१.स्व. राजकमल चौधरी
१.स्व. राजकमल चौधरी
डॉ. देवशंकर नवीन (१९६२- ), ओ ना मा सी (गद्य-पद्य मिश्रित हिन्दी-मैथिलीक प्रारम्भिक सर्जना), चानन-काजर (मैथिली कविता संग्रह), आधुनिक (मैथिली) साहित्यक परिदृश्य, गीतिकाव्य के रूप में विद्यापति पदावली, राजकमल चौधरी का रचनाकर्म (आलोचना), जमाना बदल गया, सोना बाबू का यार, पहचान (हिन्दी कहानी), अभिधा (हिन्दी कविता-संग्रह), हाथी चलए बजार (कथा-संग्रह)।
सम्पादन: प्रतिनिधि कहानियाँ: राजकमल चौधरी, अग्निस्नान एवं अन्य उपन्यास (राजकमल चौधरी), पत्थर के नीचे दबे हुए हाथ (राजकमल की कहानियाँ), विचित्रा (राजकमल चौधरी की अप्रकाशित कविताएँ), साँझक गाछ (राजकमल चौधरी की मैथिली कहानियाँ), राजकमल चौधरी की चुनी हुई कहानियाँ, बन्द कमरे में कब्रगाह (राजकमल की कहानियाँ), शवयात्रा के बाद देहशुद्धि, ऑडिट रिपोर्ट (राजकमल चौधरी की कविताएँ), बर्फ और सफेद कब्र पर एक फूल, उत्तर आधुनिकता कुछ विचार, सद्भाव मिशन (पत्रिका)क किछि अंकक सम्पादन, उदाहरण (मैथिली कथा संग्रह संपादन)।
सम्प्रति नेशनल बुक ट्रस्टमे सम्पादक।
बटुआमे बिहाड़ि आ बिर्ड़ो
(राजकमल चौधरीक उपन्यास)
ग'रसँ देखला पर बात तय होइत अछि जे उपन्यास भारतीय साहित्यक सबसँ गतिशील विधा थिक। भावककें एतए अपन तथा परिवेशक सम्यक् चित्रा सम्पूर्ण वैविध्यक संग भेटैत अछि। एहि तथ्यमे सेहो किनकहु कोनो संशय नहि छनि जे साहित्यमे उपन्यास विधाक आविर्भाव समाजमे आधुनिक सभ्यताक विकासक फलस्वरूप भेल। विज्ञान एवं तकनीकी विकासक फलस्वरूप यूरोपमे सतरहम शताब्दीमे पूंजीवादक पाँखि पसरल, सामाजिक परिवर्त्तनक झोंक आएल, आ साहित्यमे उपन्यास विधाक आविर्भाव भेल। मुदा से भारतीय साहित्यमे उपन्यासक उद्भवक स्रोत नहि थिक। विहंगम दृष्टिसँ देखी तँ भारतीय साहित्यमे उपन्यासक उद्भवक स्रोत सन् १८५७क प्रथम स्वाधीनता संग्राम, आ तकर निराशाक कारणें भारतीय बुद्धिजीवीक बीच जाग्रत चेतनाकें मानल जाएत। एकर सूत्रा उनैसम शताब्दीक प्रारम्भिक कालमे भारतीय बौद्धिक जन'क मोनमे उठल नव चेतनासँ सेहो जुड़ैत अछि, राजा राममोहन राय द्वारा समर्थित नवजागरणसँ सेहो जुड़ैत अछि, ÷बंगाल नवजागरण' आ ÷महाराष्ट्र प्रबोधन'सँ सेहो जुडै+त अछि। हिन्दी पट्टीमे अइ नवजागरणक हवा थोड़ेक देरीसँ आएल। मुदा भारतेन्दु मण्डलक बुद्धिजीवी वर्ग सम्पूर्ण तत्परता आ प्रतिबद्धताक संग एकर उद्घोष केलनि, परिणति धरि पहुँचौलनि।
