राजकमल चौधरी का रचनाकर्म (आलोचना), जमाना बदल गया, सोना बाबू का यार, पहचान (हिन्दी कहानी), अभिधा (हिन्दी कविता-संग्रह), हाथी चलए बजार (कथा-संग्रह)।
सम्पादन: प्रतिनिधि कहानियाँ: राजकमल चौधरी, अग्निस्नान एवं अन्य उपन्यास (राजकमल चौधरी), पत्थर के नीचे दबे हुए हाथ (राजकमल की कहानियाँ), विचित्रा (राजकमल चौधरी की अप्रकाशित कविताएँ), साँझक गाछ (राजकमल चौधरी की मैथिली कहानियाँ), राजकमल चौधरी की चुनी हुई कहानियाँ, बन्द कमरे में कब्रगाह (राजकमल की कहानियाँ), शवयात्रा के बाद देहशुद्धि, ऑडिट रिपोर्ट (राजकमल चौधरी की कविताएँ), बर्फ और सफेद कब्र पर एक फूल, उत्तर आधुनिकता कुछ विचार, सद्भाव मिशन (पत्रिका)क किछि अंकक सम्पादन, उदाहरण (मैथिली कथा संग्रह संपादन)।
बटुआमे बिहाड़ि आ बिर्ड़ो
(राजकमल चौधरीक उपन्यास)
वस्तुतः अपन रचनामे कोनो पात्राक सृजन केलाक बाद जँ रचनाकार ओकर स्वामी बनि जाइ छथि, चरित्राक सहज विकास नहि होअए दै छथि, तँ ओ रचना सामान्यतया असफल भ' जाइत अछि, अपना समयक यथार्थसँ पृथक रहि जाइत अछि, रचनाक सत्य आ नायकक आचरण समाज सापेक्ष नहि भ' पबैत अछि। मुदा राजकमल चौधरीक रचनाक नायक-नायिका आ तकर सहयोगी पूर्ण रूपें स्वतन्त्रा रहैत अछि, स्वेच्छाचारी नहि। ओकर चारित्रिाक विकासमे राजकमल चौधरीक नियन्त्राण ओतबे रहैत अछि, जतबा घूमैत चाक पर राखल माटि पर कुम्हार नियन्त्राण रखैत अछि। अपन ब्रह्माक मात्रा एतबहि टा नियन्त्राण पाबि ओ पात्रा आ रचना महान भ' जाइत अछि। जेना आदिकथा आ आन्दोलन महान भेल अछि; आदिकथाक देवकान्त आ सोना मामी; आन्दोलनक कमलजी, भुवनजी, नीलू, निर्मला, सुशीला महान भेल छथि।
आन्दोलनक प्रमुख पुरुष पात्रा छथि--विष्णुदेव ठाकुर, मोदनारायण जी, नरेन्द्र झा, चन्द्रशेखर बाबू, हेम बाबू, सुदर्शन जी, भुवनजी, कमलजी आदि। किछु अनाम-सुनाम सामूहिक पात्रा सेहो छथि, जे अवसर-बेअवसर अपन वक्तव्यसँ, आ अपन क्रिया-कलापसँ अपन चरित्रा आ मानसिक स्तरक परिचय दै छथि। विष्णुदेव ठाकुर, मोदनारायण जी आ चन्द्रशेखर बाबूक उपस्थिति कथा विस्तारमे ठाम-ठीम होइ छनि, मैथिलोचित प्रवृत्ति आ दुष्टतासँ परिपूर्ण छथि, एकर अलावा कोनो विशेष उल्लेखनीय योगदान हिनका लोकनिक नहि छनि। हेम बाबू सेहो तेहने प्रासंगिक पात्रा छथि, मुदा निर्मला सन उद्धत यौवना बेटीक पिता छथि, विधुर छथि। आत्म-प्रशंसासँ ग्रस्त छथि, अपन बौद्विकता पर अपनहि गर्वित रहै छथि, बेटीक उग्र-आधुनिकाक छवि कोनो बेजाए नहि लगै छनि, दोसरक नीको काल अधलाह लगै छनि, सुझाव आ उपदेश देबामे अपनाकें दक्ष बुझै छथि, छिद्रान्वेषी छथि। मैथिल समितिक आयोजनमे पचीस टाका चन्दा द' कए एना मोन बनबै छथि, जेना भुवनजीकें कीनि लेलनि (पृष्ठ-३४)।
