विद्यापतिक परवर्ती मैथिलीक कवि लोकनिक रचनादि केँ प्रोत्साहित कयनिहार नरेश लोकनि मे कंसनारायणक नाम अग्रगण्य अछि जनिक दरबार मे जतेक कवि रहथि ओ सभ विद्यापति द्वारा चलाओल शैली केँ सर्वाधिक प्रश्रय देलनि जाहि मे उल्लेखनीय छथि महाकवि गोविन्ददास (1663-4-1670-71)। हिनक एकमात्र रचना ‘श्रंृगारभजनावली’ (1938) प्रकाशित अछि। हिनक कवितादि सॅ श्रृंगारिकताक बोध होइछ, किन्तु ओ भक्ति विषयक रचना थिक। बंगालक वैष्णक भक्त कवि हिनका बंगाली बनयबाक प्रयास कयलनि, किन्तु ई मिथिलाक रहथि जनिक रचनाक अर्थक दुरूहताक कारणेँ प्रसिद्ध अछि। विद्यापतिक पश्चात् ई मैथिलीक दोसर प्रसिद्ध कवि छथि। महाराज कंसनारायणक संग हुनका ओही रूपक सम्बन्ध छलनि जे विद्यापति केँ महाराज शिवसिंहक संग छल। मैथिलीक हिनक पदावली साहित्य समस्त पूर्वान्चल मे एहि नवीन पद्धतिक पोषक सिद्ध भेल।
विद्यापतिक उत्तराधिकारी कवि लोकनि मे महाकवि लोचन (1650-1725) क नाम अग्रगण्य अछि। यद्यपि मैथिली मे हिनक अधिकांश रचनादि नहि उपलब्ध भ’ रहल अछि तथापि जे उपलब्ध भ’ रहल अछि ओ कलाक दृष्टिसँ उच्च कोटिक थिक। किन्तु एकमात्र ‘रागतरङिनी;’ (1924) उपलब्ध भ’ रहल अछि। हिनक हाथक लिखल ‘नैषधीय चरित’ क एक प्रति ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय पुस्तकालय मे सुरक्षित अछि। लोचन संस्कृत क निष्णात विद्वान, संगीतक मर्मज्ञ आ कवि रहथि। हिनक कवितावली ‘रागतरङिणी’ मे उपलब्ध अछि।
ओइनवार वंशक पतनोपरान्त अनेक वर्ष धरि मिथिला मे अराजकता आ अस्थिरताक स्थिति प्रबल रहल। पुन: मिथिलाक विद्वान, कवि, संगीतज्ञ आश्रयक अन्वेषण मे अपन समीपवर्ती राष्ट्र नेपाल चल गेलाह। एम्हर दिल्लीक सिंहासन पर अकबर केँ बैसबाक पश्चात् उत्तर भारतक राजनीतिक स्थिति मे परिवर्तन भेल। एही समय मे मिथिलाक शासन-सूत्र खण्डवलाकुलक महेश ठाकुर (1556-1569) केँ भेटलनि आ दिल्ली केन्द्र सँ मिथिलाक निकट सम्पर्क स्थापित भेल। महेश ठाकुरक अधिकांश समय पश्चिम मे व्यतीत भेल छलनि, अत: पश्चिमक भाषा-साहित्यक एतय प्रचार-प्रसार नहि भेल, प्रत्युत स्थानीय साहित्य सेहो प्रभावित भेल। इएह कारण भेल, प्रत्युत स्थानीय साहित्य सेहो प्रभावित भेल। इएह कारण थिक जे लोचन राग्तरङिणी मे राग-रागिनीक उदाहरण स्वरूप ब्रजभाषाक अनेक स्वनिर्मित पद उदृत कयलनि अछि।
