२. डॉ. देवशंकर नवीन
डॉ. देवशंकर नवीन (१९६२- ), ओ ना मा सी (गद्य-पद्य मिश्रित हिन्दी-मैथिलीक प्रारम्भिक सर्जना), चानन-काजर (मैथिली कविता संग्रह), आधुनिक (मैथिली) साहित्यक परिदृश्य, गीतिकाव्य के रूप में विद्यापति पदावली, राजकमल चौधरी का रचनाकर्म (आलोचना), जमाना बदल गया, सोना बाबू का यार, पहचान (हिन्दी कहानी), अभिधा (हिन्दी कविता-संग्रह), हाथी चलए बजार (कथा-संग्रह)।
सम्पादन: प्रतिनिधि कहानियाँ: राजकमल चौधरी, अग्निस्नान एवं अन्य उपन्यास (राजकमल चौधरी), पत्थर के नीचे दबे हुए हाथ (राजकमल की कहानियाँ), विचित्रा (राजकमल चौधरी की अप्रकाशित कविताएँ), साँझक गाछ (राजकमल चौधरी की मैथिली कहानियाँ), राजकमल चौधरी की चुनी हुई कहानियाँ, बन्द कमरे में कब्रगाह (राजकमल की कहानियाँ), शवयात्रा के बाद देहशुद्धि, ऑडिट रिपोर्ट (राजकमल चौधरी की कविताएँ), बर्फ और सफेद कब्र पर एक फूल, उत्तर आधुनिकता कुछ विचार, सद्भाव मिशन (पत्रिका)क किछि अंकक सम्पादन, उदाहरण (मैथिली कथा संग्रह संपादन)।
सम्प्रति नेशनल बुक ट्रस्टमे सम्पादक।
बटुआमे बिहाड़ि आ बिर्ड़ो
(राजकमल चौधरीक उपन्यास) (आगाँ)
भय होइ छनि। मर्यादा आ सामाजिक आदर्शक। आदर्श आ मर्यादा रक्षाक चपेटमे जरैत रहबाक ई उत्कट विवरण वस्तुतः पाठकक मोनमे अइ अयथार्थ आ फोंक परम्पराक प्रति घृणा उत्पन्न करैत अछि।...तुलना करैत देखी तँ अइ मामिलामे सुशीला मुखर छथि, देवकान्त परम लजकोटर, संकोची आ डरपोक छथि, सुलतानगंजमे अजगैबीनाथ मन्दिरक सीढ़ी चढ़ैत एकहि संग सुशीला सोचै छथि कहुना पण्डाक मँुहसँ बहराए जे ÷पति-पत्नीक ई जुगल जोड़ी अमर हो', मुदा देवकान्त भयभीत छथि जे जँ पण्डा एहेन बात कहि देलक तँ लाजें मारि जाएब।... सम्पूर्ण उपन्यासमे एहेन प्रसंग कतोक बेर आएल अछि, जतए देवकान्त संकोची आ सुशीला मुखर बुझाइ छथि। उपन्यासकारेक पंक्तिमे कही तँ वस्तुतः --सुशीलाक जीवन भेलइन, समुद्रक मिलनाकांक्षामे मग्न तीव्रगामिनी गंगाक जीवन। देवकान्तक जीवन भेल, अशान्त चिरप्रतीक्षा विमग्न, तरंगायित किन्तु बाह्यरूपें परम अचंचल समुद्रक जीवन। दुन्नू जीवन एक अबहू आशाक पातर तागसँ बान्हल...उपमा देबाक ई कौशल परम व्याख्येय आ परम प्रशंसनीय अछि।
दरअसल अइ कथामे पात्रो टा नहि, प्रेम शास्त्राक सूक्ष्मतम मनोविज्ञानक चित्राण सेहो अत्यन्त व्यापक, चमत्कृत आ प्रभावकारी रूपें भेल अछि। देवकान्त सोना मामीसँ तते बेसी प्रेम करए लागल छथि, जे आओर ठाम ओ जते बेसी व्यावहारिक आ बुद्धिमान होथु, अइ प्रेम-कथामे अत्यन्त डरपोक, तर्कवादी आ संशयवादी भ' गेल छथि। सौंसे कथामे सुशीलाक समर्पण, सुशीला पर अपन अधिकार, समर्पणक संकेत आ आदर्श-मर्यादाक गुणा-भाग करैत रहि जाइ छथि। खन सोचै छथि जे सुशीला पर हुनकर की अधिकार छनि? फेर सोचै छथि, अधिकार नहि छनि तँ अपन बीमार पतिकें छोड़ि, हुनकर सेवा-सुश्रूषा लेल ओ किऐ पहुँचि गेलीह? खन सोचै छथि--नारी कोनो पुरुखसँ प्रेम नइं क' सकइए? एक पुरुख पर विश्वास नइं क' सकइए? की नारी मात्रा छलना थीक?--ओना विरह आ व्यथाक उद्रेकमे एहि तरहक बात कोनो व्यक्ति जँ सोचि लिअए तँ तकरा स्त्राीक प्रति अमर्यादित धारणा नहि बुझबाक थिक। ओ स्वयं एकर उत्तर दै छथि जे सोना मामीक आचरण मिथिलाक ÷सभ्यता, संस्कृति, परम्परा आ धर्मक एकटा परम उदाहरणक अभिव्यक्ति' थिक। ÷सोना मामी पूर्णतः भारतीय सम्पूर्णतः मैथिल नारी छलीह... जे अपने टूटि जाएत, मुदा, परम्पराक पातर सँ पातर तागकें नइं तोड़त...।'
अलगसँ कहबाक प्रयोजन नहि जे कोनो प्रवृत्ति, आचरण आदिकें राजकमल चौधरी जातिवादी, सम्प्रदायवादी अथवा लिंगवादी नहि मानै छथि। एक दिश सोना मामीक प्रति एतेक उच्च धारणा रखै छथि दोसर दिश अपन मामक दोसर स्त्राी हरिनगरवालीक कनबाक कला देखि सोचै छथि--कहब असम्भव अछि जे हरिनगरवाली कानि रहल छलीह, अथवा अभिनय कए रहल छलीह, नाटक पसारि रहल छलीह। प्रत्येक मैथिल-स्त्राी जकाँ इहो कानब-शास्त्रामे पूर्ण सुरक्षा, पारंगता छथि। ओहुनाँ कानब-खीजब, घाना पसारब, नाटक करबाक अभ्यास सभ स्त्राीकें रहइ छइ। स्त्राी चाहे इन्द्रजीत मेघनादक, शव लग विलाप करइत दानव कन्या सुलोचना सुन्दरी हो, अथवा अर्जुन पुत्रा अभिमन्युक शव लग विलाप करइत पाण्डव कुलवधू उत्तरा-सुन्दरी, सभ स्त्राीकें कानब अबइ छइ, कलात्मक ढंगसँ रुदन करए अबइ छइ।
अइ उपन्यासमे जतबे विविधता पुरुष पात्रामे अछि, ताहिसँ कनेको कम स्त्राी-पात्रामे नहि अछि। मुख्य स्त्राी पात्रा सब छथि -- सुशीला, हरिनगरबाली (अनिरुद्ध बाबूक तृतीया आ द्वितीया), द्रौपदी (कुलानन्दक पत्नी)। हरिनगर वालीक उपस्थिति सौंसे उपन्यासमे ओहने कुटिल आ नाटकीय अछि, जकर चर्चा उक्त उद्धरणमे अछि। मैथिल स्त्राीक समस्त दुर्गुण हिनकर आचरणमे भरल छनि। फूटल ढोल, बिन पेनीक लोटा, चुगलखोरनी, भाभट पसारैमे दक्ष, सौतिनकें दुष्चरित्राा साबित करबामे तल्लीन स्त्राी छथि, हरिनगरवाली।
