुला मिथिलाक हृदयकेँ संतृष्ट करी।ककरो एक पुत्र यदि भुतिया जाइत छैक तँ ओकर कोन दशा होइत छैक ? आइ मिथिलाक लाखो सुपुत्र यत्र तत्र भय रहल छथि। कनिकोसँ कनिको चिन्हा परिचय नहि। कनिको प्रति कनिको सहानुभूति नहि। एतवा धरि जे वंश परिचयक अभावसँ हम एक दोसराकेँ मैथिलो कहबामे संकोच करय लगलहुँ अछि ?तस्मात भिन्न भिन्न प्रान्तक मैथिलक संगठन एक वा अधिक सभा द्वारा हयब परमावश्यक अछि। तदुपरान्त समस्त भारतवर्षीय मैथिलक संगठन एक बृहती सभा द्वारा कयल जाय जाहिसँ समस्त मैथिलक एक जीवन हो, एक प्राण हो, एक विचार हो। एहि महान यज्ञक हेतु जाहि त्यागक आवश्यकता अछि ताहि निमित्त हम सब प्रस्तुत होइ ई कर्तव्य अछि।
द्वितीय महान प्रश्न मैथिलजन समुदायक सम्मुख ई अछि जे अन्यान्य सभ्य जातिक सङ्ग-सङ्ग मैथिल जाति कोन प्रकारसँ सभ्यताक क्षेत्रमे अग्रसर होइत रहय जाहिसँ जातीय जीवन दिनानुदिन नवीनतर होइत जाय कोनो जाति जीवित रहय एतदर्थ जातीय जीवनक स्वरूपक तथा परिस्थितिक ज्ञान रहब परमावश्यक।परिस्थितिक उपेक्षा कयने जीवन दीपक निर्वाण हयब स्वाभाविक।मैथिल जातिक जीवन यापन निरापद हो एतदर्थ वर्त्तमान समयमे तीन दल देखल जाइछ।
1. प्राचीन सभ्यताक पक्षपाती।
2. नवीन (पाश्चात्य) सभ्यताक पक्षपाती।
3. प्राचीन नवीन सभ्यताक पक्षपाती।
प्रथम दल कोनो प्रकारक नवीनता नहि चाहैत छथि। हिनक विचारसँ प्राचीनतक रक्षा सर्वावस्थामे कर्त्तव्य थिक।यदि किनको बड़ा लाटसँ भेँट करबाक होइन्ह तँ कोट पतलून पहिरवाक आज्ञा हुनका समाज नहि दैन्हि , ई हुनक इच्छा, यदि मैथिलक 'होटल'मे क्यो भोजन करय तँ हुनक विचारसँ ओ जाति सँ वहिष्कृत कयल जाथि।
द्वितीय दल प्रत्येक आचार व्यवहारकेँ मैथिल समाजमे आनय चाहैत छथि जाहिसँ थोड़बो क्षणिक लाभ हो आवश्यकता हो, अथवा नहि, कोट, चश्मा, नेकटाइ आदिक व्यवहार करै चाहैत छथि कारण ई जे एहिसँ अनेको स्थानमे आदर सत्कार भेटवाक सम्भावना। कहू ! जातीयताक गौरव तखन की रहल ?
तृतीय दल प्राचीन एवं नवीनक सम्मिश्रण करैत छथि। प्राचीन एवं नवीन उपकरण द्वारा जातीय जीवनक रक्षा करब उचित बुझैत छथि।
जाहिसँ मैथिलक आदर्श बनल रहय से प्रयत्न प्राणसँ करब उचित। मैथिल जातिक सम्बन्ध आव देहातहिमे अवरुद्ध नहि अछि साधारण अदालत फौजदारी कचहरी सँ लय क बड़ा लाटक सभा धरि अछि।सङ्ग सङ्ग रेल तार कल कारखाना आदि नवीन नवीन वस्तु सभक प्रचार भेल अछि। की एकर उपेक्षा कयने कथमपि कार्य्य चलत ?
