
गजेन्द्र ठाकुर
मैथिली लेल दलित साहित्य समीक्षाशास्त्र-२
[संदर्भ: प्रभास कुमार चौधरीक इन्द्रधनुष, अशोकक प्रतिलोम आ रमेशक कैलास मंडलक फिलिप्स रेडियो]
दलित साहित्य समीक्षाशास्त्र, भारतीय समीक्षाशास्त्र, पाश्चात्य समीक्षाशास्त्र, गंगेशक नव्य न्याय आ विदेह समानान्तर इतिहास फ्रेमवर्कक परिप्रेक्ष्यमे
भूमिका
मैथिली साहित्यक आधुनिक कालखण्डमे कथाक स्वरूप आ उद्देश्यमे जे क्रान्तिकारी परिवर्तन आएल अछि, तकर प्रस्थान विन्दु सामाजिक यथार्थवाद आ दलित चेतना केर उद्भव मानल जाइत अछि। प्रभास कुमार चौधरीक 'इन्द्रधनुष', अशोकक 'प्रतिलोम' आ रमेशक 'कैलास मंडलक फिलिप्स रेडियो' मात्र तीनटा कथा नहि, अपितु मिथिलाक परिवर्तित सामाजिक-आर्थिक परिदृश्य, वर्गीय द्वन्द्व आ दलित अस्मिताक संघर्षक एकटा विस्तृत आलेख थिक1। एहि कथा सभक अध्ययन जखन भारतीय आ पाश्चात्य समीक्षाशास्त्र, गंगेश उपाध्याय केर नव्य न्याय आ 'विदेह समानान्तर इतिहास फ्रेमवर्क' केर आलोकमे कएल जाइत अछि, तखन साहित्यक ओहि प्रच्छन्न स्तर सभक उद्घाटन होइत अछि जे बेशी काल अभिजात्य विमर्शमे उपेक्षित रहि जाइत अछि । मिथिलाक परम्परागत 'हवेली' संस्कृति आ 'खबास' परम्परा सँ निकलि कऽ आब कथा ओहि 'सुट्टा', 'मुनरा' आ 'कैलास' धरि पहुँचि गेल अछि, जे अपन पसीना आ अधिकारक हेतु संघर्षरत अछि ।
मैथिली साहित्यक आधुनिक कथा-परम्परामे तीन गोट कृति मैथिली दलित साहित्य समीक्षाशास्त्र लेल विशेष महत्त्व राखैत अछि- प्रभास कुमार चौधरीक इन्द्रधनुष, अशोकक प्रतिलोम आ रमेशक कैलास मंडलक फिलिप्स रेडियो। ई तीनू कथा मिथिलाक ग्रामीण समाजक आर्थिक शोषण, जाति-व्यवस्थाक दंश, सामन्ती सत्ताक क्रूरता आ तिरस्कृत मानवताक प्रतिरोधक जीवन्त दस्तावेज अछि। प्रस्तुत अध्ययन एहि तीनू कृतिकेँ पाँच गोट भिन्न-भिन्न आलोचनात्मक फ्रेमवर्कसँ परखैत अछि-
(१) दलित समीक्षाशास्त्र- जे जाति-उत्पीड़न, अस्पृश्यता आ दलित प्रतिरोधकेँ केन्द्रमे राखैत अछि;
(२) भारतीय समीक्षाशास्त्र- रस-सिद्धान्त, ध्वनि, वक्रोक्ति, अलङ्कार आ काव्यशास्त्रीय परम्पराक आलोकमे;
(३) पाश्चात्य समीक्षाशास्त्र- मार्क्सवाद, उत्तर-औपनिवेशिकवाद, संरचनावाद, स्त्रीवाद आ नवइतिहासवादक परिप्रेक्ष्यमे;
(४) गंगेशोपाध्यायक नव्य न्याय- प्रमाण, अनुमान, व्याप्ति आ शब्द ज्ञानक दार्शनिक उपकरणसँ;
(५) विदेह समानान्तर इतिहास फ्रेमवर्क- मिथिलाक इतिहास, लोक-स्मृति, सांस्कृतिक अस्मिता आ समानान्तर आख्यानक आधारपर।
खण्ड १ : कथा-परिचय आ पाठ-विश्लेषण
१.१ प्रभास कुमार चौधरीक इन्द्रधनुष
(नवम्बर १९८३मे प्रकाशित)
इन्द्रधनुष मैथिलीक एकटा आन्दोलनधर्मी कथा अछि जे मिथिलाक एकटा ग्रामीण परिवेशमे सामन्ती व्यवस्थाक विरुद्ध जनजागरणक प्रक्रियाकेँ चित्रित करैत अछि। कथाक केन्द्रीय पात्र अनिल अछि, जे एकटा सचेत युवा संगठक अछि। हुनकर संगी सरोज आ महेश छथि। कथाक प्रतिपक्षमे काशी चौधरी (गाम-मालिक, सामन्त), नामी बाबू (पंचायत-प्रधान), सुट्टा (दलाल), आ मुनरा (किसान-नेता) अछि।
कथाक कथावस्तु एहि प्रकारें अग्रसर होइत अछि- गाममे बाट-सड़क, स्कूल सभ काजक नामपर सरकारी पाइ ठिकेदार आ मुखिया लूटैत अछि। जनचेतना जागृत करबाक लेल अनिल आ ओकर दल ग्रामीण सभाक आयोजन करैत अछि। ई सभा काशी चौधरीक दरबज्जापर होइत अछि। सामन्ती वर्गक प्रतिरोधक बादो जनता एकजुट होइत अछि। अन्तमे लाठीचार्ज, गोली, दमन- किन्तु लोकक मनोबल नहि टूटैत अछि।
कथामे इन्द्रधनुषक रूपक बड़ गहींर अछि- जेना बर्खाक बाद इन्द्रधनुष (पनिसोखा) उठैत अछि, तेना उत्पीड़नक बादो जनचेतनाक उदय होइत अछि।
१.२ प्रतिलोम
प्रतिलोम एकटा बड़ सघन, बहु-स्तरीय कथा अछि जे एकटा ब्राह्मण हवेलीमे श्राद्धक अवसरपर घटित होइत अछि। ई कथा जाति-व्यवस्थाक सूक्ष्मतम अत्याचारकेँ- छुआछूतसँ परंपराक आडम्बर तक- अत्यन्त तीक्ष्ण दृष्टिसँ उद्घाटित करैत अछि।
अर्जुन कथाक केन्द्रीय पात्र अछि- एकटा आधुनिक, शिक्षित युवा जे अपन बौआ (बड़का भाइ) लग आयल अछि। बूढ़ा मालिक (पं. गणेश्वर झा) हवेलीक मालिक छथि, जे पुरातन व्यवस्थाक प्रतीक अछि। कपिलेश्वर झा खस्सीक तमाशाक मुख्य संयोजक अछि। प्रदीप (बेटा) परम्पराक विरोधी किन्तु असहाय अछि। मंजू बुच्ची स्त्री-दमनक प्रतीक अछि।
कथाक 'प्रतिलोम' शीर्षक अत्यन्त अर्थपूर्ण अछि- ई वस्तुत: उनट अथवा विलोम थिक। समाजमे जे ऊपर' अछि से नैतिक रूपें 'नीचाँ' अछि- पण्डित, मालिक, ब्राह्मण सभ अपन आचरणसँ अपन तथाकथित श्रेष्ठताक खण्डन स्वयं करैत अछि।
१.३ कैलास मंडलक फिलिप्स रेडियो
(कथा-संवाद, दरभङ्गा, ७ जुलाई १९९०मे प्रकाशित)
ई कथा कैलास मंडल नामक एकटा निम्नवर्गीय (शूद्र) व्यक्तिक चारू कात घूमैत अछि जे अपन पिताक असामयिक मृत्युक बाद आर्थिक आ सामाजिक रूपसँ एकदम असहाय अछि। ओ गामसँ पंजाब गेल छल, ओतयसँ लौटि आयल अछि- हाथमे एकटा फिलिप्स रेडियो लय।
बौआ झा (हवेलीक ब्राह्मण मालिक), सुरीन्दर आ गजीन्दर (दुनू बौआ झाक लठैत) कथाक प्रतिनायक अछि। फिलिप्स रेडियो- जे आधुनिकताक, प्रगतिक, एकटा नव आकांक्षाक प्रतीक अछि- अन्तमे जातीय षड्यन्त्रक शिकार बनि जाइत अछि।
कथाक अन्त अत्यन्त मार्मिक अछि- कैलाकेँ बौआ झा, सुरीन्दर आ गजीन्दर बेइज्जत करैत अछि, रेडियो छीनि लेइत अछि। किन्तु कैलाक माय- निरक्षर, वृद्ध, दरिद्र- तखनो डेग-डेग पर अपन पुत्रक संग ठाढ़ रहैत अछि। कथाक अन्तिम दृश्यमे ओ रेडियोपर समधानि कऽ प्रहार करैत अछि कारण रेडियो अनका देत तँ मायकेँ दाँती-चनरा लागि जेतै, तइसँ नीक जे ओकरा तोड़िये देल जाय।
खण्ड २ : दलित समीक्षाशास्त्रक परिप्रेक्ष्यमे
मैथिली कथाक दलित समीक्षाशास्त्र आ अस्मिता विमर्श
मैथिलीमे दलित समीक्षाशास्त्रक आधार सहानुभूति नहि, अपितु 'स्वानुभूति' आ 'प्रतिरोध' अछि। दलित समीक्षाशास्त्रक सिद्धान्तक अनुसार साहित्य एहन हेबाक चाही जे वर्णवादी आ सामन्ती व्यवस्थाक जड़ि पर प्रहार करैत एकटा समतामूलक समाजक ओकालति कय सकय । एहि तीनू कथा मे दलित आ वंचित वर्गक चित्रण मात्र पात्रक रूप मे नहि, अपितु एकटा जाग्रत 'वर्ग' केर रूप मे भेल अछि।
२.१ दलित समीक्षाशास्त्रक सैद्धान्तिक आधार
डॉ. बी.आर. अम्बेडकरक विचार-परम्पराक आधारपर दलित समीक्षाशास्त्र ई प्रश्न पुछैत अछि- साहित्यमे दलित जीवनक चित्रण कतेक प्रामाणिक अछि? के लिखि रहल अछि? किनका लेल लिखि रहल अछि ? आ एहि लेखनसँ दलित मुक्तिमे कतेक योगदान भ' रहल अछि ? ई समीक्षाशास्त्र जाति-व्यवस्थाक भितरिया संरचनाकेँ उद्घाटित करैत अछि, साहित्यमे ब्राह्मणवादी प्रभुत्वकेँ चुनौती दैत अछि।
२.२ इन्द्रधनुषमे दलित चेतना
इन्द्रधनुषमे दलित जीवनक चित्रण अत्यन्त ठोस आ आर्थिक रूपसँ विश्लेषित अछि। खेतिहर मजदूर, धनुकटोली, मुसहरटोली- ई स्थान नाम सभ दलित समुदायक भौतिक विभाजनकेँ स्पष्ट करैत अछि। गाममे दू वर्गक लोकक बीच जे आर्थिक-सामाजिक खधाइ अछि तकरा कथाकार स्पष्टतासँ देखबैत छथि।
दलित समीक्षाशास्त्रक दृष्टिसँ एहि कथाक महत्त्वपूर्ण पक्ष ई अछि जे दलित लोकनिकेँ खाली पीड़ित वर्गक रूपमे नहि, वरन् सक्रिय प्रतिरोधक वाहकक रूपमे चित्रित कयल गेल अछि। जखन काशी चौधरीक लठैत लोकनि लाठी लय अबैत अछि, तखनो मुनरा आ ओकर दल भागैत नहि अछि। ई 'प्रतिरोधक राजनीति' दलित साहित्यक केन्द्रीय चिन्ता अछि।
किन्तु एकटा सीमा सेहो अछि- कथाकार जातिगत उत्पीड़नकेँ वर्गीय समस्यामे अपचयित करबाक प्रवृत्ति देखाबैत छथि। दलित समीक्षक एहि 'वर्ग-अपचयवाद'केँ समस्यापूर्ण मानैत छथि- जाति केवल वर्गीय शोषणक उपोत्पाद नहि, वरन् अपन स्वतन्त्र तार्किकता रखैत अछि।
'इन्द्रधनुष' मे दलित प्रतिरोधक स्वर
अशोकक कथा 'इन्द्रधनुष' मे दलित जागरणक जे स्वरूप देखाइत अछि, ओ १९८० केर दशकक राजनीतिक चेतनाक प्रतिफल अछि । कथा मे 'सुट्टा', 'मुनरा' आ 'यदु' सन पात्र आब 'मालिक' केर आगू झुकबाक बदला मे अपन 'बोनि' (मजदूरी) केर माँग करैत छथि। दलित समीक्षाशास्त्रक दृष्टि सँ देखल जाय तँ एतय 'सुट्टा' केर विद्रोह ओहि सामन्ती दम्भक विरुद्ध अछि जेकर प्रतिनिधि 'काशी चौधरी' छथि। जखन सुट्टा कहैत अछि जे "कमा कऽ खाइ छी हम तँ छोटका जाति, आ ई बैठल खयता तँ बड़का जाति," तखन ओ श्रम केर प्रतिष्ठाक स्थापना करैत अछि । ई चेतना दलित समीक्षाशास्त्रक ओहि सिद्धान्त सँ प्रेरित अछि जतय 'जाति' केर श्रेष्ठता केँ 'श्रम' केर आधार पर चुनौती देल जाइत अछि।
२.३ प्रतिलोममे अस्पृश्यता आ ब्राह्मणवाद
