राजकमल चौधरी का रचनाकर्म (आलोचना), जमाना बदल गया, सोना बाबू का यार, पहचान (हिन्दी कहानी), अभिधा (हिन्दी कविता-संग्रह), हाथी चलए बजार (कथा-संग्रह)।
सम्पादन: प्रतिनिधि कहानियाँ: राजकमल चौधरी, अग्निस्नान एवं अन्य उपन्यास (राजकमल चौधरी), पत्थर के नीचे दबे हुए हाथ (राजकमल की कहानियाँ), विचित्रा (राजकमल चौधरी की अप्रकाशित कविताएँ), साँझक गाछ (राजकमल चौधरी की मैथिली कहानियाँ), राजकमल चौधरी की चुनी हुई कहानियाँ, बन्द कमरे में कब्रगाह (राजकमल की कहानियाँ), शवयात्रा के बाद देहशुद्धि, ऑडिट रिपोर्ट (राजकमल चौधरी की कविताएँ), बर्फ और सफेद कब्र पर एक फूल, उत्तर आधुनिकता कुछ विचार, सद्भाव मिशन (पत्रिका)क किछि अंकक सम्पादन, उदाहरण (मैथिली कथा संग्रह संपादन)।
सम्प्रति नेशनल बुक ट्रस्टमे सम्पादक।
बटुआमे बिहाड़ि आ बिर्ड़ो
(राजकमल चौधरीक उपन्यास) (आगाँ)
मैथिली तँ आब संविधान स्वीकृत भाषा भ' गेल अछि, सन् १९५७मे,
जहिआ ई उपन्यास लिखल गेल छल, से बात नहि छलै; मैथिली भाषाक अधिकार लेल खूब-बर्चा होइ छलै। प्रवासी मैथिल लोकनि शहर-शहरमे भाषाई समिति बनबै छलाह। ओही समितिक माध्यमे किछु गोटए अस्तित्व रक्षा करै छलाह, किछु अस्मिता निर्माण; किओ अपन राजनीतिक उत्थान करै छलाह, किओ अकादमीक उन्नति; किओ कुण्ठा मेटबै छलाह, किओ रास-विलास; मुदा थोड़े लोक लेल धन्न सन। किऐ तँ ओ भूखसँ व्याकुल रहै छल। कहाँ दन कुरुक्षेत्रामे भूख लगला पर गान्धारी अपन बेटा सभक लहासक ढेरी पर चढ़ि फल तोड़ए लागल छलीह। भूख, मनुष्यक विवेक आ सम्वेदनाकें एहि तरहें आन्हर करैत अछि। एहना स्थितिमे भाषाक लड़ाइ लड़' लेल के जाएत? सोलह आना सत्य वचन थिक जे हरेक एहि तरहक आन्दोलनमे मुख्य रूपें लोक अपन-अपन लड़ाइ लड़ैत रहल अछि। संयोग थिक जे ई भाषाई आन्दोलन छल। जँ नहिओ रहितए तँ लोक कोनो आओर बाट ताकि लितए, जेना एखन लोक ताकि रहल अछि। भारतीय स्वाधीनताक बाद भारतीय नागरिकक विवेक एते बेसी आत्मकेन्द्रित भ' गेल, जे ओ समस्त आन्दोलनमे अपनाकें जोड़ि कए अपन लिप्सा आ कुण्ठामे तल्लीन भ' गेल। अपन स्थान तकबामे आ सुरक्षित करबामे लीन भ' गेल। स्वातन्त्रयोत्तरकालीन भारतीय लेखक मनुष्य जातिक अही वृत्तिकें उजागर करबामे लागल रहलाह अछि।
