विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका · VIDEHA · ISSN 2229-547X

कामेश्वर सिंह दरभङ्गा संस्कृत विश्वविद्यालयक प्रासंगिकता

गजेन्द्र ठाकुर · 2008-01-15 · अंक 2

मिथिला आऽ संस्कृत- कामेश्वर सिंह संस्कृत विश्वविद्यालयक प्रासांगिकता
मिथिला आऽ संस्कृतक संबंध बड्ड पुरान अछि। षड् दर्शनमे चारि दर्शनक प्रारंभ एतयसँ भेल। वाजसनेयी आऽ छांदोग्यक रूपमे दू गोट वैदिक शाखा अखनो ओतय अछि, मुदा नामे मात्रेक। मिथिलामे कतोक लोक भेटताह जे मात्र विवाह कालमे वाचसनय आऽ छंदोग्यक नमसँ परिचय प्राप्त करैत छथि। बीच रातिमे पता चलैत छन्हि जे वर छांदोग्य छथि आऽ स्त्रीगणमे शोर उठैत अछि जे आबतँ दू विवाह होयत-बड्ड समय लागत।
वाजसनेयी आऽ छांदोग्य क्रमशः शुक्ल यजुर्वेद आऽ सामवेदक शाखा अछि से हम सभ बिसरि गेल छी। कार्यालयक कार्यावशात्
हम इंदिरा गाँधी नेशनल सेंटर अऑफ आर्ट्स गेलहु तँ वेद पर एक गोट डी.वी.डी. देखबाक अवसर प्राप्त भेल।अखनो ओड़ीसा,महाराष्ट्र,केरल,कर्णाटक,आ ऽ तमिलनाडुमे वैदिक शाखा जीवित अछि, मुदा अपना अहिठाम शाखा रहितहुँ नामोसँ अर्थोसँ अनभिज्ञता।
कविकुलगुरु कालिदास संस्कृत विश्वविद्यालयक स्थापना प्रधानमंत्री नरसिम्हा रावक प्रयासेँ रामटेक,महाराष्ट्रमे खुजल। अल्पावधिमे ई वि.वि. संपूर्ण महाराष्ट्रमे वर्षावधि संस्कृत संभाषण शिविर चला रहल अछि। शिशुक हेतु 23 खंडमे किताब छपलक अछि,जखन की एकर भवन अखन बनिये रहल अछि।
का.सि.संस्कृत वि.वि. दरिभङ्गा बहुत रास संस्कृत-मैथिली काव्यक उद्धार कएलक मुदा आब जा कय एकर योगदान सालमे एकटा पतरा छपब धरि सीमित भय गेल छैक- आ ऽ ई विश्वविद्यालय पंचांग सेहो अपन गणनाक हेतु विवादमे पड़ि गेल अछि।
मुदा एहि अंकसँ हम एकर रचनात्मक कएल गेल कार्यक विवरण देब प्रारंभ कएल छी।
विश्वविद्यालय द्वारा 20 सालसँ ऊपर भेल जखन संस्कृत-प्राकृत देसिल बयना सँ युकत नाटक सभक आलोचनात्मक संस्करण प्रकाशित भेल,जे भाषा मिश्रणक कारणेँ जहिना ई संस्कृतक तहिना मैथिलीक रचनामे परिगणित होइत अछि।भावोद्रेकक लेल गीतराशिक रचना कोमलकांत मिथिलाभाषहिमे निबद्ध भेल।
विश्वविद्यालय द्वारा पहिल संपादित ग्रंथ ज्योतिरीश्वर ठाकुरक धूर्त्तसमागम अछि।
धूर्त्तसमागम तेरहम शताब्दीमे ज्योतिरीश्वर ठाकुर द्वारा रचल गेल। ज्योतिरीश्वर ठाकुर धूर्त्तसमागममे मैथिली गीतक समावेश कएलन्हि। ई प्रहसनक कोटिमे अबैत अछि।मैथिलीक अधिकांश नाटक-नाटिका श्रीकृष्णक अथवा हुनकर वंश्धरक चरित पर अवलंबितएवं हरण आकि स्वयंबर कथा पर आधारित छल। मुदा धूर्त्तसमागममे साधु आऽ हुनकर शिष्य मुख्य पात्र अछि। धूर्त्तसमागम सभ पात्र एकसँ-एक ध्होर्त्त छथि।ताहि हेतु एकर नाम धूर्त्तसमागम सर्वथा उपयुक्त अछि।प्रहसनकेँ संगीतक सेहो कहल जाइछ,ताहि हेतु एहि मे मैथिली गीतक समावेश सर्वथा समीचीन अछि।एहिमे सूत्रधार,नटी स्नातक,विश्वनगर,मृतांगार,सुरतप्रिया,अनंगसेना,अस्ज्जाति मिश्र,बंधुवंचक,मूलनाशक आऽ नागरिक मुख्य पात्र छथि।सूत्रधार कर्णाट चूड़ामणि नरसिंहदेवक प्रशस्ति करैत अछि।फेर ज्योतिरीश्वरक प्रशस्ति होइत अछि। एहिमे एक प्रकारक एब्सर्डिटी अछि,जे नितांत आधुनिक अछि।जे लोच छैक से एकरा लोकनाट्य बनबैत छैक।
विश्वनगर स्त्रीक अभावमेब्रह्मचारी छथि।शिष्य स्नातक संग भिक्षाक हेतु मृतांगार ठाकुरक घर जाइत छथि तँ अशौचक बहाना भेटैत छन्हि। विश्वनगर शिष्य स्नातक संग भिक्षाक हेतु सुरतप्रियाक घर जाइत छथि। फेर अनंगसेना नामक वैश्याकेँ लय कय गुरु-शिष्यमे मारि बजरि जाइत छन्हि। फेर गुरु-शिष्य अनंगसेनाक संग असज्जाति मिश्रक लग जाइत छथि तँ ओतय मिश्रजी लंपट निकलैत छथि।...
(अनुवर्तते)
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Suggested citation: गजेन्द्र ठाकुर. “कामेश्वर सिंह दरभङ्गा संस्कृत विश्वविद्यालयक प्रासंगिकता.” Videha — First Maithili Fortnightly eJournal, issue 2, 2008-01-15. https://www.videha.co.in/research/2008/2/कामेश्वर-सिंह-दरभङ्गा-संस्कृत-विश्वविद्यालयक-प्रासंगिकता.htm

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