विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका · VIDEHA · ISSN 2229-547X

जीवन झाक नाटकक सामाजिक विवर्तन (अंक १८ मे प्रकाशित खेप)

डॉ. प्रेमशंकर सिंह · 2008-09-15 · अंक 18

२.जीवन झाक नाटकक सामाजिक विवर्तन
उनैसम शताब्दीक पंचम दशकमे आधुनिक मैथिली साहित्यक क्षितिजपर एक प्रतिभासम्पन्न साहित्य मनीषीक आविर्भाव भेल जे अपन नवोन्मेषशालिनी प्रतिभाक प्रसादात परिप्रदीत्पि प्रकाश पुञ्जसँ बीसम शताब्दीक प्रथम दशक धरि अबैत-अबैत मैथिली नाट्य-साहित्यक पूर्ववर्ती परम्परामे क्रान्तिकारी परिवर्तन आनि, परवर्ती युगक नाट्यकार लोकनिक हेतु एक उन्मेष, नमोन्मेषक नेतृत्व नवीन नाट्य गद्यक जनक, प्रगतिशील विचारक, संवेदनशील मनोवृत्ति, कल्पनाशील मस्तिष्क, सरस रोमांचक अनुभूति एवं मैथिल समाजमे परिव्याप्त समस्याक प्रति अतिसाकांक्ष भऽ समाजकेँ दिशा-निर्देश करबाक स्तुत्य प्रयास कयलनि, ओऽ रहथि शलाका पुरुष कविवर जीवन झा (१८४८-१९१२)। राजदरबारसँ सम्पोषित रहितहुँ ओऽ जन-जनमे चेतनाक दीप जरौलनि, कण-कणमे उत्साह पसारलनि आऽ क्षण-क्षणमे सर्जनाक दिशा निर्दिष्ट कयलनि। युगपुरुष जीवन झाक सम-सामयिक समाज आऽ साहित्य बौद्धिक उत्तेजनाक लहरिसँ गुजरि रहल छल। राजनीति, समाज नीति, अर्थनीति, धर्मनीति, संस्कृति, संगीत, नाटक एवं चित्रकारीपर वैज्ञानिक प्रभावक फलस्वरूप परिवर्तन, परिवर्धन, परिमार्जन प्रारम्भ भऽ गेल छलैक। शिक्षाक नवज्योतिक फलस्वरूप सांस्कृतिक, सामाजिक एवं आर्थिक चेतनाक उदय भेल, जकर स्वाभाविक अभिव्यक्ति हिनक नाटकादिक प्रमुख केन्द्र बिन्दु थिक।
ओऽ एक दूरदर्शी साहित्य चिन्तक सदृश आशा-निराशाक मिलन-बिन्दुपर जनमानसकेँ देखलनि। ओऽ नैराश्यक अन्धकारमे आशाक दीप जरौलनि। युगीन परम्पराकेँ नीक जकाँ चिन्हलनि तथा युगानुभूति एवं कालक सत्यताक कोनो स्थितिकेँ अभिव्यक्त करबाक शक्तिकेँ दमित नहि कऽ पौलनि। सामाजिक वातावरणक विशिष्ट सन्दर्भमे सामाजिक विषमताक हुँकार, तत्कालीन सामाजिक, आर्थिक एवं सांस्कृतिक स्थितिक उपस्थापनमे अक्षर पुरुष प्रमाणित भेलाह। सामाजिक, सांस्कृतिक एवं आर्थिक दृष्टिसँ जखन हम हिनक नाटकादिक परीक्षण-निरीक्षण करैत छी, तखन हम ओकरा समसामयिक सामाजिक स्थितिक दर्पण, सांस्कृतिक वैभवक धरोहरि आऽ आर्थिक विपन्नतासँ संत्रस्त समाजक यथार्थ एलबम कहि सकैत छी। ई सर्वविदित सत्य थिक जे ओहि कृतिकारक कृतित्व अक्षय रहैछ, जे सांस्कृतिक, सामाजिक एवं आर्थिक जीवनक वास्तविक प्रतिनिधित्व करैछ, जनिका हृदयमे उपर्युक्तक प्रति पूर्ण आस्था रहैछ तथा ओकर अधःपतनकेँ जनमानसक समक्ष रेखांकित कऽ सचेष्ट हेबाक प्रेरणा दैछ, कारण साहित्य तँ हमर जीवनानुभूतिकेँ प्रतिबिम्बित करैछ।
