विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका · VIDEHA · ISSN 2229-547X

जीवन झाक नाटकक सामाजिक विवर्तन (अंक १९ मे प्रकाशित खेप)

डॉ. प्रेमशंकर सिंह · 2008-10-01 · अंक 19

जीवन झाक नाटकक सामाजिक विवर्तन (आगाँ)
ई श्रेय युगपुरुष जीवन झाकेँ छनि जे अपन नाटकक माध्यमे एकर साक्षात विरोध करबाक साहस कयलनि। “नर्मदा सागर सट्टक”क सुन्दर मिश्र तकर ज्वलन्त प्रमाण छथि। मोदन मिश्र सुन्दर मिश्रकेँ नीक जाति-पाँजिक वर त्रिविक्रम ठाकुरक संग नर्मदाक विवाह करयबाक विचार दैत अपन मतक समर्थनमे कहैत छथि:
कुलहीन जमाय- अधीन कुलीन सुता अनुताप सदा सहती।
बसि नीच मनुष्यक बीच यथोचित नीच कथा कहती सुनती।।
पठियार अगार अचार-विचार विचारि विचारि व्यथा सहती।
परिवार समान जहाँ न तहाँ भरिजन्म कोना सुख सैँ रहती॥
(कविवर जीवन झा रचनावली, पृष्ठ-१०७)
उपर्युक्त पंक्तिमे कन्याक पिताक मानसिक व्यथाक कथा सामाजिक व्यवस्था, ओकर परिवेश आऽ परिस्थितिक रेखांकन नाटककार अत्यन्त सूक्ष्मताक संग कऽ कए समाजकेँ दिशा-निर्देश करबाक उपक्रम कयलनि। एहिपर सुन्दर मिश्रक कथन छनि:
उत्तम जाति जमाय असङ्गत कष्ट सुता सभ काल जनाउति।
सासु दयादिन आदि अनादक वाद कथेँ कुल छोट मनाउति।।
जीउति जौ सहि गारि कदाचित् मातु-पिता हित बन्धु कनाउति।
ई असमञ्जस हैत निरर्थक ऊँचक सङ्ग जे नीच वनाउति॥
(कविवर जीवन झा रचनावली पृष्ठ-१०७)
नाटककार सामाजिक वातावरणमे परिव्याप्त वैवाहिक प्रथाक प्रसंगमे अपन विचार व्यक्त करैत ओकर मात्र आलोचने नहि कयलनि, प्रत्युत एहन वैवाहिक सम्बन्धक प्रसंगपर तीक्ष्ण व्यंग्य सेहो कयलनि तथा समाजकेँ सुधरबाक संकेत देलनि।
सामवती पुनर्जन्ममे बन्धुजीवक विकौआ मनोवृत्ति आ पुनर्विवाह करबाक चेष्टाक प्रति सारस्वत ओ वेदमित्रक तिरस्कार भावसँ नाटककारक व्यक्तिगत विचार धाराक परिचय भेटैत अछि। एहि प्रसंगमे बन्धुजीवक कथन छनि:
जे हमरा ठुनकाबथि से लय पहिरथु राङ।
हम पुनि कतहु विकायब पोसब अपन समाङ।
(सामवती पुनर्जन्म, पृ.३९)
उपर्युक्त कथनमे विकौआ प्रथाक निन्दाक स्पष्ट झलक भेटैत अछि। सामवती पुनर्जन्ममे घटक द्वारा सारस्वतकेँ वर पक्षसँ टाका गनयबाक प्रस्तावपर सरस्वतक उत्तरक अवलोकन करू, “छी छी टाकाक चर्चा कोन हमरा तेहन मैत्री अछि आ ओ ततेटा व्यक्ति छथि जे एहन कथा सुन टाका तँ गनि देताह। परन्तु असन्तोष हततैन्हि। ई कथा पुनि जनि बाजी”। (सामवती पुनर्जन्म, पृष्ठ-४६)।
नर्मदा सागर सट्टकमे त्रिविक्रम ठाकुर दिससँ नर्मदाक प्रति टाका गनयबाक घटकक प्रस्तावपर सुन्दर मिश्रक विपरीत प्रतिक्रियाक संग देल गेल उत्तर:
पिता आनि वर कन्या का वसन-विभूषण-युक्त।
सादर अर्पण मन्त्रवत से विवाह विधि युक्त॥
(कविवर जीवन झा रचनावली, पृष्ठ-१०९)
मिथिलांचलक समाजमे प्रचलित नियमानुकूल वैवाहिक सम्पर्क स्थापत्यर्थ घटक-पजिआरक नियोजन एक आवश्यक उपादान थिक। युगपुरुष जीवन झाक चाहे सामाजिक नाटक हो वा पौराणिक ओ अपन प्रत्येक नाटकमे एकर नियोजन कयलनि अछि। सामवती पुनर्जन्ममे सेहो घटक पजिआड़क नियोजन कयल गेल अछि। जखन सारस्वत आ वेद मित्रक बीच अपन सन्तानक विवाहार्थ स्वीकृति भेटैछ तखन वेदमित्रक कथन छनि, “यद्यपि ब्राह्मणक विवाहमे अपद व्यय कोना ने हैइ छैक तथापि घटक-पजिआड़ जे कहताह ततबा टाका त अवश्य ओरिआ लेबै पड़त”।
