राजकमल चौधरी का रचनाकर्म (आलोचना), जमाना बदल गया, सोना बाबू का यार, पहचान (हिन्दी कहानी), अभिधा (हिन्दी कविता-संग्रह), हाथी चलए बजार (कथा-संग्रह)।
सम्पादन: प्रतिनिधि कहानियाँ: राजकमल चौधरी, अग्निस्नान एवं अन्य उपन्यास (राजकमल चौधरी), पत्थर के नीचे दबे हुए हाथ (राजकमल की कहानियाँ), विचित्रा (राजकमल चौधरी की अप्रकाशित कविताएँ), साँझक गाछ (राजकमल चौधरी की मैथिली कहानियाँ), राजकमल चौधरी की चुनी हुई कहानियाँ, बन्द कमरे मे कब्रगाह (राजकमल की कहानियाँ), शवयात्रा के बाद देहशुद्धि, ऑडिट रिपोर्ट (राजकमल चौधरी की कविताएँ), बर्फ और सफेद कब्र पर एक फूल, उत्तर आधुनिकता कुछ विचार, सद्भाव मिशन (पत्रिका)क किछि अंकक सम्पादन, उदाहरण (मैथिली कथा संग्रह संपादन)।
बटुआमे बिहाड़ि आ बिर्ड़ो
(राजकमल चौधरीक उपन्यास)
सुशीलाजी जें कि आर्थिक रूपें समृद्ध आ निश्चिन्त छथि, आकर्षक
परिधान पहिरबाक क्षमता आ उन्मादक देहक स्वामिनी छथि, आइ भुवनजी, काल्हि
कमलजी, परसू केओ आओर... रंग-विरंगक स्वादमे मस्त रहै छथि। सभा-सोसाइटीमे,
बुद्धिजीवी लोकनिक बीचमे अपन उपस्थिति बनौने राखए चाहै छथि, प्रतिष्ठित आ
विद्वान लोकनिक नयनतारा बनल रहए चाहै छथि, तें ज्ञान नहिओ रहैत साहित्य,
कला, संस्कृति आ मिथिला-मैथिलीक प्रगतिगामी आन्दोलनसँ जुड़ल रहए चाहै
छथि; स्वस्थ आ सम्पूर्ण पुरुषक सान्निध्य हुनका लेल बड़ पैघ बात थिक। मदिरतम
मुस्कान, भू्र-भंगिमा, रति-सुरतिक प्रभावें विद्वत जनक आँखिमे बसल रहब हुनकर
नेत छनि (पृ. 39-40)। सुशीलाक राति आ निर्मलाक राितमे इएह अन्तर अछि आ
इएह समानता।...वस्तुतः सुशीला आ निर्मला, दुनू दू वर्ग स्त्राी छथि। एक गोटे प्राण
रक्षा लेल, नोन-रोटी लेल, अपन आ परिवारक क्षुधा मेटएबा लेल, स्वयं निष्काम
बनि दोसरक कामोत्तेजना शान्त करबाक साधन बनै छथि; दोसरक यौन-पिपासाक
शमन करै छथि; तँ दोसर यौन-पिपासासँ व्याकुल भेल दोसराकें पीबि जएबा लेल
उताहुल रहै छथि; नित नव-नव माछ पर जाल फेकै छथि।--निर्मला जी छथि
सभा-सोसाइटीक प्रेमिका। पुरुख-समाजमे गेला बिना नीक नहि लगै छनि। मैथिल
समितिक द्वारा ई भुवनजीक सम्पर्कमे अएलीह, आ भुवनजीक द्वारा मैथिल समितिक
सम्पर्कमे। आ भुवनजी हिनका अपनामे लपेट लेलथिन। निर्मलाजीकें ई गप्प अध्
ालाह नहि लगलनि। आब त’ सौंसे समाजकें बूझल छै जो ओ भुवन जीक प्रेयसी
छथि। हेम बाबूकें सेहो बूझल छनि। हेम बाबूक जमायकें सेहो खबरि छनि। ओ
बेचारा तँ लाजें कलकत्ता अबितो नहिएँ...(आन्दोलन/पृ. 39)।
विचारणीय विषय इहो थिक जे अर्थाभावे टा मानव जीवनक मूल समस्या
नहि होइत अछि। यौन-तृप्ति लेल विवाहेटासँ निश्चिन्त नहि भेल जा सकैत अछि।
निर्मलाजी तकरहि उदाहरण थिकीह, हुनका सन बिआहलि स्त्राी; विधुर पिता आ
परदेशी पतिक संयुक्त कमाइ पर एकछत्रा अधिकार रखनिहारि स्त्राीक ई आचरण कथी
लेल?
नीलूक चरित्रा अपेक्षाकृत बेसी व्याख्येय आ विश्लेषणपरक अछि। ओ
अनाथ छथि, मुदा भुवनजी सन निविष्ट व्यक्तिक छत्राछायामे लालन-पालन भेलनि।
जन्महिसँ महानगरमे छथि, मुदा महानगरीय अपसंस्कृतिक असरि हुनकर आचरण
पर नहि छनि। मैथिल संस्कार आ सभ्यतासँ परिपूर्ण छथि। वाक्चातुर्य, साहस,
शालीनता, प्रगतिकामना, रूढ़ि द्रोहसँ सम्पन्न तेरह-चैदह बर्खक किशोरी छथि।
अतिथि सत्कारमे पटु, काँचहि उम्रमे लोक-समाज आ देश-दुनियाँकें चिन्हबाक
क्षमतासँ परिपूर्ण, कोनहुँ परिस्थितिमे कोनहुँ व्यक्तिक समक्ष अपन बात निडरतासँ
रखबाक स्पष्टता छनि। विष्णुदेव ठाकुरकें ठाँय-पठाँय लोफर कहि देलनि (पृ. 16)।
नीलू भावुक छथि, कमलजीकें कमल भैया एहि लेल नहि कहती जे हुनकर
एकटा कमल भैया टी.बी. रोगसँ मरि गेलनि (पृ. 22-33)। कमलजीक जेबी आ
मनीबेग टेबैत रहै छथि, छोट हेबाक अधिकार मँगै छथि (पृ. 32)। घरमे एकाकी
जीवन व्यतीत करैत अकच्छ छथि आ कमलजीकें कहै छथि जे अहाँकें तँ हमरा दिश
तकबाक पलखति नहि होइए (पृ. 47-48)। निर्मलासँ कमलजीक हेम-क्षेम नीलूकें
नीक नइं लगै छनि (पृ. 48)। कमलजीसँ नीलूक हेम-क्षेम भुवनजीकें सन्देहास्पद
लगै छनि (पृ. 49)। कमलजी नीलूक करतब पर संशकित रहै छथि (पृ. 48)।
नीलूकें होइत रहै छनि जे ओ दिन राति कमलजी लग बैसल रहथि। राति कए
अर्द्धनग्न अवस्थामे कमलजीक ओछाओन धरि पहुँच जाइ छथि (पृ. 50-51)।
सम्पूर्ण कथामे नीलूक करतबकें एकटा ‘पाठ’ बूझि जँ एहि पर विचार-विमर्श हो, तँ
सब किछु झलफल बुझाइत अछि। कमलजी आ भुवनजीक शंका, नीलूक ईष्र्या,
बहिन-भाइक सम्बोधन, यौन-पिपासाक दैहिक आवश्यकता अथवा मनोवेग-उद्वेग
अथवा काम-युद्ध लेल उन्मादित योद्धा, आन्हर राक्षस...सब किछु गड्ड मड्ड भ’
जाइत अछि। कखनहुँ त’ मानवीय मनोवेगक सहजात चरित्रा लगैत अछि कखनहुँ
घनघोर रहस्यमय। सर्वगुण सम्पन्न किशोरी नीलूक यौनोन्माद हुनका समस्त नैतिकता,
मर्यादा, वर्जना आ सम्बन्ध-सम्बोधनक सीमासँ मुक्त क’ दै छनि। मनौन लेल
घिघियाइत कमलजीक समस्त प्रस्तावकें नकारैत साफे-साफ कहै छथि जे लोक किछु
कहए, हमरा नइं रहल जाइए, अहाँ हमरासँ विवाह क’ लिअ’ (पृ. 51)। मनोवेग आ
कामोत्तेजनाक खौंतकें एहि उपन्यासमे मानवीय प्रवृत्तिक रूपमे जतेक स्पष्टता आ
वैविध्यसँ व्याख्यातित कएल गेल अछि, ताहिसँ प्रमाणित होइत अछि जे सत्ते
यौनोन्मादमे गाय धरि बाघिन भ’ जाइत अछि। स्थापित मर्यादाक अधीन तृप्तिक
बाट साफ भेल तँ भेल, नहि भेल तँ उद्वेग लेल कोनहुँ सीमा, कोनहुँ मर्यादाक
अनुपालन काम्य नहि थिक। समस्त नायक-नायिका एवं सहयोगी पात्राक जीवन-प्रक्रिया,
रहन-सहन आदिक वर्णन एतए अत्यन्त स्वाभाविक ढंगें भेल अछि।
एकटा गौण स्त्राी पात्रा छथि कमलजीक भौजी। कमलजी अपन प्रवासक
श्रेय हिनके दै छथि। भौजी कहलकनि--गामक जीवन अहाँकें सहल नहि जाएत।
सहलो जाएत तँ... गामक लोक निन्दा करत। कहत, घरमे विधवा भौजी छथिन, तें
ई नौकरी छोड़ि गाममे बैसल अछि...(पृ. 13)। अइ वक्तव्यमे सेहो मानवीय वृत्तिक
सहज आशंका अछि--समाजक मोनमे संशय हेबाक आशंका, अपने मोनक सम्भावना
पर आशंका, कमलजीक धारणा पर आशंका...। आगि आ ख’ढ़ एक ठाँ रहत,
जानि नहि कहिआ की भ’ जाएत! ‘भौजी’ मैथिल समाजक अथवा मैथिल नारीक
विचित्रा उदाहरण थिकीह। जीवनक भार, सन्तानक भार, मर्यादाक भार, देहक भार,
समाजवृन्दक मोनमे उठैत कल्पनाक भार... मिथिलाक कोनो विधवा स्त्राीक जीवन
कोन तरहें, तरुआरिक धार पर चलबा लेल विवश रहैत अछि, तकरा उपन्यासकार
मात्रा एक वक्तव्यमे स्पष्ट क’ देने छथि।
सम्पूर्ण सृष्टिमे दू टा अभिकरण महत्वपूर्ण अछि -- एकटा समाज व्यवस्था, जाहिमे
राजनीति, समाजनीति, अर्थनीति, मूल्यनीति आदिक मर्यादा, कानून-कायदा आ
सीमा शर्त अबैत अछि; आ जकर प्रतिनिधित्व अइ उपन्यासमे मैथिल समिति द्वारा
चलाओल आन्दोलन थिक। एहि आन्दोलनमे सब किओ अपन-अपन पैरुख-प्रतिभाक
अनुकूल अपन-अपन महत्व साबित करए चाहै छथि, स’क भरि जे क’ पबै छथि,
करै छथि, तृप्त अथवा कुण्ठित होइ छथि; निन्दा-शिकायत, च’र-चुगलखोरी, ईष्र्या-द्वेषमे
लिप्त रहै छथि। अपन हैसियत लेल हरदम अत्यानुमान आ अदना लेल न्यूनानुमानक
धारणासँ ग्रस्त रहै छथि। मैथिल समितिक क्रिया-कलापकें जँ प्रतीक अर्थमे ली तँ
सम्पूर्ण भारतीय समाज व्यवस्थाक गुण-सूत्रा एहिमे भेटि सकैत अछि। दोसर अभिकरण
थिक मानवीय मनोवेगक सन्धान व्यवस्था। सत्य तँ ई थिक जे एकर कोनो व्यवस्था
नहि होइत अछि, कोनो स्थापित आ शाश्वत व्यवस्थासँ ई संचालित नहि होइत
अछि। व्यक्ति-व्यक्तिक क्षण विशेषक मनोवेग अलग-अलग व्यवस्था विधान निर्मित
करैत अछि। रोटी, सेक्स, सुरक्षाक आवश्यकता पूर कर’ लेल कखन कोन व्यक्ति
की करत, तकर पूर्वानुमान असम्भव अछि। कैक कोटिक स्त्राी पुरुषक मनोवेगक
विश्लेषण आ चित्राणसँ एहि उपन्यासकें जाहि तरहें समृद्ध कएल गेल अछि; से
विवेकशील रचना पाठ प्रक्रियाक माँग करैत अछि। ताहि आधार पर ई कहबामे
कोनो संकोच नहि हेबाक चाही जे भारतीय नागरिकक जीवन-व्यवस्थाकें गम्भीरतासँ
