मैथिली भाषाक अधिकांश साहितय मानक मैथिली मे उपलब्ध अछि जकरा ‘साहित्यिक भाषा’, ‘साधुभाषा अथवा शिष्ट भाषा’ सेहो कहल जाइत अछि। अधिकांश समयधरि ई एकमात्र साहित्यिक अभिव्यक्ति क भाषा छन जाहि आधार पर एकरा ‘मानक मैथिली’ कहल जाइत अछि। ई दरभंगा आमघुबनी जिला मे बाजल जाइत अछि। ‘दक्षिणी मानक मैथिली’ समस्तीपुर, बेगूसराय, खगडिया, सहरसा, मेधपुरा आ सुपौल जिला आदि मे बाजल जाइत अछि। एहि मे मानक मैथिली सँ किछु अन्तर अछि। पूर्वी मैथिली पूर्णिया, अररिया, किशनगंज, करिहार आदि जिला क केन्द्रीय आर पश्चिमी भाग मे अशिक्षित वर्ग सभ मे चलैत अछि तथा महानन्दा सँ पूव सेहो हिन्दू लोकति बजैत छथि जतय मुसलमान मुख्यत: बाडव्ला बजैत अछि। छिकाछिकी बोली गंगाक दक्षिण भाग मे बाजल जाइत अछि। एहि मे खगडिया आ बेगूसराय जिला क पूर्वी भाग, बॉंका जिलाक पश्चिम भाग केँ छोडि क’ संथाल परगनाक उत्तरी आ पश्चिमी भाग मे बाजल जाइत अछि। पश्चिमी मैथिली मुजफफरपुर, पूर्वी चम्पारण आ पश्चिमी चाचारण जिलाक पूर्वी भाग मे बाजल जाइछ। चम्पारण आ उत्तर मुजफफरपुर क बोली भोजपुरी सँ प्रभावित अछि। जोलही बोली दरभंगा जिलाक अधिकांश इस्लाम धर्मविलम्बी अपन पडोसी हिन्दू क भाषा मैथिली बजैत अछि, मुदा ओकर बोली थोडे क विकृत आर अरबी-फारसी शब्दऍं ूिज्ञित रहैत अछि।
वर्तमान समय मे मैथिलीक दू उपभाषाक नव नामकरण आ नवजागरण भेल अछि जाहि मे प्रथम थिक अंगिका अद्वितीय थिक बज्जिका। अंगिका भाषाक नाम पडल अछि जकरा हम पूर्वी मैथिली कहल अछि आ डा. सरजार्ज अब्राहम ग्रियर्सन छिकाछीकी गॅवारी कहलनि।एकर क्षेत्र भागलपुर, गोडा आ देवधर तथा संथाल परगना मानल जाइत अछि। बज्जिका ओहि उपभाषाक नाम पडल अछि जकरा हम पश्चिमी मैथिली कहलहुँ अछि। ई नामकरण बज्जी आलिच्छिवी क इतिहास क आधार पर कयल गेल अछि, किन्तु आधुनिक परिप्रेक्ष्य मे एहि जातिक नामनिशान नहि भेटैत अछि।
मैथिली व्याकरणक अपन निजी विशेषता अछि। एकर विशिष्टताक प्रसंग मे डा. सर जार्ज अब्राहम ग्रियर्सन ‘लिग्विस्टिक सर्वे ऑफ इण्डिया (खण्ड-5, भाग-2) (1902), ‘एन इण्ट्रोडक्शन टू द मैथिली लैंग्वेज ऑफ नौश विहार (1800) तथा ‘सेभन ग्रामर्स ऑफ द डायलेक्ट्स एण्ड सब डायलेक्ट ऑफ द विहारी लैंग्वेज (1883) मे विस्तारपूर्वक विचार क’ ई प्रमाणित क’ देलनि अछि जे ई विश्ष्टिता अन्य भारतीय भाषादि मे नहि उपलब्ध भ’ रहल अछि। मैथिली व्याकरण मे सर्वनामक तीन रूप प्रयुक्म होइत अछि-‘अपने’, ‘अहॉं’ आ ‘तों’ वा मोरा, मुदा बाडव्ला मे दू ‘आपनी’ आ ‘भूमि’ वा ‘तुइ’ आ हिन्दी मे सेहो दूइए रूप प्रयुक्त होइत अछि ‘आप’ आ ‘तुम’। मात्र भषा-शास्त्रक दृष्टिऍं सँ नहि, प्रत्युत व्याकरण आ शब्दावलीक विभन्नताहि आ विशेषतादि कारणेँ नहि, अन्य भाषा-भाषी लोकतिक द्वारा सरलता सँ बुझबाक कारणेँ नहि, प्रतयुत अपन एक स्वतन्त्र साहित्यिक आ सांस्कृतिक परम्परा हैबाक कारणेँ मैथिली भाषाक स्वतन्त्र अस्तित्व अछि। मैथिली भाषा आ व्याकरणक सम्बन्ध मे अनेक कार्य भेल अछि। ओहुना संस्कृत आ अंग्रेजी व्याकरणक आधार मानिक’ मैथिली मे छोट-पैध अनेक व्याकरण लिखल गेल अछि, मुदा महावैयाकरण दीनबन्धु झा (1878-1955) क ‘मिथिला भाषा विद्योतन’ (1945) क ऐतिहासिक महत्व अछि जकरा सूत्र-शैली मे ओ लिख लनि जे संस्कृत-प्राकृतक श्रेष्ठ व्याकरणादि सँ तुलना कयल जा सकैछ। एहि व्याकरण केँ आधार मानिक’ गोविन्द झा (1923) ‘लघुविद्योतन’ (1963) आ ‘उच्चतर मैथिली व्याकरण’ (1979) क रचना कयलनि। हिनक अन्य कृति मे ‘मैथिलीक उद्गम ओ विकास’ (1968) आ ‘मैथिली भाषा’ (1909-2000) ‘द फारमेशन ऑफ मैथिली लैग्वेज (1960) सर्वाधिक उल्लेखनीय कार्य कयलनि अदछ।
अन्य स्वतन्त्र साहित्यिक भाषाक समान मैथिली भाषाक अपन स्वतन्त्र प्राचीन लिपि थिक जकरा ‘तिरहुता’ वा ‘मिथिलाक्षर’ वा मैथिलाक्षर’ वा ‘मैथिली लिपि’ कहल जाइत अछि। तिरहुता नाससँ ज्ञात होडत अछि जे ई लिपि तिरहुत देशक अछि जकर विकास ‘तीरमुक्त’ वा ‘तिर्हुत’ नामक व्यवहार हैबाक बाद पूर्णत: प्राप्त कयल गेल अछि। बौद्ध ग्रन्थ ‘ललित-विस्तर’ मे एहि लिपि केँ ‘वैदेही लिपि’ क नाम पर अभिहिस कयल गेल अछि। घुमा क’ लिखनिहार पूर्वी वर्णमाला साक्षात बाडव्ली असमिया, मैथिली आ ओडिया लिपिक स्रोत थिक। वस्तुत: मिथिलांचल मे उपलब्ध प्राचीन संस्कृत ग्रन्थ एही लिपि मे उपलब्ध अछि जकरा बाडव्ला, असमिया आ ओडियाक पण्डित लोकति केँ पढबा मे सुविधा होइत छवि। पटना सँ प्रकाशित ‘मिथिलाक्षरक उद्भव ओ विकास’ (1960-61) मे अनेक किस्म मे एहि लिपिक तात्विक अघ्ययन प्रस्तुत कयलनि, किन्तु दुर्योग रहल जे पुज्ञतकाकार प्रकाशित नहि भ’ सकल। एहि दिशा मे राजेश्वर झा (1923-1977) ‘मिथिरलाक्षरक उद्भव आ विकास (1971) लिखिक’ एकर ऐतिहाकिसकता, प्राचीनता, शास्त्रीयता प्रमाणित कयलनि अछि जे भाषा-पैश्राानिक दृष्टिसँ एकर सर्वातिशायी महत्व थिक। उनैसम शमाब्दीक मल्यचरि ई लिपि जीवित छल, मुदा वर्तमान सन्दर्भ मे एकरा लोक बिसरि गेल अछि आ ओकरा स्थन पर देवनागरी लिपि व्यवहार कयल जाय लागल अछि।
मैथिली साहित्य क इतिहासकार लोकति एकरा सामान्यत: तीन काल आदिकाल, मघ्यकाल आ आधुनिककाल मे विभक्त क’ अघ्ययन कयलनि अछि। किन्तु ओंकर समय सीमाक निर्धारण से इतिहासकार लोकति मे मनैक्यक सर्वथा अभाव अछि। इतिहास-लेखनक आधार-भूत प्रक्रियाकेँ घ्यान मे रासिक’ एकरा निम्नस्थ काल खण्ड मे विभाजित करब श्रेयस्कर प्रतीत होइत अछि:
i. आदिकाल 800 ई. सँ 1350 ई. धरि।
ii. मघ्यकाल 1351 ई. सँ 1857 ई. धरि।
iii. आधुनिक काल
i. ब्रिटिशकाल 1857 ई. सँ 1947 ई. धरि।
ii. स्वातन्त्रयोत्तर काल 1947 सँ अर्द्यपर्यन्त।
सन् 1857 ई. का सिपाही विद्रोहक पश्चात् मैथिली साहितय मे आधुनिक कालक सूत्रपात मानल जा सकैछ। ई विशाल मुगल साम्राज्यक अन्तिम वर्ष थिक। मुगल शासनक अवसानोपरान्त ब्रिटिश शासन काल मे जाहि सामाजिक चेतनाक उदय भेल ओहि मे सन् 1857 ई. पश्चात् क्षिप्रताअबैत अछि। एहि सामाजिक चेतनाक प्रतिनिधित्व नवीन शिक्षित बुद्धि जीवी वर्ग कयलक ले एक भाग अपन प्राचीन संस्कृति क सुरक्षाक प्रति उत्सुकतिा देखौलक आ दोसर भाग युग क आलोकक स्वागत कयलक। एहि सांस्कृतिक अनुष्ठान मे भारतीय भाषादिक विकास भेल आ ओकर साहित्य सम्पन्न आ समृद्ध होइत अछि।