युगपुरुष जीवन झाक नाटकादिक प्रेरणास्रोत थिक नवीन जागरणक ज्योति। अपन सजग आँखिएँ ओऽ देश-देशान्तरक विकासोन्मुख गतिविधिपर दृष्टि निक्षेप कयलनि, एहि विषयक अनुभव कयलनि जे मैथिल समाजमे नवजागरणक अभाव अछि। ई अपन नाटकक कथानकक चयनक निमित्त मिथिलाक, सामाजिक, सांस्कृतिक एवं आर्थिक स्थिति दिस दृक् पात कयलनि तथा अपन युगक वास्तविक समसामयिक स्थितिक रूपायन ओहिमे कयलनि।
संस्कृत पण्डित रहितहुँ जीवन झा आधुनिकताक पूर्णपक्षपाती अपन कृतित्वमे दृष्टिगत होइत छथि। मिथिलांचलमे परिव्याप्त वैवाहिक समस्या छल तकरा केन्द्र-बिन्दु बनाय सामाजिक वातावरणक विशिष्ट सन्दर्भमे देशोन्नितिक निमित्त नाटकक माध्यमे जन-आन्दोलनक प्रेरणा देलनि, कारण मिथिला मोद ओ मैथिल महासभाक आविर्भावसँ पूर्वहि ई अपन नाट्यकृतिमे ओकर समाधानार्थ विचार प्रस्तुत कयलनि। मैथिल समाजमे तिलक-दहेज, जाति-पाँजिक नामपर कन्यापर होइत अत्याचार एवं अन्याय एवं अन्य सामाजिक कुप्रथापर प्रत्यक्ष वा परोक्ष रूपेँ अपन आलोचनात्मक दृष्टिकोण जनसामान्यक समक्ष प्रस्तुत कयलनि।
सामाजिक पृष्ठभूमिकेँ आधार बनाय ई मैथिलीमे नाट्य-लेखनक शुभारम्भ कयलनि। हिनक तीन सम्पूर्ण नाटक-सुन्दर संयोग (१९०४), सामवती पुनर्जन्म, नर्मदा सागर सट्टक एवं खण्डित मैथिली सट्टक समकालीन सामाजिक, सांस्कृतिक एवं आर्थिक परिस्थितिक उद्देश्य निर्धारणमे सहायक होइछ। वस्तुतः हिनक नाटकादिमे मैथिल समाजक विश्वास एवं संस्कारक प्रतिबिम्ब भेटैछ, जकरा माध्यमे ओ उच्च जीवनक प्रतिष्ठाक आकांक्षी भेलाह। हिनक सम्पूर्ण नाट्य-साहित्यमे व्याप्त सामाजिक, सांस्कृतिक एवं आर्थिक स्तरक सन्निवेशक कारणेँ मिथिलांचलक वातावरणमे परिव्याप्त अछि।
विवाहक चौमुखी समस्यापर आधारित वासना, प्रेम, मिलन आऽ विछोह यद्यपि हिनक नाटकक केन्द्र-बिन्दु थिक, जकर समाजशास्त्रीय एवं भाषाशास्त्रीय अध्ययन अपेक्षणीय अछि। सामाजिक वातावरणक विशिष्ट सन्दर्भमे मैथिल सामाजिक जीवनक अधिकाधिक प्रामाणिक रूप “सुन्दर संयोग” एवं “नर्मदा सागर सट्टक”मे प्रस्तुत करबामे ओऽ सफलता प्राप्त कयलनि। हिनक