विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका · VIDEHA · ISSN 2229-547X

जयकान्त मिश्रपर विशेष

डॉ. गंगेश गुंजन; विद्या मिश्र · 2009-03-01 · अंक 29

जयकान्त मिश्रपर विशेष
१.डॉ. गंगेश गुंजन २. विद्या मिश्र
.डॉ. गंगेश गुंजन
जयकांत बाबूक निध्अन मैथिली-मिथिला आ मैथिलक एक महान पोथीक पुस्तकालयमे सजा देबाक ऐतिहासिक शोकक अवसर जेकाँ थीक। पोथी, अध्याय नहि, पोथी। सम्प्रति तँ बहुत महान क्षति। हुनक मौलिकता मैथिलीक लौकिक एवम शास्त्रीय बुद्धि समंवय आ व्यवहारक अति दूरगामी दृष्टांत बनल। उर्दूक आधुनिक गालिब फिराक गोरखपुरी गर्वोक्ति छनि
"आने वाली नस्लें तुम से रश्क करेंगी हम असरो
जब होगा मालूम उन्हें तुम ने फिराक को देखा है"।
हमरा लोकनिक पीढ़ी जयकांत बाबूक स्नेह शिक्षाक अपन एहि सौभाग्यपर अवश्ये क्रितार्थ बनत। संस्था सेहो मरि जाइत छैक। किताब जीवित रहैत छैक।
कतोक गोटे केँ संभव जे नहियो रुचन्हि हमर ई कथन मुदा हमारा अपन अंतःकरण सँ ई कहि रहल छी जे जयकांत बाबू मैथिलीक आधुनिक वेद छथि!
भाइजी काका- डॉ. जयकान्त मिश्रक स्मरण
विद्या मिश्र
हम बहुत छोट रही, भरिसक स्कूलक दिन छल, जखन कखनहु हमर घरमे अंग्रेजीक विद्वान, कवि, मैथिली लेखकक चर्चा होइत रहए, लोक सदिखन डॉ. जयकान्त मिश्रक चरचा करिते रहथि। ओ ओहि समयमे हमर सभसँ पैघ मामाजीक साढ़ू रहथि। नेनपनमे हम मैथिल आर मिथिलाक विकास आ उन्नतिक प्रति हुनकर समर्पण आ साहित्यमे हुनकर योगदानसँ बड्ड प्रभावित रही। ओ हमरा लेल आदर्श रहथि..प्रशंसा करी आ सदैव हुनकासँ भेंट करबाक आ देखबाक लेल लालायित रही।
हम अपन स्नातक विज्ञानक द्वितीय वर्षमे रही जहिया डॉ. जयकान्त मिश्रक सभसँ छोट बेटा अपन पितियौतक घरपर धनबाद आएल रहथि। आ हमर बाबूजी तहिया ओतहि पदस्थापित रहथि, से ओ सभ हमरो सभक अहिठाम भेँट करबाक लेल आएलाह। हमरासँ भेँट कएलाक बाद, गप कएलाक बाद ओ हमर बाबूजीसँ कहलन्हि...अहाँ किए नहि हमर पितियौत हेमकान्त मिश्रसँ बिन्नी (हम) क विवाहलेल प्रस्ताव अनैत छी। आ एतए देखू.. हमर डैड हुनका सभ लग प्रस्ताव रखैत छथि आ एक मासक भीतरे हम हेमक संग विवाहित भऽ जाइत छी।
जखन हम सुनलहुँ जे हमर विवाह डॉ. जयकान्त मिश्रक भातिजक संग होमए जा रहल अछि..हम बड्ड प्रसन्न भेलहुँ आ शीघ्रहि हुनकर संग हमर सम्बन्ध परिवर्तित भऽ गेल किएक तँ हम आब ओहि परिवारक पुतोहु रही, विद्वान आ लेखकक परिवारक।
हम डॉ. हरिवंश राय बच्चनसँ बहुत नजदीक रही, पत्राचार माध्यमसँ, हुनकर परामर्श अवसरपर भेटए आ पारस्परिक रुचि हमरा सभ बाँटी। ओना तँ ओ हमरासँ बड्ड पैघ रहथि मुदा तैयो हमरा सभ एक दोसारासँ गप बाँटी आ एक-दोसराक चिन्ता करी, से हम हुनका कहलहुँ जे अहाँ प्रसन्न होएब जे हम इलाहाबादक डॉ. जयकान्त मिश्रक भातिजक संग विवाहित होमए जा रहल छी। हमरा जवाब भेटल जे हमर विवाह एकटा विद्वानक परिवारमे होमए जा रहल अछि, ई वैह छथि जिनका हम इलाहाबाद विश्वविद्यालयक अंग्रेजीक विभागाध्यक्षक अपन प्रभार देने रहियन्हि आ ओ सर्वदा हमरा अपन गुरु मानैत छथि। आ हुनकर पिता डॉ. उमेश मिश्रकेँ हम अपन गुरु मानैत छियन्हि। ओहि परिवारक ओ जे प्रशंसात्मक वर्णन कएलन्हि से आह्लादकारी रहए आ तकरा सोचैत एखनो हम उत्फुल्लित भऽ जाइत छी।
