मिथिलांचलक सूर्य पूजन स्थल
डॉ प्रफुल्ल कुमार सिंह ‘मौन’ (१९३८- )- ग्राम+पोस्ट- हसनपुर, जिला-समस्तीपुर। पिता स्व. वीरेन्द्र नारायण सिँह, माता स्व. रामकली देवी। जन्मतिथि- २० जनवरी १९३८. एम.ए., डिप.एड., विद्या-वारिधि(डि.लिट)। सेवाक्रम: नेपाल आऽ भारतमे प्राध्यापन। १.म.मो.कॉलेज, विराटनगर, नेपाल, १९६३-७३ ई.। २. प्रधानाचार्य, रा.प्र. सिंह कॉलेज, महनार (वैशाली), १९७३-९१ ई.। ३. महाविद्यालय निरीक्षक, बी.आर. अम्बेडकर बिहार विश्वविद्यालय, मुजफ्फरपुर, १९९१-९८.
मैथिलीक अतिरिक्त नेपाली अंग्रेजी आऽ हिन्दीक ज्ञाता।
मैथिलीमे १.नेपालक मैथिली साहित्यक इतिहास(विराटनगर,१९७२ई.), २.ब्रह्मग्राम(रिपोर्ताज दरभंगा १९७२ ई.), ३.’मैथिली’ त्रैमासिकक सम्पादन (विराटनगर,नेपाल १९७०-७३ई.), ४.मैथिलीक नेनागीत (पटना, १९८८ ई.), ५.नेपालक आधुनिक मैथिली साहित्य (पटना, १९९८ ई.), ६. प्रेमचन्द चयनित कथा, भाग- १ आऽ २ (अनुवाद), ७. वाल्मीकिक देशमे (महनार, २००५ ई.)।
प्रकाशनाधीन: “विदापत” (लोकधर्मी नाट्य) एवं “मिथिलाक लोकसंस्कृति”।
भूमिका लेखन: १. नेपालक शिलोत्कीर्ण मैथिली गीत (डॉ रामदेव झा), २.धर्मराज युधिष्ठिर (महाकाव्य प्रो. लक्ष्मण शास्त्री), ३.अनंग कुसुमा (महाकाव्य डॉ मणिपद्म), ४.जट-जटिन/ सामा-चकेबा/ अनिल पतंग), ५.जट-जटिन (रामभरोस कापड़ि भ्रमर)।
अकादमिक अवदान: परामर्शी, साहित्य अकादमी, दिल्ली। कार्यकारिणी सदस्य, भारतीय नृत्य कला मन्दिर, पटना। सदस्य, भारतीय भाषा संस्थान, मैसूर। भारतीय ज्ञानपीठ, दिल्ली। कार्यकारिणी सदस्य, जनकपुर ललित कला प्रतिष्ठान, जनकपुरधाम, नेपाल।
सम्मान: मौन जीकेँ साहित्य अकादमी अनुवाद पुरस्कार, २००४ ई., मिथिला विभूति सम्मान, दरभंगा, रेणु सम्मान, विराटनगर, नेपाल, मैथिली इतिहास सम्मान, वीरगंज, नेपाल, लोक-संस्कृति सम्मान, जनकपुरधाम,नेपाल, सलहेस शिखर सम्मान, सिरहा नेपाल, पूर्वोत्तर मैथिल सम्मान, गौहाटी, सरहपाद शिखर सम्मान, रानी, बेगूसराय आऽ चेतना समिति, पटनाक सम्मान भेटल छन्हि।
राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठीमे सहभागिता- इम्फाल (मणिपुर), गोहाटी (असम), कोलकाता (प. बंगाल), भोपाल (मध्यप्रदेश), आगरा (उ.प्र.), भागलपुर, हजारीबाग, (झारखण्ड), सहरसा, मधुबनी, दरभंगा, मुजफ्फरपुर, वैशाली, पटना, काठमाण्डू (नेपाल), जनकपुर (नेपाल)।
मीडिया: भारत एवं नेपालक प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिका सभमे सहस्राधिक रचना प्रकाशित। आकाशवाणी एवं दूरदर्शनसँ प्रायः साठ-सत्तर वार्तादि प्रसारित।
अप्रकाशित कृति सभ: १. मिथिलाक लोकसंस्कृति, २. बिहरैत बनजारा मन (रिपोर्ताज), ३.मैथिलीक गाथा-नायक, ४.कथा-लघु-कथा, ५.शोध-बोध (अनुसन्धान परक आलेख)।
