लोअर दिवांग घाटी: इदु-मिसमी जनजातिक अनुपम संसार
क्षेत्रफलक दृष्टिकोणसँ अरुणाचल प्रदेश सम्पूर्ण उत्तर-पूर्व भारतमे सबसँ पैघ राज्य थीक। हालाँकि जनसंख्याक घनत्व एतए सबसँ कम छैक। समस्त राज्य हरियर जंगल, पहाड़सँ भरल; रम्य आ आकर्षक। एहि राज्यमे २६ मूल जनजाति अनेक उपजातिक संग रहि रहल अछि। अरुणाचलक अधिकांश क्षेत्रमे पहुँचनाई आइयो बहुत कठिन कार्य छैक। एक ठाम पहुँचबाक हेतु कतेको बेर नदी पार केनाइ, कतहु पक्का सड़कक नहि भेनाइ, कतहुँ जमीन धसि जेबाक कारणेँ रस्ता अवरुद्ध भऽ गेनाइ इत्यादि सामान्य बात छैक। एहि कठिन परिस्थितिक कारण एतय केर जनजाति सब एखनो धरि अपन मूल परम्परा, खान-पान, आभूषण, वस्त्र-विन्यास, रीति-रिवाजकेँ सहेजने छथि। अनेक दिस चीन एवं आन अन्तर्राष्ट्रीय सीमासँ सटल भारतक ई नैसर्गिक प्रदेश सौन्दर्यक दृष्टिसँ भारतवर्षक श्रृंगार थीक। एकर प्राकृतिक स्वरूपक जतेक प्रशंसा कएल जाय से कमे होयत। अरुणाचलक नाम लैते मात्र तवांग, ईटानगर (प्रदेशक राजधानी), बोमडिला, बन्दरदेवा, रोईंग, जीरो, तिराप, सुबंसरी, नामसाई आ अनेक रम्य स्थान हमरा मानस पटलमे घुमय लगैत अछि।, आ घुमय लगैत अछि रंग-विरंगक परम्परागत परिधानसँ सजल अरुणाचल प्रदेशक जनजाति- सेड्रोपेन, खामती, आदी, इदू-मिसमी, दिगारु-मिसमी, मिजो-मिसमी, आपातानी इत्यादिक झुण्डक-झुण्ड अपन सहजतामे हँसैत आ आबय बला प्रत्येक अतिथिकेँ अपन स्वभाविक आ स्वीकारात्मक मुस्कानसँ स्वागत करैत। बिना कहने सब किछु कहैत।
ताहिँ यायावरीक एहि अंकमे हम अपन लोअर दिवांग घाटी जिलाक यात्रा वृत्तान्तक चरचा कऽ रहल छी। प्रदेशक दिवांग घाटी दू भाग- अपर दिवांग घाटी आ लोअर दिवांग घाटीमे बाँटल छैक। हम अपन यात्रा अपन संस्थाक एक सहयोगी डॉ. ऋचा नेगीक संग दिसम्बर २००७मे केने रही। लोअर दिवांग घाटी तँ ठीक रहैक परन्तु अपर दिवांग घाटी जनपदमे अति बर्फ खसलाक कारणेँ बिल्कुल अवरुद्ध छलैक। ताहिँ हमरा लोकनि ई निर्णय लेलहुँ जे अपना आपकेँ सिर्फ लोअर दिवांग घाटी जनपद तक सीमित राखब आ ओतय केर इदु-मिसमी जनजातिपर कार्य करब। कार्यक मतलब ई जे इदु-मिसमीक जीवन-चक्र, गृह-निर्माण, पावनि-तिहार, वस्त्र-विन्यास, श्रृंगार-प्रसाधन, गहना, विवाह, कृषि-कार्य, स्त्री-पुरुषक सम्बन्ध, परम्परागत क्रीड़ा आदिक विस्तारसँ प्रलेखन आ डाक्युमेन्टेशन केनाइ। इदु-मिसमीक भाषा, संस्कृतिसँ अपना-आपकेँ अवगत करेनाइ।
डॉ. ऋचा नेगी एक प्रतिष्ठित आ वरिष्ठ मानवशास्त्री प्रोफेसर रघुनाथ सिंह नेगीक पुत्री छथि। ओना तँ हिनकर शिक्षा अंग्रेजीमे एम.