विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका · VIDEHA · ISSN 2229-547X

नॉर्थ कछार हिल्स: धरतीक नुकाएल स्वर्ग (दोसर खेप)

डॉ. कैलाश कुमार मिश्र · 2008-09-15 · अंक 18

हमर एक बंगाली मानवशास्त्री मित्र छथि। हुनकर नाम छन्हि डॉ अभिक घोष। बहुत समर्पित लोक। अपन विषय मानव-विज्ञानक प्रति घोष साहेबकेँ अगाध प्रेम छन्हि। आइ-काल्हि पंजाब विश्वविद्यालय, चण्डीगढ़मे मानव-विज्ञान पढ़ा रहल छथि। झारखण्डक मुण्डा जनजातिपर पी.एच.डी. केने छथि। हालहिमे घोष साहेब हमरा लग हमर पुत्र शशांककेँ देखबाक हेतु दिल्ली आएल छलाह। हुनकासँ हम अपन नॉर्थ कछार हिल्स केर यात्राक सम्बन्धमे चर्चा केलहुँ। ओऽ बहुत प्रसन्न भेलाह। कहलन्हि “कैलाशजी, हमर पत्नी उत्तर-पूर्व भारतक छथि। ओऽ हमेशा हॉफलोंग केर प्रशंसा करैत रहैत छथि। हालहिमे हम एक संगोष्ठीमे भाग लेबाक हेतु कलकत्ता गेल रही। ओतए सेहो हॉफलोंग केर प्रसंग चललैक। कलकत्तामे बंगालक एक प्रसिद्ध पत्रकार अमिताभ चक्रवर्ती हमरा कहलन्हि जे नॉर्थ कछार हिल्स भारतक स्वीटजरलैण्ड थीक”।
डॉ अभिक घोषक एहि बातपर हम कहलियन्हि “अभिकजी, हमरा अइ बातक जानकारी दियऽ, की अमिताभ चक्रवर्ती अरुणाचल प्रदेशक तवांग गेल छलाह”?
“हँ हँ, अनेको बेर”। अभिक फटाकसँ बहुत आत्मविश्वासक संग हमर प्रश्नक उत्तर देलन्हि। फेर ओऽ एहि बातकेँ स्पष्ट करए लगलाह, “देखू। दुनू स्थानक अपन-अपन महत्व छैक। तहिँ तुलना करब उचित नहि। पुनःश्च हम तवांग गेल छी, परन्तु नॉर्थ कछार हिल्स जयबाक अवसरसँ एखन धरि वंचित छी। ताहिँ एहि सम्बन्धमे कुनो टिप्पणी करब यथोचित नहि”।
हमरा दिस मुँह कय आँखिक भंगिमाकेँ हमरापर सत-प्रतिशत केन्द्रित करैत डॉ अभिक घोष हमर ध्यानकेँ अपन कथ्यपर आकर्षित करैत कहलाह, “कैलाशजी, अहाँ एहि विषयपर सोचबाक लेल एवं निर्णय लेबाक लेल सही आदमी छी। कारण अहाँ दुनू स्थान-तवांग आऽ नॉर्थ कछार हिल्स- केर चप्पा-चप्पा घुमल छी”।
हम डॉ अभिक घोषक बातपर अपन मूरी हिला देल। कनिक कालक बाद हम नॉर्थ कछार हिल्सक परिवेशमे एक बेर पुनः मानसिक रूपसँ पहुँचि गेलहुँ। जुआएल, पाकल, सुखाएल, कुम्हलाएल, अधपाकल, खिच्चा, कोमल, हरियर, गाँठसँ भरल झुण्डक-झुण्ड बाँसक बीट हमरा मोनमे स्मरण आबए लागल। कल-कल करैत टेढ़-टाढ़ नदी, सुन्दर हरियर पहाड़ी, नव बालक-बालिका, युवक, युवती एवं वृद्ध अपन परम्परागत बहुरंगी वस्त्रमे नचैत-गबैत विभोर भेल हमर मानस पटलपर रंगमंचक अद्वितीय नायक एवं नायिका जकाँ स्मरण होमय लागल; लागल जेना सरिपहुँ हम सेकेण्डोमे दिल्लीक शोरगुलसँ हजारो किलोमीटर दूर असम राज्य केर नॉर्थ-कछार हिल्समे पहुँचि गेलहुँ। की धरती, की पहाड़, की संस्कृति आऽ केहेन आत्मीय आऽ रमनगर लोक! जतेक प्रशंसा करी कम। अनुभूतिकेँ याद करैत आत्मिक प्रसन्नता होइत अछि।
यायावरीकेँ आगाँ बढ़बैत पुनः नॉर्थ कछार हिल्स चली।
बात बांसक करैत रही। साधारणतया ५०-६० वर्षक अन्तरालमे बांसमे एकाएक फूल आबय लगैत छैक। फूल केहेन तँ धानक धानक सीस जकाँ। दाना सेहो धाने जकाँ। फूल पकलाक बाद नीचाँ खसय लगैत छैक। मूस सभ ओहि फूलकेँ धान बुझि झुण्डक-झुण्डमे आबि ओकरा कुतरनाई प्रारम्भ कऽ दैत छैक। मूसक संख्या आवश्यकतासँ अधिक भऽ जाइत छैक। फलस्वरूप जखन धानक खेतीक समय होइत छैक, तखन जतेक धान लोक सभ बीयाक रूपमे बाऊग करैत अछि, मूस सभ एक-एकटा धानक बीयाकेँ खाऽ जाइत छैक। लाख प्रयासक बादो लोक धान उगेबामे असमर्थ भऽ जाइत अछि। परिणाम ई होइत छैक जे घोर अन्नक आपदा समस्त क्षेत्रमे व्याप्त भऽ जाइत छैक। एहि आपदासँ अरुणाचल प्रदेश आऽ सिक्किमकेँ छोड़ि लगभग समस्त उत्तर-पूर्व भारतक भू-भाग कहियो ने कहियो तवाह होइते टा अछि। हालांकि आइ काल्हि सरकारी मदति भेटैत छैक। कृषक सभ सेहो जागरुक भेल जाऽ रहल छथि; समय रहिते मूस मारबाक एवं मूसकेँ भगेबाक पूर्ण इन्तजाम कएल जाइत छैक। आब कल्पना कऽ सकैत छी जे एहेन विभिषिकासँ हानि कम हेतैक।
