मिथिलांचलक शाक्त क्षेत्र- डॉ प्रफुल्ल कुमार सिंह “मौन”
सृष्टि रहस्यावृत्त अछि आर ’धर्मस्य तत्वं निहितं गुहायां’ , मुदा सृष्टिक मूलमे पृथ्वी (क्षिति), जल, अग्नि (पावक), आकाश (अंतरिक्ष) एवं वायुक तात्विक अवस्थिति सर्वमान्य अछि। वैदिक साहित्यमे पृथ्वीकेँ माता ओऽ मनुष्यकेँ पृथ्वीपुत्र कहल गेल अछि। ऋगवेदक “पृथ्वी सूक्त” ओ “नदी सूक्त” मे हुनक देवीत्वक स्तुतिगान भेल अछि। पृथ्वी ओ जलक प्रजनन शक्ति अर्थात् ओहिसँ उद्भूत चेतनशील जीवन जगत मनुष्यक लेल कौतुहलक विषय छल, श्रद्धा ओ भक्तिक विषय छल। अहिठामसँ शक्तिक प्रति निरन्तर चिन्तनक परिणामस्वरूप हुनकासँ आरोग्य, संतति, सुख-समृद्धि एवं संरक्षणक कामना कयल जाइछ।
मातृदेवीक रूपमे पृथ्वी (भूदेवी)क परिकल्पना सर्वप्राचीन अछि। विश्वक प्रायः समस्त प्राचीन सभ्यता ओ संस्कृतिक उद्गम नदी-धारी मानल गेल अछि, मोहनजोदड़ो, हड़प्पा, काली-बंगा, मिश्र, मेसोपोटामिया आदिसँ प्राप्त मातृदेवीक प्राक् ऐतिहासिक मृणमूर्तिसभक पुरावशेष एकर ज्वलंत उदाहरण अछि। एवं प्रकारे पृथ्वी ओ जलमे देवत्वक अवधारणा पूर्व वैदिक युगक आर्येतर अवधारणा थिक। आर्य लोकनिकेँ अपन प्रभुत्व विस्तारक क्रमे अनेक युद्ध (देवासुर संग्राम अर्थात् इन्द्र-वृत्रासुर, महिषासुर वध, कालिय-दमन, राम-रावण युद्ध, गजासुर वध आदिक परम्परित श्रुति ओ साहित्यिक अंतः साक्ष्य उपलभ्य अछि। तदनुसार आर्यलोकनि आर्येतरक शाक्त अवधारणाकेँ समूल नष्ट नहि कऽ ओकरा परिष्कृत कऽ अंगीकार कयलनि। पृथ्वी ओ नदी (गंगा, यमुना, सरस्वतीक समानान्तर मिथिलांचलक कमला, कोशी, जीबछ) मे देवीत्व एवं अग्नि ओ वायुमे देवत्वक प्रतिष्ठापन कयल गेल। आकाश (अंतरिक्ष) तँ अहि देवी-देवताक विहार क्षेत्र अछि। आजुक वैज्ञानिक लोकनिक लेल अंतरिक्ष शोध-बोधक विहार क्षेत्र बनि गेल अछि। शतपथ ब्राह्मणक अंतः साक्ष्यक अनुसार वैदिक आर्यलोकनि अग्निपूजक छलाह।
आध्यात्मिक चेतनाक विकासक क्रममे शक्तिक विकास एवं विस्तार सप्तमातृका, दशमहाविद्या, चौसठ योगिनी आदिक रूपमे भेल देखना जाइछ। भारतीय मूर्तिकलाक इतिहासमे एक फलकपर सप्त मातृकाक शिल्पांकन कुषाणकालमे आरम्भ भऽ गेल छल- ब्रह्माणी, वैष्णवी, माहेश्वरी, वाराही, कौमारी, इन्द्राणी ओ चामुण्डा। एकर समानान्तर मिथिलांचलक जन-जीवनमे पूजित सप्तमातृकाक नामावली भिन्न छैक एवं हुनक लोकोपासना सातटा पिण्डक आदिम रूपमे प्रचलित अछि, जे सप्तपिण्डी अथवा सप्तवेदीक रूपमे अभिज्ञात अछि।
दोसर विकासक्रममे अबैत अछि दशमहाविद्या अर्थात् काली, तारा, षोड़सी (त्रिपुर सुन्दरी), छिन्नमस्ता, बगला, कमला (लक्ष्मी), मातंगी, भुवनेश्वरी, भैरवी ओ धूमावती-
काली तारा छिन्नमस्ता सुन्दरी बगला रमा।
मातङ्गी भुवनेश्वरी सिद्धविद्या च भैरवी।
धूमावती च दशमी महाविद्या दशस्मृता॥–पुरश्चर्यार्णव शाक्त सम्प्रदायमे जाहि दस प्रधान रूपक ब्रह्मक उपासना होइछ, ओकरा महाविद्या कहल जाइछ। अहि विद्याक दू टा प्रधान मार्ग अछि, योग एवं तंत्र।
तेसर विकासक्रममे अबैत अछि चौसठ योगिनी। चौंसठ योगिनीक मध्यकालीन मन्दिर वाराणसी (उत्तर प्रदेश), भेड़ाघाट (मध्य-प्रदेश), हीरापुर (उड़ीसा) आदि स्थानसभमे पाओल जाइछ। मिथिलांचलक सहरसाक (मत्स्यगंधा परिसर) पिरामिडनुमा स्थापत्य (मन्दिर)मे निम्नलिखित चौंसठ योगिनीक संग बटुक भैरवक मूर्तिसभ प्रतिष्ठापित अछि- माया, कुष्माण्डा, नर्मदा, यमुना, क्रान्ति, वृद्धि, गौरी, ऐन्द्री, वाराही, रणवीरा, मूरति, वैष्णवी, ज्वालामुखी, अजिता, चर्चिका, मार्जारी, डाकिनी, घण्टकर्णा, घटवरा, विकराली, जयन्ती, सरस्वती, कावेरी, मालुका, नारसिंही, श्री, विकटा, व्रजेश्वरी, कौमारी, महामाया, सुरपूजिता, ईश्वरी, सर्पस्या, यशा, वैवस्वती, रुद्रकाली, मातंगी, जयावती, अभया, माहेश्वरी, कामाक्षी, मयूरी, कपालिनी, तुष्टि, काली, उमा, रौद्री, अम्बिका, ब्रह्माणी, अश्वमुखी, आग्नेयी, अग्निहोत्री, अदिति, चन्द्रकान्ता, चामुण्डा, गंगा, मारुति, धूमावती, गान्धारी, अपराजिता, विमोहिनी, सूर्यपुत्री एवं वायुवेगा।