पश्चिमी शिक्षक प्रचार, रेल-तारक व्यवहार, रचायत शासनक व्यवस्था मुद्रण कलाक आविष्कार आ सामाजिक चेतनाक प्रभाव साहित्य पर पडल आ ओ स्ढ परम्परादिकेॅा तोडि क’ नव दिशाक दिस चलि पडल। मैथिली साहित्यक इतिहास मे नव-युगक निर्माण मे कमीश्पर चन्दा झा (1831-1907) आ पण्डित लालदास (1856-19) अवदान सर्वाधिक महत्वपूर्ण अछि। हुनक राजनीतिक.सामाजिक रचनादिक आधार पर अनुमान कयल जा सकैछ जे सन् 1857 ई. क पश्चात् परिवर्तित परिस्थितिक सहल प्रक्रिया छल। वस्तुत: चन्दा झा आ लालदास मैथिली साहितय मे नवयुग अनबा मे समर्थ भेलहि। अपन गद् रचनादि द्वारा ओ लोकति आधुनिकता क द्वार खोललनि। फेर जहिना-जहिना मिथिलान्चल से नव आलोक पसरल साहितय सेहो नव-नूतन किसलयक संग पल्लवित भेल।
सर्वप्रथम तँ ओ रहस्यवादी गीत एवं कवितादिक थिक जकर अन्वेषण नेपाल मे तथा प्रकाशन बंगाल मे भेल। एकर रचयिता सिद्ध लोकति छथि। एहि सिद्ध लोकतिक सम्बन्ध बौद्ध लोकतिक महायान शाखाऍं छलनि। एहि रचना-संग्रहक नाम ‘बौद्ध गान ओ दोहा’ देल गेल अछि। सन् 1323 बंगाब्द अर्थात् सन् 1916 ई. मे महामहोपाघ्याय डा. हरप्रसाद शास्त्री (1853-1931) सर्वप्रथम एकर प्रकाशन करौने छलाह। एहि मे संग्रहीत कविता सभक भाषा अति प्राचीन अछि मथा एहि मे ओ विशेषता दि अछि जे बाडव्ला. मैथिली, मगाही आदि पूर्वीय भषादि मे अछि। एहि कारणसँ एहि भाषादिक प्रारम्भिक रूपक उदाहरण मे रारबल जाइत अछि। एहि कारण सॅा एहि भाषादिक प्रारम्भिक रूपक उदाहरण मे राखल जाइत अछि। वस्तुत: ई कवितादि तहिया लिखल गेल जखन आधुनिक पूर्वीय भाषादि अपन प्रारम्भिक अवस्था मे छल। भाषा वैज्ञानिक लोकति एहि विषय मे एकमत छथि। अत: एहि कवितादिक भाषा पूर्वीय अथवा मागधी अपभं्रशक पूर्वीय रूप थिक। यद्यपि एहि पर शौरसेनी अपभ्रशक सेहो प्रभाव संक्षिप्त अछि। तथापि ई स्वाभाविक अछि जे एहि मे ओ सभ तत्व उपलबध अछि जे मागधी अपभ्रशक पूर्वीय रूप थिक। यद्यपि एहि पर शौरसेनी अपभ्रशक सेहो प्रभाव संक्षिप्त अछि। तथापि ई स्वाभाविक अछि जे एहि मे ओ सभ तत्व उपलब्ध अछि जे मागधी अपभ्रंश सँ विकसित वर्तमान भाषादि मे सेहो पाओल जाइत अछि। एकरा संगहि ई मानबाक लेल प्रचुर साधन अछि। ई संग्रह प्राचीन मैथिलीक रूप थिक। एकर रचयिता अधिकांश मिथिलाक निवासी रहल हैताह।
बौद्ध गान ओ दोहा मे तीन न्रकारक साहित्य उपलब्ध भ’ ीहल आछि, जकरा मैथिलीक प्रारम्भिक रूप कहल जा सर्कैछ। ओ अछि: दोहा कोश, चर्चाचर्च विनिश्चय आ डाकार्णव। एकर स्वचिता बौद्ध सिद्ध आ तान्त्रिक रहथि। हिनक भाषा मिभिलाक पूर्वी भागक प्राचीन रूप थिक। एहि सामग्री आदिक आधार पर एकर रचयिता लोकतिक समय आठम शताब्दी सँ तेरहस शताब्दी धरि निश्चय कयल जाइत अछि। विषयक दृष्टि सँ एहि रचनादिक ओतेक महत्व नहि जतेक की भाषाक दृष्टिऍं अछि। एकर भाषा एहन अछि जकरा आधार पर एकरा मैथिली, बाडव्ला, असमिया, हिन्दी, मगही आ भोजपुरी आदि प्रत्येक भाषा-भाषी अपन सम्पत्ति घोषित करैत छथि। एहि समय भारतीय आर्य भाषा निर्माणक स्थिति मे छल। इएह कारण अछि जे भाषा-वैज्ञानिक लोकति एहि रचना-समूह मे भारतीय पूर्वान्चलक सभ भाषादिक रूप भेटैत अछि। संगहि-संग ई मानबाक लेल सेहो प्रचुर साधन अछि जे एहि संग्रह केँ प्रधानत: मैथिलीक रूप थिक। ज्योतिरीश्वर (1280-1340) वर्णरत्नाकर (1940) मे एकर सम्पूर्ण नामावली द’ देलनि अछि। पूर्वीय भाषादि मे सर्वप्रथम मैथिलीक प्रयोग गम्भीर साहित्यक रूप मे कयल गेल छल। बाडव्ला आ आसमी मे तँ साहित्य-रचनाक प्रयास एक शताब्दी पाछॉं जा क’ प्रारम्भ भेल तथा एकरा लेल मैथिलीक महान कवि विद्यापति प्रेरक सिद्ध भेलहि। एकर अतिरिक्त प्राचीन अप्रपभं्रश मे कविता लिखबाक परम्परा मात्र मिथिला मे छल आ ई परम्परा चौदह म शताब्दी धरि चलैत रहस। विद्यापति अपन दू पुस्तक-‘कीर्तिलता’ (1924) आ ‘कीर्तिपताका (1960) तथा अनेक छोट कवितादिक रचना मे कयलनि जे देश्य-मिश्रित अपभ्रंश शिला ‘प्राकृत पैडालम’ टीकाकर वंशीधर एहि मे संगृहीत अपभ्रंश कवितादिक भाषाकेँ अवहट् कहलनि। डा. सुभद्र झा एकरा आदिकालीन मैथिली कहलनि। ओ लिखैत छथि. ‘प्राकृत पैड;लम मे उदाहरण स्वरूप अनेक शब्द एवं पद देल गेल अछि जकरा विषय मे कहल जा ाकैछ जे ओ प्राक् मैथिली मे रचित थिक ओहि मे एहन किछु नहि अछि जकरा आदिकालीन मैथिली कहबासँ वंचित क’ सकी।‘ राधाकृष्ण चौधरी (1924-1984) ‘मिथिलाक सांस्कृतिक इतिहास’(1961) क परिशिष्ट-ग मे प्राकृत पैडलम मे व्यवहृत 115 शब्दादिक सूची देलनि अछि तथा एहरा आदिकालीन मैथिलीक ग्रन्थ मानलनि अछि। तथापि एहि प्राचीन भाषाक विषय मे सुनिश्चित एवं अन्तिम रूपसँ विचार करब आवश्यक अछि। वर्तमान परिप्रेक्ष्य मे एकरा प्राक् मैथिली मानव तर्क संगत अछि।
दोसर प्रकारक साहित्य जे उपलब्ध भ’ रहल अछि ओ थिक ‘डाकवचनाबली’। एहि वचनाबली मे स्थानीय लोक प्रसिद्ध विज्ञाता, ज्योतिष एवं कृषि सम्बन्धी वचन, जीवन आ विविध विषयक समालोचना भेरैत अछि। ई जनसामान्य मे प्रचलित अछि तथा एकर विस्तार आसामसॅ ल’ कए राजस्थान धरि सम्पूर्ण आर्यवर्त मे विस्तृत अछि। एकर रचयिताक सम्बन्ध मे विद्वान लोकति मे मतैक्य नहि अछि तथा अनेक जनश्रुति आदि प्रचलित अछि। देशक भिन्न भिन्न भाग सब मे एकर रचयिता लोकतिक भिन्न-भिन्न नाम अछि। मिथिला मे डाक, घाघ, भण्डरी एवं डंक आदि प्रचलित आदि। एम्हर आबिक’ देशक विभिन्न भागसॅ एहि वचनावलीक कतिपय संग्रह प्रकाया मे आयल अछि, परन्तु एहि मे सँ कोनो, कोनो प्राचीन हस्तलिखित प्रति पर आधारित नहि भ’ कए ओहि भू-भाग मे प्रचलित अनेक मौखिक रूप पर अछि। एकर फलस्वरूप प्रत्येक संस्करणक भाषा आधुनिक भ’ गेल अछि। मैथिलीक हेतु ई सौभाग्यक बात थिक जे डाकक नाम पर प्रचलित अनेक वचन मैथिल विद्वान द्वारा रचित ज्योतिषक प्राचीन ग्रन्थादि मे उद्घृत अछि। जाहि मे किछु तँ चौदहम-पन्द्रहम शताब्दीक थिक। एहि उद्धरणादिक भाषा अत्यन्त प्राचीन अछि तथा ‘बौद्ध गान ओ दोहा’ क भाषासँ साम्य रखैत अछि। ओना तँ मिथिला सँ जे वचनाबली प्रकाशित भेल अछि ओकर भाषा आधुनिकताक छाप नेने अछि। मात्रमिथिला आचार्यगण कोनो महान आचार्यक वचन सदृश प्रमाणक हेतु डाक वचनादि केँ जे उद्घृत कयलनि अछि ओहिसँ ओकर मैथिल उद्भव आ प्राचीनता सिद्ध होइत अछि। अत: ई कहब पूर्णत: संगत सिद्ध होइत अछि जे डाक मैथिल रहथि आ हुनक लोक प्रसिद्ध सारबी आदिक भाषा प्राचीन मैथिलीथिक। कालान्तर मे ई सम्पूर्ण भारत मे प्रचलित भ’ गेल तथा अपन मौखिक परम्परा मे नूतन रूप धारण क लेलक अछि।
