
संतोष कुमार राय 'बटोही'
हम फेर नहि भेटबैन्ह
जिनगी फुँही जकाँ बरीश जाएत छै ।
ठिठुरैत ई दुनियाक आवोहवा
बड़ गहनैत छै आब
नाक आओर फेफड़ा फाटि जाएत छै ।
हक्कन कनैत आँखि
पाथर होयत ओकर करेज
मसुआइत हमर दिल
गिन रहल अछि
अपन अवसानक दिवस
हम फेर नहि भेटबैन्ह
जखन करेज मे आगि लगतैन्ह हुनका
सचक आगि
नहि बुझायत छै ।
आइ हम मुआयल छी
अपन अंतर्मन मे
अंतर्द्वन्द्व मे
सभ बन्न भऽ गेल छै
अर्पण-तर्पण !
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