कालिकापुराणक अनुसार भगवती स्वेच्छया भिन्न-भिन्न उद्देश्यसँ विभिन्न अवसरपर चौंसठ रूपमे अवतरित भऽ योगिनीक रूपमे पूजित भेलीह। सृष्टिक सृजन, पालन एवं संहार हेतु त्रिधारूपमे अवधारित महालक्ष्मी, महासरस्वती एवं महाकालीसँ उद्भूत नाना शक्तिरूपा योगिनी सभ धन, यश, विद्या, बुद्धि, शौर्य-पराक्रम, आरोग्य ओ मोक्षदायिनी मानल जाइत छथि। उपरोक्त नामावलीमे ऐन्द्री, वाराही, वैष्णवी, माहेश्वरी, ब्रह्माणी ओ चामुण्डा, दशमहाविद्यामे एवं किछु सप्तमातृकामे सेहो परिगणित छथि। गंगा, यमुना, सरस्वती ओ कावेरी मूलतः नदी देवी छथि। कामाक्षीक स्वतंत्र तांत्रिक पूजोपासना कामरूप (असम)क कामाख्या एवं नेपाल उपत्यकाक गुह्येश्वरीमे परम्परित अछि। कुष्माण्डा, नवदुर्गाक एकटा रूप थिक मुदा योगिनीरूपेँ प्रतिष्ठित वराहविष्णुक शक्ति वाराहीक स्वतंत्र पालकालीन प्रस्तर मूर्ति पुनामा प्रतापनगर (नौगछिया, भागलपुर), ज्वालामुखी बनाम जालपाक मूर्ति लगुराँव (महुआ, वैशाली), डाकिनीक पूजन खुरहान (आलमनगर, मधेपुरा) आदि माता अम्बा बनाम अम्बिकाक पूजन आमी (दिघवारा, सारण), चामुण्डा पूजन कटरा (मुजफ्फरपुर), पचही, वरैपुरा, पचम्बा (बेगुसराय) आदिक प्राचीन प्रस्तर प्रतिमा सभमे उपलभ्य अछि। जयावतीक पूजा नाग देवी जयाक रूपमे एवं नदी देवीक रूपमे गंगा ओ यमुनाक स्वतंत्र पूजन परम्परा, बरसाम (मधुबनी), नगरडीह (दरभंगा), मंझौल (बेगुसराय) आदिक अलावा अन्धराठाढ़ी (मधुबनी) ओ महिषी (सहरसा)क मन्दिर स्थापत्यक एवं अलंकरणक रूपमे प्राप्य अछि। स्थापत्य अलंकरणक रूपमे गंगा-यमुनाक प्राचीनतम मूर्ति अवशेष भरहुत ओ सांची (मध्य-प्रदेश)सँ प्राप्त अछि, जकर शिल्पांकन ई.पू. दोसर-तेसर शताब्दीमे भेल छल। कौमारी कुमार कार्तिकेय शक्ति छथि। सभटा शक्ति स्वरूपा देवी अपन-अपन देवताक वाहन ओ आयुध धारित कयने छथि।
ध्यातव्य अछि जे आलोच्य शक्ति स्वरूपाक उद्भावना उद्देश्य विशेषक कारणेँ भेल छल। असुर शक्तिक संहारक हेतु सप्तमातृकाक संयुक्त शक्ति प्रतिकार हेतु प्रत्यक्ष भेल छल। दशमहाविद्याक प्रत्येक देवी शक्ति-सम्पन्न, मोक्षदायिनी, कल्याणकारिणी एवं स्वयंमे नानारूपा छथि। शक्तिहीन ब्रह्म शव ओ शक्तियुक्त भेलासँ शिव छथि। दोसर शब्दावलीमे शक्तिहीन शिव शव समान छथि अर्थात् निष्क्रिय ब्रह्मक सक्रिय, चेतन ओ जाग्रत स्वरूप काली छथि- “महाकालक शक्ति महाकाली”- परमात्मा कालश्च परः संविदि वर्तते। काली नाम पराशक्तिः सैव देवस्य गीयते”।– तंत्रलोक (बम्बई, १९२० ई.)। मिथिलांचलमे दस महाविद्याक पूजोपासना गढ़-बरुआरी (सहरसा), भीठ भगवानपुर ओ राजनगर (मधुबनी)मे होइछ। कर्णाटकालीन मूर्तिकलामे ओ सभ विन्यस्त छथि।
पं राजेश्वर झ मिथिलांचलक शक्ति-साधनाक एकटा उपक्रम मालिन कल्टक उल्लेख कएने छथि, जे लौकिक धरातलपर परम्परित अछि। मिथिलांचलमे भगवतीक तांत्रिक पूजा योगिनी ओ मालिनीक रूपमे होइछ। तांत्रिक साधनामे हिनक भूमिका महत्वपूर्ण मानल गेल अछि। तांत्रिक प्रक्रियामे ओ मार्गदर्शनक काज करैत छथि। कालान्तरमे योगिन ओ मालिन एकार्थक भऽ गेलीह। चौसठ योगिनीमे “मालिन” सेहो प्रतिष्ठित छथि। कल्याण, गोरखपुर, शक्ति उपासना अंक, जनवरी १९८७ ई. पृ.२३६)। ओऽ सिद्धिदायिनी, मोक्षदा एवं वरदायिनी मानल जाइत छथि। लौकिक अवधारणाक अनुसार मालिन भगवतीक प्रिय सेविकाक संगे तंत्र-मंत्र, योग-टोम, चमत्कारादिक माध्यमे अभीष्ट साधनमे निपुण होइत छथि। डॉ प्रफुल्ल कुमार सिंह ’मौन’ मिथिलाक लोकप्रसिद्ध मालिनसभमे कुसुमा मालिन, दौना मालिन, कोसा मालिन, रूपना मालिन, रमण अभिनन्दन ग्रन्थ, खुटौना, मधुबनी, २००४ ई. पृ.२२६-२३४)। मिथिलांचलक झिझिया नृत्य वस्तुतः तांत्रिक नृत्य थिक।
वैदिक एवं औपनिषदिक साहित्यमे अन्तर्निहित आद्याशक्तिक आश्रय लऽ पुराणसभमे शक्ति (देवी)क स्वरूप, महिमा ओ पूजोपासना-प्रक्रियाक विस्तृत वर्णन उपलभ्य अछि। शाक्त उपासनाक दृष्टिसँ पुराणकाल एवं शक्ति सभक भव्य शिल्पांकन दृष्टिसँ गुप्तकालकेँ स्वर्णयुग कहल जाइछ। पुराणसभक व्यापक प्रसारसँ शक्ति उपासनाकेँ एतेक बल भेटलैक जे जनजीवनमे ब्रह्मक पूजोपासना परब्रह्म एवं मातृब्रह्म दुनू रूपमे होमऽ लागल। देवी भागवत (३.६.२) क अनुसार मातृब्रह्म समस्त दैवीशक्तिक मूलमे छथि। मध्यकालमे आबि शक्तिक तंत्रोपासना बेस लोकप्रिय भऽ गेल। फलतः आभिजात्य स्तरपर कंकाली (भारदह, भीमनगर बराज, नेपाल, राजपरिसर, दरभंगा आदि) छिन्नमस्ता (सखरा, राजविराज, नेपाल; खुरहान, मधेपुरा; रजरप्पा, झारखंड आदि), तुलजा (नेपाल उपत्यका, राजा हरिसिंहदेव द्वारा स्थापित), हैहट्ट देवी (हावी डीह, कर्मादित्य द्वारा स्थापित), वाणेश्वरी (भंडाअरिसम, दरभंगा), त्रैलोक्य विजय (मंगरौनी, मधुबनी), उग्रतारा (महिषी, सहरसा) आदिक अतिरिक्त लोकस्तरपर बामती, गहिल, रक्तमाला, चम्पा डमौनी, नयना योगिन, गढ़ीमाइ, लुकेसरी (लोकेश्वरी) आदि देवी सभक प्रादुर्भाव भेल देखना जाइछ (हमारे लोक देवी-देवता, डॉ मौन, मुजफ्फरपुर, १९९९ ई.)