नव भोर जोहैत मिथिला
—धीरेन्द्र प्रेमर्षि
राज्य पुनर्संरचनाक लेल भऽ रहल अभ्यासक असरि देशक समग्र क्षेत्रक सङहि मिथिलामे सेहो व्यापक देखल जा रहल अछि । जनता जागरुक आ उत्सुक अछि— नेपालक नव–निर्माणमे मिथिला क्षेत्रकेँ अपन पृथक आ विशेष पहिचानक सङ्ग देखबाक लेल । सौँसे देशमे गणतन्त्र आ सङ्घीय व्यवस्थाक माङ जोर पकड़िरहल अछि । एहनमे मिथिलावासीमे सेहो एहन भावना जागब आ तकराप्रति सक्रियता देखल जाएब जतबए स्वाभाविक अछि, ततबए उत्साहवर्द्धक सेहो । उत्साह देशक स्वत्व आ स्वतन्त्रताप्रेमी ओहन नागरिकक लेल जे अपन माटिपानिक प्रति इमान्दार छथि, अपन राष्ट्रिय स्वाभिमानपर गर्व करैत छथि, जे मिथिलाक स्वर्णिम इतिहासकेँ वर्तमान बनएबाक आकांक्षी छथि, आ जे यथार्थमे नेपाली जनताक सर्वतोमुखी विकास आ उन्नतिक पक्षपाती छथि ।
भूगोलसँ मिथिलाक अलोपित होएबाक पीड़ा हमसभ शताब्दियोसँ भोगैत आबिरहल छी । खास कऽ कर्णाटवंशीय मिथिला राज्यक पतनक बाद विभिन्न कालखण्डमे हमसभ यवन, अङरेज, गोर्खाली आदिक प्रहार निरन्तर सहैत आएल अछि । एतबा उत्पीड़नक बाद जँ कोनो आन सभ्यता वा संस्कृति रहितए आ कि कोनो आनठामक लोक रहितए तँ आइधरि छिन्नभिन्न होइत नेस्तनाबूद भऽ गेल रहितए । मुदा मिथिला, मैथिल आ मैथिलीक अस्तित्व निरन्तर सात सए वर्षसँ चलैत आएल अनेको तरहक कुचक्रक मारि सहितो जीवन्त अछि । एकरा पाछाँ निश्चित रूपेँ मैथिल सभ्यता–संस्कृतिक सर्वाधिक योगदान रहलैक अछि । साँस लेबामे पर्यन्त अशौकर्य भऽ रहल आइधरिक अवस्थामे सेहो अपनाकेँ जियाकऽ रखनिहार मैथिलीक एहि गौरवशाली आधारसभक प्रति नतमस्तक होइत हम किछु पाँति गढ़ने छी—
मानैत छी जे आब रहल नइ दुनियाकेर भूगोलमे
तैयो हमसभ बचाकऽ रखलौँ जकरा माइक बोलमे
सोहर, लगनी, जटाजटिन कि झिझिया–साँझ–परातीमे
एकहकटा मिथिला जीबैए एकहक मैथिल छातीमे
उपर्युक्त काव्यांश भूगोलविहीनताक घाओमे मलहम लगएबाक आभास दऽ सकैत अछि, मुदा मात्र छातीमे जीवैत भूगोल हमरासभकेँ सम्पूर्णता नहि दिआ सकैत अछि । एहन–एहन कविता गढ़िकऽ असलमे कही तँ हमसभ अपनाकेँ परतारल करैत छी । एहि तरहेँ अपनाकेँ परतारिकऽ नहि राखल जाए वा जाहि बातपर हमसभ गौरव करैत छी तकरा युग–युगन्तधरिक लेल जँ चिरस्थायी करबाक हो तँ आवश्यक अछि जे खालि छातीमे सैँतल मिथिलाकेँ हमसभ जमीनपर उतारी आ मैथिल भूगोलकेँ पुनः नामकरण करैत उर्वर बनाबी । एकरा लेल देशक एखनुक राजनीतिक वातावरण हमरासभकेँ सर्वोत्तम अवसर प्रदान कएने अछि ।
