स्व. राजकमल चौधरी पर डॉ. देवशंकर नवीन
डॉ. देवशंकर नवीन (१९६२- ), ओ ना मा सी (गद्य-पद्य मिश्रित हिन्दी-मैथिलीक प्रारम्भिक सर्जना), चानन-काजर (मैथिली कविता संग्रह), आधुनिक (मैथिली) साहित्यक परिदृश्य, गीतिकाव्य के रूप में विद्यापति पदावली, राजकमल चौधरी का रचनाकर्म (आलोचना), जमाना बदल गया, सोना बाबू का यार, पहचान (हिन्दी कहानी), अभिधा (हिन्दी कविता-संग्रह), हाथी चलए बजार (कथा-संग्रह)।
सम्पादन: प्रतिनिधि कहानियाँ: राजकमल चौधरी, अग्निस्नान एवं अन्य उपन्यास (राजकमल चौधरी), पत्थर के नीचे दबे हुए हाथ (राजकमल की कहानियाँ), विचित्रा (राजकमल चौधरी की अप्रकाशित कविताएँ), साँझक गाछ (राजकमल चौधरी की मैथिली कहानियाँ), राजकमल चौधरी की चुनी हुई कहानियाँ, बन्द कमरे में कब्रगाह (राजकमल की कहानियाँ), शवयात्रा के बाद देहशुद्धि, ऑडिट रिपोर्ट (राजकमल चौधरी की कविताएँ), बर्फ और सफेद कब्र पर एक फूल, उत्तर आधुनिकता कुछ विचार, सद्भाव मिशन (पत्रिका)क किछि अंकक सम्पादन, उदाहरण (मैथिली कथा संग्रह संपादन)।
सम्प्रति नेशनल बुक ट्रस्टमे सम्पादक।
बटुआमे बिहाड़ि आ बिर्ड़ो
(राजकमल चौधरीक उपन्यास) (आगाँ)
कहल जा चुकल अछि ÷आदिकथा'क समय धरि सेहो मैथिलीक पाठक समाजक बोध-शीर्ष आ विचार-फलक उर्ध्वमुखी नहि भेल छलनि, एकदम सपाट भूमि पर जर्जर परम्पराक खुट्टीसँ बन्हाएल घूमि रहल छलनि। पूर्ववर्ती रचनाकार सेहो कम प्रयास नहि केलनि। कविताक क्षेत्रामे कतोक गोटए अपन योगदान देलनि। कथा आ उपन्यासक क्षेत्रामे कांचीनाथ झा ÷किरण' आ हरिमोहन झा स्त्राी आ विवाहसँ सम्बन्धित मिथिलाक जड़ियाएल समस्या पर नजरि द' चुकल छलाह। वैद्यनाथ मिश्र ÷यात्राी', ÷पारो' आ ÷नवतुरिया'मे एहि गन्हाएल वैवाहिक पद्धति पर समधानि क' चोट क' चुकल छलाह। तथापि समाज व्यवस्थाक पाखण्ड आ अयथार्थ आदर्शक चाँगुर एहि समाजकें जकड़ने छल, स्वाधीनता प्राप्तिक दशक भरि बादहु मिथिलाक लोक एहि वैवाहिक पद्धतिक प्रति घृणा आ विरोधक भाव नहि अवधारलनि। चुतुर्थिएक राति ÷पारो' सन बालिकाक संग पति स्थानीय वृद्ध राक्षस द्वारा बलात्कार अथवा ÷सुशीला' सन उद्दाम यौवनसँ भरल सुकामिनीक यौन-प्रताड़णाक प्रति किनकहु मोन खिन्न नहि भेलनि। पंजी प्रथाक विकृतिक रूपमे भेल एहेन बेमेल