रेखांकित करबा लेल ई छोट सन वृतान्तक कथा, भारतीय साहित्यक अपूर्व निधि
थिक, निदर्शिका थिक।
तुलनात्मक रूपें देखी तँ आदिकथाक देवकान्त आ आन्दोलनक कमलजीमे विराट
अन्तर अछि। देवकान्त मर्यादा आ मनोवेगमे सामंजस्य स्थापित नहि क’ पबै छथि।
दुनू स्थितिक संघर्षक ज्वालामे स्वयंकें भस्म करैत रहै छथि। मुदा कमलजी बेसी
सहज छथि। नैतिकता आ मर्यादाक रक्षा करबामे कतहु कोनो हूसल डेग नहि उठबै
छथि; काम-तृप्ति हेतु समर्पित नीलूकें अपना कोठलीसँ आपस तँ क’ दै छथि, मुदा
मनोवेगकें मारि कए अपनाकें प्रतारित नहि करै छथि। चल जाइ छथि राति
बेच’बाली सुशीला नामधारी स्त्राीक खाट पर। ई दीगर बात थिक जे ओतएसँ दोसर
मनोवेग बेसाहि अनै छथि।... दुनू नायकक दू परिदृश्य, दू जीवन, दू बाट, दू सीमा
अछि। आन्दोलन, जीवन-संग्राममे तल्लीन मैथिल नागरिकक चारित्रिक विश्लेषण,
सामाजिक-राजनीतिक पर्यवस्थितिक कोलाज थिक, वृत्तान्त थिक; तँ आदिकथा
सामन्ती संस्कारक कोखिमे पुष्पित-विकसित विकृति आ मानवेतर भाषा, व्यवहार,
व्यवस्थादिक कुत्सित स्वरूपक गाथा। आन्दोलनक नीलूक उन्माद वयसोचित आचरण
थिक, अजोह वयसक एकटा कन्याक क्षणिक उद्वेग थिक; ओहिमे ने तँ दुतरफा
प्रेमादर्शक कोनो रूपाकृति अछि, ने वासनात्मक भूखक कोनो नियोजित अवधारणा।
ओहिमे कोनो स्वस्थ, सुविचारित सोच आ दूरगामी चिन्तनशीलताक कोनो आशा
नहि कएल जा सकै अछि; सम्भवतः तें ओकरा बुझ-सुझा क’ बाट धराएब आसान
छल। मुदा आदिकथाक सुशीला परिपक्व, प्रौढ़ आ प्रगल्भ स्त्राी छथि। कुलीन
घरानाक एहि विवाहित आ अतृप्तकामा नायिकासँ हिनकर स्वस्थ मानसिकता, तीव्र
मनोवेग आ ठोस निर्णयक उमेद कएल जा सकैत अछि। हिनकर प्रेम निवेदनकें
नकारल जा सकै अछि, तिरस्कृत कएल जा सकै अछि, हिनका बुझाओल नहि जा
सकै अछि। नीलूक उन्माद भेल लुत्ती, जकरा सुनगैसँ पूर्वहि मिझाओल गेल; मुदा
सुशीलाक उन्माद भेल दावानल, ओकर मिझाएब असम्भव अछि, ओकर तृप्ति
आवश्यक अछि, ओहिसँ धाह उठब उचित अछि। दोसर बात ई जे नीलूक उद्वेग
एसगर उठल दोसर मिझौलक; मुदा सुशीलाक उद्वेग जखनहि उठल, देवकान्तक
उद्वेगसँ घी-बसात पबैत गेल। दावानल बनि गेल...। दुनू उपन्यासक दू परिदृश्य
अछि, दू पर्यवस्थिति अछि...। तथापि लेखकक जीवन-दृष्टिक अन्तर्धारा सब ठाँ
व्याप्त अछि। दू उपन्यासक दू परिदृश्य आ दू पर्यवस्थितिक नायक छथि--कमलजी
आ देवकान्त। मुदा सब किछु भिन्न रहलाक बादहु नायकक स्वभावमे एतबा साम्य
छनि जे कमलजीक नजरिमे चाह-काॅफीमे दूध, चीनी मिलाएब ओकर कौमार्य नष्ट
करब थिक (आन्दोलन/पृ. 43) दोसर दिश बिना दूध-चीनीक चाह पीब देवकान्तक
प्रवृत्ति भ’ गेल छनि (आदिकथा/पृ. 37)। सामान्य अर्थमे त’ ई अत्यन्त सरलीकृत
आ चलताउ वाक्य लगैत अछि, मुदा गम्भीरतापूर्वक विचार कएला पर, प्रतीक
अर्थमे वस्तु आ विचारक मौलिकता बनौने रखबाक, ओकर दोषादोष संग ओकरा
ग्रहण करबाक ईमानदारी थिक।
विद्वान लोकनि तँ मानिते छथि, पाठकीय दृष्टिकोणसँ सेहो ई प्रमाणित भ’ चुकल
अछि, जे कथोकथन आ वार्तालापसँ कोनहुँ कथाकृतिमे नाटकीयता आ जीवन्तता
अबैत अछि। उपन्यासक स्थितिमे तँ ई सर्वाधिक प्रभावी होइत अछि। कथा विस्तार
आ घटना विकासमे कथोकथन जते बेसी हो, उपन्यास ओतबे जीवन्त हएत। एतबा
धरि अवश्य जे कथोपकथनक सम्वाद, भाषण नहि भ’ जाए, से भेलासँ उपन्यासक
रोचकता आ प्रभाव आहत होइत अछि। हमरा जनैत ओ उपन्यास सर्वाधिक रोचक
आ प्रभावकारी होइत अछि, जकर पात्रा आपसमे बेसी काल गप-शप करैत कथाकें
गति दैत अछि। उपन्यासकारकें कथाभूमिमे जते कम जाए पड़नि, प्रभाव तते बेसी
प्रबल हएत। मुदा ई गप-शप लद्धर नहि हो, से ध्यान राख’क थिक। सम्वादमे
पात्राक मनोभाव आ आचरणक संकेत हो। अर्थात् नाटकीय शैलीक उपन्यास
लिखब एकटा पैघ जोखिमक काज थिक, जे उपन्यासकें संक्षिप्त, दीप्त, रोचक आ
प्रभावकारी बनबैत अछि। ओना एकटा विकराल जोखिम संग लागल रहैत अछि --
कौशलमे कनेको चूक भेल तँ सब गुर गोबर।
एहि मामिलामे राजकमल चैधरीक दुनू उपन्यास--आन्दोलन, आदिकथा--
प्रभूत सफल उपन्यास थिक। दू भिन्न विषय, दू भिन्न मनोभावक उपन्यासमे
कथानककें विस्तार दैत कथोपकथन, घटना विशेषक परिस्थिति आ वातावरण
निर्माणमे अपूर्व सफलता प्राप्त केलक अछि। पात्राक आवेग, प्रेरणा, भावना, घटना
विशेष पर ओकर प्रतिक्रिया आ पारस्परिक प्रभावक झाँकी दुनू उपन्यासक कथोपकथनमे
हरदम देखाइत रहैत अछि। छोट-छोट वाक्य आ कथन खण्डक कारणें ई प्रभाव
आओर रोचक भेल अछि आ उपन्यासमे निखार आएल अछि। आन्दोलनमे सुशीला
सन वेश्यासँ कमलजीक वार्तालाप(पृ. 38-39), निर्मलाजीसँ भेंट-घाँटक मादे कमलजी
आ नीलूक वार्तालाप(पृ. 48), भाषणक रूपमे देल गेल वक्तव्यक अछैत सुदर्शनजीक
स्थिति-चित्रा विवरण(पृ. 51-53), अइ बातक प्रमाण थिक जे छोट-छोट वार्तालापसँ
कोना एकटा वेश्याक दारुण कथा, अथवा कोनो पुरुष दिश अनुरक्त एकटा
युवतीक दोसर स्त्राीसँ ईष्र्याभाव, अथवा कोनो अनैतिक-अवांछित घटनासँ कोनो
युवकक आक्रोशक उद्वेग स्पष्ट होइत अछि; आ कोन वैशिष्ट्यक संग तकर प्रभाव
पडै़त अछि।
आदिकथा यद्यपि वर्णनात्मक शैलीमे लिखल गेल उपन्यास थिक तथापि
वार्तालाप द्वारा पात्राक मनोभाव आ चारित्रिक वैशिष्ट्य एतए अंकित अछि।
राजकमल चैधरीक कथालेखनक ई खास विशिष्टता थिक, जकर समावेश अइ
उपन्यासमे नीक जकाँ भेल अछि। वार्तालापक पश्चात एहि उपन्यासमे कतोक ठाम
उपन्यासकार पात्राक क्रिया, आवेग, मनोदशा आदि पर अपन टिप्पणी दैत आगू बढ़ै
छथि; मुदा से टिप्पणी अपन गसावक कारणें वार्तालापक संयोजक बिन्दु साबित
होइत अछि। प्रथम भेंटक प्रारम्भिक सम्वादमे सुशीला, देवकान्तसँ पूछब शुरुह करै
छथि जे--अहाँ जमीन्दार छी?... आ अन्त करै छथि जे -- अप्पन घर त’ अहाँ हमरा
सबकें द’ देलऊँ, अपने कतए सूतब?...(पृ.34-35)। अइ वार्तालापमे दुनूक अनुरक्तिक
सूक्ष्म विश्लेषण होइत नजरि अबैत अछि। कोनो स्त्राी-पुरुष एक दोसरा दिश कोना
अनुरक्त होइ छथि, अनुरक्तिक उद्भव कोना होइत अछि, संकेत कोना होइत अछि,
दू अपरिचित व्यक्तिक अपरिचित संकेतक जाँच परताल कोना होइत अछि, दुनू
आपसमे कोना खुजैत जाइत अछि... आदिकथाक कथोपकथन एहि समस्त मनोभाव
आ परिस्थितिक वार्तालापक विशिष्ट उदाहरण थिक। विश्लेषणात्मक शैलीमे लिखल
गेल उपन्यासमे, पात्राक मनोविश्लेषणकंे रेखांकित करैबला कथोपकथन, अक्सर
उपन्यासक प्रभावकें उत्कर्ष दैत अछि आ उपन्यासकारक विश्लेषणात्मकताकें गति
आ आलन दैत अछि, से एतए भेल अछि। जखन देवकान्तक माम अनिरुद्ध बाबू
देवकान्तकें मातृकमे किछु दिन आओर रहि जेबाक आग्रह करै छथि, तखन सुशीला
आ देवकान्तक प्रेमाभिव्यक्ति स्पष्ट शब्दमे होइत रहैत अछि, प्रेमिकाक पतिकें सेहो
अर्थ स्पष्ट लगैत रहै छनि, मुदा प्रेमक नहि, मामि-भागिनक मर्यादापूर्ण स्नेहक (पृ.
67-68)। बहुअर्थक कथोपकथनक ई कौशल चमत्कृत करैत अछि। दैनन्दिनक
बोली-बानी, भाषा-संस्कारकें तरासि कए रोचक कथोपकथन बनाएब पैघ कौशलक
बात थिक। राजकमल चैधरीकें भाषा संरचनामे एहि तरहक चमत्कार उत्पन्न
करबाक महारत प्राप्त छनि।
कोनहुँ उपन्यासक कथाक्रम, पात्राक आचरण आ करतब, क्रिया-कलापक
परिणति तथा सामाजिक प्रतिक्रिया आदिक प्रभाव भावक पर तखनहि फलित होइत
अछि, जखन ओकर विश्वसनीयता कायम भ’ सकए। विश्वसनीयता स्थापित नहि
भेला पर कतोक बेर सत्यकथा, फूसि लगैत रहैत अछि, आ तखन पाठक ओकरा
खिस्सा-पिहानी बूझि बहटारि दैत अछि। एहना स्थितिमे साहित्य-सृजनक मूल लक्ष्य
--सामाजिक परिदृश्य संशोधन अथवा मानवीय व्यवस्थाक संस्थापनक पूर्ति नहि भ’
पबैत अछि, ओहेन साहित्य मात्रा मनोरंजन बनि कए रहि जाइत अछि। मनोरंजन
कथा साहित्य लेल आवश्यक अवश्य अछि, मुदा ओ साधन थिक, साध्य नहि।
कोनहुँ कथा साहित्य लेल मनोरंजन एतबे अर्थ रखैत अछि, जे पाठक ओकरा
आश्रयमे रचनासँ आद्योपान्त जुड़ल रहए। कथा साहित्यक असल उद्देश्य समाप्तिक
पश्चात शुरुह होइत अछि, जखन ओकर प्रभाव भावकक मोनमे चलैत रहैत अछि।.