कलकत्ताक मैथिल समितिक भाषाई आन्दोलन, एहने आन्दोलन थिक, जाहिमे भुवनजी सगरो समाजमे बेस प्रतिष्ठित आ निविष्ट मानल जाइ छथि; मैथिल, मैथिली, आ मिथिलाक हित लेल बेस उदारतासँ काज करै छथि; लोक सब खूब मान-आदर करै छनि। मुदा ओएह लोक सभ जहिना सभा सोसाइटीक प्रेमिका, उदात-यौवना निर्मलाजीकें भुवनजी संग उठैत बैसैत देखै छथि कि सगरो मैथिल समाज चर्चा कर' लगैत अछि जे हुनकर अपन स्त्राी महान कुरूपा छथिन तें निर्मलाजीक आँचर कसि क' धएने छथि।
नीलू, विष्णुदेव ठाकुर संग सिनेमा देखब पसिन नहि करै छथि, मुदा अन्हार रातिमे जखन देह व्याकुल करै छनि, तँ निर्वस्त्रा भेल कमलजीक अन्हार कोठलीमे पहुँचि जाइ छथि। सामाजिक यथार्थ आ दैहिक यथार्थक एहि तरहक निरूपण आन्दोलन उपन्यासकें ठोस, आ महत्त्वपूर्ण साबित करैत अछि। उपन्यासक कथाभूमि कलकत्ता थिक, मुदा कथाक जीवन पूर्ण रूपें मैथिल थिक। जीवन-यापन आ आत्म-स्थापन हेतु कलकत्ता शहरमे संघर्षरत मैथिलक स्वभाव, जागरूकता, आलस्य, उदारता, राग-द्वेष, मनोवेग, उन्माद, भाषा-प्रेम, स्वार्थ-सिद्धि हेतु चलाओल भाषाई आन्दोलनक र्छंि, आत्मविज्ञापन हेतु यत्रा-कुत्रा पाँखि पसारबाक ललक, फैंटेसी... समस्त स्थितिकें सूक्ष्मता आ मार्मिकतासँ एतए रेखांकित कएल गेल अछि। मैथिलीमे एहि कृतिकें पहिल राजनीतिक उपन्यास घोषित करबामे कोनो कोताही नहि हेबाक चाही। उपन्यासकार स्वयं एकरा प्रथम राजनीतिक उपन्यास अथवा राजनीतिक पर्यवस्थितिमे लिखल गेल प्रथम वृतान्तक उपन्यास' कहलनि अछि।
समाज-व्यवस्थाक नियम अछि जे मनुष्य ÷प्रभुत्व' आ ÷प्रतिष्ठा' अर्जित करए चाहैत अछि। अही दुनूमे कतहु ÷चरित्रा' सेहो नुकाएल अछि। ÷प्रभुत्व', ÷प्रतिष्ठा' आ ÷चरित्रा'--ई तीनू पद व्यावहारिक जीवनमे बड़ अमूर्त्त सन अछि। ई तीनू वस्तुतः की थिक? केहन चरित्राक मनुष्यकें केहन प्रतिष्ठा भेटतनि? कतेक प्रतिष्ठा अर्जित केलासँ मनुष्यकें कतेक प्रभुत्व हएत? कतेक प्रभुत्व आ प्रतिष्ठाधारी व्यक्तिक चरित्रा केहन हएबाक चाही?--अइ प्रश्नावलीक उत्तर कोनो समाजक आचार संहितामे स्पष्ट नहि अछि। मुदा लोक निरन्तर फिल्मिस्तानक ÷मुन्ना भाइ' जकाँ लागल रहै'ए। अपन आचरणक श्रेष्ठताक व्याख्या अपना तरहें करैत रहै'ए। आन्दोलन उपन्यासक कमलजी, भुवनजी, निर्मलाजी, सुशीला, नीलू, हेम बाबू... सबहक आचरण देखि उपन्यासकार राजकमल चौधरीक मोनमे जे ओझराहटि उपजै छनि, तकरे उघार करबाक प्रयास एहि उपन्यासमे कएल गेल अछि। धन्य छथि ओ समीक्षक, जिनका अइ उपन्यासमे एकसूत्राताक अभाव बुझाइ छनि।...