। हिन्दू धर्मक अन्तर्गत तंत्रयानक विकास बज्रयानी परम्परासँ प्रभावित अछि। अधिकांश बौद्ध देवी हिन्दू देवीक प्रतिरूप अथवा समानान्तर विकसित छथि। बौद्ध देवी तारा दशमहाविद्याक द्वितीया तारा छथि। वनगाँव (सहरसाक) भगवती ओ महिषीक उग्रतारा, एवं वारी (सिंधिया, समस्तीपुर)क भगवती ओ तारा समानान्तर विकसित छथि। मंगरौनी (मधुबनी)क त्रैलोक्यविजय अष्टभुजी शक्तिरूपा छथि, मुदा शिव ओ पार्वती हुनक पैरक तर मर्दित छथि। आलोच्य मूर्तिमे बौद्धदेवीक श्रेष्ठता प्रदर्शित अछि। मुदा बौद्धदेवी प्रज्ञापारमिता हिन्दू देवी सरस्वतीक प्रतिरूप थिकीह।
मिथिला बंगाल ओ असम शक्ति साधनाक एकटा सशक्त त्रिकोण अछि। मिथिलाक धरतीपर एहि त्रिकोणकेँ महिषी (तारा), विराटपुर (चण्डी) ओ बदलाधमहारा (कात्यायनी)मे देखि सकैत छी। अधोमुखी त्रिकोण शाक्त ओ उर्ध्वमुखी त्रिकोण शैव लोकनिक साधना प्रतीक थिक। जखन विपरीत स्थितिमे आबि षटकोषक सृजन होइत अछि तखन ओ महाकाली ओ महाकालक संयुक्त भेने कामकलाक रूप होइत अछि। ब्रह्मक कामशक्ति द्वारा कलाक सृष्टिक नाम कामकला थिक। (प्रतीक विद्या, डॉ जनार्दन मिश्र, पटना, १९५९ ई., पृ.१९८) अर्थात् सदाशिवक ऊपर रहि (मर्दिनी काली) शक्ति ब्रह्माण्डक सृजन करैत अछि- “सदाशिवोपरि स्थिरवा ब्रह्माण्डं क्षोभमानयेत” कालीविलासतंत्र, लंडन, १९१७ ई. २४.२३)। त्रिकोण त्रिशक्तिक रूपमे चेतनाक आत्मप्रसार थिक। उर्ध्वमुखी त्रिकोण शिव, अधोमुखी त्रिकोण शक्ति (शिवा) एवं षटकोणीय त्रिकोणकेँ शिव-शक्त्यात्मक त्रिकोण कहल जाइछ। त्रिकोणक केन्द्रमे विन्दु सृष्टिक मूल थिक। तंत्रमूलक यंत्रक संरचनाक क्रमे ई आधार मानल जाइछ। मिथिलांचलमे मंगरौनी (मधुबनी) एवं हरौली (वैशाली) आद्याशक्ति (मातृब्रह्म)क साधना पीठ थिक।
देवताक भेदें आगमक वर्गीकरण निम्नरूपेँ भेल अछि- शैवागम, शाक्तागम, वैष्णवागम एवं बौद्धागम। महाकालसंहिताक अनुसार शाक्तागमक चारिटा उपभेद अछि- कापालिक, मौलेय, दिगम्बर एवं भाण्डिकेर। कापालिक डामरतंत्रक, मौलेय यामल तंत्रक, दिगम्बर भैरव-भैरवी तंत्रक एवं भाण्डिकेर क्षावरतंत्रक अनुसरण करैत अछि। मिथिलामे वेदहि जकाँ तंत्रोकेँ अपौरुषेय कहल गेल अछि।(मिथिलामे तंत्र, डॉ त्रिलोकनाथ झा श्रीअमर अर्चना; दरभंगा,२००१ ई.पृ.२९५)। तांत्रिक पद्धतिसँ उपासना सरल होइछ। प्रागैतिहासिक कालसँ पूर्वी भारतक असम, बंगाल, मिथिला ओ नेपालमे शाक्ततंत्रक प्रचार-प्रसार रहल अछि। असमक कामाख्या, बंगालक दक्षिणकाली, नेपालक गुह्येश्वरी एवं मिथिलांचलक उग्रतारा (महिषी)सहरसा। बरांटपुरक चण्डी, कटरागढ़ (मुजफ्फरपुर)क चामुण्डा, सिमरौनगढ़ (नेपाल)क कंकाली, आमी (सारण)क अम्बिका स्थान, उच्चैठ (मधुबनी)क भगवतीथान, थावे (गोपालगंजक)क भगवती मन्दिर आदिक अतिरिक्त बेतियाराज, दरभंगाराज ओ राजनगरक भगवती मन्दिर आदि।
तंत्रोपासनाक उद्भव बंगालमे भेल छल मुदा ओ साधना बलेँ मिथिलामे प्रवलीकृत भेल- “गौड़े प्रकाशित विद्या मिथिले प्रवलीकृता”। कलियुगमे संसार सागरसँ पार उतारनिहार एवं जन्म-मरणक बंधनसँ मुक्ति दियौनिहार मात्र दू टा आराध्य छथि- शिव ओ शक्ति। मिथिलांचलमे शिवक अपेक्षा शक्तिक महत्व अधिक अछि। मैथिल लोकनिकेँ कहल गेल अछि- “अन्तः शक्ताः”। शक्ति उपासनाक दू टा मार्ग- वाम एवं दक्षिण- दुनू पक्ष सैद्धांतिक ओ प्रायोगिक अपन उत्कर्षकेँ प्राप्त कयलनि। दरभंगाक खण्डवलाकुलक राजालोकनि शाक्तधर्मी ओ तंत्रोपासक छलाह।
सामान्यतः वैदिक अवधारणाक अनुसार जतऽ भोग छैक ततऽ मोक्ष नहि आर जतऽ मोक्ष छैक ओतऽ भोग नहि। मुदा दश-महाविद्याक अन्तर्गत पूजिता त्रिपुरसुन्दरीक पूजनसँ भोग एवं मोक्ष दुनू प्राप्त भऽ जाइछ। एहि तरहेँ नानारूपधारिणी शक्तिक पूजोपासना शास्त्रीय एवं लौकिक दुनू रूपेँ सम्पूर्ण मिथिलांचलमे परिव्याप्त अछि। एहिठाम आध्यात्मिक ऊर्जासँ उर्जस्वित अनेक सिद्ध शक्तिपीठ ऐतिहासिक साक्ष्यसँ प्रमाणित, पौराणिक कथासँ समन्वित एवं लोक-आस्थासँ सूत्रबद्ध अछि। गोसाउन घरसँ लऽ कऽ शक्ति (भगवती) कतहु पिण्डरूपमे, कतहु पाथरक मूर्ति रूपमे तँ कतहु तांत्रिक चक्र रूपमे पुजाइत छथि। नवरात्रक अवसरपर सम्पूर्ण मिथिला शाक्तमय भऽ जाइछ। अतः मिथिलाक सुदूर ग्रामांचलमे विशृंखलित शक्ति साधनाक किछु प्रतिनिधि स्थलसभकेँ बानगीक रूपमे “हेरिटेज मिथिला”क अन्तर्गत प्रकाशमे आनब एकटा धार्मिक कृत्य थिक।