व्यक्तित्व-कृतित्व मूल्यांकन: प्रो. प्रफुल्ल कुमार सिंह मौन: साधना और साहित्य, सम्पादक डॉ.रामप्रवेश सिंह, डॉ. शेखर शंकर (मुजफ्फरपुर, १९९८ई.)।
चर्चित हिन्दी पुस्तक सभ: थारू लोकगीत (१९६८ ई.), सुनसरी (रिपोर्ताज, १९७७), बिहार के बौद्ध संदर्भ (१९९२), हमारे लोक देवी-देवता (१९९९ ई.), बिहार की जैन संस्कृति (२००४ ई.), मेरे रेडियो नाटक (१९९१ ई.), सम्पादित- बुद्ध, विदेह और मिथिला (१९८५), बुद्ध और विहार (१९८४ ई.), बुद्ध और अम्बपाली (१९८७ ई.), राजा सलहेस: साहित्य और संस्कृति (२००२ ई.), मिथिला की लोक संस्कृति (२००६ ई.)।
वर्तमानमे मौनजी अपन गाममे साहित्य शोध आऽ रचनामे लीन छथि।
मिथिलांचलक सूर्य पूजन स्थल
भारतीय सनातन समाजमे प्रत्येक आनुष्ठानिक सत्कर्मक आरम्भ पंचदेवताक पूजनसँ होइछ। ओ पंचदेव छथि- दुर्गा (शक्ति), शिव, विष्णु, सूर्य एवं गणेश। पंचदेवताभ्यो नमः। परब्रह्म परमात्माक प्रत्यक्ष पूजोपासना सूर्यसँ होइछ। श्रुति, स्मृति, पुराणादि सम्मत सूर्यसँ जीव सभ उत्पन्न होइछ। हिनकेसँ यज्ञ, मेघ, अन्न ओ आत्मा अछि। अतः हे आदित्य, अहाँकेँ नमस्कार! आदित्ये प्रत्यक्ष ब्रह्म छथि, साक्षात् विष्णु छथि, प्रत्यक्ष रुद्र छथि। हिनकेसँ भूमि, जल, ज्योति, आकाश, दिक्, देवगण एवं वेद उत्पन्न होइछ। अतः आदित्य ब्रह्म छथि (वृहदारण्यकोपनिषत् ३.७९)। “आदित्य हृदय” (श्लोक ३६, ४४-५३) मे सूर्यकेँ सर्वयज्ञ स्वरूप, ऋक्, यजु एवं सामवेद, चन्द्र-सूर्य-अग्नि नेत्रधारी, ओ सर्वतंत्रमय कहल गेल अछि।
“आदित्य हृदय” (श्लोक ५९-६१) मे द्वादश आदित्यक उल्लेख भेल अछि- विष्णु, शिव, ब्रह्मा, प्रजापति, महेन्द्र, काल, यम, वरुण, वायु, अग्नि, कुबेर एवं तत्वादिक स्रष्टा ओ स्वतः सिद्ध अधीश्वर। उदयकालमे ओ ब्रह्मा, मध्याह्नमे महेश एवं अस्तवेलामे विष्णु स्वरूप सूर्य त्रिमूर्ति छथि। जेना शिवस्वरूप त्रिमूर्तिमे सदाशिवक संगे सौम्य ओ रौद्र रूप (भैरव) उत्कीर्ण होइत छथि। शिवलिंग ओ विष्णुलिंग जकाँ सूर्यक पूजोपासना ब्रह्म लिंगक रूपमे कयल जाइछ। सूर्यकेँ गगनलिंग सेहो कहल जाइत छनि। सूर्यमण्डलमे गायत्रीक ध्यानक विधान अछि।
विष्णु सेहो एकटा आदित्य छथि- भगवत आदितश्च। सूर्यक लाक्षण (चक्र) विष्णुक सुदर्शन चक्र बनि गेल। प्राचीन सिक्का (वृष्णि ओ गणराज्यक) पर अंकित चक्रक अभिप्राय सूर्यसँ अछि। प्रायः देवी-देवताक प्राथमिक लक्षण प्रतीक रूपेँ अभिव्यंजित भेल। कालान्तरमे बोधगम्यताक दृष्टिसँ हुनक स्वरूपक विधान कयल गेल। तदनुसार सूर्य सप्ताश्वक रथपर ठाढ़ छथि। आगाँमे सारथि अरुण बैसल छथि। माथपर उन्नत किरीट (मुकुट) शोभित छनि। दुनू हाथमे कमल पुष्प अछि। डाँरमे तरुआरि लटकल छनि। पार्श्वदेवीक रूपमे उषा ओ प्रत्युषा उत्कीर्ण छथि। सूर्यक देह जिरह बख्तरसँ अलंकृत अछि। कोनो कोनो मूर्तिमे