विवाह, बाल-वृद्ध विवाह आ बहु-विवाहक कारणें वृद्ध अथवा स्वर्गवासी जमीन्दारक कठमस्त जवान स्त्राीक संग रमणेच्छा सबकें रहै छलनि, गाछमे पाकल लताम देखि कौआ जकाँ दू लेल मारि अएबाक लालसा सबकें होइ छलनि, मुदा ओहि युवतीक मोन आ सम्वेदनासँ किनकहु कोनो मतलब नहि छलनि। छद्म आ अतिशयोक्तिसँ भरल मिथिलाक जीवन-पद्धतिक इएह विडम्बना छल। विवाहेतर सम्बन्ध रखबासँ परहेज नहि छलनि, भेद खुजि जएबाक डरें आतंकित रहै छलाह। एहेन समाजमे सुशीला आ देवकान्त अपन मोनक समर्थन कोना करितथि -- उपन्यासकारक सोझाँ ई पैघ समस्या छल। आदर्श आ मर्यादाक जर्जरतासँ आच्छन्न अइ प्रवृत्तिक कारणें उपन्यासकार ÷आदिकथा'कें सुखान्त नहि बना सकलाह। सम्भवतः इएह कारण थिक जे बाबा यात्राी ÷पारो'क दुर्दशासँ व्यथित भेलाह, उग्र नहि। रचनाकारक व्यथासँ पाठककें सामान्यतया उग्र हेबाक चाही, मुदा यात्राी देखलनि जे समाज एखनहुँ उग्र नहि भेल। आठ बर्खक बाद फेरसँ यात्राी ÷नवतुरिया'कें ठाढ़ केलनि।
मिथिला क्षेत्राक एहेन जड़ मन स्थितिक समाजमे कोनो प्रगति चेतनासँ सम्पन्न रचनाधर्मी लोकक मानसिक उद्वेलनक कल्पना कएल जा सकैत अछि। निर्दयी सासु, सुमति, मनुष्यक मोल, पुनर्विवाह, चन्द्रग्रहण, कन्यादान आदि पूर्ववर्ती उपन्यासमे मिथिलाक स्त्राीक दुर्दशाक चित्राण भेल, मुदा चित्राणक स्वरूपसँ स्त्राी-चेतना आ स्त्राीक दुर्दशाक प्रति पुरुषक वैचारिक उद्वेलनक कोनो उद्यम एहि जनपदमे नहि देखल गेल। स्पष्टतः ई दोष रचनाकारक नहि, रूढ़िग्रस्त मैथिल समाजक धर्मान्धताक छल। ÷पारो'आ ÷आदिकथा'मे सेहो स्पष्ट विरोध अइ कुरीतिक प्रति नहि देखाइत अछि, मुदा ÷पारो'क यौन उत्पीड़न और ÷सुशीलाक यौन प्रताड़णसँ पाठकक मोन खिन्न होइत अछि। संख्यामे थोड़े सही, मुदा ÷बिरजू'क क्रोध आ ÷देवकान्त'क व्यथाक सहयात्राी अवस्से बनैत अछि। ई समय समाजक बदलैत मनस्थितिक छल। उपन्यासकार अपन मोनक नहि क' सकलाह, मुदा संकेत देलनि -- समाजक बदलइत धार्मिक नैतिक मान्यतादिक एहि संक्रमित कालमे (आदिकथा)÷कॉमेडी' नइं बनि सकल, मात्रा एक अपूर्ण ÷टे्रजेडी' रहि गेल। इएह समकालिक यथार्थ थिक। लोक प्रेम करइए, प्रेमपात्राक लेल बेकल रहइए, मुदा, संस्कारक ससरफानी तोड़ि नइं पबइए। इएह आदि-आदिसँ चल अबइत कथा थिक, आदिकथा थिक।...