नरेन्द्र झा मैथिल समितिक सक्रिय कार्यकर्त्ता छथि, भुवनजीक संग रहै छथि, मुदा परोक्षमे निन्दा करब स्वभाव छनि। निर्मलाक बासा पर जएबामे मोन लगै छनि, मुदा हुनका दुष्चरित्रा कहबामे रस लगै छनि (पृ. ३९-४०)। मैथिल जातिक आम वृत्ति--चुगलखोरी आ दुष्टाचरण पर एहि उपन्यासमे पर्याप्त दृष्टि देल गेल अछि (पृ.१७)। पात्राक वक्तव्य आ आचरणसँ चरित्राक सम्पूर्ण छवि अंकित करबाक महारत राजकमल चौधरीक लेखनमे सगरो देखाइत रहैत अछि।
सुदर्शनजी सन मातृभाषानुरागीक अवतारणा उपन्यासमे थोड़बे काल लेल भेल, मुदा ओतबहि कालमे उपन्यासकार हुनकर विराट छवि ठाढ़ क' देलनि। परम उत्साही, क्रियाशील आ विद्रोही व्यक्तित्वक एहि युवक द्वारा स्कूलमे भाषा सम्बन्धी रीति पर वक्तव्य जारी करब, प्रतिक्रिया देखाएब, एकटा विराट परिदृश्य दिश इशारा करब थिक। स्कूली शिक्षाक भाषा माध्यम आ शिक्षक-शिक्षार्थीक वार्तालापक भाषा माध्यम बड़ पैघ महत्व रखैत अछि। स्कूलमे शिक्षक लोकनि जखन मैथिलीमे गप करनि, तँ हुनका ओ अपन पिता, पितृव्य, भाइ सन लगैत रहनि। मुदा जखनहि आन बोली-बानीक लोक अध्यापक बनि स्कूल अएलनि आ ओ हिन्दीमे गप करए लगलनि, हठात् ओ अदना बुझाए लगलनि, मातृभाषा विरोधी लागए लगलनि (पृ. ५४-५५)। मातृभाषा लेल बुनियादी क्रान्तिक संकेत एहि अंशमे देल गेल अछि। सुदर्शनजीक हृदयमे क्रान्तिक आगिएना धधकै छनि जे बीचहि सभामे निर्मलाजीसँ बहस क' लेलनि--नइं निरमल दीदी!...शान्तिक कविता नइं, मात्रा क्रान्ति हमरा सभकें चाही, आन्दोलन चाही(पृ. ५३)।... एहि छोट सन उपन्यासमे ततेक बातक
संकेत देल गेल अछि, जे सूइक नोक बराबरि फाँक कतहु नहि देखाइत अछि। वस्तुतः सन् १९४७सँ १९६७ धरिक समय मिथिला लेल विचित्रा सन छल। स्वातन्त्रयोत्तर कालक भारतीय परिदृश्यमे मैथिल, मैथिली आ मिथिला ठकमूड़ी लगा क' बैसल छल। मिथिलाक जे सेनानी, सब किछु छोड़ि संग्रामक सिपाही बनल छल, तकरा पमरियाक तेसर बूझल जाए लागल, ओकर कोनो मानि-मोजर नहि देल जाइ छल। मिथिलाक जे व्यक्ति शासनमे गेल, से नंगरडोलाओन धन भ' गेल। ओकरा लेल मातृभाषा मैथिलीक उपेक्षा कोनो अर्थें उद्वेलनक विषय नहि छल। भाषाक महत्वसँ ओ परिचित नहि छल। ओहेन आत्मकेन्द्रित जन प्रतिनिधि मातृभाषा आ जनपदीय संस्कृति लेल कोन संघर्ष करितए?... स्वातन्त्रयोत्तर कालीन तीन दशकक मैथिली रचनाकारकें ई सब किछु भारी बोझ जकाँ निमाहए आ सँवारए पड़लनि। स्थानीय रूढ़ि निपटानक जटिल दायित्वसँ संघर्ष करैत भाषाई जागरूकता उत्पन्न करबामे, आ आन्दोलनक छद्मसँ सर्वसाधारणकें सावधान करबामे...तल्लीन रहब बड़ दुर्वह काज छल। आन्दोलन उपन्यास ताहि क्रममे महत्वपूर्ण भूमिका निमाहने अछि।
भुवनजी एहि उपन्यासक अत्यन्त उदार, निविष्ट आ सहज चरित्राक पात्रा छथि। उपन्यासक मुखर पक्ष थिक आन्दोलन, तकर नायक इएह छथि। मुदा, जें कि आत्मकथात्मक शैलीमे ई उपन्यास लिखल गेल आ कथावाचक कमलजी भ' गेलाह, भुवनजी गौण पड़ि गेल छथि।