मात्र डाके एहन व्यक्ति नहि रहथि जे एहि प्रकारक लोक प्रसिद्ध वर्णनक रचना प्राचीन मैथिली मे कयलनि। एतबा तँ निश्चित अछि जे सबसँ विख्यात इएह छथि। सप्तरत्नाकरकर्ता महामहोपाहसाय चण्डेश्वर अपन ‘कृतचिन्तामणि’ नामक ज्योतिष निबन्धक प्रशानग्रन्थ मे अवहद्ध भाषाक अनेक पद म्रमाण रूप मे उदृत कयलनि अछि, जकरा क्षपणक जातक भृगुसंहिंता तथा कापलिक जातक प्रभृत ग्रन्थसँ उदृत कहलनि अछि। यद्यपि ई ग्रन्थ आब अनुपलब्ध अछि, अतएंव ई नियिचत रूप सँ नहि कहल जा सकैछ जे उक्त ग्रन्थ ओही भाषा मे लिखल गेल अथवा ओहि मे कतहु सँ अदृत कयल गेल अंछि। परन्तु डाकवचनावली क रचनाक समानहि ई सब सेहो जनसाधारण केँ प्रभावित करबाक लेल विद्वान लोकति हुनके भाषाक आश्रय लैत रहथि आ चाण्डेश्वर सदृश विद्वान् सेहो प्रमाण स्वरूप ओंकरा उदृत करबा मे कनेको कुण्ठित नहि भेलाह।
तेसर प्रकारक जे साहित्य उपलब्ध अछि ओ लोक प्रसिद्ध आख्यान आ गीतक थिक। एहि मे किछु तँ साहित्यिक थिक। गोपीचन्दक गीत एही श्रेणी मे अबैत अछि। ई गीत ओही समयक थिक जाहि समयक डाकक वचन थिक। ई गीत भीखमॉंगनिहारक एक वर्ग द्वारा गाओल जाइत अछि जकरा गुदरिया गोसांईक नाम देल गेल अछि। एहि गीतक अतिरिक्त लोरिक, सलइेस. बिहुला, मरािया आदिक गीत कथादि एही वर्गक थिक। ई सभ रचनादि प्राचीन कालक थिक। एहि कथादिक विशेषता ईहो अछि जे एकर कथानायक कोनो अवतारी देवता वा अंशी पुरूष नहि छथि। डा. सर जार्ज अब्राहम ग्रियर्सन एकर संकलनक प्रयास कयने रहथि। युग-युगसँ ई जनकण्ठ मे पीढी-दर-पीढी गुंजित होइत आवि रहल अछि। एकर भाषाक परिशुद्धता क विषय मे कयों दावा नहि क’ सकैछ। अपन मौखिक परम्परा सँ एकर भाषा मे निश्चित रूपेण परिवर्तन भेल हैत। एहि रचनाहि केँ देखि क’ ई स्पष्ट प्रमाण भेटैत अछि जे मैथिली अपभ्रंश भाषाकेँ लोकप्रिय रचनाक लेल प्रयोग करबाक परम्परा मात्र उपयोगी साहित्यक लेल नहि, प्रत्युत मनोरंजनक लेल सेशे-मिथिला मे पूर्व भारतीय अपभ्रंश भाषाक आरम्भिक स्थिति मे जकर समय भाषा वैज्ञाानिक एक हजार ई. निधारित करैत छथि।
डा. सर जार्ज अब्राहम ग्रियर्सन सर्व प्रथम एहन गीतादि केँ ‘इण्डियन एण्टीक्वेटी’ खण्ड-10 मे प्रकाशित करौलनि। एकर अतिरिक्त ‘समबिहारी फोक सॉंग्स’ (1884), ‘टू भरसन्स ऑफ द सांग्स आफ गोपी चन्द’ (जे. ए. एस. बी. खण्ड 54, भाग-1 अर ‘द वर्थ आफ लोरिक’ (कैम्ब्रिज 1929) आदि मे प्रकाशित अछिणे उल्लेखनीय अछि। एम्हर आबि क’ लोकगीतक कतिपय संग्रह प्रकाश मे आयल अछि जाहिसॅा एकर विकास मे गति आयल अछि। मिथिलान्चलक विभिन्न जनपद मे मैथिलीक करीब तीस लोक नाट्यक प्रस्तुति इस देखल अछि जाहि मे लोक जीवनक स्वाभाविक अभिव्यक्ति भेल अछि। एहि लोक-नाट्यादि मे गीत, संगीत आ नृत्यक त्रिवेणी प्रवाहित भेज अछि जाहि मे लोक जीवनक स्वाभाविक अभिव्यक्ति भेल अछि। एहि लोक-नाट्यादि मे गीत, संगीत आ नृत्यक त्रिवेणी प्रवाहित भेज अछि जाहि मे लोक-जीवनक सार-गर्वित भावसँ सम्पन्न, तत्कालीन युग क प्रवृतिक मनोरंजकता प्रदान करबाक हेतु नव-नव आयामक व्यवस्था कयलक। कालन्तर मे इएह साहित्यिक विधादिक रूप मे विकसित भेल। विविध मांगलिक अवसर जेना व्रत-त्यौहार, धार्मिक, सांस्कृतिक लोकोतसव इत्यादिक विशेष परिस्थिति मे विभिन्न प्रक्रियादि सँ उद्भूत सामाजिक, धार्मिक एवं सांस्कृतिक आ साहित्यिक चेतनाक परिणाम थिक मैथिली लाक-नाट्य।