पार्श्वदेवताक रूपमे कलम लेने पिंगल ओ दण्ड लेने दण्डी सेहो ठाढ़ छथि। सूर्य पैरमे नमहर बूट पहिरने छथि। ई सभ शक-ईरानी लक्षण मानल जाइछ। भारतीय सूर्य मूर्ति विज्ञानपर कुषाण कालमे इरानी प्रभाव बढ़ि गेल छल। बोधगयाक पाथरक बेष्टन वेदिका (रेलिंग) पर एवं कुम्हरार (पटना) क माँटिक पट्टी (मृण्फलक) पर सूर्यक सबसँ प्राचीन प्रतिमांकन भेल अछि। बोधगया रेलिंगपर उत्कीर्ण सूर्य चारो दिशा सभक सूचक चारिटा अश्वक रथपर आरुढ़ छथि। सूर्यक दुनूकालमे उषा ओ प्रत्युषा हाथमे धनुष-वाण लेने अंधकारक बेधन करैत छथि। आलोच्य सूर्यक प्राचीनतम मूर्ति “अंधकार पर सूर्यक विजय” सूचक अछि। सूर्यक पाछाँ वृत्ताकार आभामंडल बनल अछि। एहिसँ संकेत प्राप्त होइछ जे सूर्यक पूजा शकस्थानसँ भारतमे आयल।
मुदा बोधगया रेलिंगपर उत्कीर्ण उदीच्य वेषधारी सूर्य मूर्ति विदेशी परम्परासँ भिन्न ओ प्राचीन (शुंगकालीन) अछि। इरानी प्रभावसँ पहिने एहि ठाम सूर्य मूर्तिक भारतीय अवधारणा सुनिश्चित छल (भारतीय कला को बिहार की देन, बी.पी.सिन्हा, पटना, १९५८, पृ.८१-८३)। कुम्हरार (पटना) क सूर्य (मूर्ति) चारिटा घोड़ाक रथपर आरुढ़ छथि। माटिक गोल पट्टीपर बनल एहि सूर्यकेँ भारतीय सूर्य मूर्ति परम्परामे सर्वप्राचीन मानल जाऽ सकैछ। शाहाबाद एवं मुंगेरसँ प्राप्त सूर्य उदीच्य वेषधारी छथि। पार्श्वदेवता कलमधारी पिंगल त्रिभंग मुद्रामे ठाढ़ मनुष्यक सुकृत्य ओ कुकृत्यक लेखन कऽ रहल छथि एवं दहिन दिस विधर्मी सभकेँ दण्डित करबाक लेल हाथमे दण्ड लेने दण्डी तत्पर छथि। वाम भागमे सूर्यक पत्नी उषा ओ दहिनमे प्रत्युषा अंधकारक बेधन कऽ रहल छथि। शाहाबाद जिलासँ प्राप्त सूर्यमूर्ति संभवतः गुप्तकालीन कलाकृति थिक। गरामे एकावली (माला) शोभित छनि एवं कृपाण वाम भागमे लटकल छनि। दक्षिण बिहारमे सूर्य मन्दिर, सूर्यमूर्ति ओ सूर्योपासनाक केन्द्र उत्तर बिहारक अपेक्षा अधिक अछि।
सत्यार्थीक सर्वेक्षणक अनुसार सांस्कृतिक मिथिलांचलमे सूर्योपासनाक प्राचीन ऐतिहासिक केन्द्रक रूपमे विष्णु बरुआर (मधुबनी) क द्वादश आदित्यक रूपेँ पूजित पालकालीन सूर्यमूर्ति अछि। मूल सूर्यमूर्तिक प्रभावलीमे बारहटा आदित्यक स्वरूप उत्कीर्ण अछि। मिथिलांचलक अन्यान्य सूर्यमूर्ति जकाँ सूर्यक देहपर जिरह-बख्तरादि नहि छनि। ओ भारतीय भेषभूषा ओ आभूषणसँ विन्यस्त छथि। यद्यपि स्थलक नाम विष्णु बोधक अछि। एहि ठाम सूर्य विष्णु रूपेँ पूजित छथि।