(सामवती पुनर्जन्म, पृष्ठ-४)
अक्षर पुरुष जीवन झा मिथिलांचलक सामाजिक जीवनसँ निरपेक्ष नहि भऽ सकलाह तेँ हिनक नाटकादिमे सबठाम सामाजिक वातावरणक विशिष्ट सन्दर्भक संगहि संग सांस्कृतिक एवं आर्थिक जीवनक अति यथार्थ प्रतिनिधित्व करैछ। हिनक समस्त नाटक जनसामान्यक निकषपर अक्षरसः सत्यताक आवरणसँ आच्छादित अछि जाहिमे आशा-आकांक्षा, आचार-विचार, आमोद-प्रमोद, स्त्री-पुरुषक सुख-दुःख, रहन-सहन, खान-पान, वेश-भूषा, भाव-भाषा, राजनीति आदिक यथार्थ परिचय भेटैत अछि। ओ मिथिलाक सांस्कृतिक परम्पराक प्रबल समर्थक रहथि जकर प्रतिरूप हिनक नाटकादिमे स्थल-स्थलपर उपलब्ध होइछ। मैथिल संस्कृतिक अनुरूप विवाह पूर्व घटक-पजिआड़क नियोजन हमर सांस्कृतिक परम्पराक अनुरूप समाजमे प्रचलित नियमानुकूल वैवाहिक सम्पर्कक स्थापत्यर्थ घटक-पजिआड़क नियोजन आवश्यक अछि। सामवती पुनर्जन्म एवं नर्मदा सागर सट्टकमे जे घटक-पजिआड़क चर्चा भेल अछि ओ सर्वथा मैथिल संस्कृतिक अनुकूलहि अछि।
जतेक दूर धरि वेशभूषाक प्रश्न अछि हिनक नाटकान्तर्गत विशुद्ध रूपेँ मैथिल संस्कृतिक अनुरूपहि पात्रक वेशभूषाक संग साक्षात्कार होइछ। नर्मदा सागर सट्टकक घटकराजक स्वरूपक तँ अवलोकन करू:
जैखन देखल लटपर पाग।
धोती तौनी नोसिक दाग॥
कयलक लोक गाम घर त्याग।
हमरा हृदय भेल अनुराग॥
(कविवर जीवन झा रचनावली पृष्ठ-१७)
हाथमे फराठी छनि, अवस्था विशेषक कारणेँ हुनक डाँर पर्यन्त झुकि गेल छनि, पाग लटपर छनि। एहन वेश-भूषाकेँ देखि लोककेँ घटककेँ चिन्हब कनेको भाङठ नहि होइत छनि:
ओ जेना छल केहन उकाठी।
उचकि पड़ायल हमर फराठी॥
बीतल वयस वर्ष थिक साठी।
पैरन सोझ पड़य बिनु लाठी॥
जौँ जनितहुँ एहि गामक ढाठी।
तौँ न आबि भसिअइतहुँ भाठी॥
(कविवर जीवन झा रचनावली, पृष्ठ-९५)
एहिमे नाटककार मिथिलामे वैवाहिक अवसरपर घटकक कर्तव्यपरायणता तथा ओकर वेश-भूषाक यथार्थ स्थितिक चित्रण अत्यन्त मार्मिकताक संग कयलनि अछि।
सांस्कृतिक परिदृश्यमे मिथिलामे पर्दा प्रथाक पालन सामाजिक रीति-नीतिक अनुकूलहि हिनक नाटकादिमे वर्णित अछि। एहि प्रथाक अनुसारेँ ससुर-भंसुर वा परिवारक श्रेष्ठ व्यक्तिक समक्ष वा अपरिचित व्यक्तिक समक्ष मिथिलांचलक महिला नहि जाइत छथि। एहि प्रथाक अनुरूपहि कादम्बरी एवं अभिरानी एहि रहस्यसँ अवगत रहितहुँ जे सुन्दर निश्चित रूपेँ सरलाक पति थिकथिन तथापि ओ सभ आत्मीयता नहि प्रदर्शित करैत छथि। सुन्दरकेँ सेहो अनुभव होमय लगैत छनि जे सरला हुनक पत्नी छथिन, किन्तु मर्यादाक पालनार्थ ओ अपन वास्तविक परिचय नहि उद्घाटित करैत छथि।
सांस्कृतिक परिवेशक नियोजनक दृष्टिएँ जखन हिनक नाट्य साहित्यक विश्लेषण करैत छी तँ स्पष्ट प्रतिभाषित होइछ, जे युगपुरुष जीवन झा मिथिलाक संस्कृतिक अनुरूपहि फगुआक हुड़दंगक चित्रण सामवती पुनर्जन्ममे कयलनि अछि। विदर्भराज सपरिवार बैसल छथि आ मृदंग वाद्य सहित हुनक राज्य वेश्या कलावती नचैत अछि आ गीत गबैत अछि:
(अगिला अंकमे)
(अगिला अंकमे)

Suggested citation: डॉ. प्रेमशंकर सिंह. “जीवन झाक नाटकक सामाजिक विवर्तन (अंक १९ मे प्रकाशित खेप).” Videha — First Maithili Fortnightly eJournal, issue 19, 2008-10-01. https://www.videha.co.in/research/2008/19/जीवन-झाक-नाटकक-सामाजिक-विवर्तन-अंक-१९-मे-प्रकाशित-खेप.htm

मूल विदेह अंक / Original issue