२. डॉ. देवशंकर नवीन
डॉ. देवशंकर नवीन (१९६२- ), ओ ना मा सी (गद्य-पद्य मिश्रित हिन्दी-मैथिलीक प्रारम्भिक सर्जना), चानन-काजर (मैथिली कविता संग्रह), आधुनिक (मैथिली) साहित्यक परिदृश्य, गीतिकाव्य के रूप में विद्यापति पदावली, राजकमल चौधरी का रचनाकर्म (आलोचना), जमाना बदल गया, सोना बाबू का यार, पहचान (हिन्दी कहानी), अभिधा (हिन्दी कविता-संग्रह), हाथी चलए बजार (कथा-संग्रह)।
सम्पादन: प्रतिनिधि कहानियाँ: राजकमल चौधरी, अग्निस्नान एवं अन्य उपन्यास (राजकमल चौधरी), पत्थर के नीचे दबे हुए हाथ (राजकमल की कहानियाँ), विचित्रा (राजकमल चौधरी की अप्रकाशित कविताएँ), साँझक गाछ (राजकमल चौधरी की मैथिली कहानियाँ), राजकमल चौधरी की चुनी हुई कहानियाँ, बन्द कमरे में कब्रगाह (राजकमल की कहानियाँ), शवयात्रा के बाद देहशुद्धि, ऑडिट रिपोर्ट (राजकमल चौधरी की कविताएँ), बर्फ और सफेद कब्र पर एक फूल, उत्तर आधुनिकता कुछ विचार, सद्भाव मिशन (पत्रिका)क किछि अंकक सम्पादन, उदाहरण (मैथिली कथा संग्रह संपादन)।
सम्प्रति नेशनल बुक ट्रस्टमे सम्पादक।
बटुआमे बिहाड़ि आ बिर्ड़ो
(राजकमल चौधरीक उपन्यास) (आगाँ)
नायक देवकान्त सुशिक्षित, निविष्ट, कर्मनिष्ठ आ ज्ञानी युवक छथि। हाइ
कोर्टमे कार्यरत विशिष्ट व्यक्तिक पुत्रा आ प्रतापी रईसक पौत्रा छथि। कलाप्रेमी, कलाकार, प्रतिष्ठित, साहसी, उदार आ परोपकारी। सुशीलाक रुग्न पति अनिरुद्ध बाबूक टूटल गाड़ी कमलदहमे फँसल छलनि, ओ लोकनि के छथि, तकर सूचना देवकान्तकें नहि छलनि, तथापि हुनका सहयोग देब; सुलतानगंजमे नाहसँ डूबैत दम्पतिकें बचाएब; कुलानन्दक संग सुशीलाक प्रवासक जानकारी रहितहु, हुनका आर्थिक सहयोग देब -- ई सब आचरण देवकान्त उदारता आ मनुष्यताक परिचायक थिक। एकर अलावा देवकान्तक गम्भीर आ जिद्दी स्वभावक चित्राण सेहो भेल अछि। मुदा देवकान्तक जिदसँ हुनकर अपन जे किछु बिगड़ि गेल हो, आनक किछु नहि बिगड़लनि।
परंच मूल बात अछि सुशीला आ देवकान्तक अनुरक्तावस्थाक मनोविश्लेषण। अइ विश्लेषणमे उपन्यासकार सहजहिं चमत्कृत करै छथि। अइ अनुरक्तिक कथाकें माँसल आ उन्मादक बना क' पाठकक कामेच्छा आ कुत्सा बढ़बै लेल नहि; समाज व्यवस्थामे चलैत अयथार्थ आदर्श आ मर्यादाक प्रति पाठक/भावककें उद्वेलित करै लेल। एहि चित्राणमे राजकमल चौधरीक मनोविश्लेषणात्मक शिल्प अत्यन्त प्रभावकारी साबित भेलनि अछि। उपन्यासतँ मानव जीवनक यथार्थक आख्यान होइत अछि, जाहिमे घटना चक्र आ स्थान-काल-पात्राक आश्रय लेल जाइत अछि। मूल कथाक संग-संग कतोक आनुषंगिक कथा अबैत अछि आ अइ सब क्रियामे चरित्रा-चित्राणक अमूल्य योगदान होइत अछि। चरित्रा-चित्राणेक माध्यमे कथानकमे प्रवाह अबैत अछि आ लक्ष्य प्राप्तिक बाट सोझराइत अछि। उपन्यासक पात्राक चारित्रिाक फलक जतेक सोझराएल रहत, ओकर अभिक्रिया आ आन पात्राक संग कथोपकथन स्पष्ट आ गत्यात्मक हैत। जें कि कोनो व्यक्तिक एक-एक आचरण ओकर मानसिक हैसियतक परिचायक होइत अछि, चरित्रा चित्राणमे मनोविश्लेषणक महत्व सर्वोपरि होइत अछि।
