बीसम शताब्दी मैथिली साहित्यक स्वर्णिम युग
-प्रोफेसर प्रेम शंकर सिंह
अतीत आऽ भविष्यक संग सम्बन्ध स्थापित कऽ कए साहित्य अपन अस्तित्वक सत्यताक उद्घोषणा करैछ। विश्व-मानव अत्यन्त उत्सुकतापूर्वक साहित्यक गवाक्षसँ अतीतक गिरिगह्वरक गुफामे प्रवाहित जीवन-धाराक अवलोकन करैछ आऽ अपन गम्भीरतम उद्देश्यक विविध प्रकारक साधन भूल आऽ संशोधन द्वारा प्राप्त करैत अपन भावी जीवनकेँ सिंचित होइत देखबाक उत्कट अभिलाषा रखैछ। अतीतक प्रेरणा आऽ भविष्यक चेतना नहि तँ साहित्य नहि। अतीत, वर्तमान आऽ भविष्यक कड़ीक अनन्त शृंखलाक रूपमे भावक सृष्टि होइत चल जाइछ आऽ मानव अपन प्रगतिक नियमादि, सिद्धान्तादिकेँ अपन वास्तविक सत्ताक विकासक मंगल कंगन पहिरि कए अपन दुनू हाथसँ आवृत्त कयने रहैछ। विश्वकवि रवीन्द्रनाथ ठाकुर (१८६१-१९४१)क कथन छनि जे विश्व-मानवक विराट जीवन साहित्य द्वारा आत्मप्रकाश करैछ। एहन साहित्यक आकलनक तात्पर्य काव्यकार एवं गद्यकारक जीवनी, भाषा तथा पाठ सम्बन्धी अध्ययन तथा साहित्यक विविध विधादिक अध्ययन करब मात्र नहि, प्रत्युत ओकर सम्बन्ध संस्कृतिक इतिहाससँ अछि, मानव-मनसँ, सभ्यताक इतिहासमे साहित्य द्वारा सुरक्षित मनसँ अछि।
उन्नैसम शताब्दीमे भारतवर्षमे नवजागरणक प्रबल ज्वार उठल। तकर कोनो प्रभाव मिथिलांचलपर नहि पड़ल, कारण मिथिलावासी प्राचीन परम्पराक पृष्ठपोषक रहलाक कारणेँ संस्कृत शिक्षामे लागल रहलाह आऽ अंग्रेजी शिक्षा तथा पाश्चात्य विचारधाराक महत्वकेँ नहि स्वीकारलनि। नवजागरणक फलस्वरूप षष्ठ दशकमे भारतीय परतन्त्रताक बेड़ीसँ मुक्त होएबाक निमित्त सन् १८३७ ई. मे सिपाही विद्रोह कएलक। मिथिलाक नव शासक मैथिलीकेँ कोनो स्थान नहि देलनि। एहि दशकक अन्तिम बेलामे मिथिलाक प्रशासन “कोर्ट ऑफ वार्ड्स”क अधीन चल गेल जकरप्रभाव मिथिलापर पड़लैक। जे एहिठामक निवासीकेँ प्रथमे-प्रथम पश्चिमक स्पर्शानुभूति भेलनि। किन्तु दुर्भाग्य भेलैक जे “कोर्ट ऑफ वार्ड्स” द्वारा मिथिलाक भाषा मैथिली आऽ ओकर लिपिकेँ बहिष्कृत कऽ कए ओकरा स्थानापन्न कयलक उर्दु आऽ फारसी तथा देवनागरी। मिथिलेश महाराज लक्ष्मीश्वर सिंह (१८५८-१९९८)क गद्देनशीन भेलापर उन्नैसम शताब्दीक अष्टदशकोत्तर कालमे मिथिलावासीक सामाजिक, सांस्कृतिक एवं साहित्यिक जीवनमे नव चेतनाक संचार भेलैक। हुनक चुम्बकीय व्यक्त्तित्व, कृपापूर्ण व्यवहार, विद्या-व्यसन आऽ असीम देशभक्ति एवं दानशीलताक फलस्वरूप विद्वान साहित्य सर्जककेँ आकृष्ट कएलक। हुनक उत्तराधिकारी मिथिलेश महाराज रमेश्वर सिंह (१८९८-१९२९) सेहो उक्त परम्पराकेँ कायम रखलनि।