मैथिली साहित्यक मघ्यकालीन साहित्यिक रचनाक दृष्टिऍं स्वर्णकाल कहल जा सकैछ। यद्यपि एहि समयक राजनैतिक दृष्टिसँ उथल-पुथल भेल. किन्तु साहित्यपर एकर कोनो प्रभाव नहि पडल। एहि राजनैतिक उथल-पुथल क कारणेँ मैथिल विद्वत-वर्ग एतय सँ पडाक’ नेपाल चल गेलाह। ओ सभ ओहि ठामक राजदरबार मे संरक्षण आ प्रोत्साहनक हेतु गेलाह। नेपाल सुसंस्कृत शिक्षा-प्रेमी लोकनिक द्वारा मैथिलीकेँ नेपाल मे साहित्यिक भाषाक रूप मे स्वीकार कयल गेल। ओहि समय मे मल्लवंशक शासल छल। मल्ल शासक लोकनि काव्य आ नाटकक अत्याधिक प्रेमी रहथि। मल्ल राजवंश द्वारा मैथिल साहित्यकार लोकनि केँ प्रोत्साहित कयल गेल जकर फलस्वरूप मैथिलीक प्रारम्भिक नाट्य-साहित्यक रचना नेपाल मे प्रारम्भ भेल। विद्यापतिक परिपाटी पर रचना केनिहार स्वतंत्र पदक अतिरिक्त एहि कालावधिक अधिकांश पद नाटक मे गुम्फित अछि। मैथिली गीत सँ गुम्फित संस्कृत-प्राकृत नाटकक रचनाक श्रीगणेश ज्योतिशीश्वर कयने रहथि जकरा उमापति उपाघ्याय आगॉं बढौलनि जे एहि कालावधि मे विशेष प्रचलित भेल। क्रमश: संस्कृत प्राकृतक व्यवहार कम होअय लागल आ मैथिली मे सम्पूर्ण नाटक लिखल जाय लागल। पदावली-साहित्यक समान मघ्यकालीन नाटक नेपाल आ आसाम धरि व्यापक भ’ गेल। एहि एकारेँ मैथिली नाटकक विकास तीन केन्द्र मे भेल-मिथिला, नेपाल आ आसाम।
नेपालक मैथिली नाटककार लोकनिक कार्य भूमि भातागॉव, काठमाण्डू आ ललितपुर पाटन मे रहल। नेपाल मे मैथिली नाटक संस्कृत नाटक परम्पराक स्थानपर मैथिली नाटकक सूत्रपात भेल। ओहि समय मे मुसलमानक प्रभाव सँ नेपाल मुक्त छल जकर फलस्वरूप सांस्कृतिक आ साहित्यिक क्रिया-कलाप मे कोनो तरहक व्यवधान नहि भेल। एहि प्रकारेँ नेपाल मे मैथिली नाटकक सूत्रपात भेल जे एक भाग अपन नव-शिल्पक उत्थान मे लागल रहल आ दोसर भाग प्राचीन संस्कृत-प्राकृत-मैथिली मिश्रित त्रिभाषिक नाट्य स्वरूप केँ किछु दिन धरि अपन पूर्ववर्ती स्वरूप केँ सुरक्षित राखलक। नेपाल मे मैथिली नाटकक जे श्रृंखला स्थापित भेल ओकर सब श्रेय मल्ल राजवंश केँ छैक। भातगॉव मे प्रचुर परिमाण मे नाटक लिखल गेल आ उल्लेखनीय नाटककार मे जगज्योतिर्मल्ल (1613-1633), जगत्प्रकाश मल्ल (1637-1672), सुमतिजिता मित्रमल्ल (1672-1696), रणजीत मल्ल (1722-1772),भूपतीन्द्र मल्ल (1696-17क22) आ श्रीनिवास मल्ल (1658-1685) छथि। रणजीतमल्ल सबसँ बेसी नाटकक रचना कयलनि। काठमाण्डू आ पाटनक उल्लेखनीय नाटककार मे वंशमणि आ सिद्ध नरसिंह देव (1622-1657) क नाम लेल जाइत अछि। ई नाटककार लोकनि प्रचुर परिमाण मे नाटकक रचना कयलनि जाहि मे जगत्ज्योतिर्म्मलक ‘हरगौरी विवाह’ (1970). विश्वमल्लक ‘विद्याविलाप’ (1965) आ जगत्प्रकाश मल्लक ‘प्रभावती हरण’ नाट्क अद्यापि प्रकाशित भ’ पाओल अछि। शेष अन्य नाटककार लोकनिक नाटकक प्रकाशन अद्यापि नहि भ’ पाओल अछि जे नेपाल दरबार लाईब्रेरी मे संरक्षित अछि। शेष अन्य