सत्येन्द्र कुमार झाक अनुशीलन (मिथिला की पाल प्रतिमाएँ) क अनुसार मधुबनीक झंझारपुर-मधेपुर पट्टीक कोशी-बलानक पुरान प्रवाह क्षेत्रक सूर्य नाहर-भगवतीपुर ओ भीठ भगवानपुरक अतिरिक्त राजनगर, पस्टन एवं पटलामे प्राप्त अछि। एहि पट्टीसँ कनेक हटिकऽ एकटा सूर्यमूर्ति जगदीशपुर (मनीगाछी प्रखण्ड, दरभंगा)सँ सेहो उपलब्ध भेल अछि। एहि सूर्य पूजन पट्टीक सर्वाधिक आकर्षक ओ प्रभावशाली सूर्य मूर्ति (आकार ४८ इन्च गुणा २४ से.मी.) परसा (झंझारपुर, मधुबनी) क अछि। तेरहम सदीक बनल ई मूर्ति सूक्ष्म अलंकरणसँ भरल अछि। एहिसँ एकटा धारणा ई बनैत अछि जे सूर्य मूर्तिक पूजन एकटा सीमित क्षेत्र धरि छल। मुदा हिनक अवधारणाक खंडन देवपुरा (बेनीपट्टी प्रखण्ड, मधुबनी), रघेपुरा (असगाँव-धरमपुर), डिलाही, कोर्थ, देकुली, अरई, रतनपुर, छर्रापट्टी, कुर्सो-नदियामी, हाबीडीह (दरभंगा), भोज परौल, भीठ भगवानपुर, अकौर, अन्धराठाढ़ी, रखवारी, गाण्डीवेश्वर, झंझारपुर (मधुबनी) एवं वीरपुर, बरौनी, नौलागढ़ (बेगुसराय), सवास (मुजफ्फरपुर), कन्दाहा (सहरसा), बड़ीजान (किशनगंज) आदि ऐतिहासिक ओ धार्मिक स्थल सभसँ सूर्य मूर्तिक प्राप्तिसँ भऽ जाइछ। लौकिक स्तरपर सूर्योपासनाक परिदृश्य गाम-गाममे पसरल छठ पर्व सर्वाधिक लोकप्रियताक उदाहरण अछि।
अजय कुमार सिन्हा (बड़ीजान का पुरातात्विक महत्व, कोशी महोत्सव २००३ ई.) किशनगंज जिला मुख्यालयसँ प्रायः पचीस कि.मी.उत्तर-पश्चिम दिशामे अवस्थित बड़ीजान दुर्गापुरक विशाल सूर्यमूर्ति (५फीट ७ इन्च गुणा २ फीट ११ इन्च) क अपन शोधपत्रमे उल्लेख कयने छथि। बड़ी जान दुर्गापुर पुरातात्विक भग्नावशेषसँ भरल अछि, जाहिमे दसम शताब्दीक भव्य मन्दिरक स्थापत्य प्रमुख अछि- सूर्यक विशाल दू खण्डित पाथरक मूर्ति, मन्दिरक अलंकृत चौखट, बहुतरास शिवलिंग, पाथरक एकटा सोहावटी (लिन्टेल) मध्य गणेश एवं दोसरक केन्द्रमे उत्कीर्ण त्रिशूल। दुर्गापुर नामक संलग्नता आदिकेँ देखैत बड़ीजान पंचदेवोपासक क्षेत्र छल। बहुतरास मन्दिर सभ भग्नावशिष्ट अछि। मूर्ति विज्ञानक दृष्टिसँ एहि ठामक सूर्य मूर्तिकेँ अजय कुमार सिन्हा एगारहम सदीक कहने छथि। एहि क्षेत्रमे शैवमतक प्रधानता छल। मुदा सीमान्त क्षेत्रमे अवस्थित भेलाक कारणे एहिठाम सूर्य मन्दिरक होएब स्वाभाविक अछि।
कोशी क्षेत्रक (सुविदेह, अंगुत्तर आदिक रूपेँ ख्यात) दोसर सूर्य मन्दिरक साक्षात कन्दाहा (सहरसा) मे कयल जाऽ सकैछ। कन्दाहाक सूर्यमन्दिर सहरसा जिला मुख्यालयसँ चौदह कि.मी. पश्चिम वनगाँव-महिषी क्षेत्रमे अवस्थित अछि। वनगाँव, महिषी एवं कन्दाहाकेँ जँ त्रिभुज बनाओल जाय तँ ओऽ सभ स्थल समकोणपर अवस्थित अछि। हवलदार त्रिपाठी सहृदय (बिहार की नदियाँ)क मतेँ एहि ठामक बुद्धक समकालीन कोणियवाहक जटिल ब्राह्मण छल।