बांसक फुलेनाइक चर्चा करैत छी तँ अरुणाचल प्रदेशक चर्चा केनाई अनिवार्य। जेना कि बता चुकल छी जे एहि प्रदेशक लोक एहि विभिषिकासँ नहि प्रभावित होइत छथि। एकर कारण ई जे अरुणाचल प्रदेशक तमाम भू-भागक आदिवासी लोकनि मूस पकरबामे निपुण होइत छथि। एतबहि नहि मूस हिनका लोकनिक बहुत रुचिगर भोजन छन्हि। जखन हम लोअर दिवांग घाटी आऽ लोहित जिलामे भ्रमण करैत रही तँ लोक सभकेँ (विशेषण रूपेण इदू मिसमी, दिगारु मिसमी, मिजो-मिसमी तथा खामती जनजाति) मूसक शिकार करैत आऽ ओकर मांस खाइत देखलहुँ। एहि परम्पराक नीक परिणाम ई होइत छैक जे बांस फुलेलाक उपरान्तो मूसक जनसंख्यापर नियन्त्रण बनल रहैत छैक, आऽ एतय केर लोक बांस फुलेला उपरान्त होमय बला विभीषिकासँ बचल रहैत छथि।
हमरा लोकनि नॉर्थ कछार हिल्स केर तमाम जनजातिक स्त्रीगण सभकेँ जिलाक तमाम क्षेत्रसँ बजा समाजक विकास एवं सांस्कृतिक उन्नतिमे नारीक योगदानपर अलग-अलग जनजातिक महिलाकेँ अलग-अलग समूहमे राखि हुनका लोकनिकेँ अलग-अलग समूहमे राखि हुनका लोकनिकेँ विचारसँ अपना-आपकेँ अवगत कराबय चाहैत रही। स्पष्ट कऽ दी जे ई एकमात्र कार्यक्रम नहि छल। अनेक कार्यक्रममे ईहो एकटा महत्वपूर्ण कार्यक्रम छल। एकर परिणामसँ हम गदगद भेल रही। ई कार्यक्रम पाँच दिन चलल। पाँचो दिन महिला लोकनि हमरा लोकनि केर अनुमानसँ ज्यादेक संख्यामे उपस्थित छलीह। सभ दिन अपन परम्परागत वस्त्र, आभूषण एवं दैनिक जीवनक रूपरेखा प्रस्तुत करैत। भेल जे श्रृंगारक जंगलमे छी। एहेन जंगल जकर कल्पना मात्र कैल जाऽ सकैत अछि। वास्तवमे एहेन रंगमंच- उत्साहमय आऽ जीवन्त जीवनक आऽ संस्कृतिक निर्माण असंभव। परन्तु छल तँ सत्य आऽ संभव भेल अनुपम दृश्य!
हरेक महिला समूहमे हमरा लोकनिक तीन-चारि कार्यकर्ता साक्षात्कार करबाक हेतु तथा अधिकसँ अधिक जानकारी प्राप्त करबाक हेतु तत्पर छलाह। एहि कार्यकर्ता लोकनि केर चुनाव हमरा लोकनि अपन सहयोगी-संस्था- श्रीमंत शंकरदेव कलाक्षेत्रक सहयोगसँ केने रही। तमाम कार्यकर्ता स्थानीय छलाह एवं हॉफलोंग हिन्दी, अंग्रेजी आऽ असमिया भाषाकेँ झूरझार बाजैत आऽ लिखैत छलाह। कार्यकर्तामे आधासँ अधिक लड़की सभ छलीह।
हम प्रतिदिन प्रातः सभ समूहकेँ मुख्य हॉलमे बैसा अपन कार्यशालाक उद्देश्यक जानकारी सहभागी लोकनिकेँ दैत छलियन्हि। अगर किनको कुनो तरहक संशय रहल तँ तकरो निराकरण करबाक प्रयास करैत छलहुँ। अपन संस्कृति, संस्कार एवं संस्कारक नीक चीज एवं परम्पराक रक्षा आधुनिकताकेँ स्वीकारैत केना करी ताहिपर हम प्रभावपूर्ण ढंगसँ जोर दैत छलहुँ। हमरा एना बुझना जाइत छल जेना सहभागी महिला लोकनि एवं स्थानीय पत्रकार सभ हमरासँ प्रभावित छलाह। स्थानीय अखबारमे एवं टेलीविजनपर नित्य समाचार अबैत छल। प्रति दिन सांझमे सांस्कृतिक कार्यक्रम होइत छलैक, आऽ अन्ततः भोजन (रात्रिक भोजन)सँ पहिने कार्यकर्ता लोकनि हमरा दिन भरिक क्रिया-कलापक सम्बन्धमे संक्षिप्त जानकारी दैत छलाह। ओहि जानकारीक आधारपर हम अगिला दिन की करी तकर निर्देश दैत छलियन्हि।
कार्यक्रम अपन पूर्ण गतिसँ चलि रहल छल। एक दिन साँझमे हम चाह पिबैत रही। ओतए दिमासा जनजातिक किछु महिला हमरा लग आबि निवेदन केलन्हि, “श्रीमान्! कनी हमरा लोकनिक कार्यशालामे चलब?”
