VIDEHA ISSN 2229-547X  ·  First Maithili Fortnightly eJournal  ·  Since 2000  ·  www.videha.co.in
विदेह — प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका
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विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका

विदेह

Videha

प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका — First Maithili Fortnightly eJournal

विदेह नूतन अंक
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गजेन्द्र ठाकुर

परमेश्वर कापड़ि- पद्य-रचनाक आलोचनात्मक समीक्षा

(मूल रचना, अनुवाद, उद्धृत पद्य -सभ सम्मिलित)

रस-ध्वनि-वक्रोक्ति • नव्य-न्याय • विदेह समानान्तर इतिहास

भूमिका: परमेश्वर कापड़िक कविता-संसार

परमेश्वर कापड़िक रचना-दस्तावेजमे पद्य-रचनाक विविध स्तर अछि- हुनकर मौलिक पद्य, हुनकर आलोचनामे उद्धृत अन्य कविक गजल, बालगीत, ऋग्वेदक अनुवाद, संस्कृत श्लोकक मैथिली भावानुवाद, आ विभिन्न लोकगीत-फकड़ा। पद्य-रचनाक श्रेणी निम्न प्रकारसँ अछि:

(क) मौलिक मैथिली दोहा/मुक्तक

(ख) ऋग्वेद नासदीय सूक्तक मैथिली अनुवाद -'तत्ववोध'

(ग) संस्कृत श्लोकक मैथिली भावानुवाद -गीता, नासदीय, सीता-स्तोत्र

(घ) बालगीत -'हमर जनकपुरधाम', 'सीता अवतार'

(ङ) 'रेङ-रेङ'क गीत-फकड़ा

(च) हिन्दी गजल (धीरेन्द्र प्रेमर्षि) -कापड़िक समीक्षा-सहित

(छ) डा राजेन्द्र विमलक मैथिली गजल -कापड़िक विस्तृत समीक्षा

(ज) कथा-काव्य 'दाम'

१. 'तत्ववोध'- ऋग्वेदक नासदीय सूक्तक मैथिली अनुवाद

ई सम्पूर्ण दस्तावेजक सर्वाधिक महत्त्वाकांक्षी पद्य-रचना थिक। ऋग्वेदक दशम मण्डलक १२९ म सूक्त -'नासदीय सूक्त'- जे सृष्टिक रहस्यपर विश्वसाहित्यक प्राचीनतम दार्शनिक प्रश्न उठाबैछ- तकर कापड़ि मैथिलीमे अनुवाद प्रस्तुत कएने छथि, राधाकृष्णन-मूर ग्रन्थक आधारपर।

१.अ. पद्यांश

केओ नहि तखन छल / नहि निर्जीवो / वायु नहि / नहि छल आकाश ओकर उपर /

की छल गुप्त / कत ? / ककर संरक्षणमे / आ छल गहींर, अमाप्य सागर?

मृत्यु तखनो नहि छल / नहि छल अमर जीवन /

सांस लैत छल वायुहीनतामे / ओकर अतिरिक्त एत' कोनो वस्तु नहि छल।

शुरुमे ओहिमे प्रवेश कएल इच्छा / ई सोचि / सर्जनक सर्वप्रथम बीज छल।

के जनैत अछि निश्चित रुपस'? / के एकरा स्पष्ट करत? / कहिया जन्म लेलक / आ कहिया बनल ई सृष्‍टि?

ईश्वरे ई जनैत छथि / आ शायद ओहो नहि जनैछ!

१.आ. अनुवाद-कौशलक विश्लेषण

ऋग्वेद मूलक 'नासदासीन्नो सदासीत्तदानीम्' (न सत् आसीत् न असत् आसीत्) -'तखन ने होइत छल ने नहि होइत छल'- यएह सृष्टि-पूर्व-अवस्थाक नेति (नकारात्मक नै) वर्णन कापड़िक अनुवादमे बदलि गेल 'केओ नहि तखन छल / नहि निर्जीवो।' ई छोट-छोट, खण्डित पंक्ति- अनुवादक नहि, पुनर्सृजनक लक्षण थिक।

 

मूल संस्कृतक 'आनीदवातम् स्वधया तद् एकम्' (वायुहीनतामे ओएह एक साँस लैत छल)- कापड़ि लिखै छथि 'सांस लैत छल वायुहीनतामे।' ई एक पंक्ति मैथिलीक गहनतम विरोधाभास-काव्य (Oxymoron poetry) थिक। वायुहीनतामे साँस- यएह विरोधाभास सृष्टि-पूर्वक अकथनीयताकेँ व्यक्त करैछ।

