यायावरी संस्कृति, बताह निश्चिन्तता,
ग्राम देवी पर अथाह भरोस, जीवनक प्रति उन्मुक्त आलस्य भाव अही कारणें विकसित भेल; आ से उत्तरोत्तर एक पीढ़ीसँ दोसर पीढ़ीमे अबैत गेल।
घनघोर आपद स्थितियहुमे अथाह निश्चिन्तता, धार्मिक आ ईश्वरीय शक्ति पर निश्चेष्ट मुदा दिढ़ आस्था, उत्कट आलस्य, भोजन-मैथुन-दरबारी वृत्ति दिश आसक्ति, चुगलखोरी, चाटुकारिता, दमित वासनाक विकृति, दुष्टाचारसँ भरल मनोवृत्ति, स्त्राी-जातिकें भोगक यन्त्रा बुझबाक प्रवृत्ति, शिथिल चरित्रा...सबो टा आचार मैथिल लोकनिकें अपन अही इतिहाससँ भेटल हो--से बहुत सम्भव अछि।
सुशीला सन स्त्राीक कमी ओहि समय धरि नहि छल मिथिलामे। मुदा पर्यवस्थितिक की कएल जाए! प्रेमातुर सुशीला, देवकान्तक प्रति प्रेम निवेदनक कतोक संकेत भरि उपन्यासमे दैत रहलीह अछि। देवकान्त जखन मातृक अबै छथि, तँ घर-आँगनमे सभक समक्षे दुनूक सम्भाषण आ कथोपकथनमे ई स्पष्ट होइत अछि। देवकान्त बड़े चतुराइसँ ठोकि बजा क' अपन वक्तव्य दै छथि, मुदा सुशीलाक वाक्चातुर्य देवकान्तकें अनुत्तरित क' दै छनि। जखन देवकान्त कहै छथि -- ÷आब मामी जतबा दिन कहतीह, रामपुर रहि जाएब।' तँ सुशीला तत्काल देवकान्तक आँखिमे अपन दून्नू आँखि रखैत जवाब दै छनि--÷हम कहब जे भरि जन्म अही ठाम रहि जाउ त रहि हएत?' देवकान्त निरुत्तर भ' जाइ छथि। एक उखराहा बितलाक बाद हुनका जवाब सूझै छनि, आ तखन साँझमे आबि क' कहै छथिन -- ÷सत्त मोनसँ किओ ककरो राखए चाहत त' ओ कहिओ भागि नइं सकइ छइ।' अइ सम्भाषण पर सोना मामी लजाइ छथि; अपन समस्त जमा-पँूजी भागिनकें अर्पित करैत रहै छथि। ई समर्पण वस्तुतः महादेवक प्रति पार्वतीक सर्वस्वार्पणसँ कम प्रशस्त, कम पवित्रा, कम मूल्यवान नहि अछि। मुदा समाजक नजरिमे ई परकीया समर्पण थिक, अनाचार आ व्यभिचारक समर्पण थिक। समाजक नजरिमे सुशीला आ अनिरुद्ध बाबूक विवाह बर्बरता, अनाचार आ व्यभिचार नहि थिक। हाय रे मिथिला, हाइ रे मैथिल!
मुदा समस्त चातुर्य, समस्त धैर्य, समस्त शीलक अछैत सोना मामी अपन मान-सम्मानक प्रति सावधान आ कतोक बेर उग्र सेहो देखाइ छथि। हफीम खएबाक हिनकर कथा जखन हरिनगरवाली देवकान्तकें सुनबए लगै छथिन, तँ सुशीला तामसें तरंगि उठै छथि, ज्वालामुखी जकाँ आगि-अंगोरा मुँहसँ निकल' लगै छनि; मुदा क्रोधमे प्रेमाधारकें कोनो तरहें आहत नहि करै छथि। शरबत पीबाक हिनकर आग्रह जखन देवकान्त नहि मानै छथिन, तँ ई अपमानित होइ छथि। चोटाएल नागिन सन उधिआइ छथि, मुदा देवकान्तकें आहत नइं करै छथि, लोटा गिलास फेकि कए क्रोध शान्त क' लै छथि।
मिथिलाक स्त्राी जीवनक जतेक सूक्ष्म अध्ययन राजकमल चौधरीकें छलनि, आ हिनकर रचना संसारमे जतेक सूक्ष्म विवरण उपस्थिति अछि, हमरा जनैत कोनो स्त्रिायो एते सूक्ष्मतासँ ओहि मनोविज्ञानकें नहि पकड़ि सकल हेतीह। सुशीलाक विवरणमे तँ लगैत अछि लेखक अपन सम्पूर्ण कला लगा देने छथि। सम्पूर्ण कथामे सुशीलाक चरित्राक बहुमुख अंकित करैत कतहु एकटा खोंच-नोछाड़ नहि लागए देने छथि। जे सुशीला भागिनक प्रति एहि तरहें समर्पित छलीह जे पति-पत्नीक रूपमे अमर हएबाक आशीर्वाद चाहै छलीह, से पतिक देहावसानक पश्चात, कुलानन्दक आश्रित भ' गेलीह। कुलानन्दक कोनो बात पर ÷नइं' कहब बिसरि गेलीह। स्वामीक मुँहें कहियो वर्जना नइं सुननिहारि सुशीला, कुलानन्दक समस्त वर्जनाक पालन करए लगलीह।...