स्वातन्त्रयोत्तर कालक भारतीय साहित्यमे एहेन देखल गेल अछि जे रचनाकार लोकनि अपन हरेक पात्राक आचरण ओकर मनोविश्लेषण करैत अंकित केलनि अछि, राजकमल चौधरी अइ काजमे सर्वाधिक अग्रगामी, प्रयोगधर्मी आ नवतामूलक साबित भेलाह अछि। चरित्रा चित्राणक प्रसंग प्रेमचन्द सेहो एहि तथ्यक समर्थन दै छथि जे चरित्रा चित्राण जतेक स्पष्ट, गतिशील आ विकासमान रहत, उपन्यास ओतबे बेसी प्रभावकारी हैत। प्रेमचन्द इहो स्वीकारलनि जे मनोवैज्ञानिक सत्यक आधार पर कथा उत्तम कोटिक हैत। राजकमल चौधरीक सम्पूर्ण कथा संसार तँ मनोविश्लेषणसँ भरल अछि, आलोच्य उपन्यास ÷आदिकथा'क तँ मूल आधारे मनोविश्लेषण अछि। कहै लेल ई कथा सुशीला आ देवकान्तक प्रेम कथा थिक, मुदा दू मेसँ एको कखनहुँ किनकहु मुँह फोड़ि कए नहि कहलखिन जे हम अहाँसँ प्रेम करै छी। सौंसे समाजमे केओ ई नाहि घोषित केलनि जे दुनूमे प्रेम अछि। समाज, आ कि कुलानन्द, आ कि हरिनगर वाली (अनिरुद्ध बाबूक दोसर पत्नी, सुशीलाक माँझिल सौतिन, महानन्दक माइ, कुलानन्दक सतमाइ) अइ अनुरक्तिकें मोने मोन छिनरपन मानलनि। मुदा, ई कथा एकटा दुखान्त प्रेम-कथा थिक। सम्पूर्ण कथा सबहक मोनेमे बनैत, बढ़ैत रहल। पात्राक व्यक्तित्व, प्रवृत्ति, क्रिया-कलाप, रागात्मक मनोवेग आदिक चित्राणसँ घटना चक्र, परिस्थिति आ परिवेश सुगठित आ प्रभावकारी भेल अछि। पात्राक इच्छा-अनिच्छा, पसिन-नापसिन, क्रोध-घृणा-प्रेम, राग-अनुराग, भोगेच्छा आदिसँ कथानकमे स्वाभाविकता आ विश्वसनीयता आएल अछि।
कोनो मनुष्य प्रेम करए, घृणा करए, मारि करए, समर्थन आ विरोध करए, पूजा करए, व्याभिचार करए--ई सबो टा आचरण ओकर जीवन दर्शनसँ निर्धारित होइत अछि, जकर जानकारी ओकर मनोविश्लेषणसँ भेटैत अछि। परिवेश, प्रशिक्षण, संस्कार, प्रतिभा, अनुभव आदिक समन्वित प्रभावमे कोनो व्यक्तित्व अपन जीवन दर्शन दिढ़ करैत अछि; मुदा मनुष्य जाति जें कि सामाजिक पशु थिक, कतोक परिस्थितिमे ओकर समस्त जीवन-दर्शन विवश भ' जाइत अछि।
मनोविज्ञान कहैत अछि जे कोनहुँ क्रियाकें निष्पादित करबामे कर्त्ताक धारणा महत्वपूर्ण होइत अछि। मनुष्यक आजन्मक संस्कार, अतीतक समस्त बिसरल घटना, जीवन भरिक अनुभूति ओकर अवचेतनमे विराजमान रहैत अछि, समय पाबि कए ओएह सब बात ओकर प्रवृत्ति, आचरण आ धारणाकें निर्देशित करए लगैत अछि। आदिकथा उपन्यासक विभिन्न चरित्राक मनोविश्लेषणमे ई समस्त तत्व प्रभावी अछि। एहि उपन्यासक रचनाकाल धरि भारतीय स्वाधीनताक एक दशक बीत चुकल छल। मुदा मिथिलाक लोक--की पण्डित, की मूर्ख; की सामन्त, की मजूर...