उच्चैठक भगवती: मधुबनी जिलाक बेनीपट्टी अनुमंडल मुख्यालयसँ प्रायः पाँच किलोमीटर दिशामे अवस्थित उच्चैठक (उच्चैःस्थ) भगवती स्थान सुप्रसिद्ध शक्ति साधना स्थल अछि। मिथिलामे प्रत्येक देवीकेँ भगवती कहल जाइछ। श्रुति-परम्पराक अनुसार उच्चैठक भगवतीक सम्बन्ध कालिदाससँ सूत्रबद्ध अछि। भगवती स्थानक लगपासमे कालिदासक डीह कहल जाइछ। मुदा उच्चैठक भगवती कालिदास कालीन (गुप्तकाल) नहि अछि। मंदिरमे स्थापित भगवतीक कारी पाथरक मूर्ति तैंतीस ईंच नमहर अछि।
भगवतीक चतुर्भुजी मूर्ति दोहरा कमलासनपर ललितासनमे निर्मित अछि। भगवतीक सिरोभाग ओ वाम भुजा खण्डित अछि। एकटा समकालीन भगवती मूर्तिक वाम हाथ (निम्न)मे कलश ओ ऊपरी हाथमे त्रिशूल एवं दहिन हाथ (निम्न)मे फल ओ ऊपरी हाथमे दर्पण उत्कीर्ण अछि। शिरोभूषण, कर्णफूल, गृमहार, यज्ञोपवीत, वाजुवन्द, कंगन, कटिबन्ध ओ पायल आदिक संग कंचुकी ओ अधोवस्त्रसँ सुसज्जित अछि। पादपीठमे वाहन सिंह उत्कीर्ण अछि। रूप विन्यासक दृष्टिसँ उच्चैठक भगवती सिद्धेश्वरी पार्वती छथि।
अहि तरहक भगवतीक दोसर प्रस्तर मूर्ति मधुबनी जिलान्तर्गत कपिलेश्वरस्थानसँ पाँच किलोमीटर पश्चिम-दक्षिणमे अवस्थित भोजपरौलसँ (पैंतीस ईंच नमहर) प्राप्त अछि, जे पूर्णतः अक्षत अछि। रूप ओ भंगिमा सादृश्यक अलावा उच्चैठ भगवतीक मुखाकृति आर्यत अछि तँ भंडारिसमक भगवतीक मुखाकृति गोल अर्थात् मंगोलन अछि। मुदा अमृतकलश, त्रिशूल, फल ओ दर्पण समान अछि। सत्यनारायण झा सत्यार्थीक (मिथिलाक पुरातात्विक सम्पदा, दरभंगा, २००३ ई.) संकेतानुसार एहि वर्गक एकटा भगवती मूर्ति वनगाँव (सहरसा)मे सेहो पूजित अछि। भगवतीक तीनू मूर्ति पालकालीन कलाकृति मध्ययुगीन सांस्कृतिक दर्पण बनि गेल अछि। अमृतकलश हुनक मातृदेवीत्वक एवं दर्पण पार्वतीक प्रतीक थिक। आलोच्य भगवती-मन्दिर सभ प्राचीन भवनावशेष क्षेत्रमे बनल अछि। स्पूनर सूबेगढ़क (मुजफ्फरपुर) भगवती मंदिरकेँ तिरहुत शैलीमे बनल कहने छथि।एहि कड़ीक एकटा षटभुजी भगवती समस्तीपुर जिलान्तर्गत सिंघिया प्रखण्ड मुख्यालयसँ आठ किलोमीटर उत्तर वारीक भगवतीस्थानमे पूजित अछि। कारी पाथरक ई आलोच्य भगवती मूर्ति चौंतीस ईंच नमहर कर्णाटकालीन कलाकृति थिक। भगवतीक वाम हाथ सभमे क्रमशः नीचासँ ऊपर कलश, घण्टा, ढाल ओ दहिन हाथसभमे क्रमशः अभयमुद्रा, खड्ग ओ अक्षमाला सुशोभित अछि। भगवती कमलासनपर ललितासनमे प्रतिष्ठित छथि। पादपीठमे सिंह वाहनक रूपमे उत्कीर्ण अछि। वारी ऋषि-मुनि एवं तपसी-साधक लोकनिक साधना-स्थल छल मध्यकालमे।
उच्चैठ, भोजपरौल, वनगाँव ऊ वारीक अतिरिक्त ओ भंडारि सभ (दरभंगा)मे सेहो परम्परासँ पूजित छथि। भोजपरौल एवं भंडारिसभक भगवती चतुर्भुजी छथि। भंडारिसभक भगवतीक वाम (निम्न) हाथमे त्रिशूल ओ पद्म पुष्प एवं दहिन हाथमे फल ओ खड्ग अछि। भगवती वाणेश्वरीक नामे विशेष प्रसिद्ध छथि। मूर्ति अड़तालीस ईंच नमहर अछि, नदी अवशेषक पश्चिमी तटपर अवस्थित एकटा मंदिरमे पूजित छथि। भंडारिसम दरभंगा जिलाक मनीगाछी प्रखण्डसँ तीन कि.मी. दक्षिणमे अछि। देकुलीक अष्टभुजी भगवती कर्णाटकालीन छथि।
अध्यात्मिक चेतना ओ कलात्मक भव्यतासँ समन्वित ई मध्यकालीन भगवती मूर्तिसभ अपन युगक सांस्कृतिक दर्पणे नहि अपितु तत्युगीन जीवनक धार्मिक आस्था, आध्यात्मिक चेतना, कलात्मक सोच, सामाजिक ओ आर्थिक अवस्थितिकेँ प्रतिबिम्बित करैछ। मूर्ति विज्ञानक अनुसार भगवतीक शास्त्रीय स्वरूप निर्धारित अछि, मुदा एकहि युगक बनल भगवतीक मूर्ति सभमे शैलीगत भिन्नता पाओल जाइछ। पाल साम्राज्यक पतनोन्मुख अवस्थामे राजकीय संरक्षण ओ निर्देशक अभावक कारणे शैलीगत शैथिल्य स्वाभाविक अछि। मूर्तिशिल्पक शास्त्रीयतासँ बन्हल रहितो मूर्तिकार स्वतंत्र चेता सेहो होइत छथि।
फुलहरक भगवती गिरिजा: मधुबनी जिलान्तर्गत हरलाखी प्रखण्ड मुख्यालयसँ पश्चिम-दक्षिण दिशामे अवस्थित फुलहर गाममे प्राचीन भग्नावशेषपर बनल नवनिर्मित मंदिरमे स्थापित एवं पूजित भगवती गिरिजाक भव्य प्राचीन प्रतिमा सैंतीस ईंच नमहर अछि। जनश्रुतिक अनुसार रामचरितमानसक गिरिजास्थान यैह थिक, जे जानकीक आराध्या छलीह आर आइयो कुमारि कन्या लोकनिक आराध्या बनल छथि।