(अगिला अंकमे)
१.लघुकथा- कुमार मनोज कश्यप २. दैनिकी- ज्योति
कुमार मनोज कश्यप।जन्म-१९६९ ई़ मे मधुबनी जिलांतर्गत सलेमपुर गाम मे। स्कूली शिक्षा गाम मे आ उच्च शिक्षा मधुबनी मे। बाल्य काले सँ लेखन मे अभिरुचि। कैक गोट रचना आकाशवाणी सँ प्रसारित आ विभिन्न पत्र-पत्रिका मे प्रकाशित। सम्प्रति केंद्रीय सचिवालय मे अनुभाग आधकारी पद पर पदस्थापित।
बी०डी०ओ०
ओकर असली नाम की छलैक से तऽ नहिं कहि; मुदा हम सभ ओकरा 'माने' कहि कऽ बजबैत छलियैक। कारण, ओ बात-बात पर 'माने' शब्दक प्रयोग करैत छलीह। से 'माने' ओकर नामे पड़ि गेलई भरि गामक लोक लै। बाल-विधवा, संतानहीन 'माने' हमर घरक सदस्या जकाँ छलीह। हमरा बाद मे बुझवा मे आयल जे 'माने' हमरा ओहिठाम काज करैत छलीह। बृद्धावस्था के कारणे आब काज तऽ नहिंये कऽ सकैत छलीह; हँ दोसर नोकर-चाकर पर मुस्तैद भऽ काज धरि अवश्य करबैत छलीह।
प्रधान मंत्रीक मधुबनी आगमन के लऽ कऽ लोक मे बेसी उल्लास आ उत्साह छलैक, सभ सक्षात दर्शनक पुण्य उठाबऽ चाहि रहल छल। लोकक एहि ईच्छा के पुरा करबा मे सहयोग दऽ रहल छलाह पार्टी कार्यकर्ता लोकनि जे बेसी-सँ-बेसी लोक के जुटा अपन शक्ति प्रदर्शन करबा लेल मुपत्त सवारी के व्यवस्था केने छलाह। हम मजाक मे 'माने' सँ पुछलियै- '' प्रधान मंत्री मधुबनी मे आबि रहल छथिन। अपन गामक सभ केयो जा रहल अछि देखऽ। अहाँ नहि जायब?''
''के अबैत छथिन?''- माने पुछलनि।
''प्रधान मंत्री।'' - हम उत्तर देलियै।
''धुर! ओ कोनो बी०डी०ओ० छथिन जे 'बिरधा-पेलसुम'(वृद्धावस्था पेंसन) देताह। हम अनेरे की देखऽ जाऊ हुनका ?''