१.इ. रस-विश्लेषण

भरत मुनिक नवरसमे 'अद्भुत' रस - जे आश्चर्यक भावसँ उत्पन्न होइछ - एहि कवितामे सर्वत्र व्याप्त अछि। 'सर्जनक सर्वप्रथम बीज छल'- यएह उक्ति अद्भुतरसक चरमोत्कर्ष थिक। परन्तु अन्तिम पंक्ति -'ईश्वरे ई जनैत छथि / आ शायद ओहो नहि जनैछ!' - अद्भुत रसकेँ 'करुण'मे बदलि दैछ - अज्ञानक करुणा।

१.ई. नव्य-न्यायिक दृष्टि

गंगेश उपाध्यायक 'प्रमाण-सीमा' (Epistemological Limit) सिद्धान्तक अनुसार -प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान, शब्द -ई चारू प्रमाण सृष्टि-पूर्वक ज्ञान देबएमे असमर्थ अछि। 'के जनैत अछि निश्चित रुपस'?' - ऐ प्रश्नमे नव्य-न्यायक 'ज्ञान-सीमा' (Cognition Limit) स्वयं कापड़िक अनुवादक माध्यमसँ ध्वनित होइछ।

१.उ. ध्वनि-विश्लेषण

आनन्दवर्धनक ध्वनि-सिद्धान्तक अनुसार, एहि कवितामे तीन ध्वनि-स्तर अछि: (अ) शाब्दिक -सृष्टि-पूर्वक भौतिक वर्णन। (आ) रूपकात्मक- मानव-अज्ञानताक चित्रण। (इ) दार्शनिक व्यञ्जना -'ईश्वरो नहि जनैछ' -यएह अज्ञेयवादक (Agnosticism) गहनतम ध्वनि थिक। मैथिली साहित्यमे ऐ स्तरक दार्शनिक-काव्य अत्यन्त दुर्लभ अछि।

१.ऊ. विदेह फ्रेमवर्क

मैथिली कवितामे वैदिक दर्शनक ई साहसी अनुवाद-परम्परा दुर्लभ अछि।  विद्यापतिक बाद -जे संस्कृत आ अवहट्ठक बीच सेतु बनेलथि - कापड़ि ऋग्वेदक सर्वाधिक रहस्यमय सूक्तकेँ मैथिलीमे उतारि एक नव परम्पराक आरम्भ करै छथि। ई विदेह समानान्तर इतिहासक महत्त्वपूर्ण अध्याय थिक।

२. मौलिक दोहा/मुक्तक

२.अ. राजनीतिक दोहा

घंटी बाजल, राजनीति टनमन भेल। बहुते दलके देखू जीबिते मइर गेल।।

दोहा कापड़िक राजनीतिक व्यंग्यक सर्वश्रेष्ठ काव्य-अभिव्यक्ति थिक। दुइ पंक्तिमे एक पूर्ण व्यंग्य-चित्र।

'घंटी बाजल' -चुनाव-घंटी। 'राजनीति टनमन भेल' - नव उत्साह। 'जीबिते मइर गेल' - राजनीतिक दलक नैतिक मृत्यु। ई तीन क्रम मात्र दुइ पंक्तिमे - इएह दोहाक क्षमता थिक।

कुन्तकक वक्रोक्ति -'जीबिते मइर गेल' -जीवितावस्थामे मृत्यु - यएह विरोधाभास (Paradox) राजनीतिक नैतिकताक पतनकेँ एक चित्रमे बन्द करैछ। नेपालक राजनीतिक वास्तविकता - जतए दल चुनावमे हारल तखन नहि, आत्मा मरलापर 'जीबिते मइर' गेल -ई आधुनिक मैथिली दोहाक श्रेष्ठ उदाहरण थिक।

२.आ. लोकोक्ति-मुक्तक

भरि गाम ओझा चलब केकर सोझा!  ई दुइ-पंक्तिक लोकोक्ति-मुक्तक शहीद-दिवसक सन्दर्भमे कहल गेल अछि। 'भरि गाम ओझा' - गाममे सभ अपनाकेँ विशेषज्ञ मानैछ। 'चलब केकर सोझा' -तखन मार्गदर्शन कत्तऽ सँ?

कापड़ि एहि लोकोक्तिकेँ आन्दोलन-विमर्शमे प्रयोग करै छथि। नेपालमे अनगिन शहीद्-सभ 'आन्दोलन'क नेतागण- परन्तु वास्तविक नेतृत्व-शून्यता। ई उपमा-प्रयोग (Metaphorical Application) काव्यिक-राजनीतिक विमर्शक उदाहरण थिक।

भरतक नाट्यशास्त्रक 'हास्य रस' - परन्तु उपर-हास्य, भीतर करुण -इएह मिश्रण 'भरि गाम ओझा'क रसनिष्पत्ति थिक।