गिरिजाक चतुर्भुजी प्रतिमा कमलासनपर स्थानक मुद्रामे बनल अछि। वाम हाथमे केराक हत्था ओ गदा एवं दहिन हाथमे दर्पण ओ सनाल कमलपुष्प सुशोभित छनि। माथपर मुकुट, कानमे कुण्डल, गरामे हार, कान्हसँ लटकैत यज्ञोपवीत, बाँहिमे बाजूवन्द, कलाइमे आभूषण, डाँरमे अधोवस्त्रकेँ कसैत कटिभूषण ओ पैरसभमे पादाभूषण। भगवतीक वाम पार्श्वमे कार्तिकेय एवं दहिनमे गणेश कमलासनपर ठाढ़ छथि। भगवतीक प्रतिमा वात्सल्यक भावात्मक परिवेशमे निर्मित अछि। पार्वती जगन्माता छथि। गिरिजा वस्तुतः पर्वतकन्या पार्वती छथि। विवाह पंचमीक अवसरपर एहिठाम विशाल मेला लगैत अछि। नवरात्रमे तांत्रिक साधना सेहो प्रचलित अछि।
भगवती गिरिजा अर्थात् पार्वतीक दोसर भव्य कर्णाटकालीन (१२-१३म सदी) मूर्ति दरभंगाक मिरजापुर मोहल्लाक देवी मन्दिरमे प्रतिष्ठापित अछि। दरभंगाक सांस्कृतिक क्षितिजपर उद्भासित भगवती पार्वतीक (बत्तेस इंच नमहर) कर्णाट (पालोत्तर) शैलीमे निर्मित छथि। मूर्तिक प्रभावली बेस अलंकृत अछि। भगवती कमलासनपर वस्त्राभूषणसँ विन्यस्त स्थानक मुद्रामे ठाढ़ छथि। वाम पार्श्वमे कार्तिक ओ दहिनमे गणेश ठाढ़ छथि। दुनूकेँ भगवतीक अभय प्राप्त छनि। भगवतीक दहिन हाथ (उपरका) मे बाँसुरी उत्कीर्ण भेने सत्यार्थी एहि प्रतिमामे गिरिजा, राधा एवं लक्ष्मीक समाहार देखने छथि। मुदा बाँसुरी शब्द ब्रह्मक प्रतीक अछि, शिवक डमरू जकाँ। मिर्जापुरक भगवती म्लेच्छमर्दिनीक नामे लोकख्यात छथि। श्रुति साक्ष्यक अनुसारे भगवती जाहि पोखरिक जीर्णोद्धारक क्रमे उत्खनित भऽ प्रकट भेलीह, ओऽ कब्रगाह छल। मुजफ्फरपुर कोर्टक फैसलाक अनुसार ओहि भूभागक स्वामित्व हिन्दू लोकनिकेँ भेटलनि। ओहि स्थानपर आइ भगवतीक एकटा भव्य ओ दर्शनीय मंदिर शक्ति-साधना ओ लोक आस्थाक केन्द्र बनि गेल अछि।
सत्यार्थी (मिथिलाक पुरातात्विक संपदा, २००३ ई.) अपन सर्वेक्षणमे अन्धराठाढ़ी (मधुबनी), देकुली, कुर्सी नदियामी (दरभंगा), करियन (समस्तीपुर) ओ फुलहर (दरभंगा)क भगवती पार्वतीक उल्लेख कएने छथि। भगवतीक रूप कमनीय, वस्त्राभूषण ललित एवं देहयष्ठि आनुपातिक बनल अछि। फलतः भगवती पार्वतीक प्रतिमा प्राणवंत भऽ गेल अछि।
नाहरक महिषासुर मर्दिनी: मधुबनी जिला मुख्यालयसँ बारह कि.मी. पूर्व दिशामे अवस्थित भगवतीपुरक मंदिरमे महिषासुर मर्दिनीक पाथरक मूर्ति (२५”*१२”आकार) स्थापित एवं पूजित अछि। दसभुजी भगवती त्रिभंगी एवं स्थानक मुद्रामे कमलफूलक दोहरा आसनपर महिषासुरकेँ शूल (बरछी)सँ बेधैत बनल अछि। वस्त्राभूषणसँ सुसज्जित भगवतीक हाथसभमे दश दिक् पालक अस्त्रसभ शोभित छनि। इन्द्रक बज्र, अग्निक शक्ति, यमक दण्ड, नैऋतक खड्ग, वरुणक पाश, ईशानक शूल, वायुक अंकुश, कुबेरक गदा, विष्णुक चक्र ओ ब्रह्माक पद्म। महिषासुर महामोह अथवा अविद्याक प्रतीक अछि, जकर बध लोककल्याणार्थ भगवतीक हाथेँ भेल छल। दश भुजा भगवतीक दिग-दिगंत परिव्याप्त शक्तिक प्रतीकाभिव्यक्ति थिक। भगवतीक मूर्ति कर्णाटकालीन कलाशैलीमे निर्मित अछि। मुखाकृति आर्यन, देहयष्ठि संतुलित ओ आनुपातिक बनल अछि।
नाहरक भगवतीक प्रसिद्धिक कारणेँ शक्ति-साधना स्थल नाहर भगवतीपुरक नामे लोक प्रसिद्ध अछि। एहि ठामक पार्श्ववर्ती मंदिरसभमे सूर्य ओ विष्णुक प्रस्तर मूर्ति पूजित अछि मुदा नाहरक प्रसिद्धि महिषासुर मर्दिनीक कारणे अधिक अछि। मूर्तिक पादपीठमे भक्तगणक छोट-छोट मूर्तिसभ विनीत मुद्रामे उत्कीर्ण अछि।
हावीडीहक भगवती: दरभंगा जिलान्तर्गत बहेड़ा प्रखण्ड मुख्यालयसँ पाँच कि.मी. पूर्व-दक्षिण दिशामे अवस्थित हावीडीहक प्रसिद्धि यद्यपि महारानी सौभाग्यवतीदेवी (सुहब देवी)क आज्ञासँ प्रतापी मंत्री कर्मादित्य द्वारा स्थापित हैहट्ट देवी भगवती पार्वतीक कारणे अधिक अछि (१३म शती), मुदा देवी मंदिरक गर्भगृहमे स्थापित महिषासुर मर्दिनीक महत्व कम नहि होइछ। श्रुति अछि जे भगवतीक मूर्तिक पादपीठ नवादा (दरभंगा) मे पूजित अछि, मुदा यत्र-तत्र उद्धृत अभिलेख कतहु नहि अछि। हाबीडीहक महिषासुर मर्दिनी अष्टभुजी छथि। हैहट्ट देवीक नामे पूजित पार्वती ललितासनमे एवं महिषासुरमर्दिनी स्थानुक मुद्रामे निर्मित अछि। कर्मादित्यक काल १२२५-७५ ई. मानल जाइछ। हावीडीह पंचदेवोपासक भूमि अछि मुदा प्रभुत्व भगवतीक छनि।
