१२. पञ्जी प्रबंध-गजेन्द्र ठाकुर
पञ्जी प्रबंध
पंजी-संग्राहक- श्री विद्यानंद झा पञ्जीकार (प्रसिद्ध मोहनजी)
श्री विद्यानन्द झा पञीकार (प्रसिद्ध मोहनजी) जन्म-09.04.1957,पण्डुआ, ततैल, ककरौड़(मधुबनी), रशाढ़य(पूर्णिया), शिवनगर (अररिया) आ’ सम्प्रति पूर्णिया। पिता लब्ध धौत पञ्जीशास्त्र मार्त्तण्ड पञ्जीकार मोदानन्द झा, शिवनगर, अररिया, पूर्णिया|पितामह-स्व. श्री भिखिया झा | पञ्जीशास्त्रक दस वर्ष धरि 1970 ई.सँ 1979 ई. धरि अध्ययन,32 वर्षक वयससँ पञ्जी-प्रबंधक संवर्द्धन आ' संरक्षणमे संल्गन। कृति- पञ्जी शाखा पुस्तकक लिप्यांतरण आ' संवर्द्धन- 800 पृष्ठसँ अधिक अंकन सहित। पञ्जी नगरमिक लिप्यान्तरण ओ' संवर्द्धन- लगभग 600 पृष्ठसँ ऊपर(तिरहुता लिपिसँ देवनागरी लिपिमे)। गुरु- पञ्जीकार मोदानन्द झा। गुरुक गुरु- पञ्जीकार भिखिया झा, पञ्जीकार निरसू झा प्रसिद्ध विश्वनाथ झा- सौराठ, पञ्जीकार लूटन झा, सौराठ। गुरुक शास्त्रार्थ परीक्षा- दरभंगा महाराज कुमार जीवेश्वर सिंहक यज्ञोपवीत संस्कारक अवसर पर महाराजाधिराज(दरभंगा) कामेश्वर सिंह द्वारा आयोजित परीक्षा-1937 ई. जाहिमे मौखिक परीक्षाक मुख्य परीक्षक म.म. डॉ. सर गंगानाथ झा छलाह।
वैवाहिक अधिकार निर्णय
नियम १. कोनो कन्या अपन १६ पुरुषा (पितृकुल आऽ मातृकुल मिलाकेँ) सँ छठम स्थानमे रहैत छथि- जिनका छठि कहल जाइत छन्हि।
एहि छठिक निर्धारण निम्न प्रकारसँ होइत अछि।
१.क्न्याक प्रपितामहक पितामह प्रथम छठि
२.कन्याक प्रपितामहक मातामह द्वितीय छठि
३.कन्याक पितामहक मातामह तृतीय छठि
४.कन्याक प्रपितामहीक मातामह चतुर्थ छठि
५.कन्याक पितामहीक प्रपितामह पञ्चम छठि
६.कन्याक पिताक मातामहक मातामह छठम छठि
७.कन्याक पितामहीक प्रमातामह सातम छठि
८.कन्याक पितामहीक मातृमातामह आठम छठि
९.कन्याक मातामहक प्रपितामह नवम छठि
१०.कन्याक प्रमातामहक मातामह दसम छठि
११.कन्याक मातामहक प्रमातामह एगारहम छठि
१२.कन्याक मातामहीक मातृमातामह बारहम छठि
१३. कन्याक मातामहीक प्रपितामह तेरहम छठि
१४.कन्याक मातामहीक पितृ मातामह चौदहम छठि
१५.कन्याक मातामहीक प्रमातामह पन्द्रहम छठि
१६.कन्याक मातामहीक मातृ मातामह सोलहम छठि
उपरोक्त्त समस्त छठिक समान महत्त्व अछि। एहिमे सँ कोनो छठि वरक पितृ पक्षमे अएला पर उक्त्त वर कन्याक मध्य वैवाहिक अधिकार नहि होएत। ओऽ छठि यदि वरक मातृकुलमे अबैत छथि तँ अधिकार होएत।
नियम२. वर कन्याक गोत्र एक नहि होए।
नियम ३. वर कन्याक प्रवर एक नहि होए।
नियम ४. वरक मातामह ओऽ कन्याक मूल ओऽ मूलग्राम सहित एक होए तँ सात पुस्त धरि मातृ सापिण्ड्यक कारणेँ अधिकार नहि होएत।
नियम५.वरक विमाताक भायक सन्तान कन्या नहि होए।
मातृतः पञ्चमी त्यक्त्तवा पितृतः सप्तमीं भजेत्- मनुस्मृति
असपिण्डाय या मातुः असपिण्डा च या पितुः सा प्रशस्ता द्विजातीनां दार कर्मणि मैथुने।
पञ्चमात् सप्तमात् सप्तमात् उर्ढ्वं मात्रूतः पित्रूतस्थत।
सपिण्डा निवर्तेत कर्तुम् व्यतितिसम्।
(अनुवर्तते)
१३.
मूल विदेह अंक / Original issue
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