विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका · VIDEHA · ISSN 2229-547X

आधुनिक मैथिली नाटकमे चित्रित निर्धनताक समस्या

डॉ. शंभु कुमार सिंह · 2009-02-01 · अंक 27

आधुनिक मैथिली नाटकमे चित्रित : निर्धनताक समस्या
भारत गरीबक देश थिक। एतुका अधिकांश जनता एखनहुँ गाममे रहैत छथि जे कि कृषि कार्य पर निर्भर छथि आ बरखा पर। फलस्वरुप अनियमित बरखा सरकारी उपेक्षा ओ अशिक्षा तथा पिछड़ापनक कारणेँ गामक लोक गरीबीक जीवन बिता रहल छथि। यैह गरीब किसान ओ गामक लोक जखन कमयबा हेतु शहर जाइत छथि तँ मजदूर वा बोनिहार कहबैत छथि। ओतहु हुनका सभकेँ नारकीय जीवन जीवाक लेल बाध्य होम’ पड़ैत छैक। भारतक कुल आबादीक पैंतीस प्रतिशतक लगपास लोक एहन छथि जे जीवनोपयोगी न्यूनतम आवश्यकताक पूर्ति करबामे अक्षम छथि।
निर्धनता मनुक्खकेँ बेवस लाचार आ शक्तिहीन बना दैत अछि। निर्धन मनुक्ख पिछड़ल, दीन-हीन बाधाग्रस्त आ सदैव दोसरक दयारपर जीब’ क लेल बाध्य भ’ जाइत अछि। मानव जीवनक भयंकर अभिशाप थिक निर्धनता वा गरीबी। जाहि मनुक्खकेँ दू-साँझक रोटी नहि, पहिर’ क लेल शरीर पर वस्त्र नहि, रहक लेल घर नहि, बीमार भेलापर दवाय-दारूक पाय नहि, ओ जँ आत्माक उच्चताक दावा करत त’ ओ मिथ्याक सिवाय किछु नहि भ’ सकैत अछि। ओ स्वतंत्र कोना भ’ सकैत अछि ? ओ कोनहुँ बड़का काज कोना क’ सकैत अछि ? ओ अपन विचारकेँ स्वतंत्र रूपसँ कोना प्रकट क’ सकैत अछि ? निर्धनताक कारणेँ मनुष्य तंगदिल, तुच्छ, ओछ, कमजोर आ अपन ईच्छाक मार’वला बनि जाइत अछि।
मैथिली नाट्य साहित्य मध्य एहि समस्याक विश्लेषण निम्नस्थ नाटकमे भेल अछि। जीवनाथ झाक ‘वीर –वीरेन्द्र’ (1956) भाग्य नारायण झाक ‘मनोरथ’ (1966) बाबूसाहेब चौधरीक ‘कुहेस’ (1967) गुणनाथ झाक ‘कनियाँ – पुतरा’ (1967) महेन्द्र मलंगियाक ‘ओकरा आँगनक बारहमासा’ (1980) नचिकेताक ‘नायकक नाम जीवन’ (1971) अरविन्द कुमार ‘अक्कू’ क ‘आगि धधकि रहल छै’ (1981) गोविन्द झाक ‘अन्तिम प्रणाम’ (1982) गंगेश गुंजनक ‘बुधिबधिया’ (1982) आदि।
मनोरथ मे लक्ष्मीनाथ अपन निर्घनताकेँ कोसैत छथि। ओ कहैत छथि---- “हमर नाम तँ दरिद्रनाथ होमक चाही ने कि लक्ष्मीनाथ। एकठाम नाट्यकार गरीबक धीया-पुताक संबधमे कहने छथि जे ओ कोनो काज सोचि समझि कए करैत अछि ओ अपन सुख-सुविधाकेँ त्यागि दैत अछि। एहि परिप्रेस्थमे मैथिली नाट्यालोचक डॉ. प्रेम शंकर सिंहक कथन छनि--- “आर्थिक दशाक क्षीणताक कारणेँ मनुष्यकेँ केहन संकटापन्न समस्याक सामना करय पड़ैछ तकरे दिग्दर्शन एहि नाटकमे होइत अछि।”1
गरीबीक ई पराकाष्ठा छैक जे क्यो खाइत-खाइत मरैत अछि तँ क्यो कमाइत-कमाइत। एतय समुचित व्यवस्थाक आभाव अछि। एतय अधिकांश नेनाक स्थिति एहने अछि जे जन्मोपरान्त रोजी-रोटीक जोगाड़मे लागि जाइत अछि। ‘नाटकक लेल’ मे एहि समस्याकेँ उजागर कयल गेल अछि---- “कतेको लोक एक किनारमे पड़ल कूड़ाक ढेरसँ की सबने बीछि रहल छल, क्यो दू एकटा रोगायल बच्चाकेँ डेंगा रहल छल”2 निम्नवर्गक यर्थाथ चित्रणक दृष्टिसँ ‘ओकरा आँगनक बारहमासा’ मैथिली नाट्य साहित्यमे अद्वितीय स्थान राखैत अछि। एहि नाटकक केन्द्रबिन्दु थिक सर्वहारा वर्गक यातनापूर्ण जीवन, वासन्ती पवन, ग्रीष्मीय निदाध, बर्षाक रिमझिम हेमन्तक शीत आ शिशिरक सिहकी समटा गरीबक हेतु, फुसि थिक। एहिमे एकटा गरीब एरिवारक बारहो मासक दुर्दैन्य स्थितिक चित्रण कयल गेल अछि, जाहिमे कातिक मासक एकटा बानगी प्रस्तुत अछि-----
