विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका · VIDEHA · ISSN 2229-547X

मिथिलांचलक शैव क्षेत्र

डॉ. प्रफुल्ल कुमार सिंह ‘मौन’ · 2008-10-15 · अंक 20

मिथिलांचलक शैव क्षेत्र
देवाधिदेव शिव सर्वव्यापी पूर्ण ब्रह्म छथि। आदिदेव महादेव छथि। प्राचीनतम देवता पशुपति छथि। वैदिक साहित्य (यजुर्वेद, अध्याय-१६)क शतरुद्रिय सूक्त तथा पौराणिक साहित्य (वायुपुराण)मे हिनक पूजोपासनाक विस्तृत सिद्धांत विवेचित अछि। सूर्य, चन्द्र आओर अग्निक त्रिनेत्रधारी शिवकेँ प्रणाम- चन्द्रार्क- “वैश्वानर लोचनाय नमः शिवाय”।
शिवक हाथ सभमे त्रिशूल, डमरू, मृग ओ परशु शोभित छनि। ज्ञान, इच्छा ओ क्रिया शक्तिक क्रियाशील रूप त्रिशूल थिक। डमरु शब्द ब्रह्मक प्रतीक अछि। शिवकेँ मृगधर कहल गेल अछि। मृग वस्तुतः वेद अछि- “अत्र वेदो मृगः”। परशु संहार सूचक अछि। पशुपति शिवक प्रत्यक्ष रूप थिक। वेद, उपनिषद एवं पुराण साहित्यमे प्राणिमात्रकेँ पशु कहल गेल अछि। अतः शिवक पशुपति नाम सार्थक अछि। पशुपति शिवक प्राचीनतम मूर्ति (मृ.मोहर) मोहनजोदड़ो-हड़प्पा संस्कृतिमे प्राप्त भेल अछि। द्विभुजी पशुपति योगासीन छथि। हुनक मूर्तिक चारू दिस अनेक पशु चित्रित अछि। हुनक माथपर दू टा सिंगवला सिराभूषण शोभित छनि। आलोच्य पशुपतिक रूपांकन एखन धरि अद्वितीय अछि। शैव क्षेत्रमे नेपाल उपत्यका (काठमाण्डू) क विख्यत पशुपति चतुर्मुखी शिवलिंगक रूपमे विख्यात अछि। एहि पशुपति शिवलिंगक एकटा मध्यकालीन प्रतिमूर्ति अरेराज (प.चम्पारण)क सोमेश्वरनाथ महादेवक मन्दिर परिसरमे दर्शनीय अछि। नटराज सहस्रनाम भाष्य (मद्रास १९५१ ई.) क अनुसार द्विपद एवं चतुष्पद प्राणिमात्रक देवता पशुपति छथि।
वराहपुराण एवं विष्णुपुराणक अंतः साक्ष्यक अनुसार शिव हिरण्याक्षपुत्र अन्धकासुरक बध काशीमे कयने छलाह। ओ त्रिपुरासुर ओ गजासुरक बध सेहो कयने छलाह। ओ सभ महामोह (अविद्या)क प्रतिरूप छल। भारतीय मूर्तिकलामे गजासुर बधक प्रस्तर मूर्ति मिथिलांचलमे प्राप्य अछि। शिव संहारक देवता छथि। ओ अविनाशी सर्वात्मा छथि। शिव लीलाधर छथि।