सौतिया डाह, दुष्ट स्त्राीक आचरण, दोसरकें बदनाम करबाक नेतसँ एकसँ एक दुर्वृत्तिक कल्पना आ आरोपन मिथिलाक कतोक स्त्राीमे पाओल जाइत अछि, सौतिया डाहमे तँ ई कला आओर निखरि उठैत अछि। हरिनगरवाली सुशीला पर कलंक मढ़ै छथि--धरमपुरवाली त डाइन अछि, डाइन! गाछ हँकइए!...दुइयो दिन भिन्न भेनाँ नइं भेल छलइ आ स्वामीकें खा गेल...आब सुतन्त्रा भए गेल अछि...खूब छिड़हड़ा खेलाएत... भागिनक संगे पटना-दिल्ली करत...के रोकइबला छइ...कुलानन्दो त' तेहने छथि। अपन स्त्राीकें नैहर पठा देलइन...आब सतमाइक सेवामे रहइ छथि।--एहेन अश्रद्ध आ अवांछित गारि बर्दाश्त कइयो क' सुशीला कोनो तरहें विचलित नहि होइ छथि। विपरीत परिस्थिति अएला पर मिथिलाक बुझनुक स्त्राी सागर सन गहींर आ गम्भीर भ' जाइ छथि। सुशीला बड्ड गहींर आ बड्ड गम्भीर स्त्राी छथि। समयक उतार-चढ़ाव आ हवा-पानिक रुखि निके ना बुझै छथि। उपन्यासकार अइ उपन्यासमे हुनकर इएह छवि प्रस्तुत कएने छथि। सामाजिक बन्धन आ वैयक्तिक क्रूरता वस्तुतः एते कठोर होइत अछि, जे बिना कोनो दया-धर्मक ओ फूल सन कोमल इच्छाकें मोचारि क' राखि दैत अछि। कुटिल आदर्शसँ भरल सामाजिकता इएह थिक, जाहिमे मानवीय सम्वेदनाकें अक्षुण्ण रखबाक तर्क ताकब
व्यर्थ थिक। आदि कथाक इतिवृत्ति एकर उदाहरण थिक।
सुशीला अइ कथाक आधार चरित्रा थिकीह। कथाक आरम्भमे जखन देवकान्त आदर्श, मर्यादा, प्रतिष्ठा, पाप-पुण्य, नेत-नियम सभसँ डेराएल मामि संगें प्रेम निवेदनमे संकोच करै छलाह; समस्त उत्कट आकांक्षाक अछैत इत-उतमे फँसल छलाह; सुशीला चारि डेग आगू बढ़ि कए मुखर भेलीह; आ अपन कतोक आचरणसँ पूर्ण समर्पणक कतोक संकेत स्पष्ट रूपें देलनि। मुदा विधवा भेलाक बाद कौलिक परम्पराक अनुकूल हुनकर सतौत बेटा कुलानन्द हुनक रक्षक, प्रतिपालक भेलखिन; आ सुशीलाक भावना, मनोवेग, आन्तरिक इच्छा, साहस सब पर सामाजिक अयथार्थ आदर्शक बन्धन विजय प्राप्त क' लेलक; ओ कुलानन्द संग रहि कए अपने टुटैत रहलीह, जर्जर मर्यादाक पातर सूतकें नहि तोड़ि सकलीह।
वृद्ध, अशक्य जमीन्दार अनिरुद्ध बाबूक तेसर पत्नी सुशीला अनिन्द्य सुन्दरी छथि; आ दावानलक ज्वाला सन, अथवा समुद्री तूफान सन, अथवा भदबरिया कोसीक प्रवाह सन वेगमय यौवनक स्वामिनी छथि; अइ वेगकें सम्हारि सकबाक सामर्थ्य हुनका पतिमे नहि छनि। देवकान्तक यौवन, शिष्टता, सौन्दर्य आदि देखि ओ हुनका दिश अनुरक्त भेलीह। एहि अनुरक्तिमे अभिलाषा दैहिके टा नहि, प्रेमक आदर्श स्वरूप सेहो अर्थवन्त छलनि। इमानदारीसँ देखी तँ एहि उपन्यासमे राजकमल चौधरी द्वारा सृजित कथाक नायिका सोना मामी, अर्थात् सुशीला सन स्त्राी; कोनो कल्पना-लोकक स्त्राी नहि छथि, समाजमे एहेन कैकटा सोना मामी ओहि समयमे अही विवरणक संग भेटि सकै छलीह; एहेन स्त्राीक मनोविश्लेषण कोन मनोवैज्ञानिक करत? सुशीलाक जीवन की छल? सुन्दरि, स्वस्थ, जवान, साहसी, बुझनुक, सच्चरित ... की छथि सुशीला? एक दिश देवकान्त सन समुद्रमे मिलनक आकांक्षामे मग्न तीव्रगामिनी गंगा छथि; देवकान्तकें पैघ-पैघ प्रेमाभिसिक्त पत्रा लिखै छथि; अपन अनेक आरचरणमे अनुरक्तिक संकेतो दै छथि; रुग्ण पतिकें अस्पतालमे छोड़ि देवकान्तक परिचर्यामे पहुँचि जाइ छथि; हफीम खएलासँ अथवा कामोन्मादसँ बेहोश हएबाक कथा अपन प्रेमी देवकान्तसँ नुकएबाक प्रयास करै छथि। वृद्ध पति अनिरुद्ध बाबूक प्रति पूर्ण समर्पणक भाव स्पष्ट करै छथि। हुनका रुग्णावस्थामे देखि गाड़ी-बरद पर लादि अस्पताल ल' जाइ छथि; पति जखन अपना लेल वृद्ध वयसक चर्चा करै छथिन तँ विरोध करै छथि-- ÷सै बेर अहाँकें कहि देलऊँए, हमरा सोझाँमे अपनाकें वृद्ध नइं कहल करू...।' अर्थात अपन जवानी पर एतेक आत्मगर्विता जे वृद्ध पतिक पत्नी नहि कहाबए चाहै छथि। वैधव्य प्राप्तिक पश्चात जखन सतबेटा कुलानन्द संग तीर्थवासमे जाइ छथि, तँ धर्मशालाक मैनेजरक मुँहें अपन उच्छृंखल सतबेटाक अनाचारक कथा सुनि कुपित होइ छथि आ मैनेजरकें धोपि कए विदा करै छथि। देवकान्त जखन बलजोरी अपन बासा पर आनि लै छथिन, तँ एकहि संग प्रतिवाद आ विलाप करै छथि।... एकटा सच्चरित्रा स्त्राीकें मर्यादा आ मनोवेगमे; जीवनक सार्थकता आ सामाजिक आदर्शमे तालमेल बैसब'मे कोन-कोन यातना भोगए पड़ै छनि -- एकट अनुमान कते कठिन अछि!
सुशीलाक जीवनक पर्यवस्थिति पर उपन्यासकार नशेरी, विलासी, कुलानन्दक विचार व्यवस्था अत्यन्त सटीक आँकने छथि। सुशीला जखन बेहोश भेलीह, आ लोक हल्ला केलक जे ओ आत्महत्याक निमित्त माहुर खा नेने छथि, तखन सद्पात्राक कोटिमे नहि रहलाक अछैतो भाँगक निशाँमे भसिआएल सुशीलाक सतौत बेटा कुलानन्द, जे हुनकर समवयसी छथिन, सोचै छथि--किअए नइं सुशीलाकें मरि जाए दिअनि? जीबिए कए ओ कोन सुख काटि रहल छथि? जीवनक कोन आशा, कोन इच्छा कोन आवश्यकता आइ धरि हुनका पूर भेल छनि? आबे कोन पूर हेतइन? एहेन अपूर्व सुन्दरी छथि, जेना साक्षाते सरस्वती अथवा लक्ष्मी रहथि। मुदा, भाग्य केहेन दैबक मारल। एकटा बेटा-बेटी नइं छनि, जे तकरे मूँह देख कए जीबि लितथि।... सतमाय बाँचि कए की करती...?