महिषासुरमर्दिनीक तेसर साधना केन्द्र दरभंगासँ नौ कि.मी. पूर्व-दक्षिण दिशामे अवस्थित अन्दामामे (२२”) प्राची नदी अवशेषक पश्चिमीतटपर बनल मन्दिरमे स्थापित भगवती ओ पूजित अछि। अष्टभुजी भगवतीक हाथसभमे नाग, धनुष, ढाल, शूल, चक्र ओ खड्ग धारित अछि। नाना वस्त्रालंकारसँ सुशोभित भगवती दोहरा कमलासनपर ठाढ़ छथि। भगवतीक दहिन पार्श्वमे एकटा ढाल खड्ग धारिणी सहदेवीक मूर्ति उत्कीर्ण अछि। भगवतीक मूर्ति संरचना मैथिल अवधारणाक अनुसार भेल अछि। मिथिलांचलमे भगवतीक महिषासुर मर्दिनी रूप समसामयिक परिवेशमे बेस लोकप्रिय छल। महिषासुर मर्दिनीक प्राचीन ऐतिहासिक मूर्तिसभ वैद्यनाथपुर (चतुर्भुजी), उजान (मधुबनी). डोकहर, जरैल-परसौन, देवपुरा (मधुबनी), कुर्सो-नदियामी, बरसाम, पोखराम (अष्टभुजी), नेहरा, बहेड़ी (अष्टभुजी), चौगामा (दरभंगा), मदरिया, बुढेव (७२*३०” अष्टभुजी), भवानीपुर, सहमौरा, नया नगर (कोशी प्रमण्डल), खोजपुर (दरभंगा) आदिक अतिरिक्त भजनाहा (मधुबनी) ओ गन्धवारि (दरभंगा)सँ प्राप्त सिंहवाहिनी अष्टभुजी दुर्गाक प्राचीन, पूजनीय एवं ऐतिहासिक मूर्तिसभ पहाड़ी शैलीमे निर्मित अछि।
मिथिलांचलमे अनेक नामधारिणी भगवतीक मूर्तिसभ राजेश्वरी, परमेश्वरी, सिद्धेश्वरी, भुवनेश्वरी वाणेश्वरी, गुह्येश्वरी जयमंगला आदिक नामे पूजित अछि। सिमरिया भिण्डी (समस्तीपुर)मे सेहो महिषासुरमर्दिनीक प्राचीन पाथरक मूर्ति प्राप्त भेल अछि। नदियामीक चतुर्भुजी मूर्ति पार्वती (गिरिजा)क थिक, जनिक पार्श्वमे कार्तिक ओ गणेश उत्कीर्ण छथि। पार्वतीक एकटा विलक्षण प्राचीन प्रस्तर प्रतिमा (पाली) निसंदेह अद्वितीय अछि। पार्वतीक गोदमे शिशु गणेशक संगे बैसल छथि। गुप्तकालक ई मूर्ति भगवतीक वात्सल्य भावक अभिव्यंजक अछि। पार्वतीक एकटा चतुर्भुजीमूर्ति करियन (समस्तीपुर)सँ सेहो प्राप्त अछि। मिथिलाक इतिहास पुरातत्व ओ सांस्कृतिक क्षेत्रमे विजयकान्त मिश्र- मिथिला आर्ट एण्ड आर्किटेक्चर- एवं सत्येन्द्र कुमार झा (मिथिला की पाल प्रतिमाएँ) डॉ प्रफुल्ल कुमार सिंह मौन (कर्णाटकालीन मूर्तिकला), सत्यनारायण झा सत्यार्थी (दर्शनीय मिथिला, १-१०), डॉ नरेन्द्र नारायण सिंह निराला- मधुबनी अंचलक मूर्ति-, डॉ हीरानन्द आचार्य (राजनगरक ऐतिहासिक एवं धार्मिक महत्व) आदिक सर्वेक्षणात्मक अध्ययन-अनुशीलन उल्लेखनीय अछि।
मिथिलांचलक नवरात्रमे महिषासुर मर्दिनीक लोकपूजन सर्वाधिक लोकप्रिय एवं परम्परित अछि। आलोच्य प्रतिमा एकटा सामाजिक प्रतिक्रियाक धार्मिक अभिव्यंजना थिक। मिथिलाक मध्यकालीन इतिहास आक्रमण-प्रत्याक्रमण एवं संघर्षपूर्ण स्थितिसँ भरल अछि। विशेष कऽ मुस्लिम आक्रमण ओ घात-प्रतिघातसँ मिथिला आक्रान्त छल। एहि स्थितिमे म्लेच्छमर्दिनी दुर्गाक रूपगत संरचनाक अर्थवत्ता बढ़ि जाइछ। म्लेच्छ असुरक पर्याय अछि। देव लोकनि असुरक वध कयलनि मुदा म्लेच्छ सभक वध भगवतीक हाथे भेल आर हुनक एहि रूपकेँ म्लेच्छमर्दिनी मानल गेल, जे शक्ति-साधनाक एकटा प्रतीक बनल अछि।
मिथिलाक मध्यकालीन इतिहासक पृष्ठभूमिमे हिन्दू धर्मक अन्तर्गत धार्मिक सद्भावक विकास भेल। पाल राजालोकनि यद्यपि बौद्धधर्मी छलाह, मुदा ओ हिन्दू धर्मक देवी-देवता सभक सेहो उदारतापूर्वक संरक्षण देलनि। एहि संक्रमणकालमे बौद्ध लोकनि हिन्दू देवी-देवता एवं हिन्दू लोकनि बौद्ध देवी-देवताकेँ अंगीकार कएलनि। तारा, छिन्नमस्ता, मनसा आदि हिन्दू जगतमे ओ तारा, चण्डी, कंकाली, डाकिनी, वज्र-वाराही, वज्रतारा आदि बौद्ध जगतमे प्रतिष्ठा पौलनि। भिन्न साधना प्रक्रिया एवं रूपविन्यासक अलावा बलि निषेध छल बौद्ध-साधक लोकनिमे। मुदा विक्रमशिलाक सिद्ध-साधनामे पंचमकारक समावेशसँ मिथिलांचलक शक्ति-साधना प्रभावित अवश्य भेल। एहि भूभागमे हिन्दू ओ बौद्ध धर्म संगे-संग विकसित भेल। उदाहरणार्थ वनगाँव महिषी (सहरसा) एवं वारीक (समस्तीपुर) हिन्दू ओ बौद्ध ताराक पूजोपासनाकेँ राखल जाऽ सकैछ।
कोर्थक काली: दरभंगा जिलाक घनश्यामपुर प्रखण्डक अन्तर्गत सांस्कृतिक कोर्थ (पौराणिक कोर्थ, सत्यनारायण झा सत्यार्थी, लहेरियासराय, दरभंगा)क गोसाउनिक स्थानमे स्थापित एवं पूजित पाथरक काली मूर्ति (३ फीट ६ इंच) चतुर्भुजी अछि। आद्याशक्ति काली दशमहाविद्यामे प्रथमा एवं महाकाल (शिव)क शक्ति छथि। कला (साकार जगत)कें आत्मसात करऽबाली काली दिग्वस्त्र छथि। हुनक वाम हाथ (निम्न)मे छिन्नमस्तक ओ खड्ग एवं दहिन हाथमे पोथी (शास्त्र) ओ वरमुद्रा बनल अछि। मुण्डमालिनी काली शवरूप शिवक हृदय स्थलपर ठाढ़ छथि। शक्तिहीन ब्रह्म शव अछि आर शक्तियुक्त भऽ ओ शिव कहबैत अछि। कालीक माथपर मुकुट, डाँर ओ हाथ-पैर सभ आभूषण मंडित अछि, कालीक जिह्वा बाहर निकलल छनि। कोर्थक एहि कालीक पूजामंत्र अछि- “हंसौः सदाशिव महाप्रेतपद्मासनाय नमः”।– तारा रहस्य, १८९६ ई., पृ.४१.