ओहि लीलाधर शिवक एकटा स्वरूप नटराजक थिक।शिवक नृत्य सृष्टि विधान थिक एवं निवृत्तिकेँ प्रलय मानल जाइछ। जगतक रक्षा हेतु ओ नित्य सायंकाल नृत्य करैत छथि। ओहि समय देवादि उपस्थित रहैत छथि। जगतक सृष्टि प्रवर्तनक लेल शिव लास्य ओ संहारक लेल शिव ताण्डव करैत छथि। “ताल”क शाब्दिक रचना “ता” ओ “ल” सँ भेल अछि। अतः शिव ओ शिवा नृत्यमय छथि, संगीत-नाट्यादिक आदि प्रवर्तक छथि, डमरू ध्वनिसँ निनादित माहेश्वर सूत्र अर्थात् शब्दशास्त्रक निर्माता छथि। शिवकेँ नटराज, नटेश नृत्यनाथ अथवा नटेश्वर सेहो कहल जाइछ। चिदम्बरमक नटराज मूर्ति सर्वप्रसिद्ध अछि। मिथिलांचलसँ नटराज शिवक मध्यकालीन प्रस्तरमूर्ति प्राप्त अछि जाहिमे ओ अपस्मारक कान्हपर आरुढ़ भऽ नचैत छथि।
नटराजक जटामे अमृतक प्रतीक चन्द्रमा अछि। प्रभावली सहित अथवा प्रभावली रहित नटराजक मूर्तिक विधान अछि मुदा ओ स्फुलिंगमयी ज्वालसँ घेरायल रहैत छथि। मिथिलांचलक प्रसिद्ध शिवमन्दिर सभमे लोक रुद्राक्ष ओ त्रिशूल धारण कऽ डमरुक संग नचैत छथि। मैथिलीक प्राचीन नाटक सभ एहि नृत्यनाथक नामे समर्पित अछि। मिथिलांचलमे शिवभक्तिक लेल नचारी, महेशवाणी, हरगौरी सम्मरि, हरगौरी विवाह आदि संगीत-नाट्यादि बेस लोकप्रिय एवं परम्परित अछि। तारालाही (दरभंगा) एवं मखनाहा (तराई)क अष्टभुजी नटेशक मूर्ति कर्णाटयुगीन अछि।
शिवक तीनटा रूप विशिष्ट अछि- अर्धनारीश्वर, हरिहर ओ त्रिमूर्ति। त्रिमूर्ति शिव वस्तुतः ब्रह्मा, विष्णु, महेशक शक्तिक समाहार अछि- ब्रह्मविष्णुशिवा ब्रह्मन् प्रधाना ब्रह्मशक्तयः।– विष्णुपुराण। एहिमे सृष्टि (ब्रह्मा), स्थिति (विष्णु) ओ विनाश (शिव)क तत्व सभ निहित अछि। सृष्टि, स्थिति ओ प्रलयक कारक शिवे छथि। त्रिमूर्तिक विशाल गुप्तकालीन प्रतिमाक साक्षात एलफेण्टामे कयने छलहुँ। मिथिलांचलक भच्छी (दरभंगा)मे त्रिमूर्तिक अभिलेखांकित मध्यकालीन प्रस्तरमूर्ति भद्रेश्वर महादेव मन्दिर (बहेड़ी प्रखण्ड)मे पूजित अछि। त्रिमूर्ति सत्, रज ओ तमोगुणक प्रतिनिधित्व करैत अछि।
सिद्धांततः हरि (विष्णु) ओ हर (शिव) अभेद छथि अर्थात् संयुक्त रूपेँ हरिहर छथि। विद्यापतिक निम्नलिखित पदसँ स्थिति आर स्पष्ट भऽ जाइछ-
खन हरि खन हर भल तुअ कला।
खन पित वसन खनहि बघछला॥...