(क्रमशः, गतांकसँ आगाँ)
मिथिला धर्म प्रधान देश छल। की आवहु अछि ? मैथिलक धर्म्म परायणता आब केवल मात्र संध्या गायत्री मे रहि गेल अछि। परन्तु एकरो तत्त्व बुझनिहार कतेक व्यक्ति छथि। धर्म्मक नामपर अनर्थ हयब प्रारम्भ भय गेल अछि। यदि रोकल नहि गेल तँ देश अवश्य रसातलमे पहुँचत।पुरोहित लोकनि ग्रामोफोन जेकाँ केवल शब्दोच्चारण करै छथि। कतेक आब कर्मकाण्ड पढ़ब व्यर्थ बुझैत छथि।कारण जखन यजमानक कार्य उपस्थित होइत छैन्ह तँ ककरो संग लय कय जे कर्मकाण्ड जनैत छथि यजमानक ओहिठाम पहुँचि जाय छथि। पितरकेँ पिण्ड प्राप्त होइत छैन्ह वा नहि एकर समाधान करबामे कतेक पुरोहित समर्थ हयताह ? धार्मिक ग्रन्थक अध्ययन आब विचारपूर्वक होमक चाही। स्मरण राखू आब प्रत्येक कथनक हेतु उपयुक्त कारण देखयबाक हयत।मिथिलाक अन्य जातिकेँ धार्मिक ह्रास जे भय रहल अछि तकर दोष प्रधानतः मैथिल ब्राह्मणक ऊपर छैन्ह। सामाजिक अधःपतन अपन अन्तिम सीमा धरि पहुँचि गेल अछि। किछुकाल पूर्व धनक लोभमे पड़ि 5-7 विवाह करब एक साधारण बात छल। आबहुँ एहन गोटेक बृद्ध भेटताह, जिनका 20-25 होइन्ह। परन्तु आबहुँ दू गोट विवाह वाला सज्जन कतेको छथि। यदि क्यो अपन समधिकेँ डेराबय चाहैत छथि तँ ओ कहैत छथिन्ह जे हम अपन बालकक द्वितीय विवाह करा देबैक। धनक लोभसँ षडवर्षीया कन्याक विवाह 50 वर्षक बृद्ध वरक सङ्ग कय देव आबहुँ देखल जाइछ। की एहन व्यक्तिकेँ सामाजिक कोनो प्रकारक दण्ड देल जाइत छैन्हि ? बाल विवाहक फल शिक्षा पर, स्वस्थ्यपर एवं भावी सन्तान पर जे होइछ से सव काँ विदिते अछि। तथापि स्त्रीगणक दुराग्रहमे पड़ि हमरलोकनि बाल विवाहितक संख्याक वृद्धिए कयने जाइत छी। " कन्यादान" आब अछि कतय। कन्यादानक स्थानमे "कन्या विक्रय"क परिपाटी आरम्भ भय गेल अछि। अन्यान्य जातिमे एहि प्रकारक लेब-देबक व्यवहार नहि छैक। ऊंच नीचक विचार जातिमे अवश्य छैक परंच तकर विचाराचार केवल विवाह कालहि में रहैत छैक। ई नहि जे ऊंच छथि ओ आजीवन ऋणदाताक सदृश अपन टाका ओशूल करवाक हेतु ऋणीक इच्छा विरुद्धो हुनका ओहिठाम धरणा दैते रहथि। विवाह संबंधी तँ एहन-एहन कुप्रथाक आरम्भ भय गेल अछि जकर 5-7 करब अनुचित एवं उपहासजनक बुझना जाइछ। सहनशीलताक मात्रा लुप्तप्राय भय गेल अछि। थोड़बो सन जगहक हेतु ' कपड़फोड़ी' कय लेब साधारण बात अछि। 'धुरखेल'क अवसर पर गणासक चलब, मोकदमा हयब कोनो नवीन बात नहि। यदि ग्राम संगठनक कार्य प्रारम्भ हो तँ सव प्रकारक मतभेद पञ्चैती द्वारा मेटा सकैछ। गृह-कलहक प्रधान कारण स्त्रीगण मूर्खा एवं अशिक्षता रहब अछि।।
आर्थिक अवस्था एहि समाजक जेहन अछि से सब काँ ज्ञात अछि।कोनो गाममे 4-5 घरकेँ छोड़ि , सबहक कोन कथा, अधिकांश सुखित नहि भेटताह। एकर प्रधान कारण उद्योगहीनता अछि।जाहू कालमे गृहस्थ एकदम बेकार बैसल रहैत छथि ताहू कालमे यदि ओ चाहथि तँ अपन आर्थिक अवस्थाकेँ सुधारवाक यत्न कय सकैत छथि।परन्तु कोनो कार्य करथु कोना ? माथपर तँ आलस्य एवं अनुचित सन्तोषक भूत सवार रहैत छैन्हि।