ए. एवं अंग्रेजीयेमे लोक नाट्यपर छन्हि, परन्तु भ्रमणमे खूब मोन लगैत छन्हि। ई अलग बात छैक जे ओ एको आखर लिखयसँ सदरिकाल बचबाक बहाना बनबयमे माहिर छथि। ऋचाजीकेँ समस्त अऋणाचल प्रदेशसँ अथाह प्रेम छन्हि। हमरासँ ज्यादे ओ अरुणाचल प्रदेशमे रहैत छथि। जखन-कखनहु हमरा लोकनि उत्तर-पूर्व भारतक यात्रा करैत छी तँ गोवाहाटी जाइते मात्र ऋचाजी कोनो-ने-कोनो बहाना बनाय अरुणाचलक हेतु प्रस्थान कऽ जाइत छथि। पुनः दिल्ली वापस अयबाक नियत तिथिसँ एक-दू दिन पहिने गोवाहाटी आबि जाइत छथि। कद-काठी, उजरी गोराइ एहेन छन्हि जे सहजतासँ अरुणाचलमे खइप जाइत छथि। लम्बाई पाँच फुटसँ ज्यादे नहि हेतन्हि। एहि सब कारणेँ अरुणाचलमे लोक ऋचाजीकेँ स्थानीय बुझैत छन्हि। एहि बातपर ओ बड्ड प्रसन्न रहैत छथि।
बात लोअर दिबांग घाटी जनपद केर यात्राक सम्बन्धमे करैत रही। ई हमर प्रथम यात्रा छल, परन्तु ऋचाजी एकबेर पहिने आबि एहि जनपद केर डिस्ट्रिक्ट रिसर्च ऑफिसर, भाषा अधिकारी, जिला कला आओर संस्कृति अधिकारी एवं किछु स्थानीय लोक सभसँ बातचीत कय कार्यक्रम केर रूपरेखा बना कऽ गेल छलीह। ताहि परियोजनाक कार्यान्वयनमे हमरा लोकनिकेँ कोनो तरहक दिक्कत नहि भेल।
लोअर दिबांग घाटी जनपद केर मुख्यालय केर नाम रोईंग छैक। रोईंग ओना तँ जनपद केर मुख्यालय थीक परन्तु जनसंख्या आदिक दृष्टिएँ एना लागत जेना कोनो प्रखण्ड-स्तर केर कस्बा हो। ताइमे रोईंग पहुँचनाइ बहुत दुश्कर। हमरा लोकनि दिल्लीसँ हवाई जहाजसँ असम राज्य डिब्रूगढ़ अयलहुँ। डिब्रूगढ़सँ दू टाटा सूमो टेक्सी लेल। एक टेक्सीमे हम आ डॉ. ऋचा नेगी आ दोसर टेक्सीमे हमरा लोकनिक विडियो कैमराक सदस्य लोकनि अपन असला-खसला लय सवार भऽ गेलाह। डिब्रूगढ़ हवाई अड्डासँ हमरा लोकनि तीनसुकिया अयलहुँ। ओतय जरूरीक किछु समान जेना कि टॉर्च, रेनकोट, छत्ता, खयबाक हेतु नमकीन आदि कीन रोईंग लेल प्रस्थान कएल। तीनसुकियासँ रोईंग कोनो बड्ड दूर नहि छैक। लगभग ७५-८० किलोमीटर हेतैक मुदा पहुँचनाइ दुष्कर। सर्वप्रथम हमरा लोकनि सदियाघाट नामक स्थान जे कि ब्रह्मपुत्र नदीक कछेरपर छैक, पर पहुँचलहुँ। ओतयसँ एक प्राइवेट फेरीवलासँ बात कय अपन दुनू टेक्सीक संग ब्रह्मपुत्र पार करबाक हेतु मोटरबला नावमे सवार भेलहुँ। सवार होमाक प्रक्रिया मात्रमे लगभग सवा घन्टा लागि गेल।
आब हमरा लोकनिक नाव ब्रह्मपुत्रक दोसर कछेरक यात्राक हेतु प्रस्थान कऽ चुकल। नावकेँ चलिते एना बुझायल जेना कोनो समुद्रक बीच आबि गेलहुँ। चारू दिस जलमग्न। ऊपरसँ साँझ से भऽ गेल रहैक। ब्रह्मपुत्रक शान्त स्वभाव आ नावक मोटरक पानि काटक प्रक्रियाक कारणेँ एक अलग किस्म केर बनैत पानिक स्वरूप, वर्षाक कारणेँ मटियाएल पानि, हमरा नीक लगैत छल। नाव बला सभ कहलक जे सदियाघाटसँ दोसर दीयरा दिस जायमे लगभग सवा घंटा लागत। लगभग १० मिनट पानिमे चललाक बाद नावक मलाह अपन खोलीसँ एक छोट छिन्ह बोतल निकाललक। बोतल पौआ देशी दारुक रहैक। आधा भरल। दू आरमी बिना पानि मिलेने आधा-आधा घटकि लेलक आ जय कमला मइया कहैत खाली बोतलकेँ ब्रह्मपुत्रमे फेंकि देलकैक। पुनः ओ सब आपसमे मैथिलीमे वार्तालाप प्रारम्भ केलक।
हम पुछलियैक: “अहाँ लोकनि कतय केर छी”?