कुलानन्द सन कुपात्राक मोनमे जाहि स्त्राीक प्रति एते व्यथा छनि, तिनका मादे ओहि कालक समाजकें आ सामाजिक मर्यादाकें कोनो दरेग नहि भेलनि। जेना कि पहिनहुँ कहल गेल, एहि पाछू मिथिलाक सामाजिक पर्यवस्थितिक पैघ योगदान छल। राजकमल चौधरी सेहो कथाक पृष्ठभूमिक संकेत दैत सूचना देने छथि जे मिथिलाक लोककें कथा एखनहुँ मोन छै जे एक दिश बंगालक तुर्क नवाब आ दोसर दिश दिल्लीक फिरोजशाह तुगलकक सेना मिथिलाकें घेरि कए सब वस्तु अपहृत, बलत्कृत करै छल। दिल्लीक सेनाक, बंगाल-आसाम-जएबाक बाट आजुक सहरसा-पूर्णियाँ छलै। बंगालक नवाबी पलटन बिहार, अवध आ दिल्ली दिश धावा देबा लेल अही बाटें जाए। अइ इलाकामे कोनो पैघ युद्ध कहियो नहि भेल मुदा बंगालक नवाबी सल्तनत आ दिल्ली शासनक संघर्षसँ सर्वाधिक हानि अही क्षेत्राकें भेलै। जीतल सिपाही प्रसन्नताक आवेगमे इनार पर पानि भरैत ग्रामवधूकें उठाकए घोड़ा पर चढ़ा लिअए; हारल सिपाही दुखक उद्वेगमे खरिहानमे काज करैत किसानकें तरुआरिसँ छपाठि दिअए। पराजयक पीड़ा आ विजयक उल्लास अइ क्षेत्राक जनताकें बिना कोनो युद्धमे गेनहि भेटल छै। अइ क्षेत्रामे यायावरी संस्कृति, बताह निश्चिन्तता,
ग्राम देवी पर अथाह भरोस, जीवनक प्रति उन्मुक्त आलस्य भाव अही कारणें विकसित भेल; आ से उत्तरोत्तर एक पीढ़ीसँ दोसर पीढ़ीमे अबैत गेल।
घनघोर आपद स्थितियहुमे अथाह निश्चिन्तता, धार्मिक आ ईश्वरीय शक्ति पर निश्चेष्ट मुदा दिढ़ आस्था, उत्कट आलस्य, भोजन-मैथुन-दरबारी वृत्ति दिश आसक्ति, चुगलखोरी, चाटुकारिता, दमित वासनाक विकृति, दुष्टाचारसँ भरल मनोवृत्ति, स्त्राी-जातिकें भोगक यन्त्रा बुझबाक प्रवृत्ति, शिथिल चरित्रा...सबो टा आचार मैथिल लोकनिकें अपन अही इतिहाससँ भेटल हो--से बहुत सम्भव अछि।
सुशीला सन स्त्राीक कमी ओहि समय धरि नहि छल मिथिलामे। मुदा पर्यवस्थितिक की कएल जाए! प्रेमातुर सुशीला, देवकान्तक प्रति प्रेम निवेदनक कतोक संकेत भरि उपन्यासमे दैत रहलीह अछि। देवकान्त जखन मातृक अबै छथि, तँ घर-आँगनमे सभक समक्षे दुनूक सम्भाषण आ कथोपकथनमे ई स्पष्ट होइत अछि। देवकान्त बड़े चतुराइसँ ठोकि बजा क' अपन वक्तव्य दै छथि, मुदा सुशीलाक वाक्चातुर्य देवकान्तकें अनुत्तरित क' दै छनि। जखन देवकान्त कहै छथि -- ÷आब मामी जतबा दिन कहतीह, रामपुर रहि जाएब।' तँ सुशीला तत्काल देवकान्तक आँखिमे अपन दून्नू आँखि रखैत जवाब दै छनि--÷हम कहब जे भरि जन्म अही ठाम रहि जाउ त रहि हएत?' देवकान्त निरुत्तर भ' जाइ छथि। एक उखराहा बितलाक बाद हुनका जवाब सूझै छनि, आ तखन साँझमे आबि क' कहै छथिन -- ÷सत्त मोनसँ किओ ककरो राखए चाहत त' ओ कहिओ भागि नइं सकइ छइ।' अइ सम्भाषण पर सोना मामी लजाइ छथि; अपन समस्त जमा-पँूजी भागिनकें अर्पित करैत रहै छथि। ई समर्पण वस्तुतः महादेवक प्रति पार्वतीक सर्वस्वार्पणसँ कम प्रशस्त, कम पवित्रा, कम मूल्यवान नहि अछि। मुदा समाजक नजरिमे ई परकीया समर्पण थिक, अनाचार आ व्यभिचारक समर्पण थिक। समाजक नजरिमे सुशीला आ अनिरुद्ध बाबूक विवाह बर्बरता, अनाचार आ व्यभिचार नहि थिक। हाय रे मिथिला, हाइ रे मैथिल!
मुदा समस्त चातुर्य, समस्त धैर्य, समस्त शीलक अछैत सोना मामी अपन मान-सम्मानक प्रति सावधान आ कतोक बेर उग्र सेहो देखाइ छथि। हफीम खएबाक हिनकर कथा जखन हरिनगरवाली देवकान्तकें सुनबए लगै छथिन, तँ सुशीला तामसें तरंगि उठै छथि, ज्वालामुखी जकाँ आगि-अंगोरा मुँहसँ निकल' लगै छनि; मुदा क्रोधमे प्रेमाधारकें कोनो तरहें आहत नहि करै छथि। शरबत पीबाक हिनकर आग्रह जखन देवकान्त नहि मानै छथिन, तँ ई अपमानित होइ छथि। चोटाएल नागिन सन उधिआइ छथि, मुदा देवकान्तकें आहत नइं करै छथि, लोटा गिलास फेकि कए क्रोध शान्त क' लै छथि।
मिथिलाक स्त्राी जीवनक जतेक सूक्ष्म अध्ययन राजकमल चौधरीकें छलनि, आ हिनकर रचना संसारमे जतेक सूक्ष्म विवरण उपस्थिति अछि, हमरा जनैत कोनो स्त्रिायो एते सूक्ष्मतासँ ओहि मनोविज्ञानकें नहि पकड़ि सकल हेतीह। सुशीलाक विवरणमे तँ लगैत अछि लेखक अपन सम्पूर्ण कला लगा देने छथि। सम्पूर्ण कथामे सुशीलाक चरित्राक बहुमुख अंकित करैत कतहु एकटा खोंच-नोछाड़ नहि लागए देने छथि। जे सुशीला भागिनक प्रति एहि तरहें समर्पित छलीह जे पति-पत्नीक रूपमे अमर हएबाक आशीर्वाद चाहै छलीह, से पतिक देहावसानक पश्चात, कुलानन्दक आश्रित भ' गेलीह। कुलानन्दक कोनो बात पर ÷नइं' कहब बिसरि गेलीह। स्वामीक मुँहें कहियो वर्जना नइं सुननिहारि सुशीला, कुलानन्दक समस्त वर्जनाक पालन करए लगलीह।...
(अगिला अंकमे)
१.लघुकथा- कुमार मनोज कश्यप २. दैनिकी- ज्योति
कुमार मनोज कश्यप।जन्म-१९६९ ई़ मे मधुबनी जिलांतर्गत सलेमपुर गाम मे। स्कूली शिक्षा गाम मे आ उच्च शिक्षा मधुबनी मे। बाल्य काले सँ लेखन मे अभिरुचि। कैक गोट रचना आकाशवाणी सँ प्रसारित आ विभिन्न पत्र-पत्रिका मे प्रकाशित। सम्प्रति केंद्रीय सचिवालय मे अनुभाग आधकारी पद पर पदस्थापित।
बी०डी०ओ०
ओकर असली नाम की छलैक से तऽ नहिं कहि; मुदा हम सभ ओकरा 'माने' कहि कऽ बजबैत छलियैक। कारण, ओ बात-बात पर 'माने' शब्दक प्रयोग करैत छलीह। से 'माने' ओकर नामे पड़ि गेलई भरि गामक लोक लै। बाल-विधवा, संतानहीन 'माने' हमर घरक सदस्या जकाँ छलीह। हमरा बाद मे बुझवा मे आयल जे 'माने' हमरा ओहिठाम काज करैत छलीह। बृद्धावस्था के कारणे आब काज तऽ नहिंये कऽ सकैत छलीह; हँ दोसर नोकर-चाकर पर मुस्तैद भऽ काज धरि अवश्य करबैत छलीह।
प्रधान मंत्रीक मधुबनी आगमन के लऽ कऽ लोक मे बेसी उल्लास आ उत्साह छलैक, सभ सक्षात दर्शनक पुण्य उठाबऽ चाहि रहल छल। लोकक एहि ईच्छा के पुरा करबा मे सहयोग दऽ रहल छलाह पार्टी कार्यकर्ता लोकनि जे बेसी-सँ-बेसी लोक के जुटा अपन शक्ति प्रदर्शन करबा लेल मुपत्त सवारी के व्यवस्था केने छलाह। हम मजाक मे 'माने' सँ पुछलियै- '' प्रधान मंत्री मधुबनी मे आबि रहल छथिन। अपन गामक सभ केयो जा रहल अछि देखऽ। अहाँ नहि जायब?''
''के अबैत छथिन?''- माने पुछलनि।
''प्रधान मंत्री।'' - हम उत्तर देलियै।
''धुर! ओ कोनो बी०डी०ओ० छथिन जे 'बिरधा-पेलसुम'(वृद्धावस्था पेंसन) देताह। हम अनेरे की देखऽ जाऊ हुनका ?''