हम कहलियन्हि: “हँ, हँ। अवश्य जाएब”। आऽ चाहक प्याला हाथमे लेने विदा भऽ गेलहुँ। हमर एहि व्यवहारसँ ओऽ सभ गदगद भऽ गेलीह।
जखन हम पहुँचलहुँ तँ ओतए केर माहौल दोसरे जकाँ रहैक। तीन स्थानीय पत्रकार अपन कैमरा संग आऽ एक टी.वी.पत्रकार गुवाहाटीसँ आयल छलाह। ई महिला लोकनि हमरा पत्रकारक समक्ष अपन परम्परामे हाथक बनाओल कलात्मक चद्दरिसँ स्वागत करक हेतु बजेने छलीह। हम एहि बातकेँ सुनि कनी घबरेलहुँ। कारण एहि तरहक परम्परामे हमरा नेतागिरी केर दुर्गन्ध बुझना जाइत अछि। परन्तु दिमासा महिला लोकनिक स्नेहकेँ अपमानित हम नहि करय चाहैत रही। ताहिं चद्दरिकेँ स्वीकार कएल। एकर बाद देखैत छी जे तमाम जनजाति समूहसँ दू-तीन महिला चद्दरि, गमछा आदि लय हमर स्वागत हेतु आयल छथि। लोकक स्नेह देखि मोन भरि आएल। सभसँ भेँट स्वीकार कएल। फेर सोचए लगलहुँ: “जखन ई सभ एतेक नीक छथि तँ आतंकवादी गति-विधि, खून-खरापा किएक? की समस्याक समाधान लोक सभसँ मिलि कऽ नहि भऽ सकैत अछि”? ई बात सोचए लगलहुँ। लोकक प्रेममे आकंठ भऽ गेलहुँ। अतबेमे कार्बी जनजाति समूहक तीन महिला अयलीह। ओऽ सभ कहलन्हि: “श्रीमान्, कनी हमरा सबहक कार्यशालामे पाँच मिनट हेतु चलबैक”?
हम बिना किछु कहने अपन मूरीकेँ स्वीकारात्मक अवस्थामे हिलबैत कार्बी महिला सबहक कार्यशाला दिस प्रस्थान केलहुँ”।
ओतए गेलाऽ पर दलक महिला लोकनि कहय लगलीह: “श्रीमान्, अहाँ लोकनि प्रथम बेर हमरा सभकेँ ई अवसर देलहुँ अछि जे हम सभ अपन समाज, अपन संस्कृति, अपन परम्परा दिस ताकी। परम्पराक ताकतिकेँ आँकी। एतए तँ इसाईयत, आधुनिकता, शिक्षा एवं आतंकवादक कारणेँ लोक सभ परम्परा बिसरल जाऽ रहल अछि। अपन जनजातिक ढंगसँ रहनाई, व्यवहार केनाई, खेनाई-पिनाई, गीत-नृत्य आदि तँ आजुक युगमे पिछड़ापनक निशानी छैक। किछु जनजातिक लोक जे इसाईयतकेँ अपन धर्म स्वीकार कऽ लेलन्हि अछि, तनिका लोकनिकेँ विवाह आदिक तमाम रीति क्रिश्चियन रीतिक अनुरूप करए पड़ैत छन्हि। गिरजाघरमे विवाह केनाई, आधुनिक वस्त्र अर्थात् पेन्ट-शर्ट पहिर कऽ विवाह केनाई। ओऽ लोकनि चाहैतो अपन जनजातिक सनातनीक परम्परासँ विवाह, जन्म-संस्कार एवं मृत्यु संस्कार नहि कऽ सकैत छथि। लेकिन अहाँक कार्यशालाक बाद हमरा लोकनि एहि तथ्यपर गंभीरतासँ विचार कऽ रहल छी। धर्म कुनो भऽ सकैत अछि, परन्तु स्थानीय परम्पराक पालन अवश्य हेबाक चाही। स्थानीय परम्परा धरती, एतए केर वातावरण, पानि, पहाड़, परिस्थिति जे अटूट रूपेँ जुड़ल छैक। ई सभ बात हमरा लोकनि अहीँ सबहक कारणेँ एहि कार्यशालाक माध्यमसँ बुझि सकलहुँ अछि”।
हम मोनहि मोन प्रसन्न भेलहुँ आऽ अपन संस्थाक सदस्य सचिव डॉ कल्याण कुमार चक्रवर्तीक दूरदर्शितापर आश्चर्य होमए लागल हमरा। जखन-कखनो ओऽ हमरा एहि तरहेँ अनेक चीज संगे करय कहैत छथि, तखन हमरा बुझाइत छल जे ई हमरा मनुक्ख नहि सर्वशक्तिमान भगवान बनबय चाहैत छथि, जे कहियो सम्भव नहि थीक। एतेक चीज कहीं एक संगे संभव छैक? परन्तु आइ पता चलि गेल जे अगर नीक भावनासँ सही ढंगसँ कार्य कएल जाय तँ सभ किछु संभव छैक। ओहो मनुक्ख द्वारा। एहि हेतु भगवान बनक कुनो प्रयोजन नहि।
हम ई बात सोचि रहल छलहुँ। एकाएक एक परम्परागत परिधानमे सजल कार्बी महिला हमरा लग अयलीह आऽ कहलन्हि: “मिश्रा साहेब, एक बात कही”?