हम सब बिहारक छी”। ओ सब उत्तर देलक।
हम पुनः पुछलियैक:”बिहारक छी से तँ हम बुझि गेलहुँ, बिहारक कोन जिलामे अहाँ लोकनिक घर थीक?”
ताहिपर ओ जवाब देलक- “हमरा लोकनि पूर्णियाँ जिलासँ छी”।
एहिपर हम कहलियैक- “हम मधुबनीसँ छी”।
एकर बाद हमरा लोकनि अपन वार्तालाप मैथिलीमे शुरु कऽ देल।
मलाह हमर दिस इंगित भय कहलक- “सरकार अहाँ लोकनि कतयसँ आयल छी”।
एहिपर हम कहलियैक, “हम मधुबनीसँ छी”।
एकर बाद हमरा लोकनि अपन वार्तालाप मैथिलीमे शुरू कऽ देल।
मलाह हमरा दिस इंगित भय कहलक: “सरकार अहाँ लोकनि कतयसँ आयल छी”?
हम जवाब देलियैक: “दिल्लीसँ। हमरा लोकनि भारत सरकारक अधीनस्थ कर्मचारी छथि। लोअर दिबांग घाटी जिलामे ओतय केर लोकक विशेषतः इदु-मिसमी जनजातिक संस्कृतिकेँ बुझबाक हेतु एवं ओहि संस्कृतिपर कार्य करबाक हेतु आयल छी”।
हमर जवाब सुनि मलहबा भैया पुछलक: “सरकार, अहाँ सब कहियासँ कहिया धरि लोअर दिबांग घाटीमे रहब? लोअर दिबांग घाटीक मुख्यालय रोईंग छैक। रोईंगमे कतय रहब”?
हम कहलियैक: “भाई, हम सब दिन भरि तँ भिन्न-भिन्न गाम सबमे कार्य करब आऽ रातुक विश्राम रोईंग केर कोनो होटलमे करब। रोईंगक ई हमर प्रथम यात्रा थीक ताहिँ होटल आदिक नाम हमरा बुझल नहि अछि। हँ ओतय केर जिला शोध अधिकारी श्री श्रुतिकर हमर पूर्व परिचित लोक छथि। हमर जे महिला सखी छथि (डॉ. ऋचा नेगी) सेहो रोईंग एवं आस-पास केर इलाकासँ पूर्व परिचित छथि। श्री श्रुतिकर एवं डॉ. ऋचा नेगी दुनू गोटे मिलि सम्भवतः नीक जगहमे हमरा लोकनिक रात्रि-विश्रामक व्यवस्था करतीह ई विश्वास अछि। जहाँ तक कार्य करबाक बात छैक तँ हमरा लोकनि २४ फरबरीसँ १ फरबरी २००८ धरि सम्पूर्ण लोअर दिबांग घाटीमे कार्य करबाक योजना बना कऽ आयल छी। आगाँ भगवानक मर्जी”।
हमरा लोकनि बात करिते रही, ओहि बीच एकाएक बरखाक एक-आध बुन्द खसय लगलैक। हम डरि गेलहुँ। भेल कहीं बीच ब्रह्मपुत्र धारमे नहि फँसि जाइ। डरैत पुछलियैक : “कहीं जोरसँ बरखा तँ नहि हेतैक? आ भेलैक तऽ हमरा लोकनि केर की गति हैत”?
