
लाल देव कामत
पतीत : पोथी चर्चा
श्री उदय शंकर झा कृत ९५ पृष्ठक मैथिली पोथी हुनक स्तरीय सामाजिक उपन्यास
छन्हि। मधुबनी'क नवारम्भ प्रकाशन सँ २०२६ मे छपल ऐ पोथीक दाम २०० टाका
निर्धारित कयल गेल छैक। आई एस बी एन ९७८-९३-४९८६७-६४-२ प्राप्त ,ऐ
बहुचर्चित पोथीकेँ उपन्यासकार श्री झाजी समस्त मैथिल समाज केँ समर्पित कयने
छथि। पोथीक आवरण पृष्ठ साहित्यिक दृष्टिये देखनुक,आ पछिला कभर पर संक्षिप्त
परिचय के संग आकर्षक छवि विशेष रूपेँ लौकैत छैक। श्री झाजीक चारिगोट पोथी
यन्त्रनालयमे छैन-: यथा - बहसल/रभसल, सासु-पूतौह, जुझारू/जीबटपन आओर
प्रतिशोध। एक सामाजिक उपन्यास 'मुसहरनी' केर पाण्डुलिपि आ दोसर पोथीक लेखन
कार्य आरम्भ कयने छथि।
एखनधरि निम्नांकित सारगर्भित रचनाक पोथी जे प्रकाशित भऽ पाठक लग पहुँचल अछि
; सन् २०२४ मे चारिगोट यथा-: शक्ति- शिवक भक्ति गीत, सखि हे आँचर फुलय
वसन्त, मोन पड़ैए गाम, प्रेरणा - पुँज आ 'हमर ई मोन कहैए'-२०२५ ई० (पद्य
विधागत) अछि। गद्य विधामे २०२६ ई० मे प्रकाशित पोथी य - आंखिक देखल,कानक
सुनल 'मैथिली कथा आख्यान ' आ आँचर तर , संयोग आ सद्यप्रकाशित मैथिलीमे
पोथी'क आओर रचना कयलन्हि अछि -: पतित। ऐ बदनाम शव्द केँ शिर्षक बना' समाज
सुधारक परम उद्देश्य सँ रचना कयल गेल छैक।
मिथिलांचल केर एक बिनु कोठाक गाम जतय सँ मुख्य पात्र रमणीय बाबु देश आजादीक
द्वीतिय पंचवर्षीय आम चुनावमे विधायक पद केँ सुशोभित कयने रहथि। ओहिक वाद
एक कालेजमे फेर सँ प्राचार्य पद पर सेवारत रहलथि। ओहि कालेजमे भावो केँ आ
मेधावी पुत्र केँ सेहो वादमे व्याख्याता पद पर नियुक्ति करौलनि। घरेलू काज
ले गाममे मकदमपुर बाली एक खबाशनी आ एक गरीब ब्राह्मण फेकुजीक विधवाकेँ
वहिकरणी रूपेँ जीवन पर्यन्त राखि लेने रहैछ। संगहि एक पूर्व प्रेमिका गामक
बेटी आ अपन पटना बाली भाभोक भौजाई संग सफेदपोश प्रिन्सफल साहेब बेर - बेर
बालात्कार करैत रहल य। अपन दीदी केँ अनैतिक संबंध बनौने देखि बेबी रमणी
बाबु श्वसुर सँ कुपित भेल सासुक गैत श्राधमे नहिं आबि मायक सहमति सँ एक
पुत्रक अछैत पूर्व विधुर प्रेमी संग टूर पर हील स्टेशन गेल छथि। अपन प्रौढ़
कुलीन पैग देयादनीक श्राधमे अनुपस्थित रहैत छोटकी कनियाँ सेहो भतिजीये
जेकाँ नैहर पटना चलिए गेलैक हेन। ओतय अपन भाय सँ वार्तालाप करयमे दक्ष आ
भौजाई केँ विशवासमे राखि अनैतिक संवंधक विस्तार सँ चर्चा कयल । ओ चेतबैत
बुझेलनि जे हम अपन बच्चेदानी हटा लेने छी,अहाँ से नहिं कयलौंह। आब
ढ़िड़हारि बनि आबि गेल छी तँ ई समस्या निवारण कराबहि पड़त,से सोचि हुनक
गर्भपातक संगहि शल्यक्रिया सँ डाक्टरीमे बच्चेदानी धरि हटेबामे सक्षमता
देखबैछ। ई बात पुनः महाविद्यालय आबि भैंसुर आ भनसिया फेकू जीकेँ बताबैत
निचेन रहैत छै। जाहि कालेज लग सँ बजार जाईमे रिक्शा किराया तीन टाका, एक्का
केर बहलमान घुरती सवारी दू टकामे संतोष करैत छै आ एक आना पाई सँ मुसमारा
दवाय गामेक दोकानमे रमणीय बाबूक पत्नी बेसाहि लैत अछि; ओतय रमणी बाबूक तीन
वर्षीय पौत्रके नामे हुनका पूतौहके प्रेमी २५ लाख टाका बैंकमे जम्मा करैत
अपना सँगे अमिरिका लऽ चलि जाइछ। भौतिकी विषयमे नाम बजेनहार लेक्चररके वाबत
चन्द तरहक अनर्गल बात कानमे पड़ला सँ दुःखी भऽ स्वत: प्रकाश जी बाबूजीक पैघ
डेरा छोड़ि अपन विवशता फेकू काका सँ कहि बजारमे दूनू गोटय आवासीय रूममे नीक
जेकाँ रहैत य। प्रकाशके मित्र विनोद जी बहुत अन्वेषण कय भेंट करय आबि सब
