विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका · VIDEHA · ISSN 2229-547X

मिथिलांचलक गाणपत्य क्षेत्र

डॉ. प्रफुल्ल कुमार सिंह ‘मौन’ · 2008-10-01 · अंक 19

मिथिलांचलक गाणपत्य क्षेत्र-
डॉ.प्रफुल्ल कुमार सिंह मौन
धार्मिक ओ सांस्कारिक अनुष्ठानसँ पूर्व गणेशक पूजनक विधान अछि कियेक तँ ओ विघ्नांतक छथि, विद्या-बुद्धिक देवता छथि, सिद्धि दाता छथि एवं पंचदेवोपासनामे परिगणित छथि। गणेशक स्वरूपक परिकल्पना देवत्व संपोषित मानव देहधारी किन्तु मस्तक एकदंत गजक अछि। मनुष्य देहधारी किन्तु पशु-पक्षी मुखी मस्तकधारी देवता सभमे वराह विष्णु, नरसिंह अवतार, अश्वमुखी अश्विनीकुमार, पक्षीमुखी गरुड़, कपिमुखी हनुमान आदि स्वयंमे एकटा अद्भुत परिकल्पना अछि। बौद्धकलामे गज, अश्व ओ सिंह धर्मक प्रतीक मानल गेल अछि, जे अशोक स्तंभ (धर्मध्वज)क रूपेँ मूर्त भेल अछि। मिथिलांचलमे हाथी (हस्तिमुख) शुभप्रद मानल जाइछ। एहि ठामक सांस्कारिक अनुष्ठान (विवाह संस्कार)मे गौड़ी पूजन ओ कोहबड़ भित्तिचित्रमे हाथीक अंकन एवं छठि ओ विवाह मण्डपपर हस्तिकलश पूजनक विधान विहित अछि। देवराज इन्द्रक वाहन ऐरावत हाथी छनि। अतः गजमुखी गणपति गणेशक स्वरूपगत परिकल्पनामे मनुष्य ओ पशुक शक्ति-सामर्थ्य विशेषक समाहारसँ एकटा नवकल्पक स्थापना भेल। वराहक (विष्णु) कर्म माँटि कोरब एवं (नर) सिंहक स्वरूप हंता (संहारक)क अछि। अतः देवस्वरूपक संरचना उद्देश्य विशेषक कारणेँ होइछ आर सभक विशद व्याख्या पुराण साहित्यमे कथाक माध्यमे भेल अछि।
गणपति गणेशक मुख्य लक्षण अछि- लम्बोदर, एकदन्त, सूढ़, स्थूलकाय, भुट्ट नाटखुट एवं हाथमे परशु, पाश, अंकुश ओ कमल। मुदा ओ मोदक प्रिय छथि। वाहन मूषक छनि। गणेशकेँ चारि, आठ अथवा दस-बारह भुजी मूर्त्ति सभ भेटाइत अछि। हिनक हाथमे राखल आयुध एवं प्रतीकित वस्तु सभक आधारपर ओ भिन्न नामसँ अभिज्ञात होइत छथि- लक्ष्मी गणपति, वक्रतुण्ड गणेश, शक्ति गणेश, हेरम्ब, महागणपति आदि। मुदा मिथिलांचलक विभिन्न ऐतिहासिक स्थल सभसँ प्राप्त गणेशक स्वरूप एहि रूपेँ मूर्त भेल अछि। कोर्थक (दरभंगा) अष्टभुजी नृत्य गणेश (आकार २४”*१०”) कमलासनपर नृत्य भंगिमामे भक्त सभक वरदायी बनल छथि। व्क्रतुण्ड गणेशक हाथ सभमे अक्षमाल, अंकुश सहित परशु, पाश, मोदक पात्र आदि धारित