बीसम शताब्दी: मैथिली साहित्यक स्वर्णिम युग (आगाँ)
कथा
साहित्यिक विधानमे कथा नवीनतम अछि। मैथिली कथा-साहित्यक इतिहास पूर्णरूपेण बीसम शताब्दीक देन थिक, जकर विकास तीतीय दशकक पूर्व नहि भऽ सकल छल। प्रारम्भमे संस्कृत कथाक रूपान्तरण प्रकाशित भेल। मैथिली कथा-साहित्यकेँ लोकप्रिय बनयबाक श्रेय अछि मैथिलीक पत्रिकादिकेँ। मैथिली कथामे परिवर्तनक सूत्रपात होइत अछि विगत शताब्दीक द्वितीय दशकक पश्चात् जाऽ कऽ। मैथिली कथा साहित्यपर विचार करैत एकरा निम्नस्थ कालखण्डमे विभाजित कयल जाऽ सकैछ।
१. प्रारम्भ युग- १९२० ई.सँ १९३५ ई.
२. प्रगति युग १९३६ ई. सँ १९४६ ई.
३. प्रयोग युग १९४७ ई.क पश्चात्
स्वाधीनता पूर्वमे कतिपय कथाकार साहित्यमे प्रवेश कयलनि, किन्तु हुनक परिपक्व कथा स्वाधीनताक पश्चात् प्रकशमे आयल। देशक स्वाधीन भेलाक पश्चात् मैथिली कथामे तीव्र विकास भेल। मैथिली गल्प-साहित्यक विकासमे पत्रिकादिक योगदान सर्वाधिक रहल अछि। प्रत्येक पत्रिकक रुझान साधारणतः कथा दिस रहल अछि। अतः नव-नव कथाक रचनाक संगहि-संग नव-नव कथाकारक आविर्भाव अत्यन्त द्रुत गतिएँ भेल। अति आधुनिक कथा-साहित्यमे जाहि नवयुवक कथाकारक अवदान अछि ओऽ गल्प वाङमयक जे मानदण्ड अछि ओकर सम्यक् परिचय रखैत गल्प रचनामे संलग्न भेलाह।
शनैः-शनैः सामाजिक जीवनमे घटित भेनिहार साधारण घटनाकेँ आधार बना कऽ कथाक रचना भेल तथा यथार्थवादी आऽ कल्पना प्रसूत कथाक दुइ धारा जकर प्रवर्तक हरिमोहन झा एवं व्रजकिशोर वर्मा “मणिपद्म” कयलनि जाहिमे राजकमल (१९२९-१९६७), ललित (१९३२-१९८३), मायानन्द (१९३४), प्रभास कुमार चौधरी (१९४१-१९९८) आदि कतिपय कथाकार योगदान छलनि। उपर्युक्त कथाकार लोकनिमे सामाजिक चेतना छलनि आऽ हुनका सभक कथा-आदर्श पूर्ण संवेदनशीलताक विशेष गुण आऽ मनोविज्ञानक हल्लुक पुट अछि। परवर्ती कथाकार लोकनि रोमांसपूर्ण कथाक सर्जन कयलनि। युग-संधिक उत्कर्ष बेलाक कथाकार जीवनक कथानक चुनलनि, मध्यवर्गक जीर्ण-जीवनक वर्णन कयलनि, व्यक्तिक मनक विश्लेषण कयलनि, स्त्री-पुरुषक प्रेमक चित्रण कयलनि आऽ आधुनिक जीवनक मानसिक आऽ भौतिक विषमताक पार्श्वभूमिपर अपन कथाकेँ आधारित कयलनि।
मैथिली कथा साहित्यक क्षेत्र व्यापक भेल त्तथा मूल्य एवं दृष्टिकोणमे परिवर्तनक संग विषय-वस्तुमे अधिक वैविध्य आयल अछि। सत्तरिक दशकमे कथा सभमे यथार्थवादी एवं व्यक्तिवादी स्वर तीख आऽ सुस्पष्ट भेल। मैथिली कथाक प्रमुख भाग सामाजिक कथा थिक। सामाजिक जीवन एवं विचारधारामे परिवर्तनकेँ चित्रित कयनिहार कथाक रचना भेल। सामाजिक संरचना, परिवार एवं व्यक्तिगत जीवनक विभिन्न पक्षमे भऽ रहल परिवर्तनक यथार्थ निष्ठ चित्रण कथाकार लोकनि कयलनि अछि। मैथिलीमे लघु कथा, व्यंग्य कथा, लोक कथा इत्यादि विविध रोपक रचना सेहो भेल अछि। सर्वविध मैथिली कथा साहित्यक सम्वर्द्धक कथाकार लोकनिक सक्रिय सहभागिताक फलस्वरूप ई एक सुविकसित विधाक रूपमे अपन स्थान सुरक्षित कऽ लेलक अछि।
