
राजदेव मंडल
खाली पन्ना/
भीतरिया
कानब
१
खाली पन्ना
खाली पन्ना पूर्णत: उज्जर
आगू मे राखल अछि ।
हाथ मे चुप्पी साधने कलम अछि
आ हम उधियाइत विचारक समुन्दर मे
हेलैत-डूबैत हथोरिया मारैत
कते सँ कते पहुँच गेल छी
उगि रहल छी
डूमि रहल छी
तखैन एकटा हाथ
हमरा हाथ केँ सहारा दैत अछि ।
पुनः ओहो हाथ छूटि जाइत अछि
धारा खैंच लैत अछि
बेसहारा भए भसिया रहल छी
देखि रहल छी आगाँ मे
दोसर अनजान सहारा
मुदा मध्य मे अछि कठिन बाट।
लगाबै पड़त अपन तर्क आ बुइध
पता नै ओते पहुँचब कखैन तक
साँस बचत आकि डूमत तखैन तक।
(१३.०२.२०२६)
२
भीतरिया कानब
हमरो मन होइए जे बोमियाक कानि
बपराहाइड़ काटि
अहीं जेकाँ खसाबी नोर ।
अहाँक नोर सब देखैत अछि
अहाँक कानब सब सुनैत अछि
अहाँक सब दैत अछि बोल -भरोस
अहाँक कतेक स्वतंत्र छी
कनवाक लेल
मन हल्लुक होएत हैत
करैत ई खेल
समेटि लैत होएव सभक संवेदना ।
मुदा हमरा भीतरिया कानब के सुनत ?
के जानत हमरा अन्तर्वेदना के
कुहि होएत मन केँ?
हम कतेक परतंत्र छी
प्रत्यक्ष में कानियो नै सकै छी
हिरदय खोलि केँ।
अहाँक नोरक लेल सांत्वना
हमरा नोरक लेल कठहंसी ।
हमरो कानल होएत अछि
मुदा हम रोकने छी नोर
अहाँक बचेबाक हेतु
तैँ अहाँक लेल हम
पत्थर सन ।
(१४.०२.२०२६)
-राजदेव मंडल, मो:9199592920, ई-मेल:mandalraj@gmail.com
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