हिन्दीमे उपन्यास लेखन नवजागरण कालहिमे प्रारम्भ भेल। ÷परीक्षा गुरु'(१८८२) ÷त्रिावेणी'(१८९०) आदि औपन्यासिक कृतिसँ लाला श्रीनिवास दास आ किशोरी लाल गोस्वामी एहि विधाक शुभारम्भ केलनि। डेढ़-दू दशक बाद हिन्दी उपन्यास अपन पूर्ण ज्योतिक संग दैदीप्यमान होअए लागल। जयशंकर प्रसादक ÷कंकाल'(१९२९), ÷तितली'(१९३४); जैनेन्द्र कुमारक ÷परख'(१९२९), ÷सुनीता'(१९३५), ÷त्यागपत्रा'(१९३७);
प्रेमचन्दक ÷सेवासदन'(१९१६), ÷प्रेमाश्रम'(१९१८), ÷रंगभूमि'(१९२६), ÷गोदान'(१९३७) आदि उपन्यासक प्रकाशन भ' चुकल छल। देवकी नन्दन खत्राीक ÷चन्द्रकान्ता'(१८८८) आ ÷चन्द्रकान्ता सन्तति'(१८९६) तँ एहि सबसँ पूर्वहि प्रकाशित भ' कए ख्याति अर्जित क' चुकल छल। जनतब अछि जे भारतीय भाषा सबमे सबसँ पहिने बंगलामे उपन्यास लेखन शुरुह भेल।...मैथिलीमे उपन्यास लेखनक प्रारम्भिक अवधि थिक सन् १९१४-१९३३, अर्थात् ÷निर्दयी सासु'सँ ÷कन्यादान'क रचनाकाल धरि। एहि मध्य कैक टा उपन्यास लिखल गेल, मुदा एहि समय धरि हिन्दी आ आन भारतीय भाषाक उपन्यासक प्रगति देखैत विषयक विस्तार आ शिल्प-शैलीक नूतनताक दृष्टिएँ उल्लेखनीय उपन्यास थिक--निर्दयी सासु(जनार्दन झा ÷जनसीदन')१९१४, रामेश्वर(जीवछ मिश्र)१९१६, सुमति(रासबिहारी लाल दास)१९१८, मनुष्यक मोल(कुमार गंगानन्द सिंह)१९२४, मिथिला दर्पण(पुण्यानन्द झा)१९२५, पुनर्विवाह(जनार्दन झा ÷जनसीदन')१९२६, चन्द्रग्रहण(कांचीनाथ झा ÷किरण')१९३२, कन्यादान(हरिमोहन झा)१९३३ आदि।
एहि आँकड़ाकें देखैत ई लगैत अछि जे मैथिली उपन्यासक मूल लेखन नहि किछु तँ दू-अढ़ाइ दशक पाछू आबि कए प्रारम्भ भेल, आ शीघ्रे माटि पकड़ि लेलक। ध्यान रखबाक थिक जे पहिने बिहार आ बंगाल एकहि प्रान्त छल, कलकत्ता तकर प्रशासन केन्द्र छल। सन् १९१२मे बिहार-बंगाल विभाजित भेल मुदा मिथिलाक लोकक सम्पर्क कलकत्तासँ बनले रहल। उल्लेखनीय अछि जे स्वातन्त्रयोत्तर काल, अथवा ताहूसँ आगू, आपातकालक बाद धरि रोजगारक टोहमे विभिन्न आयुवर्गक मैथिल दिल्ली, पंजाब, गुजरात महाराष्ट्र दिश अपन रुखि केलनि, मुदा एखनहुँ धरि कलकत्ता-प्रेमसँ मैथिल लोकनि पूर्णतया मुक्त नहि भेल छथि।... मैथिली उपन्यासक उद्भवक स्रोत बौद्धिक जन'क स्वानुभूति, अंतःप्रेरणा, मिथिलाक समकालीन परिवेश, मानव जीवनक विसंगति, फिरंगी शासकक अत्याचार...जे रहल हो; मुदा सम्भव ईहो अछि जे बौद्धिक जनकें एहि विभाजनसँ ÷निज भाषा' अर्थात् ÷मातृभाषा'क उन्नति लेल; सर्वथा नव विधा उपन्यासक लेखन लेल प्रेरणा जागल होइन।
