बीसम शताब्दी: मैथिली साहित्यक स्वर्णिम युग (आगाँ)
यथार्थतः मैथिली सहित्य अपन परम्परावादी प्रशस्त मार्गक परित्याग कऽ कए गद्यक आश्रय ग्रहण कऽ नवीन मार्गपर डेग राखि शनैः-शनैः अग्रसर भेल तकर श्रेय आऽ प्रेय दुनू विगत शताब्दीकेँ छैक जे साहित्य सरिताक प्रवहमान धारा सदृश कलकल छलछल करैत अग्रसर भेल, तकर साक्षी थिक विभिन्न विधादिक साहित्येतिहासक प्रकाशन। एहि स्वर्णिम कालक सहस्राब्दीक सम्पूर्ण साहित्यकेँ स्थूल रूपेँ दू धारामे विभाजित कयल जा सकैछ- काव्य-धारा अऽ गद्य धारा। युग संधिक उत्कर्ष बेलामे साहित्यिक गतिविधिक क्षेत्र काव्यसँ बेशी गद्यकेँ प्रधानता भेटल। लोकक ध्यान राजनीति आऽ सामाजिक सुधार दिस गेलैक आऽ काव्यक विकासक लेल अनुकूल आराम वा पलखतिक वातावरण आब नहि रहलैक। नवोदित रचनाकारकेँ कविता सदृश विलास-वस्तुक लेल साधन आऽ समय नहि रहलनि। युग-सन्धिक उत्कर्ष बेलामे उद्भूत विभिन्न साहित्यिक विधादि भीतिपर दृष्टिनिक्षेप अकारान्त क्रमसँ कयल जाइत अछि, जे विगत शताब्दी कोन रूपेँ एकरा स्वर्णकाल उद्घोषित करबाक दिशामे अवदान कयलक तकर संक्षिप्त रूपरेखा अपनेक समक्ष प्रस्तुत कयल जाऽ रहल छल।
कविता सकल जीवनकेँ अपनामे समाहित करैत अछि आऽ मैथिली कविता एकर अपवाद नहि। विगत शताब्दीक मैथिली काव्यधाराक सर्वेक्षणसँ ज्ञात होइछ जे काव्यकार दुइ भागमे विभक्त छथि- किछु तँ परम्परागत रूपक अनुयायी छथि तँ किछु नव प्रयोग कयनिहार सेहो। शताब्दीक सन्धि बेलामे मैथिली काव्यकेँ पारम्परिक एवं नवीन दुनू रूपमे अभिव्यक्ति भेटलैक। पारम्परिक एवं आधुनिक काव्य जटिल रूपेँ मिझरा गेल अछि। काव्यकार लोकनि लोकप्रिय धुन एवं शैलीपर आधारित गीतक रचनाक सामाजिक, राजनीतिक चेतना जगयबाक प्रयास कयलनि। स्वाधीनताक पश्चात् मैथिली काव्यकेँ आगू बढ़यबामे मैथिली पत्रिकादि महत्त्वपूर्ण भूमिकाक निर्वाह कयलक। स्वाधीनोत्तर काव्यक प्रवृत्ति सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक स्थितिक कारणेँ आऽ समाजवादी विचारधाराक प्रसादक कारणेँ प्रगतिशील कहल गेल अनेक काव्यक रचना भेल। चीनी आक्रमण तथा पाकिस्तानक संग भेल युद्धसँ राष्ट्रवादी जोश, एकताक भावना एवं देश-भक्तिक स्फुरण भेल। राष्ट्रीय जागरण एवं वीरताक चित्रण करैत कतोक काव्यक रचना भेल। मैथिली काव्यधारा भारतीय भाषाक समकालीन प्रवृत्तिसँ सेहो प्रभावित भेल। किछु कवि एहनो दृष्टिगोचर भऽ रहल छथि जनिक रचनामे कोनो विशेष प्रवृत्तिक कारणेँ हुनका फराक कयल जाऽ सकैछ। आलोच्यकालक काव्य-साहित्यकेँ निम्नस्थ वर्गमे विभाजित कयल जा सकैछ:
१.महाकाव्य, खण्डकाव्य, प्रबन्ध काव्य।
२.पारम्परिक गीति काव्य।
३.मुक्तक काव्य।
४.नव रूप आऽ नव विषय एवं अन्यान्य जकरा अन्तर्गत पद्यबद्ध कथा, हास्य ओ व्यंग्य, प्रगतिशील, देशप्रेम, देशभक्तिपरक सम्बोधगीत एवं शोक गीत, प्रेम ओ शृंगार तथा नव कविता।
विगत शताब्दीक सत्तरिक दशकक मध्यमे किछु युवा कवि नवकविताक रचना करब प्रारम्भ कयलनि। जीवनक प्रति रुचि, मानवीय मूल्य आऽ वातावरणमे परिवर्तन तथा व्यक्तिवादी प्रवृत्ति एहन कविताक प्रमुख स्वर अछि। एहि आन्दोलनक फलस्वरूप काव्य साहित्यमे परिवर्तनक स्वर गुंजित होमय लागल जे सम्पूर्ण साहित्यमे दृष्टिगोचर होइछ।
विवेच्य शताब्दीमे कविक ध्यान आजुक मानव एवं ओकर बहुविध समस्या तथा ओकर बहुविध तत्व दिस विशेष रूपेँ आकृष्ट भेल अछि, तथापि प्राचीन विषय-वस्तु जेना सत्यता, वीरता, प्रेम, पराक्रम आदि तँ आदर्श रूपेँ रहबे करत। एहि प्रकारेँ आधुनिक काव्य-धारा विषय-वस्तुक क्षेत्रमे निस्संदेह समृद्ध भेल अछि, तथा नव-नव काव्य रूपक सेहो स्थापित भेल अछि। अमित्राक्षर वामुक्तवृत्त तथा अनेक नव-नव लय तथा छन्द-बन्धनक सफल प्रयोग एहि युगक प्रवृत्ति भऽ गेल अछि।
छन्दकेँ वर्तमान पीढ़ीक कवि पूर्णतः त्यागि देलनि से एक ध्यानाकर्षक वैलक्षण्य थिक। स्वयं कोनो मौलिक छन्द उद्भाषित करबाक एकोगोट प्रयोग नहि देखि पड़ैछ। एहन काव्यकारक संदर्भ, संकेत, उपमा, प्रतीक सभ नव-नव आऽ पारम्परिक कविताक रसिक लोकनिकेँ काव्योपयुक्त शब्द राशि छलनि तँ ऐंस्ट युगक बहुतो कवि अपन नव शब्द भण्डार बनौलनि। एकर कारण थिक जे कवि लोकनि कृत्रिमताक कोनो खास दर्शन अपनौलनि। नव तूरक कोनो कविक विषयमे ई नहि कहल जाऽ सकैछ, जे आयामिक वा अन्य प्रकारक कोनो खासवादक प्रभाव हुनकापर पड़लनि अछि। तथापि बहुतो दृष्टान्त, सन्दर्भ, संकेत, प्रतीक, मिथकक प्रयोग तथा शब्दावलीमे किछु प्रभाव ताकल जाऽ सकैछ। काव्यक भाषा, बिम्ब आऽ अलंकारक क्षेत्रमे हुनका सभकेँ नव-नव उद्भावना करबाक छनि।
गद्य धारा-
