विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका · VIDEHA · ISSN 2229-547X

स्व. राजकमल चौधरी पर शोध लेख (चारिम खेप)

डॉ. देवशंकर नवीन · 2008-11-15 · अंक 22

राजकमल चौधरी का रचनाकर्म (आलोचना), जमाना बदल गया, सोना बाबू का यार, पहचान (हिन्दी कहानी), अभिधा (हिन्दी कविता-संग्रह), हाथी चलए बजार (कथा-संग्रह)।
सम्पादन: प्रतिनिधि कहानियाँ: राजकमल चौधरी, अग्निस्नान एवं अन्य उपन्यास (राजकमल चौधरी), पत्थर के नीचे दबे हुए हाथ (राजकमल की कहानियाँ), विचित्रा (राजकमल चौधरी की अप्रकाशित कविताएँ), साँझक गाछ (राजकमल चौधरी की मैथिली कहानियाँ), राजकमल चौधरी की चुनी हुई कहानियाँ, बन्द कमरे में कब्रगाह (राजकमल की कहानियाँ), शवयात्रा के बाद देहशुद्धि, ऑडिट रिपोर्ट (राजकमल चौधरी की कविताएँ), बर्फ और सफेद कब्र पर एक फूल, उत्तर आधुनिकता कुछ विचार, सद्भाव मिशन (पत्रिका)क किछि अंकक सम्पादन, उदाहरण (मैथिली कथा संग्रह संपादन)।
सम्प्रति नेशनल बुक ट्रस्टमे सम्पादक।
बटुआमे बिहाड़ि आ बिर्ड़ो
(राजकमल चौधरीक उपन्यास) (आगाँ)
सोनामामी संग देवकान्तक वार्तालाप, मानवीय मनोवेग, प्रेमपाशमे बान्हल दू व्यक्ति, आ सामाजिक मर्यादा, पारम्परिक सम्बन्धक खुट्टीमे जकड़ल मानवक मोनक उद्वेगकें रेखांकित करैत अछि। व्यवस्था आ मर्यादाक बन्धन आ मनोवेगक स्वच्छन्द-कामनामे कतहु एक आरि-खेत नहि होइत अछि। एहि दृश्यकें ÷आदिकथा'क घटना-सूत्रा रेखांकित करैत अछि।
सुशीलाक एहेन चरित्राांकन मिथिलाक अयथार्थ आदर्श आ अव्यावहारिक मर्यादाकें नाँगट केलक अछि, एहिसँ रूढ़ि-पोषक लोकनि व्यथित जते भेल होथि, मुदा मैथिलीमे नव-चिन्तन पद्धतिसँ उपन्यास-कथा लिखबाक परम्पराक नव सूत्रापात भेल आ नव पीढ़ीक, नव दृष्टिक उद्योगसँ मिथिलाक ई बर्बरता समाप्त भेल--से प्रसन्नताक बात थिक।
राजकमल चौधरीक दोसर उपन्यास थिक -- आन्दोलन। एहिमे नाटकीय शैली पर विशेष जोर अछि। मुदा उपन्यास इहो मनोविश्लेषणात्मके अछि। नाटकीय शैलीक गद्यमे मनोविश्लेषणक सुविधा ताकब आसान नहि होइत अछि, मुदा राजकमल चौधरीक कथा-कौशलकें ई सब सुविधा तकबामे कोनो तरद्दुत्त नहि होइ छनि। सुगठित शिल्पमे सामाजिक यथार्थक मौलिक चित्रा अंकित करब हिनकर रचनाक मूल स्वभाव थिक। व्यतीत आ वर्त्तमानक घटना-चक्रक आश्रयसँ सम्भाव्य दिश इशारा एहेन कौशलसँ करै छथि जे ओ रचना एकदम सहज आ नागरिक जीवनक दैनिक व्यवस्था जकाँ लगैत अछि।