मिथिला और मैथिली साहित्यक ऐतिहासिक ग्रन्थों के अवगाहन सँ ज्ञान होइछ जे मिथिला पर अनेक राजवंश शासन कयलक जाहि मे तीन राजवंश क शासक लोकति मे कर्णाट राजवंश (1097-1324), ओइनवार राजवंश (1353-1526) आ खण्ड वला राजवंश (1556-1947) प्रमुख छथि। कर्णाटवंशीय राजा लोकतिक छत्र-छाया मे मैथिली साहित्यिक साहित्यकार लोकति केँ प्रोत्साहन भेटबाक प्रक्रिया प्रारम्भ भेल। ज्योतिरीश्वर ठाकुर एही राजवंशक छठम राजा महाराज हरिसिंह देवर (1443-1444) क सभासद रहथि। ओइनवार वंशक शासनकाल मे मैथिली साहित्यक विकास अत्यन्त दुतगतिऍं भेल, कारण एहि राजवंशक राजा लोकति केँ साहित्यक प्रति अधिक अभिरूचि छलनि जकर फलस्वरूप साहित्य मनीषी लोकतिकेँ कतेक राजा लोकति प्रोत्साहित कयलनि जाहि मे उल्लेखनीय छथि कवीश्वर चन्दा झा आ महाकविलास दास आ साहित्य रत्नाकर मुंशी रघुनन्दनदास (1860-1945)। ई साहित्य मनीषी लोकतिक रचनादि मे सर्वथा आधुनिकताक शुभारम्भ होइत अछि।
सर्व प्रथम प्रामाणिम पुस्तक जे खॉटी मैथिली मे अछि आ थिक ज्योतिरीश्वर ठाकुरक ‘वर्णरत्नाकर’ आ ‘धूर्तसमागम’ (1960)। ई दुनू पुस्तक चौदहम शताब्दीक आरम्भ मे लिखल गेल छल। वर्णरत्नाकरक विषय मे सन् 1901 ई. मे बंगाल एशियारिक सोसायटीक सचिव केँ महामहोपाघ्याय डा. हरप्रसाद शास्त्री सूचना देने रहथि। प्रथमे प्रथम एकर प्रकाशन डा. सुनीतिकुमार चटर्जी (1890-1977) आ पण्डित बबुआजी मिश्र क संयुक्त सम्पादक ख मे एकर प्रकाशन भेल छल। अपन रिपोर्ट मे महामहोपाघ्याय डा. हरप्रसाद शास्त्री कहने रहथि, ‘ई ग्रन्थ काव्य नहि, काव्योपयोगी ग्रन्थ कहि सकैत छी। यदि ज्योतिरीश्वर वास्तव मे इच्छापूर्वक काव्य ग्रन्थ लिखितथि तँ एकर स्वरूप आन रूपक रहैत, मुदा वर्णनक अवसर पाबि ग्रन्थकारक सहज कवित्व प्राय: नहि मानलक आ लाख रोकनहु पर सेहो कस्तुरी मोदक समान प्रकटभ’ गेल। स्थल-स्थलक वर्णनकेँ देखिक’ कादम्बरी प्रभृति संस्कृत गद्य-काव्यक स्मरण भ’ जाइत अछि। एहि प्रकाश्क उन्नत गद्य-साहित्य केँ देखिक’ अनुमान होइत अछि जे एहि सँ चारि-पॉंच शताब्दी पूर्व मिथिला भाषा मे नियचये साहित्य रचना प्रारम्भ भ’ गेल छल। अनेक अनुच्छिट उपमादिक संग्रह. भाषा-उपभाषाक उल्लेख द्वारा भाषा-विज्ञान सम्बन्धी अनेक सामग्री, ओहि समयक सामाजिक तथा साहित्यिक विचारक भण्डार, ओहि समयक वर्णन-शैली इतयादि विशेषताक विशद रूप एहि ग्रन्थ मे उपलब्ध अछि।