हमर अकुलायल प्रश्नसँ परेशान होइत मलहबा भाइ हँसैत एवं निर्भीक स्वरमे बाजल- “सरकार, अनेरे किएक परेशान भऽ रहल छी? ई बरखा ओना तँ हैत नहि आ किनसाइत भइयो गेल तँ चिन्ताक कोनो बात नहि। हमसब जलकर केर सन्तान छी। महाराज कोइलाबीरक पुजारी छी। कोशी माइ केर कोरामे बढ़ल छी। कहू मालिक! कोसीसँ खतरनाक भला कोनो धार दुनियाँमे भला भऽ सकैत अछि? कमलेसरी मैयाक कृपा हमरा सब पर छन्हि। लगभग १५ बरखसँ नाव चला रहल छी, आइ तक कोनो दुर्घटना नहि घटित भेल। बिना कमलेसरी आ कोइलाबीरक सुमिरन केने घरसँ नहि निकलैत छी”।
मलहबा भाइ केर ढ़ाढ़ससँ मोन कनि चैन भेल। वार्तालापक कड़ी टूटल नहि। हम पुछलियैक: “अहाँ सब हमरा ई कहू जे पुरनियाँसँ सरिमाघाट कोना अयलहुँ।
मलहबा भैया कहलक : “सरकार, पेट अनलक। गाममे बड्ड गरीबी छल। एकटा बाभनसँ हमर बाबू तीन सय टाका हमर बहिनक बियाह लेल सूदिपर लेलकैक। एहि आशामे जे धान-पानि नीक जकाँ हैत तँ धान बेचि एवं मखानक खेतीक पाइसँ कर्जा सधा देबैक। दुर्भाग्यसँ लगातार तीन बरख कोसीमे बाढ़ि अबैत रहलैक आ बभनाक पाइ सधेनाइ तँ दूर हम सब अपन पेट भरक लेल धान आ अन्न सेहो डेढ़ापर लय लेलियैक। सब टा चीज बढ़ैत गेलैक। अन्ततः पाँच बरखक बाद डकूबा बभना सब टा जोरि-जारि चालिस हजार टका बना देलकैक। गाममे पंचैती बैसलैक। हमर बूढ़ बाबूकेँ बभनाक बेटा सभ बान्हि कऽ मारलकैक। हमरा सबहिक तीन बीघा जमीन बलजोरी लिखा लेलक”।
“मालिक! मरता क्या नहीं करता! एक दिन साँझ खन हमर बाबू हमरा दुनू भाइकेँ बजौलक आ कनैत कहलक। ’बौआ! हम तँ बीट-बीट धरतीकेँ बेचि देलियौ। आब तोँ सब धरतीहीन छैं। जो कलकत्ता-असम कतहुँ कमा आ पाइ भेज जाहिसँ गुजर चलौक ’। एकर बाद बाबू हमरा दुनू भाइकेँ पकड़ि जोर-जोरसँ कानय लागल”।
“बाबूक बात तँ सत्य छलैक। हमर दुनू भाइ गामसँ कनियाक गहना बन्हक राखि कलकत्ता आबि गेलहुँ। कलकत्तामे मोहियाबुर्ज नामक स्थानपर रिक्शा चलाबय लगलहुँ। शुरूमे तँ बड्ड थकान भेल परन्तु धीरे-धीरे मोन लागि गेल। बाबू आ बच्चा सबहक बड्ड ध्यान अबैत छल। एक दिन साँझमे टेलिग्राम आयल जे “बाबू मरि गेल”। देखियौ सरकार, हमर बाबूक दुर्भाग्य, मरऽ काल हम दुनू भाइ बाबू लग नहि रहियैक। हमर पितियौत आगि देलकैक”।
“बाबू श्राद्धमे गाम गेलहुँ तँ किछु लोक कुटमैतीक नोत पूरक हेतु अयलाह। ओ सब कहलनि असम चलू। हम सब असम आबि गेलहुँ। तहियेसँ सदिया घाटमे छी। बाबू तँ हमर जमीनक शोकमे मरि गेल, मुदा हम सब १५ बरखमे पाँच बीघासँ ऊपर जमीन लेलहुँ। माय एखनहु जीबैत अछि। माय हमेशा कहैत अछि। ’रे रामओतार! तोहर बाऊ तोरा स्वर्गसँ आशीर्वाद दैत छौह। बभनाकेँ देख, कुष्ट फुटि गेल छैक। बेटासभ लगो नहि अबैत छैक। घरबाली मरि गेलैक। अपने असगरे टाहिं-टाहिं करैत अछि’। सरकार हमरा सबकेँ होइत अछि जे स्वर्ग-नरक सब एहि धरतीमे छैक”।