कथानक एकटा बेरोजगार युवक ÷कमल'क कलकत्ता महानगरमे रोजगार प्राप्ति हेतु प्रवेश आ कलकत्ता प्रवासक क्रममे उपस्थित विभिन्न दृश्यावलोकनक क्रमबद्ध नियोजन पर आधारित अछि। मूल कथा भाषा-प्रेमसँ ओत-प्रोत मैथिली आन्दोलनक विविध चरणकें रूपायित करैत अछि। विवरण-विस्तारमे एहि आन्दोलनक नग्न स्वरूप सोझाँ अबैत अछि। मैथिल जातिक मत-भिन्नता, ईर्ष्या-द्वेष, धोखाधरी इत्यादि अपूर्व कलात्मकतासँ चित्रिात भेल अछि। कथा-सूत्राक विस्तारमे पात्राक अवतारणा आ उपकथाक समावेश परम विश्वसनीय आ सहज यथार्थक संग भेल अछि। उपन्यासकारक कहब छनि जे आजुक मनुक्खमे तीन प्रवृत्ति मुख्यतः देखल जाइ'ए-- क्षुधा, आत्मरक्षा आ यौनपिपासा। एहन तीन प्रवृत्तिक चित्राांकन लेखकक प्रधान प्रयत्न रहल अछि। -- वस्तुतः एहि उपन्यासमे ई तीनू प्रवृत्ति बेस फरिच्छ भेल अछि। उपन्यासक पात्राकें जाहि जीवन्त रूपें रचनाकार एतए ठाढ़ कएने छथि, ताहिमे मैथिल चरित्रा आ मिथिलाक परिदृश्य पूर्ण विवरणक संग उपस्थित भ' जाइत अछि। राजकमल चौधरीक सृजन-कर्मक ई खास विशेषता थिक जे हुनका ओतए व्यक्ति आ व्यक्तित्व बड़े महत्त्वपूर्ण भ' उठैत अछि। व्यक्तिक जीवन-लीला, रहन-सहन, सोच-विचार, आहार-व्यवहारकें अंकित करैत ओ सम्पूर्ण परिदृश्य गढ़ि दै छथि। तें राजकमल चौधरी द्वारा सृजित चरित्राक मानसिक उद्वेग आ भौतिक करतब पर विवेकपूर्ण दृष्टि राखि ली, तँ हुनकर सम्पूर्ण रचनाक समालोचना भ' जाएत। हिनकर सकल पात्राक आचरण आ मनोवेग, ओकर आर्थिक, राजनीतिक, सामाजिक, शैक्षिक, मानसिक हैसियतक परिचायक होइत अछि। कोन परिस्थितिक कोन मनोवेगमे मनुष्य कोन आचरण करै'ए--से पूरापूरी एतए व्यक्त होइत अछि। एहि तरहें चारित्रिाक विश्लेषण करैत उपन्यासक मर्मकें बेसी नीक जकाँ बूझल जा सकैत अछि।
राजकमल चौधरीक सगरो रचना-विधानमे पात्राक सृजन आ चरित्राांकन स्पष्ट आ विलक्षण अछि, मनोविश्लेषण आधारित क्रिया-कलाप आ आहार-व्यवहार तार्किक आ समीचीन अछि। समस्त पात्राक जीवन-प्रक्रिया आ रहन-सहनमे मनोविश्लेषणक सुविधा छिड़िआएल रहैत अछि, जकर आधार पर ओकर अर्जित जीवन-दृष्टिक सूक्ष्म अध्ययन कएल जा सकैत अछि। कोनो व्यक्तिक चिन्तन-व्यवस्था कोन विवशता आ व्यवस्थामे निर्मित भेल; कोन क्रिया-कलाप ओ कोन परिस्थितिमे पूर्ण केलक-- से जानि सकबाक सुविधा मनोवैज्ञानिके धरातल पर स्पष्ट होइत अछि। चरित्राांकनक इएह उत्कर्ष आ इएह कौशल एहि उपन्यासक प्रभावकें वैराट्य दैत अछि। भाषा, विषय, विवरण, शिल्प...सब किछु मानवीय, सहज, सामाजिक, जीवन्त, प्रामाणिक आ विश्वसनीय!