नाटक-एकांकी
विगत शताब्दी मैथिली नाटक-एकांकीक हेतु एक क्रान्तिकारी युगक रूपमे प्रस्तुत भेल। आधुनिक मैथिली नाट्य जगत जखन अन्धकारमे टापर-टोइया दऽ रहल छल तखन युग-पुरुष जीवन झा गद्यक नव-ज्योतिसँ सम्पूर्ण मैथिली नाट्य-साहित्यकेँ आलोकित कयलनि। आधुनिक मैथिली नाटकक जन्म एही शताब्दीमे भेल जकरा प्रवर्तन कयलनि कीर्ति-पुरुष जीवन झा। ई मैथिली गद्यक महान उन्नायक रहथि। ओऽ गद्यकेँ नवीन स्वरूप प्रदान कयलनि। अपन नाट्यादिक माध्यमे मैथिली गद्यक मंगल द्वारकेँ खोललनि तथा भविष्यक नाटककारकेँ एक नव प्रेरणा देलनि। मैथिलीमे उच्च कोटिक नाट्य-साहित्यक निर्माण कार्य विगत शताब्दीक अनुपम उपहार एहि साहित्यकेँ भेटलैक। विगत शताब्दीक नाटककार जीवनक विभिन्न क्षेत्रसँ सामग्री ग्रहण कऽ कए सामाजिक, धार्मिक, विशुद्ध साहित्यिक, पौराणिक आऽ राष्ट्रीय एवं राजनीतिक नाटकक परम्पराकेँ जन्म देलनि आऽ भारतीय नवोत्थानकालीन भावनाक प्रचार कयलनि। जीवन झाक पश्चात् मैथिलीक दोसर नाटककार साहित्य रत्नाकर मुंशी रघुनन्दन दास आऽ पण्डित लालदास आऽ हुनका सभक पश्चातो नाटकक क्षेत्रमे एहि परम्पराक निर्वाह होइत रहल। देशक आवश्यकतानुसार विगत शताब्दीमे ऐतिहासिक नाटकक रचना भेल। पौराणिक कथाकेँ नव-ढ़ंगे प्रतिपादित कयल जाय लागल। मैथिलीक किछु नाटककार प्रतीकात्मक नाटकक रचना कयलनि, किन्तु ई परम्परा अधिक पुष्ट नहि भऽ सकल। यद्यपि गीति नाट्यक रचना सेहो विगत शताब्दीमे भेल तथापि मैथिलीमे सुन्दर गीति-नाट्यक रूपमे सोमदेव (१९३४-) क “चरैवेति” (१९८२) एक प्रतिमान प्रस्तुत करैछ। विवेच्य कालावधिमे समस्या नाटकक रचना भेल अछि। यूरोपीय प्रभावक अन्तर्गत समस्या नाटकमे बुद्धिवादक आधारपर सामाजिक, व्यक्तिगत तथा जीवनक अन्य क्षेत्रमे व्यर्थक आडम्बर आऽ वाह्याचार तथा परम्परा पालनक विरोध कयल गेल अछि। किन्तु मैथिलीक समस्या नाटकक बुद्धिवाद कूंडित आऽ ओकर क्षेत्र सीमित अछि, जाहिमे जार्ज बर्नाड शॉ आऽ हेनरिक इब्सनक तीक्ष्ण दृष्टिक अभाव अछि। ओहुना ई परम्परा मैथिलीमे विकसित नहि भेल अछि।