वस्तुतः मनुष्यक मूल प्रवृत्ति थिक जिजीविषा; आ तकर प्राथमिक शर्त थिक--रोटी, सेक्स, सुरक्षा। एहि तीनू आश्यकताक पूर्ति हेतु दुनियाँक प्रत्येक प्राणी चुट्टीसँ बाघ, बाघसँ नढ़िया, नढ़ियासँ मनुक्ख भ' जाइए। जीवनक समस्त छल, र्छंि, ईर्ष्या, द्वेष, उदारता, ईमानदारी, त्याग, तल्लीनता, भय, साहस, स्पष्टता, प्रवंचना, खोशामद, ललकार, टोप-टहंकार, धर्म-पाखण्ड, नीति-विचार, दान-दक्षिणा, लूट-बटमार... आदिक स्वांग अही निमित्त करै'ए; सफल-असफल होइ'ए। सफलताक अहंकारमे उन्मादित रहै'ए, असफलताक कुण्ठामे गन्हाइत रहै'ए। बिसरि जाइ'ए जे अइ सफलातक मार्गमे ओ कतेक हीन भेल अछि, अथवा असफल होइत केतक नमहर भेल अछि। सम्पूर्ण ÷आन्दोलन' उपन्यास मानव जीवनक अही जटिल-गुत्थीक गाथा थिक। हमरा जनैत अइ उपन्यासक आश्रय-वृक्ष ÷मैथिल समिति' टा नहि रहितए तँ भाषा परिवर्त्तन क' कए एकरा सम्पूर्ण संसारक अथवा सम्पूर्ण मानवीय वृत्तिक कोनहुँ भाषाक उपन्यास कहल जा सकै छल।
मैथिलीमे तँ निश्चिते आन्दोलन उपन्यास एकटा नव शुरुआत थिक। आत्मकथात्मक शैलीमे लिखल जएबाक अछैत एहिमे कतहु आत्मश्लाघा अथवा आत्मसंकोचक स्वाभाविक त्राुटि नहि आएल अछि। कथावाचक कमलजी कलकत्ता महानगरमे आत्म-स्थापनरत छथि, भाषाई आन्दोलनमे सहभाग-सहकार द' रहल छथि, आन्दोलनी परिवारक हरेक व्यक्ति लेल तटस्थ आ ईमानदार आचरण रखै छथि। सम्पूर्ण उपन्यासमे कतहु स्पष्ट नहि होअए दै छथि जे ओ स्वयं किनका पक्षमे छथि। जे भुवनजी हुनका कलकत्ता महानगरमे पैर रोपबाक आधार देलकनि, नैतिक समर्थन देलकनि, स्नेह-प्रेम देलकनि, मान-सम्मानक मार्ग प्रशस्त केलकनि, तिनकहु लेल ओ कतहु पक्षपातक स्थिति अपन कथावाचनमे नहि आबए देलनि। नीलू, निर्मला, सुशीला... तीनू तीन आचणक स्त्राी छथि; तीनूक खोंइचा छोड़ा क' राखि देलनि, मुदा किनकहु पर अपन निर्णायक वक्तव्य नहि देलनि। स्वयं बदनाम गली धरि गेलाह, तकरहु उजागर करबामे संकोच नहि केलनि। लक्ष्य संधान छलनि मानवीय वृत्तिक स्पष्ट नक्शा उतारबाक, से अइ तटस्थ भावे टासँ सम्भव छल। इएह कारणो थिक जे आइ आ आइसँ पहिनहुँ अइ उपन्यासमे मूल मानवीय वृत्तिक एते रास छवि देखाइत अछि, देखाइ छल। महानगरीय परिवेशक प्रवासी मैथिल द्वारा चलाओल जा रहल भाषाई आन्दोलन एहि उपन्यासक आश्रय-वृक्ष भने रहल हो, मुदा सम्पूर्णतामे ई मिश्रित चित्रा खण्डक कथ्य-बहुल उपन्यास थिक, जाहिमे क्षुधा, आत्म-सुरक्षा आ यौन-पिपासाक चारू भर चित्राखण्डक समायोजन भेल अछि। तथापि कथ्य एकटा सुगठित कौशलसँ रचल यथार्थ उद्बोधित, समाज सम्मत, विश्वसनीय वृत्तान्तक रूपमे सोझाँ आएल अछि।