आदिम सभ्यताक मानसिकतामे जी रहल छल। पुरुषवादी अहंकारक एहेन फोंक प्रदर्शन तँ आदिमो युगमे नहि छल, जतए स्त्राीकें बच्चाक जन्म देब' बला मशीन; पुरुषक कामेच्छा अथवा कुत्सा शान्त कर' बाला यन्त्रा; घर-अंगना सम्हार' वाली परिचारिका; आ पुरुषक मुँहें प्रशंसा सूनि पुलकित रह' वाली पोसुआ पशुक अलावा आओर किछु नहि बूझल जाइत हो। आसुरी भोग-विलास आ ढोंग-पाखण्ड-अन्धविश्वास-धर्मभीरुताक प्रवंचनामे सौंसे मिथिला डूबल छल। जखन कि सौंसे देशक प्रगतिशील समाजमे जीवनक जटिलता, विचित्राता पर चिन्तन-मनन
फैलसँ भ' रहल छल। लोक आधुनिक भावबोधसँ जीवनकें देखए लागल छल। मानव जीवनक उज्ज्वल आ कलुष भाव पर तुलनात्मक चिन्तन होअए लागल छल। एहना समयमे मैथिलीमे प्रभावकारी उपन्यास लिखबाक एकहि टा शिल्प भ' सकै छल--से छल मनोविश्लेषणात्मक चरित्राांकनसँ वस्तु स्थितिकें नाँगट करबाक कौशल। हमरा मनोविश्लेषण केने हरिमोहन झा ÷कन्यादान'मे मैथिलक विदूषकीय आचरणक धज्जी उड़ा देलनि, मुदा मैथिल लोकनिकें ओहेन प्रहारक व्यंग्य, हास्य बुझेलनि। आचार्य प्रवर लोकनि उदारतापूर्वक हुनका हास्य सम्राटक उपाधि द' देलखिन।
वस्तुतः ÷आदिकथा'क कथ्यो एहने अछि जे मनोविश्लेषणक अलावा दोसर कोनो सरिआएल बाट ताकलो नहि जा सकै छल। यौवनक अटट दुपहरियामे कोनो स्त्राीकें निश्चित रूपें कोनो सम्पूर्ण पुरुषक छाहरि चाही; पुष्पवती-फलवती हेबा लेल आतुर अथवा मुदित-पुलकित हेबा लेल उत्सुक-उत्फुल्ल कोनो हरियर लताकें कोनो मजगूत डारिक आसरा चाही। सुशीला एहने उत्तप्त स्त्राी आ एहने अलसाएल लता छथि; हुनका देवकान्त चाही छलनि मुदा अनिरुद्ध भेटलखिन; चाननक गाछ चाही छलनि, मुदा भाँटि-भँगरैया भेटलखिन। स्त्राीक जीवनमे अर्थसँ बेसी सार्थक बहुत किछु होइत अछि, से बात मैथिल प्रतिनिधि अनिरुद्ध, हुनकर स'र-कुटुम, सम्बन्धी-सरोकारी नहि बूझि रहल छलखिन; एते धरि जे कुलानन्दोकें तकर खाहिस नहि भेलनि।
गम्भीरतापूर्वक देखल जाए तँ अइ उपन्यासक अधिकांश घटनाचक्र चरित्राक मोनहिमे घटित भेल अछि। सभ क्यो अपन मन्तव्य संकेतहिमे व्यक्त केलनि अछि, किनकहु धारणा स्पष्ट बोलीमे स्पष्ट नहि भेल अदि।
अनिरुद्ध बाबू सन अशक्य आ वृद्ध जमीन्दारक भौतिक सम्पदा, सांसारिक असार-पसार, सतौत सन्तानक कारणें बेटा, पुतोह, धी, जमाइ, नाति-पोतासँ भरल-पुरल घर पाबियो कए कामदग्धा सुशीला अतृप्त छथि। अतृप्त कामेच्छाक दमन हेतु हफीमक सेवन करए लगै छथि। उत्तेजनामे कएल आचरणक सूचना पाबि लजा जाइ छथि, कामातुरा प्रवृत्तिक होइतहु सामाजिक आदर्श आ कौलिक मर्यादाक पालनमे अपनाकें ध्वस्त करैत रहै छथि, नहुँ-नहुँ जरबैत रहै छथि। रुग्ण पति संग यात्राा करैत अचानक देवकान्तसँ भेंट होइ छनि। देवकान्तक यौवन, स्वास्थ्य, पराक्रम, कला