आलोच्यकालमे रंगमंचक अभावक कारणेँ एकर प्रगतिमे बाधक सिद्ध भेल अछि। मैथिलीमे एक साधु अभिनयशाला नहि भेलासँ पाठ्य साहित्यक विकासक गति एक विशेष दिशामे झुकि गेल अर्थात् एहन नाटकक निर्माण होइत रहल जे साहित्यिक आनन्दक दृष्टिएँ सुन्दर रचना थिक, किन्तु रंगमंचीय विधानक दृष्टिएँ दोषपूर्ण अछि। विगत शताब्दीक नाट्य-साहित्यपर विवेचन करबाकाल मात्र रंगमंचपर ध्यान नहि देबाक चाही। जँ रंगमंचकेँ नाटकक कसौटी मानि लेल जाए तँ विश्वक अनेक प्रसिद्ध नाटकादिकेँ नाटकक श्रेणीसँ निष्कासित करए पड़त। शैलीक दृष्टिसँ मैथिली नाट्य साहित्य पूर्व आऽ पश्चिमकेँ लऽ कए चलल छल, किन्तु शनैः-शनैः ओऽ पश्चिमाभिमुख अधिक भऽ गेल अछि आऽ भारतीय तत्त्व नगण्य भेल जाऽ रहल अछि।
विगत शताब्दीक चतुर्थ दशकमे साहित्य रत्नाकर मुंशी रघुनन्दन दासकेँ श्रेय आऽ प्रेय दुनू छनि जे मैथिलीमे एकांकी रचनाक शुभारम्भ कयलनि जे पश्चात् जाऽ कऽ एक सबल प्राणवन्त विधाक रूपमे पल्लवित भेल। वर्तमान समयमे एकांकी लिखल जाऽ रहल अछि अवश्य, किन्तु किछु अपवादकेँ छोड़ि कऽ एकांकीक वास्तविक कलाक कसौटीपर खरारहनिहार एकांकीक अनुसंधान करबा-काल निराश होमए पड़ैछ। पृष्ठभूमि, वातावरण आऽ कार्य व्यापारक अभाव प्रायः सभ एकांकीमे भेटैछ। एकर उद्देश्यक परिधि विस्तृत अछि। ओऽ सामाजिक, ऐतिहासिक, राष्ट्रीय, मनोवैज्ञानिक, हास्य-व्यंग्यपूर्ण आदि अनेक उद्देश्यकेँ लऽ कए लिखल गेल अछि। वैश्वीकरणक फलस्वरूप आधुनिक जीवनक विडम्बनापर गम्भीर प्रहार करब एकांकीकारक कर्तव्य भऽ गेलनि अछि। रेडियो आऽ टेलीभीजनक कारणेँ नाटकक नवीनतम रूप ध्वनि रूपकमे भेटैछ, जकर टेकनिक एकांकीक टेकनिकसँ भिन्न होइछ। रंगमंचीय कलाक दृष्टिसँ एकांकीक ध्वनि रूपककेँ आघात पहुँचबाक पूर्ण सम्भावना अछि, ओहिना जेना फिल्मक प्रचारसँ नाट्यकलाकेँ क्षति पहुँचल अछि।
निबन्ध
भारतीय समाजमे एक नव सांस्कृतिक आऽ राजनैतिक चेतनाक उदय, पत्रिकाक प्रकाशन, साधारण विषय, सामाजिक आन्दोलनक फलस्वरूप पत्रिकाक संग जाहि साहित्यरूपक जन्मक संगहि ओकर स्वाभाव पत्रकारिताक विशेषताक झलक भेटैछ। विषय वैविध्य, सामाजिक आऽ राजनैतिक, शैलीक रोचकता आऽ गांभीर्य, गौरवक अभाव आदि आरम्भिक निबन्धक एहन गुण अछि जे पत्रकारितासँ सम्बद्ध अछि। निबन्ध तँ ज्ञान राशिक संचित कोश थिक।
निबन्धकार समाजक भाष्यकार आऽ आलोचक सेहो होइत छथि। अतएव सामाजिक परिस्थितिक जेहन प्रभाव निबन्धमे देखबामे अबैछ ओऽ साहित्यक अन्य रूपमे नहि। विवेच्य कालावधिमे निबन्धक विषय जीवनक अनेक क्षेत्रसँ लेल गेल तुच्छसँ तुच्छ तथा गम्भीरसँ गम्भीर विषयपर निबन्ध उपलब्ध होइछ। यद्यपि ओहिमे चिन्तन-मननक गम्भीरताक अभाव अछि तथापि ओकर सामाजिक चेतना व्यापक छल। समयानुकूल विविध विषयपर बिनु कोनो पूर्वाग्रहक स्वच्छन्द भऽ कए निबन्धकार