हम अवाक रहि गेलंहु माने के उत्तर सँ।
२. ज्योतिकेँwww.poetry.comसँ संपादकक चॉयस अवार्ड (अंग्रेजी पद्यक हेतु) भेटल छन्हि। हुनकर अंग्रेजी पद्य किछु दिन धरि www.poetrysoup.com केर मुख्य पृष्ठ पर सेहो रहल अछि। ज्योति मिथिला चित्रकलामे सेहो पारंगत छथि आऽ हिनकर चित्रकलाक प्रदर्शनी ईलिंग आर्ट ग्रुप केर अंतर्गत ईलिंग ब्रॊडवे, लंडनमे प्रदर्शित कएल गेल अछि।
मिथिला पेंटिंगक शिक्षा सुश्री श्वेता झासँ बसेरा इंस्टीट्यूट, जमशेदपुर आऽ ललितकला तूलिका, साकची, जमशेदपुरसँ। नेशनल एशोसिएशन फॉर ब्लाइन्ड, जमशेदपुरमे अवैतनिक रूपेँ पूर्वमे अध्यापन।
ज्योति झा चौधरी, जन्म तिथि -३० दिसम्बर १९७८; जन्म स्थान -बेल्हवार, मधुबनी ; शिक्षा- स्वामी विवेकानन्द मिडिल स्कूल़ टिस्को साकची गर्ल्स हाई स्कूल़, मिसेज के एम पी एम इन्टर कालेज़, इन्दिरा गान्धी ओपन यूनिवर्सिटी, आइ सी डबल्यू ए आइ (कॉस्ट एकाउण्टेन्सी); निवास स्थान- लन्दन, यू.के.; पिता- श्री शुभंकर झा, ज़मशेदपुर; माता- श्रीमती सुधा झा, शिवीपट्टी। ''मैथिली लिखबाक अभ्यास हम अपन दादी नानी भाई बहिन सभकेँ पत्र लिखबामे कएने छी। बच्चेसँ मैथिलीसँ लगाव रहल अछि। -ज्योति
आठम दिन :
1 जनवरी १९९१, मंगलवार :
वर्षक पहिल दिन हम ७ बजे उठलहुं। सब छात्रसब मजाकमे कहलक जे हम साल भरि सुतैत रहब। पर उठैत देरी हम अतेक जल्दी तैयार भऽ गेलहुं जे सब हमरा ऑंधी तूफान के उपाधि देलक। पहिने हमसब बकरेश्वर के मंदिर गेलहुं। मंदिरके बाहरी दृष्य देखकर हमसब मुग्ध भऽ छलहुं। अन्दरमे पंडित सब अपना दिस आमंत्रित करैत छल लेकिन हमसब अपने सऽ घुमनाइ पसन्द केलहुं। आगां जाकऽ देखलहुं जे एकटा गर्म कुण्ड अछि। हमसब पहिने तऽ नहा लेने रहुं तैयो नहिं रहल गेल आ किछु सहेलीके अपन कपड़ा आनैलेल पठाकऽ ओतऽ फेर सऽ स्नान केलहुं।
अकर बाद नास्ता कऽ दीग्घा दिस विदा भेलहुं। हमर किछु संगीसब ओतऽ पहुंचैलेल ततेक उत्साहित छलैथ जे ओ सब बीचमे रुकिकऽ भोजन करैके कार्यक्रम छोड़ि देबाक बात करै छलैथ। परन्तु ई नहिं भऽ सकल।भोजनोपरान्त हमसब फेर विदा भेलहुं। राइतके साढ़े एगारह बजे दीग्घाके एक लॉजमे रूकलहुं। ई लॉज समुद्र तट सऽ नजदीक रहै आ बहुत सुविधा सऽ युक्त रहै। पॉंच-पॉंच टा विद्यार्थीके एक टा डबलबेडरूम अटैच्ड बाथरूम आ बालकोनी भेटल रहै। हमसब निश्चय केलहुं जे आई राति भरि जागल रहब जाहिसऽ सुर्योदय देखि सकी लेकिन पता चलल जे आकासमे बादल हुअके कारण सुर्योदय नहिं देख सकब। तखन हमसब सुतैके तैयारीमे लागि गेलहुं।
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रिपोर्ताज-
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कृपानन्द झा (1970- ), जन्म- समौल, मधुबनी, मिथिला। गणितमे स्नातकोत्तर (एल.एन.एम.यू, दरभंगा), बी.लिब. (जामिया मिलिया इस्लामिया) आऽ सोचाना विज्ञानमे एसोसिएटशिप, आइ.एन.एस.डी.ओ.सी., नई दिल्ली। कृपानन्द जी मीरा बाइ पोलीटेकनिक, महारानी बाग, नई दिल्लीमे व्याखाता छथि। कृपानन्दजी यूथ ऑफ मिथिलाक अध्यक्ष छलाह आऽ एखन अन्तर्राष्ट्रीय मैथिली परिषदक जेनरल सेक्रेटरी छथि। हिनकर ६ टा शोध पेपर सूचना प्रबन्धनक क्षेत्रमे प्रकाशित छन्हि, संगहि हिन्दी आऽ अग्रेजीमे एक-एकटा कविता सेहो प्रकाशित छन्हि।
चौकपर आणविक समझौता:- कृपानन्द झा
साँझ काल गामक चौकपर गहमा-गहमी छलैक। टोनुआँक दोकानपर चाहक गिलास खनखना रहल छलैक मंडलजी पान लगेवमे व्यस्त छलाह। कनीक दूरपर दुर्गा मन्दिरक पुवरिया कात बनल चबुतरापर दस-बारह युवा आ वृद्ध सम सामयिक चर्चामे मग्न छलाह। बीचमे मन्नू भाइक आवाज जोड़सँ आयल। “हौ! एहन कोन आफद आबि गेलैक अपन देशपर जे प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंहजी अपन देशक वैज्ञानिकक लगभग पछिला पचास वर्षक तपस्या आ अनुसंधान तथा भविष्यक आणविक सामरिक अनुसंधानकेँ अमेरिकाक हाथ बंधकी रखबापर उतारु भय गेल छथि।
गगनजी चबुतरापर सँ उचकि पानक पीक कातमे फेकैत कहि उठलाह, “कक्का! एहन बात नहि छैक। ई समझौता मात्र अपन देशक महज ऊर्जा आवश्यकताकेँ ध्यानमे राखि कएल गेल-हँ!..
मन्नू भाई तम्बाकू ठोढ़मे दैत कहलखिन, “है। ई ऊर्जा आवश्यकता महज बहाना छैक। अमेरिका एहि बहाने अपन देशक स्वतन्त्र आणविक कार्यक्रममे टाँग अड़ेबाक फिराकमे बहुत दिनसँ छल। आब ओ अपन मनशामे १२३ समझौता आ ओहिमे हाइड एक्टक प्रावधान सौँ सफल भय रहल अछि”।
गगन जी थोड़ेक चिन्तित मुद्रामे कहलखिन- “देखियौ कक्का, जहाँ तक १२३ समझौता आ भारतक आणविक सामरिक कार्यक्रमक प्रश्न छैक तँ मात्र ओ सब रियेक्टर अंतर्राष्ट्रीय एजेन्सीक देखरेखमे आनल जेतैक, जे सब रियैक्टर, भारत सरकार चाहतैक। तेँ बाकी कार्यक्रमपर एकर असर नहि परतैक”।
“हाँ हौ! लेकिन ई अनबाक कोन जरूरी छैक?” मन्नू भाई आवेशमे बजलाह। ताधरि बैंकर सैहैब सेहो सहटि कय चबुतरा दिश आबि गेल छलाह। गम्भीर आवाजमे मन्नू भाईकेँ सम्बोधित कय कहलथिन- “भाई, किछु एहन प्रावधान सभ जरूरी छैक एहि समझौतामे, परन्तु ई सभ निर्भर करैत छैक जे भविष्यमे भारतक स्थिति अंतर्राष्ट्रीय स्तरपर कतेक मजबूत रहैत छैक आ हमर राजनीतिज्ञ सब परिस्थितिसँ कतेक फायदा उठबैत छथि। कारण जे ड्राफ्ट एखन प्रस्तुत कएल गेल छैक ताहिमे कोनो कन्फ्लिक्टक स्थितिमे की कदम उठायल जायत आ ओ भारतक फायदामे होयत वा नुकसानमे से ओहि समयक देशक कूटनीतिज्ञ एवं अंतर्राष्ट्रीय परिस्थितिपर निर्भर करत। परंच, वर्तमान परिस्थितिकेँ अगर देखल जाय तँ हमर देशक आणविक विद्युत उत्पादनक वर्तमान क्षमता मात्र ४०-५०% उत्पादन भय रहल अछि बाँकी आगू जे योजना छैक ओकरो अगर ध्यानमे राखल जाय तँ कहल जा सकैत अछि जे आणविक इन्धन एवं शान्तिपूर्व आणविकौपयोगसँ जुड़ल किछु तकनीककेँ यथाशीघ्र आवश्यकता छैक।
“हौ बैंकर! ई पक्ष तँ छैक परंच एखनहु अगर सरकार आंतरिक संसाधनकेँ सही ढंगसँ दोहन करय तँ ई आणविक इंधनक समस्या अल्पकालिक साबित होयत”। मन्नू भाई किछु शान्त मुद्रामे बजलाह। अपन बातकेँ आगू बढ़बैत कहलखिन जे – “हौ, एखनहु जे योजना सब झाड़खण्डक (जादूगुड़ा, बन्दूहुरंग, तुरमडीह) आन्ध्र प्रदेशक (तुम्मालापल्ली) कर्णाटक, मेघालय आ राजस्थान आदि राज्यमे चलि रहल छैक ओ अगर सही ढंगसँ कार्यान्वित कयल जाय तँ आणविक इन्धनक ई वर्तमान समस्याक समाधान आसानीसँ कयल जा सकैछ”।
चबुतराक उतरवरिया-पछवरिया कोनापर बैसल टुन्ना बाजि उठल, “यौ कक्का, मंडलजी पानक दोकान आब बन्द करताह! ८ बाजि रहल छैक”।
बैंकर सैहैब जोड़सँ कहलखिन- “यौ मंडलजी! आठटा पान लगाकऽ एमहर पठाऊ”।
चबुतराक पछवरिया कातमे मजहर सोचपूर्ण मुद्रामे साँझेसँ बैसल सबहक गप सुनि रहल छलाह। बैंकर सैहैब मजहरकेँ कहलखिन- “हौ मजहर! तूँ तँ एखन कम्पीटिशन सबहक तैयारी कए रहल छह। तूँ एहि सम्पूर्ण प्रकरण पर बहुत मंथन कयने हेब। आखिर तोहर सोच की छह”?