नाटकादि मात्र मनोरंजनक हेतु नहि, प्रत्युत जीवनक गम्भीर समस्याक समाधान करबाक उद्देश्यसँ उत्प्रेरित भऽ रचना कयलनि। एकर नायक-नायिका मिथिलांचलक परम्परागत कुलीन प्रथाक रूप प्रदर्शित करैछ। यद्यपि “सामवती पुनर्जन्म”क कथानक पौराणिक पृष्ठभूमिपर आधारित अछि, तथापि ओकर प्रत्येक पात्र समसामयिक समाज, संस्कृति एवं आर्थिक पृष्ठभूमिमे उतारल गेल अछि।
“सुन्दर संयोग”मे नाट्यकार समाजक ओहि मानसिक स्थितिक विश्लेषण कयलनि अछि, जे जाति-पाँजि, कुलीनता, बिकौआ प्रथापर प्रचलित बहु-विवाह आऽ पत्नी-परित्यागक सन विकृतिसँ उत्पन्न होइत छल। तथाकथित कुलीन-जन अनेक बियाह करैत रहथि आऽ पत्नीकेँ नैहरमे छोड़ि दैत रहथि। भलमानुसक पत्नीक जीवनगति इएह छलैक। विवाह कऽ कए जाथि आऽ जीवन भरि वापस नहि आबथि। दाम्पत्य सुख एहन कन्याक निमित्त जीवन भरि अननभूत सत्य बनल रहि जाइत छलैक। ओऽ ने तँ कुमारिए रहैत छल आऽ वास्तवमे सधवे। सधवा रहितो वैधव्य-वेदना सहैत रहैत छल। एहन स्थितिक चित्रण निम्नस्थ पंक्तिमे व्यञ्जित भेल अछि:
सीमन्तक सिन्दूरक रेखासँ छी हम धनमन्ती।
हाथक दू लहठीसँ होइछ सधवामे नित गनती।
मिथिलांचलमे कुलीनताक बलपर प्रतिवर्ष विवाह करब सामान्य बात छल। समाजमे एहन परम्परा प्रचलित छलैक जे एक ठाम विवाह आऽ चतुर्थी सम्पन्न कऽ कए दोसर ठाम पुनः विवाह करैत छलाह। कुलीन व्यक्ति विवाहोपरान्त पलटिकऽ जयबाक प्रयोजन नहि बुझैत रहथि। समयक क्रममे अपन पत्नीक आकृति आऽ सासुरक लोककेँ बिसरि जाथि। अत्यल्प परिचयक कारणेँ सर-कुटुम्बकेँ नहि चिन्हब तँ सर्वथा स्वाभाविक।
एहन विषम स्थितिमे कन्याक माता-पिता, समाज आऽ कन्याकेँ केहन मानसिक यातना होइत छलैक, निराशा आऽ विषादसँ आछन्न मनःस्थितिमे कोना जीवन-यापन करैत छल से स्वतः कल्पनातीत छल। कोनो सौभाग्यशालिनी कन्याकेँ पुनः दाम्पत्य जीवन प्राप्त होएतैक, कतेक उल्लास होयतैक, केहन हर्ष होयतैक, ओहो काल्पनिक अछि।
मिथिलांचलमे प्रचलित कन्यादानी शब्द ओही परिणीता; किन्तु परित्यक्ता नारीक यातनामय इतिहासकेँ अपनामे समेटने अछि।
युगपुरुष जीवन झाक समसामयिक सामाजिक वातावरणमे परम्परा परिव्याप्त छल। सामाजिक जीवनमे ई प्रतिष्ठाक विषय छल। नाटककार एहि सामाजिक परिस्थितिसँ पूर्ण अवगत रहथि। एकर दुष्प्रभावकेँ ओऽ अनुभव कयने रहथि। समाजक ओहि परिवेशमे कन्यापक्षक मानसिक अन्तर्द्वन्दकेँ ओऽ सुन्दर संयोगमे अभिव्यक्त कयलनि। समाजक समक्ष ओऽ सुन्दर मिश्र कए सदृश आदर्श पुरुषक रूपमे प्रस्तुत कयलनि।