एक शरीरे लेल दुइ बास।
खन बैकुण्ठ खनहि कैलास॥
हरिहरक मूर्तिक अर्द्धांगमे व्याघ्रचर्म, त्रिशूल, जटामुकुटादि एवं अर्द्धांगमे पीताम्बर, शंख-चक्र, किरीट मुकुटादि शोभित छनि। हरिहरक विशाल प्रस्तर प्रतिमा गंगा-गंडक-संगमपर अवस्थित हरिहरनाथ मंदिरमे स्थापित अछि। हरिहरक एकटा पालकालीन भव्य प्रस्तर (कसौटी पाथर) मूर्ति हम वाल्मीकिनगर (भैंसालोटन) मे देखने छलहुँ। ओ ओहिठाम अन्यान्य मूर्ति सभक संगे संरक्षित अछि। हरिहरक दहिन भागमे शिव ओ वाम भागमे विष्णु उत्कीर्ण छथि।
शिवक तेसर स्वरूप अछि अर्धनारीश्वर अर्थात् आधा देह शिवक ओ आधा पार्वतीक। शिवक जटापर चन्द्रमा ओ हाथमे त्रिशूल शोभित अछि एवं आर्धांगिनी पार्वतीक हाथद्वयमे दर्पण ओ कमल पुष्प। अर्धनारीश्वरक परिकल्पना सृष्टि बोधक अछि। लिंग ओ वेदीक एकस्थ भेने अर्धनारीश्वरक रूप प्रत्यक्ष होइछ। “लिंगवेदी समायोगादर्धनारीश्वरो भवेत”।–लिंगपुराण.९९.८.१. मिथिलांचलक कुर्सो नदियामी (दरभंगा)सँ अर्धनारीश्वरक मध्यकालीन प्रस्तरमूर्ति पाओल गेल अछि। मूर्ति षटभुजी अछि।
शिव गृहस्थ देव छथि। हुनक अर्द्धांगिनी ओ शक्ति शिवा एवं गणेश ओ कार्तिकेय पुत्र छनि। वृषभ शिवक एवं सिंह पार्वतीक वाहन छनि। हुनक परिणयक परिकल्पना “कल्याण सुन्दर” मे कयल गेल अछि। पौरोहित्यक काज ब्रह्मा करैत छथि एवं साक्षीत्व अग्निक छनि। ब्रह्मा यज्ञ ओ वेदक देवता सेहो छथि। कल्याणसुन्दरक मूर्तिक परिकल्पना स्थानुक रूपमे कयल गेल अछि। वस्त्राभूषणसँ अलंकृत शिव-पार्वती पाणिग्रहण कयने त्रिभंगी मुद्रामे ठाढ़ छथि। शिव-पार्वतीक बीचमे चतुर्भुज ब्रह्मा पुरोहित रूपेँ बैसल छथि। पूरा भावात्मक परिवेश गतिमय ओ मंगलमय अछि। कल्याणसुन्दरक मूर्ति मिथिलांचलसँ अप्राप्य अछि मुदा मिथिलांचलक कोहबर चित्रमे आदर्श वर-वधूक रूपमे ओ परम्परासँ चित्रित छथि।
शिव-पार्वतीक दाम्पत्य जीवनक सुखद, रसमय एवं कलात्मक परिकल्पना। उमा-माहेश्वरक अभिशिल्पनमे भेल अछि- शिव ओ पार्वती ललितासनमे आसीन छथि। पादपीठमे शिवक वाहन वृषभ ओ पार्वतीक वाहन सिंह उत्कीर्ण अछि। शिव चतुर्भुजी छथि। तन्वंगी पार्वती शिवक वाम जंघापर बैसल छथि। शिवक दहिन हाथमे त्रिशूल ओ वाम हाथ पार्वतीक वक्षस्थलपर स्थित अछि। शिव वाम हाथे एवं पार्वती दहिन हाथे एक दोसराकेँ आलिंगबद्ध कयने छथि। पार्वतीक दहिन हाथमे दर्पण छनि। शिव दहिन हाथसँ पार्वतीक लज्जावनत मुखकेँ उठा रहल छथि। मिथिलांचलमे