खखसि गरदनि साफ कय खखाड़ कातमे फेकैत बजलाह- “भाईजी! अंतर्राष्ट्रीय आ आर्थिक नीति काफी संकीर्ण विषय छैक। पहिल बात अछि जे हमरा लोकनि एन.पी.टी.पर हस्ताक्षर केने बिना अंतर्राष्ट्रीय आणविक बाजारमे सेंह मारवाक कोशिश कय रहल छी। एहि हालतमे किछु ने किछु अंतर्राष्ट्रीय बंधन तँ स्वीकार करहिये परत। परन्तु हम एकरा एकटा अवसरक रूपमे देख रहल छियैक। आणविक क्षेत्रक किछु एहन पक्ष छैक जाहिमे हमर देशक अनुसंधान शायद अमेरिकोसँ ऊपर अछि। हालमे एकटा रिपोर्ट पढ़ने रही, जाहिमे कहल गेल छैक जे भारतक वैज्ञानिक २००५ आ २००६ मे प्रकाशित अनुसंधान रिपोर्टक आधारपर तकनीकी रूपसँ समृद्ध देश सबकेँ सेहो पाछू छोड़ि आगू बढ़ि गेल अछि। एहि स्थितिमे आणविक इन्धन आ किछु तकनीकक आयात तँ महज अल्पकालिक छैक। दीर्घकालिक असर हमरा जनैत ई हेतैक जे भारत किछु दिनका बाद आणविक क्षेत्रमे एकटा पैघ निर्यातक भऽ कऽ उभरत। एकरामे तकनीकी क्षमता छैक आ अन्तरि आणविक साधन, जे किछु काल पहिने चर्चा भेल जेना, झारखण्ड, आन्ध्रप्रदेश, मेघालय आदिमे उपलब्ध छैक तथा अंतर्राष्ट्रीय आणविक सहयोगक माध्यमसँ एकटा पैघ निर्यातक भेनाइ सम्भव छैक।
तेँ हेतु हमर तँ एतबय कहब अछि जे जौँ एहि समझौताकेँ सही ढंगसँ उपयोग कयल जाय तँ ई अपन देशक लेल वरदान साबित होयत”।
१.नवेन्दु कुमार झा छठिपर २.नूतन झा भ्रातृद्वितियापर
नवेन्दु कुमार झा,
समाचार वाचक सह अनुवादक (मैथिली), प्रादेशिक समाचार एकांश, आकाशवाणी, पटना
१.बिहारक लोक पर्व – छठि
पावनि-तिहार हमर सभक सभ्यता-संस्कृतिक परिचायक अछि। हिन्दू धर्ममे पाबनिक विशेष महत्व अछि। हिन्दू धर्मावलम्बी सभक कतेको पाबनिमे छठिक विशेष महत्व अछि। ई पाबनि बिहारक लोक पाबनिक संग महापाबनि सेहो अछि। ई सम्पूर्ण बिहारक संग पूर्वी उत्तर प्रदेश आ महाराष्ट्र, गुजरात, राजस्थान आ दिल्लीक बिहारी बहुल क्षेत्र सभमे श्रद्धाक संग मनाओल जाइत अछि। पड़ोसी देश नेपालक मैथिली बहुल क्षेत्रमे सेहो एहि पाबनिक आयोजन कएल जाइत अछि। अगाध श्रद्धा, कड़गर व्रत साधना, एकान्त निष्ठा आ आत्म संयम बाला एहि पाबनिक बिहारमे ओतबे महत्व अछि जतेक महाराष्ट्रमे गणपति महोत्सव, पश्चिम बंगालमे दुर्गापूजा तथा पंजाबमे वैशाखीक अछि। बिहारक किछु क्षेत्रमे एहि पाबनिकेँ “डाला छठि” सेहो कहल जाइत अछि।
ई पाबनि सूर्योपासना आ साधनाक महापाबनि अछि। शक्तिक देवी दुर्गाक आराधनाक समाप्तिक बाद प्रदेशमे छठि पाबनिक आगमनक अभास होमए लगैत अछि आ प्रकाशक पाबनि दीया बातीक समाप्तिक बाद लोक एकर तैयारीमे लागि जाइत छथि। एहि पाबनिमे भगवान सूर्य देव आऽ षष्ठी माय (छठि माता)क आराधना एक संग कएल जाइत अछि। ओना तँ सूर्य देवक पूजाक परम्परा अति प्राचीन अछि आऽ कतेको हजार वर्षसँ हमर सभक सांस्कृतिक विरासत अछि मुदा सूर्य देवक संगहि षष्ठी मायक पूजा एक संग कहियासँ शुरू भेल से एखनो रहस्य बनल अछि।
छठि पाबनिक आयोजन वर्षमे दू बेर होइत अछि। पहिल बेर चैत मासमे आ दोसर बेर कार्तिक मासमे छठिक पाबनि होइत अछि। कार्तिक मासमे एहि पाबनिक आयोजन विस्तृत रूपमे होइत अछि। एहि अवसरपर प्रवासी बिहारी आवश्यक रूपसँ अपन प्रदेश आऽ गाम अबैत छथि आऽ अपन घरपर रहि सम्पूर्ण परिवारक संग एहि पाबनिकेँ मनबैत छथि। श्रद्धा आऽ आस्थाक संग एहि पाबनिकेँ कएलासँ मनोबांक्षित फलक प्राप्ति होइत अछि। धार्मिक ग्रन्थ सभमे ई जनतब देल गेल अछि जे सूर्य देवक पूजा प्राचीन कालसँ प्रसिद्ध अछि आऽ बिहारमे एकर प्रसिद्धि सहज रूपमे देखल जाऽ सकैत अछि।
चारि दिन धरि चलै बाला ई धार्मिक अनुष्ठान कार्तिक शुक्ल चतुर्थीसँ शुरु होइत अछि आऽ सप्तमीकेँ समाप्त होइत अछि। पहिल दिन “नहाय-खाय” होइत अछि। एहि दिन पबनैतिन सुविधानुसार नदी, पोखरि आऽ इनार आदिमे स्नान कऽ अरबा चाउरक भात, बुटक दालि आऽ सजिमनिक तरकारी भोजन करैत छथि। पबनैतिनक भोजन कएलाक बाद घरक आन सदस्य भोजन ग्रहण करैत छथि। एहि दिन छठि पाबनि करबाक संकल्प लेल जाइत अछि। दोसर दिन पंचमीकेँ खरना होइत अछि जाहिमे पबनैतिन भरि दिन उपास रहि नदी, पोखरि आ इनारसँ पानि आनि पीतल, ताम्बा अथवा माटिक बर्तनमे खीर, चाउरक आटाक गुलगुला बनबैत छथि आऽ सांसमे नव वस्त्र पहिर चाँद देखि बनल सामग्री, केरा आऽ दूध सूर्य भगवानकेँ समर्पित कऽ शान्त-चित्त भऽ प्रसाद ग्रहण करैत छथि। खरनाक समय कोनो आबाज नहि होमए क चाही। खरनाक विधि विभिन्न स्थानपर बदलैत अछि मुदा मूल रूपमे कोनो परिवर्तन नहि होइत अछि। एकरा बादसँ पबनैतिन उपासमे रहैत छथि आऽ चारिम दिन उगैत सूर्यकेँ अर्घ्य दऽ प्रसाद ग्रहण कऽ उपास तोड़ैत छथि। खरनाकेँ किछु क्षेत्रमे “लोहंडा” सेहो कहल जाइत अछि।