२.इ. माय-मुक्तक

मायसन माय नै। मायसन केउ नै।

मात्र छह-सात शब्दमे -'माय' (माँ) शब्दक अनन्त महिमा। ई लघुतम काव्य - परन्तु भावक सघनता सर्वाधिक। 'मायसन माय नै' - तुलनाक अनुपस्थिति (Absolute Uniqueness) - माँसँ बड़ कोनो माय नहि।

करुण-रसक आधार - वात्सल्यक चरम। भरत मुनिक 'वात्सल्य स्थायी भाव' - जे भारतीय काव्यशास्त्रमे 'करुण' अन्तर्गत आबैछ - ई दुइ पंक्तिमे घनीभूत अछि। ई मातृ-दिवसक अवसरपर कहल गेल - परन्तु ओहिसँ परे, कालातीत सत्य थिक।

२.ई. जन्मदिन-श्लोक

आई छठि के पारण दियावाती (लक्ष्मीपूजा) मे माई के जनमदिन छठि परमेश्वरी के पारण मे बाउ के जनमदिन दुन्नूके नामो जन्मदिने अनुरूप, लक्ष्मीपूजामे भेने लक्ष्मी आ छठि पारणमे भेने परमेश्वर

पुत्र (कुमार भास्कर) द्वारा पिता-माताकेँ जन्मदिन-श्रद्धा। ई रचना कापड़िकृत नहि, बरु हुनकर पुत्रकृत। एहि प्रसंगमे एक महत्त्वपूर्ण काव्यात्मक तथ्य अछि: लक्ष्मी (माँ) आ परमेश्वर (पिता) -नामानुसार पावनि - लक्ष्मीपूजापर माँक जन्म, छठि-पारणपर पिताक जन्म। ई संयोग-काव्य (Coincidence Poetry) मैथिली परम्परामे विशिष्ट थिक।

३. बालगीत -'हमर जनकपुरधाम'[(हमर मैथिली पोथी, तेसर किलास) ] आ 'सीता अवतार' [भुवनेश्वर प्रसाद 'अध्यापक' (मैथिली बाल रामायण)]

३.अ. 'हमर जनकपुरधाम'

लवकुशके मामा गाम / सएह थिक हमर जनकपुरधाम धियासिया आदर्शे कएलनि / पुण्य ई मिथिला भूमिक नाम विदेह जनकक ई राजधानी / जनमौलक अगबे सज्ञानी मधुसन मीठ मैथिली भाषा / बजनिहार मैथिल स्वाभिमानी।

बालगीत 'हमर मैथिली पोथी, तेसर किलास'मे संकलित अछि। कापड़ि एकरा उद्धृत करै छथि - इएह उनकर बालसाहित्य-चेतनाक प्रमाण थिक।

'लवकुश के मामा गाम' -जनकपुरकेँ लव-कुशक ननिहाल (मामाक घर) कहबाक काव्यिक परम्परा मैथिलीमे पुरान अछि। ऐ बालगीतमे ई परम्परा सहज रूपसँ आबैछ।

'मधुसन मीठ मैथिली भाषा' - ई उपमा अद्वितीय थिक। मधु (मध) सन मीठ- स्वरक माधुर्यकेँ खाद्य माधुर्यसँ तुलना- ई संवेदना-तन्त्रक अन्तर-विपर्यय (Synaesthesia) थिक।

रस: वीर रस - 'मैथिल स्वाभिमानी' - स्वाभिमानक उद्बोधन बालमनमे वीरत्वक बीज रोपैछ।

३.आ. 'सीता अवतार' (भुवनेश्वर प्रसाद 'अध्यापक', मैथिली बाल रामायण)

सीता लेल कोना अवतार / सुनू कथा अछि बड़ विस्तार जखन कैल निशिचर उतपात / धर्मकर्म सब भेल निपात

मिथिलामे वर्षा नहि भेल / तखन जनक हर हाथहि लेल जखनहि जोतै लगला भूमि / तखनहि भेल प्रगट धतिभूमि

गुंजित भेल गगनस' वाणी - जगदम्बा अवतार लेलनि दनुज बढ़ल धरतीपर -हरती भूमिक भार धरती माता नृपति जनककें देलनि नव उपहार कष्ट शोक दुखस' जग पाबि सकल उद्धार

कापड़ि एहि बालगीतकेँ उद्धृत करै छथि -आ ई सटीक चयन थिक। 'सीता अवतार' मैथिली बाल-रामायणक एक महत्त्वपूर्ण गीत अछि जे रावणक रक्त-कलशसँ सीताक जन्मक पौराणिक कथाकेँ सरल-सुगम लयमे कहैछ।

'जखनहि जोतै लगला भूमि / तखनहि भेल प्रगट धतिभूमि' -यएह दुइ पंक्ति बालगीतक सर्वोत्तम भाग थिक। 'धतिभूमि' (धरातलसँ प्रकट) -ई मैथिलीक विशिष्ट शब्द-प्रयोग थिक। लय, तुक, आ भाव -तीनू संतुलित अछि।

अन्तिम चतुर्दल (Quatrain) -'गुंजित भेल गगनस' वाणी' -दीर्घ पंक्तिमे भव्यता आबैछ। यएह लयक उत्थान-पतन (Rhythmic variation) बालगीतकेँ एकघेघाहपनसँ बचाबैछ।

४. 'रेङ-रेङ'क गीत-फकड़ा

घेघहा भेम्ह बजनिञा, गिरगिट लोकनिञा कुदका बेङ कहरिया मूसा सजल बरियात हे!