अछि। भोजपरौल (मधुबनी)क चतुर्भुजी गणेश कमलासनपर ललितासन मुद्रामे प्रतिष्ठित छथि। पादपीठमे मूषक वाहनक रूपेँ उत्कीर्ण अछि। साहोपररी (दरभंगा)क अष्टभुजी नृत्यगणेशक भव्य प्रस्तर मूर्ति पूजित अछि। दुनू पार्श्वमे संभवतः ऋद्धि-सिद्धि विनीत भावेँ बनल छथि। पादपीठमे भक्तजन निवेदित छथि। अहिना गणेशक मध्यकालीन प्रस्तर मूर्ति सभ हावीडीह, नेहरा, बहेड़ा, देकुली, लहेरियासराय, हिरणी, रतनपुर (दरभंगा), विष्णु बरुआर, भच्छी, भीठभगवानपुर, भगवतीपुर (मधुबनी), महादेवाडीह (दरभंगा), करियन (समस्तीपुर), वीरपुर (बेगुसराय), तिरौता (शिवहर) आदि धार्मिक एवं ऐतिहासिक स्थल सभसँ उपलभ्य एवं पूजित छथि। एकर अलावा मिथिलांचलक बेगुसराय, दरभंगा, मुजफ्फरपुर आदि संग्रहालय सभमे ओ संरक्षित अछि। सामान्य गणेश ललितासनमे वरमुद्राक संगे निर्मित अछि।
मध्यकालीन राजकीय संरक्षणमे बनल मंदिरक पाथरक कलात्मक चौखटक सोहावटीक मध्यमे गणेश अथवा गजलक्ष्मी बनयबाक चलन छल। गणेश ओ लक्ष्मी शुभसूचक देव छथि। अन्दामा (दरभंगा)क महादेवस्थानमे राखल मंदिर स्थापत्यक प्राचीन पाथरक सोहावटीमे पद्मासीन गणेशक मूर्ति एवं कोर्थ (दरभंगा)क मंदिर सोहावटीमे गजलक्ष्मी उत्कीर्ण अछि। प्रवेश द्वारक सोहावटीमे उत्कीर्ण गणेश वा गजलक्ष्मीसँ ध्वस्त मंदिरक गर्भगृहमे स्थापित मूल देव प्रतिमाक सूचक होइत अछि ओ शिवमंदिर वा विष्णुमंदिर संभावित अछि।
गणेश शिव ओ पार्वतीक पुत्र छथि, शिवगणक अधिपति गणपति छथि एवं पार्वतीक गोदमे वात्सल्यपूरित बाल गणेश छथि। पाली (दरभंगा) मे पद्मासनमे बैसल पार्वतीक गोदमे बालगणेशक एकटा गुप्तकालीन पाथरक मूर्ति मंदिरमे पूजित अछि। एहि तरहक एकटा दोसर प्राचीन कांस्य मूर्ति हाजीपुर (वैशाली)क मठसँ प्राप्त भेल अछि, जाहिमे शिव ओ पार्वती स्थानुक मुद्रामे ठाढ़ छथि। द्विभुजी शिव ओ पार्वतीक दहिन हाथ वर मुद्रामे एवं पार्वती वाम हाथे बालगणेशकेँ गोदमे समेटने छथि। एहि क्रममे सिंहपर ललितासनमे बैसल चतुर्भुजी पार्वतीक वाम गोदमे बैसल बाल कार्तिकेयक एकटा पाथरक प्राचीन मूर्तिक उल्लेख आवश्यक बुझना जाइछ (भारतीय कला को बिहार की देन, पटना, १९५८ ई. चित्र सं.१००)। एहि मूर्ति सभमे भगवतीक वात्सल्य भावक सुन्दर अभिव्यक्ति भेल अछि।