मुदा देशमे जाहि तरहक क्रियाकलापसभ देखल जा रहल अछि ताहिसँ ई नहि बुझाइत अछि जे हमसभ एहि अवसरक सदुपयोग करबाक दिशामे पर्याप्त सचेत आ गम्भीर छी । सर्वप्रथम तँ ई बात अबैत अछि जे एखनधरिक सरकारसभ वास्तविक रूपमे सत्ताधारी वर्गसँ बाहरक लोकक लेल सेहो लोकतन्त्र आएल छैक से मानैत–सन अपन चरित्र देखबिते नहि अछि । ई कटुसत्य हमरासभक सोझाँ अछिए । वस्तुतः देशमे अखनो ओहने राजनीतिक दलक दबदबा अछि जे माघ १९ सँ पहिने संविधानसभाक नामे सुनैतदेरी कोनो बिगड़ैल साँढ़जकाँ भड़कि उठैत छल । वि.सं. २०४७ सालक संविधानमे कऽमा–फुलस्टाॅपधरिमे परिवर्तन करबाक आवश्यकता नहि देखनिहारसभ आइ नव संविधान बनएबाक बीड़ा उठौने छथि । एहनमे ओहि व्यक्तिसभक मानसिकता कतेक बदलल होएतैक से सहजहिँ अनुमान लगाओल जा सकैत अछि । जँ माओवादी जनयुद्ध नहि शुरू भेल रहितैक आ एखन जे मुद्दासभ उठल अछि से नहि उठाओल जइतैक तँ निश्चित अछि जे हमसभ आजुक ई स्वर्णिम वातावरण नहि पबितहुँ । मुदा जनयुद्धक मार्फत मैथिलीसभमे अधिकारक भूख तँ माओवादी जगा देलकैक, मुदा भुखाएलसभकेँ अन्न देखैतदेरी जाहि तरहक कछमछी भऽ सकैत छैक, तकरा व्यवस्थित करबा हेतु कोनो ठोस प्रयत्न कऽ सकबाक अवस्था माओवादीक सेहो नहि छैक ।
मिथिलामे भेल पहिचानक आन्दोलनक क्रममे आयोजित एकटा पत्रकार–सम्मेलनमे माओवादी नेता बाबुराम भट्टराई बाजल छलाह— ‘मधेशमे जे चेतना जागल छैक तकर वीजारोपण वा गर्भाधान के कएलक ? मधेश आन्दोलनक बाप के ?’ खास कऽकऽ २०४६ सालक परिवर्तनक बादक अवस्थाकेँ देखलापर हमरा जवाबक रूपमे ई कहबामे कनेको द्विविधा नहि होइत अछि जे माओवादी । मुदा एहिठाम ध्यान देबायोग्य बात ई अछि जे कोनो योग्य नागरिकक सम्पूर्ण निर्माणमे बापक वीर्यक भूमिका अत्यन्त न्यून होइत छैक । मुख्य भूमिका रहैत छैक— नओ मासधरि गर्भमे राखिकऽ जन्म देनिहारि आ लालन–पालन कएनिहारि माएक । मुदा दुर्भाग्य, मिथिलासहित देशक अनेको क्षेत्र, जाति, समुदायमे जागल चेतनाक बाप तँ माओवादी बनल, मुदा आब जखन माए बनबाक समय आएल अछि तँ देखा चाही जे ई भूमिका ओ कतेक कुशलतासँ निर्वाह करैत अछि । एहिसँ पहिने मधेशक पार्टी वा सङ्गठनसभ ओहोसभ खालि बाप बनबाक दम्भ मात्र देखा सकल । ई बात खास कऽ मिथिलाक भाषा–संस्कृतिजन्य भावनापर बेरबेर कुठाराघात करैत ओसभ देखा चुकल अछि । जँ मधेशी आन्दोलन/विद्रोह बाप बनबाक अहङ्कारमे मोँछक लड़ाइ नहि बनितए, एकरा समटिकऽ–सहेजिकऽ चलनिहार एकटा माए भेटितैक, तँ आइ अवस्था किछु भिन्न रहितैक ।