जुग जग हँसौनिञा बाप पगडी खसौनिञा लाढो मुसरी बियाहन बिल्लीमे चलल बरियात हे!

४.अ. फकड़ाक स्वरूप

ई 'रेङ-रेङ' नाटकक गीत-फकड़ा थिक। मैथिलीक 'फकड़ा' परम्परा -लोकगीतक एक विशिष्ट रूप -जाहिमे जानवर-पात्रद्वारा मानव-समाजपर व्यंग्य कएल जाइछ।

४.आ. प्रतीक-विश्लेषण

'घेघहा भेम्ह' (गला फुलाएल) -राजनेताक आत्म-प्रशंसा। 'गिरगिट लोकनिञा' -रंग बदलनिहार राजनीतिज्ञ। 'कुदका बेङ' (छलांग लगाइत बेंग) -अवसरवादी। 'मूसा सजल बरियात' -माउस-बारात -मूसक बारात बिल्ली-घर जाइत! -ई परम्परागत मैथिली 'बिड़बंबनी' (Burlesque) थिक।

'बाप पगडी खसौनिञा' -पिताक प्रतिष्ठाकेँ नष्ट करनिहार। 'लाढो मुसरी बियाहन' -उच्छृंखल विवाह-बंधन। 'बिल्लीमे चलल बरियात' -बिल्लीक दरवाजेपर बारात -हास्य-रसक चरम।

४.इ. लोकनाट्य-परम्परासँ सम्बन्ध

मैथिली लोकनाटकमे 'नटुआ' परम्परा -जाहिमे जानवर-मुखोटा पहीरि समाज-व्यंग्य कएल जाइछ -एहि फकड़ाक जड़ि ओहिसँ जुड़ल अछि। कापड़ि एहि प्राचीन परम्पराकेँ आधुनिक राजनीतिक थिएटरक सन्दर्भमे जीवन्त करै छथि।

५. धीरेन्द्र प्रेमर्षिक हिन्दी गजल -कापड़िक पाठकीय समीक्षासँ

५.अ. गजलक पाठ

कि धीरज पाल रे बन्धु / जुरुरत टाल रे बन्धु खुशी हैं गमका साथी / समय को चाल रे बन्धु

हैं जो भी दिया खुदाका / उसे संभाल रे बन्धु रखा हैं क्या रंजिश में / जहन से निकाल रे बन्धु

बेखुदी की खुद में ही / खुदी खंगाल रे बन्धु डूबके प्रेम में हो जा / तू माला माल रे बन्धु

हैं गर 'प्रेमर्षि' बनना / जिगर रख लाल रे बन्धु

५.आ. कापड़िक समीक्षा-दृष्टि -स्वयं एक काव्यात्मक गद्य

कापड़ि एहि गजलकेँ पढ़िकऽ जे 'पाठकीय उहापोह' लिखलनि -जे स्वयं एक काव्यात्मक गद्य थिक। हुनकर पहिल प्रतिक्रिया -'तेसर पंक्तिपर पग दैते, मोह भंगसँ मन खटा गेल जे आहि रे वा, ई त' हिन्दी गजल अछि' -ई एक मैथिली-प्रेमीक स्वाभाविक प्रतिक्रिया थिक।

परन्तु तत्पश्चात् कापड़ि अपन संकीर्णता स्वीकार करि, गजलकेँ वस्तुनिष्ठ दृष्टिसँ देखै छथि: 'हिनक रचनाक भाषा-साहित्यक सौष्ठवके समग्रताके निरेखने अवधारने, मान' पड़त जे एहि रचनाके माध्यमसँ हिनक भाषिक रवानी गजलक रचनागत विन्यास बेछप आ सरस अछि।' ई आत्म-सुधार (Self-correction) कापड़िकेँ एक ईमानदार समीक्षक साबित करैछ।

५.इ. गजलक काव्यगत विश्लेषण

'खुशी हैं गमका साथी' -यएह शेर (couplet) सूफी परम्पराक 'फना' (आत्म-विलोपन) दर्शनसँ जुड़ल अछि। खुशी आ गम -विरोधी -परन्तु साथी -ई विरोधाभास-सौन्दर्य (Paradoxical aesthetics) उर्दू गजलक मूल आत्मा थिक।