भारतीय मूर्तिकलाक परम्परामे मिथिलांचलसँ प्राप्त गिरिजाक प्राचीन पाथरक मूर्ति सभमे भगवतीक वात्सल्य भावसँ स्नात गणेश ओ कार्तिकेय पार्श्व देवपुत्रक रूपेँ उत्कीर्ण छथि। भगवती गिरिजा (मिरजापुर, दरभंगा) कुर्सोनदियामी (दरभंगा) एवं फुलहरक गिरिजास्थानक दहिन पार्श्वमे गणेश ओ वाम पार्श्वमे कार्तिकेय ठाढ़ छथि। गणेशक हाथमे मोदक एवं कार्तिकेयक हाथमे मूसल शोभित छनि। ओ द्विभुजी छथि।
गणेश ओ कार्तिकेयक स्वतंत्र मूर्ति सेहो परिकल्पित एवं मूर्त भेल अछि। ओ प्रायः शिवमंदिरमे स्थापित एवं पूजित छथि। मयूरपर आरूढ़ कार्तिकेय युद्धक देवता छथि। पुण्ड्रवर्धन (पूर्णिया क्षेत्र)मे हिनक एकटा मंदिरक उल्लेख प्राप्त अछि। मुदा वैशालीक हरि कटोरा मन्दिरमे मयूरागढ़ कार्तिकेय स्थापित एवं पूजित छथि। एहि तरहक एकटा पालकालीन पाथरक कार्तिकेयक मूर्ति बसुआरा (मधुबनी)क मठमे सेहो संरक्षित अछि। कार्तिकेयक हाथमे बरछी छनि। आइ काल्हि नवरात्रक अवसरपर भगवती दुर्गाक पार्श्वमे सामान्यतः गणेश ओ कार्तिकेयक शिल्पांकन कयल जाइछ। तहिना दीपावलीक मांगलिक बेलामे गणेशक संग लक्ष्मीक सामंजस्य (लक्ष्मी-गणेश) श्री समृद्धि ओ सुख सौभाग्यक सूचक मानल जाइछ। मिथिलांचलमे गणेश चौठ (भाद्र शुक्ल चतुर्थी) एवं महाराष्ट्रमे गणेशोत्सव व्यापक रूपेँ मनाओल जाइछ।
डॉ. जनार्दन मिश्र (भारतीय प्रतीक विद्या, पटना, १९५९ ई.) मातृरूपमे ब्रह्म विनायकक मनोरम मूर्ति सभक (चित्र सं.९ च एवं छ) उल्लेख कयने छथि ओ गणेशक शक्ति छथि। भारतीय परिप्रेक्ष्यमे प्रत्येक देवताक लेल हुनक शक्तिक परिकल्पना कयल गेल- शिव-पार्वती (उमा-माहेश्वर), विष्णु-लक्ष्मी (लक्ष्मी-नारायण), इन्द्र-इन्द्राणी आदि। सप्तमातृकाक परिकल्पना एकटा उदाहरण अछि। एहि ब्रह्म विनायककेँ शक्तिगणेश सेहो कहल जा सकैछ। एहि तरहक प्राचीन मूर्ति सभ भारतक अलावा जापान (जापान का मूर्ति तात्विक अध्ययन, बक्शी) मे सेहो पाओल जाइछ। ओना प्राचीन भारतीय साहित्यमे ऋद्धि एवं सिद्धिकेँ हुनक पत्नी कहल गेल छनि। ओ दुनू गणेशक मूल मूर्तिक संगे उत्कीर्णो भेल छथि, पार्श्वदेवीक रूपमे।