आत्मीयताक संग अपन हृदय पाठकक समक्ष रखलनि। बिनु कोनो संकोचक विदेशी शासक वा शोषककेँ डाँटि-फटकारि सकैत रहथि तँ अपना ओतयक पण्डित मुल्ला आऽ पुरान शास्त्रकार धरि हुनक कठहुज्जतिपर नीक अधलाह कहलनि। निबन्धकार एक भाग आतुर वा प्रवाह पतित परिवर्त्तनवादी अंग्रेजी सभ्यताक गुलामक खबरि लेलनि तँ दोसर भाग नूतनता भीरू रुढ़िवादीक भर्त्सना कयलनि।
विगत शताब्दीमे गद्य शैलीक निर्माण निबन्धकारक वैयक्तिक प्रयासक प्रतिफल थिक। भाषाक दृष्टिएँ तत्कालीन निबन्धकार लोकनिमे सामूहिक भाव –कॉरपोरेट सेन्स- क अभाव छल। गद्यक कोनो स्वीकृत रूप नहि भेलाक कारणेँ ओकर भाषा सार्वजनिक रूप नहि प्राप्त कऽ सकल। आलोच्य्कालक आरम्भिक निबन्धमे विषय आऽ शैलीक दृष्टिएँ वैविध्य भेटैछ।
शनैः-शनैः निबन्धमे पत्रकारिताक स्वच्छन्दता क्षीण होमय लागल। पत्रिकाक संख्या बढ़लाक कारणेँ साप्ताहिक, मासिक एवं त्रैमासिक पत्रक दूरी बढ़ैत गेल आऽ निबन्धकार शनैः-शनैः शिक्षित आऽ शिष्ट समाजक समीप अबैत गेलाह। पश्चात् जाऽ कऽ गम्भीर विषयपर निबन्ध लिखल जाय लागल जाहिसँ ओकर रूप-रंग गम्भीर भऽ गेलैक। साहित्यिक समालोचनात्मक निबन्धक धारा जतेक पुष्ट भेल ओतेक रचना विषयक नियमानुवर्तिता छोड़ि कऽ नव ढ़ंगसँ कम अधिक स्वच्छन्दतापूर्वक शैलीमे निबन्ध नहि लिखल गेल।
हरिमोहन झा प्रचुर परिमाणमे व्यंग्य प्रधान निबन्धक रचना कयलनि जकर विकास युग सन्धिक उत्कर्ष बेलामे भऽ रहल अछि। व्यंग्यक मूल वृत्ति सामाजिक वातावरणक विशिष्ट सन्दर्भमे आलोचना भऽ रहल अछि। एकरा मूलमे नव सामाजिक चेतना आऽ ओहिसँ उत्पन्न आलोचना वृत्ति प्रखर व्यंग्यक रूप धारण कऽ कए एहन निबन्धमे अबैत अछि। एहन निबन्धकार लैंब आऽ लूकसक अपेक्षा, प्रवृत्तिक विचारसँ चेस्टरटन, प्रत्युत स्विफटक अधिक समीप छथि। मैथिली निबन्ध अपन अत्यल्प जीवनकालमे कोन प्रकारेँ विविध रूप-रंगमे विगत शताब्दीसँ विकसित होइत आयल जे आगाँ साहित्यमे विषय-नैविध्य जहिना-जहिना विकसित होइत जायत तहिना-तहिना भावी पीढ़ीक निबन्धकार बढ़ैत जयतह।
पठन-पाठनमे स्वीकृति
एकर प्राचीन साहित्यक गौरव-गरिमासँ अवगत भऽ कए विगत शताब्दीक द्वितीय दशकमे आधुनिक भारतक प्राचीनतम कलकत्ता विश्वविद्यालयमे प्रथमे-प्रथम मैथिली भाषा आऽ साहित्यक एम.ए. स्तर धरि पठन-पाठनक शुभारम्भ कएलनि सर आशुतोष मुखर्जी (१८६४-१९२४) आधुनिक भारतीय भाषा विभागक अन्तर्गत। तत्पश्चात् आलोच्य शताब्दीक शष्ठ दशकक पूर्वार्द्धमे पटना विश्वविद्यालयक संगहि संग बिहारक अन्यान्य विश्वविद्यालयमे सेहो एकर पठन-पाठनक व्यवस्था भेलैक। शिक्षण संस्थानमे मैथिलीक मान्यता भेटलाक पश्चात् साहित्यकार लोकनिक दायित्व बढ़लनि जे एहि निमित्त तदनुरूप पाठ्य-ग्रन्थक निर्माणार्थ ओऽ सभ सक्रिय भेलाह आऽ सहित्यान्तर्गत नव स्पन्दनक प्रादुर्भाव भेल।