प्रतिलोम दलित समीक्षाशास्त्रक लेल सर्वाधिक प्रासङ्गिक कथा अछि। एहिमे अस्पृश्यताक जे चित्रण अछि से अत्यन्त सूक्ष्म रूपमे देखाओल गेल अछि। श्राद्धक भोजमे पानि पीबाक दृश्य- 'पानि लेबैं ? पानि पीबैं मालिक ? पानि चाही ?' एकटा छोट प्रश्न किन्तु एहिमे हिन्दू जाति-व्यवस्थाक समस्त क्रूरता समाहित अछि।
अर्जुनक विरोधक बादो ओकर असहायता दलित समीक्षाशास्त्रक एकटा केन्द्रीय प्रश्नकेँ उठबैत अछि- शिक्षित दलित वा जाति-विरोधी व्यक्ति की स्वयं सम्पूर्ण मुक्त भ' सकैत अछि ? अर्जुन चाहैत अछि किन्तु व्यवस्थाक समक्ष ओ एकाकी अछि।
'प्रतिलोम' नामक व्यञ्जना दलित दृष्टिसँ बड़ महत्त्वपूर्ण अछि- जाति-व्यवस्थामे जे 'उच्च' अछि ओ वास्तवमे नैतिक रूपसँ निम्न अछि, आ जे 'शूद्र' वा 'अस्पृश्य' कहाइत अछि ओ मानवीय गरिमामे श्रेष्ठ अछि। ई अम्बेडकरवादी विचारक साहित्यिक अभिव्यक्ति थिक।
'प्रतिलोम' ' मे संरचनात्मक शोषण
अशोकक कथा 'प्रतिलोम' मे 'खबास' परम्परा केर जे चित्रण अछि, ओ दलित समीक्षाशास्त्रक हेतु एकटा गम्भीर शोधक विषय अछि । खबास जेकरा हवेलीक 'सम्पत्ति' मानल जाइत छल, ओ आब अपन 'जीह' (जीभ) बदलय चाहैत अछि । दलित समीक्षाशास्त्रक अनुसार 'जीह बदलब' मात्र एकटा शारीरिक क्रिया नहि, अपितु भाषिक आ सांस्कृतिक स्वाधीनताक घोषणा अछि।
२.४ कैलास मंडलक फिलिप्स रेडियोमे आर्थिक-जातीय शोषण
ई कथा दलित समीक्षाशास्त्रक एकटा विशेष आयामकेँ जगजियार करैत अछि- आधुनिकताक वस्तु (रेडियो) आ परम्परागत जातिवादक टकराव। फिलिप्स रेडियो खाली एकटा यान्त्रिक उपकरण नहि, वरन् कैला आ ओकर माय लेल ई एकटा सांस्कृतिक सहभागिताक स्वप्न अछि। जखन रेडियो छीनि लेल जाइत अछि, तखन खाली एकटा वस्तु नहि, वरन् एकटा निम्नजातीय मनुष्यक आधुनिक विश्वमे भागीदारीक अधिकार छीनल जाइत अछि।
बौआ झा आ ओकर लठैतक व्यवहारमे जातिगत घृणा आ आर्थिक लूट दुनू सम्मिलित अछि। कैलाकेँ ५०० रुपैयाक ऋणजाल आ रेडियोक छिनैकेँ दलित समीक्षाशास्त्र कृषि-दास प्रथाक आधुनिक रूपक रूपमे देखैत अछि।
'कैलास मंडलक फिलिप्स रेडियो' मे संरचनात्मक शोषण
'कैलास मंडलक फिलिप्स रेडियो' मे 'कैलास' (कैला) पंजाब सँ कमा कऽ अबैत अछि, मुदा गामक सामन्ती व्यवस्था ओकरा पुनः अपन जाल मे फँसा लैत अछि। एहि कथा मे रेडियो आधुनिकताक प्रतीक अछि, मुदा जखन ओकरा हरबाही (Bonded Labour) मे जोतल जाइत अछि, तखन ओही रेडियो पर 'आजादीक गीत' बजबाक क्रूर विडम्बना दलित विमर्शक मुख्य स्वर बनि कऽ उभरैत अछि ।
खण्ड ३ : भारतीय समीक्षाशास्त्रक परिप्रेक्ष्यमे
भारतीय समीक्षाशास्त्र: रस आ औचित्य
भारतीय काव्यशास्त्र मे 'रस' केर निष्पत्ति पाठक केर हृदय मे एकटा स्थायी भाव उत्पन्न करैत अछि। 'कैलास मंडलक फिलिप्स रेडियो' मे 'करुण रस' केर जे अनुभूति होइत अछि, ओ पाठक केँ व्यवस्थाक प्रति आक्रोश सँ भरि दैत अछि। 'औचित्य' सिद्धान्तक अनुसार, साहित्यक प्रत्येक अंग मे एकटा संतुलन हेबाक चाही। मुदा एहि कथा सभ मे 'अनौचित्य' (सामाजिक अन्याय) केर चित्रण कऽ कऽ कथाकार समाजक वास्तविक चेहरा देखबैत छथि। 'ध्वनि' सिद्धान्तक अनुसार, 'इन्द्रधनुष' केर शीर्षक स्वयं मे एकटा 'व्यंग्यार्थ' अछि, जे राजनीति केर अप्रभावी होइत रंग आ ओकर क्षणभंगुरता केँ ध्वनित करैत अछि ।
३.१ रस-सिद्धान्त आ कथाक भावभूमि
आचार्य भरतक नाट्यशास्त्रसँ प्रारम्भ भेल रस-सिद्धान्त गद्य-कथामे सेहो लागू होइत अछि। एहि तीनू कथामे प्रधान रस ई सभ अछि-
इन्द्रधनुष- वीर रस (जनसंघर्षक उत्साह), करुण रस (दरिद्रताक चित्रण), रौद्र रस (सामन्ती दमनक विरुद्ध क्रोध)।
प्रतिलोम- वीभत्स रस (अस्पृश्यताक घृणित चित्रण), करुण रस (अर्जुनक असहायता), हास्य-व्यङ्ग्य (श्राद्धक आडम्बरपर)।
कैलास मंडलक फिलिप्स रेडियो- करुण रस (प्रधान), शान्त रस (अन्तमे कैलाक माइक धीरज), तीव्र क्रोध आ बिरह।
३.२ ध्वनि-सिद्धान्त : आनन्दवर्धनक आलोकमे
ध्वनि-सिद्धान्तक अनुसार काव्यमे व्यञ्जनाशक्ति (Suggestive Power) सर्वोच्च होइत अछि। एहि कथासभमे ध्वनिक प्रयोग अत्यन्त कुशलतासँ कयल गेल अछि।
'इन्द्रधनुष'- नाममे प्रतीकात्मक ध्वनि अछि। इन्द्रधनुष सात रङ्गक होइत अछि- ठीक एहिना मिथिलाक समाजमे सात वर्ण-समुदाय अछि (ब्राह्मण, कायस्थ, यादव, धानुक, मुसहर, खतबे, अमात (अमात्य)। ई सात रङ्ग मिलिकेँ एकटा सुन्दर आकाशी दृश्य बनबैत अछि- जनचेतना सेहो एहिना एकताबद्ध होयबाक स्वप्न थिक।
'प्रतिलोम'- व्याकरण आ दर्शन दुनूमे 'प्रतिलोम' वर्जित क्रम थिक। एहि शीर्षकक ध्वनि अछि- जे समाज अपन स्वाभाविक नैतिक क्रम (न्याय, समता, प्रेम)केँ उलटा कय लेलक अछि, ओ प्रतिलोम भ' गेल अछि।
'कैलास मंडलक फिलिप्स रेडियो'- रेडियोक व्यञ्जना अछि आधुनिकताक, वर्गान्तरणक स्वप्नक। पश्चिमी ब्राण्ड 'फिलिप्स'- ई सेहो व्यञ्जित करैत अछि जे तथाकथित वैश्विक आधुनिकता सेहो दलितक लेल अप्राप्य अछि।
३.३ वक्रोक्ति आ व्यञ्ग्य : आचार्य कुन्तकक परम्परा
कुन्तकक 'वक्रोक्तिजीवित'क आलोकमे तीनू कथामे वक्रोक्ति (oblique expression) बड़ कुशलतासँ प्रयुक्त अछि।
प्रतिलोममे श्राद्धक क्रममे पाइन लेबाक विषयपर जे संवाद अछि- 'पाइन लेबैं ? पाइन पीबैं मालिक?' -ई प्रश्न सरलतासँ वक्र अछि। प्रश्न पाइनक अछि, किन्तु अर्थ अछि जाति-शुद्धताक, अपवित्रताक। एहि छोट संवादमे हिन्दू जाति-व्यवस्थाक सम्पूर्ण दर्शन व्यञ्जित अछि।
इन्द्रधनुषमे जखन मुनरा कहैत अछि 'माफ करू हजूर'- ई विनम्रताक वाक्य वस्तुत: एकटा व्यङ्ग्यपूर्ण प्रतिरोध थिक। ओ भीतरसँ टूटल नहि अछि- बस परिस्थितिक दबावमे आनुष्ठानिक शब्द कहि रहल अछि।
३.४ लोककथा-परम्परा आ मैथिली कथाशैली
तीनू कथामे मिथिलाक लोककथा-परम्पराक गहींर प्रभाव अछि। संवादक शैली, प्रतीकक चयन, ग्रामीण परिवेशक सजीव चित्रण- ई सभ मैथिली लोक-साहित्यसँ आयल अछि। विद्यापतिक पदावलीमे जेना श्रृंगार आ भक्तिक मिश्रण अछि, तेना एहि कथासभमे सामाजिक यथार्थ आ मानवीय करुणाक मिश्रण अछि।
खण्ड ४ : पाश्चात्य समीक्षाशास्त्रक परिप्रेक्ष्यमे
भारतीय आ पाश्चात्य समीक्षाशास्त्रक आलोक मे अध्ययन
मैथिली कथाक एहि त्रयी केँ 'रस', 'ध्वनि' आ 'वक्रोक्ति' सन भारतीय सिद्धान्त आ 'मार्क्सवाद', 'विखण्डनवाद' आ 'अस्तित्ववाद' सन पाश्चात्य सिद्धान्तक कसौटी पर रगरला सँ ओइमे समाहित दार्शनिक गम्भीरता स्पष्ट होइत अछि।
पाश्चात्य समीक्षाशास्त्र: मार्क्सवाद आ विखण्डनवाद
पाश्चात्य समीक्षाशास्त्र मे 'मार्क्सवाद' वर्ग संघर्ष केर व्याख्या करैत अछि। 'इन्द्रधनुष' मे दलित टोलक लोक आ गामक मालिक वर्गक बीचक संघर्ष मार्क्सवादी 'सर्वहारा' आ 'बुर्जुआ' केर द्वन्द्व थिक। 'विखण्डनवाद' (Deconstruction) केर दृष्टि सँ देखल जाय तँ 'प्रतिलोम' कथा 'मालिक-चाकर' केर स्थापित बाइनरी (Binary) केँ तोडैत अछि । 'अस्तित्ववाद' (Existentialism) केर प्रभाव 'कैलास मंडलक फिलिप्स रेडियो' मे देखल जा सकैत अछि, जतय कैला अपन अस्तित्वक हेतु संघर्ष करैत अछि मुदा व्यवस्था ओकरा वस्तु (Object) बना दैत अछि।
४.१ मार्क्सवादी समीक्षाशास्त्र
ग्राम्शीक 'सांस्कृतिक आधिपत्य' (Cultural Hegemony)क सिद्धान्तक आधारपर इन्द्रधनुषक व्याख्या बड़ स्पष्ट होइत अछि। गाममे काशी चौधरी खाली आर्थिक रूपसँ सर्वशक्तिमान नहि, बल्कि सांस्कृतिक रूपसँ सेहो शक्तिमान छथि। हुनकर दरबज्जापर सभा होइत अछि, हुनकर आशीर्वाद लेल जाइत अछि, हुनकर शब्दक 'वैधता' मानल जाइत अछि। ई सांस्कृतिक आधिपत्य थिक।
लुकाचक 'यथार्थवाद' (Realism) क दृष्टिसँ तीनू कथामे सामाजिक यथार्थताक चित्रण अत्यन्त विश्वसनीय आ ऐतिहासिक रूपसँ ठोस अछि। ब्राह्मण-मालिकक दरबज्जा, खेतिहर मजदूरक टोल, पंजाबसँ घुरल युवाक असहायता- ई सभ '१९८०-१९९०'क मिथिलाक ऐतिहासिक यथार्थक साहित्यिक अभिव्यक्ति अछि।
४.२ उत्तर-औपनिवेशिक समीक्षाशास्त्र
फ्रांज फाननक विचारक आलोकमे 'The Wretched of the Earth' कैलास मंडलक फिलिप्स रेडियोमे एकटा 'उपनिवेशित मन' (Colonized Mind) क चित्रण अछि। कैला पंजाब जाइत अछि किन्तु अपन समुदायसँ टूटि नहि जाइत अछि। ओ रेडियो आनैत अछि, एकटा 'आधुनिकताक' वस्तु- किन्तु ओकर सामाजिक स्थिति नहि बदलैत अछि।
गायत्री स्पीवाकक कात-करोटक शक्तिहीन समूह 'Subaltern'क अवधारणासँ तीनू कथामे 'सबाल्टर्न' बोली अछि। प्रतिलोममे अर्जुनक माय (गामवाली), इन्द्रधनुषमे धनुकटोलीक स्त्री सभ, कैलास मंडलमे कैलाक माय- ई सभ 'सबाल्टर्न' छथि जनिकर आवाज प्राय: मुख्यधारामे नहि सुनाइत अछि। किन्तु ई कथाकार सभ हुनका सभकेँ स्वर दैत छथि- ओना स्पीवाकक प्रश्न अखनो वैध अछि- की शोषित वर्गक लोक अपन आवाज उठा सकैत अछि?'Can the Subaltern Speak ?'