“पुरश्चर्यार्णव” (बनारस, १९०१ ई.-पृ.१७)क अनुसार कालीक नौटा भेद अछि- दक्षिणकाली (कलकत्ता), भद्रकाली (कोइलख), श्मसानकाली (दरभंगा), कालकाली, गुह्यकाली (काठमाण्डू), कामकलाकाली (कामरूप), धनकाली, सिद्धिकाली ओऽ चण्डकाली (बिराटपुर)। लक्ष्मीतंत्रक अनुसार मित्र व शत्रुक सत-असत रूपक विभुकेँ मायागुणयुक्त भेलाक कारणे ओ भद्रकाली कहबैत छथि। ओ कल्याणरूपा छथि। मिथिलांचलमे भद्रकालीक पूजोपासना कोइलख (मधुबनी) मे होइछ। “मिथिला तत्व विमर्श” (परमेश्वर झा) मे कोइलखक भगवतीकेँ भद्रकाली ओऽ काकिलाक्षी कहल गेल अछि। भगवती मधुबनीसँ तेरह कि.मी. पूर्व दिशामे स्थित कोइलखक भव्य मन्दिरमे पूजित छथि।
एकर अतिरिक्त सहरसाक मत्स्यगंधा परिसरक पगोडा शैलीमे बनल मंदिरमे रक्तकालीक भव्य ओऽ आकर्षक मूर्ति स्थापित ओ पूजित अछि। त्रिभंगी नृत्य मुद्रामे निर्मित द्विभुजी मुण्डमालिनी रक्तकालीक वाम हाथमे कपाल ओ दहिनमे खड्ग धारित छनि। रक्तकालीक एहि नृत्यमे असत तत्वादिक दमन ओ कपालमे सृष्टि बीजक संरक्षणक भाव अन्तर्निहित अछि। राजनगर (मधुबनी)क राजपरिसरक काली मन्दिरमे स्थापित कालीक सौम्य मूर्ति, मधुबनीक भओरागढ़मे महाराज रामेश्वर सिंह द्वारा स्थापित काली, राजदरभंगाक श्यामा, दरभंगाक बागमती तटक शसान काली, चैनपुर (कोशी अंचल)क महाकाली, धरान (नेपाल)क दंतकाली, बेतिया राजक काली आदि विभिन्न रूपेँ पूजित छथि। जनपदक ग्रामांचलमे वनकाली, रणकाली आदिक लोकपूजन सेहो परम्परित अछि। दशमहाविद्याक अन्तर्गत द्वितीया महाविद्याक रूपमे प्रतिपादित भगवती तारा ब्राह्मण धर्मक वैदिक परम्परा ओ बौद्धिक धर्मक तांत्रिक परम्परामे वनगाँव-महिषी ओ वारीमे स्थापित एवं पूजित छथि। डॉ जनार्दन मिश्र (भारतीय प्रतीक विद्या, पटना, १९५९ ई. पृ.२०७)क अनुसार सनातनी तारा एवं बौद्ध ओ जैन तारामे स्वरूपगत आर सिद्धान्ततः कोनो भेद नहि अछि। मुदा बौद्ध देवी ताराक रूपगत विस्तार देखना जाइछ- उग्रतारा, नीलतारा, पीततारा, हरिततारा, धनद तारा, महाचीन तारा, बज्रतारा, वरद तारा, श्वेत तारा आदि। वारी (सिंघिया समस्तीपुर) क रामजानकी मन्दिरमे रक्षित द्विभुजी बौद्धदेवी तारा (३१ इन्च)क पालयुगीन प्रस्तर मूर्तिमे मुख्य तारक अतिरिक्त सम्पूर्ण प्रभावलीमे एगारह टा विभिन्न तारा सभक मूर्ति अभिशिल्पित अछि। भगवती तारा कमलासनपर ललितासनमे बैसल छथि। दहिन हाथ वाममुद्रामे बनल अछि। भगवतीक प्रतिमा वस्त्राभूषणसँ अलंकृत अछि। हम प्रायः तीन दशक पूर्व बहेड़ा (दरभंगा)क एकटा व्यक्तिगत पूजागृहमे नीलतारा (सरस्वतीक प्रतिरूप)क पालयुगीन प्रस्तर मूर्ति देखने छलहुँ। सत्यार्थी वनगाँव महिषीक तारामूर्तिकेँ पूर्णतः (मुखाकृतिकेँ छोड़ि) वस्त्राच्छादित पोटरी कहने छथि। महिषीक वर्तमान तारामन्दिरक निर्माण नरेन्द्र ठाकुर (१७४३-६०)क रानी पद्मावती करौने छलीह। ओ महिषीक छलीह। प्रत्यक्षदर्शीक अनुसार उग्रताराक पार्श्वदेवक रूपमे नीलतारा ओ एक जटा मूर्तित अछि। महिषीक उग्रताराकेँ वशिष्टाराधितारा कहल जाइत छनि। एहि क्षेत्रक धर्ममूला (धेमुरा) नदीक तटवर्ती क्षेत्रसँ प्राप्त बौद्धदेवी ताराक एकटा प्रस्तर मूर्ति सम्प्रति पटना संग्रहालयमे संरक्षित अछि। वैशालीक नीरभुक्तौ ताराः चर्चित अछि।
जगतपुर बरारी क्षेत्रसँ प्राप्त ताराक द्विभुजी स्थानक मूर्ति दशम-एगारहम शताब्दीक थिक। ताराक पार्श्वमे दू टा देवी मूर्ति त्रिभंगी मुद्रामे अंकित अछि। एहिसँ ई ज्ञात होइछ जे मिथिला सतत ब्राह्मण धर्मक प्रवर्तक छल, सेहो बौद्ध धर्मक देवी-देवताक प्रभावसँ वंचित नहि रहि सकल। (मिथिला भारती, पटना, मार्च-जून १९६९ ई.)। मूर्ति २ फीट चारि इन्च गुणा १ फीट ३ इन्च आकारमे बनल अछि। मूर्ति अभिलिखित अछि- “यं धर्मा हेतु प्रभवा...”। महायानमे देवी तत्वक प्रधानता छल- तारा, चण्डी, हारीति आदि। भगवती ताराक एकटा प्राचीन मन्दिर तिलकेश्वर (दरभंगा)मे अछि। स्मरणीय अछि वनगाँव-महिषीक पहिचान बुद्धकालीन आपण निगमसँ भेल अछि।
कटराक चामुण्डा: गुप्तकालीन इतिहासमे कटरा तीरभुक्तिक चामुण्डा एकटा “विषय” छल आर कटरागढ़ (वर्तमान मुजफ्फरपुर जिला अन्तर्गत)क चामुण्डा एहि तांत्रिक शक्तिपीठक अधिष्ठात्री देवीक रूपमे पूजित छथि-
विदेह नगरी स्थित्वा सर्वशक्ति समन्विता
चामुण्डेति ततो ख्याता लक्ष्मणातर वासिनी।
कटराक प्राचीन ऐतिहासिक गढ़क भग्नावशेषपर चामुण्डाक नवनिर्मित मन्दिर लखनदेड़ (लक्ष्मणा) तटपर अवस्थित अछि। चामुण्डा क्षेत्रक कटैयाक कटीश्वरी ओ चकौतीक चक्रेश्वरी उपशक्ति पीठ अछि।
चामुण्डा तांत्रिक पूजावशेष वीरपुर, पचम्बा(बेगुसराय), पचही (मधुबनी) आदि स्थान सभसँ प्राप्य अछि।
विराटपुरक चण्डी: सहरसा जिलाक सोनवर्षा प्रखण्डक अंतर्गत जिला मुख्यालयसँ पैंतीस कि.मी. पूर्वमे स्थित विराटपुर गामक शक्तिपीठ चण्डीस्थानक नामसँ लोकख्यात अछि। विराटपुरक चण्डी, धमहारा (धर्मधारा)क कत्यायिनी एवं महिषीक उग्रतारा स्थान एकटा तांत्रिक त्रिकोणपर अवस्थित अछि। चण्डी मन्दिर अष्टकोणीय आधारपर बनल मन्दिरक गर्भगृहमे भगवती चण्डीक मूर्ति, मन्दिरक प्रवेश द्वारपर बुद्धक मूर्ति (बुधाय स्वामी), शिल्पांकित तांत्रिक चक्र, प्रांगणमे तिरहुतामे अभिलेखादि शक्तिपीठक ऐतिहासिकताक प्रमाण अछि।