मैथिलीमे उपन्यास लिखाएल तँ जाए लागल खूब, मुदा तदनुसार सर्वविधि विकास नहि भेल--एहि तथ्यकें स्वीकार'मे संकोच नहि कर'क चाही। मिथिलाक नव बौद्धिक वर्गक मध्य सब तरहक जागरूकता आ चेतनाक अछैत मैथिलीक उपन्यास लेखन मिथिलामे स्त्राीक दयनीयता पर कनैत रहल। एते धरि जे वैद्यनाथ मिश्र ÷यात्राी' धरिकें सन् १९४६ मे ÷पारो'क परिस्थिति पर कान' पड़लनि, जे सन् १९१६सँ १९३७ धरिक अन्तरालक दुनियाँ भरिक औपन्यासिक उत्थान देख चुकल छलाह। जँ पहिनेक उपन्यासकार कनेको साहस केने रहितथि, तँ सम्भव छल, जे ÷नवतुरिया'मे जे डेग यात्राी उठौलनि, से डेग ÷पारो'एमे उठि जइतए। चेतना आ बौद्धिकताक दृष्टिएँ मिथिला क्षेत्रा सदासँ आगू रहल अछि, तथापि उपन्यास लेखनक विकासोन्मुख धारामे मैथिली एहि तरहें पछुआएल रहल, तकर मूल कारण रचनाकारक जीवनानुभूति आ रचना-दृष्टिक कमजोरी नहि छल; मूल कारण छल मिथिलाक जनपदीय परिस्थिति आ आम नागरिकक मानस लोक।
भारतीय स्वाधीनताक दशक भरि बाद सन् १९५८मे राजकमल चौधरीक पहिल मैथिली उपन्यास ÷आदिकथा' प्रकाशित भेल। एहि समय धरि मैथिली उपन्यासक भण्डार कोनो तेहेन झुझुआनो नहि छल। ÷चन्द्रग्रहण', ÷पारो' आ ÷नवतुरिया' सनक विशिष्ट उपन्यास सब प्रकाशित भ' चुकल छल। ÷पारो' क कथावस्तु आ घटनाक्रम पर मिथिलाक कट्टरपन्थी लोकनि वितण्डा ठाढ़ क' चुकल छलाह। असलमे मिथिला क्षेत्राक सामान्य जनजीवनक समस्या ओहि समय धरि विकराल छल। पंजी-प्रथा आ जमीन्दारी संस्कारसँ मिथिलाक जे वर्ग आक्रान्त छल, ओएह वर्ग सामाजिक व्यवस्थाक नीति-निर्धारक होइ छल। पंजी-प्रथाक कारणें मिथिलामे स्त्राी जातिक स्थिति दयनीय छल। बाल विवाह, बेमेल विवाह, बहु-विवाह, वृद्ध विवाह सन कुरीति पंजीए प्रथाक परिणति छल। तथाकथित उच्च कुलशीलक पुरुष अनेक बेर विवाह क' लै छलाह। कतोक किशोरी अथवा युवतीक विवाह, पिता आ पिमामहक उम्रक लोकसँ भ' जाइ छल। अइ किशोरी आ युवतीक पितावर्ग ओइ जमीन्दार लोकनिकें अपन उद्धारक बूझै छलाह आ तृप्त भेल घोषित करै छलाह जे बेटी आब रानी बनि राज करतीह, बेटीक मोन आ मनोभावकें बूझब ओ अपन दायित्व नहि मानै छलाह। जाहि समाजमे वैज्ञानिक विकासक कोनो टोप-टहंकार पहुँचि नहि सकल छल, ओतएक लोक अपन जीवन व्यवस्थाकें एतेक यान्त्रिाक