४.३ संरचनावाद आ उत्तर-संरचनावाद
सोसुरक भाषा-विज्ञानक आधारपर तीनू कथामे 'मालिक' आ 'मजदूर', 'पण्डित' आ 'शूद्र', 'हवेली' आ 'टोल'- ई सभ द्विआधारी विरोध (Binary Oppositions) अछि जाहिपर सम्पूर्ण कथा-संरचना निर्भर करैत अछि।
देरिदाक विखण्डनवाद'Deconstruction'क दृष्टिसँ प्रतिलोमक शीर्षक अपन पारम्परिक द्विआधारी विरोधकेँ विघटित करैत अछि। 'उच्च' आ 'नीच'- ई विरोध अर्थहीन अछि जखन 'उच्च' लोक नैतिक रूपसँ 'नीच' व्यवहार करैत अछि।
४.४ स्त्रीवादी समीक्षाशास्त्र
सिमोन द बोउआरक "दोसर लिंग" 'The Second Sex'क आलोकमे तीनू कथामे स्त्री-पात्र बड़ महत्त्वपूर्ण किन्तु दोसर स्थानमे अछि। प्रतिलोममे गामवाली आ मंजू बुच्ची दुनू स्त्री अपन-अपन स्थानपर पितृसत्तात्मक प्रतिबन्धमे जीवन बितबैत अछि। कैलास मंडलमे कैलाक माय सबसँ अधिक धैर्यवान आ नैतिक रूपसँ दृढ़ अछि, किन्तु ओकर एजेन्सी सीमित अछि।
इन्द्रधनुषमे स्त्री-पात्रक लगभग अनुपस्थिति सेहो एकटा आलोचनात्मक प्रश्न उठबैत अछि- की जनसंघर्षक आख्यानमे स्त्रीकेँ स्वाभाविक रूपसँ बाहर राखल जाइत अछि ?
४.५ नव-इतिहासवाद
स्टीफेन ग्रीनब्लाटक नव-इतिहासवाद साहित्यकेँ ऐतिहासिक प्रक्रियाक भीतर राखि देखैत अछि। इन्द्रधनुष नवम्बर १९८३मे लिखल गेल, ई काल भारतीय राजनीतिमे उथल-पुथलक काल छल। बिहार आन्दोलन, नक्सलवाद, इन्दिरा गाँधीक अन्तिम काल, एहि सन्दर्भमे इन्द्रधनुषक जनसंघर्षाख्यान एकटा विशिष्ट ऐतिहासिक क्षणक उत्पाद अछि।
कैलास मंडलक फिलिप्स रेडियो १९९०मे लिखल गेल- जखन पंजाबमे खालिस्तान आन्दोलन, मण्डल आयोगक विवाद, आ आर्थिक उदारीकरणक प्रारम्भ भ' रहल छल। एहि समयमे कैलाक पंजाब-यात्रा आ रेडियोक प्रतीक एकटा ठोस ऐतिहासिक सन्दर्भ रखैत अछि।
खण्ड ५ : गंगेशोपाध्यायक नव्य न्यायक परिप्रेक्ष्यमे
५.१ नव्य न्यायक सामान्य परिचय
गंगेशोपाध्यायक 'तत्त्वचिन्तामणि' (१३वीं शताब्दी) मिथिलाक सर्वाधिक प्रभावशाली दार्शनिक ग्रन्थ अछि। ई न्याय-दर्शनकेँ एकटा कठोर तार्किक आधार प्रदान करैत अछि। नव्य न्यायक चारि प्रमुख उपकरण अछि-
(१) प्रत्यक्ष- प्रत्यक्ष अनुभवसँ ज्ञान
(२) अनुमान- व्याप्ति (vyāpti) अर्थात् सार्वत्रिक सम्बन्धसँ निष्कर्ष
(३) उपमान- तुलनासँ ज्ञान
(४) शाब्द- विश्वसनीय वक्ताक वचनसँ ज्ञान
५.२ प्रत्यक्ष प्रमाणक रूपमे साहित्यिक साक्ष्य
नव्य न्यायक 'प्रत्यक्ष' (Direct Perception) ज्ञानक उपकरण साहित्यिक समीक्षामे एहि रूपमे लागू होइत अछि- कथाकार जे देखलक, अनुभव कयलक, से ओ 'प्रत्यक्ष प्रमाण'क रूपमे प्रस्तुत करैत अछि। इन्द्रधनुषमे 'एहि गाममे लाठियो कखरो घरमे छैक।'- ई एकटा प्रत्यक्ष सामाजिक साक्ष्य थिक।
प्रतिलोममे श्राद्धक भोजमे पाइन-पीबाक क्रम, अर्जुनक आँखिसँ देखल प्रत्येक दृश्य- ई सभ नव्य न्यायक 'निर्विकल्पक प्रत्यक्ष' (Indeterminate Perception)सँ 'सविकल्पक प्रत्यक्ष' (Determinate Perception) तक विकासक कथानक अछि।
५.३ अनुमान प्रमाण आ व्याप्ति-सम्बन्ध
नव्य न्यायमे अनुमानक सर्वाधिक महत्त्व अछि। व्याप्ति (Universal Concomitance)- 'जतय धुआँ, ततय आगि' एहि तर्कपद्धतिक आधार थिक।
इन्द्रधनुष एहि व्याप्ति-सम्बन्धकेँ सामाजिक स्तरपर स्थापित करैत अछि, 'जतय सामन्ती व्यवस्था छैक, ततय शोषण छैक।' ई व्याप्ति कथाक प्रत्येक प्रसङ्गमे सिद्ध होइत अछि, पंचायत फण्डक लूटि, बाट-घाटक बेइमानी, खेतिहरकेँ न्यूनतम मजदूरीसँ वञ्चित करब।
प्रतिलोममे व्याप्ति अछि- 'जतय ब्राह्मणवादी आडम्बर, ततय मानव-अवमानना।' बूढ़ा मालिक, कपिलेश्वर झा, आ अन्य पात्र एहि व्याप्तिकेँ 'पक्ष' (Subject), 'साध्य' (Predicate), आ 'हेतु' (Reason)क नव्य न्यायिक त्रिकोणमे सिद्ध करैत अछि।
५.४ 'उपाधि' (Condition) आ समाजिक न्याय
नव्य न्यायमे 'उपाधि' (Condition/Qualifier) एकटा महत्त्वपूर्ण अवधारणा थिक जे व्याप्तिकेँ सीमित वा परिष्कृत करैत अछि। कैलास मंडलक कथामे जँ देखी तँ 'जाति' एकटा 'उपाधि' थिक जे शोषणक व्याप्तिकेँ परिभाषित करैत अछि।
एहि दार्शनिक विश्लेषणसँ एकटा महत्त्वपूर्ण निष्कर्ष निकलैत अछि, तीनू कथामे सामाजिक यथार्थ एकटा तार्किक व्यवस्थाक रूपमे उपस्थित अछि, जे संरचनात्मक रूपसँ निर्धारित अछि। ई नव्य न्यायक 'ज्ञातता' (Knownness) आ 'अज्ञातता'क तर्कशास्त्रकेँ साहित्यिक धरातलपर प्रतिबिम्बित करैत अछि।
५.५ शाब्द प्रमाण आ लोक-साक्ष्य
'शाब्द प्रमाण' (Testimony) विश्वसनीय आप्त (Authority)क वचनसँ ज्ञान एहि कथासभमे 'लोक'क आवाज अछि। इन्द्रधनुषमे अनिल जे सभाक वक्ता अछि, ओकर वचन सभाक लेल 'आप्त वचन' बनि जाइत अछि। प्रतिलोममे प्रदीपक प्रश्नोत्तर, ई शाब्द प्रमाणक एकटा नव्य न्यायिक संवाद थिक।
गंगेशक नव्य न्याय आ कथात्मक विश्लेषण
मिथिलाक गौरव गंगेश उपाध्याय केर 'नव्य न्याय' मात्र एकटा दर्शन नहि, अपितु तर्कक एकटा सूक्ष्म औजार अछि जेकर प्रयोग साहित्यक विश्लेषण मे कएल जा सकैत अछि । नव्य न्याय मे 'प्रमाण मीमांसा' केर अन्तर्गत प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान आ शब्द प्रमाणक चर्चा भेल अछि ।
प्रत्यक्ष आ आभास केर द्वन्द्व
गंगेशक अनुसार 'प्रत्यक्ष' ओ अछि जे इन्द्रिय सँ प्राप्त होइत अछि । 'इन्द्रधनुष' मे कथाक नायक जखन गाम अबैत अछि, तँ ओकरा गामक 'प्रत्यक्ष' स्वरूप मे एकटा 'भ्रान्ति' देखाइत छैक। ओकरा लगैत छैक जे गाम ओहिना अछि, मुदा ओकर 'आभास' (Pseudo-perception) तखने टूटैत अछि जखन ओ बम आ लाठीक गप्प सुनैत अछि। नव्य न्याय केर 'अतिव्याप्ति' दोष एतय देखाइत अछि, जखन गामक परम्परागत शान्तिक परिभाषा आब हिंसाक घेरा मे आबि जाइत अछि ।
अवच्छेदक आ प्रतियोगिता: कैलासक रेडियो
नव्य न्याय मे 'अवच्छेदक' (Limitor) आ 'प्रतियोगिता' (Counter-positiveness) केर अवधारणा सूक्ष्म अछि । 'कैलास मंडलक फिलिप्स रेडियो' मे 'रेडियो' कैलासक हेतु 'आधुनिकता' केर अवच्छेदक अछि। मुदा बौआ झाक हेतु ई रेडियो कैलासक 'ऋण' केर प्रतियोगिताक आधार अछि । जखन कैला रेडियो केँ पेना सँ तोड़ैत अछि, तखन ओ 'अभाव' (Absence) क स्थापना करैत अछि- रेडियोक अभाव अर्थात् ओहि समस्त अपमान आ ऋणक प्रतीकात्मक अन्त।
अनुमान आ व्याप्ति: 'प्रतिलोम' क तर्क
'प्रतिलोम' कथा मे अर्जुन केर तर्क 'अनुमान' (Inference) केर प्रक्रिया सँ जुडल अछि। ओ बउआ सन देखाय चाहैत अछि, किएक तँ ओकर 'व्याप्ति' (Universal Concomitance) ई अछि जे जकर ठोर लाल होइत अछि, जे स्वच्छ होइत अछि, वएह 'मालिक' होइत अछि। मुदा समाजक क्रूर 'उपाधि' (Limiting condition) ओकरा पुनः खबासक श्रेणी मे राखि दैत अछि।
खण्ड ६ : विदेह समानान्तर इतिहास फ्रेमवर्कक परिप्रेक्ष्यमे
६.१ विदेह समानान्तर इतिहास फ्रेमवर्क : परिचय
मिथिलाक इतिहास-दर्शनमे 'विदेह समानान्तर इतिहास' एकटा अभिनव आलोचनात्मक उपकरण थिक। ई फ्रेमवर्क एहि मान्यतापर आधारित अछि जे मिथिलाक इतिहास राज्य, शासन, आ मुख्यधाराक ऐतिहासिक आख्यानसँ अलग एकटा समानान्तर इतिहास रखैत अछि जाहिमे लोक-स्मृति, दलित अनुभव, स्त्री-आख्यान, आ उपेक्षित समुदायक सत्य सुरक्षित अछि।
'विदेह' (जनकपुर-मिथिलाक प्राचीन नाम) शब्दमे एकटा 'देहातीत' (Beyond the Body / Beyond the Physical) अर्थ सेहो अछि, ई समानान्तर इतिहास ओहि सत्यकेँ सुरक्षित रखैत अछि जे सरकारी दस्तावेजमे, राजकीय इतिहासमे दर्ज नहि भेल।
विदेह समानान्तर इतिहास फ्रेमवर्क: एकटा नव विमर्श
गजेन्द्र ठाकुर द्वारा प्रवर्तित 'विदेह समानान्तर इतिहास फ्रेमवर्क' मैथिली साहित्यक स्थापित इतिहास केँ चुनौती दैत एकटा 'समानान्तर' विमर्शक स्थापना करैत अछि । ई फ्रेमवर्क मुख्य रूप सँ ओहि आवाज सभ केँ स्थान दैत अछि जेकरा दरभंगा राज वा अन्य संस्थागत ढाँचा मे उपेक्षित कएल गेल छल ।
वंचितक इतिहास (सबल्टर्न हिस्ट्री) आ मैथिली कथा
'विदेह' फ्रेमवर्क केर अनुसार, मिथिलाक वास्तविक इतिहास ओ नहि अछि जे राजदरबारक वर्णन मे अछि, अपितु ओ अछि जे 'नाराशंसी' (लोक-चरित्र) मे सुरक्षित अछि। अशोकक 'इन्द्रधनुष', गामक ओहि दलित टोलक इतिहास केँ चित्रित करैत अछि जे राजनीतिक इन्द्रधनुष क नीचाँ दबल अछि। 'प्रतिलोम' मे खबास कुलक खाढ़ीक वर्णन (मंशी मड़र सँ अर्जुन धरि) ओही 'समानान्तर इतिहास' केर अंग अछि जे मुख्य इतिहासक धारा सँ दूर रहल अछि।
विदेह फ्रेमवर्कक मुख्य स्थापना आ कथात्मक प्रयोग
१. कैनन केर विखण्डन: स्थापित साहित्यिक मानदण्ड केँ चुनौती देनाइ2। 'कैलास मंडलक फिलिप्स रेडियो' मे एकटा दलित पात्रक संघर्ष केँ केन्द्र मे राखब एहि फ्रेमवर्कक सफलता अछि। २. भाषाई स्वाधीनता: विदेह फ्रेमवर्क मे 'मैथिली' केर ओहि रूप केँ महत्व देल जाइत अछि जे जनसाधारण मे व्याप्त अछि6। एहि तीनू कथा मे गामक भाषा, मुहावरा आ 'गाएइ' केर प्रयोग साहित्यक लोकतंत्रीकरण करैत अछि। ३. दस्तावेजी यथार्थ: विदेह फ्रेमवर्क कथा केँ एकटा 'सामाजिक दस्तावेज' मानैत अछि। 'इन्द्रधनुष' १९८३ केर गामक राजनीतिक आ सामाजिक स्थिति केर एकटा गम्भीर दस्तावेज थिक।