आधुनिक भारतीय भाषामे गद्य-साहित्यक आविर्भाव भारतीय जीवनमे ओहि मंजिलक द्योतक थिक, जखन मध्ययुगीन वातावरणसँ बहरा कऽ वैज्ञानिकताक प्रतीक बनल। हमर समग्र गद्य साहित्य जीवनक परिष्करण आऽ उत्थानक साहित्य थिक। आइ एकरा माध्यमे हम अन्तर्राष्ट्रीय ज्ञान-विज्ञानक सम्पर्कमे अयलहुँ। मुसलमानी शासन कालमे अरबी-फारसी साहित्यक सम्पर्क भेलासँ गद्य रचनाकेँ प्रोत्साहन नहि भेटि सकल। पूर्व आऽ पश्चिमक सम्पर्कक फलस्वरूप नवचेतना उत्पन्न भेल, समाज अपन हेरायल शक्तिकेँ जमाकऽ गतिशील भेल, साहित्यमे गद्यक श्रीवृद्धि भेल। अतएव विगत शताब्दी मैथिली गद्यक स्वर्णकाल थिक। आब तेँ ई साहित्यक प्रधान अंग बनि गेल अछि। एहि समयमे मिथिलांचलवासी पश्चिमक एक सजीव आऽ उन्नत्तिशीलजातिक सम्पर्कमे अयलाह आऽ ओऽ जाति अपना संग यूरोपीय औद्योगिक क्रान्तिक पश्चात् सभ्यता लऽ कए आयल। नवीन शिक्षा पद्धति, वैज्ञानिक आविष्करादिक प्रवृत्तिसँ मैथिली साहित्य अछूत नहि रहल। शासन सम्बन्धी आवश्यकता तथा जीवन परिस्थितिक कारणेँ गद्य सदृश नवीन साहित्यक माध्यमक आवश्यकता भेल आऽ वास्तवमे गद्य द्वारा मैथिलीमे आधुनिकताक बीज वपन भेलैक। वस्तुतः नवयुगमे नव शिक्षा-पद्धतिमे पालित-पोषित शिक्षित समुदायक आविर्भावक कारणेँ मैथिली गद्य-परम्पराक क्रमबद्ध इतिहास विगत शताब्दीसँ उपलब्ध भऽ रहल अछि। नवीनता जँ भेटैत अछि मात्र गद्यक रूपमे- नवीनता एहि अर्थमे जे ई साहित्यक प्रमुख आऽ स्थायी अंग बनि गेल अछि। गद्यक अटूट परम्परा भेटैछ जे एकर उज्जवल भविष्यक संकेत करैछ। मिथिलांचलमे आधुनिकताक बीजवपन गद्य रचनासँ मानल जयबाक चाही। वास्तवमे गद्यक इतिहासमिथिलांचलक जीवनमे बढ़ैत पाश्चात्य प्रभावक इतिहास कही तँ अनुचित नहि हैत।
गद्य-साहित्यक प्रसंगमे ई बात स्मरण रखबाक चाही जे विगत शताब्दीमे अधिकांश उपयोगी आऽ व्यावहारिक विषयसँ सम्बन्धित रचना भेल। वर्तमान समयमे गद्यमे अनुनाद, आलोचना, इतिहास, उपन्यास, कथा, नाटक-एकांकी, निबन्ध, पत्रिका तथा विविध रूपमे रचित गद्य साहित्यक रचना भऽ रहल, कारण जाहि-जाहि साधन द्वारा गद्यक विकास भेल अछि ओऽ सभ नवीन आवश्यकताक पूर्तिक लेल व्यावहारिक दृष्टिकोणमे सन्निहित अछि। साहित्यकार सभक द्वारा एकरा सजयबाक आऽ सँवारक कार्य कयल गेल। मैथिली गद्यक गाथा मिथिलांचलक नवजीवनक प्रभातकालीन चेतना, स्फूर्ति, ग्राहिका शक्ति आऽ गतिशीलताक आशा भरल गाथा थिक। जाहि दिन गद्यक कोनो प्रथम पृष्ठ प्रेसमे मुद्रित भेल हैत से दिन निस्सन्देह साहित्यक क्रान्तिक दिन रहल हैत।
अनुवाद
