
लाल देव कामत
पहिल लोक 'उपन्यासक' आलोचनात्मक अध्ययन
स्पष्ट वक्ता पुरुष- लेखक, कथाकार,नाटककार , कवि, गीतकार, अनुवादक रुपमे उपन्यासकार डॉ० गंगेश्वर झा ,जिनक साहित्यिक नाम थीकैन गंगेश गुंजन जी सँ एकबेर झंझारपुरमे भेंटघांट भेल अछि । मधुबनी जिलाक पिलखबाड़ गाममे १५ जुलाई १९४२ ई० केँ हिनक जन्म भेल छन्हि। माय स्व० महालक्ष्मी आ बाबु- स्व० हरिहर झा तथा बाबाके नाऊ नैयायिक पं० चुम्बे झा रमण रहनि। हिनक प्रपितामहक भ्राता ज्योतिर्विद पं० भानु नाथ झा उर्फ भाना झा मैथिली'क प्रसिद्ध कवि आ नाटककार रहथिन। हिनका पिता सँ विरासतमे भेटल रहनि एक वाक् - सदा बाम भाग चलथि। से पढाय- लिखाय हिन्दी आ मैथिली भाषा मेँ एम.ए. धरि कयने छथि। पटना आकाशवाणीमे प्रोड्यूसर पद पर कार्यरत रहि , पटना विश्वविद्यालय सँ मैथिली रेडियो रूपक विषयमे पीएचडी.उपाधि प्राप्त करने छथि। ई हिन्दी क्षेत्रमे अपन लेखन काजके बाट धेयने रहथि। मुदा मातृभाषा मैथिली'क प्रति अगाध प्रेमक चलते ई मैथिली केँ भऽ कऽ रहि गेलाह। मैथिली गद्य आ पद्य दूनू विधामे बहुत कम रचना छन्हि। हिनकामे एक संग अज्ञेय के कलावाद आ मुक्तिबोध के वस्तुवाद देखल गेलैक हेन। हिन्दी आ मैथिलीमे साहित्यक तत्व तथ्य बनैत एक सृजनहार कहल गेल छन्हि। हिनका मादे गद्यकोशमे देवशंकर नवीन जी विस्तार सँ बतेने छथि। ग्राम+पो०- मधेपुर सँ डॉ० ममता कुमारी लिखैय छैन "हिन्दी जगतके अतिरिक्त मैथिली साहित्यक क्षेत्रमे ई वरिष्ठ कथाकार,नाटककार, कवि, उपन्यासकार ओ गीतकारक रूपमे प्रसिद्ध छथि। " हिन्दी केर प्रकाशित पुस्तक 'भोर' २०१७ ई०मे १३ कहानीके संग्रह छपल छैक। मणीपद्म जीके मैथिली पोथी नैका बनिजारा केँ हिन्दी भाषामे अनुवाद 'मिथिलांचल की लोक कथाएं ' छपलनि। हिन्दी लिखैत रहथि तँ १६ चुनल कविमे हिनक स्थान रहनि। मैथिली भाषा मेँ चौबटिया नाटक 'बुधिबधिया'क १९८२ म पोथी छपलनि। दू आरो नाटक क्रमश: आई भोर, नबका सिलेवश छैन। कथा संग्रह :- अन्हार इजोत - १९६४,उचित वक्ता - १९९१ ई० आ सिंन्दुरक दाम - २०११ मे प्रकाशित पोथी छैन। कविता संग्रह पोथी -: दीर्घ काव्य १९६८ मे 'हम एकटा मिथ्या परिचय 'आ सन् १९८० मे लोक सुनू प्रकाशित भेलाक वाद १६ महाकाव्य चारि खंडमे यथा, अपमान बोधि,गीत नहिं मरत, विश्वासघात - एक,आ नव घरक ठेकान पता केर अतिरिक्त १५ गीत छैन -: आब गाम अस्पताल लगैए,करइथ नेतागण भाषण मनुष्याभास ,गंधहीन फूलक मधुमास, गामकेँ प्रणाम, आ दुपहरिया रौदमे खूब प्रशंसित भेलनि। गजल रूपेँ हिनक रचना -: दुखक दुपहरिया - १९९९ म बहरेलनि।
गंगेश गुंजन जी कें एकटा कचोट मोनमे हौरैत-पौरैत रहलनि अछि। साहित्य अकादमी सँ छपल १९८१ ई० म १६४ पृष्ठक मैथिली पोथी 'पहिल लोक' केर लेखक दिससँ पन्नामे ओ लिखने छथि-: " पहिल लोक हमर दोसर उपन्यास 'माहुर वन' मिथिला मिहिर मैथिली सप्ताहिक कार्यालय सँ चोरी भ' गेल ,वा हेराय गेल। मूले पाण्डुलिपि रहय से प्रकाशित नहिं भ' सकल ।" मदनेश्वर मिश्र - तत्कालीन अध्यक्ष, मैथिली अकादमी , श्रीकृष्ण पुरी -पटना १ अपन प्रकाशकीयमे लिखैत छथि - "समकालीन भारतीय साहित्यक सामानांतर नवचिन्तन ओ नव शिल्प प्रस्तुत मैथिली उपन्यास 'पहिल लोक' अछि। गंगेश गुंजनके पोथीमे कुशल चित्रकारक आ महान् चिन्तकक चमत्कार भेटल अछि।नविन दृष्टिकोण ्क अभिव्यक्ति हिनक रचनाक गुण थीक।"