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फ्रेमवर्क केर अंग |
कथा मे अभिव्यक्ति |
प्रभाव |
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सबल्टर्न चेतना |
सुट्टा आ मुनराक विद्रोह |
परम्परागत सत्ताक ह्रास |
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लोक-इतिहास |
खबास वंशावलीक चर्चा |
वंचित वर्गक इतिहासक पुनर्प्राप्ति |
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यथार्थवादी चित्रण |
गामक बम-बारी आ हिंसा |
रोमानी मिथिलाक मिथकक अन्त |
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दार्शनिक विश्लेषण |
नव्य न्याय केर तार्किक प्रयोग |
साहित्यक बौद्धिक गम्भीरता मे वृद्धि |
कथात्मक पात्र विश्लेषण आ सामाजिक संरचना
एहि तीनू कथा मे पात्र सभक चयन आ हुनकर आचरण समाजक बदलैत मूल्य सभ केँ दर्शाबैत अछि।
'इन्द्रधनुष' क पात्र: संघर्ष आ भ्रम
अनिल: मध्यमवर्गीय युवा, जे गामक परिवर्तन सँ डरायल अछि मुदा संघर्षक हेतु तैयार अछि।
सुट्टा: दलित विद्रोहक प्रतीक, जे आब झुकबा लेल तैयार नहि अछि ।
सतीनाथ झा: राजनीतिक 'अवतरण' केर प्रतीक, जे दलित जागरण केँ अपन वोटक हेतु प्रयोग करैत अछि।
'प्रतिलोम' क पात्र: दासता सँ विद्रोह धरि
अर्जुन: एकटा १४ वर्षक छौड़ा, जे खबास परम्परा मे जन्म लेलक अछि मुदा जकर भीतर अपन अस्मिताप्रेम अछि।
गामवाली (अर्जुनक माय): परम्परागत विवशताक प्रतीक, जे गरीबीक कारण हवेली सँ जुडल रहबा लेल विवश अछि।
जबहिरा: ओहि दलित युवा वर्गक प्रतिनिधित्व करैत अछि जे आब मालिक केँ 'जीह पकड़ि कऽ' चुनौती दैत अछि।
'फिलिप्स रेडियो' क पात्र: आधुनिकताक बलि
कैलास (कैला): एकटा आशावादी युवा, जे बाहक दुनिया देखि कऽ आएल अछि मुदा गामक सामन्ती पेंच मे फँसि जाइत अछि।
बौआ झा: सामन्ती शोषणक क्रूर चेहरा, जे मधुर वाणी सँ शोषण करैत अछि।
सुरीन्दर आ गजीन्दर: सामन्ती शक्तिक 'लठैत' आ षड्यंत्रकारी, जे 'दोस्ती' केर आवरण मे शोषण करैत अछि।
मैथिली कथाक भाषिक आ शिल्पगत सौन्दर्य
मैथिलीक एहि कथा सभ मे शिल्प आ भाषा मात्र सम्प्रेषणक माध्यम नहि, अपितु स्वयं मे एकटा विमर्श अछि।
इन्द्रधनुष केर भाषा: प्रभास कुमार चौधरी एतय वर्णनात्मक शिल्प केर प्रयोग करैत छथि। "बम तक आबि गेल छैक"सन छोट वाक्य गामक तनाव केँ सघन बना दैत अछि।
प्रतिलोम केर भाषा: अशोक एतय मनोवैज्ञानिक शिल्प केर प्रयोग करैत छथि। "ठोर लाल भऽ गेलैए... बउआ सन भेलै की नहि?" अर्जुनक ई सोच ओकर आन्तरिक हीनभावना आ ओकरा सँ निकलबाक इच्छा केँ व्यक्त करैत अछि।
फिलिप्स रेडियो केर भाषा: एतय भाषा मे व्यंग्य आ विडम्बना (Irony) केर प्रचुरता अछि। रेडियो पर 'आजादीक गीत' आ कैला केर 'हरबाही'- ई विरोधाभास मैथिली कथाक शिल्पगत ऊँचाई केँ प्रदर्शित करैत अछि।
सांख्यिकीय सन्दर्भ आ ऐतिहासिक कालखण्ड
मैथिली कथाक विकास क्रम मे एहि कथा सभक समय महत्वपूर्ण अछि। 'इन्द्रधनुष' १९८३ केर कालखण्डक अछि, जखन बिहारक ग्रामीण राजनीति मे हिंसा आ जातीय ध्रुवीकरण बढ़ि रहल छल। 'कैलास मंडलक फिलिप्स रेडियो' १९९० केर कथा अछि, जखन भूमण्डलीकरण आ बाहक दुनिया सँ सम्पर्क गामक आर्थिक ढाँचा केँ बदलि रहल छल।
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कथा |
प्रकाशन/पठन काल |
भौगोलिक परिवेश |
सामाजिक समस्या |
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इन्द्रधनुष |
नवम्बर १९८३ |
ग्रामीण मिथिला |
जातीय हिंसा, वोट बैंक राजनीति |
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प्रतिलोम |
आधुनिक काल |
हवेली आ दलित टोल |
खबास परम्परा, अस्मिता संघर्ष |
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फिलिप्स रेडियो |
जुलाई १९९० |
पंजाब सँ गाम धरि |
ऋणक जाल, आधुनिकताक विद्रूपता |
६.२ मिथिलाक ऐतिहासिक सन्दर्भ
मिथिलाक इतिहासमे तीन स्तर अछि- (क) राजनीतिक इतिहास- राजा, जमींदार, सामन्त; (ख) सांस्कृतिक इतिहास- विद्यापति, गंगेश, लोकगाथा नायक; आ (ग) सामाजिक इतिहास- जाति-व्यवस्था, भूमि-सम्बन्ध, मिथिला-ब्राह्मणवाद। एहि तीनू स्तरपर साहित्य सेहो तीन प्रकारें लिखल गेल।
विदेह समानान्तर इतिहास फ्रेमवर्क प्रश्न करैत अछि- मैथिली साहित्यमे 'चारिम आयाम' कतय अछि ? अर्थात् ओ इतिहास जे मुसहर, धानुक, यादव, कुर्मी, ततमा, दुसाध (दूधवंशी), अमात्य, एहि समुदायसभकेँ केन्द्रमे राखि लिखल गेल हो ?
६.३ इन्द्रधनुष आ मिथिलाक कृषि-इतिहास
इन्द्रधनुषकेँ विदेह समानान्तर इतिहास फ्रेमवर्कसँ पढ़ी तखन ई कथा केवल एकटा कथा नहि, वरन् १९७०-८० क दशकमे मिथिलाक भूमि-आन्दोलनक एकटा साहित्यिक अभिलेख बनि जाइत अछि।
मिथिलामे भूमि-सुधार आन्दोलन, 'जोतहा जमीन जोतहाक' नारा, आ नक्सल प्रभावक समय- एहि कालखण्डमे 'इन्द्रधनुष' लिखल गेल। कथाक 'काशी चौधरी' एकटा साहित्यिक चरित्र मात्र नहि, वरन् ओ मिथिलाक तत्कालीन सामन्ती व्यवस्थाक ऐतिहासिक प्रतिनिधित्व करैत अछि।
विदेह फ्रेमवर्कमे ई कथा मिथिलाक 'समानान्तर इतिहास'क एकटा अध्याय थिक- जे सरकारी गजेटियरमे दर्ज नहि, किन्तु लोक-स्मृतिमे जीवित अछि।
६.४ प्रतिलोम आ मिथिला-ब्राह्मणवादक इतिहास
मिथिलामे ब्राह्मणवादक इतिहास बड़ पुरान आ जटिल अछि। मिथिला-ब्राह्मण पञ्जी (कुलपंजी) व्यवस्था- जे विवाह-सम्बन्धकेँ जातिक आधारपर नियन्त्रित करैत अछि- ई सम्भवत: विश्वमे सबसँ जटिल जातीय नौकरशाही थिक।
प्रतिलोममे पं. गणेश्वर झाक श्राद्ध समारोह- ई वस्तुत: एहि ऐतिहासिक ब्राह्मणवादी व्यवस्थाक 'लाइव डॉक्यूमेन्टेशन' थिक। लूटन मड़र, थोलाइ मड़र, रौदी मड़र- ई सभ पात्र मिथिलाक तत्कालीन खानदानी संरचनाक प्रतिनिधि छथि।
विदेह समानान्तर इतिहास दृष्टिसँ अर्जुनक प्रतिरोध मिथिलाक भीतरी सुधारवादी आन्दोलनक साहित्यिक प्रतिध्वनि अछि। चाहे ओ मिथिला विद्यापीठक प्रगतिशील आन्दोलन होउ, वा सामाजिक न्यायक लेल लड़ैत संगठन ई सभ इतिहासमे दर्ज कमे अछि, किन्तु प्रतिलोम जेका कथामे सुरक्षित अछि।
६.५ कैलास मंडलक फिलिप्स रेडियो : प्रवासी मजदूरक इतिहास
मिथिलाक आधुनिक इतिहासक एकटा सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण अध्याय अछि प्रवासी श्रमिकक इतिहास। बिहार-मिथिलासँ लाखक लाख लोक पंजाब, दिल्ली, मुम्बई गेल। एहि आन्तरिक प्रवासक इतिहास मुख्यधाराक इतिहास-लेखनमे प्राय: अनुपस्थित अछि।
कैलास मंडलक फिलिप्स रेडियो- ई कथा एहि समानान्तर इतिहासक एकटा अमूल्य दस्तावेज थिक। कैला पंजाब गेल, ओतय 'भग्गू मल्लाह'क संग काज कयलक, पाइ कमयलक, रेडियो किनलक- ई एकटा व्यक्तिगत कथा नहि, वरन् मिथिलाक प्रवासी मजदूरक सामूहिक अनुभवक प्रतीक थिक।
विदेह फ्रेमवर्कमे ई कथा 'मिथिलाक प्रवासी श्रमिकक समानान्तर इतिहास'क एकटा अध्याय थिक जे ने सरकारी आँकड़ामे, ने शैक्षणिक शोध-पत्रमे, वरन् खाली साहित्यमे जीवित अछि।
खण्ड ७ : तुलनात्मक विश्लेषण आ संश्लेषण
७.१ तीनू कथाक परस्पर सम्बन्ध
तीनू कथामे एकटा गहींर परस्पर सम्बन्ध अछि- ई सभ मिथिलाक एकहि समाजक तीन भिन्न-भिन्न आयामकेँ प्रस्तुत करैत अछि।
इन्द्रधनुष- राजनीतिक आयाम : जनसंघर्ष, संगठन, सामन्त-विरोध।
प्रतिलोम- धार्मिक-सांस्कृतिक आयाम : श्राद्ध, जाति-पूजा, परम्पराक आडम्बर।
कैलास मंडलक फिलिप्स रेडियो- आर्थिक-व्यक्तिगत आयाम : प्रवास, आकांक्षा, जातीय शोषण।
तीनू मिलिकेँ मिथिलाक समकालीन जीवनक एकटा त्रिआयामी चित्र प्रस्तुत करैत अछि।
७.२ शैली आ भाषाक विविधता
तीनू कथाक भाषा-शैली भिन्न अछि। इन्द्रधनुषमे बोलचालक मैथिली, समूह-संवाद, नारेबाजी- ई 'जनभाषा'क प्रयोग अछि। प्रतिलोममे अपेक्षाकृत साहित्यिक, संस्कृत-प्रभावित मैथिली जे ब्राह्मण पात्रसभक भाषा-व्यवहारकेँ सेहो दर्शाबैत अछि। कैलास मंडलमे मैथिली आ हिन्दीक मिश्रण, जे शहरी-ग्रामीण सम्पर्कक भाषाई यथार्थ थिक।
७.३ पाँचू फ्रेमवर्कक संश्लेषण
ई पाँचू फ्रेमवर्क सभ एकहि सत्यक पाँच दिशासँ दर्शन करैत अछि। दलित समीक्षाशास्त्र कहैत अछि- जातीय उत्पीड़न प्राथमिक अछि। भारतीय समीक्षाशास्त्र कहैत अछि- रस, ध्वनि, अलङ्कारसँ एहि कथाक काव्य-सौन्दर्य निर्मित अछि। पाश्चात्य समीक्षाशास्त्र कहैत अछि- वर्ग, जाति, लिङ्ग, इतिहास सभ एक-दोसरमे गाँथल अछि। नव्य न्याय कहैत अछि- तर्कपूर्वक सिद्ध करू जे शोषण एकटा व्यवस्थागत सत्य थिक, मनमानी नहि। विदेह फ्रेमवर्क कहैत अछिमिथिलाक अपन विशिष्ट इतिहास अछि जे एहि साहित्यमे सुरक्षित अछि।
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समीक्षात्मक दृष्टिकोण |
मुख्य सिद्धान्त |
कथा मे प्रयोग |
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भारतीय समीक्षाशास्त्र |