प्रतिपाद्य गद्य ग्रन्थ भावी कवि आ कत्थक लोकतिक क हेतु एकपथ प्रदर्शक ग्रन्थ बनायब छल जेना जँ नायकक वर्णन करबाक होतॅ कोन-कोन विषयक उल्लेख करब उचित, जँ नायिका वर्णन करबाक होतँ कोन-कोन विषयक निरूपण करब आवश्यक अछि। ई ग्रन्थ सातकल्लोल मे विभाजित अछि जेना नगस्वर्णन, नायिका वर्णन, आस्थान वर्णन, ऋतु-वर्णन, प्रयानक वर्णन, भट्टादि वर्णन आ श्मशान वर्णन। सबसँ महम्वक बातईथिक जे ई पुस्तक गद्य मे अछि तथा उत्तर भारतक कोनो भाषा साहित्य मे एतेक प्राचीन ग्रन्थ नहि भेहैत अछि। जखन दोसर-दोसर प्रान्त अपन भाव प्रकाशनक लेल कोनो साहित्यिक माघ्यमक अभाव मे अन्धकार मे टापर-टोइया द’ रहल छल, तखन मैथिली एक पूर्ण भाषा क रूप मे विकसित भ’ गेल छल जाहि सँ समाजक स्वरूप केँ प्रकट कयल जाय सकय। ई कोनो लोकप्रिय भाषाक प्रधान विशेषता है। वर्णरतनाकर एकर सटीक उदाहरण थिक।
ज्योतिरीश्वरक दोसर रचना संस्कृत-प्राकृत-मैथिली मिश्रित त्रिभाषिक नाटक थिक ‘धूर्त समागम’ । ई नाटक जतय मैथिली कविता आ नाटकीय परम्पराक द्योतक थिक, ओतहितत्कालीन समाजक चित्र अंकित कयलनि अछि जनिक चातु:शालक चारू भाग कतहु महींस बान्हल अछि, कतहु बाछा-बाछीक संगपुष्ट थन्त्वाली गाच एम्हर-ओम्हर जा रहल अछि, कतहु दासी सुन्दर भवनक प्रागंण मे मन्द-मन्द गति सँ अवगार्हन क’ रहल अछि।
वर्णरत्नाकर आ धूर्तसमागम क रचना नोकभाषाक आलोकमय भविष्यक सूचक छल। भाषा-साहितयक एहि अभ्युदय आ विकासक कोनो साहित्यिक प्रेरणाक परिणाम नहि कहल जा सकैछ, प्रत्युत ई तँ साहित्यिक जडवाद सँ असन्तुष्ट जनताक स्वाभाविक प्रवृतिक प्रकाशन छल। भाषा मे फूटैत कवि-प्रतिभा जरमन राजा लोकति केॅा चमत्कृत कयलक तखन हुनक संरक्षण एवं प्रोत्साहनक फलस्वरूप भाषा-काव्यक विकास भेल। ई विकास एहि बातकद्योतक जे लोक भाषा केँ साहित्यिक गौरव सॅ विशेष अवधि धरि वंचित नहि कयल जा सकैछ। जे सामान्य जनमानसक व्यापक भाषा बनिगेल ओहि मे व्यवहारोपसोगी एवं ललित दुनू प्रकारक साहित्यिक सृष्टि अवश्य हैत। मैथिली साहित्यक इतिहासक इतिहासक अवलोकन कयला सँ एकर स्पष्ट बोध होइछ। वस्तुत: ज्योतिरीश्परक रचनादि मैथिली गंगाक ‘हरद्वार’ थिक जतय ओ लोक भाषाक सामान्य धरातल पर उतरि क’ पूर्ण वेग सँ प्रवाहित होमच लागल एकर पश्चात् उमापति उपाघ्याय सर्वाधिक लोकप्रिय नाटककार भेलाह जनिक ‘पारिजातहरण’नाटकऍं असमक शंकरदेव (1499-1568) आत्यधिक प्रभावित भेलाह।
मैथिली साहित्य केँ ई सौभाग्य अछि जे ओइनवार वंशक शासनकाल मे एक एहन प्रतिभासम्पन्न व्यक्तित्वक प्रादुर्भाव भेल जनिक काव्यप्रतिभा अमर भ’ गेल आ ओ मात्र मिथिला धरि सीमित नहि रहल ; प्रत्युत पूर्वान्चल मे बंगाल, आसाम आ ओडिसा धरि ख्याति अर्जित कयलक आ समस्त भारतवर्ष मे लोकप्रियता अर्जित कयलनि ओ रहथि विद्यापति। हिनक ग्र्न्थक विषय-वैविघ्यकेँ देखला सँ ज्ञात होइत अछि जे ओ केवल कविए नहि, प्रत्युत सर्वतोमुखी प्रतिभासँ समलंकृत सच्चिन्तक रहथि। ओ एकहि संग शास्त्रकार, राजनीति-विशारद, इतिहासकार, भूवृतान्त लेखक, अर्थशास्त्राविद्, नीतिशास्त्र विचक्षण, धर्म-व्यवस्थापक, निबन्धकार, शिक्षक, कथाकार, संगीतज्ञ आपुरूषार्थ पुजारी रहथि। ई निम्नस्थ संस्कृत ग्रन्थादिक रचना कयलनि यथा- भूपरिक्रमण (1976), शैवसर्वस्वसार (1815), लिखनावली (1969), दुर्भाभक्तिरडि;णी (1902), शैवसर्वस्वसार (1980), शैव सर्वस्वसार पुराण-भूतसंग्रह (1981), गंगावाक्यावली (अप्रकाशित), संस्कृत-प्राकृत-मैथिली मिश्रित रचनादि मे त्रिभाषिक नाटक गोरक्षविजय (1960) आ मणिमन्जरी (1966) आ अवहटट् रचनादि मे कीर्तिलता (1924) एवं कीर्तिपताका (1960) थिक । विशुद्ध मैथिली मे ई पदावलीक रचना कयलनि जकर उपलब्धताक स्रोत थिक नेपाल, मिथिलाम्पलक अन्तर्गत रामभद्रपुर, तरौनी एवं राग तरडि;णी आ बंगालक अन्तर्गत क्षणदा गीत चिन्तामणि, पदामृतसमुद्र, पदकल्पतरू, कीर्तनालल्द आ संकीर्तनामृत तथा लोककण्ठक पद। एहि पदक संख्या एक हजार पॉंच सयक लगधक अछि। यद्यपि हिलक अधिरकांश रचनादि प्रकाश मे आबि गेल अछि तथापि गंगावाक्यावली, गयापतलक आ वर्षकृत्य पुस्तकाकार प्रकाशन नहि भ’ पाओल अछि। ई पीडा दायक स्थिति अछि जे हिनक रचनादि एतेक लोकप्रिस मेल तथापि हिलक समग्र रचनादिक प्रकाशन ग्रन्थावली वा रचनावलीक रूप मे अद्यापि प्रकाशित नहि भ’ पाओल अछि।
वस्तुत: एहन प्रतिभासम्पन्न महाकविक कृतिकेँ घ्यान मे राखि अद्यापि साहित्य चिन्तक लोकति जतेक अपुसन्धान आ आलोचना प्रज्ञतुत कयलनि अछि ओकरा एकांगी कहल जा सर्केछ ले ओ पुरूषार्थ कवि रहथि जे अपन कृति आदि मे कोनो-ने-कोना रूप सॅ ‘पुरूषार्थचतुष्टय’क प्रतिपादण कयलनि अछि। हिनक सम्पूर्ण कृतिक मुख्य उद्देश्य अछि पौरूष। विद्यापति अपन कृति सभ मे मानवक उदारता, वीरता, धीरता, साहसिकता, निर्भीकता, स्पष्टता, कर्तव्यपरायणता, बुद्धि आ ज्ञानवर्द्धक सभ साधन पर बल देलनि अछि जे सामाजिक आ सांस्कृतिक वातावरणक निर्माण मे समान रूपसँ सहयोग प्रदान क’ समय। जाहि मानव मे पर्युक्त गुणक अभाव अछि जे हुनका दृष्टि मे अयलनि तकर ओ अपहास कयलनि। पुरूषार्थ चतुष्टय क दृष्टिएँ हिनक समग्र कृति हिनक नवोन्सेषशालिनी प्रतिभाक विपुल-वैठुण्यक परिचय दैत अछि। लोक मे स्व-धर्म आ राष्ट्र-धर्म क सुरक्षा क भावना ओ संचारित आ ओकरा पल्लवित पुष्पित करय चाहैत रहथि। अपन समग्र पदावली मे ओ अतीव मृदुलता, जनजीवन मे सुसुप्त मधुर-भाव केँ जगयबाक क्षमता मिथिलाक जनमानस मे अभिहिंत हैबाक कारणेँ ई सर्वाधिक लोकप्रिय भेल।
विद्यापति अपन साहित्य-साधनाक माघ्य मे मैथिली-साहित्य भंडार केॅा भरबाक लेल अनेक विधा करचनाकयलनि। हिनक एक-एक रचना मैथिलीक अमूल्य-निधि थिक जाहि मे एक भाग श्रंृखगारिकताक आभास भेटैछ तँ दोसर भाग भक्तिक, मुदाविद्यापतिक समग्र कृति पर जखन प्रत्यक्ष रूप सॅ विचार करैत छी तखन स्पष्ट भ’ जाइठ जे भारतीय-चिन्तन-धारासँ प्रभावित भ’ कए ओ पुरूषार्थ-चतुष्टयक उदेदश्यसँ समग्र रचनादि कयते रहथि।
एहि प्रकारेँ विद्यापति मैथिली-साहित्य मे जे परम्पराक शुभारम्भ कयलनि ओकरा परवर्ती कवि लोकति अपनाक’ रचना कयलनि। विद्यापतिक समसायिक उवं यपरवर्ती कविलोकति एहि साहित्यक बहुमूल्य सेवा कयलनि। हिनक समसामयिक कवि लोकति मे भवानीनाथ (1375-1450), अमृतकर (1450-1500), चन्द्रकला (1400-1475), कंसनारायण (1475-1528), गोविन्द कवि (1450-1530), जीवनाथ (1500), दस-अवधान (1500), नवकवि यशोधर (1500-1550), जीवनाथ (1500), दस-अवधान (1500), सदानन्द 1550), भीषम (1600), चतुर्भुज (1575-1640), श्याम सुन्दर (1500), भीषम (1600), चतुर्भुज (1575-1640), श्याम सुन्दर (1500), हरिदास (1609-1950), गंगाधर (1600) श्रीनिवास मल्ल (1640) इत्यादि उल्लेखनीय छथि।
(अगिला अंकमे जारी)