नाटकादिक प्रकाशनसँ मैथिली नाटकक उदय आ विकास पर नव प्रकाश पडि सकैछ। एहि नाटकादि मे गीतक प्रधानता अछि, कथानक पौराणिक अछि, नाटककार क्यो होथु, किन्तु ओहि मे प्रयुक्त गीतादि अन्य कवि लोकनिक उपललब्ध होइछ। सभ नाटक अभिनीयता सँ पूर्ण अछि आ ओकर भाषा मानक मैथिलीक प्रतिमान प्रस्तुत करैत अछि। महाराज पृथ्वीनारायण साह (1768-1775) क आक्रमणक फलस्वरूप मल्ल राजवंश द्वारा स्थापित परम्परा समाप्त भ’ गेल आ ओकरा स्थान पर गोरखा राजवंशक स्थापना भेल। एकर फलस्वरूप काठमाण्डू आ पाटन मे नाटकक परम्परा क समाप्ति भ’ गेल, किन्तु भातगॉव मे अद्यापि ई परम्परा सुरक्षित अछि।
नेपालक उपर्युक्त परम्पराक क्षीण आलोक मिथिला मे सेहो भेटैत अछि। मिथिला मे जे नाटक लिखल गेल ओकर नाम केँ ल’ कए विद्वान लोकनि मे मतैक्यक अभाव अछि। डा. जयकान्त मिश्र (1922) एकरा ‘कीर्तीनयॉं नाटक’ रमानाथ झा (1906-1971) ‘कीर्तनियॉं नाच’ आ डा. प्रेमशंकर सिंह (1942) ‘लीला नाटक’ नामसँ अभिहित कयलनि अछि। एहि नाटककादिमे मूलरूप सँ शिव तथा विष्णु क लीला प्रस्तुत कयल गेल अछि। एहि नाटकादि केँ नाट्य मण्डली आदि कृष्ण आ शिवसम्बन्धी विविध कथादि केँ आधार बना क’ प्रदर्शन करैत छल. एहि कोटिक नाटक मे उपलब्ध सामग्री सभकेँ तीन काल खण्ड मे बाॅटल जा सकैछ: प्रथम उत्थान, द्वितीय उत्थान आ तृतीय उत्थान । प्रथम उत्थानक नाटक कार मे गोविन्दक ‘नलचरितनाटक’ रामदास (1644-1671) क ‘आनन्द विजय नाटक’, देवानन्दक ‘उषाहरण’ आ रमापतिक ‘रूकिमणीहरण’ इत्यादिक नामोलेख कयल जा सकैछ। द्वितीय उत्थानक उल्लेखनीय नाटककार लोकनि मे लाल कविक’गौरीस्वयंवर’ (1960), नन्दीपतिक ‘कृष्णकेलिमाला नाटक’ (1960), गोकुलानन्द क ‘मानचरित नाटक’, शिवदतक ‘पारिजात हरण’, कर्णजयानन्दक ‘रूकमागद नाटक’ श्रीकान्त गणक ‘श्रीकृष्ण जन्म रहस्य’, काल्हारामदासक’ गौरी स्वयंवर नाटक’, रत्नपाणिक ‘उषाहरण नाटिका’, भानुनायक ‘प्रभावती हरण’ आ हर्षनाथ झा (1897-1898) क ‘उषाहरण’, ‘माधवानन्द’ एवं ‘राधाकृष्ण मिलन लीला’ (1962) आदि साहित्यिक दृष्टिसँ उल्लेख
अछि। तृतीय उत्थानक नाटककार मे विश्वनाथ झा क ‘रमेश्वरबन्द्रिक’ चन्दा झा क ‘अहल्या चरित नाटक’ महामहोपाघ्याय परमेश्वर झा क ‘महिषासुर मर्दनी’ आ राज पण्डित बलदेव मिश्र (1897-1975) क ‘राजराजेश्वरी’ एवं ‘रमेशोदय नाटक’ उल्लेखनीय थिक। एहि मे सँ किछु नाटक अनुसंधाता लोकनिक अथक प्रयास सँ प्रकाश मे आयल अछि, किन्तु अधिकांश अद्यपि अप्रकाशित अछि। ई नाटककार लोकनिक नाटकादि मे नाटकीयताक अभाव परिलक्षित होइत अछि तथापि एहि कालक नाटकक बुझैत दीपक क्षीण आलोकक अभास भरैत अछि।