रस, ध्वनि, औचित्य |
सामन्ती विडम्बना आ करुणाक चित्रण |
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पाश्चात्य समीक्षाशास्त्र |
मार्क्सवाद, विखण्डनवाद |
वर्ग संघर्ष आ स्थापित सत्ताक विखण्डन |
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दलित समीक्षाशास्त्र |
स्वानुभूति, प्रतिरोध |
खबास परम्पराक विरोध आ अस्मिता रक्षा |
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नव्य न्याय |
प्रत्यक्ष, अनुमान, अवच्छेदक |
सामाजिक तर्क आ प्रपञ्चक उद्घाटन |
उपसंहार
इन्द्रधनुष, प्रतिलोम, आ कैलास मंडलक फिलिप्स रेडियो- ई तीनू कथा मैथिली साहित्यक ओ सुसोनहुल कड़ी थिक जे एकक्षणमे 'साहित्य'सँ उठि कऽ 'इतिहास' बनि जाइत अछि, 'इतिहास'सँ उठि कऽ 'दर्शन' बनि जाइत अछि। पाँचू समीक्षात्मक फ्रेमवर्कसँ जाँचि कऽ देखी तखन स्पष्ट होइत अछि-
(१) एहि कथासभमे मानव गरिमाक प्रश्न सर्वोपरि अछि- चाहे ओ दलित हो, स्त्री हो, वा निम्नवर्गीय मजदूर।
(२) मिथिलाक विशिष्ट सामाजिक-सांस्कृतिक परिवेश एहि कथासभकेँ सार्वभौमिक बनबैत अछि, ई कथा केवल मिथिलाक नहि, भारतीय समाजक ओइ सभ कोणक कथा थिक जतय जाति-वर्ग-लिङ्गक त्रिकोणमे मनुष्य पिसाइत अछि।
(३) साहित्यिक उत्कृष्टता आ सामाजिक प्रतिबद्धताक बीच एहि कथासभक सेतु अछि- ई 'कला कलाक लेल' 'Art for Art's Sake' नहि वरन् 'कला जीवनक लेल' 'Art for Life's Sake' थिक।
(४) विदेह समानान्तर इतिहास फ्रेमवर्कक दृष्टिसँ ई तीनू कथा मिथिलाक ओ इतिहास लिखैत अछि जे आधिकारिक इतिहास-लेखन लिखबामे असमर्थ रहल।
अन्तमे, गंगेशोपाध्यायक नव्य न्यायमे एकटा अवधारणा अछि 'सिद्धि' (Accomplishment through valid knowledge)। एहि तीनू कथाक पठन-मनन-विश्लेषणसँ जे 'सिद्धि' प्राप्त होइत अछि, ओ थिक- जाति, वर्ग, आ मानव-अवमानना एकटा तार्किक, ऐतिहासिक, आ नैतिक रूपसँ अन्यायपूर्ण व्यवस्था थिक आ साहित्य एकर विरुद्ध सबसँ सशक्त प्रतिरोध थिक।
निष्कर्ष: मैथिली कथाक भविष्य आ समानान्तर धारा
प्रभास कुमार चौधरी, अशोक आ रमेशक ई कथा सभ मैथिली साहित्य केँ 'अभिजात्य' घेरा सँ बाहर निकलि कऽ 'लोक' केर यथार्थ धरि लऽ जाइत अछि। 'इन्द्रधनुष' केर राजनीतिक यथार्थ, 'प्रतिलोम' केर अस्मिता संघर्ष आ 'फिलिप्स रेडियो' केर आर्थिक विडम्बना- ई तीनू मिलि कऽ मिथिलाक एकटा 'समानान्तर इतिहास' केर निर्माण करैत अछि। गंगेश उपाध्याय केर नव्य न्याय केर तर्क पद्धति सँ जखन एहि कथा सभक विश्लेषण कएल जाइत अछि, तखन साहित्य मात्र भावुकताक विषय नहि रहि जाइत अछि, अपितु ओ एकटा 'बौद्धिक विमर्श' बनि जाइत अछि। 'विदेह फ्रेमवर्क' एहि विमर्श केँ एकटा व्यवस्थित आधार प्रदान करैत अछि, जतय दलित विमर्श, वर्गीय चेतना आ आधुनिकताक द्वन्द्व एक संग समाहित अछि। मैथिली कथाक ई विकास यात्रा भविष्य मे ओहि 'इन्द्रधनुष' (पनिसोखा) केर खोज मे अछि जकर रंग उड़ि नहि जाय आ जतय सभ 'कैला' आ 'अर्जुन' केँ अपन 'फिलिप्स रेडियो' आ 'अस्मिता' बचेबाक पूर्ण अधिकार भेटय। एहि कथा सभक माध्यम सँ मैथिली साहित्य आब वैश्विक स्तरक 'सबल्टर्न' विमर्श केर संग डेग सँ डेग मिला कऽ चलि रहल अछि।
सन्दर्भ-ग्रन्थ
भारतीय ग्रन्थ
भरत मुनि- नाट्यशास्त्र
आनन्दवर्धन- ध्वन्यालोक
कुन्तक- वक्रोक्तिजीवित
गंगेशोपाध्याय- तत्त्वचिन्तामणि
अम्बेडकर, डॉ. बी.आर.- जाति का विनाश
अम्बेडकर, डॉ. बी.आर.- Annihilation of Caste
पाश्चात्य ग्रन्थ
Marx, Karl- Capital (Vol. I)
Gramsci, Antonio- Prison Notebooks
Lukcs, Georg- The Historical Novel
Fanon, Frantz- The Wretched of the Earth
Spivak, Gayatri- Can the Subaltern Speak?
de Beauvoir, Simone- The Second Sex
Derrida, Jacques- Of Grammatology
Saussure, Ferdinand de- Course in General Linguistics
Greenblatt, Stephen- Renaissance Self-Fashioning
अनुलग्नक:
ज्योत्स्ना फणिजा- कतिपय मैथिली कथा मे जातीय संघर्षक अन्वेषण
[प्रभास कुमार चौधरीक इन्द्रधनुष द रेनबो, अशोक कुमार झाक प्रतिलोम एंटीकरेंट आ रमेश झाक कैलास मंडलक फिलिप्स रेडियो- कन्टेम्परेरी मैथिली शॉर्ट स्टोरीज (Contemporary Maithili Short Stories)। संपादक: ठाकुर, मुरारी मधुसूदन। नई दिल्ली: साहित्य अकादमी, २००५]
(म्यूज इण्डिया नवम्बर- दिसम्बर २०१९, अंक ८८)
ज्योत्स्ना फणिजा
आंध्र प्रदेशक काईकलूर नामक शांत गामक डॉ. ज्योत्स्ना फणिजा, परिस्थिति द्वारा थोपल गेल मौन पर लिखित शब्दक शक्तिक एकटा गहीर प्रमाण छथि। ओ दिल्ली विश्वविद्यालयक एआरएसडी कॉलेजमे अंग्रेजीक सहायक प्रोफेसर छथि। ओ २०१६ मे मात्र २५ वर्षक अल्पायुमे अंग्रेजी आ विदेशी भाषा विश्वविद्यालय (EFLU), हैदराबाद सँ पीएचडीक उपाधि प्राप्त कएलनि। डॉ. फणिजाक कार्य कात-करोट मे रहि रहल समाजक सूक्ष्म अन्वेषण थिक। हुनकर शोध उत्तर-औपनिवेशिक साहित्यक हिलकोरक बीच अपन रास्ता बनबैत अछि, विशेष रूप सँ लिंग आ "उन्माद" (madness) क अंतर्संबंधक पड़ताल करैत अछि, जकरा ओ कोनो चिकित्सीय कमीक रूपमे नहि, वरन् प्रतिरोधक एकटा विद्रोही रूपक रूपमे देखैत छथि। पुनरुत्थानक ई स्वर हुनकर विविध साहित्यिक पोर्टफोलियोमे अछि:
कविता आ अनुवाद: अपन पहिल कविता संग्रह सिरेमिक इवनिंग (२०१६) सँ ल' क' क्रिमसन लैंप (२०१५) आ स्टोन्ड सॉन्ग (२०१९) मे तेलुगु कविताक सूक्ष्म अनुवाद धरि, ओ भाषाई आ भावनात्मक दूरी कें पाटैत छथि।
संपादकीय दृष्टि: निवेदिता एन. क संग ओ द वर्ल्ड आई राइट इन (२०१६) क संपादन कएलनि, जे दृष्टिबाधित लेखकक आवाज कें केंद्रमे राखय बला एकटा महत्वपूर्ण संकलन थिक।
बहुआयामी पहुँच: हुनकर रचनात्मक प्रतिभा कथा, शैक्षणिक लेख आ निबंध धरि पसरल अछि, जे प्रायः हुनकर गायन जीवनक फुरसतिक क्षणमे रचल जाइत अछि। ओ ओहि संगमक साक्षात स्वरूप छथि जतय जाति, लिंग आ दिव्यांगताक उपनदी सभ आपसमे मिलैत अछि। डॉ. फणिजाक पहचान एकटा जटिल चौबटिया पर बनल अछि। एहन संसारमे जतय महिला, दृष्टिबाधित आ निम्न जातिक पहचानक मेल सँ प्रायः संसाधनक प्रणालीगत अभाव उत्पन्न होइत अछि, ओतय ओ मात्र सहैत नहि छथि; वरन् मुखर छथि। हुनकर जीवन आ साहित्य चुप रहबाक विरोध करैत अछि जे अपन अंतर्विभागीय वास्तविकताक समस्या सभ कें एकटा साहसी आ काव्यात्मक हुंकारमे बदलि दैत अछि।
कतिपय मैथिली कथा मे जातीय संघर्षक अन्वेषण
[प्रभास कुमार चौधरीक इन्द्रधनुष द रेनबो, अशोक कुमार झाक प्रतिलोम एंटीकरेंट आ रमेश झाक कैलास मंडलक फिलिप्स रेडियो- कन्टेम्परेरी मैथिली शॉर्ट स्टोरीज (Contemporary Maithili Short Stories)। संपादक: ठाकुर, मुरारी मधुसूदन। नई दिल्ली: साहित्य अकादमी, २००५]
जाति लोक कें विशेषाधिकार प्राप्त आ सुविधाविहीन वर्गमे विभाजित करैत अछि, जे श्रेष्ठता आ हीनताक भेद उत्पन्न करैत अछि। ई दुनू एहन पृथक संसारक निर्माण करैत अछि जे कहियो एक नहि भ' सकैत अछि, आ एकटा पैघ समय सँ ई मानवक सोच-विचारक क्षमता पर शासन क' रहल अछि। साहित्य जातिगत दमनक शिकार भेलाक पीड़ा, जातीय भिन्नता सँ उत्पन्न आतंक आ हिंसा, तथा मानवता कें दुखित करय बला 'जाति रूपी संक्रमण' कें स्वर दैत अछि। अंग्रेजीमे अनूदित किछु मैथिली कथा जातिगत उत्पीड़न कें रूपकात्मक स्वरमे समेटने अछि। ग्रामीण पृष्ठभूमि पर आधारित ई कथा सभ जातिगत दमनक शिकार भेलाक स्थिति, आ लिंग तथा जातिकें 'दोबड़ उत्पीड़न' क रूपमे चित्रित करैत अछि, जतय काव्यात्मक बिंबक माध्यम सँ पीड़ा आ कष्टक अभिव्यक्ति होइत अछि। ई कथा सभ भौतिक स्थान, आर्थिक, राजनीतिक आ सांस्कृतिक चिंता सभ सँ उत्पन्न जातीय संघर्ष आ अस्तित्वक प्रतीकक रूपमे व्याप्त हिंसा कें रेखांकित करैत अछि।
जातिक संबंधमे गप्प करब एकटा जटिल काज थिक, जतय पीड़ा आ कष्ट कें रेखांकित कएनाइ आ वर्तमान असमान समाजक निर्भीकतापूर्वक चित्रण कएनाइ चुनौतीपूर्ण अछि। जेना कि शर्मिला रेगे लिखैत छथि, जातिक विषयमे लिखब कहियो काल राष्ट्रक प्रति विश्वासघातक समान प्रतीत होइत अछि। हुनकर शब्दमे, उत्तर-औपनिवेशिक कालमे सेहो, जातिक सार्वजनिक आ राजनीतिक अभिव्यक्ति कें एकटा पछुआएल विचारधाराक रूपमे देखल गेल, जे वर्ग संघर्षक गति कें कम करैत अछि आ राष्ट्रक संग गद्दारी सेहो मानल जाइत अछि। (रेगे ३९)। जातिक विषयमे लिखब भारतीय सभ्यताक न्याय अथवा सद्गुणक भ्रम कें तोड़ब अछि।
चयनित कथासभ- प्रभास कुमार चौधरीक द रेनबो, अशोक कुमार झाक एंटीकरेंट आ रमेश झाक कैलास मंडलक फिलिप्स रेडियो- एकटा उच्छृंखल सभ्यता अथवा जातिमे विभाजित समाजक संदर्भमे जातीय संघर्षक अन्वेषण करैत अछि। एहि तीनू कथाक एकटा सझिया दृष्टिकोण अछि- जातिकें वर्गक रूपमे चिन्हब, आ संगे ओहि विचारक लोक कें विभाजित करब जे जातिकें वर्गक बराबर मानैत छथि। उत्तर-औपनिवेशिक स्वरमे, वर्ग आ जाति अदलि-बदलि क' निवासी सभ कें प्रताड़ित क' रहल अछि। ओना कागच पर जातीय भिन्नताक उन्मूलन दर्ज अछि, मुदा वर्ग चेतना जे जातिक उपस्थिति कें बनौने अछि, ओ अखनो पीड़ित लोक कें अपन शिकार बना रहल अछि। ई कथासभ देखबैत अछि जे कोना एकटा विशिष्ट समूहक लोक कें स्वतंत्रता सँ वंचित कएल जाइत अछि, कोना हुनकर बाल्यकाल छीन लेल जाइत अछि, कोना हुनकर आत्म-स्वीकृतिक भावना पर प्रश्न उठाओल जाइत अछि, आ कोना ओ समाजक अन्यायपूर्ण व्यवस्थाक विरुद्ध संघर्ष करबाक लेल प्रयास करैत छथि।