सुन्दर मिश्र अपन सासुरक प्रत्येक व्यक्ति, अपन पत्नीकेँ तखने चिन्ह जाइत छथि, जखन हरदत्त पण्डा हुनक ससुरक पूर्व पुरखाक नाम गाम बाँचैत छथि। ओऽ चतुर्थी दिन पत्नीक अस्वस्थताक कारणेँ सासुर छोड़ि देने रहथि। ओऽ अपन पत्नी पर्यन्तकेँ नहि चिन्ह पौने रहथि। इएह स्थिति तँ सरलाक ओकर माय, ओकर परिवार, ओकर सखी-बहिनपा ओऽ समाजक छलैक। किन्तु सभक मनमे आशाक किरण छलैक जे भलमानुस सुन्दर मिश्र विवाह कऽ कए चल गेलाह तँ आने बिकौआ वर जकाँ नहि जे आबथि। एहि मानसिकताक अभिव्यक्ति सरस्वतीक कथनमे अभिव्यक्त भेल अछि। जखन ओऽ वैद्यनाथकेँ प्रार्थना करैत छथि; “हे वैद्यनाथ! जे जे कबुला कैल सभ मनोरथ पुरल, आब जमाइकेँ कुशल पूर्वक देखी से वरदान दिअ” (सुन्दर संयोग, पृष्ठ १२)।
सरस्वतीक मनोभाव अत्यधिक पल्लवित भेल अछि, जखन ओऽ अनचीन्हेमे (अपन जमाय) सुन्दर मिश्रकेँ कहैत छथिन, “हे बाबू! बड़ पुण्य रहैत तँ एकर ई वयस भेलैक जमाय चुर्थि अहिक दिन एकरा दुखित छोड़िकेँ जे गेलाह से आइ धरि उदेशो ने पबै छिऐन्ह! (सुन्दर संयोग, पृष्ठ-१४)।
जखन पण्डाइन संकेत करैत छथिन जे पण्डित बाबू सरलाक वर थिकथिन तखन हुनक निराशा व्यक्त होइत छनि, “एहन हम गहमर कहाँ जे जमायकेँ देखब परन्तु वैद्यनाथ बड़ गोर थिकाह”। (सुन्दर-संयोग, पृष्ठ-१९)
सरलाक मनोव्यथा तावत धरि अव्यक्त रहैछ जावत धरि ओकरा संकेत नहि भेटैछ जे पण्डित बाबू सम्भवतः ओकरे वर थिकथिन। तत्पश्चात् ओकर विरह व्यथाक अभिव्यक्ति भेल अछि। मुदा ओऽ सामान्य विरह नहि थिक। सरलाक कथन गद्य आऽ गीतमे सामाजिक परिवेश-जन्य विषाद बजैत अछि, “हे वैद्यनाथ! ऐ तरहेँ दुखिनीकेँ किए सतबैत छहक~ (सुन्दर-संयोग, पृष्ठ-२०) मे “दुखिनी” शब्दक मार्मिकताक अनुभूति तखने भऽ सकैछ, जखन ओहि समयक सामाजिक परिवेशक अनुभव हो। ओहि सामाजिक कुप्रथाक पृष्ठभूमिमे सरलाक कथन विशेषार्थ बोध भऽ जाइछ;
एतदिन शिवपद सेवल, केवल एतबहि काज।
से प्रसन्न वर भाषल राखल मोर कुल लाज॥
(सुन्दर संयोग, पृष्ठ-१८)
बुझा देमक चाही कौखना अनजानकेँ कनिएँ।
जे ई अपराध छौ तोहर किए हमरासँ रुसल छी॥
सरलाक विरह समाजशास्त्रीय विषय थिक जे समाजक परिस्थितिसँ उत्पन्न भेल अछि। एहि तथ्यकेँ नआट्यकार अन्तमे स्पष्ट करैत छथि। सुन्दर सासुरसँ गाम जयबाक जखन प्रस्ताव करैत छथि, तखन उद्विग्न भऽ जाइछ, “हमरा बुझि पडैए जे एहि लोकक मन फेरि अन्तऽ गेलैका” (सुन्दर संयोग, पृष्ठ-३३)। ओऽ सुन्दरकेँ कहैत छथिन, “और नहि किछु, जे फेरि ओएह बरहमासा सवने गाबक पड़ै” (सुन्दर संयोग, पृष्ठ-३४)।