हम रामओतारकेँ कहलियैक- “हमरा बड्ड प्रसन्नता भेल जे तोँ सब एतय इमानदारीसँ मएहनति कय सम्पत्ति अर्जन करैत छह। नीक चीजक परिणाम नीके होइत छैक”।
संयोग नीक छल। कनीक बुन्दी-बान्दी भय आकाश स्वच्छ भऽ गेलैक। बरखा नहि भेलैक। मोन खरहर भऽ गेल। ओना जनवरी-फरवरी महिना प्रचण्ड जाड़, बरखा आ बर्फ खसबाक समय छैक लोअर दिबांग घाटीमे। अपर दिबांग घाटी तँ एहि मासमे आबाजाही साफे बन्द भऽ जाइत छैक। समस्त इलाका बर्फ आऽ पानिसँ भरल। रस्ता सबपर बर्फक परत दर परत जमल रहैत छैक। स्थानीय लोक सब दू तीन मास पहिने जरूरी समान जेना कि नोन, तेल, मसल्ला, दवाइ, वस्त्र, इन्धन, अन्न आदिक भण्डारण कऽ कए राखि लैत अछि।
खैर! थोरेक कालक बाद घाटक दोसर कछेरपर हमरा लोकनि पहुँचि गेलहुँ। आब राति भऽ गेल छल। पता चलल जे ओतयसँ रोईंग शहर लगभग ५५ किलोमीटर केर दूरीपर अवस्थित छैक। ५५ किलोमीटरमे लगभग १५ किलोमीटर दियारा अर्थात् बालु आ कादोसँ भरल कच्चा रस्ता। पहिने गेल गाड़ीक लीकपर चलैत रही। खूब सावधानीक संग। ड्राइवरक गति आ दिमाग दुनू चीजक आश्चर्यजनक सामंजस्यक संग चलबाक जरूरत। से नहि भेल तँ कतहुँ फँसि जाएब।
हमरा लोकनिक गाड़ी टाटा-सूमो छल। गाड़ीक ड्राइवर धर्मा बड़ा तेज आ बातूनी। ऋचा नेगीकेँ हाँ मे हाँ मिला कऽ बेबकूफ बनेबामे माहिर। ओना ड्राइवरीमे ओतेक निपुण नहि जतेक बात बनेबामे। हम सब अन्हरिया रातिमे ओहि सुन-सान दियारामे जाइत रही। एकाएक गाड़ीक पछिला चक्का थालमे फँसि गेलैक। हम सब कियो बाहर निकललहुँ। किछु कारणवश ऋचाजी सँ बाताबाती भऽ गेल रहए ताहिँ वार्तालाप नहि चलैत छल। ऋचाजी अपन शेखी बखारय लगलीह। तुरत अपन भायक दोस्त जे कि गोरखा रेजीमेन्टमे छलन्हि तकरा फोन करय लगलीह। एम्हर हमरा लोकनि डण्टा आऽ खन्तीसँ पछिलका चक्का आ मडगार्ड लग जमल माटिकेँ हटाबय लगलहुँ। लगभग आधा घण्टा धरि ऋचाजीकेँ फोनो नहि लगलन्हि। जखन लगलन्हि तँ गोरखा रेजीमेन्ट केर ऑफिसर सब कहलकन्हि जे आबयमे ओकरा सबकेँ थोरेक देर लगतैक कारण ओऽ सब कोनो दोसर ठाम फँसल गाड़ीकेँ निकालबाक हेतु पहिनेसँ कतहु गेल छैक।
खैर! हमरा लोकनि अपन प्रयासमे लागल रही। हमरा लोकनिक मणीपुरी कैमरामेन या विडियोग्राफर रोनेल हाओबाम आ जेम्स बड़ा उत्साही युवक छलाह। ओ सभ पूर्ण तन्मयताक संगे कादो निकालयमे लागल रहलाह। हुनका लोकनिक साहसकेँ देखैत हमहू सेतु बान्हक लुक्खी जकाँ कनी-कनी माँटि निकालैत रहलहुँ। हमरा सभ लग दुर्भाग्यसँ टॉर्च आदि सेहो नहि छल।
ओहि बीचमे धर्मा ड्राइवर बाजल जे एहि रस्तामे चलबाक हेतु जरूरी छैक जे गाड़ीमे एक कोदारि, एक खन्ती, एक टॉर्च आदि लऽ कऽ चलए”।
धर्मा पहिनहुँ ऋचाजीक संग लोअर दिबांग घाटीमे आबि चुकल छल। हम आब ओकरापर कनी तमसेलहुँ- “तोँ पहिने किएक नहि खन्ती, कोदारि, टॉर्च आदि नहि अनलैंह? जखन रस्ताक बारेमे बूझल छलौक तँ एना केयरलेस किएक”?