रचनाकालक दृष्टिएँ ÷आन्दोलन' ÷आदिकथा'सँ पूर्वक उपन्यास थिक, मुदा विषय आ शिल्पक दृष्टिएँ ई बेसी प्रगतिशील, आधुनिक, आ ऊर्ध्वोन्मुखी अछि।
कोनो उपन्यास मनुष्य, मानवीय जीवन, जनजीवनक सामाजिक व्यवस्था आ ओकर वातावरणक कथा कहैत अछि। एहि अर्थमे उपन्यासमे ठाढ़ मनुष्यक क्रिया-कलापहिसँ उपन्यासक गरिमाकें चीन्हल-बूझल जा सकैत अछि आ उपन्यासकारक रचना-दृष्टिक मूल्यांकन कएल जा सकैत अछि। अर्थात् चरित्रा-चित्राण जाहि कृतिमे जतेक सन्तुलित आ स्पष्ट हएत ओहि कृतिक उद्देश्य आ वातावरणकें ओतेक स्पष्टतासँ बूझल जा सकत। सामान्यतया रचनाकार लोकनि अपन सृजित पात्राक चरित्रा पर समग्रतामे अपन टीका दै छथि। केहन लोक छथि, कते पढ़ल छथि, कोना कमाइ छथि, कोना खाइ छथि, की करै छथि...। चाही तँ सुविधा लेल एकरा व्याख्यापरक चरित्रा-चित्राण कहल जा सकैत अछि, मुदा एहिसँ बेसी सुविधा होइत अछि, पात्राक आचरण आ कथोकथनक आधार पर ओकर चरित्रा बुझबामे। एहिमे भावक लोकनि पात्राकें अपना नजरिएँ चिन्हबाक चेष्टा करै छथि। प्रायः इएह कारण थिक जे नाटक, अथवा नाटकीय शैलीक कृतिमे चरित्रा चित्राणक सुविधा बेसी भेटैत अछि। खास क' कए मनोविश्लेषणात्मक चरित्रा-चित्राण करबाक पर्याप्त सम्भावना रहैत अछि। इहो कहब समीचीन होएत जे राजकमल चौधरीक रचनामे अकारणे एते कथोपकथन नहि रहैत अछि। नाटकीय शैलीक एहि उपन्यासमे पात्राक मनोविश्लेषणक प्रभूत व्यवस्था अछि। रचनाक नायक-नायिका आ सहयोगी लोकनि पारस्परिक वार्तालाप आ अपन क्रिया-कलापसँ जते तरहें अपन चारित्रिाक सीमा अंकित करैत'छि रचनाकार स्वयं टीका द' कए ओते विस्तारसँ कहिओ नहि कहि सकै छथि। एहिसँ कृति संक्षिप्त, दीप्त आ प्रभावकारी सेहो होइत अछि। सम्भवतः इएह कारण थिक जे राजकमल चौधरीक उपन्यास आकारमे एते छोट होइत अछि आ प्रभावमे एते विराट। वार्तालापसँ मनुष्यक सम्पूर्ण व्यक्तित्व ठाढ़ भ' जाइत अछि। शिल्प, शैली, वाक्य-संरचना, शब्द-चयन, सम्बोधन-अभिवादन, विषय आ विषयानुरक्तिसँ कोनहुँ व्यक्ति अपन सम्पूर्ण सोच-समझ-आचरण, कौलिक आ व्यावहारिक संस्कार, आर्थिक-शैक्षिक-सामाजिक पृष्ठभूमि स्पष्ट करैत अछि। जेना आन्दोलन उपन्यासक पात्रा सब कएने छथि।
भाँगक निशाँमे मातल कमलजीक कोठलीमे अल्पवयस नीलू अर्धनग्न अवस्थामे पहुँच जाइत अछि। ओहि अन्हार गुज्ज रातिमे बन्द कोठलीमे नीलू, कमलजीकें ÷भैया' कहैत अछि, मुदा सर्वस्व अर्पित करए चाहैत अछि। स्पष्ट अछि, जे किशोर वयक उन्माद आ उत्तेजनामे नीलू ÷सम्बोधन' आ ÷क्रिया'क बीचक समन्वय बिसरि गेल अछि। जे कमलजी यौन पिपासा मेटएबा लेल देह-व्यापारमे लिप्त स्त्राीक खोली धरि पहुँचि जाइ छथि, से कमलजी भाँगक घनघोर निशाँमे मातल छथि, आ अन्हार गुज्ज रातिमे बन्द कोठलीमे समर्पित नीलूकें बुझा-सुझा क' आपस क' दै छथि (आन्दोलन/पृ. ५०-५१)। मैथिलानी वेश्याक ताकमे जखन कमलजी बनगामबालीक खोलीमे पहुँचै छथि तँ सम्पूर्ण नक्शा उनटि जाइत अछि, हुनक विषय-वासना करपूर जकाँ बिला जाइत अछि (पृ. ३५-३७)। अइ वार्तालापमे आ एहने कतोक वार्तालापमे व्यक्ति, समाज, व्यवस्था, वातावरण आ मनोवेगक जतेक स्पष्ट छवि अंकित भेल अछि, ततेक स्पष्ट करब आन कोनो माध्यमे
असम्भव छल।
एतए नीलूक किशोरावस्था आ काम-पिपासा नीलूकें आन्हर क' देने अछि। ÷भैया' सम्बोधनक बादहु यौनाचार प्रतिवेदन अनर्गल थिक, मुदा एतए नीलूक वयसोचित उन्माद आ अपरिक्वतामे उचितानुचितक विवेक नुका गेल अछि, जे सहज अछि, सम्भाव्य अछि। मुदा तें, नीलूक चरित्रा घृणित नहि कहल जा सकैत अछि। अपरिपक्व रहितहुँ ओ सर्वस्व-अर्पण हेतु पात्रा-चयनमे असावधान नहि अछि, भुवनजीक आवासीय परिसरमे आओर कतोक पुरुख, मैथिल पुरुख बिलमल छथि, तिनका संग ओ एना नहि केलनि; महानगरीय वातावरणक विकृतिमे ओ निर्मलाजी अथवा सुशीला नहि बनि गेलीह। नीलूक समर्पणकें अस्वीकार करबाक अर्थ कमलजीक नपुंसकता अथवा निष्काम वृत्ति नहि थिक। से रहितथि तँ कमलजी वेश्यालय नहि जैतथि। मुदा कमलजी कामातुर राक्षस नहि छथि। से रहितथि तँ ओ सुशीलाक राति किनलनि, हुनका संग सब किछु कइए क' आपस होइतथि। समस्त मानवीय दुर्बलताक अछैत मनुष्यक विवेक ओकरा नैतिक रूपें विराट बनबैत अछि। समस्त दुर्बलता आ सबलताक सीमा बूझब समयक नायककें वास्तविक स्वरूप दैत अछि आ ओकर चारित्रिाक वैशिष्ट्य समकालीन समाजकें जीवन जीबाक दृष्टि आ नैतिक बल अनुसंधानक बाट देखबैत अछि। आन्दोलन उपन्यासक चरित्रा चित्राण तकरहि उदाहरण थिक।
(अगिला अंकमे)