मैथिली नाटकक विकसित आ सुव्यवस्थित स्वरूप हमरा असम मे उपलब्ध होइत अछि। महाप्रभु चैतन्यक वैष्णव धर्मक समस्त पूर्वान्चल क भारतीय साहित्य पर यथेष्ट परिमाण पडल जकर परिणाम भेल जे साहित्य पूर्णत: भक्तिमय भ’ गेल। फलत: साहित्य मे रसक दृष्टिसँ विशेषत: कृष्णक अवतार लीला कथा केँ अधिक प्रश्रय देल गेल। वैष्णव कवि लोकनिक अभिव्यक्तिक भाषा अन्धकारमय छल। विद्यापतिक श्रृंगार रसक पदावली मे राधाकृष्णक उल्लेख रहलाक कारणेँ चैतन्यदेव ओकरा भक्तिरस क कविता बुझलनि। ओ वैष्णव धर्मक प्रचारार्थ विद्यापतिक कविता केँ माघ्यम बनौलनि। जखन विद्यापतिक भाषा आसाम पहुँचल तखत युगपुरूष शंकर देव (1449-1568) आ हुनक शिष्य माधवदेव (1489-1556) विद्यापतिक भाषाक अनुकरण क’ कए ओकरा संग असमिया केँ मिश्रित क’ कए एक नूतन भाषा ब्रजबुलिक जन्म देलनि। आसमाक ब्रजबुलि असमिया साहित्यक मेरूदण्ड थिक। एकरा माघ्यम सँ असमिया-साहित्य रस-समृद्ध भेल अछि। एक दूरूप थिक: वरगीत आ अङकीयानाट। युगपुरूष शंकरदेव वैष्णव धर्मक प्रचारार्थ नाटक केँ माघ्यम बनौलनि। अङकीयानाट मे गद्य आ पद्यक समविभाग थिक। सबसँ आश्चर्यक बात थिक जे महापुरूष शंकरदेव विशुद्ध आसमिया मे कयलनि, मुदा विद्यापतिक भाषासँ ओ एतेक अधिक प्रभावित भेलाह जे मैथिली-मिश्रित असमिया मे वरगीत आ नाटकक रचना कयलनि। असमी साहित्य मे एकर एहि विशिष्टता पर प्रकाश दैत अछि। डा. वाणीकान्त कातकी क कथन छनि, ‘जाहि प्रकारेँ प्रचण्ड वात्या वन मं लागल दत्वागिन केँ प्रज्वलित करबा मे सहायक होइत अछि ओही प्रकारेँ साहित्य जातीय एवं महाजातीय आन्दोलन केँ प्रेरित करैछ। नाटक, गीत एवं पद ई तीनू शंकर देवक वैष्णव-आन्दोलन केँ शाक्त प्रदेश मे एतेक व्यापक आ लोकप्रिय बनौलक जाहि प्रकारेँ मरूभूमिक ऊँट जलक गन्ध-सूत्र पकडि क’ जलाशयक खोल मे चलि पडैछ ओही प्रकारेँ तृषित जनता परगीतक सौरभसँ आकृष्ट भ’ कए शंकर माधवक शरणापन्न भेलाह ‘असमिया साहित्य, 510 वाणी कान्ता काकती)।
युगपुरूष शंकरदेव अपन तीर्थ-यात्राक क्रम मे विद्यापति क वैष्णव-वंश्क गुरूमानि मिथिला अयलाह। ओहि समय मैथिली-काव्य आ नाट्य-साहित्य विकासक अपन चरमपर छल। उमापति उपाघ्याय रचित ‘पारिजातहरण’ क अभिनय अत्यधिक भ’ रहल छल। एकर विषय-वस्तु सेहो राधाकृष्ण छल। पारिजातहरण अभिनीत होइत देखिक’ प्रयोक्ता शंकरदेव अत्याधिक प्रभावित भेलाह। एस. के. भूइयॉंक मतानुसार, ‘आङ्कीयानाटक भाषा मैथिलीक तथा आसमियाक मिश्रणक विलक्षण उदाहरण प्रस्तुत करैत अछि। ‘ (Oh Anita NAT, She. BHUYAN, Page 288-289) (शंकरादेव अपन अद्वितीय प्रतिभा आ अप्रतिभ बैदुष्यक बल पर असमिया साहित्य मे अङ्कीयानाटक जनकक रूप मे प्रख्यात छथि। नाटककार लोकनि पुराणादि सँ उपादान क चयन कयलनि आ एहि सन्दर्भ मे भागवत पुराण, हरिवंश पुराण एवं रामायण हुनक प्रधान उपजीव्य रहल। शंकरदेवक निम्नांकित नाटक कालिदमन (1518), पत्नी प्रसाद (1521), केलिगोपाल (1540), रामविजय (1568), रूक्मिणी हरण (1568) संतपारिजात हरण (1568) आ माधवदेवक भोजजनविहार, भूमि लोखा, अर्जुन भंजन (1538), विम्परा-गुचोबा, रासझुमरा, चोरधरा, कटोरा-खेलोबा, भूषण हेरोवा एवं ब्रहमा-मोहन आदि प्रकाशित आछि। एकर अतिरिक्त गोपाल अता (1533-1688), द्विजराजभूषण (1507-1571), रामचरन ठाकुर (1521-1600) आ दैत्यारि ठाकुर (1564-1622) आदि नाटककार उल्लेखनीय छथि। यद्यपि एहि नाटक सभक कथा-वस्तु पौराणिक रहल, किन्तु संस्कृत और प्राकृतक स्थान पर मैथिली-असमिया-मिश्रित गद्यक प्रयोग भेल। गीतक स्थिति यथावता रहल, किन्तु संस्कृत-प्राकृतक प्रयोग नहि कयल गेल जतय ओ अनिवार्य छल। एहि नाटकादिक उद्देश्य मनोविनोद नहि, प्रत्युत वैष्णव धर्म प्रचार करब छल। एहि लेल अधिकांश नाटकादि मे कृष्णक वात्सल्यमय आ दासत्व भावक पूर्ण लीलाक रूप मे वर्णन कयल गेल। रंगमंचक दृष्टिसँ ई अधिक सुव्यवस्थित अछि।
एहि नाटकादि विषय-वस्तु, रूप-रचना, भाषा आदि विशिष्टता केँ देखनासँ प्रतिभाषित होइत अछि जे युग पुरूष शंकरदेव असमक लोक मनोरंजनक विधा पर मैथिली आ ब्रज क्षेत्र मे प्रचलित रंग-शैलीक आरोपन ओहिना कयलनि जेना संस्कृत नाटकक शास्त्रोक्त परम्परा छल, कारण नाटकक माघ्यमसँ ओ वैष्णव धर्मक प्रचार-प्रसार करय चाहैत छलाह। मघ्यकालीन अन्य उल्लेखनीय सामग्री सभ मे मैथिली गद्यक प्राचीन परम्परा केँ जोडबाक निमित प्राचीन दस्तावेजादि मे एकरारनामा, गौरीवचरिका, बहिखत, अजातपत्र, एकररपत्र, निस्तार पत्र, दानपत्र, फैसलापत्र आ चिट्ठी-पत्री उपलब्ध होइत अछि। एहि अभिलेखादि मे कतहु साहित्यिक सौन्दर्य भेटैछ। मैथिली साहित्य मे एकर महत्व एहि बात केँ ल’ कए अछि जे ई सब मैथिली गद्यक विकास-क्रम विच्छिन्न परम्पराक पूर्ति करैत अछि।
पद्य-काव्यक परम्परा तँ पूर्णवते रहल, किन्तु एहि युग मे महाकाव्य, चरित-काव्य, संस्मरण आदि लिखबाक परम्पराक शुभारम्भ भेल। नव राजनैतिक, सांस्कृतिक, सामाजिक आ साहित्यिक स्वरूपक जन्म भेल आ मैथिली मे नवयुगक प्रारम्भ भेल। एहि समय मे डा. सर जार्ज अब्राहम ग्रियर्सन द्वारा संकलित एवं सम्पादित रचनादि मे मैथिली क्रस्टोमैथी (1882) तथा ट्वेन्टी वन वैष्णव (1884), भोल झा द्वारा सम्पादित मैथिली संस्कृत भक्ति गीतादिक संग्रह, मैथिल भक्त प्रकाश (1920) आ जितेन्द्र नारायण झा द्वारा संकलित आ कविशेखर बदरीनाथ झा (18931974) द्वारा सम्पादित मैथिली गीत रत्नावली उल्लेखनीय अछि। एहि कालखण्ड मे गीतिकाव्य क परम्पराक विकास भेल। विद्यापतिक परम्पराक अतिरिक्त गीति-काव्यक काव्यकार भेलाह ओहि मे भन्जन कवि, लालकवि, कर्णश्याम अछि प्रमुख छथि।