हमरा बुझनामे मैथिल जातिक मध्य परस्पर विरोधक मात्रा ततवा अधिक नहि अछि जतवा पारस्परिक सहानुभूतिक अभाव। श्रोत्रिय अश्रोत्रियक एक अस्वाभाविक विभाग भेल अछि। पंजिबद्ध अपंजिबद्ध केँ हीनदृष्टिसँ देखैत छथि। धनिक निर्धनकेँ सर्वथा उपेक्षा करैत छथि। संस्कृतज्ञ असंस्कृतज्ञकेँ तथा अंग्रेजी पढ़ल-लिखल अंग्रेजी नहि पढनिहारकेँ आदर नहि करैत छथि। जाहि स्थानमे क्यो मैथिल प्रधान भय कs रहताह ताहिठाम अन्य मैथिल केँ ताकि-ताकि कय लायब , वा यदि क्यो अयबाक उद्योग करय तँ ओकरा आब देमक नीतिकेँ ग्रहण करब ओ लाभप्रद नहि बुझैत छथि। आब विचारणीय विषय ई अछि जे मैथिल जातिक उन्नति कोना हो, ई जाति सुखी कोना हयताह। साधारण दृष्टया सुखक तीन रूप छैक, शारीरिक, मानसिक एवं आध्यात्मिक। प्रथम प्रकारक सुख उत्तम स्वास्थ्य द्वारा एवं अन्न-वस्त्र द्वारा प्राप्त होइछ। द्वितीय प्रकारक सुख विद्याध्ययन द्वारा एवं सुशिक्षा द्वारा भेटैछ। तृतीय प्रकारक सुख अध्यात्म विद्या द्वारा भेटि सकैछ।
यदि विचार कयल जाय तँ मैथिल जातिकेँ यथार्थतः कोनो प्रकारक सुख नहि प्राप्त छैन्ह। तैं हम कहैत छी जे मैथिल जाति वा इहो कही जे समस्त मिथिला विपदापन्न अछि तँ कोनो अत्युक्ति नहि। एहि विपत्ति सँ बचबाक उपाय कोन अछि, सुखी बनयबाक युक्ति कोन अछि। हमर क्षुद्र बुद्धि मे तँ यैह अबैछ जे " ऋते ज्ञानान्न मुक्तिः!" यदि हम अपन उद्धार चाहैत छी , यदि यथार्थमे सुखी बनय चाहैत छी तँ अपन अवस्थाक ज्ञान, आत्मज्ञान, प्राप्त करबाक उद्योग करक चाही। हम सब मोहमे पड़ल छी, अपन हित अनहितक ज्ञान नहि अछि। यावत धरि ई मोह नहि हटत, ज्ञानोदय नहि हयत तावत पर्य्यन्त नेत विपत्ति सँ उद्धार हयबाक आओर ने यथार्थ सुखक प्राप्ति हयबाक सम्भावना अछि।
इति शम् ।।
लेखक -श्री बालादत्त झा(कोइलख)
(प्रभात, वर्ष-2, अंक 06,07, जून-जुलाइ 1934)
श्री भद्रकाली विजयते।
निनानवेक फेरि
श्री बालादत्त झा
एक नगरमे क्यो धनिक बनिआँ छल, ओकरा घरहि लग एक दरिद्र ब्राह्मणक घर छलन्हि।बनिआँ अपन आय व्यय विचारि कहियो सातु, कहियो रोटी,कहियो फुटहे खाए लेथि, परन्तु ब्राह्मणकेँ "आयव्यय"क परिगणन छलन्हि नहि, जे किछु यजमान सभैक ओतय सँ माँगि चाँगि आनथि ताहिसँ नित्य दूनू साँझ दालि, भात, पूरी ओ तरकारी इत्यादि उत्तम वस्तु सव भोजन कय घरघराएन यजमानक कल्याण मनबैत आनन्दहिसँ समय बिताबथि।हुनका घर लगक ताहि बनिआँक लोककेँ हिनक भोजनानन्द देखि बहुत आश्चर्य लगैक। एकदिन ओहि बनिआँक स्त्री बनिआँसँ पुछलकन्हि- जे हमरालोकनिकेँ एतेक धन रहलु उत्तर कहियो नहि उत्तम जेकाँ भोजन होइछ ओ ई ब्राह्मण परम् दरिद्र अछि तथापि नित्य नीके भोजन करैत अछि तकर की कारण ?बनिआँ कहलथिन्ह जे हमरालोकनि धनी भइयो निनानवेक फेरिमे पड़ल छी, तेँ हमरालोकनिकेँ बढिआँ भोजन नहि कय होइछ।यथा नीति कहैछ -
"जेना ज्वरादि रोग पाबि दिव्य अन्न ढेरि मे।
घृणा होइछ तेहिना निनानवेक फेरिमे।।"
ओ ब्राह्मण निनानवेक फेरिसँ बाँचल छथि, तेँ नित्य दिव्य भोजन करैछ, बनिआँइनि पुछलथिन्ह जे निनानवेक फेरि की ?