पत्रिका
पुनर्जागरणक एहि प्रवृत्तिक मैथिलीक सचेष्ट मनीषी तपः सपूत संघर्षरत भऽ साहित्यक नव निर्माणक दिशामे उन्मुख भेलाह। एहिमे सन्देह नहि जे प्रगतिशील आऽ सामान्य पूर्वाग्रह मुक्त शिक्षित समाजकेँ वाणी देबाक निमित्त प्रवासी मातृभाषानुरागी लोकनिक सत्प्रयाससँ जयपुरसँ “मैथिल हितसाधन” (१९०५) तथा काशीसँ “मिथिला मोद” (१९०६) क प्रकाशनक शुभारम्भ भेलैक, जकरा एक क्रान्तिकारी डेग कहल जाऽ सकैछ, जे गद्य साहित्यक गतिविधिसँ पाठककेँ परिचय करौलनि। एकरा माध्यमे सामयिक साहित्यिक परम्पराक अध्ययन, चिन्तन आऽ मननक क्रम स्वाभाविक आऽ वांछनीय नहि, प्रत्युत भविष्यक हेतु मार्ग निर्देश करबाक, रुढ़ि आऽ विश्वास, शास्त्रीय मान्यतादिक मूल्यांकन करबाक, युगक नवीन आवश्यकता आऽ परखबाक दृष्टिएँ अत्यावश्यक छ्ल। एहि दृष्टिएँ साहित्य निर्माता आऽ अध्येता एक दोसराक समीप आबि गेलाह आऽ कोनो ठोस वस्तु प्राप्ति करबाक प्रशस्त मार्गक निर्माण कयलनि। एक नव शक्ति उद्भाषित भेल, पर्युषितक स्थान अपर्युषितक जन्म भेल। एकर जोरदार प्रभाव पड़लैक मिथिलांचलक मैथिल समुदायपर जे ओऽ सभ एहिसँ अनुप्राणित भऽ दरभंगासँ “मिथिला मिहिर” (१९०९-) क प्रकाशनक शुभारम्भ कयलनि जे विगत शताब्दीक नवम दशक धरि अनवरत चलैत रहल जे पाठकक संगहि लेखक वर्गक सबल दल तैयार कयलक आऽ ओकर नवीनतम अंक देखबाक निमित्त जहिना पाठकमे उत्सुकता रहैत छलनि तहिना लेखक लोकनि में सेहो औत्सुक्य रहैत छलनि जे हुनक कोन रचना प्रकाशित भेल अछि।
मैथिली पत्रकारिताक दोसर चरणक प्रारम्भ प्रथम विश्वयुद्ध (१९१४-१९१८) क पश्चात् प्रारम्भ भेल। एहि समयमे सामाजिक, बौद्धिक आऽ औद्योगिक विकासक रचनात्मक कार्यक्रम हेतु मेधावी जनशक्तिक लोप भऽ गेलैक। विश्व-युद्धक समाप्तिक पश्चात् लोकक मोह भंग भऽ गेलैक जे विदेशी आधिपत्यक चापसँ किछु आशा कऽ रहल रहथि। एहि निराशासँ १९२० ई. मे राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी द्वारा समाज सुधार आऽ असहयोग आन्दोलनक शुभारम्भ मिथिलांचलक चम्पार्णसँ भेल। एहि आन्दोलनक हेतु परिस्थिति अनुकूल भेल अपन किछु गम्भीर मन, देशी लोकक विपरीत एहि आन्दोलनक स्वागत सोत्साह कयलनि आऽ मैथिली पत्रिका आलोच्य कालक तृतेय दशाब्दमे प्रकाशनक पथपर अग्रसर भेल।