“कातिक हे सखि बोनियो ने लागै छै,
अन्नक नहि कोनो बाट यौ।
पेटक ज्वाला राम सहलो ने जाइ छै,
घर-घर हुलकय राड़ यौ।”3
वस्तुत: कातिक मास खेतिहर मजदूरक लेल दुखक मास होइत अछि। एहि समयमे अन्नाभाव भ’ जाइत छैक एहन स्थितिमे निम्नवर्ग स्थिति दयनीय भ’ जाइत छैक – “दू गोट कोकड़ा पकबिति पियास लागल हय।”4गरीब लोकक लेल खयबाक हेतु भरिपेट अन्न वस्त्र आ आवासक एकटा जटिल समस्या भ’ गेल अछि एहि समस्या दिस नाटकारक ध्यान जाति छनि--- “अन्न बिना पेट जरिते हय, बस्तर बिना ठिठुरबे केली आ घर त’ दखते छी”5 प्रो. प्रेमशंकर सिंह एहि नाटककेँ “मिथिलाक निम्नवर्गीय समाजक अलबम कहने छथि।”6 “जाहि आँगनक बारहमासा एहिमे टेरल गेल अदि तकर ध्वनि खाली ओहि आँगनसँ नहि आबि रहल अछि, प्रत्युत मिथिलाक लाख-लाख आँगनसँ उठैत ओकर रोस, हाहाकार करैत सोझे मर्मकेँ बेधि देमयवला अछि।”7
आर तँ आर आइ समाजमे एहन गरीबी व्याप्त छैक जे गरीबकेँ मुइलाक उपरान्त कफन किनबाक लेल टका नहि रहैत छैक। “अंतिम प्रणाम” मे समाजक एहन दुर्दैन्य स्थितिक चित्रण द्रष्टव्य थिक--- “ठीके त’ कहै छिऐ। हमरा आरू गरीब छी मुदा आनि पर दस गोटय मिलि जाय तँ की ने क’ सकैत छी।”8
‘बुधिबधिया’ मे सेहो गरीबीक दृष्टान्त भेटैत अछि। देश मे कतेको व्यक्तिक स्थिति सोचनीच अछि। किछु व्यक्ति अपन जीवन-यापन विलासितापूर्वक ढगसँ व्यतीत करैत छथि, मुदा सरकारक ध्यान गरीब लोकक दिस नहि जाइत छैक। जँ सरकार द्वारा किछु व्यवस्था कयलो जाइछ तँ ओकर लाभ गरीब लोक घरि नहि पहुँचि सकैत अछि--- “एकरा देह पर एक बीत वस्त्र नहि, एकर अंग-2 उघार अछि।”9
समाजक अधिकांश लोक गरीबी रेखाक नीचाँ अछि। महगी अकाश छुबि रहल अछि। सामान्य लोक अपन परिवारक हेतु भोजन, वस्त्र आवास जुटएबामे परेशान अछि। ‘अंतिम प्रणाम’ मे मुरारीक कथन अछि--- “तीन-तीन टा बच्चोकेँ भुखले सुतैत देखैत रहैत छी----घरवालीकेँ फाटल वस्त्रमे देखैत छी---अहू सँ बेसी किछु अशुभ भ’ सकैत अछि।”10
वर्तमान युगमे सामाजिक चेतनाक निरन्तर बढ़ैत गतिशीलता ओ परंपरागत रूढ़ि व्यवस्थाक जड़ताक बीच एकटा भयंकर संघर्ष आ तनावक स्थिति बनल अछि। आधुनिक सामाजिक मैथिली नाटकक मूल-स्वर एहि प्रकारक विभिन्न संघर्ष, तनाव आ अनेक सामाजिक समस्या आदिसँ भरल अछि। सामाजिक जीवनक यथार्थक अभिव्यक्ति नाटककारक सामाजिक दृष्टि आ रचना दृष्टि पर आधारित होइत अछि। मिथिलांचलक समाजमे आर्थिक विपन्न जीवनक अस्तव्यस्तता स्वाभाविकतामे परिवर्तित भए गेल अछि।
संदर्भ
1. मैथिली नाटक परिचय, डॉ. प्रेम शंकर सिंह, पृष्ठ—96
2. नाटकक लेल, नचिकेता, पृष्ठ—54
3. ओकरा आँगनक बारहमासा, महेन्द्र मलंगिया,पृष्ठ--1
4. वएह, पृष्ठ—2
5. वएह, पृष्ठ--46
6. मैथिली नवीन साहित्य, सं. डॉ. बासुकीनाथ झा, पृष्ठ--28
7. वएह, पृष्ठ—28
8. अंतिम प्रणाम, गोविन्द झा,
9. बुधिबधिया, डॉ. गंगेश गुंजन
10. अंतिम प्रणाम, गोविन्द झा,
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Suggested citation: डॉ. शंभु कुमार सिंह. “आधुनिक मैथिली नाटकमे चित्रित निर्धनताक समस्या.” Videha — First Maithili Fortnightly eJournal, issue 27, 2009-02-01. https://www.videha.co.in/research/2009/27/आधुनिक-मैथिली-नाटकमे-चित्रित-निर्धनताक-समस्या.htm

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