नो एण्ट्री: मा प्रविश- डॉ उदयनारायण सिंह “नचिकेता”
समीक्षा १.: -प्रोफेसर प्रेमशंकर सिंह
स्वाधीनोत्तर कालावधिमे सांस्कृतिक आऽ साहित्यिक गतिविधिकेँ नव आयाम प्रदान करबामे मिथिलाञ्चलक प्रवासी मातृभाषानुरागी लोकनिक सत्प्रयासक परिणाम आऽ प्रतिफल थिक महानगर कोलकाताक अवदान मैथिली नाटक ओ रंगमंचकेँ नव-दिशा प्रदान करबाक दिशामे जतेक प्रयास कयलक अछि आ वर्तमानमे कऽ रहल अछि ओ निश्चित रूपेँ एक अविस्मरणीय ऐतिहासिक पृष्ठभूमिक निर्माण करबामे सराहणीय भूमिकाक निर्वाह कयलक, जाहिसँ मैथिली आऽ मिथिलाञ्चलक विकास-यात्राकेँ अग्रगति करबामे सहायक सिद्ध भेल। एहि महानगरसँ मैथिली काव्य-यात्रामे अपन शैशवावस्थामे प्रवेश कऽ कए, नवचेतनावादक प्रवर्तक बनि कऽ मैथिली नाटक ओ रंगमंचक क्षेत्रमे अपन प्रयोगधर्मिताक कारणेँ एक नव कीर्तिमान स्थापित कयनिहार नाटककारक रूपमे अवतीर्ण भेलाह। बीसम शताब्दीक अष्टम दशकमे प्रयोगधर्मी नाटककार जे स्वयं कुशल अभिनेता सेहो छथि, ओ छथि उदय नारायण सिंह “नचिकेता” (१९५१) जे एकपर-एक मौलिक प्रयोगधर्मी नाटकक रचना कऽ कए नाटक ओ रंगमंचकेँ एक नव-दिशा देबामे अहं भूमिकाक निर्वाह कयलनि। विगत वर्षान्तमे हुनक सम्मानमे चेतना समिति पटना द्वारा आयोजित एक समारोहमे हम अपन भाषणमे कहने छलियनि जे काव्यक क्षेत्रमे तँ अहाँ ख्यात प्राप्त कएनहि छी, किन्तु नाटकसँ विमुख नहि होउ आ नाटक लिखू। हमर ओ वाक्य हुनका स्पर्श कयलकनि तकरे प्रतिफल थिक जे एक पैघ अन्तरालक पश्चात् ओ “नो एण्ट्री: मा प्रविश” नाटक लऽ कए मैथिली नाट्य-प्रेमी जनमानसक सम्मुख प्रस्तुत भेलाह अछि जे निश्चित रूपेँ नाटक ओ रंगमंचक निमित्त एक अभिनव घटना कहि सकैत छी।
टी.एस. एलियटक कथन छनि जे वाङमयी कलाक चरम उत्कर्ष तखन देखबामे अबैछ जखन रचनामे नाटकीयता कवित्व दिस झुकल दृष्टिगत हो आ कवित्व नाटकीयता दिस। उपर्युक्त कथनक परिप्रेक्ष्यमे प्रस्तुत नाटक “नो एण्ट्री: मा प्रविश”क इएह स्वरूप हमरा समक्ष अबैत अछि, जे नाटककार समाजक यथार्थ स्वरूपकेँ प्रस्तुत करबाक उपक्रम कयलनि अछि जाहिमे नाटकीयता आ कवित्व-शक्तिक अद्भुत समन्वयात्मक स्वरूप पाठककेँ उपलब्ध होइत छनि। मनुष्य जन्मजात क्यो नीक वा अधलाह नहि होइछ, प्रत्युत ओकरा समक्ष एहन परिस्थिति आबि कऽ उपस्थित होइछ जाहिसँ वाह्य भऽ कए ओ कर्ममे संलिप्त भऽ कए तदवत् कार्य करैछ, जकर फल ओकरा एही जीवनमे भोगए पड़ैछ। कारण मानवक सर्वोपरि इच्छा रहैछ जे सांसारिक जतेक सुखोपलब्धि थिक तकर उपलब्धि ओकरे हो, किन्तु ओ बिसरि जाइछ जे ओ जेहन कर्म करत तदनुरूपेँ ओकरा फलोपलब्धि सेहो होयतैक।
वैश्वीकरणक फलस्वरूप मानवक इच्छा-शक्तिक एतेक बेसी बलवती भऽ गेल अछि ओ चिर-नूतनताक आग्रही भऽ ओकर अन्वेषणमे लागि, ओकर अनुयायी भऽ कए अपन पुरातन दुःख-दर्द, मान-अपमान, ग्लानि-मर्यादा आदिक इतिहासक पन्नामे ओझरायल रहब श्रेयस्कर नहि बुझैत अछि, अत्याधुनिक परिवेश वा परिस्थितिक कारणेँ उत्पन्न आधुनिकता आ पुरातन पोंगा-पन्थी विचारधारामे वर्तमान परिप्रेक्ष्यमे समन्वय नहि स्थापित कयल जाऽ सकैछ, कारण मनुष्यक इच्छा शक्ति अनादि आऽ अनन्त थिक तकरा नियन्त्रित करब दुःसाध्य थिक। मनुष्य परिस्थितिसँ प्रेरित भऽ कए अपन मानसिक सुखोपलब्धि निमित्त विश्वक रंगमंचपर उपस्थित भऽ विविध रूपा अभिनय करैछ तकर प्रत्यक्ष वा परोक्ष रूपेँ विविध कलाक प्रदर्शन करैछ तकर परिणाम ओकरा एत्तहि भोगय पड़ैछ, तथापि मानव स्वर्ग-नरकक द्वन्दमे सतत जीवित रहबाक आकांक्षी रहैछ।