हम कहलियन्हि: “हँ, हँ। अवश्य कहू”?
ओऽ महिला बजलीह: “ अहाँ जखन संस्कृति इत्यादिक सम्बन्धमे हमरा लोकनिसँ बात करैत छी तँ बड्ड नीक लगैत अछि। आब हम सभ विचार केलहुँ अछि जे सप्ताहमे कमसँ कम एक दिन अपन परम्परागत वस्त्र एवं गहनामे अवश्य रहब। लेकिन एक चीज हमरा सभकेँ पहिले दिनसँ परेशान कऽ रहल अछि। अहाँ मिथिलासँ छी। पढ़ल-लिखल छी। समस्त भारतक परम्पराकेँ जनैत छी। परम्पराक नीक चीजकेँ पालन हो आऽ ओऽ चीज शाश्वत रहय ताहि लेल प्रयासरत छी। परन्तु अहाँ कहियो अपन परम्पराक वस्त्रमे हमरा सभ लग नहि अएलहुँ। हमरा सभकेँ एहि चीजसँ आश्चर्य भऽ रहल अछि। हमरा लोकनि एहि विषयपर काफी विचार-विमर्श कएल आऽ अन्ततः एहि निष्कर्षपर पहुँचलहुँ जे अहाँसँ एहि सम्बन्धमे बात करी। आशा अछि अहाँ हमरा लोकनिक भावनाकेँ सही अर्थमे लेब। एकरा अन्यथा नहि मानब”।
हम बिना कोनो देर केने अपन गलतीकेँ स्वीकार कऽ लेलहुँ। हम ओहि कार्बी महिलाकेँ कहलियन्हि: “ई हमर घोर गलती थीक। शायद दिल्ली शहरक जीवन चक्रमे फँसि हम अपन परम्परासँ दूर भऽ गेल छी। हमरा अहाँक विचार उत्तम लागल। अहाँ हमरा अपन मोनमे अपन मैथिली परम्परा आऽ संस्कारक प्रति घोर आस्था जाग्रत केलहुँ, ताहि लेल हम अहाँक प्रति हृदयसँ आभार व्यक्त करैत छी। अहाँ बातकेँ अन्यथा भला केना लऽ सकैत छी? हम अहाँकेँ वचन दैत छी, जे हम आब जतए कतहु जाएब एक जोड़ धोती-कुर्ता अवश्य लऽ जाएब आऽ कमसँ कम एक दिन अपन मिथिलाक परम्परागत परिधानमे अवश्य रहब”।
हमर एहि बातसँ ओऽ कार्बी महिला बड्ड प्रसन्न भेलीह। एकर बाद हम कार्बी कार्यशालासँ दिमासा जनजातिक कार्यशाला दिस गेलहुँ।
दिमासा जनजातिक महिला लोकनिक कार्यशालामे एहि बातपर चर्चा चलैत रहैक जे शहर (अर्थात् हॉफलोंग) केँ साफ एवं स्वच्छ रखबाक लेल महिला सभकेँ की करक चाही।
हम पुछलियन्हि: “अहाँ सभ एकटा बातक उत्तर दिअ। की एहि हॉफलौंग शहरमे गन्दगी नहि फैलैक, एतय मच्छड़ आदिक प्रकोप नहि हो, ट्रैफिक निअमक पालन होइक, ई कर्तव्य ककर छैक? सरकारक? प्रशासनक? पुरुषक? नेताक? आकि आनो ककरो? अहूँ लोकनिक अर्थात् एतय केर सजग महिला सभक सेहो”?