मैथिली पत्रिकाक तेसर चरणक शुभारम्भ आलोच्य शताब्दीक चतुर्थ दशकमे गवर्नमेंट ऑफ इण्डिया एक्ट (१९३५) द्वारा देशमे संवैधानिक परिवर्तनसँ भेल। एहि समयक अवसान बेलामे द्वितीय विश्व-युद्ध (१९३९-१९४५) प्रारम्भ भेलैक तथा कतिपय नव-नव पत्रिका साहित्य जगतमे प्रवेश कयलक। विगत शताब्दीक षष्ठ दशकमे अनेक पत्रिका प्रकाशित भेल जाहिमे वैदेही (१९५०) एवं मिथिला दर्शन (१९५३) मैथिली साहित्यक नव-निर्माण अहम् भूमिकाक निर्माणे नहि कएलक प्रत्युत रचनाकारक संगहि पाठक वर्गक निर्माण कयलक। युग सन्धिक उत्कर्ष बेलामे गोट बीसेक पत्रिका चलि रहल अछि जाहिमे कोलकातासँ प्रकाशित कर्णामृत विगत २६ वर्षसँ अनवरत चलि रहल अछि, किन्तु शेष पत्रिकादि कखन काल कवलित भऽ जायत ओऽ तँ भविष्यपर निर्भर करैछ।
प्रकाशन
विगत एवं वर्तमान सहस्राब्दी मैथिलीक जे उत्कर्ष जनमानसक समक्ष प्रस्तुत अछि तकर ज्वलन्त साक्षी थिक जे साहित्य निर्माताक संगहि संग प्रकाशनक सौविध्यक फलस्वरूप मैथिली साहित्यमे विपुल परिमाणमे गद्य-पद्य साहित्यक प्रकाशन भेल अछि, तकर श्रेय आऽ प्रेय मैथिली अकादमी आऽ साहित्य अकादमीकेँ छैक। मैथिली अकादमी द्वारा विविध विधादिक स्तरीय ग्रंथ अद्यापि लगभग अढ़ाय सय तथा साहित्य अकादेमी द्वारा डेढ़ सय ग्रन्थक प्रकाशन भऽ सकल अछि। एहि दृष्टिसँ कोलकाताक प्रवासी संस्थादिकेँ छैक जे ओतएसँ विविध-विधादिक सहस्राधिक मौलिक अनूदित पुस्तकक प्रकाशन संभव भऽ सकल अछि जे एक प्रतिमान प्रस्तुत करैछ। एहि दिशामे चेतना समिति अर्द्ध शतकसँ बेशी पुस्तकक प्रकाशन कयलक अछि जे उल्लेख्य योग्य अछि। वर्तमान परिप्रेक्ष्यमे प्रयोजन अछि जे अन्यान्य संस्थादि जे पुस्तक प्रकाशनमे सक्रिय अछि तकर सिलसिलेवार ढ़ंगसँ पुस्तक-प्रकाशनमे सहयोग देथि। एहिसँ अतिरिक्त कतिपय साहित्यिक संस्था तथा लेखक लोकनि अपन रुचिक अनुकूल साहित्यिक प्रकाशन कऽ कए एकरा सम्वर्धित करबाक दिशामे संलग्न छथि जे एहि साहित्यक रीढ़केँ सुदृढ़ कयलक अछि। युग-सन्धिक उत्कर्ष बेलामे जेना पुस्तक प्रकाशनक बाढ़ि आबि गेल अछि।
महिला साहित्यकारक प्रादुर्भाव
स्वातन्त्र्योत्तर साहित्यान्तर्गत जनजागरणक जे मन्त्र फूकल गेल तकर महिला साहित्यकारपर अत्यन्त तीव्र प्रभाव पड़ल। विगत शताब्दीमे पुरुष लेखकक समानहि महिला लेखक प्रचुर परिमाणमे साहित्यक प्रत्येक विधामे अपन उपस्थिति दर्ज करौलनि जकरा नहि अस्वीकारल जाऽ सकैछ। शताब्दीक सन्धि बेलामे महिला साहित्यकारक कृतित्वक अवगाहनोपरान्त स्पष्ट प्रतिभाषित होइत अछि, जे हुनकामे साहित्य साधनाक अपरिमित सम्भावना छनि। हुनका सभक रचनाक क्षमता एवं गुणवत्ता दुनू दृष्टिएँ उल्लेखनीय अछि। साहित्यक क्षेत्रमे मिथिलांचलक नारी समाजक जागरण विगत शताब्दीक