हम सभ १९९९ ई. मे संयुक्त राज्य अमेरिकामे बसि गेलहुँ मुदा हमरा सभक हृदय, आत्मा आ मस्तिष्क सर्वदा इलाहाबादमे रहैत छी आ त्रिवेणीपर भेल सभ कर्मकेँ अनुभव करैत छी हमरा सभ ओ सभ छोट-छीन काज करैत छी जे परिवारक प्रति आदर आ प्रेमक भाग अछि। हुनकर समर्पण, परम्परा, सरलता आ संस्कृतिक प्रति लगाव अनुकरणीय अछि। हम सभ हुनकर परिवारक मुखिया, गुरु आ भाइजी काकाक रूपमे क्षति सदैव अनुभव करब। ई परिवार आ समाजक लेल एकटा पैघ क्षति अछि।
होलीक संदेश
डा. चन्‍देश्‍वर शाह
होलीक रंग–अबीरक खेल खेल्बासँ पहिने सम्‍मत जराएब (होलीका दहन) आवश्‍यक होइत छैक । शास्‍त्रीय वर्णन अछि जे भक्‍त प्रह्लादक विष्‍णु भक्‍त्तिसँरुष्‍ट भेल हुनके पिता देवराज हिरण्‍यकश्‍यपु जे स्‍वयं के ईश्‍वर मौनत छल, भक्‍त प्रह्लादकें मारि देवाक लेल अनेक प्रयत्‍न कयलाक बादो जखन असफल होइत गेल तँ अपन बहिन होलिका कें बरदान में प्राप्‍त भेल आगिमे नहि जरएबला चछरिक उपयोग करैत अपन स्‍वार्थ पुरा करबाक लेल प्रह्लाद सहित आगिमे प्रवेश करबाक लेल आज्ञा देलक, भगावनक कृपासँ ओ चछरि अपन प्रभावसं प्रह्लादक रक्षा कएलक आ होलिका ओही आगिमे भष्‍म भऽगेल । एही प्रकारसँ होलिकाक अवसानपर लोक खुशी मनौलक जे एखन एकटा पर्वक रुपमे समाजमे विद्यमान अघि । एहि पर्वक प्रसंग मे इएह कथा सम्‍पूर्ण नहि अछि, आनो कतेक कथा एहि प्रसंगमे कहल जाइत अछि तथापि एहि कथाक प्रचार आन कथासँ आधिक अछि ।
होली पर्वक एहि कथासँ अपना अपना बुद्धि विवेक अनुरुप अनेक तरहक संंदेश ग्रहण कएल जा सकैत अछि । जेना आसुरी प्रवृतिक होलिका जे समाजकें अपन स्‍वाभाव अनुरुप अनेक तरहक कष्‍ट दैत छलैक, तकर मृत्‍यु भेला पर लोक खुशी मनौलक । अर्थात जे किओ व्‍यक्‍ति समाजमे अन्‍याय अत्‍याचार करत, समाजक लोक तत्‍काल यदि विरोध नहियो करैत छैक तँ तकर ई मतलब नहि छैक जे ओ समाज ओकर अत्‍याचार सहर्ष स्‍वीकार करैत छैक । दोसर बात जे अन्‍यायी, अत्‍याचारीकेँ अकाल मृत्‍य प्राप्‍त होइत छैक । यदि होलिका प्रह्लादकेँ आगिमे जरएवाक लेल उद्यत नहि होइत तँ अकालमे ओकर मृत्‍य नहि होइतैक । तेसर बात जे एहि कथाक मुख्‍य पात्र हिरण्‍यकश्‍यपु जे अपन धन बलसँ प्राप्‍त सुख भोगसँ एतेक माति गेल छल जे ओकरा बुझाइत छलैक जे धनक बलसँ सब किछु सम्‍भव छैक, ईश्‍वरकेँ एहि सेँ बेसी की प्राप्‍त छैक, जे हमरा प्राप्‍त नहि अछि । जखन सब तरहक सामर्थ्‍य हमरा प्राप्‍त अछि तखन ईश्‍वर हमरासेँ पैघ नहि अछि, हमहीँ ईश्‍वर छी । ओ ईश्‍वरीय सत्ताक विरोध कैरत गेल आ अन्‍तमे ओकर की दशा भ.ेलैक से सवकेँ बुम�ले अछि । अर्थात् अहंकारीक अहम् सबदिन नहि रहैत छैक । चारिम बात ईश्‍वरीय शक्ति अथवा आशीर्वाद जँ ककरो प्राप्‍त होइत छैक तँ ओकर उपयोग जनकल्‍याणमें करबाक चाही नहि कि जनविरोधी कार्यमें । होलिका केँ जे चहरि बरदानमे प्राप्‍त भेल छलैक ओहिसेँ आगि ओकरा लेल संतापक बस्‍तु नहि छलैक, परन्‍तु जखन होलिका एकर प्रयोग दोसराक जान लेवाक लेल कयलक तै ओकर अपने जान चलि गेलैक । एहि तरहेँ होलिका आओर प्रह्लादक अग्‍नि प्रवेशक सन्‍दर्भमे जे कथा प्रचलित अछि ताहिसेँ अनेको संदेश ग्रहण कएल जा सकैत अघि ।