..एहि स्थिति लेल कथाक्रमक विश्वसनीयता प्रमुख तत्व थिक। अविश्वसनीय
कथासूत्रा कोनहुँ पाठकक चेतनाकें झकझोड़ि नहि सकैत अछि। तें हरेक घटनाक्रम
लेल, चरित्रा चित्राण लेल, देश-काल-वातावरणक व्यवस्थित स्वरूपक निरूपण आवश्यक
अछि। कोनहुँ पात्राक आचरण, करतब, मनोवेग, क्रिया-कलाप, कथोपकथन आदिक
स्वाभाविकता सुनिश्चित करबा लेल वातावरण, देश, काल आदिक औचित्यक
सूचना आवश्यक होइत अछि। निर्मलाजीक कामोन्माद, अनेक पुरुष संग
घुमबा-फिरबाक प्रवृत्ति कलकत्ताक परिवेशमे मात्रा चर्चाक विषय थिक, मिथिलाक
कोनो गाममे ई घटना होइत, तँ आगि लागि जइतए। मुदा इंगलैण्ड-अमेरिकामे एहेन
किछु नहि होइतए। ठीक तहिना, नीलूक विवाह लेल हुनकर आश्रयदाता ब’र तकै
छथि, कमलजी संगे हेम-क्षेम देखि चिन्तित होइ छथि; मुदा पाश्चात्य देशमे ई बात
अप्रासंगिक होइतए। एम.ए. पास युवक कमलजी मिथिलाक कोनो गाम, कोनो
टोलमे ट्यूशनकें अपन जीविका नहि बना सकितथि। कतबो पढ़ल-लिखल होथु,
कोनो युवती ग्रामीण परिवेशमे सभा-सोसाइटीमे उठब-बैसब नहि क’ सकितए।
पाश्चात्य संस्कृतिमे अनिरुद्ध बाबू कतबो उच्च कुलशीलक होइतथि, कतबो
सम्पत्तिशाली होइतथि, सुशीला सन उद्दाम जवानीक स्त्राी बियाहि क’ घर नहि
अनितथि; कदाचित अबियो जैतनि तँ ओ कुलानन्द सन समवस्की युवकक मातृत्व
नहि स्वीकारितथि, अपन यौन तुष्टि लेल कखनहुँ कोनो देवकान्त, अथवा कुलानन्दक
बाँहि ध’ लितथि। कुलानन्दक स्त्राी हुनकर अत्याचार नहि सहितनि; हरिनगरबालीक
चैताली नहि चलितनि...।
वातावरण निर्माण लेल सेहो आलोच्य समाजक सभ्यता, संस्कृति,
आचार-विचार, व्यवहार, रीति-रिवाज, वेश-भूषा, सामाजिक परिवेश भौगोलिक आबोहवा,
प्राकृतिक परिस्थिति...सब किछु उत्तरदायी होइत अछि। कोन परिवेश, कोन वातावरणसँ
प्रभावित भ’ कए कोन कालमे आदिकथाक सोना मामी देवकान्त पर अनुरक्त होइ
छथि, रुष्ट होइ छथि; कोन रीति रिवाजक कारणें कुलानन्द संगे रहबा लेल विवश
होइ छथि, कोन कारणें हुनकासँ घृणा होइ छनि, कखन आ किऐ हफीम खा लै छथि,
हरिनगरवाली पर किऐ तामस उठै छनि; आन्दोलनक नीलू कोन संस्कार आ
सास्कृतिक अनदानक कारणें कोन समयमे कमलजीक स्वागत करै छथि, आदर करै
छथि, प्रेम करए लगै छथि, सर्वस्व अर्पित करए चल जाइ छथि; कोन समयमे
निर्मलाक शांतिगीतक प्रस्ताव अनर्गल साबित होइत अछि; कोन परिस्थितिमे
आन्दोलनक सुशीला बनगाम बालीक शरणमे जाइ छथि; निर्मला भुवनजीक संग
छोड़ि कमलजी दिश लपकै छथि... एहि समस्त प्रश्नक उत्तर देश-काल-वातावरणसँ
देल जाइत अछि। कोनो घटना खास भौगोलिक परिवेशक खास परिस्थिति आ खास
समयमे घटित भ’ कए अर्थवान अथवा अर्थहीन होइत अछि। कोनहुँ पात्राक
मनोदशा अथवा क्रिया-कलाप स्थान-काल-पात्रा आ वातावरणक अनुसार स्थिर आ
परिवत्र्तनशील होइत अछि। उपन्यासक कथाक्रममे एकर बड़ महत्व होइत अछि। से
राजकमल चैधरीक एहि दुनू उपन्यासमे सहजतासँ रूपायित अछि।
चित्राकलासँ राजकमल चैधरीकें बड़ बेसी अनुराग रहलनि अछि। कतोक
बेर मित्रा लोकनिकें पत्रा लिखैत अपन किछु धारणा चित्रामे अभिव्यक्त केलनि अछि,
किछु कविता, चित्राक संग लिखने छथि। इएह कारण थिक जे हुनकर कथा, कविता,
उपन्यासमे कतोक ठाम पढ़बासँ बेसी कोनो मनोरम अथवा मार्मिक अथवा हृदय
विदारक पेंटिंग देखबाक अनुभव होइत रहैत अछि, अर्थबहुल आ संकेतबहुल पेंटिंग
देखबाक अनुभव -- शरदक पवित्रा आकाशमे श्वेत तनु चन्द्रमा उगल छल। कती
राति बीतल होएत, किछु ज्ञात नहि। हमर मोन अपन गाम दिश भागि चलल।
चरखा काटि कए गुजर करैबाली माइ, बदरिकाश्रम-केदारनाथ-अमरनाथ जएबाक
मनोरथ जकर पूर नइं भ’ सकलइ... आ हम दू बेर सुमेरु पर्वत आ तिब्बतक
अन्तिम सिमान धरि भ’ आएल छी। हमर अग्रज गामक हाई स्कूलमे गणितक
अध्यापक छलाह... अपन पेट काटि कए हमरा एम.ए. पास करौलनि... गाममे
महामारीक उत्पात भेल, टन्नसँ रहि गेलाह। आब विधवा भौजी छथि, सोन-सन
हुनकर कन्या छनि आ चारू कात भूख, दरिद्रता, संक्रामक बीमारी सभक जाल
पसरल अछि... भौजी हमरा संगें नइं रहै छथि, समाजक भयसँ... आ हम बिआह नइं
करै छी... (आन्दोलन/पृ. 21)।
एहि छोट सन स्थिति-चित्रामे उपन्यासकार कैक बर्खक समय, कैक
मनोभाव आ स्वप्नखण्डक वितान, कैक मनोवृत्ति आ व्यवस्था-मर्यादा-दायित्वक
बन्धन आ कैक विवशताक दारुण विडम्बनाकें जीवन्त क’ देने छथि। एतेक छोट
चित्रामे विराट परिदृश्यक समावेश कोनो कलाकारक श्रेष्ठ कौशल आ गम्भीर
जीवन-दृष्टिक परिचायक थिक। अहिना आदिकथा उपन्यासमे--अहाँ देवबाबूक संगें
सुलतानगंजक जल-मन्दिर देख आउ। हम नइं जा सकब। कैकटा मोकदमाक
कागज-पत्रा तैयार करबाक अछि...।...सुलतानगंजमे गंगाक बीच धारामे अछि प्रसिद्ध
अजगैबीनाथ महादेवक प्राचीनतम मन्दिर।...भागिन आ मामी नाह किराया क’ कए
मन्दिर पर अएलाह। भोरक आठ-नौ बजल हएत। सूर्यक किरण जाद्दवीक जल पर
सतरंग चित्रा बना रहल छल।...अकारणे खिलखिलाइत, सुशीला पुछलथिन--महादेवसँ
की वरदान मँगबैन?...की कहबैन? लाज किऐ होइ’ए...?...तावत तीन-चारि टा
पण्डा हिनका सबकें धनीक कुलशीलक दम्पति बूझि कए संग भ’ गेलनि...(आदिकथा
पृ. 44-46) ...स्थिति चित्राक एहि तरहक उत्कर्ष चमत्कृत करैत अछि। शब्द, कथन,
आ वाक्यांशक अर्थ कैक परतमे कैक तरहक व्यंजना दैत रहैत अछि। सन्तुलित आ
संयमित कौशलसँ देश-काल-वातावरणक चित्रांकन सर्वथा, सर्वदा कोनो रचनाकें
विराट आ शाश्वत साबित करैत रहल अछि, से राजकमल चैधरीक हरेक रचनामे
भेटैत अछि।
वस्तुतः राजकमल चैधरी बहुविधावादी रचनाकार छथि। अंग्रेजी आ
बांग्लामे त’ सब विधामे रचना नहि केलनि मुदा मैथिली आ हिन्दीमे ओ सब विध्
ाामे रचना केलनि। विवेचक लोकनिमे बड़ बेसी विवाद अछि, किओ हुनका
सफलतम कवि, किओ कथाकार, किओ उपन्यासकार, किओ निबन्धकार मानै
छथि। हमरा जनैत, राजकमल चैधरीकें मूलतः कवि माननिहार लोकक धारणा ई
रहैत हेतनि, जे हुनकर भाषा-शिल्प मूलतः कविताक शिल्प थिकनि। सम्पूर्ण गद्य,
एते धरि जे डायरी आ पत्रा धरिमे कविताक लय भरल रहैत अछि। ई बात
उल्लिखित समस्त उदाहरणहुँसँ प्रमाणित कएल जा सकैत अछि। छोट सन वाक्य
खण्ड लिखि कए विराट व्यंजना दिश संकेत क’ दै छथि, आ तखनहिसँ पाठक/भावक
दोहरी विचार-व्यवस्था संग वेगमयी जलधारामे बहैत चल जाइत अछि। जखनहि
पाठक--भौजी (विधवा) हमरासंगें नहि रहै छथि, समाजक भयसँ...अथवा...महादेवसँ
की...कहबैन?लाज किऐ होइए...? ... सन उद्धरण देखै छथि, एक टा कथा ओ पढ़ैत
रहै छथि, आ एक टा कथा हुनका भीतर सेहो जनमैत जाइत अछि। दू कथाधाराक
विकास एक संग होइत जाइत अछि, कखनहुँ समानान्तर, कखनहुँ ओझराइत,
कखनहुँ स्पष्ट होइ...राजकमल चैधरीक गद्यक ई विशेष छटा थिक। मानव जीवनक
पारस्परिक सम्बन्धक विचार, भावना, आवेग, प्रेरणा आदिकें अभिव्यक्ति दै वला
महत्वपूर्ण विधा, आ महत्वपूर्ण रचनामे तकर उपयोग करैत गेल छथि।
मैथिली समस्याक टोह लैत कथा-संकलन: उदाहरण
पछिला चारि बर्खमे कोनो पैघ आ महत्वपूर्ण प्रकाशनसँ मैथिलीक तीन गोट
कथा-संकलनक प्रकाशन मैथिली भाषा लेल एकटा शुभ-संकेत मानल जा
सकै’छ। नेशनल बुक ट्रस्टसँ प्रकाशित शिवशंकर श्रीनिवास द्वारा सम्पादित
मैथिली कथा संचयन(सन् 2005) आ सन् 2007मे तारानन्द वियोगी द्वारा
सम्पादित देसिल बयना(सन् 2007) पाठकक बीच लोकप्रिय भ’ए रहल छल कि
प्रकाशन विभागसँ देवशंकर नवीन द्वारा सम्पादित टटका मैथिली कथा-संग्रह
उदाहरण छपि क’ आबि गेल। प्रसन्नताक बात थिक जे उदाहरणक प्रकाशनसँ
प्रकाशन विभागमे साहित्यिक रचनाक प्रकाशनक बाट फूजल, जे स्वागत योग्य
अछि।
उदाहरणमे ललितसँ सियाराम सरस धरिकक कुल छत्तीस गोट कथा
संकलित अछि। एहि संकलनसँ मैथिली कथा-संसारक परिदृश्य स्पष्ट होइत
अछि। संकलनक कतोक कथा समस्त भारतीय भाषासँ कान्ही मिलान लेल
तत्पर अछि, जे संकलनकत्र्ताक चयनकौशलक सूचक थिक। श्रेष्ठ कथाकार
राजकमल चैधरीक कथा ‘एकटा चम्पाकली एकटा विषधर’ घाघ मैथिल समाजक
टोप-टहंकारकें अद्भुत रूपें अनावृत्त करैत अछि। सवर्ण मैथिलक गरीबी, ओहि