कन्दाहाक सूर्यमन्दिरक गर्भगृहमे स्थापित भगवान सूर्यक मूर्तिकेँ भवादित्य (द्वादश आदित्यक एकटा प्रकार) कहल गेल अछि। सूर्यक संग उषा एवं प्रत्युषा सेहो उत्कीर्ण छथि। मन्दिरक द्वार स्तंभ (चौखट) पर उत्कीर्ण शिलालेखक अनुसार (१४५३ ई.) वर्तमान सूर्यमन्दिरक निर्माता ओइनवार वंशीय हरसिंहदेवक पुत्र नरसिंहदेव छलाह। शिलालेखक प्रशस्तिमे नरसिंहदेवकेँ भूपतिलक, महादानी, धीरवीर आदि कहल गेल छनि। विद्यापतिक पदावलीक भणिता (सुभद्र झा द्वारा सम्पादित पदांक ४४-४५)सँ नरसिंहदेवक ऐतिहासिक अवस्थितिक सेहो पुष्टि होइछ। सूर्यमन्दिर लगक कूपजलक सेवनसँ चर्मरोग समाप्त भऽ जाइछ। सूर्योपासनासँ चर्मरोग, कुष्टादि रोगसँ मुक्तिक अनेक पौराणिक अनुश्रुति अछि। एहि तरहेँ कन्दाहाक सूर्य मन्दिर सूर्योपासनाक प्रसिद्ध केन्द्र बनल अछि।
नाहर भगवतीपुर (मधुबनी)क प्रसिद्धि जतेक महिषासुर मर्दिनी भगवतीक तेजस्विताक कारणे अछि ओतबे ख्याति पाथरक अनेक सूर्यमूर्ति (मध्यकालीन)क कारणे अछि। मूर्ति सभमे धनुष धारिणी पार्श्वदेवीक अपेक्षा पैघ पार्श्वदेवक रूपेँ पिंगल ओ दण्डी उत्कीर्ण अछि। सिरोभूषणक स्थान सिमरौनगढ़ (घोड़ासाहन, चम्पारणसँ उत्तर नेपालक तराइक सीमान्त क्षेत्र) क सूर्यमूर्ति जकाँ अलगसँ मुकुट लगयबाक स्थान खाली छोड़ल गेल अछि। नाहर भगवतीपुरक सूर्यमूर्ति कर्णाटकालीन थिक। सिमरौनगढ़सँ प्राप्त एवं काठमाण्डूक राष्ट्रिय संग्रहालयमे संरक्षित एकटा अभिलेखांकित कर्णाटकालीन सूर्यमूर्तिक सूचना तारानन्द मिश्र (प्राचीन नेपाल -२४- काठमाण्डौ, नेपाल) देने छथि।
एहि सभसँ किंचित भिन्न ओ विशिष्ट सूर्यमूर्ति सवास, गायघाट प्रखण्ड (मुजफ्फरपुर)सँ प्राप्त अछि। सूर्यमूर्ति पाँच फीट नमहर अछि, जे ओहिठामक एकटा मन्दिरमे स्थापित एवं लक्ष्मीनारायणक नामे पूजित छथि। सूर्यक प्रतिरूप विष्णुकेँ मानल गेल अछि। सूर्य सप्ताश्वक रथपर स्थानुक मुद्रामे ठाढ़ छथि। ठेहुनधारी अधोवस्त्र ओ वामकंधसँ आवक्ष बन्हैत उत्तरीय एवं वस्त्राभूषणसँ सूर्य आच्छादित छथि। कान्हपर यज्ञोपवीत एवं डाँरमे कटार छनि। कर्णाटवंशी राजा लोकनि सूर्यवंशी क्षत्रिय छलाह। अतः पंचदेवोपासक भूमि मिथिलाक अनेक कर्णाट शासित क्षेत्रसँ सूर्य मूर्तिक प्राप्ति स्वाभाविके मानल जायत। कर्णाटकालीन तिरहुतक राजधानी सिमरौनगढ़ (सिमरौनगढ़ को इतिहास, मोहन प्रसाद खनाल, काठमांडौ, नेपाल, २०५६ वि.), अन्धराठाढ़ीक कमलादित्य स्थान (मधुबनी), भीठ भगवानपुर (मधुबनी) मूर्तिया (नेपाल तराइ), कुर्सो नदियामी (दरभंगा), कोर्थ (दरभंगा) आदि ऐतिहासिक ओ धार्मिक स्थान सभसँ प्राप्त अछि। सिमरौनगढ़क सूर्य मूर्तिक निर्माण याज्ञिक श्रीपतिक लेल हरसिंहदेवक मंत्री गणेशक आदेशपर कयल गेल छल (प्राचीन नेपाल-२४)। कर्णाटवंशी राजालोकनि पंचदेवोपासक छलाह।