प्रयोगधर्मी नाटककार जनमानसमे जे ज्वार आयल अछि, जे लहरि परिव्याप्त भऽ गेल अछि जे ओ अपन अधिकार आऽ कर्तव्यक हेतु एतेक बेसी साकांक्ष भऽ गेल अछि जे ओ सिद्धांतकेँ स्वीकार कऽ कए, ओकर अनुयायी भऽ कए ओ आधुनिक परिप्रेक्ष्यमे दृष्टिबोध कऽ रहल अछि। मानव-समाजक पुरातन इतिहासपर दृष्टिपात कयलासँ स्पष्ट भऽ जाइछ जे चाहे सतयुग हो, द्वापरयुग हो, त्रेता युग हो वा कलियुग हो सब समयक प्रामाणिक इतिहास साक्षी थिक जे अत्याचार-अनाचार, दुःख-दर्द, सुख-समृद्धि, पाप-पुण्य, धर्म-अधर्म आदि-आदिक प्रबल आकांक्षी रहल अछि मानव समुदाय। किन्तु आधुनिक युगक सर्वोपरि उपलब्धि थिक देश-प्रेमक अपेक्षा विश्व-प्रेम। एकर परिणाम प्रत्यक्ष अछि जे जनमानससँ लऽ कए राजनीति दल सेहो समन्वयवादी भऽ कए ओकर अनुगामी जकर प्रमाण थिक सम्मिलित सरकार।
प्रस्तुत नाटक एक प्रतीक नाटक थिक, कारण एहिमे सामाजिक परिप्रेक्ष्यमे एकर कथामुखकेँ उत्थापित कऽ कए प्रतीक योजना नियोजित कयलनि अछि, नाटककार जाहिमे समाजक सब वर्ग यथा चाहे ओऽ चोर हो, उचक्का हो, पाकेटमार हो, नेता हो, अभिनेता हो, कलाकार हो, साहित्यकार हो, बीमा कम्पनीक एजेण्ट हो, प्रेमी-प्रेमिका हो, उच्चवंशीय महिला, अप्सरा हो, नृत्यांगना हो, रद्दी कागज बेचनिहार वा किननिहार हो, नेताक चमचा हो सभक मानसिक पृष्ठभूमिमे प्रवेश कऽ कए नाटककार एक मनोवैज्ञानिक सदृश ओकर साइको-एनालिसिस करबाक उपक्रम कयलनि अछि जे सभक आन्तरिक अभिलाषा रहैछ जे वैह समाजक सर्वश्रेष्ठ प्राणी थिक आऽ स्वर्ग जएबाक अभिलाषाक पूत्यर्थ तद्वत कार्यमे संलिप्त भऽ जाइछ। अन्ततः सब एकत्रित भऽ कए स्वर्गक फाटक लग क्यू लगबैछ, किन्तु चित्रगुप्त द्वारा ओकर कयल गेल कार्य-विवरणी प्रस्तुत कऽ कए पुनः पृथ्वीपर प्रत्यागत हैबाक आदेश दैत छथि आऽ ओतए नो एण्ट्रीक साइन बोर्ड लागि जाइछ आऽ यमराज सेहो प्रत्यागत भऽ जाइछ। इएह द्वन्द्व नाटकमे सर्वत्र दृष्टिगत जे एकर एक नवोपलब्धि थिक।
एहि नाटकक वैशिष्ट्य अछि जे मैथिलीमे प्रथमे-प्रथम ने तँ अंक विभाजन अछि ने दृश्य-विभाजन कयलनि, प्रत्युत सम्पूर्ण नाटककेँ प्रयोगधर्मी नाटककार चारि कल्लोलमे विभाजित कऽ कए वर्तमान समाजक सामाजिक पृष्ठभूमिकेँ समाहित कयलनि अछि जे एहने लहर समाजान्तरगत परिव्याप्त अछि। पत्रोचित भाषाक प्रयोग आऽ छोट-छोट वाक्य-विन्यास, नाटकीयता कवित्व-शक्तिसँ ओत-प्रोत रहलाक कारणेँ ई नाटक दर्शकपर अमिट प्रभावोत्पादकता उत्पन्न करत से हमर विश्वास अछि। सम्पूर्ण नाटकान्तर्गत अनेक स्थलपर छोट-छोट गेय पदक प्रयोग कऽ कए एकरसताक परिहार करबामे सहायक भेल अछि। नचिकेता स्वयं अभिनेता छथि, तेँ मैथिली रंगमंचक यथार्थ स्थितिसँ चिर-परिचित छथि जे मैथिलानी रंगकर्मीक अभाव अछि तेँ एहिमे अत्यल्प महिला पात्रकेँ समायोजित कयलनि अछि जे एकर मंचनमे व्यवधान नहि हो। भविष्यमे आर अभिनव प्रयोगधर्मी नाटककारक कृतिक अपेक्षा मैथिली रंगकर्मीकेँ बनल रहत जकर ओऽ पूर्ति करताह।