अर्द्धशतकक पश्चात् भेल जे सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण उपलब्धि थिक। महिलामे साहित्यिक अभिरुचि जगयबाक श्रेय छैक मैथिली पत्रिकादिकेँ जकर कतिपय उदाहरण अछि। साहित्यक कोनो एहन विधा बाकी नहि अछि जाहिमे ई लोकनि अपन हस्ताक्षर नहि कयलनि। हमरा दृष्टिएँ हुनका सभमे साहित्य-साधनाक अपरिमित सम्भावना युग सन्धिक उत्कर्षमे स्पष्ट परिलक्षित भऽ रहल अछि।
विविध गद्य
युग सन्धिक उत्कर्ष बेलामे मैथिलीमे आत्मकथा, जीवनी, यात्रा, संस्मरण, साक्षात्कार आऽ परिचर्चा विषयपर साहित्य पाठकक समक्ष आयल अछि। विभिन्न पत्रिकादिमे समय-समयपर एहन रचनादि अवश्य प्रकाशित भेल अछि, किन्तु ओऽ सभ प्रकाशनाभावक कारणेँ धूल-धूसरित भऽ रहल अछि। वर्तमान शताब्दीक प्रथम दशाब्दमे ब्रजलिशोर वर्मा “मणिपद्म”क एक अनमोल संस्मरण प्रकाशमे आयल अछि, “हुनकासँ भेट भेल छल”(२००४) जकर सम्पादन कयलनि प्रेमशंकर सिंह एवं इन्द्रमोहन लाल दास, जे अत्यधिक चर्चित-अर्चित भेल अछि। एकरा माध्यमे मिथिलाक अनेक कीर्तिपुरुषक व्यक्तित्व ओ कृतित्वक संगहि मिथिलाक सांस्कृतिक चेतना तथा गौरवमय परम्पराक चित्रण कऽ मैथिली पाठककेँ अनुप्राणित कयलनि अछि।
संस्थादिक सक्रिय सहभागिता
मैथिली साहित्यक उत्कर्ष बेलामे विगत शताब्दीमे मातृभाषानुरागी लोकनिक सक्रिय सहभागिताक फलस्वरूप मैथिली भाषा आऽ साहित्यक उन्नयनार्थ भारतक विभिन्न क्षेत्रमे यथा- मैथिल महासभा (१९१०), मैथिल छात्र सम्मेलन (१९१०), मैथिली क्ल्ब (१९१८), मैथिल शिक्षित समाज (१९१९), मैथिल सम्मेलन (१९२३), मैथिल युवक संघ (१९३०), मैथिली साहित्य परिषद (१९३०), मिथिला लोक संघ (१९४७), अखिल भारतीय मैथिली साहित्य समिति (१९५०), चेतना समिति (१९५४), कर्णगोष्ठी (१९७४) आदि-आदि साहित्यिक संस्थादिक प्रादुर्भूत भेल जे योजना वद्ध रूपेँ मनसा वाचा कर्मणा दत्तचित्त भऽ कार्यरत भेल, जकर फलस्वरूप एकर विकासक अवरुद्ध मार्ग शनैः-शनैः प्रशस्त होइत गेल। सन् १९४७ ई.मे विश्व लेखक सम्मेलन पी.ई.एन.मे, १९६० ई. मे इलाहाबादमे एवं १९६३ ई. मे दिल्लीमे पुस्तक प्रदर्शनीक फलस्वरूप १९६५ ई. मे साहित्य अकादेमीमे आऽ वर्तमान शताब्दीमे भारतीय संविधानमे एहि भाषा आऽ साहित्यकेँ अष्टम अनुसूचीमे एक प्राचीन भाषाक रूपमे मान्यता भेटलाक तत्पश्चात् एकर विकासक गति तीव्रतर होइत गेल।
वर्तमान परिप्रेक्ष्यमे प्रयोजन अछि जे समग्र संस्थादिक सिलसिलेवार ढ़्गसँ अनुसंधान कऽ कए तथ्योपलब्ध ऐतिहासिक वृत्तिक लेखा-जोखा प्रस्तुत कयल जाय जे भावी पीढ़ीकेँ ई दिशा निर्देश करत। एहि प्रकारक संस्थादिक संख्या बड़ विशाल अछि तेँ ऐतिहासिक वृत्तिक लेखा-जोखा करब आवश्यक अछि।