बनिआँ- बेस, एकर तमाशा हम देखाए दैत छी, ई कहि निनानवे गोट टाका गनि एक लत्तामे बान्हि अपन स्त्रीक हाथमे दय हुनका कहलथिन्ह- ई गेठरी अहाँ ओहि बाभनक घरमे फेकि आउ, परन्तु क्यो देखै नहि, ताहि रूपें फेकबैक।बनिआँइनि ओ गेठरी लय लोकक आँखि बचाय ब्राह्मणक घरमे फेंकि ऐलीहि। ब्राह्मणी घर आबि ओ गेठरी पाबि फोललन्हि तँ ओहिमे निनानवे गोट तक ?।से देखि बड़े प्रसन्ना भेलीहि, ओ टाका लय अपन स्वामीकेँ देखय देलन्हि, ओहो(ब्राह्मण) देखि बहुत प्रसन्न भेलाह, किछु कालधरि तँ यैह परामर्श भेल जे ई आएल कतयसँ ? नीतिक कथन अछि जे स्त्री केँ द्रव्य देव नहि नीक, ओ देयै तँ जाचक थिक।
सव रूपें परामर्श कय निश्चय कयलैन्ह जे ई भगवान देलन्हि अछि, एहिमे एके टाका और राखि देलासँ एक द0शय पूर भय जाएत ओ एक शय फराक राखि ढेला उत्तर बेरि पर काज आओत। बस सबहि गोटय निश्चय कयलैन्ह जे चारि दिन धरि यदि सातु रोटी ओ फुटहा इत्यादि खाइ तँ एक टाका बाँचि जाएत। यैह उपाय सव गोटय चारि दिन धरि कय एक टाका बंचाय शय पुरौलन्हि, बस ब्राह्मण विचारलन्हि जे चारि दिनमे और एक रुपैया खर्चो भय गेलापर शैयो रुपैया जमे रहत। फेरि चारि दिन ओही रूपें निर्वाह कय एक शय और एकट्ठा कय राखि देबाक थिक ई विचारि वैह निर्वाह सर्वदाक हेतु स्वीकार कय लेलन्हि, दश-बीस दिन बीति गेला उत्तर बनिआँ अपन स्त्री केँ पुछलथिन्ह कहू, आब बाभन(देवता)क घरमे कोन प्रकारेँ भोजनाच्छादनक आनन्द होइत छन्हि, हुनक स्त्री (बनिआँइन) कहलथिन्ह जे जाहि दिनसँ हम निनानवे टाकाक गेठरी फेंकलिऐक , ताहि दिनसँ हमरहु घरसँ अधिक कष्ट बाभनैक घरमे होइत छैक, तखन बनिआँराम कहलथिन्ह यैह थिकैक ' निनानवेक फेरि" जे धन एकट्ठा करय चाहैत अछि तकरा अन्नवस्त्र रहलहु पर सर्वदा उपभोग नहि होइत छैक।
इति शम् ।
लेखक
कोइलख निवासी श्री बालादत्त झा
पो.औ. रामपट्टी जि. दरभंगा।
संपादकीय सूचना-एहि सिरीजक पुरान क्रम एहि लिंकपर जा कऽ पढ़ि सकैत छी-
मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा
एवं हुनक परिवारक योगदान-1
मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा
एवं हुनक परिवारक योगदान-2
मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा
एवं हुनक परिवारक योगदान-3
मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा
एवं हुनक परिवारक योगदान-4
मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा
एवं हुनक परिवारक योगदान-5
मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा
एवं हुनक परिवारक योगदान-6
मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा
एवं हुनक परिवारक योगदान-7
मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा
एवं हुनक परिवारक योगदान-8
मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा
एवं हुनक परिवारक योगदान-9
मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा
एवं हुनक परिवारक योगदान-10
मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा
एवं हुनक परिवारक योगदान-11
मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा
एवं हुनक परिवारक योगदान-12
मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा
एवं हुनक परिवारक योगदान-13
मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा
एवं हुनक परिवारक योगदान-14
मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा
एवं हुनक परिवारक योगदान-15
मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा
एवं हुनक परिवारक योगदान-16
मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा
एवं हुनक परिवारक योगदान-17
मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा
एवं हुनक परिवारक योगदान-18
मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा
एवं हुनक परिवारक योगदान-19
मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा
एवं हुनक परिवारक योगदान-20
मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा
एवं हुनक परिवारक योगदान-21
मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-22
मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-23
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