गणेशक स्वतंत्र पूजोपासना कहियासँ आरम्भ भेल, तकर निश्चित जनतबक अभाव अछि, तथापि पंचदेवोपासनाक क्रममे हिनक पूजन प्रबल भेल। गणेशक स्वतंत्र मूर्तिक दूटा रूप मिथिलांचलमे सर्वाधिक लोकप्रिय अछि- (क) पद्नासीन गणेश एवं (ख) नृत्य गणेश। भोजपरौल (मधुबनी)क पद्मासनपर ललितासनमे बैसल चतुर्भुजी वक्रतुण्ड गणेशक पादपीठमे वाहन मूषक बनल अछि। कमलासन विशाल उदर ब्रह्माण्डक सृष्टिबोधक, मूषक विघ्नक द्योतक, हाथक मोदक सृष्टिक संकेत बिन्दु, पाश-अंकुश शक्ति बोधक, वाम स्कंधसँ लटकैत यज्ञोपवीत यज्ञसूत्रधारी गणेश पूर्णब्रह्मक प्रतीक बनि गेल छथि। दहिन हाथ अभय मुद्रामे बनल अछि।
नृत्य गणेश अथवा नटेश गणेशक मूर्तरूप अपेक्षाकृत अधिक लोकग्राह्य भेल। मूर्तिकारकेँ सेहो विन्यासक नीक अवसर भेटलनि। नटराज शिवक उत्तराधिकार पुत्र गणेशकेँ प्राप्त होयब स्वभाविके। एहि दृष्टिसँ कोर्थक अष्टभुजी नृत्यगणेशक मूर्तिकेँ आदर्श मानल जा सकैछ। जकर साक्षात दर्शन कऽ मनक मयूर स्वतः नाचि उठैत अछि। ब्रह्मक निरन्तर गति ओ स्पंदनक नाम थिक नृत्य आर ब्रह्मक नृत्य भेल लीला। नृत्य गणेश त्रिभंगी मुद्रामे बनल छथि। हिनक पैरक नुपूरक ललित छन्द ओ नृत्यभंगिमायुक्त हाथ सभमे पाश, मोदक पात्र, परशुयुक्त अंकुश एवं अक्षमाला प्रमुख अछि। दहिन हाथ वरमुद्रामे बनल छनि। ठेहुन धरि अधोवस्त्र, डाँरमे कटि भूषण, कान्हसँ लटकैत यज्ञसूत्र, गरामे कष्ठाभूषण, माथपर गजमुक्ताक झालरिक संग शिखराकार मुकुट एवं हाथ सभमे कंगन सुशोभित छनि। नृत्यरत गणेश एकदंत छथि। ब्रह्मस्वरूप प्रायः देवी-देवता सभक नृत्यमयी मूर्ति निर्मित होइत छल। सप्त मातृकाक नृत्यरतमूर्ति सभक संग शिव परिवारक नृत्य गणेश अथवा नृत्य वटुक भैरवक रूपांकन सेहो भेल अछि।
करियन (रोसड़ा, समस्तीपुर)क भगवती मंदिरमे स्थापित एवं पूजित पार्वतीक अगल-बगलमे द्विभुजी गणेश एवं कार्तिकेयक पाथरक मूर्तिसभ पालकालीन थिक (करियन एक्सकेवेशन- डॉ.सीताराम राय, पटना)। गणेशक आठ इंच बलुआही पाथरक बनल मूर्तिक दुनू हाथमे मोदक छनि। लम्बोदर नृत्य गणेशक हाथ ओ पैर सभमे आभूषण एवं देहपर यज्ञोपवीत शोभित छनि। करियनकेँ वैदिक धर्मक न्यायविद् आचार्य उदयनक जन्मभूमि एवं ब्राह्मण देवी-देवता सभक सिद्ध भूमि मानल जाइछ।
सत्येन्द्र नारायण झा (मिथिला की पाल प्रतिमाएँ, मिथिला संस्कृति एवं परम्परा पृ.२५८) क सर्वेक्षणक अनुसार भगवतीपुर (मधुबनीसँ) गणेशक दूटा पाथरक मूर्तिक अलावा भगवानपुरसँ नृत्य गणेश, महदेवाडीह (गोरहट्टा, दरभंगा) एवं तिरौता (शिवहर)सँ गणेशक पालकालीन मूर्ति प्राप्त भेल अछि, जे ब्राह्मण धर्मक पुनरुत्थान एवं पंच देवोपासनाक लोकप्रियताक कारणे पालकला शैलीक विकास ओ विस्तारक क्रम बनल रहल। शिल्पक दृष्टिसँ किछु महत्वपूर्ण प्रयोग रेखांकन योग्य अछि।