हमर एहि प्रश्नक उत्तर देमाक हेतु एक अधेर महिला अयलीह। ओऽ कहलन्हि: “श्रीमान् शहर तँ सबहक छैक। की महिला आऽ की पुरुष! एकटा उदाहरण हम एहि सम्बन्धमे देमय चाहैत छी। किछु दिन पूर्व हॉफलोंग शहरमे मलेरियाक भयंकर प्रकोप भेलैक। चारु कात गन्दगी पसरल रहैक। सड़कपर सफाई नहि। ककरो एहि बातक चिन्ता नहि। नॉर्थ कछार ऑटोनोमस काउन्सिलक अधिकारीगण एवं नेता लोकनिसँ दिमासा महिला एसोसिएशन केर सदस्य सभ बात केलन्हि तँ ओऽ लोकनि आश्वसन देलाह परन्तु ओहि आश्वासनपर कोनो कार्यवाही नहि केलन्हि। मलेरियाक कारणेँ स्त्रीगणक जीवन नर्क बनल छलैक। बच्चा सभ ज्यादे परेशान। बच्चाक कारणेँ मायो परेशान। की करु की नहि। अन्ततः हमरा लोकनि शहरक सफाई करक बीड़ा स्वयं अपना हाथमे लेल। करीब पचास महिला एकत्रित भेलहुँ। पच्चास टा बाढ़नि, पच्चास पथिया, पाँच कोदारि कीनल आऽ सफाई केर अभियानमे लागि गेलहुँ। सर्वप्रथम जिलाधिकारीक ऑफिसक बाहरक गन्दगीकेँ साफ करए लगलहुँ, फेर ऑटोनोमस काउन्सिलक दफ्तर, फेर शहरक रोड। सामान्य जनता सँ गीत गाबि-गाबि एवं अपन सफाई अभियानसँ शहरकेँ साफ रखबामे मदति करबाक निवेदन करय लगलहुँ। एक दिन तँ लोक सभ हमरा सभपर ध्यान नहि देलाह। परन्तु दोसर दिन पत्रकार सभ एहि बातकेँ उजागर केलन्हि आऽ सरकार, प्रशासन एवं नेताक अकर्मण्यताक बारेमे लिखय लगलाह। आब लोक सभकेँ एहसास भेलन्हि जे गलती भेल। तेसर दिन एकाएक समस्त प्रशासन साकांक्ष भऽ गेल आऽ चप्पा-चप्पामे सफाई होमए लगलैक। हमहूँ सभ जनता लोकनिसँ साफ एवं स्वच्छ रहबाक निवेदन करैत रहलहुँ। शहर हमर अछि तँ एकर ध्यानो हमरे सभकेँ राखए पड़त”।
दिमासा महिलाक एहि जवाबसँ लागल जे नीक चीजक श्रीगणेश संसारक छोटसँ छोट कोनसँ भऽ सकैत अछि। समाजमे जागृति लेबाक लेल महिला वर्गक योगदान अतुलनीय भऽ सकैत अछि। दिमासा महिला हमरा कहलन्हि: “श्रीमान्, हमरा लोकनिक आनो अनेक तरहक समाजक समस्या छैक जाहिपर एकजुट भए कार्य करए चाहैत छी। पुरुषक शराब पीनाई, एकसँ अधिक पत्नी रखनाई आदि किछु एहन विषय छैक जाहिपर हमरा लोकनि गम्भीरतासँ सोचि रहल छी”।
हम जवाब देलियन्हि: “अहाँ लोकनिक प्रयास प्रशंसनीय अछि। अहाँक प्रयोग प्रभावकारी अछि। एहि तरहक प्रयोग सूतल प्रशासन एवं अधिकारी सबहक निन्द खोलबाक नीक औषधि थीक। हमरासँ जतेक मदति संभव भऽ सकत से हम करब”।
ओऽ महिला कहलीह: “दिमासा महिला उत्थान समिति नामक एक संस्थाक गठन हमरा लोकनि केलहुँ अछि। एकरा हमरा लोकनि दिल्लीसँ अखिल भारतीय संस्थाक रूपमे रजिस्ट्रेशन करबय चाहैत छी। एहि पंजीकरणमे अहाँक सहायता चाही। अगर पंजीकरण भऽ गेल तँ हमरा लोकनि अनेक तरहक कार्य करब”।
हम उत्तर देलियन्हि: “अहाँ लोकनि जखन चाही दिल्ली आबि जाऊ। हम दू-तीन दिनक भीतर अहाँ संस्थाक पंजीकरण अखिल भारतीय संस्थाक रूपमे पंजाब रेगुलेशन एक्ट केर अन्तर्गत सोसाइटीक रूपमे करबा देब। एहिमे कोनो तरहक पैसा इत्यादि नहि लागत”।
दिमासाक बाद हम जेमि नागा महिला समूह द्वारा आयोजित कार्यशाला दिस बढ़लहुँ। जेमि नागाक सम्बन्धमे ई जानकारी देनाई उचित जे ई नागा मात्र असम टा मे रहि गेल अछि। आन राज्यमे तीन नागा मिलि एक जिलियांगरोंग (zeliangrong) बनि जाइत अछि। तहिँ नागा बहुल प्रदेश नागालैण्ड आऽ मणीपुरमे एकर स्वतंत्र अस्तित्व नहि रहि जाइत छैक। सच पूछी तँ जेमि जनजातिक महिला सबहिक आभूषण एवं वस्त्र सभसँ आकर्षक आऽ मनोहारी लागल। जेमि महिला लोकनि कहलीह जे हुनकर सबहक अपन महिलाक संस्था छन्हि। संस्थाक उद्देश्य जेमि नागा समुदायमे अपन संस्कृति आऽ परम्पराक रक्षा केनाई छैक। एक उद्देश्य इहो जे एहि समुदायक लोक इसाईयतकेँ नहि स्वीकार कय अपन मूल जनजातीय धार्मिक मान्यता आऽ आस्थासँ जुड़ल रहथि। नागालैण्डमे लगभग ९५ प्रतिशत नागा समुदाय केर लोक इसाई भऽ चुकल छथि, स्थिति कमो-बेश मणीपुरक नागा समुदायक सेहो यैह छन्हि। परन्तु सौभाग्यसँ नॉर्थ कछार हिल्स केर जेमि नागाक अधिकांश परिवार एखनहुँ धरि अपन मूल मान्यता, धर्म, देवी-देवता, पूजा-पद्धति आदिसँ जुड़ल छथि।