होलीक कथा प्रसँगकेँ ध्‍यानमे राखि ओहिसँ सँदेश ग्रहण करैत अपना जीवनमे सफलता प्राप्‍तिक लेल सबकेँ सचेत रहबाक चाहि । जेना होली मनएबाक प्रसंग अछि जे होलीसँ पहिलका राति मे सम्‍मत् जराओल जाएत । सम्‍मत् जरएबाक लेल लकडी–काठीक जरुरत होइत छैक, ई लकडी–काठी कानो एक व्‍यक्ति नहि दैत छैक । होलीक सम्‍मत् जरएबाक लेल टोलक किछ सक्रिय व्‍यक्‍ति कतहुकतहु सँ लोकक लकडी–काठी अथवा ओइने चीज उठा कऽ चुप्‍पे अनैत अछि । यदि किओ ककरो घर बनएबाक लेल कतौ राखल लकडी लाबी कऽजरा दैत छैक, चाहे एक गोटाक बहुत लकडी–काठी लऽ अबैत छैक तँ ओकर समाजमे केहन प्रभाव हैतैक ताहि पर ध्‍यान देबाक चाहि । तहिना होलीक दिन पर्वक दिन छैक । नीक भोजनक नामपर यदि किओ ऋण करैत अछि अथवा मस्‍तिक नामपर भाँग धथुर, दारु–तारीक अधिक प्रयोग करैत अछि, त ओकर प्रतिफल सबके देखल नहियो हएत त सुनल जरुर हएत, तेँ सचेत रहव सबहक लेल कल्‍याणकारी बात छैक । तहिना रंग–अबीर खेलबाक नामपर किओ अलकतरा त किओ इनामेल सनक रंगक प्रयोग कऽ बहादुरी वा मस्‍ती करैत अछि तेँ प्रयोग कयनिहारक मस्‍ती आ ओही सेँ प्रभावित व्‍यक्‍तिक तकलीफ कोन अधिक छैक से तराजू पर नहि जोखल जा सकत, एकटा अनुभव करबाक लेल नीक भावना रहल हृदयक जरुरत छैक । यदि किओ कोनो बिमार, व्‍यक्तिकेँ बलपूर्वक रंंग अबीर लगा कऽ ओकर रोग बढा दैत छैक अथवा एहने कोनो अप्रिय काज भाँगक जोश के करैत अछि तँ ओकरा नीक किओ नहि कहतैक । अर्थात कोनो काज करबाक लेल सीमाक भीतर काज सम्‍पन्‍न करब बुद्धिमानी छैक ।
सब तरहक बन्‍धन, बाधा व्‍यवधान रहितहुँ जेना लोककेँ अपन लक्ष्‍यपर आगू बढब आवश्‍यक होइत छैक, तहिना अपन संस्‍कृति परम्‍पराक रक्षा आ निरन्‍तरता देब सेँहो दायित्‍व बनैत छैक । एहने अवस्‍थाक मार्गदर्शन महाकवि विद्यापतिक एकटा गीतमे अछि—
आजु नाथ एक व्रत महासुख लागत हे
तोँहेँ शिव धरु नटवेश नाँच देखाबहु हे ।
पार्वतीक एहि आग्रहपर महादेव अपन बात करैत छथिन्‍ह जे जौं नाँचब तँ शिरक गंगाक धार बहि जाएत धरती जलमग्‍न भऽ जेतैक, गलाक सर्प चारु दिस जहिँ तहिँ भऽ जाएत अनर्थ भऽ जेतैक । एहिसँ अनेक व्‍यवधानक सुनबैत छथिन्‍ह । इ सबटा बात सत्‍य छै, एहन सम्‍भव छलैक मुद्दा ओही गीतक अंतिम पँक्‍तिमे विद्यापति लिखने छथि जे ‘राखल गौराक मान कि नाँच देखावल हे ।’ अर्थात हमरा सभक क्रियाकलाप बुद्धिमानी पूर्वक अपन आ समाजक हितमे होयबाक चाहि । होली पर्वसेँ सबके ई सन्‍देश ग्रहण करबाक चाहि ।

Suggested citation: डॉ. गंगेश गुंजन; विद्या मिश्र. “जयकान्त मिश्रपर विशेष.” Videha — First Maithili Fortnightly eJournal, issue 29, 2009-03-01. https://www.videha.co.in/research/2009/29/जयकान्त-मिश्रपर-विशेष.htm

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