'बेखुदी की खुद में ही / खुदी खंगाल' -'बेखुदी' (Self-loss) मे 'खुदी' (Self) ढूंढ़ब -ई सूफी आत्म-साक्षात्कारक पद्धति थिक। मीरा, कबीर, रहीमक परम्परा -जाहिमे कापड़ि प्रेमर्षिकेँ राखि देलखिन -उचित थिक।

कापड़िक तुलनात्मक टिप्पणी -'हिनकामे बहुते मीरा, तुलसीदास, आ सूरदासक निर्मल मनक युगसंचेतना देखाइ दैत अछि' -ई मैथिली आलोचनाक उत्कृष्ट उदाहरण थिक।

६. डा राजेन्द्र विमलक मैथिली गजल -कापड़िक विस्तृत समीक्षा

६.अ. गजल-१: क्रान्तिक आह्वान

जोड़ि बाँहि बाँहस', जोरस' आवाज दियौ रोटी चोरओने अछि, पेट ओकर फाड़ि लिय।

बहिरा करैत अछि, डँसैत रहत, पुजू नहि घेंटे छपटि दियौ, हाथमे तरुआरि लिय।

हमर खून जे पीलक, कए देबै खून तकर अपन खून-खूनमे, धधरा पसारि लिय।

रावण-बध धर्म थिक, जरत पापके लंका डंका से पीटि-पीटि, धर्म-ध्वजा गाड़ि लिय।

शब्दक हुक्कालोली, भजिते हम रहब विमल चेतनाक दीपावली, सजा आ' सिङारि लिय।

समीक्षा

कापड़ि एहि गजलकेँ 'बहुत आक्रमक तथा विष्फोटक' कहै छथि -ई सटीक वर्णन थिक। 'घेंटे छपटि दियौ, हाथमे तरुआरि लिय' -ई रौद्र-रसक चरमोत्कर्ष थिक। भरत मुनिक रौद्र-रस -'क्रोध' स्थायी भाव -एहि शेरमे प्रचण्ड रूपसँ उपस्थित अछि।

 

'रोटी चोरओने अछि' -शोषण-विमर्श। 'पेट ओकर फाड़ि लिय' -रूपकात्मक प्रतिशोध -शाब्दिक हिंसा नहि, काव्यिक न्याय-माँग। वक्रोक्ति-दृष्टि: 'धर्म-ध्वजा गाड़ि लिय' -प्रतिरोधकेँ धर्म-युद्ध (Dharmic war) कहब -यएह वक्र-प्रतीकतन्त्र थिक।

६.आ. गजल-२: 'मार सार दोगलाके' -व्यंग्य-गजल

ठाँय ठाँय गोली, मार सार दोगलाके दैत छौक बोली, मार सार दोगलाके।

चास-बास, बेटी-पुतहुधरि ने छोड़तउ ओढ़ने छौ खोली, मार सार दोगलाके।

पुरखा-दर-पुरखा, बस घेंट रेतलकौ छौ घेंटकट्टा-टोली, मार सार दोगलाके।

ऐ गजलमे 'मार सार दोगलाके' -पाँचोपर एकहि रदीफ (Refrain) -यएह रिपीटिशन तकनीक रौद्र-रसकेँ प्रचण्ड करैछ। 'चास-बास, बेटी-पुतहुधरि' -अर्थात् जीवनक सभ कुछ -सर्वग्रासी शोषण। 'घेंटकट्टा-टोली' -गला काटनिहारक दल -ई मैथिलीक विशिष्ट गारि-शब्द जे काव्यमे प्रयुक्त होइछ -साहसिक भाषाई प्रयोग थिक।

६.इ. गजल-३: 'छै कोन लोकक बस्ती'

छै कोन लोकक बस्ती, सभ लोक एतए घायल छै छै खोपरीपर ताला, आ जीभ सभक काटल छै।

लटकि चलै लोक एतए, हेँज बान्हि सूलीपर छै कोन शहर, जतए लोक स्वेच्छास' टाँगल छै।

बदलै छै संविधान रोज, वेश्याक नया लहङासन नूआ हमर मतारिके, एखनो धरि फाटल छै।

ई गजल विमलक सर्वश्रेष्ठ थिक। 'बस्ती जतए सभ घायल' -ई उद्घाटन-शेर (Mataala) अद्भुत थिक। 'खोपरीपर ताला, जीभ काटल'- मानसिक-वाचिक दासताक रूपक। 'लटकि चलै हेँज बान्हि सूलीपर' -यएह सूली-उपमा (Crucifixion metaphor) आधुनिक मैथिली गजलमे नव थिक।