खुलस्ता बात बुझेने धरि रहैक । पत्निक उड़हरि गेने पुन: प्रकाश जीक विवाह
मादे एक घटकक प्रसंगवश चर्चा सेहो क्रमवार रूपेँ उपन्यासकार लिखलन्हि अछि।
आचरण संदिग्ध रहने रमणीय बाबुक पैघौत पर अनेक प्रश्नचिन्ह लागल छैक। मुदा
अगियाह रमनी बाबु पैग लोक दुरस्थ लोकक नजैरमे बनले रहला । पुरूख पात्रमे
आनों नाऊ ,जेनाकि- दिनेश बाबु ,चिंतु गोप, मोहन, सुखी बाबु तथा स्त्री
पात्रमे रामपुर बाली, बेलामबाली मैंयाँ ,सविताक माय, आ रमणी बाबूक परम
आदरणीया ममतामयी माय केर भूमिका सँ पठनीयता रोचक भेल अछि। ऐ पतितपना पर
नवारम्भ प्रकाशनके कर्ताधर्ता ओ साहित्यकार अजित आजाद जी अश्लीलता पर विचार
विस्तार सँ लिखलनि अछि।
उपन्यासकार श्रीझाजीक लेखन शैली कोन तरहक वाक्य विन्यास होय छनि,से पृष्ठ
सं० ३६ सँ उद्धृत -: आइ भोरे कविता आ सविता ,दुनू एके वयसक छौड़ी ,दुनू
आपसमे मित्र बनल अछि आ अपनामे एक-दोसरक लेल संबोधन रखने अछि 'लौंग' । "हय
लौंग ! पोखरि दिस नहिं जयबह?" कविता बाजलि। हँ हइ लौंग! जेबाक तँ अछि मुदा
आइ हमरा घरमे दातमनि खतम भ' गेल अछि, बुझाइए बाहरे कत्तौ तोड़य पड़त।"
सविता बाजलि। " कियै है? हमर भैया काल्हिए एक मुठ्ठी साहोरक दातमनि
अनलखिनहें, चलह ने तोरो लए एकटा राखि लैत छियह।"
" ऐँ हेँ! श्रवण भैयाक आइ कनियाँ औतै, चलबह देखै लेल?"
" हँ - हँ, कियै नहि जायब? ओनाहुँ तँ हकार देबे ने करथिन।"
" हकार कत्तौ नहि देथिन!"
" हइ ! सुनै छिए, कनियाँ बड़ पढ़ल छै।"
" हमरा भौजी सँ बेसी!"
" तोहर भौजी कतेक पढ़ल छथुन?"
" ओ सातवाँ पास छथिन आ सभकेँ चिठ्ठी - पत्री लिख दैत छथिन।"
" ई की करथिन से नहि बुझल अछि मुदा सुनै छियै जे रमणीये भाइजी ओत्तेक पढ़ल
छै।"
" नहि हे, ओतेक नहि पढ़ल हेतै?"
" सुनै छिए ओहो पोरफेसरी करतै।"
" जहन ओतेक पढ़ल छै तखन तँ करबे ने करतै।"
" गै लौंग ! एकटा बात कहियौ? एकाएक ध्यान पर आबि गेल।"
" तँ' कह ने"
" ई रमणी भाइजी छौ ने से बड़का छिनार छौ।"
" कियै किछु कहलकौए?"
" कहलकए तँ नहि। जखन पोखरिमे शौच करै लेल जेबौ, तँ हटबे नहि करतौ आ हमरे सब
दिस तकैत रहतौ।"
" सुनै छियै जे ओकर चालि - चलन ठीक नहि छै।"
" कह तँ ई कोनो नीक बात भेलै ! सुनै छिए कहाँदन बड़का लोक छै।"
" देखै नहि छिहिन। कतेक लोक ओकरा आगू - पाछू लागल रहै छै।"
" एहिसँ नीक तँ छोटके लोक रहितय मुदा चालि - चलनक नीक रहितै।"
" छोड़ ने , ई सब तँ ओकर मामला छै, से कहि देलियौ।"
" से तँ ठीके, ओना हमरा मोनमे जे बात छलह, से कहि देलियौ।"
" हम सब साँझमे चलब कनियाँ देखै लेल।"
" हँ , हँ , चलब की। देखबै ओत्ते पढ़ल कनियाँ केहन होइ छै?"
" केहेन हेतै? कनिये जकाँ ने।"
दुनू हँसय लागल आ आँगन दिस बिदा भ' गेल।
उपरोक्त कथोपकथन सँ साबित होईछ जे जनवाणी खासकय जनिजात लोकनिमे कानों-कान
एहन निर्लजताक खबेर पसैर गेलैक हेन। ग्रामीण समाज वोटमे आ चुनवा प्रचारमे
सामूहिक बल देखेने छथि आ लेमनचूस बालाके श्राधकर्ममे सेहो चंदा - बेहरी धरि
कयने रहैछ।रमणी बाबूक छोट भाय विदेश म रहैछ,जहन पत्नि अपन एक ६ वर्षीय बालक
सँग नहिं जेबाक बात कहैत छैन तँ ओ विदेश जाए ,ओतय अपना दिशुका गोत्र- मूल
देखि योग्य कन्या सँ समध कय लेल। अभिजात्य वर्गमे ऐ तरहक समस्याक निदानक
कोनू वाट दुर - दूर धरि नहिं देखाईछ। पाठककेँ लाईट स्टोरी बढ़ चिकन लागत।
समग्र रूप सँ चेतना जागृत करय लेल अपन युवा अवस्थामे लिखल ऐ उपन्यास केँ
हालहिमे छपेबाक लेल यथेष्ट प्रशंसा करैत छियैन हम।
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