VIDEHA ISSN 2229-547X  ·  First Maithili Fortnightly eJournal  ·  Since 2000  ·  www.videha.co.in
विदेह — प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका
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विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका

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प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका — First Maithili Fortnightly eJournal

विदेह नूतन अंक
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मोहन कुमार झा
बीहनिकथा १०० शब्दमे किएक?


मैथिली साहित्यक एकटा विशिष्ट विधा बीहनिकथा एकरा बीज कथाक नामसँ सेहो जानल जाइत अछि , एहिमे एकटा छोट सन कथ्यक बीया पारल जाइत अछि , जे पाठकक मोन मे उपजल विवेक, संवेदना आओर कल्पनासँ स्वतः पूर्ण कथामे गढ़ि लैत छथि , ई ने कोनो ठेठ लघुकथा थिक आ ने अति-लघुकथा ई एकटा मुक्त, आ अत्यंत संक्षिप्त रचना अछि, जे प्रायः १०० शब्द धरि सीमित रहैत अछि , सवाल उठैत अछि अधिकतम १०० शब्द किएक?

ई मनमाना सीमा अछि वा साहित्यिक आवश्यकता ?

गहन विचार केलापर निष्कर्ष पहुँचलहुँ अछि जे ई सीमा कोनो व्यक्ति विशेषक मनमानी नहिं, अपितु कलाके गहींरगर पाठकके सक्रियता, आ आधुनिक समय के मांगक प्रतिबिंब अछि !

संक्षिप्तता एकटा प्राचीन साहित्यिक परंपरा रहल अछि, संस्कृत सूत्र साहित्य, जापानी हाइकु, या अंग्रेजी फ्लैश फिक्शन एहि सिद्धांत पर आधारित अछि , बीहनिकथा एहि परंपराक आधुनिक मैथिली अभिव्यक्ति थिक , १०० शब्दक सीमा रचनाकेँ अनुशासित करैत अछि!

लेखककेँ अनावश्यक शब्द, विस्तार, आ अलंकरणसँ बचबाक चाही , प्रत्येक शब्द सार्थक, स्तरित, आ सुझाव देबयवला हेबाक चाही , एहिसँ भाषाक स्तर मजगूत हेतैक , जेना बियामे पूरा गाछक सम्भावना होइत छैक तहिना बीहनिकथाक सार, द्वंद्व, चरित्र, आ निष्कर्ष १०० शब्द मे समाहित छैक , पाठक बियाके पोसैत छथि आ अपन कल्पनासँ कथाके पूरा करैत छथि ई निष्क्रिय पठन स बेसी सक्रिय सह-सृष्टि अछि !

दीर्घ कथा लेखक व्याख्या थोपैत छथि, जखन कि बीहनिकथा मे लेखक मात्र बिया पारित छथि , पाठकक मन, अनुभव, स्मृति, आ संवेदना कथाकेँ आकार दैत अछि , एकहि बीहनिकथा फराक-फराक पाठक लेल फराक-फराक अर्थ ल' सकैत अछि , ई बहुसंयोजकता साहित्यके समृद्ध करैत अछि, मुदा जँ १०० शब्दसँ बेसी भ' जाइत अछि त' ई गुण खतम भ' जाइत , विस्तार सँ लेखकक छाह बढ़ैत छैक आ पाठकक स्वतंत्रता कम होइत छैक, तेँ सीमा अनिवार्य अछि !

आजुक पाठक व्यस्त छथि। सोशल मीडिया, छोट-छोट स्क्रीन स्क्रोल, आ तत्काल जानकारी के युगमे लोकके नम्हर उपन्यास पढ़य के समय नहिं भेटैत छनि , बीहनिकथा एहि युगक साहित्यिक प्रतिक्रिया अछि , पूरा कहानी १०० शब्द में पढ़ल जा सकैत अछि-एक कप चाह, छोट-छोट बस के यात्रा पर, या मोबाइल फोन के स्क्रॉल करैत काल अपितु एकर गहींर छाप छोड़ैत अछि !

एहिसँ साहित्य लोकतांत्रिक भ' जाइत अछि; साधारण लोक सेहो साहित्यक उपभोग आ सृजन क' सकैत अछि दिल्ली सन महानगरमे रहय वाला मैथिली प्रेमी सेहो अपन व्यस्तता के बीच एहि विधा के अपनाबैत छथि कियाक त ई हुनकर समय के मांग के पूरा करैत अछि !

मैथिली सन क्षेत्रीय भाषा मे शब्द भाषाक मिठास आ शक्ति केँ कायम रखैत अछि, अनावश्यक विस्तार भाषाकेँ खिचड़ी बना दैत अछि , १०० शब्दक सीमा लेखक केँ सबसँ सटीक, मधुर, आ प्रभावशाली शब्द चुनबा लेल बाध्य करैत अछि, जाहि सँ मैथिलीक मौलिकता सुरक्षित रहैत अछि !

बीहनिकथा ठीक १०० शब्द मे लिखबाक चाही कारण एहि सीमा सँ रचना केँ बिया सन रूप भेटैत छैक , ई लेखक के अनुशासित करै छै, हर शब्द के सार्थक बनबै छै, आओर पाठकके सक्रिय सह-निर्माता बनै में सक्षम करै छै। आधुनिक व्यस्त जीवन मे त्वरित पठनीयता सुनिश्चित करैत अछि ,अनेक व्याख्या, आओर गहींर प्रभावशाली विचारक जन्म दैत अछि , अधिक शब्द विस्तार कमजोरी दिस ल' जाइत अछि, जखन कि ई सीमा साहित्य के सशक्त आ संक्षिप्त रखैत अछि , बीहनिकथाक सार ओकर संक्षिप्तता मे निहित अछि-जहिना छोट-छोट बीया मे नुकायल विशाल गाछ!

अंत मे एकटा बीहनिकथा मात्र १०० शब्द मे लिखल जेबाक चाही कारण संक्षिप्तता एकर ताकत होइत छैक , पाठक के सोचय लेल बाध्य करैत अछि, भाषा के परिष्कृत करैत अछि, आ समयके मांग के पूरा करैत अछि ई विधा साबित करैत अछि जे कममे बेसी कहल जा सकैत अछि ! साहित्यक असली परीक्षा ओकर प्रभाव होइत छैक, ओकर विस्तार नहि ,बीहनिकथा परीक्षा पास करैत अछि !

-मोहन कुमार झा, बेहट, झंझारपुर। कोहट एनक्लेव, दिल्ली

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