बहुत रोचक ढंगें उपन्यासकार भुवनजीक चरित्रा ठाढ़ केने छथि--धीर, गम्भीर, शान्त, उदार।... कलकत्ताक पैघ कम्पनीमे कानूनी सहायक आ व्यापार संचालक छथि। मुदा मातृभाषाक प्रति प्रबल अनुराग छनि। मैथिल समिति आ मैथिली पत्रिाका लेल समर्पित व्यक्ति छथि, परोपकारी छथि, मैथिल लोकनि लेल बेस सहायक लोक छथि। ट्राम, बस, फैक्ट्रीमे सय-दू सय मैथिलकें नौकरी दिऔने छथि (पृ. ३४)। नीलू सन अनाथ बालिकाकें बेटी जकाँ रखने छथि (पृ. १४)। बेस बुझनुक, चिन्तनशील, युगीन परिस्थितिसँ आ परिस्थितिजन्य क्रिया-कलापसँ नीक जकाँ परिचित छथि। कमलजी जखन कोनो बात पर प्रतिवाद करै छथिन, तँ भुवन जी कहै छथि -- ई राजनीति थिकै कमलजी, एहिमे उचित-अनुचितक कोनो गप नहि कएल जा सकइए। मिथिला-आन्दोलनक लेल एखन एकटा नेता हमरा सबकें चाही, नामक नेता। जे सभामे गरजि सकए, शासक वर्गक आगाँ धुरझाड़ अंग्रेजी, हिन्दी, बंग्ला, फारसी चिकरि सकए। लोककें आतंकित क' सकए, एकटा बिहाड़ि सौंसे देशमे उठा सकए।... असली काज त' हम सब करबइ।... बिहाड़िमे उड़ैत ख'ढ़मे चिनगी त' हम सब लगेबइ (पृ. १५)। मातृभाषा आ जन्मभूमिक प्रति एहि तरहें समर्पित लोक, आन्दोलनकें सफल करबा लेल सफल मार्गक ज्ञाता, नीति-कुशल लोक, भुवनजीक नजरिमे कोनो पैघ काज लेल योजनापूर्वक काज करबाक परिदृश्य एना रचल जाइत अछि। एहेन निविष्ट आ नीतिज्ञ पुरुषक पत्नी महान कुरूपा, नितान्त अव्यवहारिक छथिन। समस्त भव्य छविक अछैत जीवन-परिदृश्यक एक खण्ड बेरंग छनि, मलीन छनि, श्रीहीन छनि। एहेन पत्नी संग कोनो सभा सोसाइटीमे नहि जा सकै छथि। कोनो सभ्य व्यक्तिक चौपालमे नहि बैसि सकै छथि...। भुवनजी सन विशिष्ट आ विराट व्यक्तित्व संग उठबा-बैसबाक लिलसा निर्मला सन सुशिक्षित, सुदर्शन, उद्धत यौवना स्त्रीकें होइ छनि। एहेन उदार देह आ उदार मोनक जवान स्त्रीक प्रति जँ भुवनजी सन परिस्थितिक लोक अनुरक्त होइ छथि, तँ से सहज सम्भाव्य थिक। मुदा अही बीच निर्मलाजीक परिचय कमलजीसँ होइ छनि आ निर्मला आब पुरान गाछक डारिसँ उड़ि कए नव डारि पर बैसए चाहै छथि, कमलजी दिश हुनकर अनुरक्ति बढ़ि जाइ छनि। भुवनजीकें ई बात पसिन नहि छनि, मुदा से व्यक्त नहि करए चाहै छथि। नहि चाहै छथि, मुदा व्यक्त भ' जाइ छनि (पृ. ४५)। वार्तालापक ई चमत्कार रोचक अछि।... वस्तुतः प्रेम, प्रतिष्ठा, ऐश्वर्यक मार्गमे प्रतिद्वन्द्वी ठाढ़ हैब बड़ दुखदायी होइत अछि। एहि दृश्यक विकट-जटिल मनोविज्ञानक ओझराहटिकें जाहि सहजतासँ राजकमल चौधरी टिपने छथि, से रोमांचक अछि।
सकल मैथिल समाजमे चर्चा अछि, जे निर्मलाजी भुवनजीक प्रेयसी छथिन, ताही आकर्षणमे भुवनजी हुनकर बासा पर जाएब आएब करै छथि। मुदा भुवनजी ई व्यक्त नहि होअए देताह, प्रतिष्ठाक प्रश्न अछि। लोकक मुँह बन्द करबा लेल भुवनजी निर्मलासँ दूरी बढ़ा लेताह, से नहि हेतनि। स्त्री देहक उदार छाहरिक प्रश्न अछि। कोनो आन पुरुखक संगति निर्मलाकें भेटनि, से भुवनजीकें पसिन नहि, मुदा कोना रोकथिन, ओ हुनकर पत्नी नहि छथिन, घोषित प्रेमिको नहि। कमलजीक सोझाँ, जे हुनकर बड़ सम्मान करै छथिन, नांगट कोना हेताह?