आन्दोलन उपन्यासक नायक ÷कमल' मिथिलाक सुशिक्षित, परम विवेकशील आ प्रतिभावान युवक छथि। आत्म-स्थापनक उद्देश्यें कलकत्ताक महानगरीय परिवेशमे बौआ रहल छथि। नीलू सन अल्प वयस किशोरी अथवा नवयुवतीक उन्मादित समर्पण अथवा अल्हड़ आमन्त्राण नकारि देलनि; मुदा वासनाक राक्षससँ मुक्ति पाब' लेल अन्हार आ बदनाम गली धरि चल गेलाह।
आदर्श आ सद्पात्राताक प्रतिमूर्ति भुवनजी मातृभाषा आ मातृभूमिक प्रसार-प्रगतिमे तल्लीन छथि, मुदा कोनो खास कारणें हुनकहुमे विचलन आबि गेल छनि। निर्मला सन अत्याधुनिक सुकामा, सुवर्णा स्त्राी भुवनोजीकें हिला दै छनि। भुवनजीक पत्नी निरक्षरा आ कुरूपा छनि। निर्मला जी सन सुकामा स्त्राीक यौवन, रूप लावण्य, आधुनिक चटक-मटक पर हुनकर लहालोट हैब स्वाभाविक आ यथार्थ थिक।
मानव सभ्यताक इतिहासक कहै'ए जे मनुष्य अपन विराट छवि ठाढ़ कर'मे तल्लीन रहै'ए, विराट भ' जाइ'ए, मुदा मानवीय कमजोरी ओकरा संग रहै छै। अइ उपन्यासमे उपन्यासकार भुवनजीक छवि अति विशिष्ट आ निविष्ट रूपमे ठाढ़ कएने छथि। मुदा जँ सएह टा रहितए, तँ भुवनजी कोनो दन्तकथाक नायक बनि जैतथि। समस्त वैशिष्ट्यक अछैत मानवोचित दुर्बलता रेखांकित क' कए उपन्यासकार वस्तुतः भुवनजी आ कमलजी--दुनूकें यथार्थसँ जोड़लनि अछि।
सुशीला बहुगामिनी स्त्राी छथि, नित्य प्रति नव-नव पुरुखक बाँहिमे झूलए चाहै छथि। दोसर स्त्राी छथि सुशीला, ओहो अनेक पुरुखक संगें समागम करै छथि। मुदा तें, दुनू स्त्राी समान नहि छथि। पर-पुरुख समागम सुशीलाक विवशता छनि, अर्थोपार्जनक आधार छनि, जीवन-यापनक ठहार छनि, माइ-बाप संग अपन भरण-पोषण हेतु अन्न-वस्त्रा चाही। देहे टा पूँजी छनि, तकरहि भेजबै छथि, कूटि-पीसि गुजर करै छथि। मुदा निर्मलाक विवशता अर्थाभाव नहि छनि। ओ कामातुरा छथि। यौन-पिपासासँ व्याकुल रहै छथि। कोनो सम्पूर्ण पुरुखक सम्पूर्ण भोग लेल तत्पर रहै छथि। ... एकटा देह बेचै छथि, एकटा देह बिलहै छथि। एकटा आत्मबुभुक्षाक तृप्तिमे कोनो नैतिक-अनैतिक काज लेल तत्पर छथि, दोसर यौनपिपासा शान्त करबा लेल उताहुल।