'संविधान बदलै रोज, वेश्याक नया लहङासन' -'वेश्या-संविधान' उपमा -अत्यन्त विवादास्पद, परन्तु काव्यिकतः अत्यन्त प्रभावशाली। 'नूआ हमर मतारिके एखनो धरि फाटल' -गरीबीक यएह व्यक्तिगत-सार्वजनिक बिम्ब (Personal-Universal image) विमलकेँ महान बनाबैछ।

६.ई. गजल-४: 'तखने दीवाली थिक'

जगमग ई सृष्टि करए, तखने दीवाली थिक चेतनाक दीप बरए, तखने दीवाली थिक।

जीर्ण आ पुरातनकें, हुक्कालोली बनाउ पलपल नव दीप जरए, तखने दीवाली थिक।

तमिस्राकेर सूत्रधार! सावधान! सावधान! राकेट बम उड़ि लड़ए, तखने दीवाली थिक।

ऐ गजलमे 'तखने दीवाली थिक' -रदीफ -प्रत्येक शेरमे दीवाली-उत्सवकेँ एक नव शर्तसँ जोड़ैछ। 'चेतनाक दीप' -बौद्धिक जागरण। 'हुक्कालोली' -लोकभाषाक ई शब्द (खुलेआम उपहास) गजलमे दुर्लभ थिक -लोकभाषा आ उर्दू-गजल परम्पराक मेल।

'राकेट बम उड़ि लड़ए, तखने दीवाली थिक' -दीवालीक आनन्द-पर्वमे बम-विस्फोटक प्रतीक -ई रचनाक सबसँ वक्र उक्ति थिक। 'अन्धकारक सूत्रधार' कें सावधान करब -क्रान्तिकारी चेतनाक काव्यिक उद्बोधन।

६.उ. गजल-५: 'इनकिलाब गगनमे'

इनकिलाब गगनमे के लीखि टङै छै सोनितसँ धरती-आसमान रङै छै।

हमर चान-ताराकेर कविताकेर खून कए के जीवनमे नफरतकेर ग्रन्थ तगै छै?

भूखलसँ नीक मरय गोली खा लोक इएह सत्य बूझि ओ मृत्यु चुगै छै।

'इनकिलाब गगनमे के लीखि टङै छै' -ई उद्घाटन-शेर मैथिली गजलक इतिहासमे स्मरणीय थिक। 'सोनितसँ धरती-आसमान रङै छै' -खूनसँ आकाश-धरती रंगाएल -ई बिम्ब क्रान्ति-काव्यक उत्कर्ष थिक।

'कविताक खून' -कविताकेँ जीवित प्राणी मानिकऽ हुनकर हत्याक आरोप -ई Personification आधुनिक मैथिली कवितामे विरल थिक। 'भूखलसँ नीक मरय गोली खा' -यएह निर्दयी यथार्थवाद (Brutal realism) -जे जीवनक गरीबी-त्रासदीकेँ बिना अलंकारक कहैछ -महान काव्य-उक्ति थिक।

परमेश्वर कापड़ि जकड़ा गजल संग्रह ['सूर्यास्तसॅ पहिने' '- राजेन्द्र विमल] कहि रहल छथि से अछि गीत संग्रह। दोहा, कुण्डलिया, रोला सन गजल सेहो विधा थिक जे नहिये राजेन्द्र विमल सीखि सकलाह नहिये धीरेन्द्र प्रेमर्षि। आब देखू ई तथाकथित बाल गजल राजेन्द्र विमलक संग्रहसँ:

अओ हजूर

खाउ खजूर

अपने मालिक

हम मजदूर

सत्ताक दारू

चूरमचूर

हमरे नोकर

हमहीं दूर

हमरा दगैए

हमरे घूर

पाॅच बरखधरि

कानमे तूर

अबै छौ फेरो

पकडिक' थूर

गरीबक मन नइ

होएतै पूर

पोंपों गडीमे

करियौ टूर

भोंटक बक्सा

' देत भूर

अओ नेताजी

आएब जरूर

एमरी धासब

लाठीक हूर

आ रे कौआ

आ रे कौआ आ'- '- '

उडि उडि आ, दौड दौडि आ

आ रे चिडैया उडि -उडि आ

हमरा बौआके नाचि क देखा

आ रे सुगा आ'- ' - '

आ रे मैना आ'- ' - '

सुगा मैना उडि - उडि आ

आम लताम खोधि खसा

मैना आएल सिलोरिया

सुगा आएल हरियरिया

जामुन गिरएलक करिया

बौआ बिछलक झोरिया

बौआ पोती

हम्मर ई बौआ पोती

हरख आनन्दक ज्योती

खाएत परौठा रोटी

देत ने केकरो खोंटी

देख'मे बड छोटी

बात बाजत पकठोसी

चट खेलत पट कानत

हॅसत त' हीरा - मोती

डिजिटल गेम खेल खेलौना

'टच' 'क्लीक' के गोटी

ई एकटा नीक बालगीत भऽ सकैए बाल गजल नै।

७. संस्कृत श्लोकक मैथिली भावानुवाद

७.अ. गीताक श्लोक -'पिता हमस्य जगतो' (रचना-क्र. ८६)