मिथिलांचलक बरौनी-बेगुसराय क्षेत्रमे सूर्योपासनाक ऐतिहासिक अवशेष सभ उपलभ्य अछि। वीरपुर-वरियारपुर ओ कैथसँ सूर्यक अलावा हुनक पुत्र रेवन्तक पाथरक प्राचीन मूर्ति प्राप्त भेल अछि। बरौनी ओ चकबेदौलियाक सूर्य मन्दिर दर्शनीय अछि। एहि भूभागक किछु सूर्यमूर्ति जी.डी.कॉलेज, बेगुसरायक संग्रहालयमे संरक्षित अछि। डॉ. सत्यनारायण ठाकुर ( मिथिला में मंदिरों का प्रादुर्भाव एवं स्वरूप, मिथिला की लोकसंस्कृति विशेषांक, दरभंगा, २००६ ई.) मिथिलांचलक अकौर, झंझारपुर, राजनगर ओ कंदर्पीघाटक सूर्य मन्दिर सभक उल्लेख कयने छथि। मुदा सत्येन्द्र कुमार झाक अनुसार नाहर भगवतीपुर सूर्योपासनाक पैघ केन्द्र छल जाहि ठाम चारिटा महत्वपूर्ण सूर्य मूर्ति उपलभ्य ओ पूजित अछि।
उपर्युक्त सर्वेक्षणात्मक अनुशीलनसँ स्पष्ट भऽ जाइछ जे सांस्कृतिक मिथिलांचलक पूर्वी छोड़ बड़ीजान दुर्गापुर (किशनगंज)सँ पश्चिममे अकौर (मधुबनी), उत्तरमे सिमरौनागढ़ (मिथिला नेपाल सीमान्त) एवं दक्षिणमे बरौनी-बेगुसराय धरि सूर्यमन्दिर ओ सूर्योपासनाक क्षेत्र विस्तृत छल। ओकरा राजकीय संरक्षण एवं लोकाश्रय प्राप्त छल। आर्य सूर्यप्रतिबद्ध लोक छलाह। मिथिलांचलक दक्षिणी सीमान्तक गंगातटवर्ती क्षेत्र (जढुआ, हाजीपुर, वैशाली)क सूर्योपासना यदुवंशी लोकनिक सुरजाहा सम्प्रदाय अवशिष्ट अछि। एहि जनपदक ज्योति एवं कारिख पंजियार सन लोकदेवता सूर्योपासक छलाह। हुनक स्वरूप वेदनिष्ठ ब्राह्मणक अछि। हुनक पैरमे खराम, अधोवस्त्रमे धोती, कान्हपर जनेउ, माथपर तिलक, हाथमे पोथी-पतरा एवं सोनाक चाभुक (किरणक प्रतीक) शोभित छनि-
पैर खरमुआ हो दिनानाथ, हाथ सटकुन।
देह जनेउआ हो दिनानाथ, तिलक लिलार॥– मैथिली प्रकाश, (शोध विशेषांक, मैथिली लोकसाहित्यक भूमिका, प्रो. मौन, कलकत्ता, जनवरी-फरवरी १९७६)।
मैथिली लोकसाहित्यक संदर्भमे सूर्य पूर्वदिशाक अधिपति छथि।
बिहारक धरतीपर सूर्यक प्राचीनतम स्वरूप कुम्हरार (पटना) सँ प्राप्य अछि जाहिमे सूर्य एकचक्रीय अश्वरथपर सवार (ई.पू. पहिल सदी) छथि। एकर विकास बोधगया रेलिंग (शुंगकालीन) पर उत्कीर्ण चारि घोड़ावाला रथपर आरुढ़ सूर्य मूर्तिमे भेल अछि, जाहिमे पार्श्वदेवी उषा ओ प्रत्युषा सेहो अभिशिल्पित छथि। कुषाणकालक सूर्य मूर्तिक विशिष्ट पहचान पैरमे इरानी बूट, देहमे जिरह-बख्तर ओ माथपर किरीट बनि गेल। एहिमे सूर्य सप्त अश्व रथी छथि। मुदा गुप्तकालमे सूर्यक स्वरूप क्रमशः भारतीय वस्त्राभूषणमे बदलैत गेल। मिथिलांचलक पाल, कर्णाट ओ ओइनवार कालीन शासनकालमे समानरूपेँ सूर्यमूर्ति ओ मन्दिरक निर्माण होइत रहल। सूर्य मूलतः अश्वारोही देव छथि, जनिक प्रभुत्वसूचक रथक चारिटा अश्व दिक् दिगन्त बोधक अछि त सप्ताश्व सप्तलोकक विस्तारकेँ प्रतिबिम्बित करैत अछि। एतबे नहि सप्ताश्व सप्तरंगी किरणक द्योतक सेहो बनि गेल अछि। सूर्य आर्य लोकनिक वैद्इक देवता छथि। अतः मिथिलांचलमे निर्मित सूर्यमूर्ति भारतीय परम्परा (वस्त्राभूषण) मे अछि। ओ वैष्णव धर्मी तिलक मण्डित छथि, अर्थात् आदित्य ब्रह्म ओ वेदज्ञ ब्राह्मणक प्रतीक बनि गेल छथि। हुनक हाथक कमल सृष्टि मूलक थिक। कमल फूल सूर्योदयक संग प्रस्फुटित होइत अछि एवं सूर्यास्तक संग सम्पुटित होइत अछि। दुनू हाथक कमल सूर्योदय एवं सूर्यास्तक प्रतीक अछि। मिथिलांचलमे नवोदित सूर्य ओ अस्ताचलगामी सूर्यदेवकेँ अर्घ्य देल जयबाक परम्परा अछि। एवं प्रकारें मध्यकालीन मिथिलामे सूर्य पूजन एकटा प्रबल धार्मिक प्रवृत्ति छल। कमल सभ देवी देवताक आसन बनल अछि।
