हितनाथ झा- मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-२२

(मैथिलीमे ग्रामगाथा विधाकेँ नव जीवन देनिहार, पाठकीय विधाक अगुआ। संपर्क-9430743070)
श्री क्वैलख देव्यै नमः ।।
क्वैलख
श्री कार्तिकेय झा, कोइलख
ई ग्राम मिथिलामे एहन प्रसिद्ध अछि जे एतद ग्रामवासि-महाशयवृन्दकेँ कतहु अपन ग्रामक विशेष परिचय देवाक कष्ट उठयबाक प्रयोजन नहि पड़ैत छैन्ह। प्रत्युत एतद ग्राम पार्श्व वर्ति-ग्रामवासि-महाशयवृन्द अपन-अपन ग्रामक परिचय देबामे सफलता प्राप्त करबाक हेतु एहि ग्रामक नार्मलय कृतार्थ होइत छथि।
एतद ग्रामवासि-भूतपूर्व-विपश्चिद गण-प्रणीतानेक ग्रंथावलोकनसँ विदित होइत अछि जे ' मिथिला'मे एहन पुरातन, प्रतिष्ठित, विद्वज्जनमण्डल मण्डित, ग्रामान्तर अधिक नहि छलैक, अर्थात ई ग्राम आदर्श छल।
एतद ग्रामवासि ब्राह्मणवृन्द एहन आदर्श स्वरूप,कर्मठ,अग्निहोत्री, चरित्रसम्पन्न तथा ऋषिगणवत सात्विक छलाह जे हुनका लोकनिक योग्यतानुसार उचित प्रतिष्ठा वितरण स्वरूप पंजीप्रवन्ध स्थापना करबाक हेतु नृप हरि सिंह देव मिथिलामे अद्यावधि प्रसिद्ध छथि।
हिनका लोकनिक पारस्परिक स्नेह, सहानुभूति, आचार, व्यवहार तथा सन्तोष आदि सद्गुण सीखि ग्रामान्तरवासि-मैथिल सज्जनवृन्द हिनका लोकनिकेँ शिरोधार्य स्वीकार करबामे कनेको नहि हिचकैत छलाह।
एहि ग्रामक पुरातन पण्डितक ग्रंथावलोकनहिसँ आइयो काल्हि धर्म निर्णय करबामे विद्वदगण समर्थ होइत छथि।
एहि ग्राममे पढ़ि जगत्प्रसिद्ध महामहोपाध्याय गोकुलनाथोपाध्यय अनेक दर्शनक टीका लिखबामे तथा बंगाल आदि अनेक देशमे न्यायाद्यन प्रचार करबामे सफलता प्राप्त कयलैन्ह।
प्रायः ओहि समयमे विना हिनका लोकनिक सम्मतिसँ धर्म्म निर्णय कतहु नहि होइत छलैक।
हिनका लोकनिक जीविका अन्यानधीन छलैन्ह। जे विद्वान छलाह विद्यासँ धनोपार्जन कय निर्वाह करैत छलाह।अतिरिक्त जनसमुदाय अति कुलीनता प्राप्त कैओ कय स्वश्रम सँ धनोपार्जन कय जीवन निर्वाह करैत छलाह। याचना, वरकन्या विक्रय तथा वाणिज्यादि सदृश सदुपायसँ धनोपार्जन करबामे ओ लोकनि अनभिज्ञ छलाह।हुनका लोकनिक विद्याश्रमोपार्जित भूमिसम्पन्न-अनेक घर एहिग्राममे अद्यावधि वर्तमान अछि।
यद्यपि ई लोकनि दैवयोगसँ कदाचित निर्धन भय जाथि तथापि स्वसंतोष द्वारा हिनका लोकनिकेँ दुःखानुभाव कहियो नहि होइन्हि। अतएव परमुखापेक्षी कहियो नहि होथि।
हिनका लोकनिक सामाजिक व्यवस्था एहन समुचित तथा सुदृढ़ छलैन्हि जे केओ ओकरा उल्लंघन नहि कय सकैत छलाह।
हिनका लोकनिक लाघव गौरव व्यवस्था धनाधन निवन्धन नहि छलैन्ह किन्तु आचार-विचार निवन्धन छलैन्ह।
हिनका लोकनिक प्रतिष्ठा तथा सन्तोष एतेक बढ़ि गेल छलैन्हि जे राजा लोकनिकेँ हिनका लोकनिक सङ्ग वैवाहिक सम्बन्ध करबाक हेतु लालायित भय निराश होमय पड़ैत छलैन्ह। ई लोकनि स्व समाजसँ अन्य समाजमे वैवाहिक सम्बन्ध स्थापना कयनिहार व्यक्तिकेँ वक्त्यन्तर मानैत छलथिन्ह।