पिता हमस्य जगतो माता धाता पितामहः। वेद्यं पवित्र ओंकार ऋक्सामयजुरेव ॐ।।

मैथिली भावानुवाद: 'हमही सम्पूर्ण जगतके धाता अर्थात् धारण-पोषण कएनिहार एवं कर्म सबके फल देनिहार तथा पिता, माता आ पितामह छी आ जानबायोग्य पवित्र ओंकार तथा ऋग्वेद, सामवेद, यजुर्वेद हमहीं छी!'

कापड़िक अनुवाद-पद्धति: संस्कृतक संक्षिप्तता -एक श्लोकमे विश्वव्यापी सत्य -मैथिलीमे विस्तारपूर्वक व्याख्यात। 'धारण-पोषण कएनिहार' -'धाता'क अनुवाद -'धाता' शब्दक तीन-स्तरीय अर्थ (Dhata = Creator + Sustainer + Karma-giver) कापड़ि सभकेँ समाहित करै छथि।

७.आ. सीता-स्तोत्र -'त्वं विद्या परमात्रैलोक्य जननी'

त्वं विद्या परमात्रैलोक्य जननी स्वर्गापवर्ग दायिनी। त्रैलोक्या कर्षणी देवी सीता देवी नमस्तुते।।

मैथिली भावानुवाद: 'अहाँ परम तथा तीनू लोकक माता परम विद्या छी। अहीं स्वर्ग तथा अन्य विशिष्ट लोक प्रदायिनी छी। अहीं तीनू लोकके आकर्षणके केन्द्र छी। हे सीते अहांके प्रणाम अछि!'

'त्वं विद्या' -'अहाँ... परम विद्या' -संस्कृतक तात्कालिक पहचान-उक्ति मैथिलीमे विस्तृत। 'त्रैलोक्या कर्षणी' -'तीनू लोककेँ आकर्षित करनिहारी' -'कर्षणी' शब्द चुम्बकीय शक्तिक अर्थमे -कापड़ि एहि जटिल शब्दकेँ सरल मैथिलीमे 'आकर्षणके केन्द्र' कहिकऽ सुलभ बनबै छथि।

७.इ. नारद-वचन -श्लोकक भावानुवाद

धर्माधर्म विवेकेन वेदमार्गानुसारिणी। सर्वलोकहितासक्ता: साधव: परिकीर्तिता:।। -नारद, १६(२९-३१)

मैथिली भावानुवाद: 'जे आदमी धर्म आ अधर्मके विवेक क', वेदोक्त मार्गपर चलैछ, हुनका साधु कहल जाइछ।'

ई भावानुवाद कापड़िक अनुवाद-सिद्धान्तकेँ स्पष्ट करैछ -ओ शब्द-प्रति-शब्द अनुवाद नहि करैछ। 'सर्वलोकहितासक्ता' -'सभ लोककेँ हित चाहनिहार' -ऐ एक पदक विस्तार कापड़ि तत्काल नहि करै छथि, कारण अनुवादक लक्ष्य -मैथिली पाठककेँ 'साधु' शब्दक परिभाषा बुझेनाइ -पूरा भ' जाइछ।

७.ई. गंगासागर-स्तोत्र (पुराण)

गङ्गाद्य: सरित: सर्वाधिक स्त्रिषु लोकेषु विश्रुता। ता सर्वा अनपायिन्यो गङ्गसागर मण्डलले।।

मैथिली भावानुवाद: 'हे पार्वती! त्रिभुवनमे विख्यात गंगादिक जतेक महापवित्र नदी सब अछि ओ सब श्री मिथिलाके गंगासागर सरोवरमे निरन्तर निवास करैत अछि!'

ऐ श्लोकक उद्धरण कापड़ि जनकपुरक गंगासागर सरोवरक पौराणिक महत्त्वकेँ प्रतिपादित करैबाक लेल करै छथि। 'अनपायिन्यो' (निरन्तर बहैत) -कापड़ि 'निरन्तर निवास करैत' अनुवाद करै छथि -'निवास' आ 'बहब'क बीच अर्थ-विस्तार आश्चर्यजनक थिक। नदी बहैत नहि, निवास करैछ -ई अनुवाद-सृजन थिक।

८. सुरेश पण्डितक हनुमान चालीसा  आ 'दाम'- कथा-काव्य (साक्षी) [परमेश्वर कापड़ि द्वारा प्रस्तुत](विस्तृत पद्य-विश्लेषण)