मिथिला क्षेत्रा भारतक एकटा एहेन भूखण्ड थिक जतए परस्पर विरोधी आचरण आ व्यवस्था निःशंक भ' कए विकसित भ' रहल अछि, होइत रहल अछि। पर्याप्त संख्यामे उद्दाम प्रवाहक नदी अछि, बाढ़िक कारण ओकर प्रवाहमे उद्दाम गत्यात्मकता अबैत अछि, प्रति वर्ष कोसीक बाढ़ि, गंगाक बाढ़ि, बागमती, कमला आदि नदी सभक बाढ़िक कारण तीव्रतासँ नदी-नालाक दिशा, स्थान परिवर्तित होइत रहल, जमीनक तल परिवर्तन होइत रहल... मुदा एहि प्रबल प्रभावकारी प्राकृतिक परिदृश्यक प्रतिकूल एतएक जीवन-यापन आ आचरण शिथिल, सुस्त, आ आरामपसन्द बनल रहल। गत्यामकतासँ निर्लिप्त, यथास्थिति पर अतीव आग्रह।... विद्वताक लेल मिथिला क्षेत्रा पुरातन कालहिसँ नामी-गिरामी रहल अछि। विद्वता आ प्रगतिशीलता आपसमे सहयात्राी होइत अछि, अर्थ-धर्म-काम-मोक्षक परिभाषा बुझितहि मनुष्यमे उदारताक प'ट खुजैत अछि, आ कलुष मेटाइत अछि। मुदा, मिथिलामे सब कथूक अछैतो एहि समस्त सद्वृत्तिक लोपे लोप रहल, उनटे रूढि, पाखण्ड, धर्मान्धता, अस्पृश्यता आदि भावना जड़िआएल रहल। जीवन विरोधी जर्जर व्यवस्थाक अनुपालनमे
अपन इच्छा आ नैतिकताकें मारैत रहल, फोंक मर्यादाक प्रदर्शन हेतु छद्म जीवन प्रक्रिया चलैत रहल। अइ छद्मक प्रति जड़िआएल आग्रह एतेक बढ़ल छल, जे छद्मे वास्तविकता लगैत रहल। छद्मक आँचर हटएबाक अर्थ मर्यादाक अतिक्रमण बूझल जाए लागल। राजकमल चौधरीक समस्त रचना संसार अइ छद्मेक अनावरणमे लागल रहल। आदिकथा उपन्यास सेहो, तकरे प्रमाण थिक। समाज ओहिसँ पहिने कनेको प्रगति-बोधसँ युक्त भेल रहितए, तँ सम्भव छल जे सुशीला आ देवकान्तक आदिकथा दुखान्त नहि भ' कए सुखान्त भ' जइतए।
÷आदिकथा' उपन्यासक अप्रतिम प्रभावोत्पादकताक मुख्य कारण ओहिमे प्रयुक्त गद्य सेहो थिक। राजकमल चौधरीक गद्य रचनामे एकटा खास बात रहैत अछि, जे ओ अपन मन्तव्य राख' लेल घटनावलीक कोनो श्रृंखला नहि तकै छथि; छोट सन कोनो प्रसंगक चारू भर एकटा परिवार, समाज अथवा मण्डली ठाढ़ करै छथि; ओकर आचरणकें ओकर मानसिक व्यापारसँ जोड़ैत जाइ छथि; अन्ततः अइ तरहक चरित्रा-चित्राणे हुनकर मन्तव्यकें आकार, रचनाकें पूर्णता, अभिप्रायकें सफलता, आ प्रभावकें उत्कर्ष दैत अछि। आदिकथा उपन्यासमे मोटा मोटी घटना तँ एतबे अछि जे कोनो विपत्ति-यात्राामे सुशीला आ देवकान्तक भेंट होइ छनि, बीचमे सब तरहक राग अनुराग चलैत अछि, आ अन्ततः ओ भेंट, ओ अनुरक्ति एकटा अयथार्थ आदर्शक रक्षामे पानि पर