प्रेम, उदारता आ सौहार्द देखि हुनकासँ मोने प्रेम करए लगै छथि। परम शिष्ट, धीर, प्रशान्त सुशिक्षित, उदार आ दृढ़ प्रतिज्ञ देवकान्त मोनमे सेहो प्रेमक तरंग अहिना उठैत अछि। आ, दुनूक प्रेमांकुर तीव्र गतिसँ पसर' लगैत अछि। मुदा जहिना दुनूक मामि-भागिनक सम्बन्ध-कथा सुनिश्चित होइत अछि। प्रेमक उद्वेग भीतरे-भीतर सुनग' लगैत अछि। किन्तु प्रेम होइत अछि आगि, ओकरा पर काँच-कोचिल जते झाँपन देल जाए ओ आओर तीव्रतासँ, अधिकाधिक उत्तापसँ प्रज्ज्वलित होइत अछि। पे्रमक ई तीव्र उत्ताप सामाजिक मर्यादाक जर्जर सूत्राक कारणें अन्नतः सुखान्त परिणति धरि नहिएँ पहुँचैत अछि। मुँह फोरि कए अइ प्रेमाभिव्यक्तिक अवसर धरि दुनूकें हाथ नहि अबै छनि। दुनू भीतरे-भीतर सुनगैत रहै छथि। मनोविश्लेषणक आधार पर दुनूक आचरणमे देखल जा सकैत अछि जे दुनूक मोनमे आगि कोन गतिसँ धधकि रहल अछि।
सौन्दर्यक प्रति आकर्षण मनुष्यक स्वाभाविक आचरण होइत अछि। चाहिओ क' कोनो व्यक्ति सौन्दर्यक उपेक्षा नहि क' सकैत अछि। सौन्दर्य बोध, आ अनुरक्ति कर्मक अपन शास्त्रा आ विधान होइत अछि, जे अलग-अलग प्राणीक आन्तरिक-बाह्य परिस्थिति आ मनोदशासँ निर्देशित होइत अछि। भूखसँ व्याकुल कोनो बरदकें लहलहाइत घास, आ कि सूखल नार-पुआरमे सौन्दर्य भेटतै, अनुरक्ति हेतै। मुदा घास अथवा नार-पुआरक घेराव, आ कि बरदक गरदनिक पगहा, आ कि मुँहमे लागल जाबी...अइ भोगक बाधक बनि सकैत अछि।...सुशीला परम सुन्दरी छथि। वयस, तदनुकूल सौन्दर्य, यौवन, आचरण, ओज, भाव आदि भादबक बाढ़ि जकाँ, उमड़ैत मेघ जकाँ उपरौंझ क' रहल छनि। ब्राह्म मूहूर्त्तमे निश्चिन्त निद्रा आ अलस मुद्रामे हुनका सूतल देखि देवकान्त दिव्य-दर्शनक अनुभव केलनि। नारी-सौन्दर्यक एहन दिव्य-दर्शन हुनका जीवनक पहिल अवसर छल, एकटा सुमधुर स्वप्न छल। वस्तुतः --हृदय कोनो सीमा-बन्धन नहि मानै'ए। कहियो नहि मानि आएल अछि।-- देवकान्तक मोनमे प्रेमक लहरि उमड़ैत रहै छनि। सुशीला मामीसँ भेंट करबाक इच्छा होइत रहै छनि, तै ले' मातृक (रामपुर) जाए पड़तनि। मुदा रामपुर नहि जेताह। इच्छा होइ छनि, मुदा अपनहि इच्छासँ भय होइ छनि। मातृक-पैतृक मर्यादा पर, अथवा सुशीला मामीक शील पर, अथवा अपन व्यक्तित्व पर आँच लागि जेबाक भय होइ छनि। मोने-मोन सुनगैत रहै छथि, मुदा मातृक जा क' सोझाँ-सोझी सुशीलाकें कहि नहि अबै छथि--मामी, सोना मामी, हमरा अहाँसँ प्रेम भ' गेल अछि। हम अहाँ बिना नहि रहि सकब। अहाँ सन ऊर्वर ऊर्जस्वित, उत्तेजनामयी, कामातुरा रूपवतीक वेगमय ज्वारकें हमर वृद्ध, अशक्य मामा नहि थाम्हि सकताह, हम थाम्हि लेब। अहाँ हमरा संग चलू। संग-संग रहब। जीवनकें जराएब नहि, स्वाहा नहि करब, जीब...।
(अगिला अंकमे)
२. ज्योतिकेँwww.poetry.comसँ संपादकक चॉयस अवार्ड (अंग्रेजी