गरीबीसँ उत्पन्न दयनीयता, आ तकर खोलमे दुबकल बेटीक शातिर माइ-बापक
घिनौन आचरण घनघोर तनावक संग पाठककें झकझोरैत अछि। दशरथ झा आ
हुनकर घरबाली अपन तेरह बर्खक बेटी चम्पाक विवाह बासैठ बर्खक वृद्ध शशि
बाबू संग करेबाक षड्यंत्रापूर्ण योजना बनबैत अछि। दुनू प्राणीक गिद्ध दृष्टि
शशि बाबूक सम्पति पर टिकल छनि, जकर मलिकाइन विवाहोपरान्त हुनक तेरह
वर्षीया चम्पा बनैबाली छनि। अतिशयोक्ति सन लगैबला एहि घटनाक मर्मकें
ओएह बूझि सकत जे मिथिलांचलक बहुविवाह प्रथासँ नीक जकाँ परिचित छथि।
बीसम-एकैसम विवाहक बाद पति अपन पूर्व पत्नी सभक मुँहो बिसरि जाइ
छलाह।
पत्राकारिता दुनियाक महत्वपूर्ण आ सम्वेदनशील पक्षसँ मायानन्द मिश्रक
कथा ‘भए प्रकट कृपाला’ साक्षात्कार करबैत अछि। मीडिया-तन्त्रा पर बनल
सार्थक हिन्दी सिनेमा ‘पेज थ्री’ जे किओ देखने छथि, से एहि कथाक मर्मकें बेसी
नीक जकाँ बुझि सकै छथि। शीघ्रतासँ नामी पत्राकार बनि जाएबाक हड़बड़ीकें
कथामे कलात्मक ढंगसँ एकेरल गेल अछि। काॅरपोरेट दुनियाँक बादशाह श्याम
बोगलाक मृत्युक खबरि सबसँ पहिने देबाक होड़ लागल अछि। पत्राकार लोकनिक
नजरिमे ओएह सभसँ पैघ खबर अछि, दुनियामे किछु भ’ जाउ।
लिलीरे मैथिलीक सशक्त कथालेखिक छथि। हुनकर कथा ‘विधिक
विधान’मे कामकाजी स्त्राीक संघर्षकें यथार्थतः देखबाक, आ यथार्थक मर्मकें
कलात्मक कौंध संग उभारबाक सफल चेष्टा अछि। उषाकिरण खान अपन कथा
‘त्यागपत्रा’मे ग्रामीण युवतीक अदम्य जिजीविषाकें व्यक्त करबामे पूर्ण सफल
नहि भ’ सकलीह। घोर आदर्शवादी आ कठोर अनुशासित परिवारमे पालित-पोषित
चम्पा काॅलेजमे पढ़’ चाहैत अछि, अपन मर्जीसँ विवाह कर’ चाहैत अछि। मुदा
आजीवन विवाह नहि करबाक घोषणा करैत चम्पा स्वयंकें ओही परंपराक
केंचुलमे समेटि लैत अछि। चम्पा विवाहक लक्ष्मण रेखा पार करैत ‘और भी ग़म
हैं’ कें आधार मानि अपन व्यक्तित्वकंे विस्तृत आयाम नहि द’ पबैत अछि।
मनमोहन झाक कया ‘फयदा’मे स्त्राी जातिक मोलभाव बला प्रवृत्तिक रेखांकन
खूब जमल अछि, मुदा वो एहि प्रवृत्तिक वर्णन क’ स्त्राी जाति कोन पक्षक
उद्घाटन करै छथि, से बूझब कठिन। कोनो व्यक्तिक स्वभावमे नीक आ खराब
दूनू भाव रहैत अछि। कथाक हेतु कोन तरहक भावक चुनाव कयल जाए, ई
महत्वपूर्ण अछि। इएह चुनाव मैथिली कथामे स्त्राी चेतनाक दर्शन करा सकैत
अछि।
स्त्राी चेतनाक दृष्टिएं प्रदीप बिहारीक कथा ‘मकड़ी’ अपेक्षाकृत मेच्योर्ड
आ बोल्ड कथा कहल जा सकैछ। बेराबेरी कथानायिका सुनीता दू बेर विवाह
करैत अछि, दुनू बेर ओकर पति मरि जाइछ, मुदा ओ जिनगीसँ हारि नहि मानैत
अछि। सिलाई मशीन चला क’ ओ गुजर-बसर करैत अछि। एतबे नहि, ओ
एकटा अनाथ आ बौक बच्चाक लालन-पालनक दायित्व ल’ क’ अपन व्यक्तित्वकें
विस्तार दैत अछि। कथामे मोड़ तखन अबैत अछि जखन ओ बौका समर्थ भेला
पर सुनीताक स्वीकृतियेसँ सही, ओकरा गर्भाधान क’ क’ भागि जाइत अछि।
सुनीताकें एहि बातक अपराधबोध नहि छै, जे ओ बौका संग किऐ ई कृत्य
केलक, ओ देहक विवशतासँ परिचित अछि, मुदा बौकाक भागि जेबाक दंश
ओकरा व्यथित करै छै। देवशंकर नवीनक कथा ‘पेंपी’ पति-पत्नीक सम्बन्ध
विच्छेदक परिणामस्वरूप बेटीक मनोमस्तिष्क आ व्यक्तित्व पर पड़ैबला कुप्रभाव
आ बेहिसाब उपेक्षाभावकें करुणापूर्ण ढंगसँ व्यक्त करैत अछि। मुदा एहिमे
सभटा दोष स्त्राी पर फेकि देब पूर्वाग्रह मानल जा सकैछ। ई सामाजिक सत्य नहि
भ’ सकैत अछि। वरिष्ठ कथाकार राजमोहन झा अत्यंत कुशलतापूर्वक ‘भोजन’
कथाक बहन्ने स्त्राीक बाहर काज करबाक विरोध क’ जाइत छथि। राजमोहनजीक
दक्षता इएह छन्हि जे ई सभ बात कहिओ क’ ओ प्रगतिशील बनल रहै छथि।
राजकमल चैधरीक ‘एकटा चम्पाकली एकटा विषधर’, धूमकेतुक
‘भरदुतिया’, गंगेश गुंजनक ‘अपन समांग’(ई कथा देसिल बयनामे सेहो संकलित
अछि), तारानन्द वियोगीक ‘पन्द्रह अगस्त सन्तानबे’ आ अशोकक ‘तानपूरा’
एहि संग्रहक श्रेष्ठ कथा मानल जा सकैछ। धूमकेतुक कथा ‘भरदुतिया’ व्यक्ति
स्वार्थ हेतु भाई-बहिनक पावन पाबनिक दुरुपयोग करबैत देखबैत अछि। आजुक
मनुख अहू पाबनिकंे नहि छोड़लक। ‘पन्द्रह अगस्त सन्तानबे’ वियोगीक सफल
राजनीतिक कथा कहल जा सकैछ। कथाक ई निष्पति एकदम ठीक लगैत अछि
जे सवर्णक पार्टी एहि दुआरे जीतैत रहल जे निम्नजातिक आर्थिक स्थित बहुत
खराब छल। स्वामीक पार्टी दासोक पार्टी होइछ। दोसर पार्टीक मादे सोचब
मृत्युकें आमन्त्राण देब छल। आओर नइं किछु त’ आवास आ रोजगार छीनि
बेलल्ला बना देब उच्चवर्गक हेतु बाम हाथक काज छल। दिल्ली-पंजाब प्रवासँ
निम्नवर्गक आर्थिक, सामाजिक स्थितिमे सुधार भेल। परिणामस्वरूप ओहि वर्गमे
आत्मसम्मान आ राजनीतिक चेतनाक अंकुरण भेल। भक्तिकाव्यक उन्मेष आ
ओहिमे निम्नजातिक कविक बाहुल्यक पृष्ठभूमिमे सुप्रसिद्ध इतिहाकार इरफमान
हबीब मुगलकालीन विकास कार्यकें लक्षित केलनि अछि। ‘पन्द्रह अगस्त सन्तानबे’
कथाक विलक्षणता बिहारमे बनल निम्नजातिक पार्टीक आत्मालोचन थिक।
कहबा लेल त’ ई पार्टी निम्नजातिक-निम्नवर्गक छल, मुदा अइ पार्टीमे छल,
प्रपंच, भ्रष्टाचार, अपराध आओर पाखण्ड पहिनहुँसँ तेजगर और धारदार भ’ गेल
छल। कथाकारक इएह द्वन्द्व कथाकें गरिमा प्रदान करैछ। चाहक दोकान
चलबैबला मुदा बहुत प्रारम्भहिसँ सक्रिय मूल्यपरक राजनीति करैबला हीरा
महतोक धैर्य जखन संग छोड़ि दै छनि त’ ओ पार्टी प्रमुख बासुदेव महतो पर
बिफरैत कहै छथि-- रे निर्लज्जा, एतबो सरम कर! जे कुकर्म करै छैं से अपन
करैत रह, लेकिन एना समाजमे नइं कहिए जे कुकर्मे करब ठीक छिऐ। एतबो
रहम कर बहिं...।’’
अशोकक कथा ‘तानपूरा’ मध्यवर्गीय हिप्पोक्रेसीक घटाटोपकें तार-तार
क’ देबामे पूर्ण सफल भेल अछि। बिना कोनो उपदेश आ नैतिक आग्रहक कथा
मध्यवर्गीय कुत्सित मानसिकताक दुर्ग भेदन करैत अछि। कथानायक विनोद
बाबूक संगीत-प्रेमकें हुनक पिता घोर अभाव आ द्ररिद््रयक बीच जेना-तेना पूरा
करैत छथि, मुदा जखन विनोद बाबूक पुत्रा संगीत सिखबाक इच्छा प्रकट करै
छनि त’ दुनू प्राणीकें साँप सूँघि जाइत छनि। एहि दुआरे नहि, जे हुनका कोनो
तरहक अभाव छनि। बल्कि एहि दुआरे जे संगीतक स’ख हुनक बेटाकें रुपैया
कमबैबला मशीन नहि बना सकत। जे दम्पति कोनो विषय पर कहियो एकमत
नहि भेल, एहि विषय पर एकमत भ’ पुत्राक एहि अव्यावहारिक स’ख’क केठ
मोंकबाक साजिशपूर्ण योजना बनबए लगै छथि।
संग्रहक किछु कथा जेना अवकाश, अयना, खान साहेब, जंगलक हरीन
आदि यथार्थक मोहमे शुष्क गद्य बनि क’ रहि गेल अछि। एहिमे किछु कथा
ततेक सरलीकृत भ’ गेल अछि जे ओ नवसाक्षर हेतु लिखल कथा बुझि पडै़छ।
एहन कथा सभक मूल संरचना इतिवृत्तात्मक अछि। यद्यपि इतिवृत्त कोनो
कथाक सीमा नहि होइछ, मुदा जखन कोनो कथा घटनाक स्थूल आ तथ्यात्मक
विवरण टा दैछ, कथामे समय वा क्षणक मर्म नहि आबि पबैछ, त’ एहन इतिवृत्त
निपट गद्य बनि क’ रहि जाइछ। यथार्थ कोनो कथाकें विश्वसनीयता देबाक
बदलामे ओकरा भीतरसँ संवेदना निचोड़ि अनैत अछि, कथाकें प्रमाणिक बनेबाक
फेरमे पड़ल नहि रहैत अछि। कथाकार रमेश अपन कथा ‘नागदेसमे अयनाक
व्यवसाय’मे अतियथार्थ आ इतिवृत्तक फ्रेमकें तोड़ि प्रतीक वा फैंटेसीक प्रयोगसँ
कथा बुनबाक प्रयास त’ केलनि, मुदा कथाक विन्यासमे एकरसता आबि गेल।
एहि फ्रेम हेतु हमरा लोकनिकें राजस्थानी कथाकार विजयदान देथा(दुविधा) आ
हिन्दी कथाकार उदय प्रकाश (वारेन हेस्टिंग्स का सांढ़) आदिकें पढ़बाक चाही।
हिनका लोकनिक कथा यथार्थक फ्रेमकें तोड़ियो क’ यथार्थ बनल रहल अछि।
मैथिलीमे प्रकाशित उक्त तीनूँ कथा संकलनसँ मैथिली कथाक प्रसार
राष्ट्रीय स्तर पर भ’ रहल अछि, एहिमे दू मत नहि। मुदा उक्त संकलनकें पढ़ि
आम पाठकक राय इएह बनत जे मैथिलीमे कुल इएह तीस-चालीस गोट
कथाकार आइ तक भेलाहे। कारण तीनूँ संग्रहमे कथाकारक सूचीमे अद्भुत
साम्य अछि। कथा पढ़ि बुझना जाइछ जे कथा चयनमे कथाक अपेक्षा कथाकारकें