परवर्ती मघ्यकाल मे एक नव-धारा चलल जकरा सन्त काव्यक नाम सँ सम्बोधित कयल जाइछ जकर आधार स्तम्भ मे साहेबराम दास (लगभग 1746), महात्मा रोहिणीदत गोंसाई, महात्मा तारादत गोंसाई, महात्मा रामरूपदास, महात्मा लक्ष्मीनाथ गोंसाई, तारादत गोंसाई, महात्मा रामरूपदास, महात्मा हकरू गोंसाई, महात्मा परमानन्द दास आ रघुवर गोंसाई प्रमुख छथि। लक्ष्मीनाथ गोंसाई क ‘गीतावली’ (1969) मे प्रकाश मे आयल अछि।
विद्यापतिक श्रृंगार-प्रधान गीत परम्पराक विपरीत मनबोध (निधन 1788) कथा काव्यक माघ्य मे ‘कृष्णजन्म’ (1934) क रचना कयलनि। हिनक लोकप्रियताक प्रमुख कारण थिक जे ई ग्राम्य-शब्दादिक स्वच्छन्द भ’ कए प्रयोग कयलनि। इएह कारण अछि जे मैथिली साहित्य मे हिनक महत्वपूर्ण स्थान अछि।
अनेक दृष्टिऍं मैथिली साहितयक आधुनिक काल मे अत्याधिक आधुनिकताक आभास भेटैत अछि। सन् 1857 ई. क सिपाही विद्रोह क पश्चात् भारत वर्षक राजनैतिक क्षेत्र मे बड पैघ परिवर्तन भेल जाहि सँ साहित्य सेहो अछूत नहि रहल। जतय अन्यान्य भारतीय भाषादि मे साहित्य मे गद्यक दिशा मे अत्याधिक प्रगति भेल ततय मैथिली उपेक्षित रहल। एकर प्रमुख तत्व छल फोर्ट विलियम कालेजक द्वारा उपेक्षा, मिशीनरी द्वारा उदासीनता, लिथो आ टाइप प्रेसक अभाव, समाज-सुधार सम्बन्धी आन्दोलनक अभाव, नव-शिक्षा योजना आ कचहरीक भाषा मे मैथिलीक उपेक्षा, मैथिल पण्डित लोकनिक संकीर्ण दृष्टिकोण तथा मैथिली भाषा-भाषी मे जनजागरणक अभाव। एहि दिशा मे उपर्युक्त उपेक्षा नीतिक फलस्वरूप मैथिली भाषा-भाषी जतय रहथि ततय एहि गेलाह। आधुनिक युग मे एहि साहित्यक जे प्रगति भेल अछि ओकर श्रेय कवीश्वर चन्दाझा, लालदास आ साहित्यरत्नाकर मुंशी रघुनन्दन दास केँ छनि से मौलिक, अनूदित रचनाक द्वारा मैथिली साहित्यक श्रृंगार कयलनि।
मैथिली मे पत्र-पत्रिकादिक प्रकाशनक फलस्वरूप गद्य-साहित्यक विकास भेल जकरा माघ्यमे सुन्दर भाषाक निर्माण भेल, शब्द-भंडार मे श्रीवृद्धि भेल आ विश्वविद्यालय स्तर पर मैथिली केँ पाठ्य-विषयक रूप मे स्वीकार कयल गेल। बीसम शताब्दीक प्रारम्भिक दशक मे मैथिली मे पत्र-पत्रकादिक प्रकाशनक शुभारम्भ भेल जकर फलस्वरूप आधुनिक गद्य-साहित्यिक विकास मे तीव्रता आयल। मुद्रण कलाक नवीन वैज्ञाानिक प्रगतिक फलस्वरूप