उन्नैसम शताब्दीक अष्टदशकोत्तर कालमे भारतीयमे अभूतपूर्व जनजागरण भेलैक, जकर फलस्वरूप स्वतन्त्रता संग्रामक नव स्फुलिंग जागृत भेल आऽ ओऽ सभ स्वतन्त्रताक निमित्त अत्यधिक सचेष्टताक संग सन्नद्ध भेलाह, जकर प्रभाव साहित्य सृजनिहारपर पड़लनि। यद्यपि शताब्दीक अन्तिम वर्ष धरि धार्मिक आऽ सांस्कृतिक चिन्तनपर रुढ़िवादिताक पुनः प्रकोपक विस्तृत छायासँ बौद्धिक आऽ साहित्यिक प्रगतिक समक्ष अवसादपूर्ण वातावरणक परिव्याप्त भऽ गेलैक। तथापि मैथिली साहित्य जगतमे उत्कर्ष अनबाक निमित्त अपन परम्परागत परिधानक परित्याग कऽ नव प्रवृत्तिक रचनाकारक प्रादुर्भाव भेल जाहिमे मातृभाषानुरागी आऽ प्रकाशनक सौविध्यसँ साहित्य नव रूप धारण करय लागल जकर नेतृत्व कयलनि कवीश्वर चन्दा झा (१८३०-१९०७), कविवर जीवन झा (१८४८-१९१२), पण्डित लालदास(१८५६-१९२१), परमेश्वर झा (१८५६-१९२४), तुलापति सिंह (१८५९-१९१४), साहित्य रत्नाकर मुन्शी रघुनन्दन दास (१८६८-१९४५), मुकुन्द जा बक्शी (१८६०-१९३८), जीवछ मिश्र (१८६४-१९२३), चेतनाथ झा (१८६६-१९२१), खुद्दी झा (१८६६-१९२७), मुरलीधर झा (१८६८-१९२९), जनार्दन झा “जनसीदन”, सर गंगानाथ झा (१८७२-१९४१), दीनबन्धु झा (१८७३-१९५५), रामचन्द्र मिश्र (१८७३-१९३८), बबुआजी मिश्र (१८७८-१९५९), गुणवन्तलालदास (१८८०-१९४३), कुशेश्वर कुमर (१८८१-१९४३), विद्यानन्द ठाकुर (१८९०-१९५०), कविशेखर बद्रीनाथ झा (१८९३-१७४), पुलकितलालदास (१८९३-१९४३), गंगापति सिंह (१८९४-१९६९), उमेश मिश्र (१८९६-१९६७), धनुषधारीलालदास (१८९६-१९६५), भोलालालदास (१८९७-१९७७), अमरनाथ झा (१८९७-१९५५), राजपण्डित बलदेव मिश्र (१८९७-१९६५), कुमार गंगानन्द सिंह (१८९८-१९७०), ब्रजमोहन ठाकुर (१८९९-१९७०) एवं रासबिहारीलालदास आदि-आदि जे विविध साहित्यिक विधादिक जन्म देलनि आऽ एकरा सम्वर्धित करबाक दृढ़ सन्कल्प कयलनि।
वस्तुतः विगत शताब्दी मैथिली साहित्यक हेतु एक क्रान्तिकारी युगक रूपमे प्रस्तुत भेल। अंग्रेजी राज्यक स्थापना देशक साहित्यिक, वैज्ञानिक, राजनैतिक, आर्थिक आऽ सामाजिक क्षेत्रमे एक नव स्फूर्ति प्रदान कऽ कए मिथिलांचलक जीवन-शैली आऽ सोचक पुनर्संस्कार कयलक। एहि शताब्दीमे आधुनिक शिक्षा, छापाखाना आऽ सरल यातायातक सुविधाक अभाव रहितहुँ मैथिलीमे साहित्य सृजनक परम्परा वर्तमान रहल। बहुतो दिन धरि मैथिली साहित्य संस्कृत साहित्यक प्रतिछाया सदृश रहल। एहिमे साहित्यिक एवं अन्य प्रकारक लेखन निरन्तर होइत रहल। दुइ विश्व युद्धक बीचक कालमे मैथिली साहित्यक सर्वांगीन समुद्धारक चेतना अनलक। एहि कालक लेखनमे ई नव मनोदशा प्रतिफलित भेल आऽ साहित्यक विभिन्न विधामे उल्लेख्य योग्य परिवर्तन भेल।