महत्व देल गेल अदि। ई कहब सर्वथा अनुचित जे संकलनक कथाकार महत्वपूर्ण
नहि छथि, मुदा अन्य श्रेष्ठ कथाकें सेहो प्रकाशमे अएबाक प्रयास हेबाक चाही।
हमरा लोकनि ई नीक जकाँ जनै छी जे मैथिलीमे श्रेष्ठ कथाक अभाव नहि
अछि। किन्तु प्रकाशनक अभावमे पत्रा-पत्रिकाकें छानि मारब कठिनाहे नहि
समय-साध्य कार्य थिक। वैद्यनाथ मिश्र यात्राीक पहिचान भने श्रेष्ठ कविक रूपमे
छनि, मुदा हुनकर मैथिली कथा ‘चितकबड़ी इजोरिया’ आ ‘रूपांतर’ कतोक
दृष्टिएं महत्वपूर्ण अछि। रेणुजी सेहो मैथिली कथा लिखलनि अछि। ई दीगर
बात थिक जे बादमे ओ हिन्दिए टामे लिखए लगलाह। ‘नेपथ्य अभिनेता’ आ
‘जहां पमन को गमन नहीं’ आदि लीकसँ हटि क’ लिखल गेल कथा थिक।
‘उदाहरण’मे कथाक प्रकाशन वर्ष आ सन्दर्भक अनुपस्थिति खटकैत अछि।
समय-सीमा जनने बिना कोनो कथाक सम्यक मूल्यांकन सम्भव नहि। नवीनजी
सदृश दक्ष आ अनुभवी सम्पादकसँ ई आशा नहि कएल जा सकै छल। एहि
कमीकें पूरा करैत अछि हुनकर चैदह पृष्ठीय भूमिका। सम्पादक मैथिली कथाक
सीमा आ सम्भावनाक विस्तृत पड़ताल अपन एहि भूमिकामे केलनि अछि।
मैथिली कथाक इतिहासकें बुझबा लेल ई भूमिका निश्चित रूपें रेखांकन योग्य
अछि।
कमलानन्द झा
हिन्दी विभाग
सी.एम. काॅलेज
दरभंगा
फोन-09431857789
06272-256343
पुस्तकक नाम - उदाहरण
सम्पादक - देवशंकर नवीन
प्रकाशक - प्रकाशन विभाग
सूचना और प्रसारण मन्त्रालय
भारत सरकार
पृष्ठ - 274
मूल्य - 200 टाका मात्रा
देवशंकर नवीन
ए-2/198, फेज-5, आयानगर एक्सटेंशन, नई दिल्ली 110047
अदद्दी पेनेनकें मजगुतुत करबाक आवश्यकता
मिथिलाक सांस्कृतिक विरासत तकैत दूर धरि नजरि जाइत अछि, सबसँ पहिने
देखाइत अछि जे उच्च शिक्षा प्राप्त करबाक, गम्भीर चिन्तन-मनन करबाक, छोट-सँ-छोट
बात पर पर्याप्त विचार-विमर्श करैत निर्णय लेबाक प्रथा मिथिलामे पुरातन कालसँ
अबैत रहैत रहल अछि। मुदा तकर अतिरिक्त ‘परसुख देबामे परमसुख’क आनन्द
लेबाक आ जीवनक हरेक आचार एवं आचरणमे लयाश्रित रहबाक अभ्यास मैथिल
जनकें निकेनाँ रहलनि अछि। स्वयं कष्ट सहिओ क’, अपन सब किछु गमाइओ क’,
दोसरकें अधिकसँ अधिक प्रसन्नता देबाक आदति मिथिलामे बड़ पुरान अछि। प्रायः
इएह कारण थिक जे अतिथि सत्कारमे मिथिलाक लोक अपना घरक थाड़ी-लोटा
धरि बन्हकी राखि देलनि। दोसरकें सम्मान देबामे मैथिल नागरिक बढ़ि-चढ़ि कए
आगू रहल अछि। भनसियाक काज कर’बला व्यक्तिकें महराज अथवा महराजिन,
केस-नह-दाढ़ी-मोंछ साफ कर’बला व्यक्तिकें ठाकुर-ठकुराइन, घर-आँगनमे
नौरी-बहिकिरनी आ सोइरी घ’रमे परसौतीक काज करबाब’वाली स्त्राीकें दाय कहि
क’ सम्बोधित करबाक प्रथा मिथिलामे एहने धारणासँ रहल होएत। ध्यान देबाक
थिक जे मिथिलामे दादीकें, जेठ बहिनकें आ घ’रक अत्यधिक दुलारि बेटीकें दाय
कहबाक परम्परा अछि।
अध्ययन, चिन्तन, मननक प्रथा मिथिलामे बड़ पुरान अछि। मुदा ई सत्य
थिक जे अशिक्षेक कारणें मिथिला एतेक पछुआएलो रहल। गनल गूथल जे व्यक्ति
अध्ययनशील भेलाह, से अत्यधिक पढ़लनि, जे नहि पढ़ि सकल, से अपन रोजी-रोटीमे
लागल रहल। रोजी-रोटीक एक मात्रा आधार कृषि छल। विद्वान लोकनिक गम्भीर
बहसमे बैसबाक अथवा ओहिमे हिस्सा लेबाक तर्कशक्ति, बोध-सामथ्र्य, आ पलखति
रहै नहि छलनि, तें जे उपदेश देल जाइन, तकरा आर्ष वाक्य मानि अपन जीवन-यापनमे
मैथिल लोकनि तल्लीन रहै छलाह। ईश भक्तिक प्रथा अहू कारणें मिथिलामे दृढ़
भेल। मानव सभ्यताक इतिहास कहै’ए जे प्रकृति-पूजन, नदी-पहाड़-भूमि-वृक्ष-पशु
आदिक पूजन एहि करणें शुरुह भेल जे प्रारम्भिक कालमे जीवन-रक्षाक आधार इएह
होइत छल। लोक अनुमान लगौलक जे सृष्टिक कारण, स्त्राी-पुरुषक जननांग थिक,
तें ओ लिंग पूजा आ योनि-पूजा शुरुह केलक, जे बादमे शिवलिंग आ कामयोनि
पूजाक रूपमे प्रचलित भेल। बादमे औजार पूजन होअए लागल।... तें पूजा पाठमे
लीन हेबाक प्रथा पुरान अछि। मिथिलामे ओहि समस्त पूजन-पद्धतिक अनुपालन तँ
होइते रहल; पितर पूजा, ग्रामदेव पूजा, ऋतु पूजा, फसल पूजा, कुलदेव-देवी पूजा
आदिक प्रथा बढ़ल। हमरा जनैत विद्वान लोकनि द्वारा ईश भक्तिक उपदेश एहि
लेल देल जाइत रहल हएत जे ईश भक्तिमे लागल लोक धर्म-भयसँ सदाचार अनुपालनमे
लागल रहत, सद्वृत्तिमे लीन रहत, सामाजिक मर्यादाक ध्यान राखत, भुजबल-धनबलक
मदमे निर्बल-निर्धन पर अत्याचार नहि करत।...लक्ष्यपूर्ति त’ नहिएँ भेल, उनटे लोक
धर्मभीरु, पाखण्डी अन्धविश्वासी आ निरन्तर लोभी, स्वार्थी, अत्याचारी होइत गेल,
परिणामस्वरूप आजुक मैथिल-प्रवृत्ति हमरा सभक सोझाँ अछि।
कृषि जीवनसँ समाजक कौटुम्बिक बन्हन एते मजगुत छल, जे भूमिहीनो
व्यक्ति सम्पूर्ण किसानक दर्जा पबै छल। हरेक गाममे सब वृत्तिक लोक रहै छल।
डोम, चमार, नौआ, कुमार, गुआर, धोबि, कुम्हार, कोइरी, बाह्मण, क्षत्राी... आदि
समस्त जातिक उपस्थितिसँ गाम पूरा होइ छल। जमीन्दार लोकनि समस्त भूमिहीनकें
जागीर दै छलाह, बाह्मण पुरहिताइ करै छलाह, नौआ केश कटै छलाह; कुमार
ह’र-फार, चैकी केबाड़ बनबै छलाह; धोबि कपड़ा-बस्तर धोइ छलाह...। सम्पूर्ण
समाज एक परिवार जकाँ चलै छल। सब एक दोसरा लेल जीबै छलाह, सब गोटए
किसान छलाह, कृषि-सभ्यतामे मस्त छलाह।
सिरपंचमी दिनक ह’र-पूजा हो; दसमी, दीया-बाती, सामा-चकेबाक उत्सव
हो; मूड़न-उपनयन-विवाह-श्राद्ध हो; छठि अथवा फगुआ हो... बिना सर्वजातीय,
सर्ववृत्तीय लोकक सहभाग नेने कोनो काज पूर नहि होइ छल। एहिमेसँ बहुत बात
तँ एखनहुँ बाँचल अछि, होइत अछि ओहिना, ओकर ध्येय कतहु लुप्त भ’ गेल
अछि।
मिथिलाक विवाहमे एखनहुँ जा धरि नौआ ब’रक कानमे हुनकर खानदान
लेल गारि नहि देताह (परिहास लेल); धोबिन अपना केस संगें कनियाँक केस धो क’
सोहाग नहि देतीह, विवाह पूर्ण नहि मानल जाइत अछि। ध्यान देबाक थिक जे एहि
तरहें ओहि नौआकें कन्याक पिता आ धोबिनकें कन्याक माइक ओहदा देल जाइत
अछि। मिथिलाक छठि पाबनि तँ अद्भुत रूपें सम्पूर्ण विरासतक रक्षा क’ रहल
अछि। नदीमे ठाढ़ भ’ कए सूर्यकें अर्घ देबाक ई प्रथा जाति-धर्म समभावक सुरक्षा
एना केने अछि जे समाजक कोनहुँ वर्गक सहभागक बिना ई पाबनि पूर्ण नहि
होएत। नेत अइ स’ब टामे एकता आ समानताक सूत्रा स्थापित रखबाक रहैत छल।
ई कलंक स्वातन्त्रयोत्तरकालीन मिथिलाक स्वाधीन मानवक नाम अथवा वैज्ञानिक
विकास, बौद्धिक उन्नति, औद्योगिक प्रगतिक माथ जाइत अछि, जे समस्त विकासक
अछैत मानव-मनमे लोभ-द्रोह, अहंकार एहि तरहें भरलक छूआछूत, जाति-द्वेष,
शोषण-उत्पीड़न बढ़ैत गेल; आ आइ मिथिला-समाज, जे त्याग, बलिदान, प्रेम,
सौहार्द लेल ख्यात छल, सामाकि रूपें खण्ड-खण्ड भेल अछि। पैघसँ पैघ आपदा,
विभीषिका ओकरा एक ठाँ आनि कए, एकमत नहि क’ पबै’ए। मिथलाक उदारता
आ सामाजिकता ई छल जे ककरो बाड़ी-झारीमे अथवा लत्ती-फत्तीमे अथवा
कलम-गाछीमे नव साग-पात, तर-तरकारी, फूल-फल होइ छल तँ सभसँ पहिने
ग्रामदेवक थान पर आ पड़ोसियाक आँगनमे पहुँचाओल जाइ छल; कोनो फसिल
तैयार भेलाक बाद आगों-राशि कोनो परगोत्राीकें देल जाइ छल; खेतमे फसिल कटबा
काल खेतक हरेक टुकड़ीमे एक अंश रखबारकें देल जाइ छल...ई समस्त बात
सामाजिक सम्बन्ध-बन्धक मजगूतीक उदाहरण छल।
कोनो स’र-कुटुमक ओतएसँ कोनो वस्तु सनेसमे आबए, तँ ओ सौंसे
टोलमे लोक बिलहै छल।...कहबा लेल कहि सकै छी जे ई मैथिलजनक जीवनक
नाटकीयता आ प्रशंसा हेतु लोलुपता रहल होएत... मुदा तकर अछैत एहि पद्धति
आ परम्पराक श्रेष्ठता आ सामाजिक मूल्य हेतु एकर आवश्यकतासँ मुँह नहि मोड़ल
जा सकैत अछि। गाममे कोनो बेटीक दुरागसनक दिन तय होइ छल, तँ बेटीक
सासुरसँ आएल मिठाइ भरि गाममे बिलहल जाइ छल। तात्पर्य ई होइ छल जे भरि
गामक लोक बूझि जाए, जे ई बेटी आब अइ गामसँ चल जाएत। ओहि बेटीकें भरि
गामक लोक धन-वित्त-जातिसँ परे, ओहि बेटीकें अपना घ’रमे एक साँझ भोजन
करबै छल। सब किछुक लक्ष्यार्थ गुप्त रहै छल। एकर अर्थ ई छल, जे सम्पूर्ण गाम
अपन-अपन थाड़ी-पीढ़ी देखा कए ओहि बेटीक विवेककंे उद्बुद्ध करै छल जे बेटी!