निःसारण
युग-सन्धिक उत्कर्षबेलामे बीसम शताब्दीकेँ स्वर्णिम काल उद्घोषित करबाक पाछाँ कतिपय आर्थिक, ऐतिहासिक, धार्मिक, राजनैतिक, सांस्कृतिक आ सामाजिक तत्त्वक परिप्रेक्ष्यमे मैथिली साहित्यक उन्नयनार्थ जे क्रिया-कलाप भेल तकर वास्तविक रूपेँ विवरण प्रस्तुत करब एक दुर्वह कार्य थिक तथापि साहित्यिक गवाक्षसँ उल्लेख योग्य परिस्थिति एवं परिवेशमे एकरा स्वर्णिम काल उद्घोषित करबाक उपक्रम कयल गेल अछि। विगत शताब्दीक मैथिली साहित्य जाहि सजीवता, प्रतिभा आऽ विभिन्न विचारादर्श आऽ गतिविधिक परिचय दैत अछि ओकर जड़िमे जाहि प्रकारेँ उन्नैसम शताब्दीक उत्तरार्धमे जमल ओहिना बीसम शताब्दीक उत्तरार्धक बौद्धिक क्रियाशीलताक पूर्वाभास हमरा भेटैछ।
वर्तमान परिप्रेक्ष्यमे ई श्रेय आऽ प्रेय बीसम शताब्दीकेँ छैक जे आलोच्य कालक सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण उपलब्धि थिक गद्य-साहित्य। जतय एक भाग परम्परागत मैथिली साहित्य अपन बन्धनमे बरोबरि बन्हने रहल आऽ अपनाकेँ मेटबैत रहल ओतय निश्चये अभूतपूर्व आऽ निस्सन्देह गद्यक रूपमे प्रतिष्ठित भेल। आलोच्य कालीन गद्य मैथिली साहित्यमे एक नव युगक अवतरण कयलक। साहित्येतिहासमे क्रमबद्ध परम्परा एहि शताब्दीक महत्वपूर्ण अवदान थिक जे अपन भविष्यक प्रति आशाक सम्बल लेने साहित्यमे प्रवेश कयलक आऽ ओकर शब्दकोशमे आश्चर्यजनक वृद्धि भेलैक। वस्तुतः आलोच्य शताब्दी गद्य-युग थिक जे अवतारणा आलोच्यकालीन गद्य थिक।
युगसन्धिक उन्मेषबेलामे गद्य जगतक संगहि संग काव्य जगतक अभूतपूर्व समागम एहि कालावधिमे भेल जे मैथिली साहित्यान्तर्गत कतिपय नव-नव विधादिक जन्म भेलैक, ओकर संस्कार भेलैक आऽ ओकर प्रचार-प्रसार द्रुतगतिएँ भेलैक आऽ भऽ रहल अछि जे वर्तमान सन्दर्भमे ओऽ साहित्यक सर्वाधिक प्रमुख अंग बनि कऽ अपन अस्तित्वकेँ सुरक्षित कयलक आऽ लोकप्रिय भऽ गेल अछि। वर्तमानमे साहित्यक कोनो एहन विधा नहि अछि जाहिमे तिल-तिल नूतनताक संचार नहि भऽ रहल हो आऽ साहित्य नव स्पंदनसँ भरि गेल अछि। वर्तमान समयमे हमरा लोकनि अपन मातृभाषाक अत्यन्त समीपमे छी आऽ एहिमे कतिपय उलझन आऽ सन्देहपूर्ण स्थल अछि। तथापि निस्सन्देह कहल जा सकैछ जे मैथिली जीवनक सहस्राब्दीक कालावधि मानसिक उथल-पुथल आऽ बौद्धिक क्रान्तिक संधि-स्थल थिक। विविध-धारा अन्तर्धाराक बीच वर्तमानमे हम मैतिली साहित्यक संधि स्थलपर स्थिर भऽ नवयुगक आशा भरल प्रतीक्षा कऽ रहल छी। गेटेक कथन छनि “वी बिड यू होप”- इतिहास हमरा एहिसँ नीक संदेश नहि दऽ सकैछ।