अस्तु हिनका लोकनिक गुण वर्णन करब मानू सूर्यकेँ दीप सँ देखायब थिक।आइ काल्हि हमरालोकनिक जे किछु सामाजिक सुव्यवस्था शेष रूपमे वर्तमान अछि से ओही महानुभाव लोकनिक व्यवस्थाक अवशिष्ट परमाणु मात्र एक अंश थिक। पाठकवृन्द, एहिसँ अनुभव कय सकैत छी जे ओहि दिनुक सामाजिक सुव्यवस्था केहन छलैक।
परन्तु बहुत दुखक विषय थिक जे आइ-काल्हि सब विपरीत भय गेल अछि।हमरा लोकनिक एहन कदाचार तथा कुविचार सुदृढ़ भेल जाइत अछि जे हमरा लोकनिक प्रतिदिन अधःपतन भय रहल अछि।
हमरा लोकनिमे एतेक ईर्ष्या तथा द्वेष बढ़ि गेल अछि जे यदि नेपाल राज्यसदृश एहूठाम अभियोग (मोकदमा) करबामे द्रव्य व्यय नहि होयतैक तँ आवाल वृद्ध मधुबनीक न्यायालयक चौकठिक चुम्बन करैत रहितहुँ।
यद्यपि हमरा लोकनि असदु पापसँ धनोपार्जन करबामे चतुर भय गेल छी।परन्तु बहुत दुखक विषय थिक जे तथापि बहुत व्यक्ति धनहीन दृष्टिगोचर होइत छी। की कारण ? से परमात्मा वेत्ति ।
एहन दुःस्थितिमे प्रति कार्यमे द्रव्य-व्यय करबाक व्यवहार एहन हमरा लोकनिमे सुदृढ़ भय गेल अछि जे धनहीन व्यक्तिक वास होयब असंभव भय गेल छैन्हि। दैवहत धनहीन व्यक्ति यदि सर्व रंच वेचि कार्यमे खर्च कयलैन्ह तँ नष्ट भेलाह,यदि नहि कयलन्हि तँ आजन्म असूयक जनवाग वाणाहत होयबाक कष्ट उठाबय पड़ैत छैन्ह। अर्थात उभयथा दुःख भागी बनैत छथि।
अस्तु वर्त्तमान दशाक विशेष वर्णन करब केवल पृष्ठपोषण मात्र थिक। अतएव एहि गामक आधुनिक अवनातिक परिचय देवाक हेतु एक उदाहरण मात्र सज्जन पाठकक समक्ष उपस्थित कय हम अपन उद्देश्याभिमुख होयब।
आइ काल्हि देशमे अनेक धार्मिक प्रश्न स्पृश्यास्पृश्य, तथा हरिजन मन्दिर प्रवेश आदि उपस्थित भय गेल अछि, जाहि हेतुक देश सम्प्रति दू दलमे विभक्त भय गेल अछि।एक दलक पक्ष स्थापना करबाक हेतु विश्वमान्य महात्माजी सदृश नेतृप्रवर कटिबद्ध भय सफलता प्राप्त करबाक हेतु देशभ्रमण कय रहल छथि। द्वितीय दलक पक्षरक्षार्थ धार्मिक शिरोमणि श्री मान महाराज बहादुर गिद्धौर अपन राज्य-कार्य त्यागि कय ओ एहि दलक नेतृत्व स्वीकार कय अमूल्य समय नष्ट कय रहल छथि। और एकर कार्य संचालनक हेतु बहुत मुद्रा प्रदान कयलैन्ह अछि। " बिहार प्रान्तीय देवालय संरक्षण समिति" स्थापित भेलि अछि। एकर शाखा सर्वत्र स्थापित भय चुकल अछि।
अस्तु,जे ग्राम एहन-एहन देशव्यापी धार्मिक प्रश्न उपस्थित भेला पर स्वपक्ष रक्षार्थ अग्रसर होइत छल, से आइ काल्हि पृष्ठपोषको नहि होइत अछि एहिसँ बेसी दुःखक विषय की भय सकैत अछि ? अर्थात एहि ग्राममे एक शाखा मात्रो नहि अछि। प्रायः एहि गामक केओ सज्जन ओहि समितिक सदस्य मात्रो नहि बनल छथि। यदि बनलो होएताह तँ एक-दू व्यक्तिसँ बेसी नहि। कहू ? एहिसँ बेसी कतेक भय सकैत अछि।
परन्तु नवयुवकगण, हताश होयबाक प्रयोजन नहि। यदि हमरा लोकनि चाही तँ यथा हमरा लोकनिक पूर्वजसव स्वसद्गुण बलें ईश्वरवत समाजमे सम्मान प्राप्त कय एहि क्वैलखकेँ वासुदेवपुर नामसँ पूर्वमे प्रसिद्ध कयने छलाह।तथैव हमरा लोकनि कय सकैत छी। कर्तव्य पालन कयने को महत्व नहि प्राप्त कय सकैत अछि ?