आब तों ई गाम, ई कुल-वंश छोड़ि आन ठाम जा रहल छह, हमरा लोकनि अपन
शील-संस्कृतिक ज्ञान तोरा देलियहु, सासुर जा कए, ओतुक्का शील-संस्कार देखि
कए अपन विवेकसँ चलिह’, आ अपन गाम, अपन कुल-शीलक प्रतिष्ठा बढ़बिह’।
इएह कारण थिक जे पहिने कोनो बेटीक दुरागमनक दिन पैघ अन्तराल द’ कए तय
होइ छल। मुदा आब ई रिवाज एकटा औपचारिकता बनि कए रहि गेल अछि;
गामक बेटीकें अपन बेटी मानिते के अछि?
मिथिलामे कोनो स्त्राी संगें भैंसुर आ ममिया ससुरक वार्तालाप, भेंट-घाँट
वर्जित रहल अछि, एते धरि जे दुनूमे छूआछूतक प्रथा अछि। आधुनिक सभ्यताक
लोक एकरा पाखण्ड घोषित केलनि। परिस्थिति बदलै छै, त’ मान्यताक सन्दर्भ
बदलि जाइ छै, से भिन्न बात; मुदा एहि प्रथाकें पाखण्ड कहनिहार लोककें ई
बुझबाक थिक जे ई प्रथा एहि लेल छल, जे एहि दुनू सम्बन्धमे समवयस्की हेबाक
सम्भावना बेसी काल रहै छल। संयुक्त परिवारक प्रथा छल, कखनहुँ कोनो अघट
घटि सकै छल। ई वर्जना एकटा शिष्टाचार निर्वहरण हेतु पैघ आधार छल। प्रायः
इएह कारण थिक जे विवाह कालमे घोघट देबा लेल प्राथमिक अधिकार अही दुनू
सम्बन्धीय व्यक्तिकें देल जाइ छनि। जाहि स्त्राीकें केओ भैंसुर अथवा ममिया ससुर
नहि छनि, हुनकहि टा ससुर स्थानीय कोनो आन व्यक्ति घोघट दै छनि। घोघट
देबाक प्रक्रियामे कतेक नैतिक बन्हन रहैत अछि, से देखू, जे सकल समाजक समक्ष
भैंसुर, नव विवाहित भावहुक उघार माथकें नव नूआसँ झाँपै छथि आ बगलमे ठाढ़
ब’र ओहि नूआकें घीचिकए माथ उघारि दैत अछि, ई प्रक्रिया तीन बेर होइत अछि,
अन्तिम बेर माथ झाँपले राखल जाइत अछि। अर्थात्, सकल समाजक सम्मुख ओ
व्यक्ति प्रतिज्ञा करैत अछि--हे शुभे! हम, तोहर भैंसुर (ससुर) प्रण लैत छी, जे जीवन
पर्यन्त तोहर लाजक रक्षा करब! एते धरि जे अग्नि, आकाश, धरती, पवनकें साक्षी
राखि जे व्यक्ति तोरा संग विवाह केलकहु अछि, सेहो जखन तोहर लाज पर
आक्रमण करतहु, हम तोहर रक्षा लेल तैयार रहब!
अही तरहें उपनयनमे आचार्य, बह्मा, केस नेनिहारि, भीख देनिहारि, डोम,
चमार, नौआ, धोबि, कमार, कुम्हार आदिक भागीदारी; आ एहने कोनो आन उत्सव,
संस्कारमे सामूहिक भागीदारी सामाजिक अनुबन्धक तार्किक आधार देखबैत अछि।
कहबी अछि जे मैथिल भोजन भट्ट होइ छथि। अइ कहबीक त’हमे जाइ
तँ ओतहु एकर सांस्कृतिक, पारम्परकि सूत्रा भेटल। मिथिलाक स्त्राी, खाहे ओ कोनहु
जाति-वर्गक होथि, तीक्ष्ण प्रतिभाक स्वामिनी होइत रहल छथि। मुदा परदा प्रथाक
कारणें हुनकर पैर भनसा घरसँ ल’ क’ अँगनाक डेरही धरि बान्हल रहै छलनि।
अधिकांश समय भनसे घरमे बितब’ पड़नि। सृजनशील प्रतिभा निश्चिन्त बैस’ नहि
दैन। की करितथि! भोजनक विन्यासमे अपन समय आ प्रतिभा लगब’ लगलथि।
आइयो भोजनक जतेक विन्यास, तीमन-तरकारीक जतेक कोटि, चटनी आ अचारक
जेतक विधान मिथिलामे अछि, हमरा जनैत देशक कोनहुँ आन भागमे नहि होएत।
वनस्पतिजन्य औषधिकें सुस्वादु भोजन बनएबाक प्रथा सेहो मिथिलामे सर्वाधिक
अछि।... आब जखन एते प्रकारक भोजन ओ बनौलनि, तँ उपयोग कतए हैत?...
घरक पुरुष वर्गकें खोआओल जाएत। सर्वदा एहिना होइत रहल अछि, जे कोनो
क्रियाक विकृति प्रचारित भ’ जाइत अछि, मूल तत्व गौण रहि जाइत अछि। मैथिल
पेटू होइत अछि, से सब जनै’ए, मुदा मिथिलाक स्त्राीमे विलक्षण सृजनशीलता रहलैक
अछि, से बात कम प्रचारित अछि। जे स्त्राी कामकाजी होइ छलीह, खेत-पथार जा
कए शरीर श्रम करै छलीह, गामक बाबू बबुआनक घर-आँगन नीपै, लेबै छलीह,
तिनकहु कलात्मक कौशल हुनका लोकनिक काजमे देखाइ छल।
स्त्राी जातिक कला-कौशलक मनोविज्ञानक उत्कर्ष तँ एना देखाइ अछि जे
हुनका लोकनिक उछाह-उल्लास धरिमे जीवन-यापनक आधार आ घर-परिवारक
मंगलकामना गुम्फित रहै छल। जट-जटिन लोक नाटिका विशुद्ध रूपसँ कृषि कर्मक
आयोजन थिक, जे अनावृष्टिक आशंकामे मेघक आवाहन लेल होइ छल, होइत
अछि; सामा भसेबा काल गाओल जाइबला गीतमे सब स्त्राी अपन पारिवारिक पुरुष
पात्राक स्वास्थ्यक कामना करै छथि; विवाह उपनयनमे अपरिहार्य रूपें वृक्ष पूजा
(आम, महु), नदी पूजा, प्रकृति पूजा आदि करै छथि। विभिन्न वृत्तिक लोकक
अधिकार क्षेत्रा पर नजरि दी, तँ नौआ, कमार, कुम्हार, डोम, धोबि... सबहक
स्वामित्व निर्धारित रहैत आएल अछि। जाहि गाम अथवा टोल पर जिनकर स्वामित्व
छनि, हुनकर अनुमतिक बिना केओ दोसर प्रवेश नहि क’ सकै छलाह। ई लोकनि
आपसी समझौतासँ अथवा निलामीसँ गामक खरीद-बिक्री करै छलाह। एहि व्यवहारमे
जजमानक कोनो भूमिका अथवा दखल नहि होइ छल।
हस्तकलाक कुटीर उद्योग एतेक सम्पन्न छल, जे सामाजिक व्यवस्थामे
सब एक दोसरा पर आश्रित छल। सूप, कोनियाँ, पथिया, बखाड़ी, घैल, छाँछी,
सरबा, पुरहर, मौनी, पौती, जनौ, चरखा, लदहा, बरहा, गरदामी, मुखारी, उघैन,
कराम, खाट, सीक, अरिपन... सब किछु लुप्तप्राय भ’ गेल। एते धरि जे ई शब्द आ
क्रिया अपरिचित भेल जा रहल अछि। ढोनि केनाइ, भौरी केनाइ, केन केनाइ, पस’र
चरेनाइ, झिल्हैर खेलेनाइ सन क्रिया, आ सुठौरा, हरीस, लागन, बरेन, जोती, कनेल,
पालो, चास, समार, फेरा, पचोटा, ढोसि, करीन सन शब्द आब आधुनिक साहित्योमे
कमे काल अबै’ए।
मिथिलाक एहेन विलक्षण विरासत--कला, संस्कृति आ जीवन-यापन पद्धतिक
उत्कृष्ट उदाहरण सम्भावनाविहीन भविष्यक कारणें आ सामाजिक कटुताक कारणें
हेराएल जा रहल अछि। नवीन शिक्षा पद्धतिसँ सामाजिक जागृति बढ़ल, मुदा ओहि
जागृतिक समक्ष ठढ़ भेल वैज्ञानिक विकास आ आर्थिक उदारीकरणक प्रभावमे
अहंकारग्रस्त समृद्ध लोकक लोलुपता आ क्षुद्र वृत्ति। संघर्ष जायज छल। अपन
पारम्परिक वृत्ति आ हस्तकलामे, पुश्तैनी पेशामे लोककें अपन भविष्य सुरक्षित नहि
देखेलै। ‘रंग उड़ल मुरूत’ कथामे मायानन्द मिश्र आ ‘रमजानी’ कथामे ललित
मिथिलाक परम्परा पर आघात देखा चुकल छथि।...
ख’ढ़क घर आब होइत नहि अछि, घरामीक वृत्ति एहिना चल गेल।
सीक’क प्रयोजन, खाटक प्रयोजन समाप्त भ’ गेल, बचल-खुचल माल-जाल लेल
नाथ-गरदामी आब प्लास्टिकक बनल-बनाएल डोरिसँ होअए लागल, बच्चाक खेलौना
प्लास्टिकक होअए लागल। नौआ, कमार, धोबि, डोमक जागीर आपस लेल जा
लागल। ओ लोकनि अपन पुश्तैनी पेशा छोड़ि आन-आन नोकरी चाकरीमे जाए
लगलाह। स्त्राी जाति आब भानस करबा लेल किताब पढ़ए लगलीह, फास्ट फूड
खएबाक प्रथा विकसित भेल। मिथिला पेंटिंगकें आफसेट मशीन पर छपबा कए
पूँजीपति लोकनि री-प्रोडक्शन बेच’ लगलाह। जट-जटिन आ सामा-चकेबाक खेलक
विडियोग्राफी देखाओल जाए लागल। गोनू झा, राजा सलहेस, नैका बनिजारा, कारू
खिरहरि, लोरिकाइनि आदिक कथा छपा कए बिक्री होअए लागल, टेप पर रेकाॅर्ड
क’ कए, अथवा सी.डी.मे तैयार क’ कए, री-मिक्ससँ ओकर मौलिकतामे फेंट-फाँट
क’ कए लाक सुन’ लागल, आ एकरा अपन बड़का उपलब्धि घोषित कर’ लागल।
... अर्थात् जे लोककला लोकजीवनक संग विकसित आ परिवर्द्धित होइ छल, तकर
अभिलेखनसँ (डकुमेण्टेशन) ओकरा स्थिर कएल जा लागल। लोकजीवनक संग
अविरल प्रवाहित रहैबाली सांस्कृतिक-धारा आब अभिलेखागारमे बन्द रहत, ओकर
विकासक सम्भावना स्थगित रहत।
अइ समस्त वृत्तिमे जुड़ल लोककें सम्मानित जीवन जीबै जोगर वृत्ति द’
कए एकर विकासमान प्रक्रियाकें आओर तीव्र करबाक आवश्यकता छलै, मुदा
जखन मिथिलाक लोके ओ ‘लोक’ नहि रहि गेल अछि, तखन लोक-संस्कृति आ
लोक-परम्पराक रक्षा के करत?
(समाप्त)
कथा-
फानी-श्रीधरम
पंच सभ एकाएकी कारी मड़रक दुअरा पर जमा हुअ’ लागलछल । दलान पर चटाइ बिछा देल गेल रहै । देबालक खोधली मे राखल डिबिया धुआँ बोकरि रहल छल । मात्र रामअधीन नेताक अयबाक देरी रहै
बिना रामअधीन नेताक पंचैती कोना शुरु भ’ सकैए? डोमन पाँच दिन पहिनहि सँ पंच सभक घूर-धुआँ मे लागल छल । डोमन चाहैत रहए जे सभ जातिक पँच आबय, मुदा रामअधीन नेता मना क’ देने रहै, “बाभन-ताभन केँ बजेबेँ तँ हम नइँ पँचैती मे रहबौ जातिनामा पँचैती जातिए मे होना चाही ।“ डोमन केँ नेताजीक बात काटबाक साहस नइँ भेलै । रामअधीन आब कोनो एम्हर-ओम्हर वला नेता नइँ रहलै, दलित पाटीक प्रखंड अध्यक्ष छिऐ । थानाक बड़ाबाबू, सीओ, बीडीओ, इसडीओ सभ टा चिन्है छै । कुसी पर बैसाक’ कनफुसकी करै छै । मुसहरी टोलक बिरधापेंशनवला कागज-पत्तर सेहो आब नेतेजी पास करबै छै । कोन हाकिम कतेक घूस लै छै, से सभ टा रामअधीन नेता केँ बूझल छै । कारी मड़र तँ नामे टाक माइनजन, असली माइनजन तँ आब रामअधीने नेता किने?