उमामाहेश्वरक पाथरक मूर्तिसभ भीठभगवानपुर, डोकहर (मधुबनी), सिमरिया भिण्डी, करियन (समस्तीपुर), नावकोठी (बेगूसराय), बाथे, राजेश्वरस्थान (मधुबनी) तिरहुता, बेलामोड़, वनवारी, कोर्थ, भोजपरौल, सौराठ, मंगरौनी, महादेवमठ, बसुदेवा, गाण्डवीकेश्वर, परानपुर (कटिहार) सिमरौनागढ़ (वारा, नेपाल) आदि ऐतिहासिक स्थलसभसँ प्राप्त अछि एवं ओहिठामक मंदिरसभमे संरक्षित ओ पूजित अछि। एहिसँ स्पष्ट अछि जे मिथिलांचलक मध्यकालीन परिवेशमे उमा-माहेश्वरक ललित मूर्तिक परिकल्पना सुखद दाम्पत्य दिस उत्प्रेरित करवामे सक्षम अछि।
दाम्पत्यक सुखद परिणति संततिक रूपेँ फलित होइछ। शिवक पुत्र गणेश कार्तिकेयक अपेक्षा अधिक लोकप्रिय एवं पंचदेवोपासकमे परिगणित छथि। पाली (दरभंगा)क एकटा मंदिरमे पार्वतीक गोदमे शिशु गणेश (बाल गणेश) वात्सल्य पूरित छथि। मुदा हाजीपुर (वैशाली)क एकटा मठसँ जब्त शिव-पार्वतीक कांस्य मूर्तिमे बालगणेश पार्वतीक गोदमे छथि। कांस्य प्रतिमा स्थानुक मुद्रामे बनल अछि। पार्वतीपुत्र कार्तिकेयक एकटा स्वतंत्र पालकालीन पाथरक प्रतिमा वैशालीगढ़ एवं दोसर बसुआरा (मधुबनी) सँ प्राप्त अछि। पालीक पार्वती-गणेश गुप्तकालीन थिक मुदा अन्यान्य सभ पाल-पालोत्तरकालीन थिक। पुण्ड्रवर्धन (पूर्णियाँ) मे कार्तिकेयक एकटा मन्दिर छल (राजतरंगिणी)।
लिंग ओंकार ब्रह्मक स्थूल रूप थिक। शिवलिंग ब्रह्मबोधक थिक। ओ पद्मपीठ (वेदी) पर स्थापित रहैत अछि। शिवलिंगक निम्न भाग भूमिस्थ, मध्य भाग वेदीमे एवं तृतीय भाग पूज्य मानल जाइछ। शास्त्रानुसार लिंगक अनेक प्रकार अछि जाहिमे शिव लिंगक पूजोपासना सर्वाधिक लोकप्रिय धार्मिक कृत्य मानल जाइछ। ज्योतिर्मय शिवलिंगक महत्ता विशिष्ट अछि जे भौगोलिक दृष्टिसँ राष्ट्रिय एकताकेँ सूत्रबद्ध करैत अछि। तहिना मिथिलाक सांस्कृतिक दिग्सूचक शिव (मंदिर) छथि। मिथिला परिक्रमामे एहि शिवमंदिर सभक धार्मिक महत्व बढ़ि जाइछ। कल्याणेश्वर, जलेश्वर, क्षीरेश्वर एवं सप्तरेश्वर। जनकपुरक उत्तरमे अवस्थित क्षीरेश्वर शिवक वृहदविष्णु पुराण (मिथिला माहात्म्य)मे एवं दक्षिणमे स्थित जलेश्वर शिवक स्कन्दपुराणमे (नेपाल माहात्म्य) विस्तृत वर्णन उपलभ्य अछि (जनकपुरधाम, भ्रमर, जनकपुरधाम, नेपाल, १९९९ ई.)।