आन्दोलन उपन्यासक केन्द्र-बिन्दु थिक आत्मबुभुक्षा, यौनपिपासा, आत्मसुरक्षा। सत्य थिक, आ राजकमल चौधरीक मान्यता छनि, जे मानव जीवनक
आदिम आवश्यकता इएह तीन होइत अछि। ओना मनुष्य की, प्राणी मात्राक आदिम प्रवृत्ति इएह तीन टा होइत अछि। शेष सभ प्रवृत्ति--ईर्ष्या, द्वेष, राग-विराग, लोभ-लालच, पक्ष-विपक्ष, झंझट-फसाद, खून-खुनामय... सब किछु लोक एतए आबि कए, जीवन जीबाक क्रममे विकसित करै'ए; उल्लिखित तीनू प्रवृत्ति मनुष्य जन्महिसँ संग नेने अबैत अछि। अही तीनू प्रवृत्तिक निपटानमे किओ अपन छवि कुतुबमीनार सन ऊँच क' लैत अछि, किओ अपन कुतुबमीनार सन छविकें सड़ल पानिक नाली बना लैत अछि। आन्दोलन उपन्यासकें अइ आलोकमे देखब समीचीन थिक।
उपन्यास उत्तम पुरुषमे लिखल गेल अछि। कथानायक कमलजी जीवन-संग्राममे जुटल छथि, आत्म-स्थापनमे लागल छथि; भाषाई आन्दोलनमे अपनाकें बलिदानी घोषित केनिहार मैथिल लोकनिक समस्त र्छंिकें प्राथमिक आ मौलिक अनुभव जकाँ देखि-भोगि रहल छथि। मैथिल जातिक र्छंि-पाखण्ड, राग-द्वेष, वासना आ नपुंसकताकें, आ एहि वृत्तिकें छपा रखबाक मनुष्यक कौशलकें निकेनाँ चीन्हि रहल छथि; इएह कथानायक अइ उपन्यासक कथावाचक छथि। कलकत्ता महानगरमे जीवन-यापन करैत विभिन्न आय-वित्त आ बुद्धि-वित्तक प्रवासी मैथिलक क्रिया-कलापसँ परिचित छथि। निर्मलाजी आ सुशीलाजी जाहि वर्गक मैथिल स्त्राीक प्रतिनिधि छथि, ताहि दुनू वर्गकें निकटसँ देखने छथि। कमलजीक नजरिमे निर्मलाजी छथि क्लयोपैट्रा, रूपोद्धता, प्रति निशि नव प्रेमीकें साँपसँ कटबा क' मरबा दै वाली विकटकामा। सुशीला छथि निश्छल, निस्पन्द, क्रिया-शून्य, सभ किछु हेरएने बिसरएने रस्ता पर ठाढ़ि, जे केओ पुरुख आबए आ किछु टाका द' जाए! सुशीला छथि ओ नारी, जे नुका-चोरा क' नहि, धोखा-धड़ीसँ नहि, एकदम सफा-सफी अपन अस्तित्वकें बेचि रहल छथि!
श्यामा नयनाभिरामा कुसुम-सुषमा-रंजिता सौख्यधामा नहि, देह पर मैल, फाटल साड़ी, ओछान पर पुरान, मँहकैत चद्दरि, आँखिमे निर्लज्जता, भाव-शून्य, निष्काम, पाथर बनि गेल पुतली। छिः छिः, सुशीला आ निर्मलाजीमे कोनो तुलना भ' सकैछ (आन्दोलन/पृ०. ३९)!