लिखल आखर जकाँ मेटा जाइत अछि। मुदा ई सम्पूर्ण ताना-बाना किछु खास-खास तरहक चरित्रासँ बुनल गेल अछि, ओहि चरित्रोक माध्यमसँ राजकमल चौधरी अइ उपन्यासकें अपन समयक एकटा महत्वपूर्ण उपन्यासक रूप देलनि अछि। आदिकथा, एकटा दुखान्त प्रेमकथाक प्रमाण होइतहु समकालीन समाजक मार्मिक आ बेधक दृश्यक कोलाज थिक, जाहिमे पंजी प्रथा, सामन्ती संस्कार आ सामाजिक पाखण्ड पर चोट अछि; जमीन्दारिएक जड़िसँ निकलि कए जमीन्दारी प्रथाक विरोध परिवर्त्तन-चक्रक सार्थकता साबित केलक अछि। समस्त पद-प्रतिष्ठा-सम्पन्नताक अछैत मिथिलामे स्त्राी लेल कोन तरहक सोच-पद्धति अपनाओल जाइत रहल अछि, तकर स्पष्ट चित्रा बनि सकल अछि।
आदिकथाक मुख्य पुरुष चरित्रा छथि -- अनिरुद्ध बाबू, कुलानन्द, महानन्द, ज्योतिषी लघुकान्त, आ देवकान्त। किछु गौण पात्रा सेहो छथि -- डाक्टर वैद्यनाथ, धर्मशालाक मैनेजर, खबास इत्यादि। मुदा हिनका लोकनिक कोनो चारित्रिाक विकास उपन्यासक कथाभूमिमे नहि भेल अछि। लघुकान्त ज्योतिषीक अवतारणा सेहो सामाजिक धर्मान्धता, पाखण्ड, भीरुता, छद्म आ निर्लज्जता देखएबा लेल भेल अछि। धरमपुरवाली, अर्थात् सुशीला, अर्थात् देवकान्तक सोनामामी, अर्थात कुलानन्द, महानन्दक सबसँ छोट सतमाइ कामोत्तेजनामे, अथवा कोनो मादक पदार्थक सेवनसँ बेहोश छथि। प्रयोजन छलै हुनकर सेवा-परिचर्या अथवा चिकित्साक, मुदा ज्योतिषी जी एकटा जवान स्त्राीक कामोत्तेजक बाँहि-पाँजरक स्पर्श पएबा लेल, कुत्सित लिप्सा तृप्त करबा लेल, अपन फोंक अस्मिता समाजमे ऊँच करबा लेल, आ लोक पर अपन पाखण्डक मनोवैज्ञानिक दबाब बढ़एबा लेल घोषित करै छथि, जे सुशीला पर ओएह प्रेतनी सवार छनि, जे तीन बर्ख पहिने हुनका हरिद्वारमे भेटल रहनि -- ई बात, ज्योतिषीकें भगवती कहि देने छनि...। मुदा उपन्यास मध्य राजकमल चौधरी एहेन एकहु छद्म चरित्राकें क्षमादान नहि देलनि अछि।... जे प्रेतनी छलहे नहि, तकरासँ मान-मनुहार ज्योतिषी करैत रहलाह, श्वसुर स्थानीय होइतहुँ, नजरिए आ स्पर्शे टासँ सही, सुशीला सन रसवन्तीक रसपान करैत रहलाह, एही बीच हुनकर पोल खुजि गेल, ओ नाँगरि सुटका क' पड़एलाह।