'दाम' (साक्षी, अर्पण: विद्यापति सेवा संस्थान, २०१२) -मात्रावृत्त कथा-काव्य -पहिनेसँ समग्र कथाक रूपमे विश्लेषित भेल अछि। एत' केवल पद्य-शिल्पक दृष्टिसँ किछु महत्त्वपूर्ण पंक्ति:

छला एक लम्वोदर बाबू, पेट हुनक छल खत्ते। काजक नाम मारथि न माछी, हुरथि भरि थार तुरते।।

'खत्ते' (खाली/भूखल) + 'तुरते' (तुरन्त) -तुकबन्दी सटीक। 'काजक नाम मारथि न माछी' -हास्य मुहावरा जे 'कोनो काज नहि करब'क लेल प्रयुक्त।

मुदा, एक दिन भेटलनि जखने, भेल राजाक फरमान। साजल गेल संग्राम-साज, हरु अरिदलक प्राण।।

'साजल गेल संग्राम-साज' -स-पंक्ति अनुप्रास (Alliteration: स, ज, ज, ज) - छन्द-चेतनाक प्रमाण।

वैह रोटी देखौलक खेल, हरलक बघबाक जान। गलै प्राण अपटी सहजे, तें लम्वोदर महान।।

अन्तिम पंक्ति -'तेँ लम्वोदर महान' -व्यंग्यात्मक महानता-स्थापना। इएह विडम्बना (Irony) कापड़िक हास्य-व्यंग्यक शैली थिक। : 'दाम' दीर्घ काव्य अछि परन्तु कथात्मक प्रधान अछि।

तहिना सुरेश पण्डितक हनुमान चालीसापर परमेश्वर कापड़ि कहै छथि: “उछनरहा उपदरिया बच्चा त’ होइते अछि, ओकर बालसाहित्यमे सेहो बहुते हंसी–मजाक कोनो कम नै छै आ सुरेश पण्डितक हनुमान चालीसा ओना छै त’ कने बेसी पुरान तैयो अपूर्व आ रोचक अछि।“ सुरेश पण्डितक हनुमान चालीसाक प्रारम्भिक पंक्ति:

जय हनुमान ज्ञान गुण सागर ।

मम्मी हंसए, कानए फादर ।।

 

९. समग्र मूल्यांकन -कापड़िक कवि-व्यक्तित्व

९.अ. शक्ति

(क) दार्शनिक गहराई: ऋग्वेद अनुवादमे -मैथिली काव्यमे अपूर्व। अज्ञेयवादक काव्यिक अभिव्यक्ति।

(ख) लोक-काव्य-परम्पराक जीवन्त उपयोग: फकड़ा, लोकोक्ति-मुक्तक - मैथिलीक जड़िसँ जुड़ल।

(ग) अनुवाद-सृजन: संस्कृत श्लोकक मैथिली भावानुवादमे हुनकर 'रचनात्मक स्वतन्त्रता' -जे अनुवादकेँ पुनर्सृजन बनाबैछ।

(घ) समीक्षक-कवि: प्रेमर्षिक आजाद हिन्दी गजलपर हुनकर टिप्पणी/ राजेन्द्र विमलक गीत संग्रह (गजल संग्रह कहि कऽ प्रकाशित) पर टिप्पणी स्वयं एक काव्यात्मक गद्य थिक।

(ङ) राजनीतिक व्यंग्य-काव्य: 'घंटी बाजल' दोहा -आधुनिक मैथिली दोहाक उत्कृष्ट नमूना।

९.आ. सीमा

(क) स्वयंकृत पद्य अत्यन्त अल्प: अधिकांश पद्य अन्य कविक- विमल, प्रेमर्षि, 'अध्यापक'- जकर समीक्षा कापड़ि करै छथि।

(ख) दीर्घ मौलिक कविताक अभाव।

(ग) बिम्ब-विधान: कापड़िक बिम्ब (imagery) लोककथा-परम्पराक बिम्ब थिक -भव्य आधुनिक बिम्ब-सृजनक अभाव।

९.इ. विदेह समानान्तर इतिहासमे स्थान

परमेश्वर कापड़ि प्राथमिक रूपे कथाकार आ नाटककार, द्वितीयतः समीक्षक-कवि। तथापि हुनकर ऋग्वेद-अनुवाद ('तत्ववोध'), राजनीतिक दोहा, आ 'रेङ-रेङ'क फकड़ा - मैथिली पद्य-इतिहासमे हुनकर उल्लेखनीय योगदान थिक। विदेह समानान्तर इतिहास -'What the Canon Left Out' - एहि कवि-आलोचक-अनुवादककेँ समुचित मान दैछ।

 

[सैद्धांतिक विवेचन लेल देखू- मैथिली समीक्षाशास्त्र- गजेन्द्र ठाकुर]

 

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