पहिले लोक दीर्घ कथावस्तुक पात्र आ मनोरम मिथिला ्'क दृश्य ऐ ५५ सालमे बहुत किछु बदलाव सन छैक। उपन्यासकार अपना कैंचा सं पोथी छपेबामे असमर्थ रहथि।तेँ लेखन कार्यक १० बरख बिरला पर ई उपन्यास अस्तित्वमे आयल रहय। ऐहिमे स्त्री पात्र सुष्मिता दी आ पुरूष पात्र राजू'दा विषयमे काल्पनिक कथा कहर गेल छैक। सब पराबके एक उप शिर्षक उपन्यासमे लेल गेल य। राजू दा केर प्रेमिका इला आ सुष्मिता केर सखी- अरुणाक कथा सेहो क्षेपकमे कहल गेल छैक। बाल बच्चैदार कामकाजी जनीजात शहरमे अपन पति संग कार्यालयमे खटैत छै। हुनक पति महोदय विष्णु जी नशबंदी धरि अपन समय सँ करा लेने छै। उपन्यासके शुभ संज्ञा अनुसारे राजू योग्य ब्राह्मण केँ शासकीय सेवा मे सफलता नहिं भटलैक। लोकसेवा आयोग केर एक अन्तरविक्षामे शहर गेलापर अपन परिचित शिष्या सुष्मीताक डेरा पर आश्रय लैत छै। इला सँ पत्राचार नहिं भेने निश्तुकी पता सेहो नहिं छैक। गाममे ऐबेर खेती करैत राजू भाय - भौजक आशा छोड़ि मायक सेवामे रहैत छथि। भाय आ भाउज गरीबक बेटी सँ हाथ धरेबाक जोगार बैसाए गामेक दोसर टोलमे राजूक संग कन्यागत ओहिठाम गेल छथि। मुदा जे भवितव्य लिखल छैक से कोना मेटतनि। अकस्मात् सुष्मिता जी अपन स्वस्थ मोन सँ राजूझा ओतय रहय ले सदाके लेल आबि धरफरन लाधि देलि हेन। हर जोति धरती मायके सेवामे एक अनोखा संबंध दाम्पत्य जीवनक आरंभ भेलैक। आब तँ गुंजन जीके साहित्य पढ़ि कतूको अर्थशास्त्र क' ग्रेजुएट लोकल फार ......! आधार पर कृषि काजमे दतचित जुटल अछि। आ अन्तर गोत्रिय वियाहक समर्थन करैत अछि। उपन्यासकार श्री गंगेश गुंजन जीक शव्द चयन आ सुलेख पाँति एहि तरहक होय छन्हि -:
" क्षमा करु राजूदा। अहाँ सुधंगे रहि गेलहुँ । हिनका संदेह बनले रहतनि ने यदि बच्चा होइत तँ जे कोनो आने संयोग सँ हमरा बच्चा भेल अछि, ओ सुनकर नहिं। अपने ऑपरेशन सँ निश्चिन्त रहताह जे परपुरुष लग जयबाक हमरा साहसे नहिं होयत। आ एहि प्रकारे हमर सतीत्व अक्षुण्ण रहत जिनका नजैरमे। हमर सम्पूर्ण आत्मा क्रोध आ घृणा सँ धह- धह जरैत रहैए,राजूदा। प्राण जरैत रहैए। कखनो काल एहि बातपर मन तेहन कठोर भ' जाइए जे हम कयटा बढ़ मारुख संकल्प सब कर' लगैत छी। हमारा अपना ऊपर अपने पतिक कयल गेल एहि अविश्वासक हेतु मनमे बड़ भयावह प्रतिशोधक भावना तंग करैत रहैए । बहुत! आ, आब तो हमरा बड़ साफ- साफ बुझाइत रहैए जे हम आई धरि भुखायल भोजन सभ कौरक स्वादो नहिं बुझने छीऐक। स्वादि - स्वादि क' खायब तो दूर ,जे बिना स्वदियो क' खयने जे स्वाद भेटैत छैक,ताहू सं हम अनभिज्ञे छी। हमरा मोनमे आब एहि बातक बड़ लोभ होइत रहैए। मनमे जबर्दस्त प्रतिक्रिया उठैत रहैए। हमर मन जेना अपने चारु कात सँ घेराएल धधकैत रहैए। "
ओहि दिन
डिप्टी पर नहिं जाए
,अपन
मनके पीड़ा नै चाहैत व्यक्त धरि कय मोन हल्लूक कयने छलीह। हुनकर हिममतकेँ
दाद दैत छी। ऐ तरहक निष्ठुर साहित्य रचना सँ गुंजन जी लेखकीय समाज सँ
गुटबाजी आ खेमाबाजीक कारणेँ तत्कालीन परिवेश सँ कटल बुझाइत रहलाह अछि। हुनक
जन्म जयंती लगीच य,
हार्दिक शुभकामना आ बधाय दैत छीयैन हम।
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