बना नेने छल, जे ओहि बेटीक बाप-माइकें ई नहि बुझाइन जे एकटा स्त्राी लेल अन्न-पानि, जमीन-जथा, गहना-जेबरे टा सब किछु नहि होइ छै; कोनो स्त्राीक मनोवेगक उत्ताप-अनुताप, युवावस्थाक दैहिक भार सेहो बड़ अर्थ रखै छै। स्त्राी मनोवेगक अइ दशाक बोध ओहि उच्च कुल-वंशीय जमीन्दारकें सेहो नहि होइ छलनि। अइ तरहक विवाहक परिणति दू दिशामे होइ छल -- की तँ जवानीक उमेर अबैब-अबैत किशोरी विधवा भ' जाइथ, आ कि वृद्ध पति संग जवान पत्नीक रति-विलास सुखकर नहि पाबि कुण्ठित होइत रहथि। दुनू परिस्थितिमे देहक भार कोनो जवान पुरुखकें सौंप देबा लेल ओ युवती विधवा, अथवा अतृप्त सधवा ललायित रहै छलीह। राजकमल चौधरीक ÷आदिकथा' उपन्यास एहने अतृप्त सधवा अथवा कामातुर
विधवाक कथा थिक जे अभिलाषा आ मर्यादाक दू छोरसँ तानल-छानल छथि।
÷आदिकथा'क नायिका सुशीलाक विवाह वृद्ध जमीन्दार अनिरुद्ध बाबूसँ भेलनि। दुनूक वयसमे एक पीढ़ीक अन्तर छलनि। सुशीलाक उमेर अपन सतौत बेटा कुलानन्दसँ मेल-जोल खाइ छलनि। पहाड़ी नदी, अथवा कोशीक बाढ़ि, अथवा समुद्रक ज्वारि सन सनकी सुशीलाक जवानी आ देह-तन्त्रा कोनो मर्यादाक बन्हन मान' लेल तैयार नहि छलनि, मुदा घून खाएल चौकठि-केबाड़ सन मिथिलाक कौलिक मर्यादामे तकरा छेक क' रखबाक प्रयास कएल जाइ छल। अइ जर्जर मर्यादाक पुल पर सम्हरि-सम्हरि क' पैर राखि जीवन पार कर' चाहै छलीह, मुदा बीचहिमे अनिरुद्ध बाबूक भागिन देवकान्तक कान्तिमय रूप, चट्टान सन काया-काठी देखि सुशीला, अर्थात सोना मामीक मोन सम्हरि नहि सकलनि, ओ बहकि जेबाक उद्यम नहि केलनि, मुदा बहकि जएबासँ अपनाकें रोकि राखब एते आसानो नहि छलनि। सुशीलाक अतृप्त वासना आ दमित अभिलाषाक संकेत देवकान्तकें लागि जाइ छनि। अइ दुनू चरित्राक मनोविश्लेषण अइ उपन्यासमे बेस सूक्ष्मतासँ भेल अछि। बीचमे आओरो कतोक घटना-उपघटनाक माध्यमे मूल कथाकें माँसल आ प्रभावकारी बनाओल गेल।
मामि-भागिनक कामातुर अनुराग सामाजिक रूपें स्वीकार्य नहि अछि, तें एहि उपन्यासक कथानक मिथिलाक पुरातन विचारक लोककें पसिन नहि पड़लनि। कहल गेल जे ई कथा सत्य नहि सत्यानुरूप अछि, एहिमे अमर्यादित सत्यक वर्णन अछि, नायक-नायिकाक मनोवृत्ति अथवा मानसिक उद्वेलनक चर्चा करै काल लेखककें उचितानुचितक ध्यान रखबाक चाही, सामाजिक बन्धक अवहेलना क' कए कथामे विश्वसनीयता अनबाक आग्रह नहि हएबाक चाही, मामि-भागिनक कामजनित आकर्षण मर्यादाक