राजकमल चौधरीक रचना संसार पर बहुतो गोटए बहुत तरहक बात कहलनि अछि। हिनकर औपन्यासिक-कौशल पर कतोक गोटएकें एकसूत्राताक अभाव देखेलनि।... समग्रतामे देखी तँ भारतीय नागरिक, अथवा मैथिल नागरिकक सम्पूर्ण जीवन परिदृश्य हिनका नजरिमे कौड़ी जकाँ जगजिआर अछि। सामाजिक जीवन व्यतीत करबा लेल संस्थापित समाज-व्यवस्था, भारतीय लोकतन्त्रा, मानवीय जीवन-पद्धति, जीवन-यापनक बुनियादी सीमा-शर्त, जिजीविषाक अपरिहार्य वृत्ति, मानवीय मनोवेग, मनुष्यक अभिलाषा, अस्तित्वक अविचल यथार्थ... सब बिन्दु, पर विरोधाभास आ विडम्बनाक जुलूस देखाइत अछि। राजकमल चौधरी अही जुलूसमे देखलनि जे सिद्धान्त आ व्यवहार, वचन आ आचरण, जीवन आ लेखनमे कोनो तरहक पारस्परिक सम्बन्ध-बन्ध, स्थापित नहि अछि। लोकतान्त्रिाक व्यवस्थामे मानवीय सम्वेदनाक रक्षा हेतु जे आचार संहिता घोषित भेल अछि; अथवा मिथिलाक नैतिक शिक्षामे जे पाठ पढ़ाओल गेल अछि; तकर अनुपालन अइ भाग्य विधाता वर्गक कोनहु टा आचरणमे नहि भ' रहल अछि; आ व्यावहारिक स्तर पर जे भ' रहल अछि, से मानवीय जीवन पद्धति लेल कोनो अर्थें उपयोगी नहि अछि। एहि विचित्रा विडम्बनाकें राजकमल चौधरी उठबैत रहलाह आ जस के तस रखैत गेलाह; अही कारणें हिनकर उपन्यास विडम्बनासँ भरल, परस्पर विरोधाभासी आचरणसँ भरल समाज-व्यवस्थाक चित्रा-खण्डक कोलाज लगैत अछि। पारम्परिक पद्धतिसँ शिक्षित-दीक्षित समीक्षक लोकनिकें जें कि राजकमल चौधरीक उपन्यास अथवा कथामे कथासार अथवा कथानक नहि भेटै छनि, तें हुनका लगै छनि, जे एहि रचनामे एकसूत्राताक अभाव अछि। एहेन समीक्षक लोकनिकें प्रौढ़ शिक्षा निदेशालय द्वारा नवसाक्षर लेल प्रकाशित कहानीक पोथी पढ़बाक चाही, जाहिमे समस्या, समस्याक कारण आ समस्याक समाधान खोंसैत कहानी लिखल जाइत अछि आ अन्तमे पूछल जाइत अछि--त' अहाँकें एहि कहानीसँ की शिक्षा भेटल?
सत्य थिक जे वस्त्राक भीतर हरेक मनुष्य नाँगट होइत अछि। वस्त्रा पहिरैत अछि परदा लेल। ओना तँ सबहक सब बात लोककें बुझले रहै छै। हरेक सन्तानकें बूझल रहै जे हम अइ दुनियाँमे कोना एलहुँ आ हरेक माइ-बापकें बूझल रहै छै जे ओ अपन सन्तानक विवाह किऐ करौलनि अछि। मुदा एकटा मर्यादाक खुट्टी छै, जाहिमे सामाजिक पशु बान्हल रहैत अछि। स्वातन्त्रयोत्तर कालमे, आ एम्हर आबि कए त' आओर बेसी, ई बात लागू भ' गेल अछि। मनुष्यक भौतिक नग्नता पर नहि, मानसिक आ वैचारिक नग्नता पर। सब व्यक्तिक स'ब बात स'ब कियो जनैत अछि, मुदा स'ब व्यक्ति अपन ओहि समस्त आचरण पर, वृत्ति पर परदा देबा लेल कोनो ने कोनो नैतिक बातक परदा देब' चाहै छथि। कहि नहि, मनुष्य स्वयंकें ठकबा लेल एते बेसी बिर्त्त किऐ रहै छथि! दुनियाँक लोक तँ सबटा बात बुझिते रहै छै।
(अगिला अंकमे)

Suggested citation: डॉ. देवशंकर नवीन. “स्व. राजकमल चौधरी पर शोध लेख (चारिम खेप).” Videha — First Maithili Fortnightly eJournal, issue 22, 2008-11-15. https://www.videha.co.in/research/2008/22/स्व-राजकमल-चौधरी-पर-शोध-लेख-चारिम-खेप.htm

मूल विदेह अंक / Original issue