सत्यनारायण झा सत्यार्थी मिथिलांचलक एकटा विलक्षण गणेशमूर्तिक सचित्र सूचना देने छथि। तदनुसार एकहि प्रस्तर खण्डमे गणेशक तीन टा मूर्ति ऊपर-नीचाक क्रममे उत्कीर्ण अछि। प्रत्येकक भंगिमा भिन्न अछि।
सत्येन्द्र कुमार झा (मिथिला की लोक संस्कृति विशेषांक, दरभंगा, २००६ ई. पृ. २४९) क्षेत्रीय सर्वेक्षणक क्रममे करियन (समस्तीपुर), बरेपुरा (बेगुसराय), मुक्तेश्वर स्थान, देवहर, मधुबनी), भगवतीपुर नाहर, विष्णु बरुआर, भोजपरौल (मधुबनी)क अतिरिक्त चन्द्रधारी संग्रहालय, दरभंगाक नृत्यगणेशक प्रतिमाकेँ विशेष महत्वपूर्ण मानलनि अछि। एहिमे करियन, मुक्तेश्वर ओ हिरौताक गणेशमूर्तिकेँ ओ प्रारम्भिक पालसेन कालीन कहने छथि। सत्यनारायण झा सत्यार्थीक सर्वेक्षणक (मिथिलाक पुरातात्विक सम्पदा, दरभंगा, २००३ ई.) सूचनानुसार कोर्थ, हाबीडीह, भीठ भगवानपुर, सौराठ, देकुली, फुलहर, बहेड़ा, भच्छी, लहेरियासराय, रतनपुर आदि स्थल सभपर विघ्नांतक गणेशक ऐतिहासिक मूर्ति सभ उपलभ्य एवं पूजित अछि। हिरणी-बड़गाँव (कुशेश्वर क्षेत्र)मे सेहो गणेशक भव्य मूर्तिक जनतब अछि। भगवतीपुरमे गणेशक दू टा प्राचीन मूर्ति स्थापित ओ पूजित अछि। विजयकान्त मिश्र (मिथिला आर्ट एण्ड आर्किटेक्चर, इलाहाबाद, १९७८ ई., प्लेट xii/ २१-२२) भगवानपुरक नृत्यगणेशक मूर्तिक उल्लेख कयने छथि। एकर अतिरिक्त तिरौताक (शिवहर) गणेश विशिष्ट अछि, अत्यल्प अलंकरण ओ पादपीठक बनावटक आधारपर गुप्तोत्तर कालक संभावित लगैत अछि। हम सकरा (मुजफ्फरपुर)मे बलुआ पाथरक एकटा गुप्तकालीन गणेशमूर्ति देखने छलहुँ।
शैलीगत विशिष्टताक आधारपर मौर्यकालमे सिर्फ मूर्ति बनैत छल। गुप्त कालमे मूर्तिक संग प्रभावली जोड़ल गेल। मुदा ग्यारहवी-बारहवी सदीमे मूर्तिकार मुख्य मूर्तिक अपेक्षा प्रभावली, सिंहासन, वस्त्राभूषण आदिक सौन्दर्याभिव्यक्तिमे विशेष कौशल देखौलनि। मिथिलांचलसँ प्राप्त पाल-सेन ओ कर्णाटकालीन गणेशमूर्ति सभ अलंकृत पाल शैलीक परम्परामे निर्मित अछि। गणेश पूजन विशेष लोकप्रिय छल, पालकालमे। एक दिस नालंदा, ओदंतपुरी ओ विक्रमशिला बौद्ध विहारक