ऋचाजी धर्माकेँ बचेबाक मुद्रामे हमरा लग अयलीह। एहिसँ पहिने जे ओऽ किछु बजितथि, हम कहलियैन- “अहाँ लेल नीक हैत जे अहाँ एकौ शब्द नहि निकालू। हम एखन घोर तामसमे छी! अहाँ सभ पहिने की एतय पिकनिक मनेबाक हेतु आयल छी”?
ऋचाजी हमर तामससँ पूर्व परिचित छलीह। ओऽ चुपे रहबामे अपन कल्याण बुझलनि आ किछु बातक जवाब नहि देलीह। ओना रोनल आऽ जेम्स केर जतेक प्रशंसा करी से कम। दुनू बिना एकौ मिनट केर आरामक कादो हटबैत रहलाह। हमहूँ तमसाइत, चिचियाइत रहलहुँ मुदा कादो हटेबाक कार्यकेँ रुकय नहि देलियैक। अन्ततः हमरा लोकनि अपन उद्देश्यमे सफलता प्राप्त कएल। गाड़ी कादोसँ बाहर भेल। आब रातिमे बौआइत डेराइत हमरा लोकनि अपन गन्तव्य दिस बढ़य लगलहुँ। लगभग १५ किलोमीटर आगाँ बढ़लाक बाद गोरखा रेजीमेन्ट बला सब एक जीप आऽ एक ट्रकक संग हमरा लोकनि लग आयल। धर्मा ड्राइवर ओकरासभकेँ बता देलकैक जे हमरा लोकनिक टाटा सूमो स्वतः हमरा लोकनिक प्रयाससँ ठीक भऽ गेल।
मुदा ऋचाजी कतय मानयबाली। सेना जीपकेँ रोकबाक इशारा करैत स्वयं गाड़ीसँ बाहर अयलीह। हाथ मिलेलन्हि। मुद्रा एहेन बनेली जेना भारतक तीनू सेनाक सर्वोत्कृष्ट अधिकारी होथि। हम तामसे भेर रही।
खैर लगभग साढ़े दस बजे रातिमे हमरा लोकनि रोईंग आबि एक स्थानीय होटलमे अयलहुँ। आब पानि खूब जोरसँ होबय लगलैक। होटलक मैनेजर एक बंगाली भद्रलोक छलाह। कनीक फुचफुचाएल। लगभग ६२ वर्षक श्यामवर्ण। मोटुका चश्मा धारण केने। हम सभ जखन होटल अयलहुँ तँ पता चलल जे जिला शोध अधिकारी डॉ. पी.के.श्रुतिकर एवं जिला भाषाधिकारी श्री जेमि पुलू महोदय हमरा लोकनिक रहय केर व्यवस्था डॉ. ऋचा नेगीसँ दूरभाषसँ भेल बातचीतक आधारपर पूर्वहिँ एहि होटलमे केने छलाह। डॉ. श्रुतिकर स्वयं कतहु व्यस्त छलाह ताहिँ लोअर दिवांग घाटीक जिला कला एवं संस्कृति अधिकारी श्री गोगोई लींगि एवं जिला भाषाधिकारी श्री जेमिपुलूकेँ हमरा लोकनिक स्वागत