आइयो काल्हि ई ग्राम दिग्विजयी, विश्वविख्यात पण्डित सँ रिक्त नहि भेल अछि। आइ ओ काल्हि एहि ग्राममे अति पुरातन, अनुपलब्ध प्रतीक मात्रा वशिष्टनिक ग्रन्थ नवीन जीवन दान कय प्रकाशित भय रहल अछि। आओर एहन संस्कृत भाषा आंग्ल भाषो भय पारदश्वा विद्वान एही ग्राममे उपलब्ध भय सकैत छथि, जनिक सदृश विद्वान सम्पूर्ण मिथिलामे प्रायः उपलब्ध हयब असम्भव।
आओर बहुत दिन नहि वितल अछि जे एहन व्यवस्था पत्र एही ग्राममे लिखल गेल छल, जे देखि वैकुण्ठवासी श्रीमान महाराजाधिराज बहादुर सदृश विज्ञ निरोता महामहोपाध्याय लिखित व्यवस्था पत्रकेँ .तिरस्कृत कयलैन्ह।
बहुत दिन नहि बीतल अछि जे 'नागेशोक्ति प्रकाश ' सदृश ग्रन्थ लेखक अमरत्व प्राप्त कयलन्हि अछि।
यदि तत्पर भय अन्वेषण हमरा लोकनि करी तँ एहन-एहन व्यक्ति आइयो काल्हि एहि ग्राममे अवश्य उपलब्ध भय सकैत छथि, जे प्रतिदिन हवन करैत छथि स्वयंपाकी छथि, रात्रिंदिव पूजापाठ निरत रहैत छथि, ओ अपन नित्यकर्म कर्मवामे एहन दृढ़ ब्रत छथि जे गृह दाह सदृश भयानक विपत्ति उपस्थिति भेलहुँ पर अपन नित्य कृत त्याग नहि करैत छथि, अर्थात हिनका लोकनि प्राणहुं सँ बेसी स्वकर्तव्य मे प्रेम रखैत छथि।
ई लिखबामे अत्यन्त आनन्द तथा गर्व होइत अछि जे क्वैलख तथा क्वैलख प्रान्तीय बालकगण केँ निःशुल्क शिक्षादायिनी, मन्दिर निर्मात्री, गंगावदाराध्या, धर्ममूर्ति श्रीमती रानी साहिबाक जन्मस्थान यैह ग्राम थिकैन्ह। जनिक लक्षक लक्ष मुद्रा धर्म्म विभागमे काशी आदि अनेक तीर्थमे व्यय भय रहल छैन्ह। हमरा लोकनिकेँ श्री 108 भद्रकाली सँ प्रार्थना करबाक चाही जे श्रीमती रानी साहिबा चिजीविनी होथि, जाहिसँ हिनका अपन जन्मस्थान मे उच्च शिक्षालय स्थापना करबाक सुयोग प्राप्त होइन्हि।
नवयुवकगण, यदि हमरा लोकनि चाही तँ अतिश्लाघ्य एतद ग्रामीण आंग्ल भाषा विद्गणक सहायता सँ अनेक ग्रामोपकारिणी संस्था स्थापित कय सकैत छी। कारण जे राजकीय कार्यालय मात्र केँ ओ लोकनि रचावस्थितिसँ अलंकृत कय रहल छथि।
एहन सुसंयोग प्राप्त कैओ कय जे एहि ग्राममे पोस्टऑफिस मात्रो एखन धरि स्थापित नहि भय सकल अछि से ग्रामक दुर्भाग्य थिक। अर्थात सवतरहक सुविधा प्राप्त कैओ कय जे उन्नति मार्गमे हमरा लोकनिक श्रेयसर नहि होइत छी से हमरा लोकनिक आलस्य अथवा दुर्भाग्य मात्र थीक।