जिमि नागा महिला समूहमे एकटा २७ वर्षीय अविवाहित युवती भेटलीह। हुनकासँ पताचलल जे जिमि नागाक महिला सभ अपन संस्कृतिक रक्षाक प्रति बड्ड सचेत छथि। ओऽ २७ वर्षीय नागा नायिका हमरा ईहो बतेलीह जे ओऽ तीन वर्ष धरि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ केर मुख्यालय नागपुरसँ प्रशिक्षण लय आयलि छथि।
हम कहलियन्हि: “अहाँकेँ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ केर वातावरण केहन लागल? ओतए केर लोक सभ हिन्दू धर्मक प्रति अनेरे निष्ठा तँ नहि जगेबाक प्रयास कयलन्हि? एहि सभ कारणेँ अहाँकेँ अपन जनजातीय धार्मिक विश्वास आऽ रीति-रिवाजपर कोनो आघात तँ नहि पड़ल”?
हमर प्रश्नक उत्तर दैत नागा नायिका कहलन्हि: “की कहि रहल छी श्रीमान्! ओऽ लोकनि तँ हमरा सभकेँ हमेशा यैह कहलन्हि जे अपन मान्यता, धर्म, परम्परा आदिक त्याग नहि करू। अगर परम्परामे कोनो अन्ध-विश्वास अथवा विनाशकारी तत्व अछि तँ ओकर निदान अवश्य करू। जेना हमरा लोकनि परम्परासँ जानवर आदिक बलि चढ़बैत छी। ओऽ सभ कहैत छथिकि अगर संभव भऽ सकय तँ कमसँ कम मिथुन, साँढ़ या भैंसाक बलि दिअ। जिमि नागा समुदायमे बियाहल स्त्रीगण सिन्नूर नहि लगबैत छथि। फेर कोनो लड़कीकेँ देखि ई पता कोना लगाएल जाऽ सकैत अछि कि ई लड़की कुमारि अछि आकि व्याहता? परम्परागत संस्कृतिकेँ अगर पालन करी तँ ई बात सहजतासँ पता चलि जाइत अछि। परम्परा तँ ई छैक जे कुमारि कन्या विवाहसँ पहिने कपारक आगाँ किछु केशकेँ आधा कटा ओकरा कपारपर लटकबइत अछि। संगहि कनपटीपर केश विन्यास करैत अछि। एहिसँ सहजतासँ पता चलि जाइत छैक कि फलाँ-ने-फलाँ लड़की कुमारि थीकि”।
हम ओहि नागा नायिकासँ प्रश्न केलियन्हि: “अहाँ ई बताऊ जे व्याहता महिला केर पहचान फेर कोना होइत छन्हि”?
हमर प्रश्नक जवाब दैत ओऽ नागा नायिका कहय लगलीह: “विवाह होइते नागा महिला कपार परक केसकेँ कटेनाई बन्द कऽ दैत छथि आऽ केसकेँ कपारपर नहि लटका माथक सीथ दिस ऊपर कय बान्हय छथि। संगहि विवाह होइते मातरि नागा महिला कनपट्टी बला किछु लट दुनू कात कटा लैत छथि। एहिसँ कियोक सहजतासँ पता लगा सकैत अछि कि फलाँ ने फलाँ स्त्रीगण व्याहता थीकि”।
नागा नायिका फेर हमरा कहय लगलीह जे प्रतिवर्ष समस्त बराक घाटी आऽ नॉर्थ कछार पहाड़ी केर जेमि नागा लोकनिक महिला सभ जनवरी-फरवरी मासमे कोनो दिन कोनो-ने-कोनो जिमि नागा गाँवमे जुटान करैत छथि। मर्दक कोनो प्रयोजन नहि। प्रत्येक जिमि नागा गामक महिला सभमे एक प्रधान, एक सहायक तथा एक ट्रेजरार होइत छथि। मर्दक कार्य केवल एतेक जे शामियाना लाबथि, स्टेज बनाबय इत्यादिमे महिला लोकनिकेँ मदत करथि। हजारक संख्यामे स्त्रीगण सभ अबैत छथि। हुनका लोकनिकेँ रहबाक एवं खेबाक इन्तजाम गामक महिला सभ करैत छथि। प्रत्येक घरमे तीन-चारि या सामर्थ्यक हिसाबे कम-ज्यादे महिला सभ रहि जाइत छथि, जाय कालमे अतिथि गामक महिला सभकेँ अपना संगे आनल चाऊर, किछु पाई, हरियर तरकारी आदिक संग किछु पाई दऽ दैत छथिन्ह। एहिसँ ककरोपर कोनो अनेर भार नहि पड़ैत छैक। प्रत्येक वर्ष नव पदाधिकारीक चुनाव होइत छैक, एवं अगिला वर्षक जुटान कोन गाममे हैत तकर निर्णय सेहो लेल जाइत छैक।