अइ चरित्राक प्रवेश उपन्यासक कथाभूमिमे अचानक भेल अछि। हिनकर अवतारणा नहियों होइतए तँ मूल कथा पर एकर कोनो असरि नहि होइतए। मुदा जें कि उपन्यासक गति एकरैखिक नहि होइत अछि, बहुत रास साँगह-पाती संग नेने चलैत अछि, कही तँ उपन्यास कम्प्यूटरक नॉर्टन एण्टी वायरस होइत अछि, अथवा मलाहक महजाल होइत अछि, जे सौंसे समाज व्याधि, अथवा सौंसे पोखरिक माछ, काछु, साँप, सनगोहि, सोंसि, नकार समेटने चलैत अछि। अही प्रक्रियामे राजकमल चौधरी ÷आदिकथा'मे कथा तँ कहलनि अछि मामि-भागिनक अनुक्तिक; मुदा बीच-बीचमे समस्त सामाजिक व्याधिक इलाज करैत गेलाह अछि। ज्योतिषी लघुकान्तक पाखण्ड उजागर करब आ समाजकें अन्धविश्वाससँ मुक्त करब आवश्यक छल, तें लघुकान्तक अवतरण भेल। एहि अवतारणा लेल कोनो संयोग-कथा नहि गढ़ल गेल, सहजतासँ ओ मूलकथाक अंश बनि गेल अछि -- से उपन्यासकारक विशिष्ट कौशल थिक।
महानन्द सामन्ती खानदानक नव उम्रक युवक छथि। अनिरुद्ध बाबूक छोट बेटा, सुशीला सन सुकामाक सतौत बेटा, कुलाकानन्दक सहोदर आ देवकान्तक ममियौत। छूआ-छूत, वर्ग संघर्ष समाजसँ मेटा देबाक आग्रही आ सामाजिक कुरीतिक उन्मूलनक श्रेय लेब' लेल तत्पर अपरिपक्व विद्रोही। हिनकर परिचय लेल उपन्यासकारक पंक्तिक उपयोग करी तँ -- ÷महानन्दक शरीरमे एखन समाज-सुधारक रक्त-प्रवाह दौड़ि रहल छइन। उर्दू-भाषामे एकटा कड़बी छइ -- नब मुसलमान सतरह बेर नामज पढ़इए -- से महानन्द सतरह बेर नामज पढ़ए चाहइ छथि। चाहइ छथि जे
युग-युगान्तरक धार्म्मिक संस्कारकें विद्रोहक एक्के धक्कासँ तोड़ि दी।' -- महानन्द जमीन्दारी संस्कारसँ उबिया तँ गेलाह अछि अवस्से, परिवर्त्तन चाहै छथि, ताहि लेल उद्यमो करए चाहै छथि, मुदा चेतना जाग्रत नहि छनि। महानन्द समकालीन मिथिलाक प्रतिक्रियावादी नौजवानक प्रतिनिधि जकाँ एहि उपन्यासमे ठाढ़ छथि, जे लक्ष्य निर्धारण आ संधान-समायोजन कएनहि बिना व्यवस्था विरोधमे लागि जाइ छथि। परिवर्तनक एतब टा बाट बूझल छनि जे आँगनमे तथाकथित निम्नजातीय लोक पात ओछा कए खा लिअए।... नितान्त अपरिपक्व आ क्षणोन्मादी लोक छथि महानन्द। अवज्ञा आ चिन्तनविहीन विरोधक संग परिवारसँ भिन्न भ' जएबाक बात सोचै छथि। महानन्दक आचरणक चित्रा एक दिश मिथिलाक युवा वृन्दक वास्तविक मानस लोकक परिचय दैत अछि, तँ दोसर दिश ओहि वर्गकें सुचिन्तित विरोधक प्रेरणा आ ललकार सेहो।