अतएव हमरा लोकनि केँ उचित थीक जे आलस्य त्यागि पूर्वजक गौरव रक्षार्थ स्वसदुन्नति द्वारा एहिग्रामकेँ पूर्व प्रतिष्ठा प्राप्त करयबाक चेष्टा करी। इति शुभम।
कार्तिकेय झा कोइलख
(प्रभात वर्ष-2, अंक-6, जून 1934)
उपर्युक्त आलेखक लेखक कोइलखक गामक पहिल मुखिया प. कार्तिकेय झा प्रसिद्ध घुल्ली बाबू छलाह। नवतुरियाकेँ सम्बोधन क' अपन पूर्वजक आ गामक प्रतिष्ठाकेँ कोना आगाँ बढ़ाओल जाय, ओहि विषयमे प्रभावोत्पादक आलेख अछि। कोइलखसँ पहिने क्वैलख आ ओहूसँ पहिने कोइलखकेँ वासुदेवपुर नामसँ जानल जाइत छल।
प. कार्तिकेय झाक विषयमे कोइलख पोथीमे जकर लेखक हितनाथ झा छथि, जे देल गेल अछि, ओ हू-बहू एतय प्रस्तुत क' रहल छी।
पण्डित कार्तिकेय झा
प. कार्तिकेय झा गामक प्रथम मुखिया छलाह। हिनक जन्म साओन कृष्ण अमावास्या उपरि प्रतिपदा 1899 ई.केँ भेल रहनि आ घर दछिनबारि टोलमे छलनि। ई संस्कृतक विद्वान एवं सामाजिक काजमे अग्रणी रहैत छलाह। नैष्ठिक रहथि, किन्तु दकियानूसी विचार- व्यवहारसँ जकड़ल नहि रहथि।
हिनक प्रतिष्ठा गामसँ बाहर एहि लs कs अधिक रहनि जे शतरंजक ई नामी खेलाड़ी रहथि। बिहारक भीतरो आ बिहारसँ बाहरो, यथा जयपुर, ग्वालियरक राज- रजवाड़ा जाथि आ शतरंज प्रतियोगितामे विजयी भs आबथि।दरभंगा राज दिससँ आयोजित " धौत परीक्षा"मे हिनका शतरंजेक चैंपियनक रूपमे उत्तीर्ण घोषित कैल गेलनि आ सम्मानित कयल गेलनि। बहुत पुरना पत्रिका सभमे हिनक शतरंज-विजयक समाचार भेटैत अछि।दृष्टान्त लेल 'प्रभात' मासिक पत्रिकाक जून 1833क पृष्ठ संख्या 44पर लिखल गेल एक समाचार देखल जा सकैत अछि -
" श्री कार्तिकेय झा उर्फ घुल्ली बाबू दरभंगाक हाईकौक क्लब द्वारा आयोजित सतरंजक खेलमे विजय प्राप्त केने छलाह। गत अठारह तरीखकें एक चाँदीक कप (कटोरा) तथा एक रजत पदक पारितोषिकमे देल गेलनि। कप तीन मासक अभ्यन्तर वापस करय पड़तैन्ह तथा पदक सर्वदाक वास्ते रहतनि।"
हिनक निधन दि. 30 मार्च 1986 केँ भs गेलनि।
(कोइलख-लेखक हितनाथ झा पृष्ठ -46.)
संपादकीय सूचना-एहि सिरीजक पुरान क्रम एहि लिंकपर जा कऽ पढ़ि सकैत छी-
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