डोमन पँच सभ केँ चटाइ पर बैसा रहल छल आ सोमन माथा-हाथ देने खाम्ह मे ओङठल, जेना किछु हरा गेल होइ । टील भरिक मौगी सभ कारी मड़रक अँगना मे घोदिया गेल रहै—सोमन आ डोमनक भैयारी-बँटवारा देख’ लेल । ओना दुनू भाइक झगड़ा आब पुरना गेल रहै । मौगी सभक कुकुर-कटाउझ सँ टोल भरिक लोक आजिज भ’ ग्र्ल रहय तेँ रामअधीन नेता डोमन केँ तार द’क’ दिल्ली सँ बजबौलकै । सभ दिनक हर-हर खट-खट सँ नीक बाँट-बखरा भइए जाय ।
झगड़ाक जड़ि सीलिंग मे भेटलाहा वैह दसकठबा खेत छिऐ जे सोमनक बापे केँ भेटल रहै । रामअधीन नेताक खेतक आरिये लागल दसकठबा खेत । कैक बेर रामअधीन नेता, सोमनक बाप पँचू सदाय केँ कहने रहै जे हमरे हाथेँ खेत बेचि लैह, मुदा पँचू सदाय नठि गेल रहै । रामअधीन नेता आशा लहौने रहए जे बेटीक बियाह मे खेत भरना राखहि पड़तनि, मुदा पँचू सदाय आशा पर पानि फेर देने छलै । एकहक टा पाइ जोगाक’ बेटीक बियाह सम्हारि लेलक तेँ खेत नइँ भरना लगेलक । मरै सँ चारि दिन पहिनहि पँचू सदाय सोमन आ डोमन केँ खेतक पर्ची दैत कहने रहै,”ई पर्ची सरकारक देल छिऐ, जोगाक’ रखिहेँ बौआ, बोहबिहेँ । नइँ । दस कट्ठा केँ बिगहा बनबिहेँ, भरि पेट खाइत देखिक’ सभकेँ फट्टै छनि । बगुला जकाँ टकध्यान लगेने रहैए ।“
डोमन बापक मुइलाक बाद परदेश मे कमाय लागल रहय आ सोमन गामे मे अपन खेतीक संग-सग मजूरी । फसिलक अधहा डोमनक बहु रेवाड़ीवाली केँ बाँटि दैक । मुदा, जेठकीसियादिनी महरैलवाली केँ ईबड्ड अनसोहाँत लागै, “मर्र, ई कोन बात भेलै, पसेना चुवाबै हमर साँय, चास लगाब’ बेर मे सभ निपत्ता आ बखरा लेब’ बेर गिरथाइन बनि जायत । लोकक साँय बलू गमकौआ तेल-साबुन डिल्ली से भेजै हय त’ हम कि हमर धीया-पुत्ता आरु सुङहैयो ले’ जाइ हय् ।“
सभ दिन कने-मने टोना-टनी दुनू दियादिनी मे होइते रहै । मुदा, ओहि दिन जे भेलै...
सोमन गहूँम दौन क’ क’ दू टा कूड़ी लगा देलक आ नहाय ले’ चलि गेल । गहूमक सऊँग देह मे गड़ैत रहै । रेवाड़ीवाली अपन हिस्सा गहूम पथिया मे उठाब’ लागल रहए कि देखते जेना महौलवाली केँ सौंसे देह मे फोँका दड़रि देलकै, “रोइयोँ नइँ सिहरै हय जेना अपने मरदबाक उपजायल होइ ।” रेवाड़ीवाली कोना चुप रहितय ? कोनो कि खेराअँत लै छै? झट द’ जवाब देलकै, “कोनो रंडियाक जिरात नइँ बाँटै हय कोइ अधहाक मालिक छिऐ छाती पर चढ़िक बाँटि लेबै।” ’रंडिया’ शब्दा महीरैलवालीक छाती मे दुकैम जकाँ धँसि गेलै-“बरबनाचो...के लाज होइ हय बजैत साँय मुट्ठा भेजै हय आइँठ-कुइठ धोइ क’ आ एत’ ई मौगी थिराएल महिंस जकाँ टोले-टोल डिरियायल फिरै हय, से बपचो...हमरा लग गाल बजाओत।“ सुनिते रेवाड़ीवालोक देह मे जेना जुरपित्ती उठि गेलै ओ हाथ चमकबैत महरैलवालीक मुँह लग । चलि गेल, “ऐ गै धोँछिया निरासी! तूँ बड़ सतबरती गै! हे गै उखैल क’ राखि देबौ गै । भरि-भरि राति सुरजा कम्पोटर पानि चढ़ा-चढ़ा क’ बेटीक ढीढ़ खसेलकौ से ककरा स’ नुकायल हौ गै? कोना बलू फटा-फटि बेटीक ’दीन क’ ससुरा भेज देलही।”
बेटीक नाम सुनिते महरैलवालीक तामस जवाब द’ देलकै झोँ टा पकड़िक’ रेवाड़ीवाली केँ खसा देलक । दुनू एकदोसराक झोँ ट पकड़ने गुत्थम-गुत्थी भेल । ओम्हर सँ सोमनक बेटा गँगवा हहासल-फुहासल आयल आ मुक्के-म्य्क्की रेवड़ीवाली केँ पेटे ताके मार’ लागल । रेवाड़ीवाली एसगर आ एमहर दू माइ-पूत । कतेक काल धरि ठठितया, ओ बपहारि काट’ लागल । टोल पड़ोसक लोक सभ जमा भ’ गेल रहै, दुनू केँ डाँटि-दबाड़ि क’ कात कयलक । दुनू दियादिनीक माथक अधहा केस हाथ मे आबि गेल रहै ।
ओहि राति रेवाड़ीवालीक पेट ने तेहन ने दरद उखड़लै जे सुरज कम्पोटर पानि चध्आ क’ थाकि गेलै, मुदा नइँ सम्हरेलै । चारिये मासक तँ भेल रहै, नोकसान भ’ गेलै । बेहोसियो मे रेवाड़वाली गरियबिते रहलै, “ईडनियाही हमरा बच्चा केँ खा गेल । सोचै हय कहुना निर्वश भ’ जाय जे सभ टा सम्पैत हड़पि ली । डनियाहीक बेटा मरतै । धतिंगबाक हाथ मे लुल्ही-करौआ धरतै । काटल गाछ जकाँ अर्रा जेतै...। ”
दिसरे दिन रेवाड़ईवाली थाना दौगल जाइत रहे, रिपोट लिखाव’ । रस्ता सँ रामअधीन नेता घुरेने रहै, “समाजे मे पँचैती भ’ जैतौ” आ नेताजी सोमन केँ मार’-मास्क छूटल रहै, “रौ बहि सोमना । मौगी केँ पाँज मे राखबेँ से नै । आइए सरबे सब परानी जहल मे चक्की पिसैत रहित’ । मडर केस भ’ जइतौ । सरबे हाइकोट तक जमानति नहि होइत ।” सोमन बीतर धरि काँपि उठल रहय । नहि जानि पँचैती मे की सभ हेतै । एक मोन भेलै, जाय आ पटुआ जकाँमहरैलवाली केँ डंगा दैक । ’ई, छिनरी के हरदम फसादे वेसाहैत रहैए ।’
रामअधीन नेताक अबिते पँचैतीक करबाइ शुरु भ’ गेलै । फौदारक चीलम सँ निकलैत धुँआक टुकड़ी किछु दूर उपर उठि बिला जाइत रहे गंधक माध्यम सँ अपन उपस्थितिक आभास दैत एअहय ।
“हँ त’ डोमन किऐ बैसेलही हेँ पँचैती, से पँच केँ कहबिही किने” रामअधीन नेता बाजल । डोमन ठाढ़ होइत बाजल, “हम परदेस कामाइ छिऐ । रेवाड़ीवाले एत’ एसगर रहै हय । पँचू सदाय बलू भैयाक बाप रहै त’ हमरो बाप रहै । हमहुँ पँचूए सदायक बुन्न स’ जनमल छिऐ आ बोए केँ सरकार जमीन देने रहै महंथ स’ छीनिक । अइ जमीन पर जतने अधिकार एकर हइ ओतने हमरो हय । तहन जे स’ब मिलि क’ रेवाड़ीवालीक गँजन केलकै, तकर निसाफ पँच आरु क’ दइ जाउ । हमरा आर कुछो नइँ कहनाइ हय ।“ सब चुप...फेर नेतेजी सोमन केँ टोकलके, “की रौ । तोहर की कहनाम छौ?”
“आब हम बलू की कहबै ? जे भ’ गेलै से त’ घुरिक नइँ एतै ग’ । समाज आरूक बीच मे छिऐ । जते जुत्ता मारै केँ हइ, मारि लौ । दुनू मौगी रोसाएल रहै, तहन त’ बलू ओकर नोकसान भ’ गेलै तेँ ओकर दिख त लोक नइँ देतै । तहन जे भ’ गेलै से भ’ गेलै । पंच आरू मिलिक’ बाँट-बखरा क’ दौ । खेतो केँ आ घरो केँ । झगड़े समापत भ’ हेतै ।”
“रौ बहिं सिमना, बात केँ लसियबही नइँ । तहन त’ अहिना ककरो कियो खून क’ देतै आ समाज मुँह देखैत रहतै । कोना बभना आरू पुक्की मारै जाइ हइ से तूँ सभ की जान’ गेलही । परसू बेलौक पर सार मुखिया हमरा देखि-देखिक’ हँसैत रहय, चुटकी लैत रहय, “की हौ रामअधीन! जहन टोले नइँ सम्हरै छ’ त’ बिधायक बनलाक बाद पूरा एलाका कोना सम्हरतह? सुनै छिय’ एहि बेर टिकट तोरे भेटत’ । चल’ अइहबा मे पार लागिऐ जेत’।...” नेताजी गुम्हरल, “टिकटेक नाम सुनिक’ सार सब केँ झरकै छनि, आगू की सभ जरतनि?” रामअधीन नेता एक बेर मोँ छ केँ चुटकी सँ मीड़ि उपर उठेक फेर आक्रामक मुद्रा बनबैत बाजल, “सुनि ले बहिं, से सभ नइँहेतौ । गलती दुनू के छौ । पाँच-पाँच हजार दुनू केँ जुर्बाना देम’ पड़तौ, जातिनाम खाता मे।” नेताजीस्वाभाविक गति सँ पुन: एक बेर मोंछक लोली केँ चुटकी पर चढ़बैत मड़र कका दिस देखलनि, “की हौ मरड़ कका बजैत किऐ ने छहक?” मड़र कका बदहा जकाँ मूड़ी डोला देलकै ।
डोमन भाइ सँ बदला लैक धुन मे एखन धरि गुम्हरि रहल छल, मुदा नेताजीक बात सुनिते झमान भ’ खसल । एक मोन भेलै, कहि दै—जे भेलै से भेलै भैयारी मे । नइँ करेबाक य’ पंचैती । ई किन बात भेलै ! हमरे बहु मारियो खेलक आ जुर्बान सेहो हमहीं दियौ, मुदा चुप रहल । डरें बाजल नइँ भेलै । डोमन केँ देखल छै जे रामअधीन नेता पंचैती नइँ माननिहार केँ कोना ताड़क गाछ मे बान्हिक’ पीटै छै । एखन धरि जुर्बाना वला पचासो हजार टाका जातिनाम खाता मे गेल हेतै, मुदा हिसाब? ककर बेटी बियेलैहेँ जे रामअधीन नेता सँ हिसाब माँगत!