अनिरुद्ध बाबू रामपुर गामक सामन्ती संस्कारक उच्च कुल-वंश, जाति-पाँजिक विशिष्ट लोक छथि। चारिम पनमे प्रगल्भा, कामातुरा स्त्राीक पति भेलाह। एक पुत्रावती पत्नीक स्वर्गवास, आ दोसर पत्नीसँ एक पुत्रा तथा एक पुत्राीक प्राप्तिक पश्चातहु तेसर विवाहक लोभ सम्वरण नहि क' सकलाह, अधेर होएबा धरि ओहि पत्नीकें पुष्पवती नहि क' सकलाह। स्वयं साठि पार क' कए मामिला मोकदमामे तल्लीन रहै छथि। खाएब-पीब, रास-विहार, ज'र-जमीन, म'र-मोकदमाक बाद समय बचै छनि तँ सर-कुटुमक आदर आ नवोढ़ा पत्नीक आज्ञा-पालनमे लगबै छथि। अपन कौलिक संस्कार आ पूर्वजक अकबालक गर्वसँ फूलल रहै छथि। एहिसँ बेसी हुनकर कोनहुँ आचरणकें उपन्यासकार महत्व नहि देलनि अछि। जमीन्दारी सन रुग्ण व्यवस्थाक एक वृद्ध या रुग्ण व्यक्तिकें एही तरहें कोनो नव चेतनाक कथामे उपेक्षा कएल जेबाक चाही छल। ÷गहरी मार कबीर की, दिल से दिया निकाल।' अतीत-व्यतीतक फेण्टेसीमे भोतिआइत आत्महीन लोककें वस्तुतः एहिसँ बेसी महत्व नहि देल जेबाक चाही। अन्ततः उपन्यासक पाठककें अनुमान तँ होउ, जे मानवेच्छाक प्रति अनुदार आ सम्वेदनहीन लोकक इएह दुर्गति होइत अछि। भौतिक सुखमे मुग्ध रहताह, मुदा पहाड़ी नदीक जीवन्त धारकें, कामेच्छाक ज्वालामुखीकें बान्हि क' रखताह। धिक्कार ...
कुलानन्द अनिरुद्ध बाबूक पहिल स्वर्गीया पत्नीक एकमात्रा पुत्रा छथि। वयस करीब-करीब अपन छोटकी सतमाइक बराबर छनि। मूल कथाक विस्तारमे हिनकर उपस्थिति थोड़ेक सहायक भेल अछि। अपना समयक मेधाहीन छात्रा आ नाटक-नौटंकी कम्पनीक कलाकार-कलारिनीक संग बौआ कए ऊर्जस्वित जीवन समाप्त केलनि, आब गाममे पैतृक सम्पति कूटि कए भाँग आ विलासमे जीवन बितबै छथि। कायर, क्रोधी, आ अय्याशी प्रवृत्तिक पात्रा छथि। द्रौपदी सन सुशील स्त्राीक देवता छथि। स्त्राी जातिकें पुरुषक आश्रित आ गुलाम बुझै छथि। पत्नी तवाह रहै छनि। खून-खुनामय धरिक स्थितिमे पहुँचि जाइवला तामसी छथि। क्रोधमे किछु क' लेताह। नाच-नटुआमे लिप्त रहताह। देवकान्तक प्रति अपन सतमाइक अनुरक्ति नीक नइं लगै छनि। समाजक लोक तँ इहो कहबामे संकोच नहि करै छनि जे कुलानन्द अपन स्त्राीकें नैहर पठा क' सतमाइ संग रहै छथि। पिताक मृत्युक तत्काल बाद ओ सुशीलाकें अपन आश्रित बूझए लगलाह, हुनकर गहना जेबर बेचि कए अय्याशी करब हुनकर स्वभाव भ' गेलनि, मुदा सतमाइक उचितो खर्च पर आँकुश लगएबाक प्रवृत्ति आओर उग्र भ' गेलनि। लम्पट एहेन जे सुशीला संग तीर्थ कर' गेलाह तँ हुनकर आचरण देखि धर्मशालाक मैनेजर धरि सुशीलाकें कुलानन्दक लम्पटपनीक कथा कह' अएलनि।
एकटा सामन्ती संस्कारक व्यक्तिक कुलमे आओर केहेन सन्तान होइतए! सम्पत्ति छलनि तँ पिता सामाजिक स्वीकृतिक संग लम्पटपनी केलकनि, समय बदलल तँ कुलानन्द ओकरा आओर विकृति धरि पहुँचौलनि।