ध्वंसाविशेषसँ ब्राह्मण ओ बौद्धधर्मी मूर्तिसभ प्राप्त भेल अछि। गणेश दुनू संदर्भमे एक समान विघ्नांतक ओ सिद्धिदाता देवताक रूपमे मान्य छथि; मुदा किछु बौद्ध मूर्तिमे बौद्ध प्रभुत्वक क्रमे बौद्धदेवी अपराजिता (देवी) द्वारा गणेशकेँ मर्दित देखाओल गेल अछि। क्रद्धा देवीक वाम पैर गणेशक दहिन पैरकेँ मर्दित कयने अछि। त्रैलोक्य विजयक मूर्तिमे शिव ओ पार्वतीकेँ मर्दित देखाओल गेल अछि। मुदा ओदंतपुरी (बिहारशरीफ, नालंदा) सँ प्राप्त एकटा ऐतिहासिक शिवलिंग (चतुर्मुखी)मे एक दिस गणेश एवं दोसर दिस विष्णु मूर्तित छथि अर्थात् पंचदेवोपासनाक माध्यमसँ विभिन्न सम्प्रदायकेँ एक छत्रक (शिव) अन्तर्गत आनल गेल एकटा समन्वयात्मक चेष्टा छल। मुदा आश्चर्य, मंगरौनीक त्रैलोक्य विजयक मूर्तिमे बौद्धदेवी अपराजिताक पैरतर गणेश नहि छथि। बौद्ध लोकनि मिथिलाक ब्राह्मणत्वसँ आतंकित छल।
मिथिलांचलक लोकजीवनमे कोनो शुभ ओ सांस्कारिक अनुष्ठानमे गणेश पूजनक विधान अछि। गाथारम्भ, नाट्यारम्भ, कीर्तनारम्भ आदिमे गणेशक वन्दना प्रथमे कयल जाइत अछि- “आदित्यं गणनाथं च देवी रुद्रं च केशवम्। पञ्चदैवत्य मित्युक्तं सर्वकर्मसु पूजयेत”।– मत्स्यपुराण। मिथिलाक चौथचन, गौड़ी-गणेश, लक्ष्मी गणेश आदि प्रकारान्तरसँ गणेश-पूजन थिक”।
शिवमंदिरमे पार्वती, गणेश, कार्तिकेय, नन्दी ओ प्रायः भैरवक मूर्तिक स्थापन ओ पूजनक विधान अछि। मुदा कौटिल्यक अर्थशास्त्र (३५० ई.पू.) कालमे दुर्गक अन्दर दुर्गा, विष्णु, कार्तिकेय (जयन्त), इन्द्र (वैजयन्त), कुबेर (वैश्रवण) आदिक स्वतंत्र मंदिरक प्रावधान अछि, “राजतरंगिणी”क अंतः साक्ष्यक अनुसार पुण्ड्रवर्धन (पूर्णिया)मे कार्तिकेयक मंदिरक उल्लेख प्राप्त होइछ। रजौनाक एकटा गुप्तकालीन स्तंभावशेषमे गंगाधर शिवक एवं गणेश कार्तिकेयक मूर्ति उत्कीर्ण अछि (सम्प्रति कलकत्ता संग्रहालयमे)। गरुड़ पुराण एवं करतोया माहात्म्यमे कार्तिकेयक पवित्र मंदिरक साक्ष्य स्रोत उपलब्ध अछि। गणेश पुराणक क्रीड़ा खण्ड (श्लोक १३८-१४८)क श्री गणेशगीतामे गणेश राजा वरेण्यकेँ योगसाधनाक शिक्षा देने छथि। देकुलीक (दरभंगा)क मंदिरालयमे गणेशक मूर्ति ऐतिहासिक ओ पूजनीय अछि। डॉ. वी.पी.