एवं दिशा निर्देशन हेतु होटलमे पठा देने रहथि। जार प्रचण्ड रहैक। थर-थर कँपैत आ ऊपरसँ पानिमे भिजैत कोनो तरहेँ हमरा लोकनि होटलक प्रांगणमे प्रवेश केलहुँ। होटलक स्वागत कक्षमे प्रवेश करिते मात्र बिजली गुम भऽ गेलैक। अन्हार गुप्प!!! होटल केर मैनेजर साहेब तुरत एकटा १३-१४ वर्षीय बच्चाकेँ बजौलाह। ओऽ बच्चा सेहो मोतीहारी जिलाक रहैक। बच्चाकेँ डटैत मोमबत्ती लयबाक निर्देश देलथिन्ह। हम कहलियन्हि- “एतय जेनेरेटर केर व्यवस्था नहि छैक की”? ताहिपर गोगोई लींगि महोदय कहलाह- “एतय ई सभ सुविधा कोना भेटत? एतय केर सभसँ नीक होटल यैह छैक। समय कोहुना बिताबय पड़त। एहिसँ नीक समस्त रोईंग शहरमे कोनो स्थान नहि छैक”।
कनीक कालक बाद ओ बच्चा (होटल केर नौकर) तीन टा मोमबत्ती लय हमरा लोकनि लग एक आरो नौकरक संग आयल। पता चलल जे हमरा लोकनिक व्यवस्था होटल केर तेसर तल्लापर अछि। जखन तेसर तल्लापर पहुँचलहुँ तँ घोर पश्चाताप भेल। तमाम कमरासभ दुर्गन्धसँ भरल। कोनो कमरामे लैट्रिन-बाथरूम संलग्न नहि, मूस सभ एम्हर-ओम्हर दौड़ैत; ओछाओन सभ मैल, मसुआएल आ दुर्गन्धसँ भरल। भेल, हे भगवान। कतय आबि गेलहुँ। अन्ततः एक कमरा कनीक नीक लागल। हम अपन लैपटॉप बला बैग लय ओहि कमरा दिस आगाँ बढ़ि कहलियैक जे- “हमर समान एतय राखू”।
बीचहिमे जिला कला एवं संस्कृति अधिकारी श्री गोगोई लींगि महोदय झटाक दऽ बाजि उठलाह- “नहिँ, नहिँ। एहि कमरामे अहाँ नहि रहि सकैत छी। कोनो आन कमरा पसन्द कऽ लिअ। ई कमरा हमरा लोकनि डायरेक्टर महोदया लेल सुरक्षित रखने छी”।
ई कहि गोगोई लींगि ऋचाजीक बैग लय ओहि कमरामे आबि गेलाह। फेर होटलक नौकरकेँ निर्देश देलथिन्ह: “एहि कमराकेँ ठीकसँ साफ कय डॉ. ऋचा नेगी लेल तैयार करह”।
हम तामसे भेर भऽ गेलहुँ। तामससँ काँपैत कहलियैक: “कियोक डायरेक्टर नहि अछि एतय। जैह ऋचा नेगी छथि, सैह हमहुँ छी। दू तरहक कमराक निर्देश अहाँ लोकनिकेँ के देलक”?