उल्लंघन थिक।... हमरा जनैत ई समस्त धारणा पाखण्ड थिक। वस्तुतः उपन्यासकार कोनो अखबारक सम्वाददाता नहि होइत छथि जे ओ सत्य घटनाक रिपोर्ट लिखता। कथा आ कि उपन्यास सम्भाव्यक संकेत, वर्त्तमानक विश्लेषण आ अतीतक अनुस्मरण करैत अछि; घटितक सूचना द' देब मात्रा ओ अपन दायित्व नहि बूझै छथि। आदर्श स्थितिसँ कथा, उपन्यासकें परहेज नहि होइत अछि, ओ तँ आदर्शेक अनुसन्धानमे लिप्त रहैत अछि; मुदा अयथार्थ आदर्श ओकरा लेल उपेक्षणीय अवश्य होइत अछि। अही उपन्यासक प्रसंग राजकमल चौधरीक कहब छनि-- सोनामामीक प्रति देवकान्तक प्रेम बड्ड आदर्श थिक। आ, अही आदर्शक रक्षाक कारणें देवक जीवन स्वाहा भ' गेल छइन। आब अहीं कहू; जे भस्म करए, आगि लेसने रहए, से आदर्श कोना, अनुकरणीय कोन तरहें? हम सामाजिक मर्यादाक पूजा करइ छी, आ (अयथार्थ) आदर्शवादिताक घोर विरोध।
आदिकथा उपन्यास पर जे लोकनि मर्यादाक उल्लंघनक दोहाइ देलनि, ओ लोकनि अनिरुद्ध बाबूकें अमर्यादित पुरुष नहि कहलनि, जे अपन अशक्य अवस्थामे सन्तानहुँसँ छोट वयसक युवतीकें पत्नीक रूपमे वरन् केलनि। सुशीलाकें जखन अतृप्त मनोवेगक दौरा पड़लनि तखन श्वसुर स्थानीय जोतखी जी आडम्बर पसारलनि जे हुनका पर प्रेतनी सवार भ' गेलखिनहें। आ, भूत झारबाक बहन्नें वधू-स्थानीय सुशीलाक बाँहि, पाँजर पकड़बाक आचरण गामक लोककें अमर्यादित नहि लगलनि। किऐक तँ अइ समस्त आचरणक फैंटेसीमे मिथिलाक समाज प्रारम्भहिसँ जीबैत आएल छल।
मनुष्य जें कि एकटा जटिल प्राणी थिक, तें मनुष्यक समस्त मानसिक प्रक्रिया विचित्रा जटिलतासँ आबद्ध रहैत अछि। हजारह बर्खक विकास-यात्राामे मनुष्यक सभ्यता आइ जाहि स्थिति धरि पहुँचल अछि, ताहिमे विवेक धारणक विराट भूमिका अछि। मर्यादाक रक्षा विवेकहीन आचरणसँ नहि भ' सकैत अछि। मर्यादाक निर्वाहमे एक ठाम देखाओल गेल विवेकहीनता अनेक अमर्यादाक जननी होइत अछि, एहि सत्यक उपेक्षा केनिहार लोक पारो, आकि आदिकथा सन उपन्यासक कथा पर अँगुरी उठबैत छथि।
मैथिलीमे लिखल राजकमल चौधरीक तीन गोट उपन्यास उपलब्ध अछि --आदिकथा, आन्दोलन आ पाथर-फूल। एकर अलावा हंसराजक नामे १९.११.१९५९ सँ ०६.०१.१९६०क बीच एक पत्रामे राजकमल चौधरी लिखने छथि... जनवरीमे एकटा मैथिली उपन्यास लिखब हम -- बटगमनी। एकटा एहन युवती पर जे भरि निजगी विभिन्न लोकक संगें पड़ाएल घुरइ'ए। कथाक विस्तार जनकपुरसँ पूर्णियाँ धरि रहत।