शिवलिंगोक अनेक प्रकार अछि- एकमुखी, चतुर्मुखी, पंचमुखी एवं सहस्रमुखी। एकमुखी शिवलिंगक परिकल्पना सर्वप्राचीन अछि। चण्डीस्थान (अरेराज, प.चम्पारण)सँ प्राप्त कुषाणकालीन एकमुखी शिवलिंगमे शिवक मुखाकृति उत्कीर्ण अछि। हुनक जटाजूटसँ गंगा प्रवाहित अछि। शिवलिंग अद्भुत ओ अद्वितीय अछि। सर्वेक्षण क्रममे देखने छलहुँ। छायाचित्र उपलब्ध अछि। मुदा सामान्यतः एकमुखी शिवलिंगमे पार्वतीक मुखाकृति उत्कीर्ण होइछ, जकरा गौरीशंकर सेहो कहल जाइछ। लिंग भावनाक आधार शैव ओ शाक्त दर्शन अछि।
एलफेंटाक त्रिमूर्तिक मध्यमुख शिव, वाममुख पार्वती एवं दहिन मुख रौद्र रूप शिव अर्थात् भैरवक थिक। अर्थात् त्रिमुखी शिव (गुप्तकालीन) शिवत्वक विस्तार अछि। मुदा चतुर्मुखी शिव शिवशक्तिक दिग् दिगन्त व्यापकताक सूचक थिक। पशुपतिनाथ (नेपाल) ओ अरेराजक (चम्पारण) चतुर्मुखी शिवलिंगमे कतहु श्रीराम, बुद्ध, शक्ति (पार्वती), सूर्य आदिक मुखाकृति जनपदीय मान्यतानुसार उत्कीर्ण अछि। बसाढ़ (वैशाली)क गुप्तकालीन चतुर्मुखी शिवलिंग अभिलेखांकित अछि। वैशालीमे कैकटा पालकालीन चतुर्मुखी शिवलिंग सेहो मंदिरसभमे स्थापित अछि, चौगामा (दरभंगा), शाहपुर (सहरसा) एवं गढ़पुरा (बेगुसराय)क शिवमन्दिरमे सेहो चतुर्मुखी शिवलिंग स्थापित अछि। पंचमुखी शिवलिंगमे एकटा आकाशतत्व बढ़ि जाइछ। मिथिलांचलमे एकादश रुद्रक पूजन परम्परा मंगरौनी (मधुबनी) ओ बगहा (प.चम्पारण) मे अवशिष्ट अछि। मुदा सहस्रमुखी शिव लिंगक पूजनक प्राचीन उदाहरण वारी (समस्तीपुर), कटहरिया (विदुपुर, वैशाली), हजारीनाथ (वागमती तटीय दरभंगा) आदिमे प्रत्यक्ष अछि। वरुआरी (सहरसा), हाजीपुर (वैशाली), जमथरि (मधुबनी) आदिक ऐतिहासिक शिवलिंग अभिलेखांकित अछि।
हिमालयसँ गंगाधरि पसरल मिथिलांचल प्रकारान्तरसँ शिवलोक बनल अछि। भागलपुर ताम्रपत्र (सेलेक्टेड इंस्क्रिपशंस आफ बिहार, प्रो. आर.के.चौधरी)क अनुसार ओहि समय (पाल युग) तिरहुतमे हजारटा शिव मन्दिर छल। अधिकांशशिव मन्दिर आइ भग्नावशिष्ट अछि। पुरातात्विक उत्खननसँ प्राचीन शिवमंदिर सभक भग्नावशेष भगीरथपुर, चौगामा, करियन आदि ऐतिहासिक स्थल सभसँ प्राप्त भेल अछि। तिलकेश्वर शिवमंदिरक ऐतिहासिकता कर्मादित्य प्रस्तर अभिलेखसँ भऽ जाइछ। एकर अलावा ऋषि-मुनि द्वारा स्थापित शिवलिंग लोकख्यात अछि- श्रृंग ऋषि द्वारा स्थापित सिंघेश्वर शिव (सहरसा), कपिल मुनि द्वारा स्थापित कपिलेश्वर (मधुबनी), शुकदेव मुनि द्वारा स्थापित शुकेश्वरनाथ (सीतामढ़ी), कुश ऋषि द्वारा स्थापित कुशेश्वर (दरभंगा) आदि। आब प्रश्न उठैत अछि जे कि ओ ऋषि-मुनि लोकनि शिवभक्त छलाह? अथवा शिव हुनक आराध्य छलनि?