अइ उपन्यासमे सर्वाधिक जटिल व्यवस्था हिनकहि चरित्रा-चित्राणमे अछि। विवाद, तनाव, दाम्पत्य, प्रतिष्ठा, प्रभुत्व, भय, उदारता, वैराट्य... सब किछु मिला कए विचित्रा सन स्थिति बनैत अछि। एक दिशा पकड़ि कए जाइत रहू, हुनका नीक आ कि बेजाए साबित करैत रहू, जाइत-जाइत ओहिमे दोसर दृश्य आबि कए पहिलुक सूत्रा ओकरा देत। आन पात्राक संग से स्थिति नहि होइत अछि। कने-मने नीलूक चरित्रा-चित्राणमे सेहो इएह बात अछि।
कमलजी अइ उपन्यासक नस-नसमे समाएल छथि। कथावाचक हेबाक कारणें आन पात्रा लोकनिक चरित्रा पर टिप्पणियो करैत गेलाह अछि, मुदा हिनका सम्बन्धमे हिनकर टिप्पणी, उद्घोषणा, वक्तव्य, वार्तालाप आ आचरणे टा विश्लेषण आ मूल्यांकनक आधार बनि सकैत अछि। बेस पढ़ल-लिखल, आधुनिक विचारधारा, स्वच्छन्द चिन्तन पद्धति, प्रचुर प्रतिभा सम्पन्न बेरोजगार मैथिल युवक छथि। साहित्यिक संस्कारक सृजनशील आ सांसारिक युग चक्रक सूक्ष्मतासँ परिचित व्यक्ति छथि। छद्म, पाखण्ड, द्वेष-दुविधासँ परहेज छनि। क्षुधा, यौन-पिपासा आ आत्मसुरक्षाकें मनुष्यक मूल प्रवृत्ति मानै छथि। बुझनुक, वाक्चतुर आ जिम्मेदार लोक छथि। ट्यूशन क' कए भाउज, भतीजीक जीवन-यापन, लालन-पालनक चिन्ता रखै छथि। सामाजिक रीति-कुरीति, द्वेष-दुविधा, लोभ-ईर्ष्या, जीह-जाँघ-पेटक कामनासँ परिचित छथि। प्रतिभा आ वाक्चातुर्यक बलें महानगरमे अधिकांश लोकक नजरिमे सम्मानपूर्वक बसल छथि। निर्मला सन कामातुरा युवती हुनका पर लहालोट होइ छथि, नीलू सन किशोरी समर्पित हेबा लेल तत्पर छनि, मुदा उचितानुचितक ज्ञानसँ परिपूर्ण कमलजी नीलूक कौमार्य भंग नहि करै छथि। स्त्री-पुरुषक अतिरिक्त निकटता कखनहुँ कोनो परिस्थितिमे परिणत भ' जा सकैत अछि--ताहि अन्देशासँ कमलजी परिचित छथि, तें नीलू आ अपना बीच भाइ-बहिनक लक्ष्मण रेखा घीचि दै छथि।
नारी शोषणक प्रति रोष छनि, स्त्री दमनक प्रति आक्रोश छनि, देह व्यापार क' कए गुजर-बसर करै वाली सुशीला सन स्त्रीक अन्तर्कथा सुनि कए मोन घोर भ' जाइ छनि। कामेच्छा तृप्त करबा लेल अनेक पुरुख कोरमे नांगट होइत अर्थ-सम्पन्न स्त्री निर्मला, आ पारिवारिक भरण-पोषण हेतु असंख्य कामुक राक्षसक उत्तेजना शान्त करैवाली विपन्न स्त्री सुशीलाक तुलनात्मक विश्लेषण करए लगै छथि (पृ. ३७-३९)।