विगत शताब्दीक चतुर्थ दशकमे मैथिली साहित्यान्तर्गत अनुवादक सूत्रपात भेल। आरम्भिक कालमे ओकर गति मन्थर रहलैक; किन्तु स्वाधीनताक पश्चात् एकर विकासमे गति आयल आऽ वर्तमान समयमे ई एक अत्यन्त सशक्त विधाक रूपमे प्रतिफलित भेल अछि तथा एकर सर्वोपरि उपलब्धि थिक जे प्रचुर परिमाणमे गद्य आऽ पद्य प्रकाशमे आयल अछि। एहि प्रकारक सहित्यिक उपलब्धि अतीतमे नहि छल। आधुनिक, प्राचीन भारतीय भाषाक संगहि संग पाश्चात्य भाषा आऽ साहित्यक सहस्राधिक गद्य-पद्य मैथिली गद्य साहित्यक श्रीवृद्धिमे सहायक भेल अछि।
आलोचना
साहित्यिक सृजन आऽ ओकर आलोचनाक धारा समानान्तर चलैछ। प्रत्येक युगक साहित्य एक एहन आलोचनाक उद्भावना करैछ जे ओकर अनुरूप होइछ। एहि प्रकारेँ प्रत्येक युगक आलोचना सेहो ओहि युगक रचनाकेँ अनुकूल स्वरूप प्रदान करैछ। वस्तुतः देश आऽ समाजक परिवर्तनशील प्रवृत्ति एक भाग साहित्य निर्माणकेँ दिशा दैछ आऽ समीक्षा ओकर स्वरूप निर्धारित करैछ। अतएव रचनात्मक साहित्यक इतिहास आऽ समीक्षाक इतिहासमे धारावाहिकताक समानता रहैछ।
मैथिलीमे आलोचनाक उदय विगत शताब्दीमे भेल आऽ एकर विचित्र स्थिति अछि तथा ई ओकर सभसँ दुर्बल अंग थिक। विवेच्य कालक मैथिली आलोचना विधाक सम्पूर्ण विकास यात्राकेँ दृष्टिमे राखि हम एकर तीन रूप निर्धारित कयल अछि। प्रथम रूप संस्कृत समालोचना सिद्धांत वा निर्णयात्मक अछि। एहि प्रणालीक अनुगमन कयनिहार संस्कृत आचार्य लोकनिक रूप थिक। द्वितीय अछि पाश्चात्य समालोचना सिद्धांत। तृतीय रूप अछि जाहिमे प्राचीन भारतीय आऽ पाश्चात्य सिद्धान्तक समन्वय कयल गेल अछि। जीवनक नव परिस्थिति एवं नव सामाजिक चेतनाक कारणेँ विशुद्ध भारतीय दृष्टिकोण अपनायब तँ असम्भव थिक। किन्तु दुर्भाग्यवश अन्य दू रूपक कोनो विशिष्ट आऽ निश्चित परम्परा स्थापित नहि भऽ सकल अछि। साहित्यक उत्कर्षक सन्धि बेलामे आलोचना शास्त्र विभिन्न मत वादक अजायब घर बनि गेल अछि। ओकर प्रधान आधार वैयक्तिक रुचि-अरुचि अछि ने कि कोनो सिद्धान्तक आधार। एकहि आलोचकक समीक्षामे परस्पर विरोधी बात आऽ ओकर सुसंगत रूप नहि भेटैछ।
वर्तमानमे प्रवणता सभसँ बेशी देखल जाइछ जे भारत एवं पाश्चात्यक विभिन्न विश्वविद्यालयमे मैथिली विषयपर अनुसंधान भेल अछि आऽ भऽ रहल अछि, जकर संख्या लगभग तीन सहस्रादिसँ अधिक अछि। किन्तु मैथिली अनुसंधानक जे स्थिति अछि ताहिपर कतिपय प्रश्न चिन्ह लागि गेल अछि। अधिकांशतः अनुसंधान अप्रकाशित अछि। वर्तमान परिप्रेक्ष्यमे ओकर प्रकाशनक प्रयोजन अछि, जाहिसँ यथार्थ स्थितिक रहस्योद्घाटन भऽ सकय तथा ई विधा अभिवद्धिति भऽ सकय।
इतिहास-लेखन