तावत ऋचाजी ओतय आबि गेल छलीह। ओऽ तुरतहि अपन गलतीकेँ ठीक करऽ लगलीह। गोगोई लींगिसँ हमर परिचय करओलन्हि: “ई डॉ. कैलाश कुमार मिश्र छथि। हम सभ दुनू गोटे शोध अधिकारी छी। ई ज्यादे काल असम, मणीपुर, मेघालय, नागालैण्ड, त्रिपुरा आदिमे व्यस्त रहैत छथि। अरुणाचल मूलतः हमहीँ अबैत छी। हिनका यैह कमरा देल जाय”।
हम ऋचाजीकेँ किछु नहि कहलियन्हि। अपन समान ओही कमरामे राखि लेल। गोगोई लींगि महोदय एवं भाषाधिकारी जीमि पुलू महोदयसँ हाथ मिला अपन समान सभ ठीक करय लगलहुँ। ओऽ सभ ऋचाजी एवं हमर टीमक आन सदस्य सभ लेल कमराक व्यवस्थामे लागि गेलाह। आब बिजली सेहो आबि गेल छलैक। हम मुँह हाथ धोबय चाहैत रही। मुदा पानि सर्द एतेक जेना बर्फ हो। की करू? घंटी बजाय मैनेजर साहेबकेँ बजाओल आ निर्देश देलोयन्हि जे तुरत गरम पानिक व्यवस्था करओल जाय।
पन्द्रह मिनटक बाद एक लड़का एक बाल्टीन पानि लए प्रवेश कएलक। आब हम कपड़ा बदलि मुँह हाथ धोलहुँ। हाथमे थाल इत्यादि लागल छल। तकरा नीक जकाँ साफ कयल। कनीक कालक बाद रात्रिक भोजन केर व्यवस्था भेल, मोटका चाउरक भात, हरियर तरकारी, स्थानीय साग, मुर्गाक मांस, मसुरिक दालि, टमाटर, पियाज, मुरइ, हरियर मिरचाई इत्यादि केर सलाद। रोटीक कल्पना केनाई मूर्खता। ताहिँ भोजन करय लगलहुँ। मुदा भोजनमे कोनो स्वाद नहि। भूख हदसँ ज्यादा, मुदा स्वादहीन भोजन खाऊ तँ कोना! तावतमे कैमरामेन रोनल आ जेम्स हमरा लग आबि गेलाह। कहलन्हि- “सर, ई भोजन अहाँ नहि खाऽ सकैत छी। स्थानीय मसाला आऽ बिना तेलक बनल छैक। हमरा लोकनि बड्ड भुखायल छी। एतय एक सप्ताह रहबाक सेहो अछि। अहाँ दू पैग रमक लऽ लिअ। जाड़ सेहो ठीक भऽ जाएत। एक आज्ञाकारी शिष्य जकाँ हम बिना कोनो तर्क केने रोनल आ जेम्सक बात मानि लेलहुँ। जेम्स एक स्टील बला ग्लासमे एकै बेर दू पैग रम ढारि पानिसँ भरि हमरा लग अनलन्हि। हम धीरे-धीरे पी लेलहुँ। आ नीक जकाँ भोजन कय डायरी लीखय लगलहुँ। कनीक कालक बाद ऋचाजी अयलीह। कहलन्हि: “हम अहाँसँ किछु बात करय चाहैत छी”।
हम कहलियन्हि: “हम एखन बात करबाक मूडमे नहि छी। काफी थाकल छी। अपसेट सेहो छी। अहाँ हमरासँ भोरमे बात करू।
ऋचाजी फेर कहलन्हि- “हमरा बुझा रहल अछि जे गोगोई लींगिक बातसँ अहाँकेँ हमरा प्रति किछु गलतफहमी भऽ गेल अछि। हम ओकरा दूर करए चाहैत छी। हमरा मात्र ५-१० मिनट समय दिअ। हम फेर चलि जाएब”।
हम साफ मना कऽ देलियन्हि। “देखू ऋचाजी। हम एखन बहुत डिस्टर्ब आऽ थाकल छी। अहाँसँ हम कोनो तरहक वार्तालापक मूडमे नहि छी। जतेक गलतफहमी अछि तकरा भोरमे ठीक करब। एखन हम असगर रहए चाहैत छी। चिन्तन करए चाहैत छी। आऽ पुनः सुतए चाहैत छी। अहूँ थाकल छी, जाउ आऽ सुति रहू”।
ऋचाजी बुझि गेलीह जे हम नाराज छियन्हि, मुदा वार्तालाप सेहो सम्भव नहि। कनिक उदास भय नहुँ-नहुँ हमरा कमरासँ बाहर भऽ गेलीह। जाइत-जाइत शुभ-रात्रि कहलन्हि, मुदा हम कोनो उत्तर नहि देलियन्हि। कनिक काल तक हम तमाम परियोजनापर सोचैत रहलहुँ। रोईंगक एहि विकट होटलमे अपन पुत्र शशांकक याद बेर-बेर अबैत छल। सोचि रहल रही जे पूनम (हमर कनियाँ) बड्ड परेशान हेतीह। बात करय चाहैत रही। परन्तु नेटवर्क साफे इंगित नहि भऽ रहल छल। काफी कचोट भेल। अन्ततः सुति रहलहुँ।
(अगिला अंकमे)