-- कहि नहि ई उपन्यास लिखल गेल अथवा नहि। आदिकथा आ आन्दोलन तँ पहिनहिसँ पाठक लोकनिकें उपलब्ध छलनि। पाथर-फूल उपन्यास हेबनि धरि अनुपलब्ध छल। आखर (राजकमल विशेषांक)मे जीवकान्त अपन निबन्धमे राजकमल चौधरीक पंक्ति उद्धृत कएने छथि -- एक गोट उत्साही युवक ओकरा (÷पाथर-फूल' उपन्यासकें) प्रकाशित करौलनि, मुदा ककरो कहला पर जे उपन्यासक अश्लीलताक कारणें प्रकाशक बन्हा जेताह, प्रकाशित मैटर ओ (प्रकाशक) डैमेज करबा देलनि। -- मुदा सुकर भेल जे दू बर्ख पूर्व तारानन्द वियोगी ओहि उपन्यासक एकमात्रा प्रति कतहुसँ नष्ट-भ्रष्ट स्थितिमे उपलब्ध केलनि। सम्पूर्ण पोथीमे दीवार
महाशय आर-पार एकटा भोकाँड़ क' देलखिन। ओही स्थितिमे ओकर छाया प्रति करवा कए बीचसँ पंक्तिकें जोड़ल गेल अछि। जोड़ल शब्दावलीमे राजकमलक शैली आ गरिमा अक्षुण्ण रहि सकल -- से कहब कठिन अछि, मुदा एते तय अछि जे उपन्यासक रसबोधमे कोनो बाधा उपस्थित नहि होइत अछि। एकर अलावा आओरो एकाध उपन्यासक चर्चा अछि, मुदा तकर कोनो सूत्रा एखन धरि उपलब्ध नहि भेल अछि।(अगिला अंकमे)
डॉ कैलाश कुमार मिश्र (८ फरबरी १९६७- ) दिल्ली विश्वविद्यालयसँ एम.एस.सी., एम.फिल., “मैथिली फॉकलोर स्ट्रक्चर एण्ड कॊग्निशन ऑफ द फॉकसांग्स ऑफ मिथिला: एन एनेलिटिकल स्टडी ऑफ एन्थ्रोपोलोजी ऑफ म्युजिक” पर पी.एच.डी.। मानव अधिकार मे स्नातकोत्तर, ४०० सँ बेशी प्रबन्ध -अंग्रेजी-हिन्दी आऽ मैथिली भाषामे- फॉकलोर, एन्थ्रोपोलोजी, कला-इतिहास, यात्रावृत्तांत आऽ साहित्य विषयपर जर्नल, पत्रिका, समाचारपत्र आऽ सम्पादित-ग्रन्थ सभमे प्रकाशित। भारतक लगभग सभ सांस्कृतिक क्षेत्रमे भ्रमण, एखन उत्तर-पूर्वमे मौखिक आऽ लोक संस्कृतिक सर्वांगीन पक्षपर गहन रूपसँ कार्यरत। यूनिवर्सिटी ऑफ नेब्रास्का, यू.एस.ए. केर “फॉकलोर ऑफ इण्डिया” विषयक रेफ़ेरी। केन्द्रीय हिन्दी निदेशालयक पुरस्कारक रेफरी सेहो। सय सँ ऊपर सेमीनार आऽ वर्कशॉपक संचालन, बहु-विषयक राष्ट्रीय आऽ अन्तर्राष्ट्रीय संगोष्ठीमे सहभागिता। एम.फिल. आऽ पी. एच.डी. छात्रकेँ दिशा-निर्देशक संग कैलाशजी विजिटिंग फैकल्टीक रूपमे विश्वविद्यालय आऽ उच्च-प्रशस्ति प्राप्त संस्थानमे अध्यापन सेहो करैत छथि। मैथिलीक लोक गीत, मैथिलीक डहकन, विद्यापति-गीत, मधुपजीक गीत सभक अंग्रेजीमे अनुवाद।
डॉ कैलाश कुमार मिश्र, इन्दिरा गान्धी राष्ट्रीय कला केन्द्रमे कार्यरत छथि। “रचना” मैथिली साहित्यिक पत्रिकामे “