मिथिलांचलमे एक विशिष्ट प्रकारक घुर्णित (घुमैत) शिवलिंगक प्राप्ति अद्भुत ओ अद्वितीय अछि। जमथरि (मधुबनी)क शिवमंदिरमे एकटा अभिलेखांकित किन्तु घुमइवला शिवलिंग स्थापित अछि। बाइस ईंच नमगर शिवलिंगक वामपार्श्वमे शिवगायत्री ओ दहिन पार्श्वमे रामगायत्री उत्कीर्ण अछि। एहि तरहक एकटा आर घूर्णित शिवलिंग हैठीवालीक शिवमंदिर (मधुबनी) मे सेहो स्थापित अछि। तांत्रिक उपासनाक दृष्टिएँ ई शिवलिंग स्थापित अछि। कथित अछि जे तांत्रिक विधिसँ सिद्धि प्राप्ति होइछ कलियुगमे। शिवपार्वतीक एकटा आर तांत्रिक मूर्ति (कर्णाटकालीन) शैवजगतमे विशिष्ट अछि- सद्योजात। एहिमे पार्वती माताक रूपमे एवं शिव शिशुक रूपमे बनल अछि। पार्वती वाम करोटे लेटल छथि। एहि तरहक मध्यकालीन मूर्ति सभ अलौली (खगड़िया), जनकपुरक राममंदिर (नेपाल) आदिमे प्रत्यक्ष उदाहृत अछि।
मिथिलांचलमे ऐतिहासिक, पुरातात्विक एवं सांस्कृतिक महत्वक अनेक शिवालय प्राचीन साहित्य, अभिलेख ओ लोक आस्थामे युग-युगसँ प्रतिस्थापित अछि। शिवालय निर्माण एवं ओहिमे शिवक स्थापना प्रथमतः व्यक्तिपरक उद्देश्यसँ कयल गेल, मुदा कालांतरमे ओ लोक कल्याण मूलक प्रमाणित भेल। आइ ओ शिवालय लोक आस्थाक आध्यात्मिक ऊर्जाक केन्द्र बनि गेल अछि। शिवरात्रिक अवसर हो अथवा श्रावण मास प्रायः प्रत्येक महत्वपूर्ण शिवालय धार्मिक लोकोत्सवसँ स्फुरित भऽ जाइछ। शिवरात्रिक परिकल्पनाक कलात्मक अभिव्यक्ति “कल्याणसुन्दर” (शिव-पार्वती परिणय) मे उत्कीर्ण भेल अछि। मुदा मास भरि शिवक जलाभिषेक एकटा धार्मिक कृत्य रूपेँ मान्य अछि। एकर मूलमे यद्यपि देवघरक वैद्यनाथ (ज्योतिर्लिंग) छथि, मुदा मिथिलांचलोक अपन सोमेश्वरनाथ (अरेराज), गरीबनाथ (मुजफ्फरपुर), सिंहेश्वर (सहर्षा), कपिलेश्वर (मधुबनी), कुशेश्वर (दरभंगा), हलेश्वर, शुकेश्वर (सीतामढ़ी), भुवनेश्वर (शिवहर), माधवेश्वर, वर्धमानेश्वर (दरभंगा) आदि शैव तीर्थ प्रत्यक्ष रूपेँ सुलभ अछि।

Suggested citation: डॉ. प्रफुल्ल कुमार सिंह ‘मौन’. “मिथिलांचलक शैव क्षेत्र.” Videha — First Maithili Fortnightly eJournal, issue 20, 2008-10-15. https://www.videha.co.in/research/2008/20/मिथिलांचलक-शैव-क्षेत्र.htm

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