अवस्था तैयो बिगड़ल नहि छैक । सम्पूर्ण मिथिलावासीक मनोबल अखनो ओतबए उच्च छैक । एहि मनोबलकेँ सकारात्मक आ सार्थक परिणामपर अवतरण करएबाक लेल क्रियाशील होएबाक जिम्मेदारी हमरेसभपर अछि । संसद आ सड़कसँ जनआवाज बुलन्द कएनिहारसभ बेर–बेर ई बात दोहराओल करैत छथि जे संविधानसभा सभसँ बेसी मधेशी, दलित एवं जनजातिएक लेल आवश्यक अछि । ओहि आवश्यक संविधानसभा आ तकरा बाद बनल सरकारमे मैथिलसभक उल्लेख्य सहभागिता अछि । तेँ संविधानसभाकेँ अपन हकमे उपयोग करबाक दिशामे सभक क्रियाशीलता आवश्यक अछि । रहि गेल बात सशस्त्र आन्दोलन कएनिहार जनतान्त्रिक तराई मुक्ति मोर्चासभक, हमर विचारमे ओहोसभ राज्यसत्ताकेँ समदर्शीए बनएबाक लेल ई मार्ग अपनौने छथि । जनभावसँ निरपेक्ष राजनीति हुनकोसभक नहि भऽ सकैत छनि ।
सुदीर्घ राजनीतिक इतिहास समटिकऽ बैसल व्यक्तिसभ एखन क्रियाशील मोर्चासभमे छथि । हुनकासभक आगाँ इहो चुनौती छनि जे हुनकेसभक देखासिखी कतेको अवाञ्छित तत्वसभ मिथिलामे पएर पसारिरहल अछि । ओ तत्वसभ हमरासभक मूल मुद्दाकेँ दरकिनार करबाक लेल जी–जानसँ लागल अछि । एहन अवस्थाकेँ विचारैत सेहो अपनाकेँ जनताप्रति उत्तरदायी बुझनिहारसभकेँ अपना–अपना दिससँ सेहो सहमतिक विन्दु तलाशैत रहबाक चाही । एम्हर अन्य पक्ष सेहो जँ व्यक्तिगत ईर्ष्या–द्वेषसँ उपर उठि जनताक प्रति इमान्दार भऽकऽ आगाँ आबए तँ निश्चित अछि जे सशस्त्र समूहसभ सेहो आमिल पीबिकऽ नहि बैसल रहत । एहि काजमे सरकार आ विशेष कऽ माओवादीक भूमिका विशेष महत्वपूर्ण भऽ सकैत अछि । किएक तँ जेसभ अलग बाट धएने छथि सेसभ अधिकांश माओवादीएसँ बहराएल छथि । जँ माओवादीसभ गम्भीरतासँ ई सोचथि जे जेसभ ओहन विकट–विकराल समयमे सङ्ग छल से आइ किएक अलग भऽ गेल तँ ई समस्या जल्दीए सलटि जाएत । ई विशुद्ध रूपसँ दियाद–वादमे होबऽ वला भावनात्मक प्रहारक कारणे उत्पन्न मतभिन्नता भऽ सकैत अछि । एहिमे अलग विचार रखनिहार दियादक बात सुनिकऽ ओकर सम्मान मात्र कऽ देल जाए तँ जतऽ कतौ ककरो अहंकेँ ठेस लागल होएतैक, से शान्त भऽ जएतैक । शान्तिक जोरक आगाँ केहनो कड़गर हथियारकेँ घमऽ पड़तैक आ घमि जएतैक से हमर दृढ विश्वास अछि । रहल मिथिलाकेँ साकार रूप देबाक बात, तँ एहिमे एतबए कहब—
जखन जनजन ई मिथिलाक जागि जेतै भाइ
हेतै सोन मढ़ल भोर, राति भागि जेतै भाइ ।