तेसर दिन षष्ठीकेँ पबनैतिन नदी, पोखरि आ इनारमे पानिमे ठाढ़ भऽ कतेको तरहक पकबान, फल-फूल, सुपारी, पान आदिकेँ कांच बासक बनल सूपमे सजा ओहिमे दीप जड़ा डुबैत सूर्य दिस मूँह कऽ भगवान सूर्यकेँ अर्घ्य चढ़बैत छथि। परिवारक आन सदस्य सेहो सूपक आगाँ पानि अथवा दूध ढ़ारि अर्घ्य दैत छथि। षष्ठी दिन भगवान सूर्यकेँ अर्घ्य देलाक बाद प्रदेशक किछु क्षेत्रमे “कोसी भरबाक” परम्परा सेहो अछि। एहि दिन अर्घ्य देलाक बाद स्त्रीगण अपन अंगनाकेँ गोबरसँ निपैत छथि आ ओहिपर अरिपन दैत छथि। एकर बाद चारि टा पैघ कुसियारसँ मंडप बना एकर बीचमे माटिक बनल हाथी रखैत छथि जकर चारु कात दीप बनल रहैत अछि। सभ दीपकेँ मालासँ सजा ओहिमे घी ढ़ारि जड़ाओल जाइत अछि। हाथीक ऊपरमे भगवान भाष्करकेँ अर्पित कएल जाए बाला प्रसाद, ठकुआ, केरा आऽ आन फलकेँ माटिक बर्तनमे राखल जाइत अछि। दीप राति भरि जड़ैत रहैत अछि आ स्त्रीगण मंडपक चारूकात बैसि भरि राति जागल रहि छठि माइक गीत गबैत छथि। भरि राति दीप जड़बऽ आऽ गीत गाबएमे बितैत अछि। षष्ठी जकाँ चारिम दिन सप्तमीकेँ उगैत सूर्यक भिनसरमे समर्पित कएल जाइत अछि। एकर बाद कोसी उठा लेल जाइत अछि। अर्घ्य देलाक बाद सभ लोक पबनैतिनकेँ प्रणाम कऽ आशीर्वाद लैत छथि। लोक पबनैतिनक आशीर्वादकेँ सूर्यदेवक आशीर्वाद मानैत छथि। अमीर-गरीब, बूढ़-जवान, मालिक-नोकर, स्त्री-पुरुष सभ भेदभाव बिसरि पबनैतिनसँ आशीर्वाद लैत छथि। तेजीसँ बदलैत परिवेशक बावजूद ई परम्परा निरन्तर चलि रहल अछि। सप्तमी अर्घ्यक बाद छठि मायक प्रसाद ग्रहण कऽ पबनैतिन अपन उपास समाप्त करैत छथि आ भोजन ग्रहण करैत छथि। एहिक संग चारि दिनक ई धार्मिक अनुष्ठान समाप्त होइत अछि। अन्तिम दिनकेँ पारन सेहो कहल जाइत अछि।
बिहारमे ई पाबनि हिन्दूक संगहि मुसलमान आ सिख सेहो मनबैत अछि। कटिहार जिलाक लक्ष्मीपुर आऽ भोजपुर जिलाक कोइलवर गाममे तीनू धर्मक लोक एहि पाबनिकें मनबैत छथि। लक्ष्मीपुर गामक पश्चिम स्थित नदीक किनारमे तीनू समुदायक श्रद्धालु एकट्ठा होइत छथि आऽ एक संग सूर्यदेवकेँ अर्घ्य दैत छथि, ओतहि, कोइलवर गाममे हिन्दू रोजा रखैत छथि तऽ मुसलमान छठिक पाबनिमे हिन्दू सभक घरमे सूप पठा कऽ एहि पाबनिकेँ मनबैत छथि।
प्रदेशक सांस्कृतिक सम्पन्नताक उदाहरण प्रस्तुत करैत एहि पाबनिमे उपयोगमे आबए बाला वस्तु सभ खेतीक व्यवस्थाक अर्थशास्त्रीय स्वरूप प्रस्तुत करैत अछि। ई एकमात्र एहन धार्मिक अनुष्ठान अछि जाहिमे पंडितक कोनो हस्तक्षेप नहि होइत अछि। बिना पंडितक सम्पन्न होमएबाला एहि पाबनिमे भगवान आऽ भक्तक संग सीधा सम्पर्क होइत अछि। एहि पाबनिमे स्त्रीगणक महत्वपूर्ण भूमिका होइत अछि जे अपन शरीरकेँ तपा कऽ पूरा भक्तिक संग नियम-निष्ठा आऽ पवित्रताकेँ बनाएल रखबाक प्रति विशेष रूपसँ सतर्क रखैत छथि। एहन धारणा अछि जे एहि पाबनिकेँ नियम निष्ठा आऽ पवित्रताक संग नहि कएलासँ एकर विपरीत असरि पबनैतिन आऽ ओकर निकट सम्बन्धी आऽ परिवारपर तुरत पड़ैत अछि। ई मान्यता अछि जेऽ पवित्रताक संग ई पाबनि नहि कएलासँ असाध्य रोग उत्पन्न होएबाक संभावना रहैत अछि। दोसर दिस ईहोमानब अछि जे एहि पाबनिकेँ नियमित रूपेँ कएलासँ सफेद दाग जेहन रोगसँ मुक्ति सेहो भेटैत अछि। एहि पाबनिक बढ़ैत लोकप्रियताकेँ देखि आब पुरुष सेहो ई पाबनि करए लगलाह अछि।
भगवान सूर्यक पूजा भारतक संगहि इन्डोनेशिया, जावा, सुमात्रा आदि कतेको देशमे कएल जाइत अछि, मुदा अन्तर अतबा अछि जे स्थानक परिवर्तनक संग एकर स्वरूप बदलि जाइत अछि। सूर्योपासनाक चरचा विश्वक प्रायः सभ प्राचीन साहित्यमे अलग-अलग रूपमे कएल गेल अछि। एकर चर्चा वेदमे तँ अछिए संगहि सूर्योपनिषद, चाक्षुपोपनिषद, अक्ष्युपनिषद आदिमे सेहो अछि मुदा सूर्य देवक संग सूर्य देवक संग षष्ठी देवी पूजा एक संग कहियासँ कएल जाऽ रहल अछि एकर प्रमान एखन धरि अनुपलब्ध अछि।
कार्तिक मासक षष्ठी तिथि षष्ठी देवी कऽ अछि जे भगवान कार्तिकेयक पत्नी छथि। ई पाबनि सूर्य देव आ षष्ठी देवी एक संग करबाक पाबनि अछि जे पूरा भक्तिक भावक संग मनाओल जाइत अछि। छठिक गीतमे सेहो सूर्य देव आऽ षष्ठी मायक स्तुति एक संग कएल गेल अछि।
सूर्योपासनाक संग एहि धार्मिक अनुष्ठानक संबंधमे कतेको कथा प्रचलित अछि। एकटा मान्यता ई अछि जे मधुश्रवामे च्यवन ऋषिक आश्रम छल। ऋषिक पत्नी सुकन्याक पिता जंगलमे शिकार खेलऽ गेलाह तँ हुनका द्वारा छोड़ल गेल तीर च्यवन ऋषिक एकटा आँखिमे लागि गेल जाहिसँ हुनक एकटा आँखि चलि गेल। एहि घटनासँ सुकन्या व्याकुल भऽ गेलीह आऽ जंगलक भ्रमण करए लगलीह। जंगलमे एक दिन एकाएक सूर्य देवक पूजामे लागल एकटा नाग कन्यासँ हुनक भेँट भेल। ओ एहि सम्बन्धमे नागकन्यासँ जनतब लेलनि तँ नागकन्या जनौलक जे षष्ठी आऽ सप्तमीकेँ सूर्य देवक पूजा कएलासँ भक्तक सभ मनोकामना पूरा होइत अछि। एहन चरचा होइत अछि जे च्यवन ऋषि आऽ सुकन्या सूर्य देवक पूजा कएलनि आऽ हुनक आँखि ठीक भऽ गेल। प्राचीन साहित्यसँ ईहो जनतब होइत अछि जे औरंगजेब सेहो औरंगाबाद स्थिति देवक प्रसिद्ध सूर्य मन्दिरमे १६७७ सँ १७०७ ई. धरि नियमित रूपसँ छठिक अवसरपर सूर्य देवक आराधनामे लागि जाइत छल। एहनो चरचा भेटैत अछि जे महाभारतक समय पांडव जखन सभ किछु हारि गेलाह आऽ जंगलमे घुमैत छलाह जखन विपत्ति एहि समयमे द्रौपदी सूर्यदेवक १०८ नामसँ सूर्यक पूजा कएलनि आऽ छठिक व्रत कएलाक बाद पांडवकेँ अपन राज-पाट वापस भेटि गेल। एहि घटनाक बाद लोक सभ एकटा “महाभारत पर्व” सेहो कहए लगलाह। आम जन समूहक मध्य ई धारणा अछि जे एहि धार्मिक अनुष्ठानकेँ निष्ठाक संग कएलासँ मनोवांक्षित फलक प्राप्ति तँ होइते अछि संगहि संतानोत्पत्ति आऽ पारिवारिक शान्ति आऽ चैनक संग असाध्य रोगक निवारण सेहो होइत अछि।