भारतीय मूर्तिकला परम्परामे सूर्य अपन शक्तिद्वय उषा एवं प्रत्युषा, पार्श्वदेवता पिंगल एवं दण्डीक अतिरिक्त सूर्यपुत्र रेवंतक एकटा मूर्ति पचम्बा (बेगुसराय) एवं देवपुरा (मधुबनी) सँ प्राप्त भेल अछि। मिथिलांचलमे सूर्य मूर्तिक निर्माणक्रममे शास्त्रीयतासँ किंचित् भिन्न अभिनव प्रयोग सेहो देखना जाइछ, जकरा जनपदीय आस्थाक अभिव्यक्ति कहल जाऽ सकैछ। उदाहरणार्थ विष्णु बरुआरक द्वादश आदित्य (सूर्य)क मूर्तिक पाछाँ अग्नि शिखा सभक प्रत्यंकनकेँ देखल जाऽ सकैछ। सूर्य अग्निक प्रत्यक्ष प्रतिरूप छथि।
सूर्यक गणना नवग्रहमे होइत अछि। दिकपालमे ओ पूर्वक दिग्पति छथि। भारतीय मूर्तिकलामे नवग्रहक अवधारणा गुप्तकालीन परिवेशमे मूर्त भेल मुदा मिथिलांचलक धरतीपर हुनक पूजन परम्पराक पुरातात्विक अवशेष पाल ओ सेनकालमे विशेष देखना जाइछ। मध्यकालीन शिवमन्दिरमे प्रायः नवग्रहक मूर्ति अवशेष प्राप्त होइछ। वीरपुर (बेगुसराय) एवं चेचर (वैशाली)सँ नवग्रहक पालकालीन प्रस्तर पैनेल प्राप्त भेल अछि जाहिमे सूर्य प्रथम अनुक्रममे छथि। हुनक दुनू हाथमे कमल पुष्प शोभित छनि। मुदा लखीसरायक अष्टग्रह पैनेलमे सूर्य कमलासनपर प्रतिष्ठित छथि। बिहारशरीफ, नालन्दाक नवग्रह पैनेलमे सूर्य दण्ड ओ पिंगलक संगे उत्कीर्ण छथि। अंतीचक (विक्रमशिला, भागलपुर)क नवग्रह पैनल सबसँ पैघ (११८*६२ से.मी.) अछि। नवग्रह क्रम एवं प्रकारेँ निर्मित होइछ- सूर्य, चन्द्र, मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र, राहु एवं केतु। कोनो कोनो पैनेलक आरम्भ उलटाक्रम (केतु, राहु...)सँ होइछ। मिथिला लोकचित्रकलामे नवग्रहक प्रतीकांकन हरिशयन एकादशीक अरिपनमे देखना जाइछ। मांगलिक अनुष्ठानमे नवग्रहक पूजन आवश्यक मानल जाइछ।
शिवलिंगमे सूर्य: कन्दाहा (सहरसा)क चतुर्मुखी शिवलिंग सूर्य प्रमुख छथि एवं अन्यान्यमे ब्रह्मा, विष्णु ओ शिव छथि। तहिना रानीघाट (पटना)क दुधेश्वर मन्दिर (शिव) क पंचमुखी शिवलिंगमे ब्रह्मा, सरस्वती, सूर्य ओ गणेशक अलावा शीर्षपर नृत्यमूर्ति उत्कीर्ण (नवम-दसम सदी) अछि। अरेराज (प.चम्पारण)क सोमेश्वर शिव मन्दिरक प्रांगणमे स्थापित चतुर्मुखी शिवलिंगमे एकटा सूर्यक मुखाकृति उत्कीर्ण अछि। सर्वेक्षणात्मक अनुशीलनसँ ई स्पष्ट होइछ जे प्रत्येक शिवलिंगमे देवस्थानक मुख्य मूर्तिक अनुरूप एकटा देवता प्रमुख होइछ। उदाहरणार्थ कन्दाहाक शिवलिंगमे सूर्यक, भच्छीमे ब्रह्माक (त्रिमूर्ति)क इत्यादि।