सिन्हा (भारतीय कला को बिहार की देन, पटना) मे शाहावाद जिलासँ प्राप्त एकटा कार्तिकेयक प्राचीन मूर्तिक उल्लेख कयने छथि। एकटा हाथमे बरछी ओ दोसर वरमुद्रामे उत्कीर्ण अछि। ओ विवाह नहि कयलनि, तँ कुमार कहबैत छथि। मुदा हुनक शक्ति देवसेनाक परिकल्पना कयल गेल अछि जे सप्तमातृकामे कौमारीक रूपमे प्रतिष्ठित छथि। एहि शक्तिक चित्र (सं.१०१) आलोच्य पोथीमे प्रकाशित अछि। तदनुसार द्विभुजी कार्तिकेयक शक्ति स्थानक मुद्रामे ठाढ़ छथि। वरमुद्रामे एवं पार्श्वमे मयूरी विनीत भावमे ठाढ़ अछि। डॉ कंचन सिन्हाक एहि सम्बन्धमे शोध ग्रंथ प्रकाशित अछि- कार्तिकेय इन इण्डियन आर्ट एण्ड लिटरेचर (दिल्ली १९७९ ई.)। तहिना मिथिलांचलक किछु गणेश मूर्तिक अनुशीलन डॉ चितरंजन प्र. सिन्हा (मिथिला भारती, अंक-१, भाग-२) प्रकाशित अछि।
पाली (दरभंगा)क गुप्तकालीन पार्वतीक गोदमे गणेश मातृस्नेहक सुख पावि रहल छथि, तहिना भागलपुर जनपदसँ प्राप्त एकटा ऐतिहासिक, प्रस्तरमूर्तिमे चतुर्भुजी पार्वतीक गोदमे कार्तिकेय शोभित छथि (सम्प्रति पटना संग्रहालयमे संरक्षित)। मुदा लालगंज (वैशाली)क शिवपरिवारक एकटा विशाल मूर्तिमे बसहाक पीठपर शिव-पार्वती ओ गणेश-कार्तिकेय सभ केओ संगे अभिशिल्पित छथि। मिथिलांचलमे कार्तिकेयक स्वतंत्र प्रतिमा गणेशक अपेक्षा कम भेटाएल अछि मुदा बसाढ़ (वैशाली) ओ बसुआरा (मधुबनी)क कार्तिकेयक पालकालीन प्रस्तर मोर्ति ऐतिहासिक एवं दुर्लभ कलाकृति थिक। दक्षिण भारतमे हिनक पूजा-अर्चना विशेष होइछ। आजुक सांस्कृतिक परिवेशमे नवरात्रक अवसरपर प्रतिवर्ष निर्मित दुर्गाक मूर्तिक पार्श्वमे गणेश-लक्ष्मी ओ कार्तिकेय-सरस्वतीक मूर्तिक लोकप्रियता विशेष अछि।
एक दिस गणपति गणेश नटराज शिवक परम्परामे नृत्यनाथक रूपेँ मल्लकालीन मैथिली नाटकसभ (नेपालक मैथिली साहित्यक इतिहास, प्रफुल्ल कुमार सिंह “मौन”, विराटनगर, नेपाल, १९७२ ई.)मे संपूजित छथि तँ दोसर दिस ओ मैथिली लोकगाथा गायनसँ पूर्व हिनक भक्तिपूर्ण स्मरण कयल जाइछ। एवं प्रकारेँ मिथिलांचलक प्रायः समस्त जनजीवनमे कोनो न कोनो रूपेँ ओ लोकक श्रद्धापूर्वक निवेदित अछि।

Suggested citation: डॉ. प्रफुल्ल कुमार सिंह ‘मौन’. “मिथिलांचलक गाणपत्य क्षेत्र.” Videha — First Maithili Fortnightly eJournal, issue 19, 2008-10-01. https://www.videha.co.in/research/2008/19/मिथिलांचलक-गाणपत्य-क्षेत्र.htm

मूल विदेह अंक / Original issue