सम्पूर्ण बिहारमे पूरा उत्साह आऽ भक्तिभावक संग मनाओल जाएबाला एहि पाबनिक अतेक महत्व अछि जे गरीब सेहो भीख माँगि कऽ ई पाबनि करैत अछि। कतेको लोक आऽ संगठन एहि अवसरपर फल-फूल आऽ पूजाक सामान बाँटि पुण्यक भागी बनैत छथि। खरना आऽ सप्तमीक दिन लोकसभ माँगियो कऽ प्रसाद जरूर ग्रहण करैत छथि। पबनैतिन सेहो बिना कोनो भेदभावक प्रसाद बँटैत छथि। एहि अवसरपर पूरा प्रदेशमे नदी, पोखरि, कुआ आदिक सफाई कएल जाइत अछि। सम्पूर्ण प्रदेशक शहर गामक सड़क, गली, मोहल्लामे अद्भुत सफाई आऽ प्रकाशक व्यवस्था कएल जाइत अछि। शहर सभमे नदी-पोखरिपर बढ़ैत भीड़ देखि आब लोक सभ अपन मोहल्ला आऽ घरक छत अथवा लग पासमे खाली स्थानपर पोखरि जकाँ संरचना बना ओहिमे पानि जमा दैत छथि आऽ पबनैतिन ओहिमे ठाढ़ भऽ सूर्यदेवकेँ अर्घ्य समर्पित करैत छथि। ई एकमात्र अवसर अछि जखन लोक सभ साक्षात अराध्य देवक पूजा करैत छथि। एहि अवसरपर सम्पूर्ण बिहारमे अमीर-गरीब, ऊँच-नीच आऽ मालिक-मजूरक बीच दूरी समाप्त भऽ जाइत अछि। सभ केओ तन, मन, धनसँ एहि पाबनिमे लागि जाइत अछि आऽ सम्पूर्ण वातावरण छठिमय भऽ जाइत अछि।
२. बिहारमे सूर्योपासनाक प्रमुख केन्द्र-
नवेन्दु कुमार झा,
समाचार वाचक सह अनुवादक (मैथिली), प्रादेशिक समाचार एकांश, आकाशवाणी, पटना
छठि पाबनि बिहारक एकटा लोक पर्व अछि जे प्रायः सभ घरमे मनाओल जाइत अछि। पूरा प्रदेशमे आस्था आऽ श्रद्धाक संग ई चारि दिवसीय अनुष्ठान सम्पन्न होइत अछि। बिहारमे सूर्योपासनाक कतेको केन्द्र अछि। बिहारमे स्थित कतेको सूर्य मन्दिर श्रद्धालु सभकेँ भगवान सूर्यक अर्घ्य देबाक लेल आकर्षित करैत अछि। प्रदेशक संगहि देशक कतेको आन क्षेत्रसँ श्रद्धालु एहि मन्दिर सभमे आबि सूर्य देवक आराधना करैत छथि:-
देवक सूर्य मन्दिर:- औरंगाबाद जिला मुख्यालयसँ बीस किलोमीटरपर देवमे स्थित सूर्य मन्दिर मगध विशिष्ट संस्कृति, आस्था आऽ विश्वासक सर्वाधिक सशक्त आऽ विराट प्रतीक अछि। ई प्राचीन सूर्य मन्दिर अपन शिल्प आऽ स्थापत्यक प्रभावशाली सौम्यक अभिव्यक्त करैत अछि। सूर्य देवक ई विशाल मन्दिर पूर्वाभि,उख नहि भऽ पश्चिमाभिमुख अछि। बिना सिमेन्ट या गार चूनाक आयताकार, वर्गाकार, अर्द्धवृत्ताकार, गोलाकार आऽ त्रिभुजाकार आदि कतेको रूप आऽ आकारमे काटल पत्थरकेँ जोड़िकऽ बनाओल गेल अछि। गोटेक सौ फीट ऊँच एहि सूर्य मन्दिरमे सूर्य देवक तीन रूपक उदयाचल, मध्यांचल तथा अस्ताचलमे विद्यमान छथि। एहि मन्दिरक कारी पाथरिक नक्कासी, अभिषेक करैत अस्ताचलगामी सूर्यक किरण आऽ एहि मन्दिरक महिमाक कारण लोक सभमे अटूट श्रद्धा अछि। एहि कारण प्रति वर्ष चैत आऽ कातिक मासमे देशक कतेको क्षेत्रसँ पबनैतिन एहि ठाम आबि सूर्यदेवकेँ अर्घ्य दैत छथि।
पोखरामाक सूर्य मन्दिर- लखीसराय जिला सूर्यगढ़ा प्रखण्डक पोखरामा गाममे स्थापित सूर्य मन्दिर सूर्य पंचायतन मन्दिर अछि जतए पाँचो देवता शिव, गणेश, विष्णु आऽ देवी दुर्गाक संग सूर्यदेव विराजमान छथि। एहि तरहक प्रदेशक ई पहिल मन्दिर अछि। एकर निर्माण सूर्य देवक प्रेरणासँ भेल अछि। १२०० फीटमे बनल एहि मन्दिरक बगलमे एकटा पोखरि सेहो अछि जतए भगवान सूर्यकेँ अर्घ्य देल जाइत अछि। लोक सभक मान्यता अछि जे सच हृदय, स्वच्छ भाव आऽ पवित्र मनसँ एहि मन्दिरमे छठिक पूजा कएलासँ दैहिक, दैविक आऽ भौतिक पापसँ मुक्ति तँ भेटैते अछि, सूर्य नारायण मनोनुकूल फल सेहो दैत छथि। पोखरामा गाम किउल-भागलपुर रेल खण्डपर कजरा स्टेशनसँ पाँच किलोमीटर उत्तर पश्चिममे तथा सड़क मार्गसँ ई गाम लखीसराय –मुँगेर पथपर लखीसरायसँ पन्द्रह किलोमीटर आऽ अलीनगरसँ चारि किलोमीटरपर अवस्थित अछि।
उलारक सूर्य मन्दिर- राजधानी पटनासँ पचास किलोमीटर दूर दुल्हिन बाजार आऽ पालीगंजक मध्य उलार मोड़सँ एक किलोमीटर दूर अवस्थित उलारक सूर्य मन्दिर अपन विशिष्ट पहचानक कारण प्रसिद्ध अछि। द्वापर कालमे भगवान श्रीकृष्णक वंशक राजा एहि मन्दिरक निर्माण करौने छलाह। गोटेक तीस फीट ऊँच एहि मन्दिरक इतिहास आऽ महत्वक कारण आइयो सभ रवि दिन कतेको हजार श्रद्धालु पैदल चलि कऽ एहि ठाम पूजा-अर्चना करैत छथि। छठिक अवसरपर एहि ठाम पैघ संख्यामे लोक छठि करऽ अबैत छथि।
मधुश्रवाक सूर्य मन्दिर- राजधानी पटनासँ सटल अरवल जिलाक मधुश्रवामे सेहो एकटा प्राचीन सूर्य मन्दिर अछि। कहल जाइत अछि जे मधुश्रवामे च्यवन ऋषिक आश्रम छल। पौराणिक कथाक अनुसार सुकन्या आऽ च्यवन ऋषिक देवार लागल शरीर एहि ठाम ठीक भऽ गेल छल आऽ हुनक फूटल आँखि पूर्ववत भऽ गेल।
सुवासक सूर्य मूर्ति- मुजफ्फरपुर जिलाक गायघाट प्रखण्ड अन्तर्गत दरभंगा-मुजफ्फरपुर राष्ट्रीय उच्च पथपर लढ़ौर पंचायतक सुवास गाममे सेहो भगवान सूर्यक एकटा प्राचीन मूर्ति अछि। एहि गामक लोक एकर पूजा अपन ग्राम देवताक रूपमे करैत छथि। जानकारीक अभावमे ई मूर्ति एकटा छोट मन्दिरमे एखनो स्थापित अछि। हालाँकि एखन धरि प्रदेशक सूर्योपासनाक केन्द्रमे एकर पहचान नहि बनि सकल अछि।
उमगाक सूर्य मन्दिर- औरंगाबाद जिलाक मदनपुर उमगा पर्वत श्रृंखलापर चौदह सौ वर्ष पूर्व एकटा सूर्य मन्दिरक निर्माण कराओल गेल छल जकर शिल्प देवक सूर्य मन्दिरसँ मिलैत अछि। गोटेक साठि फीट ऊँच ई मन्दिर बिना सिमेन्टक प्राचीन पाथरसँ बनल अछि। एहि ठाम सात टा घोड़ापर सवार भगवान सूर्यक प्रतिमा स्थापित अछि। देवसँ गोटेक बारह किलोमीटरपर ई मन्दिर अवस्थित अछि।