सुन्दर जखन ओहि बारहमासा गीतक जिज्ञासा करैत छथिन तँ सरलाक उत्तर थिक, “छओ मासक प्राप्त खन लोक वाजै जे आब नहि औथीन तखनसँ कादम्बरी बहिनक संग इएह गीत सब गबै छलहुँ। (सुन्दर संयोग, पृष्ठ-३४)
सुन्दर संयोग नाटकक कथानक सामान्य प्रेम-कथाक परिधिमे नहि राखल जाऽ सकैछ। ओऽ थिक मैथिल समाजमे प्रचलित नारी-यातनाक मानस इतिकथा। प्रकारान्तरेँ नाट्यकार ओहि प्रथाक प्रति अरुचि प्रदर्शित करैत समाधान रूपमे सुन्दर सदृश आदर्श पुरुषक प्रयोजनीयता देखौलनि। सुन्दरमे आदर्श पतिक प्राण प्रतिष्ठा कऽ कए नाट्यकार समाजकेँ कान्ता सम्मति उपदेश देलनि।
हिनक नाटकमे मिथिलाक सामाजिक जीवनमे व्याप्त विवाह सम्बन्धी कुप्रथादिक प्रति आलोचनात्मक दृष्टिकोण प्रतिफलित भेल अछि, तकर विश्लेषणसँ प्रतिभाषित होइछ जे नाटककार सामाजिक सुधारक प्रति पूर्णतः साकांक्ष रहथि। विवाह सदृश अतिमहत्वपूर्ण संयोजनमे निरीह पात्री होइछ, कन्या सामवती पुनर्जन्मक प्रस्तावनामे नटीक कथन थिक:
कन्या कुल मर्यादामे बान्हलि कूजय मुँह न बकार।
(सामवती पुनर्जन्म, पृष्ठ ३)
समाजमे कन्याकेँ पुत्रक अपेक्षा न्यून मानल जाइत अछि जे सर्वथा अनुचित। तेँ तँ गौतमीक कथन थिक; “तखन पुत्र वा कन्या दु टा संसारमे ह्वै छैक। हम तँ बड़ि प्रसन्न छी”। (सामवती पुनर्जन्म पृष्ठ-२३)
जीवन झा कालीन मिथिलांचलक समाज दुइ वर्ग सम्पन्न वर्ग एवं विपन्न वर्गमे विभाजित छल। ताहि कारणेँ स्वजातिमे जाति-पाँजि, कुलीन-अकुलीन, सोति-जोग, भलमानुस, जयवार, पठियार इत्यादिक विचार समाजमे घून जकाँ लागल छलैक। एकरे फलस्वरूप कन्या-विक्रय, बिकौआ प्रथा, बहुविवाह प्रथा आऽ अनेक अमानुषिक समस्याकेँ जन्म दैत छल। ई श्रेय युगपुरुष जीवन झाकेँ छनि जे अपन नाटकक माध्यमे एकर साक्षात विरोध करबाक साहस कयलनि। “नर्मदा सागर सट्टक”क
(अगिला अंकमे)

Suggested citation: डॉ. प्रेमशंकर सिंह. “जीवन झाक नाटकक सामाजिक विवर्तन (अंक १८ मे प्रकाशित खेप).” Videha — First Maithili Fortnightly eJournal, issue 18, 2008-09-15. https://www.videha.co.in/research/2008/18/जीवन-झाक-नाटकक-सामाजिक-विवर्तन-अंक-१८-मे-प्रकाशित-खेप.htm

मूल विदेह अंक / Original issue