अइ उपन्यासमे राजकमल चौधरी जमीन्दार परिवारक सदस्य लोकनिकें ज्यामितीय आकृति पर ठाढ़ क' कए सामन्ती संस्कार, पंजी-प्रथा आ मिथिलाक स्थगित चिन्तन प्रणालीक धज्जी उड़ा रहल छथि। एहेन विकृत, वीभत्स रूप भरिसके कतहु भेटए। महानन्द, कुलानन्द, सुशीला--तीनू त्रिाभुजक तीन कोण पर ठाढ़ छथि। केन्द्रमे बैसल छथि स्वयं अनिरुद्ध बाबू, बेबस, लाचार, खानदानी पराक्रम आ कौलिक मर्यादाक गोबर गीजैत। आ बाहरमे ठाढ़ छथि देवकान्त। त्रिाभुज आ त्रिाकोण--दुनूसँ सम्वेदना, एक कोन पर अनुरक्ति, मुदा प्रवेश वर्जित, अमर्यादित...। विचित्रा हाल छल मिथिलाक! अशक्य अनिरुद्ध बाबू केन्द्रमे रहितहु, कतहु नहि रहलाह। अनिरुद्ध बाबूक देहावसान होइतहि जमीन्दारी पालो थमै लेल कुलानन्द केन्द्र दिश लपकै छथि। त्रिाभुज टूटि जाइत अछि, मुदा देवकान्त तथापि बहरइए रहि जाइ छथि। एकटा क्रोधी, नशेरी आ लम्पट पतिक पत्नी द्रौपदी कतहु नहि छथि, किछु नहि छथि। ई मिथिलाक आदर्श आ मर्यादा छल, जकरा, राजकमल चौधरी जीवन लेल अयथार्थ मर्यादा साबित केलनि।
(अगिला अंकमे)
डॉ कैलाश कुमार मिश्र (८ फरबरी १९६७- ) दिल्ली विश्वविद्यालयसँ एम.एस.सी., एम.फिल., “मैथिली फॉकलोर स्ट्रक्चर एण्ड कॊग्निशन ऑफ द फॉकसांग्स ऑफ मिथिला: एन एनेलिटिकल स्टडी ऑफ एन्थ्रोपोलोजी ऑफ म्युजिक” पर पी.एच.डी.। मानव अधिकार मे स्नातकोत्तर, ४०० सँ बेशी प्रबन्ध -अंग्रेजी-हिन्दी आऽ मैथिली भाषामे- फॉकलोर, एन्थ्रोपोलोजी, कला-इतिहास, यात्रावृत्तांत आऽ साहित्य विषयपर जर्नल, पत्रिका, समाचारपत्र आऽ सम्पादित-ग्रन्थ सभमे प्रकाशित। भारतक लगभग सभ सांस्कृतिक क्षेत्रमे भ्रमण, एखन उत्तर-पूर्वमे मौखिक आऽ लोक संस्कृतिक सर्वांगीन पक्षपर गहन रूपसँ कार्यरत। यूनिवर्सिटी ऑफ नेब्रास्का, यू.एस.ए. केर “फॉकलोर ऑफ इण्डिया” विषयक रेफ़ेरी। केन्द्रीय हिन्दी निदेशालयक पुरस्कारक रेफरी सेहो। सय सँ ऊपर सेमीनार आऽ वर्कशॉपक संचालन, बहु-विषयक राष्ट्रीय आऽ अन्तर्राष्ट्रीय संगोष्ठीमे सहभागिता। एम.फिल. आऽ पी. एच.डी. छात्रकेँ दिशा-निर्देशक संग कैलाशजी विजिटिंग फैकल्टीक रूपमे विश्वविद्यालय आऽ उच्च-प्रशस्ति प्राप्त संस्थानमे अध्यापन सेहो करैत छथि। मैथिलीक लोक गीत, मैथिलीक डहकन, विद्यापति-गीत, मधुपजीक गीत सभक अंग्रेजीमे अनुवाद।
डॉ कैलाश कुमार मिश्र, इन्दिरा गान्धी राष्ट्रीय कला केन्द्रमे कार्यरत छथि। “रचना” मैथिली साहित्यिक पत्रिकामे “