छोट वयसमे, जखन विवाहक अर्थो नहि बूझै छलाह, स्त्री पुरुष सम्बन्धक ज्ञानो नहि छलनि, तखनहि अपन भाउजक बहिन गुलाबसँ विवाह करबाक इच्छा व्यक्त केलनि (पृ २८); सम्पूर्ण उपन्यासक जीवनमे भुवनजी सन निविष्ट, प्रतिष्ठित आ गम्भीर लोकक प्रति कोनहु आक्षेप अथवा आधार नहिओ रहैत, निर्मलाजी सन पथभ्रमित स्त्रीक प्रति हुनकर अनुरक्ति (पृ. ४५); स्वकीया होइतहु अनेक परिस्थितिवश निर्मलाजी परकीया बनि जएबाक घटना (पृ. ३८-४०), नीलू पर विष्णुदेव ठाकुरक वासनात्मक दृष्टि (पृ. १६)...अइ तरहक कतोक प्रकरणसँ उपन्यासमे कथावाचक स्पष्ट करै छथि जे भूख, वासना आ सुरक्षाभाव मानव जीवनक अपरिहार्य आवश्यकता थिक, अइ अपरिहार्यताक अपवाद कमलजी स्वयं सेहो नहि छथि, जकर संकेत अपन वक्तव्य आ आचरणसँ दैत रहलाह। ई परिदृश्य एक दिश उपन्यासक आधार कथ्यकें मजगुत करैत अछि तँ दोसर दिश कमलजीक वैचारिक दुनियाँ आ दृढ़ मान्यताक प्रमाण दैत अछि।
आन्दोलनक स्त्री पात्राक कैक कोटि अछि-- समय-चक्र आ समाज व्यवस्थाक चाँगुरमे विवश; कामोन्मादमे मातल, मदोन्मत्त; किशोरकालीन उद्वेगमे बहकल, मुदा किछु-किछु सावधान। एहिमे एक वर्गक स्त्री छथि बनगाम वाली आ सुशीला। बनगामवाली जीवन संग्रामसँ लड़बा लेल स्त्री देहक सौदा करै छथि, सौदाक प्रबन्धन, दलाली; दस पाँच स्त्री रखै छथि, अपना घरमे जगह, सुविधा, सुरक्षा दै छथिन, व्यापार चलै छनि, तकर कमीशनसँ हुनकर जीवन-यापन होइ छनि; दुनियाँक आन कोनहुँ परिस्थिति, परिवेश, आर्थिक-सामजिक-राजनीतिक-नैतिक घटना-कुघटनासँ हुनका कोनहुँ सरोकार नहि छनि। गँहिकी अबैत रहए, पाइ लेल परपुरुष गमन हेतु सहर्ष तैयार स्त्रीक संख्या हुनका ओतए बढ़ैत रहए, एहिसँ पैघ बात, प्रसन्नताक बात हुनका लेल किछु नहि थिक। सुशीला रोजगारक अनुसन्धानमे बौआइत पिताक सन्तान थिकीह, जिनका अपन माइए अइ काज लेल प्रेरित केलकनि आ माइ संगे ओ विभिन्न वेश्यालयमे जाए लगलीह। जीवन-यापन हेतु आओर कोनो आधार बचल नहि छलनि (पृ. ३६-३९)।
दोसर वर्गक प्रतिनिधित्व करै छथि-- निर्मलाजी। जेना कि कहल भेल जे कोनहु व्यक्तिक आचारण, ओकर मनोवेगसँ संचालित होइत अछि, आ मनोवेगक मानसिक अवस्थिति व्यक्तिकें प्रदत्त सर्वांगीण वातावरणमे निर्मित आ निर्देशित होइत अछि। निर्मला, हेम बाबूक पुत्री छथि, हेम बाबू कमाऊ लोक छथि, महिनबारी दरमाहा अबै छनि, ओहि दरमाहाक लार-चार, संचय-निस्तार करबाक दायित्व अथवा अधिकार निर्मलाजीकें छनि--कोनो तरहक सामाजिक आँकुश अथवा आर्थिक दबावमे नहि रहै छथि। अन्न-वस्त्रा आ सामाजिक सुरक्षाक कोनो समस्या नहि छनि। मुदा दैहिक उत्ताप छनि, जगजियार बनल रहबाक