पञ्जी प्रबंध-गजेन्द्र ठाकुर
पंजी-संग्राहक- श्री विद्यानंद झा पञ्जीकार (प्रसिद्ध मोहनजी)
श्री विद्यानन्द झा पञीकार (प्रसिद्ध मोहनजी) जन्म-09.04.1957,पण्डुआ, ततैल, ककरौड़(मधुबनी), रशाढ़य(पूर्णिया), शिवनगर (अररिया) आ’ सम्प्रति पूर्णिया। पिता लब्ध धौत पञ्जीशास्त्र मार्त्तण्ड पञ्जीकार मोदानन्द झा, शिवनगर, अररिया, पूर्णिया|पितामह-स्व. श्री भिखिया झा | पञ्जीशास्त्रक दस वर्ष धरि 1970 ई.सँ 1979 ई. धरि अध्ययन,32 वर्षक वयससँ पञ्जी-प्रबंधक संवर्द्धन आ' संरक्षणमे संल्गन। कृति- पञ्जी शाखा पुस्तकक लिप्यांतरण आ' संवर्द्धन- 800 पृष्ठसँ अधिक अंकन सहित। पञ्जी नगरमिक लिप्यान्तरण ओ' संवर्द्धन- लगभग 600 पृष्ठसँ ऊपर(तिरहुता लिपिसँ देवनागरी लिपिमे)। गुरु- पञ्जीकार मोदानन्द झा। गुरुक गुरु- पञ्जीकार भिखिया झा, पञ्जीकार निरसू झा प्रसिद्ध विश्वनाथ झा- सौराठ, पञ्जीकार लूटन झा, सौराठ। गुरुक शास्त्रार्थ परीक्षा- दरभंगा महाराज कुमार जीवेश्वर सिंहक यज्ञोपवीत संस्कारक अवसर पर महाराजाधिराज(दरभंगा) कामेश्वर सिंह द्वारा आयोजित परीक्षा-1937 ई. जाहिमे मौखिक परीक्षाक मुख्य परीक्षक म.म. डॉ. सर गंगानाथ झा छलाह।
पछिला अंकमे देल गेल श्रोत्रियक सातक बदलामे आठ श्रेणीमे ओ लोकनि क्रमबद्ध छथि- आ’ पञ्जीक कुल संख्या 185 अछि, जाहिमे 32 टा श्रोत्रिय आ’ 153 टा आन ब्राह्मणक श्रेणी अछि। जातुकर्ण गोत्र त्रिप्रवर जातुकर्ण/आंगीरस/भारद्वाज छथि। पहिने सभ क्यो अपन-अपन पुरखाक, आ’ वैवाहिक संबंधक लेखा स्वयं रखैत रहथि। हरसिंहदेवजी एहि हेतु एक गोट संस्थाक प्रारम्भ कलन्हि। मैथिल ब्राह्मणक हेतु गुणाकर झा, कर्ण कायस्थक लेल शंकरदत्त, आ’ क्षत्रियक हेतु विजयदत्त एहि हेतु प्रथमतया नियुक्त्त भेलाह। हरसिंहदेवक पंजी वैज्ञानिक आधार बला छल आ’ शुद्ध रूपेँ वंशावली परिचय छल। सभ ब्राह्मण कायस्थ आ’ क्षत्रिय एहिमे बराबर छलाह। मुदा महाराज माधव सिंहक समयमे शाखा पञ्जीक प्रारम्भ भेल आ’ श्रोत्रिय आदि विभाजन आ’ क्रमानुसारे छोट-पैघक आ’ ओहिसँ उपजल सामाजिक कुरीतिक प्रारम्भ भेल।
कर्ण कायस्थमे एकेटा गोत्र काश्यप अछि। मात्र मूलक अनुसारेँ उतेढ़ होइत अछि, मझौला दर्जाक गृहस्थ कहल जाइत अछि।
मूलसँ गोत्र सामान्यतः पता चलि जाइत अछि। किछु अपवादो छैक। जेना: ब्रह्मपुरा मूल, काश्यप/गौतम/वत्स/वशिष्ठ।(7टा)
करमहा- शाण्डिल्य (गौल शाखा)/ बाकी सभ वत्स गोत्री।
दुनू करमहामे विवाह संभव।
चैतन्य महाप्रभु: रमापति उपाध्याय करमहे तरौनी मूलक छलाह। ओ’ बंगाल चलि गेलाह, हुकर शिष्य रहथि चैतन्य महाप्रभु।
श्रोत्रियकेँ पुबारिपार आ’ शेषकेँ पछ्बारिपार सेहो कहल जाइत अछि।श्रोत्रियक पाँजिकेँ चौगाला(श्रेणी) मे विभक्त्त अछि। श्रोत्रिय पंञ्जीकेँ लौकित कहल जाइत अछि। कुल 8 टा चौगोल श्रेणी अछि।32 टा पञ्जी अछि। पञ्जी आ’ पानि अधोगामी होइत अछि। विवाह संबंधक कारणे समय बीतला पर उच्च श्रेणी समाप्त होइत जाइत अछि। प्रथम श्रेणी ताहि कारणसँ समाप्त भ’ गेल अछि।
शेष ब्राह्मण पछ्बारिपार कहबैत छथि। एहि मे 15 गोट श्रेणी अछि।153 टा पञ्जी अछि। एकरा नामसँ जेना महादेव झा पाँजि इत्यादि संबोधित कएल जाइत अछि।
(अनुवर्तते)
मूल विदेह अंक / Original issue
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