चण्डी दुर्गाक एकटा रूप थिक। हिन्दू प्रतिमा विज्ञानक अनुसार ओऽ दसभुजी एवं सिंह अथवा बाघपर आरुढ़ रहैत छथि। ओऽ महिषासुर मर्दिनी जकाँ उग्ररूपा छथि। चण्डीक एकटा गुप्तकालीन मन्दिर गाजीपैता (कोशी क्षेत्र) गाममे अवस्थित अछि। मन्दिरक पाथरक चौखटिमे एकटा अस्पष्ट अभिलेख उत्कीर्ण अछि (बिहार की नदियाँ, हवलदार प्रसाद त्रिपाठी, पटना, १९७७ ई., पृ.४१०)। बेहट ओ लक्ष्मीपुरमे सेहो चण्डीमन्दिर शक्ति-साधनाक केन्द्र बनल अछि। जयमंगलागढ़ (बेगुसराय)क भगवती मंगलाकेँ “मंगल चण्डी” (देवी भागवत) कहल गेल अछि। एवं प्रकारे चण्डीक पूजन परम्पराक अवशेष विराटपुर (वीरहट्ट), गाजीपैता, लक्ष्मीपुर (कोशी क्षेत्र), बेहट, जयमंगलागढ़ एवं अरेराज (प.चम्पारण) क्षेत्रक चण्डीस्थानमे उपलभ्य अछि।
सिमरौनगढ़क कंकाली: तिरहुतक कर्णाटवंशीय राजा नान्यदेवक राजधानीनगर सिमरौनगढ़ (सम्प्रति नेपाल तराइमे अवस्थित)क कुलदेवी कंकालीक प्राचीन प्रस्तर मूर्ति (खण्डित) एकटा मन्दिरक गर्भगृहमे स्थापित ओ पूजित अछि। मन्दिरक प्रांगणमे विष्णु, उमामाहेश्वर सूर्य आदिक विशाल- पाथरक कलात्मक मूर्तिसभ कर्णाटशैलीमे निर्मित एवं लोकपूजित अछि। कर्णाट राजा लोकनि पंचदेवोपासक रहितो शक्तिक उपासक छलाह। कर्णाट राजा शक्र सिंह द्वारा स्थापित सखराक भगवतीक शक्रेश्वरी एवं राजा हरिसिंहदेवक कुलदेवी तुलजा भवानीक (नेपाल उपत्यकाक तीनू राजधानी नगरमे स्थापित एवं पूजित मूर्ति सभ शक्ति उपासनाक उदाहरण बनि गेल अछि। कंकालीक एकटा मन्दिर राजपरिसर, दरभंगामे अछि।
कंकालीक तेसर सांस्कृतिक मिथिलांचलक भारदह (भीमनगर बराजसँ पश्चिम, वर्तमान नेपाल तराइ)क मन्दिरमे एकटा तेजस्विनी पाथरक मूर्ति स्थापित अछि। कंकाली भगवती चतुर्भुजी छथि, जे निसंदेह कर्णाटकालीन (१२-१३म सदी) थिक। कंकालीक पार्श्वमे अष्टभुजी दक्षिणकाली, वाम दिस चतुर्भुजी विष्णु आदि प्राचीन प्रस्तर मूर्ति सभक ऐतिहासिक महत्व अछि। कंकालीक उदर भाग गहीर धरि तराशल अछि आर हाथसभमे दण्ड ओ पाश बाँचल अछि। शेष खण्डित अछि।
आमीक अम्बिका स्थान: हाजीपुर-सोनपुरसँ छपरा मार्गमे दिघवारा (सारण) लग गंगाक वाम तटपर आमीमे अम्बिका भगवतीक एकटा प्राचीन मूर्ति स्थापित ओ पूजित अछि। आमी मही ओ गंगाक संगम क्षेत्र अछि। एहि भूभागकेँ संगमतीर्थ सेहो कहल जाऽ सकैछ। श्रुति अछि एहिठाम दक्ष प्रजापतिक यज्ञमे शिवा अपन प्राणाहुति देने छलीह। राजा सुरथ एहिठाम भगवतीक उपासना कयने छलाह। दुर्गा-सप्तशतीक अंतः साक्ष्यक अनुसार ओ एहिठाम भगवतीक मंदिरक मूर्ति बनाकऽ पूजने छलाह। आमी जाग्रत शक्तिपीठ अछि।
अम्बिकाक रूप विन्यासमे कहल गेल अछि जे ओ कमलासनपर आसीन छथि। हुनक हाथमे पाश, अंकुश आदि छनि एवं वाहन सिंह छनि। अम्बिकाक पूजोपासना समान रूपसँ शैव, शाक्त, बौद्ध, जैन आदि लोकनि करैत छथि। जैन सन्दर्भमे ओ नेमिनाथक यक्षिणी ओ शासनदेवी सेहो छथि।
सखराक छिन्नमस्ता: कुनौलीसँ (निर्मली, सहरसा) मात्र दू मील पश्चिमोत्तर दिशामे अवस्थित सखरामे छिन्नमस्ताक प्रसिद्ध मन्दिर अछि। मन्दिरक गर्भगृहमे कर्णाट राजा शक्रसिंह (१२८५-९५) भगवतीक मूर्तिक स्थापना कयने छलाह। फलतः सखराक छिन्नमस्ताकेँ शक्रेश्वरी सेहो कहल जाइत अछि। ओऽ तांत्रिक पूज्या भगवती छथि, मन्दिरक गर्भगृहमे स्थापित पंचदेवीमे छिन्नमस्ता प्रमुख छथि। सखरा सांस्कृतिक मिथिलांचलक नेपाल तराइ राजबिराज, सप्तरीमे पड़ैत अछि।
भगवती छिन्नमस्ता द्विभुजी रूपमे रति-कामक युगनद्ध आसनपर ठाढ़ छथि। दहिन हाथमे काता एवं वाम हाथमे स्वहस्ते मुण्डित मस्तक छनि। ओ दिगवस्त्रा छथि, मुक्तकेशा छथि। हुनक दुनू पार्श्वमे योगिनी ओ भोगिनी (डाकिनी) योनिमुद्रामे ठाढ़ भगवतीक कण्ठसँ निःसृत रक्तक धारकेँ पीबैत छथि। रक्तक पहिल धार भगवतीक अपने मुँहमे जाइत छनि। यैह सृष्टिक जीवनचक्र थिक। योगिनी ओ डाकिनीक हाथ सभमे कपाल ओ काता छनि। रजरप्पा (झारखण्ड) मे भगवतीक भव्य मन्दिर दर्शनीय अछि।
भगवतीक शास्त्रविहित एवं लोकविहित रूपसाधनाक सन्दर्भमे निम्नलिखित स्वरूपक प्रसिद्धि उल्लेखनीय अछि- लक्ष्मी (अन्धराठाढ़ी, मधुबनी; परानपुर, कटिहार), गजलक्ष्मी (भीठ-भगवानपुर, मधुबनी; रोसड़ा, समस्तीपुर आदि), सहोदरा माई (नरकटियागंज, प.चम्पारण), गढ़ी माइ (नेपाल तराइ), बुढ़िया माइ ( मंगरौनी, मधुबनी;कन्हौली, वैशाली आदि) आदिक अतिरिक्त परमेश्वरी (अन्धराठाढ़ी), वाणेश्वरी (मकरन्दा), भुवनेश्वरी (भवानीपुर), राजेश्वरी (डोकहर), सिद्धेश्वरी (सरिसव), जटेश्वरी (लोहट), विषहरी (दियारीथान, सहरसा) आदि। मिथिलांचलक गाम-गाममे पसरल पिण्डस्वरूपा सप्तमातृका एवं घर-घरमे पिण्डित गोसाउनि भगवतीक रूप विस्तारक सांस्कृतिक सर्वेक्षण ओ अनुशीलन आवश्यक अछि। एकर अतिरिक्त जलशक्ति पूरित नदी देवी सभमे गंगा, यमुना, कोशी, कमला ओ जीवछक शक्ति स्वरूपक पूजोपासना सेहो विशिष्ट अछि।