एहि तरहेँ कन्दाहा (सहरसा), बड़ी जान दुर्गापुर (किशनगंज), बरौनी (बेगुसराय), झंझारपुर, कंदर्पीघाट, अकौर, चकबेदौलिया, परसा, अन्धराठाढ़ी, राजनगर (मधुबनी) आदिक सूर्य मन्दिर एवं अन्यान्य स्थल सभसँ प्राप्त प्राचीन सूर्यमूर्ति सभक उपलब्धता मिथिलांचलमे सूर्योपासनाक महत्ताकेँ रेखांकित करैत अछि।
आर्य लोकनिक अभिजात्य संस्कृतिक समानान्तर लोकक अपन सम्प्रदाय अछि, अपन देवी-देवता, पूजोपासना पद्धति, पावनि-तिहार आदि छैक। आभीर लोकनिक सुरजाहा सम्प्रदायक सूर्योपासक लोकदेवता ज्योति ओ कारिख, उषा-प्रत्युषाक समानान्तर गहिल षष्ठी आदिक पूजोपासना प्रकारान्तरसँ सूर्योपासना थिक। सौर संस्कृतिक केन्द्रीय देवता सूर्य छथि। आर्यलोकनिक सूर्य प्रतिबद्धताक उदाहरण अछि सूर्यक वाहन सप्ताश्व रथ। आर्य अश्वप्रिय छलाह आर अश्व हिनक संस्कृतिक संवाहक देवी-देवताक वाहन बनल अछि। छठि व्रतक परम्परा पुराणयुगसँ पहिनेक थिक। सुकन्या एहि कठिन व्रत साधनासँ अपन पति च्यवन ऋषिक नेत्रक ज्योति घुरौने छलीह। षष्ठी वा छठी मइया लोकजीवनक आंचरमे संतति, आरोग्य व सुख-समृद्धि देइत छथि।
सूर्यक सम्बन्ध ऋतुचक्रसँ अछि। बारह मास (द्वादश आदित्य), छह टा ऋतु (षष्ठी माता) एवं सात दिन (सप्ताश्व रथ) सभटा सूर्यसँ सम्बद्ध। हिनक गति प्रक्रिया अयन (गति क्रिया) मे विभाजित अछि- उत्तरायण एवं दक्षिणायन। सूर्यक दुनू अयनमे अर्थात् कार्तिक एवं चैत्रमे छठि मइयाक पूजोपासना कयल जाइछ। अश्वारोही सूर्यकेँ जलाशयक तटपर हस्तिकलश, चौमुख दीप, मौसमी फल-फूल, मेवा-मिष्टान्न आदिसँ अर्घ्य देल जाइछ (लोकायत और लोकदेवता, डॉ. रामप्रवेश सिंह, मुजफ्फरपुर, १९८६ ई.)। हिनक पूजोपासनाक लेल लोक श्रद्धावनत भऽ ठाढ़ रहैत अछि- ब्राह्मण बेटी जनेऊ, अहीर बेटी गायक दूध, कुम्हार बेटी हस्तिकलश आदि, तेली बेटी तेल, माली बेटी फूल-पात आदि लऽ कऽ उदयाचल दिस सूर्योन्मुख भऽ अर्घ्य देइत छनि। जापानकेँ सूर्योदयक देश ओ अरुणाचलकेँ उदयाचलक प्रदेश कहल जाइत अछि। मिथिलांचलमे उगैत एवं डुबैत (अस्ताचलगामी) सूर्यकेँ लोकपूजन परम्परित अछि। सूर्यक छठी व्रतानुष्ठान बहुत कठिन मानल जाइछ। एहि ठामक स्त्रीगण सूर्यक अर्घ्यक केराक रक्षाक लेल ब्रह्मास्त्र धरि उठयबाक लेल कृतसंकल्पित रहैत अछि- “मारवउ रे सुगवा धनुष से, ई घउर, रौना माइ के जाए”। छठी माइकेँ मिथिलांचलमे रौना माइ सेहो कहल जाइछ। षष्ठी लोकायत संस्कृतिक देन थिक मुदा सूर्य वैदिक संस्कृतिक। अतः रौनामाइ सूर्यक सतरंगी अश्वरथपर सवार भऽ कऽ मिथिलांचलक धरतीपर अबैत छथि एवं लोकजीवनक दुख-दारिद्र्यक हरण कऽ अपन “लोक”मे घुरि जाइत छथि। एवं प्रकारेँ सूर्योपासना सम्पूर्ण लोकजीवनकेँ श्रद्धाभिभूत कयने अछि। वैदिक एवं लोकायत संस्कृतिक समाहार एहि ठाम प्रत्यक्ष देखना जाइछ।