एहि महिला सभाक उद्देश्य मूल रूपेण परम्परागत जिमि नागा जनजातिक परम्पराकेँ महिला लोकनिक माध्यमसँ बचेबाक थीक। ई सभा एक सांस्कृतिक जनचेतना थीक। एकर सूत्रधार छलीह महान स्वतंत्रता सेनानी आऽ परम गम्भीर, चतुर्मुख प्रतिभासँ सम्पन्न जेलियांगरोंग नागा समुदायक रानी गैदीन्लयू (Gaidinliu)। गैदीन्ल्यूक जन्म आजुक मणीपुर प्रान्तमे २६ जनवरी १९१५ ई. मे भेल छ्लन्हि। हुनकर गाम तामेंगलोंग जिला अन्तर्गत तौसेम सब-डिवीजनमे छन्हि। गामक नाम लोंगकाओ छैक।
कहल जाइत छैक कि प्रारम्भहिसँ गैदीन्ल्यू जिनका कि स्थानीय लोक सभ रानी माँ कहैत छन्हि, बहुत प्रतिभासम्पन्न आओर साहसी छलीह। ब्रिटिश सरकारक सामाजिक आर राजनैतिक क्रिया-कलाप देखि तेरह वर्षक छोट अवस्थामे रानी माँ विचलित भऽ गेलीह आऽ एकरा विरुद्ध संघर्षक बिगुल बजेबाक प्लान करए लगलीह। किंवदन्ती तँ ई छैक जे छोटे उमरिमे रानी माँ मे दैविक शक्ति प्रवेश कऽ गेलन्हि। हुनकर एहि आश्चर्यजनक शक्तिक भान सर्वप्रथम हुनक पिताकेँ भेलन्हि। रानी माँ के तेरहम अवस्थामे पहुँचैत एहि बातक अनुभूति होमय लगलन्हि जे अंग्रेज सभ प्रशासनके मादे आऽ पुनः क्रिश्चियन मिशिनरी केर माध्यमसँ आजुक तीन उत्तरपूर्वी राज्य- असम, नागालैण्ड आऽ मणीपुर- केर नागा जनजातिक तमाम उपजाति सबहक संस्कृति, संस्कार आऽ परम्पराक नाश कऽ रहल अछि। ठीक ओही क्षण रानी माँ हैपु जदोनांग नामक नागा विद्रोहीसँ भेँट केलन्हि। जदोनांग रानी माँ केँ बतेलखिन्ह जे केना क्रिश्चियन मिशिनरीक लोक सभ स्थानीय संस्कृति आऽ संस्कारक सर्वनाश कऽ रहल अछि। जदोनांग महोदयक दर्शनसँ प्रभावती भय रानी माँ हुनकर परम अनुयायी भऽ गेलीह। फेर की छल १९२७ ई. मे एकाएक लोक सभ आन्दोलन प्रारम्भ कऽ देलक। रानी माँ ओहि आन्दोलन केर प्रमुख सूत्रधारमे एक छलीह। लोक सभ एकाएक अंग्रेजक शुल्क आऽ बलपूर्वक बेगारीक प्रथाक विरोध करय लागल। सबतरि हड़ताल पडि गेलैक। धीरे-धीरे चारि-पांच वर्षमे आन्दोलन अपन पराकाष्ठापर चढ़ि गेल। दुर्भाग्यसँ ओहि समय हैपू जदोनांगकेँ अंग्रेज सभ छलसँ कैद कऽ लेलकन्हि आऽ कनिकबे दिनक बाद २९ अगस्त १९३१ ई. मे आजुक मणीपुर राज्यक राजधानी इम्फालमे फाँसीपर निर्दयतापूर्ण ढंगसँ चढ़ा देलकन्हि। एहि घटनासँ रानी माँ बड्ड दुखी भेलीह, परन्तु अपन निश्चय पर चट्टान जकाँ ठाढ़ि छलीह।
आब आन्दोलन केर समस्त कमान रानी माँ के हाथमे आबि गेलन्हि। कतेक ठाम हुनकर गुरिल्लानुमा अनुयायी सभ अंग्रेज सभकेँ पश्त कएलक। अंग्रेज सिपाही सभ रानी माँ के युद्ध कौशलसँ त्राहि-त्राहि करय लागल। अही नॉर्थ कछार धरतीक हंगरुम नामक गाममेअंग्रेज सिपाही आऽ रानी माँक समर्थकक बीच भयानक संघर्ष भेलैक। बादमे घोर तामसमे आबि अंग्रेज सभ समस्त गामकेँ आगिमे झोँकि देलकैक। जान-मालक बड्ड क्षति पहुँचलैक। एतबहि नहि अंग्रेज अधिकारी लोकनि एक गुप्त मीटिंग केलन्हि जाहिमे ई निर्णय लेल गेलैक जे कियोक रानी माँक हुलिया बताओत तकरा प्रशासन दिससँ पाँच सय टका इनाम देल जेतैक। परन्तु रानी माँक प्रति कछार हिल्स, मणीपुर तथा नागालैण्डक लोककेँ बड्ड श्रद्धा छलैक। दुर्भाग्यसँ वर्तमान नागालैण्ड प्रान्तक पोइलवा गाम सँ १७ अक्टूबर १९३२ ई. मे अंग्रेज सैनिक रानी माँ केँ बन्दी बना लेलकन्हि। एहि सैन्य टुकड़ीक संचालन कैप्टन मैकडोनाल्ड करैत छलाह।
रानी माँक दुनू हाथ बान्हि देल गेलन्हि। रौदमे बान्हल हाथ उठेने ठाढ़ छलीह। एक रस्ता चलैत बूढ़केँ नीक नहि लगलन्हि। तमसा कऽ बाजि उठलाह: “सर्वनाश हो अहाँ लोकनिकें। लाजे मरि नहि होइत अछि। एक महिलाक दुनू हाथ बान्हि ऊपर उठेने छी। मर्द छी तँ हाथ खोलि दियौक”?