बेलाउरक सूर्य मन्दिर- भोजपुर जिलाक उदवन्तनगर प्रखण्डक दक्षिण-पूर्व कोनपर आरा-सहार सड़कपर स्थित बेलाउर सूर्य मन्दिरक लेल प्रसिद्ध अछि। बेलाउरक नयनाभिराम एहि मन्दिरमे सूर्य देवक भव्य प्रतिमा प्रतिष्ठित कएल गेल अछि। एहि ठाम प्रदेशक कोन-कोनसँ लोक सभ मनता मानए अबैत छथि।
औंगारीक सूर्य मन्दिर- नालन्दा जिलाक एकंगरसराय प्रखण्डक एकंगरडीह बजारसँ गोटेक पाँच किलोमीटर दक्षिण ऐतिहासिक औगारी गाममे बनल सूर्य मन्दिरमे सूर्य देव आऽ भगवान विष्णुक उनीस टा प्राचीन प्रतिमा अछि। भगवान सूर्यक बारह टा राशि अछि। एहि सभ राशिक प्रतीक देश भरिक बारह टा सूर्य मन्दिरमे सँ एकटा औंगारीक सूर्य मन्दिर अछि। मन्दिरक लग एकटा विशाल पोखरि सेहो अछि। एहि पोखरिमे स्नान कऽ सूर्य देवकेँ एहि ठाम अर्घ्य देबाक विशेष महत्व अछि। छठिक अवसरपर औंगारीमे पैघ मेला सेहो लगैत अछि।
हवेली खड़गपुरक सूर्य मन्दिर- मुंगेर जिलाक हवेली खड़गपुर मुख्यालयसँ गोटेक तीन किलोमीटर उत्तर पश्चिम जमुई-मुंगेर रोडपर अवस्थित सूर्य मन्दिरक निर्माण पाँच दशक पूर्व छात्र सभक पूजा-अर्चनाक लेल बनाओल गेल छल। एकर निर्माण पंडित देवदत्त शर्मा छात्र-छात्रा सभक लेल कएने छलाह जाहिसँ छात्र सभ भगवानक सजीव रूपकेँ महसूस करथि। हालाँकि आब ई मन्दिर भक्त सभक लेल आराधनाक प्रमुख केन्द्र बनि गेल अछि। ई मन्दिरक बाहरी भाग एखनो अर्द्धनिर्मित अछि आऽ स्थानीय जनताक अपेक्षाक शिकार अछि तथापि छठिक अवसरपर पैघ भीड़ एहि ठाम लगैत अछि आऽ चारि दिवसीय एहि अनुष्ठानक अन्तिम दिन “पारण” केँ भगवान सूर्यक प्रतिमापर अर्घ्य चढ़ैबाक लेल होड़ लागल रहैत अछि।
बड़ीजानक सूर्य मन्दिर- किशनगंज जिलाक अररिया-बहादुरगंज रोडसँ दक्षिण बड़ीजानमे भगवान सूर्यक भव्य पुरान मन्दिर अछि। एहि मन्दिरक गर्भ गृहमे उत्तर पालकालीन छओ फीटक सूर्यदेवक प्रतिमा स्थापित अछि।
बड़गावक सूर्य मन्दिर- नालन्दा जिलाक प्राचीन नालन्दा विश्वविद्यालयक खंडहरसँ गोटेक दू किलोमीटर उत्तर-पश्चिममे स्थित बड़गाव नामक स्थानपर भगवान सूर्यक प्राचीन आऽ भव्य मन्दिर अछि। मन्दिरसँ सटल सूर्य तालाब सेहो अछि। मान्यता अछि जे एहि तालाबमे स्नान कएलासँ कुष्ट रोगक निवारण होइत अछि। बेशी संख्यामे लोक एहि ठाम छठि करैत छथि।
देव कुण्डक सूर्य मन्दिर- औरंगाबाद जिलाक पंचरुखिया मोड़सँ पाँच किलोमीटर उत्तर हंसपुरा नामक गामसँ तीन किलोमीटर पूरबमे स्थित अछि देवकुण्डक सूर्य मन्दिर। एहि मन्दिरक दरबाजा पूर्व दिस अछि। चैत आऽ कातिक दुनू मासक छठिमे एहि ठाम भव्य मेला लगैत अछि।
पंडारक सूर्य मन्दिर- पटना जिलाक बाढ़ अनुमंडलसँ गोटेक दस किलोमीटर दूर पंडारक गामक पश्चिम भागमे गंगा नदीक कातमे सूर्य देवक मन्दिर स्थित अछि। एहि मन्दिरक निर्माण द्वापर युगमे श्री कृष्णक अष्ट महिषिमे सँ एक सभसँ सुन्दरी जावन्तीक पुत्र साम्बा करौने छलाह। मन्दिरक गर्भगृहमे कारी पाथरपर पुरान शैलीमे सूर्य देवक सम्मोहक आऽ दुर्लभ प्रतिमा अछि। देशक बारह टा प्रमुख सूर्य मन्दिरमे सँ ईहो एकटा सूर्य मन्दिर अछि।
नूतन झा; गाम : बेल्हवार, मधुबनी, बिहार; जन्म तिथि : ५ दिसम्बर १९७६; शिक्षा - बी एस सी, कल्याण कॉलेज, भिलाई; एम एस सी, कॉर्पोरेटिव कॉलेज, जमशेदपुर; फैशन डिजाइनिंग, एन.आइ.एफ.डी., जमशेदपुर।“मैथिली भाषा आ' मैथिल संस्कृतिक प्रति आस्था आ' आदर हम्मर मोनमे बच्चेसॅं बसल अछि। इंटरनेट पर तिरहुताक्षर लिपिक उपयोग देखि हम मैथिल संस्कृतिक उज्ज्वल भविष्यक हेतु अति आशान्वित छी।”
मिथिलांचलक भ्रातृद्वितीया
भ्रातृद्वितीया हिन्दु समाज मे प्रचलित पाबनि अछि । मिथिलांचल मे सेहो अकर विशिष्ट महत्व अछि । कार्तिक मास मे शुक्ल पक्ष के द्वितीया तिथि क ई पाबनि मनाओल जाइत अछि । ई दिन भाय - बहिनक अटूट प्रेम के समर्पित होइत अछि । अहि पाबनि सऽ जुड़ल एक पौराणिक कथा अछि जाहि अनुसारे जमुना अप्पन भाय यम के अहि दिन नोतने रहैथ । बहिन सब अप्पन भाय के पूजा करैत छथि । बहिन अपन घरक ऑंगन नीप कऽपीठार सऽ षष्ठदलक अड़िपन बनाबैत छैथ । भाय के आसन अथवा पीढ़ी पर बैसाबैत छैथ । अड़िपन पर एक गोट बाटी राखै छैथ ।लोटा मे अछिंजल लैत छैथ । पूजा के लेल छह गोट कुम्हरक फूल, पिठार, सिन्दूर, छह गोट डॉंट सहित पानक पात, छह गोट सुपाड़ी, दुनु प्रकारक इलायची आर हरीर आवश्यक होइत अछि । कुम्हरक फूल नहिं भेटला पर गेंदाक फूल सऽ काज लेल जाईत अछि ।
बहिन अपन भाय के आसन पर बैसाकऽ पिठार आ सिन्दूर सऽ तिलक करैत छैथ । तकर बाद भाय दुनु कर पसारिकऽ बाटिक ऊपरि राखैत छैथ आ' बहिन भाय के हाथ मे पिठार सिन्दूर सहित पूजाक सब सामग्री राखैत छथि । पुन जलसॅं भायके हाथ धो दैत छैथ । जलसऽ हाथ धोईत काल बहिन निम्नलिखित फकरा गाबैत छथि
''यमुना नोतली यम के़ हम नोतै छी भाय के,
जते दिन यमुनाक धार रहै तते दिन भाय के अरूदा रहै"
तकर बाद बहिन अपन भाय के वैभवानुसार उपहार दैत छथि । मान्यता अछि जे ई पूजा करै वाली स्त्री वैधव्य एवम् अन्य क्लेश सऽ दूर रहैत छथि ।बचपन मे जतऽ ई पाबनि बहिन सभ लेल उपहारक लालसा आ' भाई सभ लेल पूजा कराबऽ के खुशी दैत अछि ओतई पैघ भेलापर ई पाबनि भाय बहिन के भेंट करबाक अवसर बनि जाईत अछि ।