
मोहन कुमार झा
बीहनिकथा १०० शब्दमे किएक?
मैथिली साहित्यक एकटा विशिष्ट विधा बीहनिकथा एकरा बीज कथाक नामसँ सेहो जानल
जाइत अछि , एहिमे एकटा छोट सन कथ्यक बीया पारल जाइत अछि , जे पाठकक मोन मे
उपजल विवेक, संवेदना आओर कल्पनासँ स्वतः पूर्ण कथामे गढ़ि लैत छथि , ई ने
कोनो ठेठ लघुकथा थिक आ ने अति-लघुकथा ई एकटा मुक्त, आ अत्यंत संक्षिप्त
रचना अछि, जे प्रायः १०० शब्द धरि सीमित रहैत अछि , सवाल उठैत अछि अधिकतम
१०० शब्द किएक?
ई मनमाना सीमा अछि वा साहित्यिक आवश्यकता ?
गहन विचार केलापर निष्कर्ष पहुँचलहुँ अछि जे ई सीमा कोनो व्यक्ति विशेषक
मनमानी नहिं, अपितु कलाके गहींरगर पाठकके सक्रियता, आ आधुनिक समय के मांगक
प्रतिबिंब अछि !
संक्षिप्तता एकटा प्राचीन साहित्यिक परंपरा रहल अछि, संस्कृत सूत्र
साहित्य, जापानी हाइकु, या अंग्रेजी फ्लैश फिक्शन एहि सिद्धांत पर आधारित
अछि , बीहनिकथा एहि परंपराक आधुनिक मैथिली अभिव्यक्ति थिक , १०० शब्दक सीमा
रचनाकेँ अनुशासित करैत अछि!
लेखककेँ अनावश्यक शब्द, विस्तार, आ अलंकरणसँ बचबाक चाही , प्रत्येक शब्द
सार्थक, स्तरित, आ सुझाव देबयवला हेबाक चाही , एहिसँ भाषाक स्तर मजगूत
हेतैक , जेना बियामे पूरा गाछक सम्भावना होइत छैक तहिना बीहनिकथाक सार,
द्वंद्व, चरित्र, आ निष्कर्ष १०० शब्द मे समाहित छैक , पाठक बियाके पोसैत
छथि आ अपन कल्पनासँ कथाके पूरा करैत छथि ई निष्क्रिय पठन स बेसी सक्रिय
सह-सृष्टि अछि !
दीर्घ कथा लेखक व्याख्या थोपैत छथि, जखन कि बीहनिकथा मे लेखक मात्र बिया
पारित छथि , पाठकक मन, अनुभव, स्मृति, आ संवेदना कथाकेँ आकार दैत अछि ,
एकहि बीहनिकथा फराक-फराक पाठक लेल फराक-फराक अर्थ ल' सकैत अछि , ई
बहुसंयोजकता साहित्यके समृद्ध करैत अछि, मुदा जँ १०० शब्दसँ बेसी भ' जाइत
अछि त' ई गुण खतम भ' जाइत , विस्तार सँ लेखकक छाह बढ़ैत छैक आ पाठकक
स्वतंत्रता कम होइत छैक, तेँ सीमा अनिवार्य अछि !
आजुक पाठक व्यस्त छथि। सोशल मीडिया, छोट-छोट स्क्रीन स्क्रोल, आ तत्काल
जानकारी के युगमे लोकके नम्हर उपन्यास पढ़य के समय नहिं भेटैत छनि ,
बीहनिकथा एहि युगक साहित्यिक प्रतिक्रिया अछि , पूरा कहानी १०० शब्द में
पढ़ल जा सकैत अछि-एक कप चाह, छोट-छोट बस के यात्रा पर, या मोबाइल फोन के
स्क्रॉल करैत काल अपितु एकर गहींर छाप छोड़ैत अछि !
एहिसँ साहित्य लोकतांत्रिक भ' जाइत अछि; साधारण लोक सेहो साहित्यक उपभोग आ
सृजन क' सकैत अछि दिल्ली सन महानगरमे रहय वाला मैथिली प्रेमी सेहो अपन
व्यस्तता के बीच एहि विधा के अपनाबैत छथि कियाक त ई हुनकर समय के मांग के
पूरा करैत अछि !
मैथिली सन क्षेत्रीय भाषा मे शब्द भाषाक मिठास आ शक्ति केँ कायम रखैत अछि,
अनावश्यक विस्तार भाषाकेँ खिचड़ी बना दैत अछि , १०० शब्दक सीमा लेखक केँ
सबसँ सटीक, मधुर, आ प्रभावशाली शब्द चुनबा लेल बाध्य करैत अछि, जाहि सँ
मैथिलीक मौलिकता सुरक्षित रहैत अछि !
बीहनिकथा ठीक १०० शब्द मे लिखबाक चाही कारण एहि सीमा सँ रचना केँ बिया सन
रूप भेटैत छैक , ई लेखक के अनुशासित करै छै, हर शब्द के सार्थक बनबै छै,
आओर पाठकके सक्रिय सह-निर्माता बनै में सक्षम करै छै। आधुनिक व्यस्त जीवन
मे त्वरित पठनीयता सुनिश्चित करैत अछि ,अनेक व्याख्या, आओर गहींर
प्रभावशाली विचारक जन्म दैत अछि , अधिक शब्द विस्तार कमजोरी दिस ल' जाइत
अछि, जखन कि ई सीमा साहित्य के सशक्त आ संक्षिप्त रखैत अछि , बीहनिकथाक सार
ओकर संक्षिप्तता मे निहित अछि-जहिना छोट-छोट बीया मे नुकायल विशाल गाछ!
अंत मे एकटा बीहनिकथा मात्र १०० शब्द मे लिखल जेबाक चाही कारण संक्षिप्तता
एकर ताकत होइत छैक , पाठक के सोचय लेल बाध्य करैत अछि, भाषा के परिष्कृत
करैत अछि, आ समयके मांग के पूरा करैत अछि ई विधा साबित करैत अछि जे कममे
बेसी कहल जा सकैत अछि ! साहित्यक असली परीक्षा ओकर प्रभाव होइत छैक, ओकर
विस्तार नहि ,बीहनिकथा परीक्षा पास करैत अछि !
-मोहन कुमार झा, बेहट, झंझारपुर। कोहट एनक्लेव, दिल्ली
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