ताहिपर अंग्रेज सिपाही बूढ़ापर चिचिआए लगलन्हि। बूढ़ो आव देखलाह ने ताव। उठेलन्हि एकटा पाथर आऽ प्रहार कऽ देलन्हि। संयोगसँ अंग्रेज सिपाही बचि गेल। तुरतहि बूढ़ाकेँ कैद कऽ लेलकन्हि। तीन मासक बाद बूढ़ाक उम्रकेँ ध्यानमे रखैत हुनका जेहलसँ रिहा कऽ देल गेलन्हि। रानी माँ इम्फाल, तूरा, कोहिमा आऽ शिलांगक जेहलमे अपन समय बिताबय लगलीह।
१९३७ ई. मे पण्डित जवाहर लाल नेहरू रानी माँ सँ शिलांगक जेहेलमे भेंट केलथिन्ह आऽ हुनका प्रति अपन सम्वेदना व्यक्त केलाह। हुनका जेहलसँ बाहर निकालबाक प्रयास सेहो पण्डितजी करय लगलाह। नेहरू जी रानी माँकेँ पहाड़ीक बेटीक संज्ञा देलथिन्ह आऽ हुनकर नामक संग सर्वप्रथम रानी जोड़ि देलथिन्ह। नेहरू जी रानी माँक तुलना जॉन ऑफ आर्क आऽ रानी लक्ष्मीबाई सँ केलथिन्ह। हालांकि रानी माँ केँ छोड़ेबामे नेहरूजी असमर्थ रहलाह।
अन्ततः भारतक आजादी भेटलाक उपरान्त १४ अक्टूबर १९४७ ई. मे लगभग १५ वर्ष विभिन्न जेलमे रहलाक बाद रानीमाँ आजाद भेलीह।
हालांकि किछु वर्षक बाद रानी माँ अपन जनजातीय धर्म एवं संस्कारपर क्रिश्चियन संस्था द्वारा आघात बर्दाश्त नहि केलन्हि आऽ पुनः अण्डरग्राउण्ड भय संघर्ष करय लगलीह। १९६० ई मे सेहो हुनकर लगभग ३०० समर्थकक जान चलि गेलन्हि। बादमे रानी माँकेँ १९७२ ई. मे ताम्रपत्र स्वतन्त्रता सेनानी अवार्ड, १९८१ मे पद्म भूषण आर १९८३ मे विवेकानन्द सेवा अवार्ड देल गेलन्हि।
अन्ततः १७ फरबरी १९९३ केँ लगभग ७८ वर्षक अवस्थामे रानी माँ पंच तत्वमे विलीन भऽ गेलीह।
एखनहुँ धरि स्त्रीगण सभ (विशेष तौरपर नॉर्थ कछार हिल्स केर जिमि नागा जनजातिक स्त्रीगण) सभ रानी माँ केँ सामाजिक आऽ राजनैतिक चेतनाक मन्त्रकेँ स्मरण करैत अपन संस्कृति आऽ सभ्यताक रक्षामे लागलि छथि।
नॉर्थ कछार हिल्समे अनेको तरहक प्रयोग हमरा लोकनि कएल। आन प्रयोग सभ पूर्णतः शैक्षणिक आऽ दार्शनिक छल। तँहि पाठकसँ ओहि विषय सभपर चर्चा कय हम अनेरे बोर नहि करय चाहैत छियन्हि। नॉर्थ कछार हिल्स केर यात्राक यायावरीकेँ एतय अन्त कऽ रहल छी।

Suggested citation: डॉ. कैलाश कुमार मिश्र. “नॉर्थ कछार हिल्स: धरतीक नुकाएल स्वर्ग (दोसर खेप).” Videha — First Maithili Fortnightly eJournal, issue 18, 2008-09-15. https://www.videha.co.in/research/2008/18/नॉर्थ-कछार-हिल्स-धरतीक-नुकाएल-स्वर्ग-दोसर-खेप.htm

मूल विदेह अंक / Original issue