पत्रिकादिक प्रकाशन मे जोरदार प्रगति भेल। मैथिली पत्रकारिताक प्रारम्भिक अवस्था तप, उत्सर्ग आ पीडादायक रहल अछि। मैथिलीक सर्वप्रथम पत्रिका मिथिलेतर क्षेत्र जयपुर सँ प्रकाशित भेल मैथिल हित साधन (1905)। एकर प्रकाशनक दोसर वर्ष काशीसँ मिथिलामोद (1906) क प्रकाशन भेल। मिथिलामोद मातृभाषाक जागरणक जे शंखनाद कएलक ओकरा निरर्थक नहि कहल जा सकैछ, कारण मैथिलीक आङनमे बैह शंखनाद क्रान्तिक स्वर बनल। निर्भीकता, व्यंग्य, मैथिलीत्वक समर्थन, मैथिली भाषाक ओजस्विता एहि पत्रिकाक प्रधान गुण छल। मिथिला सँ मिथिला मिहिर (1907) उदित भेल। प्रारम्भ मे एकर स्वरूप मासिक रहल आ पाछॉं जा क’ ई साप्ताहिक भ’ गेल। मैथिली मे ई पत्रिका दीर्घजीवी रहल। सन् 1960 ई सँ 1989 धरि ई प्रकाशित होइत रहल। जतय धरि मैथिली सेवाक प्रयत्न अछि एकर योगदान सराहणीय रहल। एकरा द्वारा गद्य केँ अभिवर्द्धित करबाक उदेद्श्य सँ उत्प्रेरित भ’ कए वर्तमान गद्य-गंगा विविध रूप सँ समलंकृत भेल अछि। स्वातन्त्रोत्तर काल मे मैथिली गद्य-साहित्यक विकास विभिन्न विधा यथा उपन्यास, कहानी, निबन्ध, आलोचना, यात्रा, संस्मरण, साक्षात्कार आदि गद्यक संभावित विधादिक विकास मे एकर बहुमूल्य योगदान रहल। प्रथम विश्वयुद्ध क पश्चात् मैथिली पत्रिकादिक प्रकाशन मे तीव्रताक संचार भेल। एहि कालावधि मे अनेक पत्रिकादि प्रकाशित भेल जे साहित्यिक जागरण मे सहयोग दैत रहल। ई पत्रिकादि मातृभाषाक प्रति जे शिक्षित जनमानसक घ्यान आकृष्ट होइत रहल जकर प्रतिफल तँ एकरा अवश्ये कहब। मैथिल प्रभा (1920-192, मैथिली प्रभाकर (1929-1930), श्री मैथिली (1925-1927), मिथिला (1929-1931), मिथिलामिश्र (1931-1932), मैथिल बन्धु (1935), मैथिलयुवक (1931-1941), जीवन-प्रभा (1940-1950), भारती (1937), विभूति (1936-1938), मैथिली साहित्यपत्र (1937-1938) आदि अनेक पत्रिकादि साहित्यक जागरण मे सहयोग दैत रहल अछि।
देशक स्वाधीनताक पश्चात् तँ मातृभाषादिक महत्व आर वेशी बढि गेल अछि। जनसाधारणक घ्यान मातृभाषाक दिस गेल आ सचेष्ट एवं जागरूक भ’ कए एकर विकास मे संलग्न भेलाह। स्वतंत्रताक प्रभात मे स्वदेश (1948) क अभ्युदय भेल। पटना सँ मिथिला ज्योति (1949) प्रकाशित भेल। सीतामढी सँ वैदेही (1950) प्रकट भेल। मातृभाषाक एहि नवोत्थाान मे मिथिला दर्शन (1952), पल्लव (1क948), मिथिला सेवक (1954), निर्माण (1955), इजोत (1960), मिथिला दूत (1954), बटुक (1949) घीयापूता (1957), कर्णामृत (1981), अन्तिका (1998), पूर्वातर मैथिल (2000) एवं घर बाहर (2001) इत्यादि सब पत्रिकादिक योगदान अछि।
(अगिला अंकमे जारी)