साहित्येतिहासक लेखन तँ ओहि साहित्यक दर्पण समान होइछ जकर अवलोकनहि सँ साहित्यक यथार्थताक परिज्ञान पाठककेँ होइछ। विगत शताब्दीकेँ स्वर्णकाल उद्घोषित करबाक आऽ मातृभाषानुरागी प्रबुद्ध पाठककेँ अपन मातृभाषाक गौरव-गरिमाक आख्यान प्रस्तुत करबाक लेल कतिपय इतिहासकार एकर साहित्यिक परम्पराक पुनराख्यान निमित्त साहित्येतिहासिक ग्रन्थक रचना आऽ ओकर प्रकाशन कयलनि। किन्तु एहि साहित्येतिहासक ग्रन्थक अवलोकनोपरान्त निराश होमय पड़ैछ, कारण निष्पक्ष भावेँ मैथिलीक वैज्ञानिक पद्धतिक अनुसरण कऽ कए अद्यापि इतिहास नहि लिखल गेल अछि जे चिन्तनीय विषय थिक। प्रत्येक इतिहासकार दलगत भावनासँ उत्प्रेरित छथि जाहि कारणेँ महत्त्वपूर्ण कृतिकारक चरचा पर्यन्त नहि भऽ सकल अछि। एहि सन्दर्भमे हम दुइ इतिहासक चर्चा करब। साहित्य अकादमीक सत्प्रयाससँ “इण्डियन लिटरेचर सिन्स इण्डिपेनडेन्स” (१९७३) प्रकाशित भेल जकर त्रुटिक विषयमे मिथिला मिहिरक कतोक अंकमे एकर भर्त्सना कयल गेल। युग-संधिक उत्कर्ष बेलामे “ए हिस्ट्री ऑफ मोडर्न मैथिली लिटेरेचर”(२००४) प्रकाशमे आयल अछि जकरा कतिपय कारणेँ साहित्य जगतमे विवादास्पद ओ अपूर्ण सेहो अछि जकरा इतिहास कहबामे संकोचक अवबोध होइछ। वर्तमान संदर्भमे प्रयोजन अछि एक एहन साहित्येतिहासक जाहिमे साहित्यिक यथार्थ स्वरूपक उद्घाटन हो तथा उपेक्षित लेखक लोकनिक कृतित्वक सम्यक रूपेण उल्लेख प्रवृत्तिक अनुरूप हो।
उपन्यास
आधुनिक भारतीय भाषा साहित्यक अन्तर्गत उपन्यास लेखनक प्रादुर्भाव पश्चिमक नव सभ्यता आऽ प्रिंटिंग प्रेसक देन थिक आऽ मानव जीवनकेँ समग्र रूपसँ देखबाक प्रयास मैथिली उपन्यासान्तर्गत विगत शताब्दीक प्रथम दशकमे भेल। ई.एम.फॉस्टर (१८७९- ) क कथन छनि जे जीवनक गुप्त रहस्यकेँ समग्र रूपसँ अभिव्यक्तिक क्षमता जतेक उपन्यासमे अछि ओतेक अन्य कोनो विधामे नहि। इएह कारण अछि जे विगत शताब्दीमे उपन्यास अपन सीमाक कारणेँ महत्त्वपूर्ण विधाक रूपमे साहित्यमे प्रवेश पौलक तथा प्रधान साहित्यिक रूप बनि गेल जकर द्वारा मानव अपन वाह्य एवं आन्तरिक समस्यादिकेँ सोझरयबाक प्रयासमे संलग्न अछि।
मिथिलांचलक नव-चेतना, आकांक्षा आऽ विषमता, राष्ट्रीय संग्रामक विभिन्न मतवाद सामाजिक, आर्थिक, मनोवैज्ञानिक विषमता आदिक अभिव्यक्ति मैथिली उपन्यासक प्रमुखरूपेँ मुखरित भेल। विगत शताब्दीक चतुर्थ दशकक आरम्भिक साल मैथिली उपन्यास जगतमे विशेष महत्त्व रखैत अछि। “मिथिला” (१९२९) मासिक पत्रमे हरिमोहन झा (१९०८-१९८९)क “कन्यादान” धारावाहिक रूपेँ उपन्यास प्रकाशित होमय लागल। उपन्यास लिखबाक