हम अवाक रहि गेलंहु माने के उत्तर सँ।
२. ज्योतिकेँwww.poetry.comसँ संपादकक चॉयस अवार्ड (अंग्रेजी पद्यक हेतु) भेटल छन्हि। हुनकर अंग्रेजी पद्य किछु दिन धरि www.poetrysoup.com केर मुख्य पृष्ठ पर सेहो रहल अछि। ज्योति मिथिला चित्रकलामे सेहो पारंगत छथि आऽ हिनकर चित्रकलाक प्रदर्शनी ईलिंग आर्ट ग्रुप केर अंतर्गत ईलिंग ब्रॊडवे, लंडनमे प्रदर्शित कएल गेल अछि।
मिथिला पेंटिंगक शिक्षा सुश्री श्वेता झासँ बसेरा इंस्टीट्यूट, जमशेदपुर आऽ ललितकला तूलिका, साकची, जमशेदपुरसँ। नेशनल एशोसिएशन फॉर ब्लाइन्ड, जमशेदपुरमे अवैतनिक रूपेँ पूर्वमे अध्यापन।
ज्योति झा चौधरी, जन्म तिथि -३० दिसम्बर १९७८; जन्म स्थान -बेल्हवार, मधुबनी ; शिक्षा- स्वामी विवेकानन्द मिडिल स्कूल़ टिस्को साकची गर्ल्स हाई स्कूल़, मिसेज के एम पी एम इन्टर कालेज़, इन्दिरा गान्धी ओपन यूनिवर्सिटी, आइ सी डबल्यू ए आइ (कॉस्ट एकाउण्टेन्सी); निवास स्थान- लन्दन, यू.के.; पिता- श्री शुभंकर झा, ज़मशेदपुर; माता- श्रीमती सुधा झा, शिवीपट्टी। ''मैथिली लिखबाक अभ्यास हम अपन दादी नानी भाई बहिन सभकेँ पत्र लिखबामे कएने छी। बच्चेसँ मैथिलीसँ लगाव रहल अछि। -ज्योति
आठम दिन :
1 जनवरी १९९१, मंगलवार :
वर्षक पहिल दिन हम ७ बजे उठलहुं। सब छात्रसब मजाकमे कहलक जे हम साल भरि सुतैत रहब। पर उठैत देरी हम अतेक जल्दी तैयार भऽ गेलहुं जे सब हमरा ऑंधी तूफान के उपाधि देलक। पहिने हमसब बकरेश्वर के मंदिर गेलहुं। मंदिरके बाहरी दृष्य देखकर हमसब मुग्ध भऽ छलहुं। अन्दरमे पंडित सब अपना दिस आमंत्रित करैत छल लेकिन हमसब अपने सऽ घुमनाइ पसन्द केलहुं। आगां जाकऽ देखलहुं जे एकटा गर्म कुण्ड अछि। हमसब पहिने तऽ नहा लेने रहुं तैयो नहिं रहल गेल आ किछु सहेलीके अपन कपड़ा आनैलेल पठाकऽ ओतऽ फेर सऽ स्नान केलहुं।
अकर बाद नास्ता कऽ दीग्घा दिस विदा भेलहुं। हमर किछु संगीसब ओतऽ पहुंचैलेल ततेक उत्साहित छलैथ जे ओ सब बीचमे रुकिकऽ भोजन करैके कार्यक्रम छोड़ि देबाक बात करै छलैथ। परन्तु ई नहिं भऽ सकल।भोजनोपरान्त हमसब फेर विदा भेलहुं। राइतके साढ़े एगारह बजे दीग्घाके एक लॉजमे रूकलहुं। ई लॉज समुद्र तट सऽ नजदीक रहै आ बहुत सुविधा सऽ युक्त रहै। पॉंच-पॉंच टा विद्यार्थीके एक टा डबलबेडरूम अटैच्ड बाथरूम आ बालकोनी भेटल रहै। हमसब निश्चय केलहुं जे आई राति भरि जागल रहब जाहिसऽ सुर्योदय देखि सकी लेकिन पता चलल जे आकासमे बादल हुअके कारण सुर्योदय नहिं देख सकब। तखन हमसब सुतैके तैयारीमे लागि गेलहुं।
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रिपोर्ताज-
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कृपानन्द झा (1970- ), जन्म- समौल, मधुबनी, मिथिला। गणितमे स्नातकोत्तर (एल.एन.एम.यू, दरभंगा), बी.लिब. (जामिया मिलिया इस्लामिया) आऽ सोचाना विज्ञानमे एसोसिएटशिप, आइ.एन.एस.डी.ओ.सी., नई दिल्ली। कृपानन्द जी मीरा बाइ पोलीटेकनिक, महारानी बाग, नई दिल्लीमे व्याखाता छथि। कृपानन्दजी यूथ ऑफ मिथिलाक अध्यक्ष छलाह आऽ एखन अन्तर्राष्ट्रीय मैथिली परिषदक जेनरल सेक्रेटरी छथि। हिनकर ६ टा शोध पेपर सूचना प्रबन्धनक क्षेत्रमे प्रकाशित छन्हि, संगहि हिन्दी आऽ अग्रेजीमे एक-एकटा कविता सेहो प्रकाशित छन्हि।