आकांक्षा छनि, सबहक आँखिमे बसल रहबाक लिप्सा छनि। विधुर पिताक दरमाहा, आ परदेशी पति द्वारा पठाओल मनीयाडरक महाबलसँ निर्मलाजी मैथिल समिति द्वारा आयोजित जनसभामे अपनाकें शो-केसक मूर्त्ति जकाँ सजा क' प्रस्तुत करै छथि। अपन भाषण, भू्र-विलास, अधरक लाली, कुटिल कटाक्ष, रति-सुरति, अंग-संचालनसँ लोकक मोन मोहैत रहै छथि आ लोकक प्रशंसाक पात्रा बनल रहै छथि। हिनका सुशीला जकाँ बनगाम बालीक
खोलीमे खाट नहि ओछब' पडै छनि, नित्य प्रति आ अनेक बेर अनेक कामुक पुरुष संग व्याभिचार नहि करए पड़ै छनि। काज दुनू एके रंग करै छथि, मुदा, जें कि सुशीला लेल देह पूँजी छनि, तें हुनकर करतब व्यभिचार कहल गेल आ जें कि निर्मला लेल देह प्रसाद छनि, तें हुनकर करतब आचार भेल। सुशीला जकाँ जँ निर्मलोजी बेरोजगार पिताक बेटी रहितथि, दायित्वक बोझ तर दाबल रहितथि, दू साँझक नोन रोटी जुटएबा लेल, दू बीत वस्त्राखण्ड अनबा लेल देहक अलावा आन कोनो बाट नहि रहितनि, तँ निर्मला जीक चटक-मटक कतए जइतनि?... ओना आजुक स्त्री विमर्शमे छान-पगहा तोड़निहार वक्तव्यवीर लोकनि एहि चरित्राक प्रति, आ तकर एहि तरहक मूल्यांकनक प्रति अनघोल अवश्य करताह, जे स्त्री, देहसँ बाहरो बहुत किछु होइत अछि।...अवश्य होइत अछि, मुदा कोनो मादक संगीत सुनि पोन पर तबला बजाएब, आ तबला पर तबला बजाएब, दुनू दू बात होइत अछि। निर्मलाजी आ सुशीला जीक चारित्रिाक विश्लेषणमे एहि उपन्यासमे कामुकताक इएह विरोधी स्वरूप, वासनाक इएह विरोधाभास, नारी समुदायक इएह रूप वैविध्य आन्दोलन उपन्यासमे भावककें आन्दोलित करैत अछि।
(अगिला अंकमे जारी)
डॉ.शंभु कुमार सिंह
जन्म : 18 अप्रील 1965 सहरसा जिलाक महिषी प्रखंडक लहुआर गाममे। आरंभिक शिक्षा, गामहिसँ, आइ.ए., बी.ए. (मैथिली सम्मान) एम.ए. मैथिली (स्वर्णपदक प्राप्त) तिलका माँझी भागलपुर विश्वविद्यालय, भागलपुर, बिहार सँ। BET [बिहार पात्रता परीक्षा (NET क समतुल्य) व्याख्याता हेतु उत्तीर्ण, 1995] “मैथिली नाटकक सामाजिक विवर्त्तन” विषय पर पी-एच.डी. वर्ष 2008, तिलका माँ. भा.विश्वविद्यालय, भागलपुर, बिहार सँ। मैथिलीक कतोक प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिका सभमे कविता, कथा, निबंध आदि समय-समय पर प्रकाशित। वर्तमानमे शैक्षिक सलाहकार (मैथिली) राष्ट्रीय अनुवाद मिशन, केन्द्रीय भारतीय भाषा संस्थान, मैसूर-6 मे कार्यरत।
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