प्रेरणा हुनका जनार्दन झा “जनसीदन” सँ भेटलनि। स्त्री-शिक्षाक आवश्यकता तथा नव-पुरान सम्बन्धी विचारक संघर्ष देखयबाक लेल एकर रचना कयल गेल छल। पुस्तकाकार प्रकाशित होइतहि ई उपन्यास लोकप्रिय भऽ गेल। सामाजिक जीवनक एतेक व्यापक चित्रण एहिसँ पूर्व नहि भेल छल। सामाजिक कुरीतिक पर्दाफाश होइत देखि कए रुढ़िवादी तिलमिला गेलाह, किन्तु नवयुवक वृन्द एकर स्वागत कयलनि। एहि उपन्यासक प्रभाव मुख्यतः तीन रूपमे पड़ल- प्रथम समाजक मनोवृत्तिकपर, द्वितीय कन्या लोकनिक व्यक्तिगत जीवनपर तथा तृतीय मैथिली लेखक समुदायपर।
जतय स्वाधीनतापूर्व मैथिली उपन्यासक संख्याअत्यल्प छल ततय स्वाधीनोत्तर युगक प्रवेश एहि विधामे नव स्पन्दन आनि देलक आऽ एकर सहस्रमुखी धारा प्रवाहित भेल आऽ युग संधिक उत्कर्ष बेलामे अनेक उपन्यासकार प्रादुर्भूत भऽ अपन प्रतिभाक किरण बिखेरि कऽ एकरा समुन्नतशील बनौलनि तथा संदर्भमे बना रहल छथि। उपन्यास-लेखनक क्षेत्रमे एक कीर्तिमान स्थापित कयलनि विलक्षण प्रतिभासम्पन्न उपन्यासकार ब्रजकिशोर वर्मा “मणिपद्म” (१९१८-१९८६) जे क्वालिटी आऽ क्वान्टिटीक दृष्टिएँ डेढ़ दर्जन उपन्यास एहि साहित्यकेँ भेंट देलनि जे अद्यापि कोनो उपन्यासकार द्वारा सम्भव नहि भऽ सकल अछि। हिनक एक नवतम् उपन्यास “सोना रूपा हीरा” प्रकाशनक पथपर अछि।
दुइ शताब्दीक संधि बेलामे उपन्यास साहित्यमे नव-नव मार्ग प्रशस्त भेल अछि, जाहिसँ ई एक सशक्त विधाक रूपमे चर्चित-अर्चित भऽ रहल अछि। प्रथम विसशव-युद्धक पश्चात् कांग्रेसक नेतृत्वमे राजनीतिक चेतनाक जागरण भेल संगहि सामाजिक आऽ आर्थिक आन्दोलनक जन्म भेल। उपन्यासकार जमीन्दारीक अत्याचार, दरिद्र किसान, अंग्रेज शासक नीति, नागरिक जीवन, नारी समस्या, समाजमे व्याप्त कुसंस्कार, विवाह प्रथा, शिक्षा आदि अनेक विषयकेँ लऽ कए उपन्यासक निर्माण कयलनि। मिथिलांचलक ग्रामीण जीवनक चित्रणक प्रमुखता आरम्भिक कालमे अवश्य रहलैक, किन्तु आब ओहिमे शहरी मध्यवर्गक मजदूरक जीवनक आर्थिक, राजनैतिक आऽ मनोवैज्ञानिक समस्याक प्रमुखता भऽ गेल अछि। एहि दृष्टिएँ उपन्यास क्षेत्रमे अनेक प्रयोग भेल अछि तथा पाश्चात्य विचरक प्रभाव साहित्यपर स्पष्ट लक्षित भऽ रहल अछि। अधुनातन समयमे मैथिलीक अनेक आधुनिक जीवनक विसंगति, अनेक जटिल राजनीतिक, आर्थिक आऽ मनोवैज्ञानिक यथार्थताकेँ लऽ कए अपन कृतिक निर्माण कऽ रहक छथि आऽ शैली आऽ व्यक्तित्वक दृष्टिसँ नवीनता उद्भासित कऽ रहल छथि।
(अनुवर्तते)