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प्रभास कुमार चौधरीक कथा द रेनबो (इंद्रधनुष) क विश्लेषण
राजनंद झा द्वारा अनूदित प्रभास कुमार चौधरीक कथा द रेनबो जातीय संघर्ष सँ प्रभावित एकटा गामक संपूर्ण रूपांतरणक उदाहरण थिक। ई कथा उच्च जातिक खसैत सामाजिक पहिचान कें रेखांकित करैत अछि, जतय कथावाचक अखन धरि अपन जातीय श्रेष्ठता आ ऊँच-नीचक संस्कार कें बिसरय (unlearning) क प्रक्रियामे अछि। ओ ओहि नव व्यवस्थाक संग तालमेल बनबैत अछि जतय हुनकर 'उच्च' होयब कें चुनौती देल जा रहल अछि।
कथावाचक, जे अपन गाम सँ दूर रहैत अछि, अपन माए कें सांत्वना देबाक लेल वापस अबैत अछि। हुनकर माए गाममे असगर छथि आ उच्च आ निम्न जातिक बीच भ' रहल निरंतर झगड़ाक कारण असुरक्षित अनुभव करैत छथि। ई स्थिति गामक ओहि शांति लेल खतरा अछि जे कहियो ओतय विद्यमान छल। यद्यपि कथाक शीर्षक द रेनबो (इंद्रधनुष) सौंदर्य आ आनंदक प्रतीक अछि, मुदा वास्तवमे ई सामाजिक अशांति दिस संकेत करैत अछि।
कथावाचकक माए कोनो राजनीति नहि जानैत छथि; ओ जातीय स्थितिक प्रति तटस्थ छथि, मुदा गामक भविष्यक खतराक प्रति चिंतित छथि। दोसर दिस, कथावाचक स्वयं कें उच्च जातिक वर्चस्व सँ अलग करबाक लेल तैयार छथि। मुदा अनिल, जे कथावाचकक संबंधी आ उच्च जातिक एकटा प्रमुख युवक अछि, समाजमे समानता कें स्वीकार करबाक लेल तैयार नहि अछि। ओ हिंसाक माध्यम सँ निम्न जातिक लोक कें दबेबाक प्रयास करैत अछि। अनिलक ई दृढ़ विचार अछि जे वर्गहीन समाज कहियो प्राप्त नहि कएल जा सकैत अछि, ई मात्र एकटा भ्रम अछि।
कि अनिल सत्य कहि रहल अछि? कि वर्गहीन समाज मात्र एकटा कल्पना थिक? कथाक अन्य कारक एहि कठोर वास्तविकता कें पुष्ट करैत अछि। गामक विभाजन- शासक आ शासित, मालिक आ मजदूरक बीच आ प्रत्येक समूह द्वारा अपन आत्म-सम्मान कें सिद्ध करबाक चेष्टा, जातीय संघर्षक अनेक तह कें खोलैत अछि।
एहिमे एकटा तेसर समूह सेहो अछि- जे धनीक जमींदार, सूदखोर, आ छद्म समाज सुधारकक थिक, जे अपन स्वार्थ लेल जातीय संघर्षक दुरुपयोग करैत अछि। अंतमे, एकटा चारिम समूह सेहो अछि, जाहिमे दुनू जातिक निर्दोष ग्रामीण छथि जे एहि व्यवस्थाक मारि सहि रहल छथि। ई कथा जातीय संघर्षक ओहि बहुआयामी आ जटिल स्वरूप कें साक्षात करैत अछि जाहिमे मानवता थकुचाइत रहैत अछि।
ई कथा ओहि परिवर्तन कें चित्रित करैत अछि जतय उच्च जातिक लोक एहि वास्तविकता कें स्वीकार करबाक लेल संघर्ष क' रहल छथि जे कोनो व्यक्ति कें संपत्तिक समान अपन अधिकारमे नहि राखल जा सकैत अछि। जेना कि कथावाचक मोन पाड़ैत छथि जे एखन ओ ग्रामीण लोकनि द्वारा "मालिक" नहि कहल जा सकैत छथि। ई कथा अपन परिष्कृत रूपमे उच्च आ निम्न जातिक बीचक "स्वामी-दास" संबंधक अंतक घोषणा करैत अछि।
एहि चित्रणक समानान्तर, ई कथा धनी लोकक द्वारा ओढ़ल गेल समानताक छद्म आवरणक विषयमे सेहो गप्प करैत अछि। महाकांत झा आ भुट्टा झा जेहन छद्म साम्यवादी मजदूर सभ कें समानताक पाठ पढ़ेबाक प्रयास करैत छथि। ओ मजदूर सभ कें अपन मालिकक विरुद्ध भड़का दैत छथि। हुनकर उद्देश्य गरीबक मदद कएनाइ नहि, वरन् समाज सुधारकक रूपमे पहिचान बना क' चुनाव लड़ब आ लोकक समर्थन प्राप्त करब अछि। हुनकर एहि योजनाक परिणामस्वरूप, मजदूर सभ सरोज भैयाक खेतमे तीन मास धरि काज करब बंद क' दैत छथि। जखन सरोज अपन मजदूर परबोधनक पत्नी कें अपन मजदूरी लेबाक लेल बेर-बेर अपन घर बजबैत छथि, तखन आंदोलन शुरू भ' जाइत अछि।
जाति, विभाजनक एकटा अवैज्ञानिक पद्धति थिक जे संपूर्ण समाजक पूर्ण सहभागिता कें रोकैत अछि। एहि कथामे चित्रित गाम राष्ट्रक एकटा लघु रूप थिक, जतय जातिक राजनीतिक संघर्ष व्यक्ति लेल कहियो नहि खत्म होय वाला मनोवैज्ञानिक द्वंद्व उत्पन्न करैत अछि। गामक उच्च जातिक लोक निम्न जातिक "विद्रोही" व्यवहार सँ स्तब्ध छथि। ओ अनुभव करैत छथि जे ओहि सर्वोच्च स्थिति कें जे ओ कहियो उपभोग करैत छलाह, ओ आब मात्र एकटा परिकथा बनि क' रहि जायत। सरोजक विचार अछि जे उच्च जातिक बीच समन्वयक अभावक कारण निम्न जातिक लोक स्वतंत्र भ' गेलाह। हुनकर उच्च जातीय संस्कार हुनका श्रेष्ठताक अनुभव करबाक आ निम्न जाति पर अपन मालिक सन हक देखेबाक लेल विवश करैत छनि।
ई कथा ओहि राजनीतिक संघर्षक चर्चा करैत अछि, जतय निम्न जातिक कूटनीतिक लोक अपनहि समाजक लोकक कष्टक अनुचित लाभ उठबैत छथि आ अपन आर्थिक लाभ लेल हुनकर उपयोग करैत छथि। सुत्ता खतबे आ मुनरा कें गाममे हिंसा पसारय आ गरीब सभ कें कष्ट देबाक लेल दोषी मानल जाइत अछि। खतबे-धानुक समुदायक सुत्ता खतबे, अपन हाथमे मोट लाठी लय क' काशी चौधरी कें डराबैत अछि। ओ अपन पूर्ण क्रोध देखबैत काशी बाबू कें चेतौनी दैत अछि जे जँ ओ हुनकर मजदूरी देबा सँ मना कएलनि त' परिणाम गंभीर हएत। ई घटनाक्रम नाटकीय प्रतीत होइत अछि, कियाक त' ई मात्र काशी बाबूक क्षणिक हारि देखबैत अछि। अगिला दिन सुत्ताक पिता काशी बाबू सँ क्षमा मंगैत छथि, जाहि सँ पता चलैत अछि जे पुरान खाढ़ी अखनो उच्च जातिक वर्चस्वमे विश्वास रखैत अछि।
ई घटना गहीर स्तर पर निर्दोष लोकक उत्पीड़न कें सेहो रेखांकित करैत अछि। उच्च जातिक लोक क्रोध सँ हिंसक भ' जाइत छथि। सुत्ता अपन हाथमे लाठी लय क' अबैत अछि आ अपन पिता कें कहैत छनि जे ओ अनिलक आगू गिड़गिड़ाएब बंद करथि। अपन क्रोधमे ओ उच्च जातिक लोक पर प्रश्न उठबैत कहैत अछि- "हम 'बाभन' सभ कें गारी देनाइ जारी राखब।" ओ मारक प्रहार करैत पुछैत अछि, "हम सभ पसीना बहा क' कमाइत छी त' नीच जाति भ' गेलहुँ, आ ई कोढ़िया सभ जे बैसल रहैत अछि से ऊँच जाति भ' गेल?" (चौधरी १५३)। हुनकर ई प्रश्न अपन श्रम लेल समान सम्मान पेबाक अधिकार कें चिन्हित करैत अछि।
कथा ओहि ठाम हिंसक मोड़ लैत अछि जखन अनिल द्वारा नियुक्त भीड़ सुत्ता कें पकड़बाक प्रयास करैत अछि, मुदा ओ भागि जाइत अछि। भीड़ सुत्ताक पिता यदुआ कें पकड़ि लैत अछि आ ओकरा ओधबाध कऽ दैत अछि। मुनरा काशी बाबू कें धमकी दैत अछि जे यदुआ कें भीड़ सँ मुक्त कएल जाय। ओ सभ यदुआ कें छोड़ि दैत छथि, मुदा जखन मुनरा नहि भेटैत अछि, तखन ओ सभ हुनकर पत्नी पर हमला करैत छथि आ हुनकर साड़ी फाड़ि दैत छथि। मुनरा घरमे नुकायल रहैत अछि। एहि स्थितिमे मुनराक पत्नी वास्तविक शिकार बनैत अछि, जखन कि ओकर पति सुरक्षित नुकायल रहैत अछि। ठीक ओहिना, वृद्ध यदुआ जातीय संघर्ष सँ उत्पन्न हिंसाक शिकार बनैत छथि, जखन कि हुनकर बेटा बचि जाइत अछि।
तकर बाद निम्न जातिक लोक उच्च जातिक लोक पर हमला शुरू क' दैत छथि। "बेचारा असहाय विश्वनाथ मिश्र जे अपन दलानमे बैसल छलाह, हुनका ओहिना उठा क' फेकि देल गेल जेना कोनो बेंग कें। मंदिर सँ वापस अबैत काल पंडित मुसहर झा कें हाथमे फूलक डलिया सहित जमीन पर पटकि देल गेल।" (चौधरी १५३)। ई राजनीतिक संघर्ष निर्दोष लोक कें शिकार बनबैत अछि आ हुनका विवशताक स्थितिमे ल' जाइत अछि। दुनू समूहक 'चलाक' लोक सुरक्षित रूप सँ जातीय राजनीति खेलाइत छथि, आ निर्दोष ग्रामीण सभ कें कष्ट सहबाक लेल छोड़ि दैत छथि। नामी बाबू, जे गामक एकटा सूदखोर छथि, एहि स्थितिमे तटस्थ रहबाक ढोंग करैत छथि, जे गामक लेल आबय बला समयमे आइयो बड्ड खतरनाक अछि।
उच्च जातिक कूटनीतिक लोक निम्न जातिक लोकक आशंकाक संग खेलाइत छथि, जइसँ ओ सतीनाथ झा सन समाज सुधारकक रूपमे जानल जा सकथि। सतीनाथ झा एकटा विधुर आ लोकदलक सदस्य छथि, जे उदारवादी होयबाक ढोंग करैत छथि आ अपन स्वार्थ लेल जातीय राजनीतिक उपयोग करैत छथि। कथावाचक, जे एकटा सचेत व्यक्ति अछि, एहि विभाजनकेँ देखि स्तब्ध भ' जाइत अछि। ओ पुछैत अछि, ई सब की अछि? दलितक पुनरुत्थान? जातीय संघर्ष आ वर्ग संघर्ष? ई सब ककरा लेल? तथाकथित नेता लोकनि अपन वोट बैंक बनेबाक लेल जातिक नाम पर सामाजिक ताना-बाना मे जहर किएक घोरि रहल छथि? (चौधरी १५५)। जाति वोट मांगय बला लोकक लेल एकटा हथियार बनि गेल अछि। एहि पंक्ति सभमे जातिक विषयमे गप्प करैत, राजनेता, छद्म साम्यवादी, धनीक, कूटनीतिक, शक्तिशाली आ तटस्थताक सुरक्षित खेल खेलय बला लोकक वास्तविक स्वरूप कें उघारैत, चौधरी लोकतंत्र कें मात्र एकटा सपनाक रूपमे देखना जाइत छथि।
ई कथा जातीय संघर्ष सँ उत्पन्न गरीबक प्रताड़नाक आलोचना करैत अछि, जेना कि वैशंपवल्लिक पुतहु अपन स्थितिक विषयमे कड़गर टिप्पणी करैत छथि:
सुत्ता शहरमे रिक्शा चलबैत अछि आ मुनरा गाम-गाम जा क' राजमिस्त्रीक काज करैत अछि। हुनका सभ कें कोनो चिंता नहि छनि। हमरा सभ कें बीचमे छोड़ि ओ सभ मौज कऽ रहल छथि। हमरा सभ कें खाय लेल किछु नहि अछि। हमर बच्चा सभ भूखल अछि! अहाँ लोकनि हमरा सभ पर कोनो दया नहि करैत छी। अहाँ हमरा सभ कें घरक काज सँ निकालि देलहुँ। हमर मालजाल बिना घासक मरि जायत। एहि बान्ह पर ओ सभ चरैत अछि कियाक त' हमरा सभ कें खेत आ कलम मे चरायब मना अछि। ओ सभ निश्चित रूप सँ मरि जायत। ई सब सुत्ता आ मुनराक कारण भ' रहल अछि। (चौधरी १६१)
तहिना, जातीय संघर्ष उच्च जातिक मध्यम वर्गक बीच सेहो तनाव उत्पन्न करैत अछि, किएक त' हुनका अपन कृषि कार्य लेल मजदूरक आवश्यकता होइत अछि। उच्च मध्यम वर्गक मुन्ना बाबू एहि संपूर्ण संघर्षक निचोड़ एहि रूपमे रखैत छथि:
काशी बाबूक रोटी पर अब दुनू तरफ सँ घी लागल छनि। ओ एहि माध्यम सँ पर्याप्त पाइ कमा लेताह, ई निश्चित अछि। नामी बाबू पहिनहि सँ हुनकर पक्षमे छथि। जतऽ धरि मुनरा आ सुत्ताक गप्प अछि, ओ हुनका काल्हि बजा क' हाथ मिला लेताह। ओ हुनकर अपनहि टोलक छथि। बाद बाकी हम सभ ग्रामीण मूर्ख बनब। काशी कें अपन खेत-पथारक कोनो चिंता नहि छनि। अहाँक जमीन परती रहि जायत जखन कि ओ एहि मे आनंद लेताह। (चौधरी १५९)
अतः ई इंद्रधनुष एकटा अशांत इंद्रधनुष अछि, जाहिमे क्रूर पाँखि लागल अछि आ जे पूरा आकाश कें तोपने अछि, जतय राजनेता लोकनि द्वारा राष्ट्रीय हितक मशीनीकरण कएल जा रहल अछि। ई कथा प्रश्न उठाबैत अछि जे स्वतंत्रता वास्तविक अछि वा मात्र एकटा भ्रम, किएक त' निर्दोष लोक, जे कोनो समूह सँ नहि जुड़ल छथि, ओ अपन जीविका सँ वंचित भ' रहल छथि। जाति आ वर्गक अवधारणाक बीच चोरा-नुक्की खेलाइत ई कथा जातीय व्यवस्थाक जड़ि पर प्रहार करैत अछि।
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अशोकक कथा एंटीकरेंट (प्रतिलोम) क विश्लेषण
अशोक कुमार झाक लघु कथा एंटीकरेंट, जकर अनुवाद संजीव कुमार चौधरी कएलनि अछि, जातीय संघर्ष आ छीनल गेल बाल्यकाल कें प्रस्तुत करैत अछि। धनमंतीक चौदह बर्खक बेटा अर्जुन अपन माय सँ उच्च जातिक प्रति समर्पणक भाव विरासतमे पौने अछि, कियाक त' अपनहि समाजक लोक द्वारा ओकर उपहास कएल जाइत अछि। ई ओ समय सेहो थिक जखन पुनरुत्थान भ' रहल अछि आ उच्च जातिक वर्चस्वक विरुद्ध आंदोलन तेज भ' रहल अछि। अर्जुन अपन पुरान मालिकक घरक उच्छिष्ट (छोड़ल गेल भोजन) लेबाक लेल तैयार अछि, यद्यपि हुनका अपन जातिक लोक द्वारा कहल जाइत छनि जे हुनका सभ कें उच्च जाति सँ उच्छिष्ट भोजन नहि लेबाक चाही। "खबासिन सभ आब उच्छिष्ट भोजन नहि लैत छथि। हुनकर जातिक लोक हुनकर हवेलीमे खबास आ खबासिनक रूपमे काज करबा सँ मना करैत छथि; एकरा अपमानजनक मानल जाइत अछि।" (झा २३९)। द रेनबो मे भूख आ भुखमरीक रूपमे चित्रित संघर्षक समान, एहि ठाम सेहो अर्जुन आ हुनकर असहाय माय अपन भूख मेटेबाक लेल अपनहि जातिक लोकक विरुद्ध जा क' काज करैत छथि। अर्जुन जखन अपन पुरान मालिक पंडित गणेश्वर झाक श्राद्धमे सम्मिलित होमय लेल जाइत छथि, जतय भारी मात्रामे स्वादिष्ट भोजन परसल जायत, तखन हुनका अपनहि जातिक लोक द्वारा उपहास कएल जाइत अछि। ओ सभ हुनकर उपहास उड़बैत छथि, जाहि सँ हुनकर निर्दोष मन प्रताड़ित होइत अछि।
आर्थिक संघर्षक उदाहरण एहि कथामे देखल जा सकैत अछि जखन बौआ झाक परिवार आ हुनकर पैघ संख्यामे संबंधी भोजनक आनंद लैत छथि आ ओकरा बहुत बर्बाद करैत छथि, मुदा अर्जुनक घरमे चाह बनेबाक लेल रती भरि चिन्नी सेहो नहि अछि। अर्जुनक थाकल देह कें अनुभव होइत अछि जे एहि कड़कड़ाइत जाड़मे एक कप चाह जरूरी अछि, मुदा हुनकर वर्तमान परिस्थिति हुनका एक कप चाह पीबा सँ रोकैत अछि। हुनकर माय हुनका चाह नहि द' सकैत छथि किएक त' घरमे चिन्नी नहि अछि; हवेलीमे हुनका बेर-बेर अलग-अलग काज लेल पठाओल जाइत अछि, आ ओ एक कप चाह लेल संघर्ष करैत छथि। ई विकट स्थिति भूख आ ओकर क्रूर स्वरूप कें चित्रित करैत अछि।
लोक कें जातिमे विभाजित करय बला एकटा भेद भोजनक आदति सेहो अछि। भोजनक आदति आ दोसर भोजनक आदति मे परिवर्तन कें एहि कथामे व्यंग्यात्मक रूप सँ चित्रित कएल गेल अछि। अर्जुनक पिता लूटन मरड़ मांस खायब छोड़ि देने छलाह। ओ एकटा तपस्वी सँ "कंठी" लेने छलाह। हुनकर पुरान मालिक आ मालकिन हुनका पर तमसायल छलाह मुदा ओ शाकाहारी बनल रहलाह। धनमंती हुनकर अकाल मृत्यु कें शाकाहारी भोजनक अभ्यास मे परिवर्तन सँ जोड़ैत छथि। किएक तँ शाकाहारी भोजनक सेवन एकटा विशिष्ट जाति आ ओकर पहचान कें चिन्हित करैत अछि, तें लूटन मरड़क अपन मूल स्वरूप बदलबाक लेल आलोचना कएल जाइत अछि।
ई कथा रेखांकित करैत अछि जे परंपराक नाम पर लोक कें कोना अन्याय सहय लेल विवश कएल जाइत अछि। अर्जुन अपन मालिकक प्रशंसामे बौआ झाक सोचक नकल करैत अछि। प्रशंसाक एहि प्रक्रियामे अर्जुन अपन अस्थित्व हेरा जाइत छथि। एकर एकटा उदाहरण कथामे भेटैत अछि, जतय अर्जुन जोर दैत अछि जे चाह पीबाक बाद सभ कें हाथ धोबाक चाही, आ ओ पाहुन सभ कें हाथ धोबा लेल लोटा बढ़ाबैत रहैत अछि। ओतय उपस्थित लोक हुनका पंडित सन, उच्च जातिक सदस्य सन व्यवहार करबाक लेल आलोचना करैत छथि। दोसराक समान व्यवहार कएनाइ सेहो जातीय व्यवस्थाक दीर्घकाल धरि बनल रहबाक एकटा कारण अछि। प्रशंसा सँ आत्म-घृणा उत्पन्न होइत अछि, जाहि सँ अपन पहिचान नीचा खसैत अछि। ई कथा एहि मनोवैज्ञानिक द्वंद्व कें चिन्हित करैत अछि, जतय अर्जुन आ हुनकर माय एकटा जटिल चिंतामे फँसि जाइत छथि जतय ओ अपना सँ घृणा करैत छथि; मालिकक नकल करबाक वा हुनकर आदति सभक अभ्यास करबाक प्रत्येक छोट काज हुनका ओहि स्वीकृत समूहक सदस्य भेलाक एकटा अस्थायी दर्जा दैत अछि। जखन कि लूटन मरड़क भोजन परिवर्तनक आलोचना धनमंती करैत छथि, ओ स्वयं अपन बेटाक उच्चवर्गीय आदति सभ सँ मंत्रमुग्ध भ' जाइत छथि। तखने अपना कें स्वीकार करबाक असमर्थता हुनका मनोवैज्ञानिक रूपेँ खंडित क' दैत अछि। अर्जुनक गुलामीक एकटा आन कारण मालिकक प्रति हुनकर भय अछि। एकटा जवान लड़काक रूपमे ओ अपन जीवन, अपन मायक विवशता, अपन परिवार आ ओकर भूखक आवश्यकताक विषयमे सोचैत अछि। एकटा अशांत बालकक रूपमे जकरा आदेशक बदला स्नेहक गरमाहटि आ अपन छोट-छोट काजक लेल प्रशंसाक आवश्यकता अछि। अनेक स्तर पर एकटा सुविधाविहीन बालकक रूपमे अर्जुनक छीनल गेल बाल्यकाल राष्ट्रक भूल थिक।
कथा तखन एकटा महत्वपूर्ण मोड़ लैत अछि जखन बौआ झाक अहंकार कें जवाहर द्वारा चुनौती देल जाइत अछि, जे एकटा एहन लड़का अछि जकरा अर्जुन २० टका मजदूरी पर श्राद्ध लेल अनने अछि। पानमे बेसी चूनक कारणें अर्जुनक जीह कटि जाइत अछि, आ जवाहर बौआ झा कें कहैत छनि जे ओ ओकर जीह बदलि दिअय। बौआ झाक उच्च जातिक सदस्य भेलाक दर्जा, पवित्र शास्त्र पढ़बाक क्षमता, पवित्रताक प्रति हुनकर दीर्घकालीन विश्वास कें चुनौती देल जाइत अछि। ...ई जवाहिरा, ई पिद्दी सन लड़का हमरा चुनौती द' रहल अछि। ओ हमरा अर्जुनक जीह बदलबय लेल कहि रहल अछि! जेना कि ई कोनो नट वा बोल्ट हो। (झा २५५)। बौआ झा जानैत छथि जे अर्जुनक जीह बदलब असंभव अछि, तें ओ असहनीय क्रोध सँ भरि जाइत छथि। अर्जुनक कटल जीह ओहि खंडित पहिचानक रूपक थिक जकरा ओ सहबा लेल विवश अछि। ओ पिता चलि गेला, ओकर बाल्यकाल हेरा गेल, ओ आत्म-सम्मानसँ वंचित भऽ गेल; ओ अपन जातिक लोक सँ नहि जुड़ि सकैत अछि, नहिये ओ मालिकक सेवा जारी राखि सकैत अछि, जे जातिक नाम पर संपूर्ण प्रताड़नाक प्रतीक थिक। मुदा बौआ झा कें देल गेल चुनौती तेहनो समयमे समानता प्राप्त करबाक आशा कें प्रस्तुत करैत अछि।
ई कथा एकटा एहन गाममे आधारित अछि जतय लोक कें विद्याक वर्चस्वमे विश्वास करय लेल विवश कएल जाइत अछि। किएक तँ सिखबाक अवसर खाली उच्च जाति लग अछि, तें निम्न जाति कें ज्ञानक नाम पर चुप कएल जाइत रहैत अछि। ई कथा विस्तार सँ कहैत अछि जे कोना गणेश्वर झाक व्यक्तित्व श्राद्ध मंत्रोच्चार, संगीत, विभिन्न प्रकारक भोजन परसब, खस्सी काटब, राजनीति, भाषा विज्ञान, साहित्य पर चर्चा, वेद, उपनिषद, कर्म, मृत्यु पर व्याख्या, शुद्धता आ अशुद्धता पर बहस, श्लोक उद्धृत कएनाइ अछि; मुदा ई मानवता, समानता आ न्याय पर कोनो विचार नहि कएनाइ- एहि सभ सँ सेहो चिन्हित अछि। ई श्रोत्रियक बौआ झा आ कार्यशील वर्गक जवाहरक बीचक संघर्ष कें प्रस्तुत करैत अछि, जतय जवाहर ओ काज करबा मे सक्षम अछि जे गामक बहुत रास लोक सोचबाक साहस सेहो नहि क' सकलाह। ई कथा जातीय व्यवस्थाक एकटा कड़गर आलोचना थिक जे पवित्रताक नाम पर समाज पर थोपल गेल अछि। धर्मक संदर्भमे जातीय संघर्षक अन्वेषण करबाक अशोक कुमार झाक ई हस्तक्षेप कोनो धर्म कें जीवन पद्धतिक बराबर मानबाक प्रस्तावना सभ लेल एकटा पैघ खतरा अछि।
आधुनिक समयमे सेहो भारतीय सामाजिक जीवनमे जाति एकटा अटूट संरचना अछि, जेना कि वेलासेरी आ पात्रा नोट करैत छथि:
...जाति कें भ्रम आ कल्पना दुनू कहल जाइत अछि। ई एकटा भ्रम अछि किएक त' ई ओहि समाजक मानसिक रचना अछि जाहि मे हम रहैत छी; ई एकटा कल्पना अछि किएक त' एहि सँ विविध प्रकारक बौद्धिक उत्तेजनाक मार्ग प्रशस्त भेल अछि जाहि सँ भारतमे विभिन्न प्रकारक मानसिक विभ्रम उत्पन्न भेल अछि। यद्यपि जातिकें कोनो प्रकारक बौद्धिक वैधता वा वैज्ञानिक मान्यता नहि देल जा सकैत अछि, तथापि व्यक्तिक सामाजिक स्तरीकरणक रूपमे जाति आधुनिकताक एहि समयमे सेहो अपन राजनीतिक आ सामाजिक मान्यता रखैत अछि। (वेलासेरी आ पात्रा १)
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रमेशक लघु कथा कैलास मंडलक फिलिप्स रेडियो
भैरत्वेश्वर झा द्वारा अनूदित रमेश झाक लघु कथा कैलास मंडलक फिलिप्स रेडियो एहि बातक उल्लेख करैत अछि जे कोना जाति एकटा भ्रम अछि, लोक कें चुप कराबय लेल एकटा अवैज्ञानिक सिद्धांत अछि, अथवा कोना जाति एकटा कल्पना थिक जे वास्तविकता कें चुनौती दैत अछि। ई कथा जातीय सोपान आ गामक राजनीतिक अंतर्संबंधक चित्रण अछि। कैलास एकटा मधुर स्वभावक लड़का अछि, एकटा स्नेही बेटा अछि, मुदा ...हवेलीक लेल आ ओहि ब्राह्मण टोलक लोकक लेल जे ओकरा 'शूद्र' मानैत छथि, ओ एकटा विद्रोही पिछड़ल लोक छल। (रमेश झा ३००)। कैलास जातिगत प्रथासभक प्रति हारि मानयबला नहि अछि। एंटीकरेंट क अर्जुनक समान, कैलास अपन बाल्यकाल हेरा देने अछि, भूख ओकर परिवार पर अपन पाँखि पसारने अछि, आ ओ काज करबाक लेल पंजाब चलि जाइत अछि। ओकर पिताक मृत्यु कमला नदीक बाढ़िमे भ' गेल छल, जखन ओ खेतमे बाचल-खुचल अल्हुआ चुनि रहल छलाह। पिताक मृत्युक बाद कैलासक कष्ट शुरू भ' गेल। ग्रामीण लोकनि हुनका 'कैला' कहैत छथि, जे हुनकर नामक एकटा विकृत रूप थिक। ई हुनकर विकृत पहिचान कें चिन्हित करैत अछि। हवेलीक हुनकर मालिक बौआ झा कैलासक कतहु आन ठाम काज कएनाइ बर्दाश्त नहि क' सकैत छलाह। बौआ झाक मानब छनि जे कैलासक माय ओकरा दूर पठा देलक। बौआ झा हुनका सँ बदला लेबाक प्रतीक्षा करैत छथि। कथा तखन शुरू होइत अछि जखन कैलास पंजाब सँ घर वापस अबैत अछि, जाहि सँ हुनकर माय गदगद भ' जाइत छथि। जखन ओ बौआ झाक हवेलीमे काज लेल नहि अबैत छथि, तखन ओ खिसिया जाइत छथि। बौआ झा कें अपन वर्चस्व छीनि लेल जेबाक डर सतबैत छनि। ओ किछु टका कमा लेलक आ ओकरा पर पंजाबक हवा लागि गेल, हँ? काल्हि धरि ओ दुआरि पर माड़ आ उच्छिष्ट भोजन लेल बैसल रहैत छल आ कहैत छलि; 'मालिक, ई ढोर कें नहि दियौक, हमरा द' दियौ', आ आi जखन ओकर बेटा घर आयल अछि त' ओ... (रमेश झा ३०४)। बौआ झा कैलास आ हुनकर माय सँ गुलामीक अपेक्षा रखैत छथि, आ जखन ओकरा चुनौती भेटैत छनि, त' ओ हुनका सभ मे डर उत्पन्न करबाक नव तरीका सोचैत छथि।
कैलास अपन माय कें खुश करबाक लेल पंजाब सँ एकटा रेडियो अनैत अछि, जे ओकर नव प्राप्त स्वतंत्रताक एकटा बिंब बनि जाइत अछि। बौआ झा कें ओकर स्वतंत्रता आ आत्म-सम्मान मे कोनो अर्थ नहि भेटैत छनि, आ ओ हुनका फेर सँ नीचा देखेबाक प्रयास करैत छथि। ओ गजेंदर आ सुरेंदर कें कैलास कें छलबाक लेल कहैत छथि, आ ओ सभ कैलास कें कर्ज लेबाक लेल विवश करबा मे सफल भ' जाइत छथि, जाहि सँ ओ कर्ज चुकाबय मे असमर्थ भ' जाइत अछि। कैलास फेर सँ गुलामीक स्थिति मे आबि जाइत अछि आ फेर सँ काज लेल पंजाब जेबाक प्रयास करैत अछि। मुदा बौआ झा ग्रामीण सभ कें धमकी दैत छथि जे जँ केओ कैलास कें कर्ज देत, त' ओकरा प्रतिकूल परिणाम लेल तैयार रहबाक चाही। कैलास फेर सँ बौआ झाक खेतमे हरवाह बनि जाइत अछि। ई कथा एकटा गंभीर स्थिति कें सोझाँ अनैत अछि, जतय अनेक प्रतिकूल कथा सभ अनकहल रहि जाइत अछि, जतय ग्रामीणक बीच डर उत्पन्न कएल जाइत अछि, आ उच्च जातिक दर्जा अखनो प्रश्नहीन बनल रहैत अछि। पिछड़ल लोकक उत्थानक आलोचना करैत बौआ झा कहैत छथि, निश्चित रूप सँ सरकार बहुत प्रचार क' हुनका सभ कें बिगाड़ि देने अछि, एहिमे कोनो संदेह नहि। नहि त', कैला क भनसाघर अखन धरि अशुद्ध छै आ ओ छानल रोटी क नाश्ता कोना क' सकैत छै?" (रमेश झा ३०४)। अपन एहि डरक संग जे वर्गहीन समाजक स्थापना भ' जायत, ओ दोसर लोक मे डर उत्पन्न करैत छथि। वर्गहीन समाज एकटा भ्रम बनि जाइत अछि, किएक त' बौआ झा सन लोक वर्गहीन समाजक विचार कें थकुचबाक लेल अनेक उपाय करैत छथि। बौआ झा अपन टका आ बाहुबलक उपयोग दुइ निर्दोष व्यक्ति कें चुनौती देबा लेल करैत छथि, जाहि सँ हरिजन थाना वा पिछड़ल वर्ग लेल विशेष अदालत सन व्यवस्था सभ विफल प्रतीत होइत अछि। बौआ झा कैलासक पंजाब सँ आनल गेल नव विचार कें पिंजरा मे बंद क' दैत छथि।
रेडियो सुननाइ कैलासक मायक जीवन मे स्वतंत्रताक एकटा नव संकेत बनि जाइत अछि। ओ शीघ्र दरभंगा रेडियो स्टेशन लगायब सीखि जाइत छथि आ लोकगीत सुनैत छथि। कैलास अपन मायक जीवन मे जे किछु अनलक, ओ हुनकर सपनाक दुनिया कें वास्तविकता मे बदलब छल। ओ रेडियो सँ जुड़ि जाइत छथि, अपन पूरा जीवन कें मोन पाड़ैत, एकटा नव 'स्व' (self) प्राप्त करैत छथि। जखन कैलास कर्ज चुकाबय मे विफल भ' जाइत अछि, त' रेडियो छीनि लेल जाइत अछि। ओहि सँ ओकर नव प्राप्त व्यक्तित्व खंडित भ' जाइत अछि। ओकर हृदय टूटि जाइत अछि किएक त' ओकर स्वतंत्रताक बोध मात्र एकटा अस्थायी स्थिति छल। मुदा कथा अंत मे एकटा प्रश्न छोड़ि जाइत अछि जे अंत मे ककर जीत होइत अछि? धनीक वर्चस्ववादी व्यवहारक वा एकटा स्नेही बेटाक अपन मायक प्रति विचार क। कैलास जखन अपन माय कें खेतमे अबैत देखैत अछि, तँ रेडियो बौआ झा लग चलि जेतै, ओ मायक तइ दुखक कल्पना करैत अछि। कैलास बौआ झाक खेतमे अपन हरवाहा लाठी सँ रेडियो कें फोड़ि दैत अछि। कैलास अपन माय कें शोक सँ बचेबाक लेल रेडियो कें नष्ट क' दैत अछि, आ बौआ झा कें सेहो ई बुझा दैत अछि जे ओकर पहिचान कें कहियो नष्ट नहि कएल जा सकैत अछि। एक बेर जखन रेडियो ओकर नहि रहल, तखन ओकरा सँ ओकर कोनो लगाव नहि अछि। ओ बुझैत अछि जे ओकर माय अखनो रेडियो सँ जुड़ल छथि। वस्तु सँ एहि मोह कें भंग करबाक ओकर काज, दार्शनिक रूप सँ असमान समाजक प्रति ओकर प्रतिरोध कें चिन्हित करैत अछि।
एहि सभ कथा कें समानता लेल खतराक चिंतनक रूप मे बुझल जा सकैत अछि। एहि सभ मे राष्ट्रीय हित अछि। ई तीनू कथा गामक परिवेशपर आधारित अछि, जइसँ जातिगत प्रथा आ ग्रामीण जीवनक अंतर्संबंध पर जोर देल जा सकय। जखन कि द रेनबो क कथावाचक जाति व्यवस्थाक प्रति तटस्थ अछि आ अपन आँखि क आगू भ' रहल अन्यायक प्रतिरोध नहि करैत अछि, एंटीकरेंट क जवाहर उच्च जाति क प्रति अपन डर त्यागि दैत अछि आ ओकरा चुनौती दैत अछि, आ कैलास मंडलक फिलिप्स रेडियो मे कैलास, बौआ झा सँ हारलाक बादो, अपन सोचल-बुझल योजना कें अपन आंदोलनक प्रतीकक रूप मे चलबैत अछि। जखन कि द रेनबो राजनीतिक आधार आ दुनू समूहक लोकक उत्पीड़न कें प्रस्तुत करैत अछि, एंटीकरेंट आ कैलास मंडलक फिलिप्स रेडियो निम्न जातिक व्यक्तिगत संघर्ष कें प्रस्तुत करैत अछि। जखन कि अनेक लोकक सम्मिलित हिंसा द रेनबो कें चिन्हित करैत अछि, एंटीकरेंट आ कैलास मंडलक फिलिप्स रेडियो मे बाजि कऽ आ दोसराकेँ डरा कऽ चुप करा कऽ उत्पन्न हिंसा केँ स्पष्ट कएल गेल अछि। ई कथा सभ, मिश्रित बिंब सँ समृद्ध आ नव समाजक लक्ष्य रखैत, मैथिली साहित्यक रहस्यमय आ अप्राप्य स्वरूप कें बनौने अछि।
संदर्भित कार्य
चौधरी, प्रभास कुमार। "द रेनबो" (The Rainbow)। अनुवादक: राजनंद झा। कन्टेम्परेरी मैथिली शॉर्ट स्टोरीज (Contemporary Maithili Short Stories)। संपादक: ठाकुर, मुरारी मधुसूदन। नई दिल्ली: साहित्य अकादमी, २००५। मुद्रित।
झा, अशोक कुमार। "एंटीकरेंट" (Anticurrent)। अनुवादक: संजीव कुमार चौधरी। कन्टेम्परेरी मैथिली शॉर्ट स्टोरीज (Contemporary Maithili Short Stories)। संपादक: ठाकुर, मुरारी मधुसूदन। नई दिल्ली: साहित्य अकादमी, २००५। मुद्रित।
झा, रमेश। "कैलास मंडलक फिलिप्स रेडियो" (Kailash Mandal's Philips Radio)। अनुवादक: भैरत्वेश्वर झा। कन्टेम्परेरी मैथिली शॉर्ट स्टोरीज (Contemporary Maithili Short Stories)। संपादक: ठाकुर, मुरारी मधुसूदन। नई दिल्ली: साहित्य अकादमी, २००५। मुद्रित।
रेगे, शर्मिला। राइटिंग कास्ट/राइटिंग जेंडर: नरेटिंग दलित वीमेन्स टेस्टीमोनीज (Writing Caste/Writing Gender: Narrating Dalit Women's Testimonies)। नई दिल्ली: जुबान बुक्स, २०१३। ई-बुक।
वेलासेरी, सेबेस्टियन आ पात्रा, रीना। कास्ट आइडेंटिटीज एंड द आइडियोलॉजी ऑफ एक्सक्लूजन: ए पोस्ट-स्क्रिप्ट ऑन द ह्युमनाइजेशन ऑफ इंडियन सोशल लाइफ (Caste Identities and The Ideology of Exclusion: A Post-Script on the Humanization of Indian Social Life)। कैलिफोर्निया: ब्राउन वॉकर प्रेस, २०१८। मुद्रित।
[सैद्धांतिक विवेचन लेल देखू- मैथिली समीक्षाशास्त्र- गजेन्द्र ठाकुर]
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