रामअधीन नेताक पी.ए. जकाँ हरदम संग रहनिहार मोहन सदाय बाजि उठल, “की रौ सोमना, हम दुनू भाइ स’ पुछै छियो; कहिया तक पाइ जमा क’ देमही ? एक सप्ताह स’ बेसीक टेम नइँ देल जेतौ । अहि पाइ स’ कोनो छिनरपन नइँ हतै, सारबजनिक काम हेतै । दीना-भदरीक गहबर बनतै ।”
“कतौ स’ चोरी कए क’ त’ नइँ आनबै हमर हालति बलू ककरो स’ नुकाएल त’ नइँ हय ।“ सोमन कलपल ।
मोहन सदाय केँ रामअधीनक कृपा सँ जवाहर-रोजगार वला ठिकेदारी सभ भेट’ लागल छै । सीओ, बीडीओ केँ चेम्बरे मे बंद क’ दैत अछि आ मनमाना दस्तखत करा लैत अछि तेँ ओकरा सभ टभजियायल छै जे घी किना निकालल जाइत छै । ओ सभक चुप्पी केँ तौलैत मड़रककाअक नाड़ी पकड़लक “की हौ मड़र कका! तोरा आरूक की बिचार छह? दीना भदरीक गहबर मे ओ पाइ लागि जाए त’ नीके किने ?”
मरड़ कका आइ दस साल सँ हरेक पंचैती मे अहिना दीना-भदरीक गहबर बनैत देखि रहलछै’ मुदा एखनो दीना-भदरीक पीड़ी पर ओहिना टाँग अलगा क’ कुकूर मुतिते छै । मड़रकका मने-मन कुकू केँ गरियेलक, “सार, कुकूरो केँ कतौ जगह नइँ भेटै हय, देबते-पितरक पीड़ी केँ घिनायत ।” खैनीक थूक कठ धरि ठेकि गेल रहै, पच्चा द’ फेकैत बाजल’ “जे तूँ सभ उचित बुझही !”
पंचैती मे रामधीन नेता आ मोहन सदाय बजैत जा रहल छल । बाकी सभ पमरियाक तेसर जकाँ हँ मे हँ मिलबैत । सोमन पंच सभक मुँह ताकि रहल अछि, मुदा दिन भरिक हट्ठाक थाकल-ठेहियायल पंच सभक मुँह स्पष्ट कहै छै जे कतेक जल्दी रामअधीन नेता निर्णय दै आ ओ सभ निद्राक कोरा मे बैसि रहय । मड़र ककाक हुँहकारी सँ मोहन सदायक मनोबल एक इँच आरो उपर उठलै । ओ बाजल, “नगदी ई दुनू भाइ जमा क’ सकत से उपाय त’ नइँ छै तहन पाइ कोना एकरा सभ केँ हेतै, तकरो इन्तिजाम त’ आइए भ्’ जेबाक चाही । आब अहि ले’ दोसर दिन त’ बैसार नइँ हेतै । हम्र एक टा प्रस्ताब छै जे दुनू भाइक साझिया दसकठबा खेत ताबत केओ दस हजार मे भरना ल’ लौ । जहिया दुनू भाइ पाइ जमा क’ देतै तहिया खेत घुरि जेतै ।”
बिना ककरो विचार लेनहि मोहन सदाय डाक शुरु क’ देलक, “बाज’के लेबहक! जमीन अपने टोला मे रहतै बभनटोली मे नइँ जेनाय छै खपटा ल’क”
सभ चुप्प!
फेर मोहन सहाय बाजल, “जँ नइँ कियो लेबहक त’ नेताजी सोचतै, टोलक इज्जति त’ बलू बचाब’ पड़तै ओकरे किने ।” अंतिम श्ब्द बजैत मोहन सदायक आँखि नेताजीक आँखि सँ टकरा गेलै । मड़रकका आँखि मुनने भरिसक कुकूरे केँ खिहारि रहल छलाह । खैनीक सेप मुँह मे एतेक भरि गेल रहनि जे कने घोँ टाइयो गेलनि । खूब जोर सँ खखसैत बजलाह, :सुनि ले’ बहिं पिछला बेर जकाँ एहू बेर नइँ पजेबा खसि क’ उठि जाइ ।“ मड़र ककाक शंका मे आरो एक-दू गोटा अपन हामी भरलक । मोहन सदाय पहिनहि सँ तैयार रहय, झट द’ बाजि उठल, “नइँ हौ। दसक हहास बलू अपना कपार पर के लेत? जुर्बानाक पाइ देबते-पितर मे जेतै । दीना-भदरी संगे जे सार फ़द्दारी करत, तकरा घर पर खढ़ो बचतै ? घटतै त’ एक-दू हजार नेताजी अपन जेबियो स’ लगा देतै । कोनो अंत’ जेतै? धरम-खाता मे जमा रहतै । बभना आरू जेहन डीहबारक गहबर बनेलकै, ओहू स’ निम्मन दीना-भदरीक गहबर बनतै।”
महरैलवाली बड़ी काल सँ मुँह दबने रहय । आब ओकर धैर्य जबाव द’ देलक, “हइ के हमर जमीन लेतै? दीना-भदरीक गहबर बनै ले’ हमरे जमीन हइ । मोंछवला सभ बेहरी द’क’ बनेतै से नइँ।” रेवाड़ीवाक्लीक हृदय सेहो आब बर्फ भ’ गेल रहय । दियादनीक बात मे ओकरो मौन समर्थन रहै ।
रामअधीन नेता केँ कहियो-कहिओ दिन तका क’ तामस उठै छै जहन ओकरा मोनक विपरीत कोनो काज होइत छै। एहन परिस्थिति मे नेताजी टोल भरिक छौड़ी-मौगी सँ गारिक माध्यम सँ लैंगिक संबंध स्थापित क’ लैत छथि । “छिनरी केँ तूँ बीच मे बजनाहर के? हम सोमना नइँ छी, ततारि देब ।“ नेताजी मारैक लेल हाथ उठेलनि । महरसिलवली नेताजीक लग मे आरो सटैत बाजल, “माय दूध पियेने हइ त’ मारि क’ देख लौ ।” नेताजीक हाथ थरथरा गेलनि मुदा मुँह चालू “मुँह सम्हारि क’ बाज मौगी नइँ त’ चरसा घीचि लेबौ । आगि-पानि बारि देबौ, देखै छी कोना गाम मे तूँ रहि जाइत छें।”
“है केहन-केहन गेलै त’ मोछवला एलै । बहरा गाम मे रहि जेबै तें जमीन पर नइँ ककरो चड़ह’ देबै । ई नेताबा आरू गुरमिटी क’क जमीन हड़प चाहै हय । जमीन भरना लेनिहार केँ त’ खपड़ी स’ चानि फोड़ि देबै । दीना-भदरी गरीबेक जमीन लेतै । अइ नेताबा आरूक कपार पर हरहरी बज्जर खसतै । घुसहा पंच सभ केँ मुँह मे जाबी लागि गेल हय । निसाफ बात बजैत लकबा नारने हइ ।“
महरैवालीक ई हस्तक्षेप सोमनक पक्ष केँ आरो कमजोर क’ देलकै । पंच सभ सोमन केँ धुरछी-धुरछी कर’ लगलै । फौदार कहलकै, “त’ रौ बहिं सोमना, ई मौगी ठिके झँझटिक जड़ि छियौ । एकरा अँगना क’ बइलेबेँ से नइँ? गाइरे सुनबै ले’ पंच आरू केँ बजेलही हें ।” सोमन केँ भरल सभा मे ई बेइज्जती बड़ अखड़लै “जहन मरदा-मरदी बात होइ हय त’ ई मौगी किऐ बीच मे टपकै हय ।” सोमन, महरैलवालीक ठौठ पकड़ि क’ अँगना मे जा क’ धकेलि देलक । महरैवाली आँगने सँ गरियाबैत रहल, “अइ मुनसा केँ त’ जे नइँ ठकि लइ । बोहा दौ सभ टा । नेतबा सभ त’ तौला मे कुश द’क’ रखनै हय।”
आब नेताजीक तामस मगजो सँ उपर चढ़ि गेल, “ई सार सभ ओना नइँ सुधरत । एखने बभना आरू दस टा गारि दैतनि आ चारि डंटा पोन पर मारितन्हि त’ तुरते पंचैती मानितय । कोन सार पंचैती नइँ मानत से हमरा देखनाइ यए ।” नेताजीक ठोरक लय पर मोंछो थरथरा रहल छल ! “सरबे सभ केँ हाथ-पयर तोड़िक’ राखि देबनि । घर मे आगि लगा क’ भक्सी झोंकान झौकि देबनि । देखै छी कोन छिनरी भाइ दरोगा हमरा खिलाफ एन्ट्री लैयए ।” चारू भर श्मशानक नीरवता पसरि गेल छल । पंच सभ आगाँक बातव् केँ रोकबाक लेल डोमन आ सोमन दिस याचक दृष्टएँ ताकि रहल छल । मोहन सदाय कागत-कजरौटी निकालैत सोमनक कान मे बाजल, “की विचार छौ, फसाद ठाढ़ करबें?” आ फेर सोमनक थरथराइत औंठा पकड़िक’ कजरौटी मे धँसा देलक ।
अही बीच महरैलवाली वसात जकाँ हहाइत आयल आ दुनू हाथ सँ कागत आ कजरौटी केँ पकड़ि क’ ओहि पर सूति रहल! ओ बाजय चाहैत रहय, मुदा मुँह सँ आवाज नहि निकलि रहल छलै । रामअधीन नेता कागत आ कजरौटी महरैलवालीक हाथ सँ छीन’ चाहैत छल, मुदा महरैलवाली पाथर भ’ गेल रहय । जेना ओ कागत नहि, ओ दसकठवा खेत हो जकरा ओ अपना छाती सँ अलग नहि कर’ चाहैत रहय ।
“छिनरी केँ तू एना नहि मानवें ।” महरैलवालीक मुँह पर घुस्सा मारैत ओकर मुट्ठी केँ हल्लुक कर’ चाहलक ।
एम्हर रेवाड़ीवालीक चेहरा तामसे लाल भ’ गैल रहै । ओकर सभ टा चिद्रोह नेता सभक कूटनीति केँ बुझिते पिघलि गेल रहै । ओ डोमनक देह झकझौरैत बाजल, “बकर-बकर की ताकै छ’ । नार’ ने पूतखौका नेताबा आरू केँ । जब खेते नहि बचत’ त’ बाँटब’ की?” रेवाड़ीवालीक ई रूप देखि नेताजीक हाथ ढील हुअ’ लागल । पंच सभ हतप्रभ रेवाड़ीवाली दिस ताक’ लागल।
होलीपर विशेष
विद्या मिश्र
मैथिल रंग बरसे (यू.एस. मे मैथिलक होली) - विद्या मिश्र
हमर सभक एहि बेरक होली हमर घरमे मनाओल गेल...25-30 टा परिवार रहथि। सभ मैथिल रहथि जाहिमे प्रोफेसर हरिमोहन झाक नाति आ डॉ. रमा झाक पुत्र प्रतीक झा सेहो रहथि, ओ हमरा सभक न्ईक मित्र सेहो छथि।
हमर सभक प्रयास रहैत अछि पाबनि-तिहारकेँ पारम्परिक रूपमे मनेबाक जाहिसँ अगिला पीढ़ीक बच्चा एकर अनुकरण कए सकए, अनुभव क’ सकए आ अर्थ बुझि सकए।
पछिला साल सभ बच्चा सभ अपन लिखल नाटक हिरण्यकश्यप/ होलिकाक मंचन कएने रहथि। कमसँ कम हुनकासभकेँ होली पाबनि कोना आ किएक मनाओल जाइत अछि तकर पूर्ण ज्ञान छन्हि। किएक हम सभ रंग लगबैत छी आ गरा मिलैत छी, पारम्परिक खानपान आ होली गीत..सभटा।
मैथिल लोकनि भाग लेबाक लेल न्यू जर्सी, विर्जिनिया, वासिंगटन डी.सी आ मेरीलेण्ड सँ अएलाह, से 4-5 गोट स्टेट्स मैथिल रहथि।
एहि बेर सभसँ नीक उत्तर प्रतियोगिता रहए, सर्वोत्तम ड्रेस-समन्वय आ पार्सल देबाक प्रतियोगिता रहए आ एहि सभमे मिथिला संस्कृतिसँ सम्बन्धित गहन प्रश्न रहए।सर्वोत्तम उत्तरक लेल हम सभटा उत्तर पढ़लहुँ आ तखन वोट देलहुँ??? सभ गोटे एहि अवसरक लेल बड्ड उत्साहित रहथि आ एहि अवसरक प्रति उत्सुक सेहो। एतए यू.एस.ए. मे बसंतक छुट्टी रहैत अछि से स्कूल कॉलेजक बच्चा सभ अएलाह आ एहि पारम्परिक होली उत्सवमे भाग लेलन्हि...आ हुनका ई एतेक नीक लगलन्हि जे अगिला बरिख सेहो एहिमे सम्मिलित होएबाक सोचलन्हि.... आ अंतिममे होलीक आशीर्वचन हमर लिखल।