1. सुभाषचन्द्र यादवजीक कथा संग्रह -बनैत-बिगड़ैत- विवेचना- डॊ. कैलाश कुमार मिश्र
श्री सुभाषचन्द्र यादव केर कथा-संकलन आद्योपान्त पढ़लहुँ लेखक महोदय अपन भावनाक बेवाक प्रस्तुत करबाक नीक प्रयास केने छथि। कथा पढ़ब तँ लागत जे केना एकटा निम्न-मध्यम- वर्गीय परिवारमे बढ़ल-पलल एक पढ़ल-लिखल मनुक्ख अपन जीवनक घटना, अनुभव आ सम्वेदनाक वर्णन अक्षरश: कऽ रहल अछि । परम्पराक नीक चिन्हसॅं लेखक अपना-आपकेँ जोड़ने छथि आ परम्पराक विद्रोह करबामे कखनो नहि हिचकिचाइत छथि। गाम, घर, परम्परा, परिवेश, खेत, खरिहान, गाम-घर, सौन्दर्य, यात्रा-वृतान्त आदिक वर्णन सोहनगर लगैत अछि।
सुभाषजीक कथा-संग्रहपर हमरा जनैत दू दृष्टिकोणसँ विवेचित कएल जा सकैत अछि:
(क) भाषा विन्यास आ शब्दावलीक दृष्टिकोणसँ:
(ख) कथा-वस्तुक दृष्टिकोण सँ।
आब उपर-लिखित दृष्टिकोण पर विचार करी: भाषा विन्यास आ शब्दावलीक दृष्टिकोणसँ कथाकार बड्ड प्रशंसनीय कार्य केलन्हि अछि। प्रकाशक सेहो एहि तरहक रचनाकेँ प्रकाशित कय एक नीक परम्पराक प्रारम्भ केलन्हि अछि।
मैथिली भाषाक सबसँ पैघ समस्या एकटा मानवविज्ञानक छात्र हेबाक नाते ई बुझना जाइत अछि जे जखन ई भाषा लिखल जाइत अछि तँ किछु तथाकथित संस्कृतनिष्ठ ब्राह्मण एवं कायस्थ लोकनिक हाथक खेलौना बनि रहि जाइत अछि। अनेरे संस्कृत शब्दकेँ घुसा-धुसा भाषाकेँ दुरूह बना देल जाइत अछि। छोट जाति एवं सर्वहाराक शब्द विन्यास, व्यवहार आदिकेँ नजरअंदाज कऽ परम्परा सँ कटि जाइत अछि। सर्वहारा वर्ग सँ कटि स्त्रीगण आदि अपना-आप केँ भाषाक ताग सँ बान्हल नहि बुझैत छथि। भाषाक प्रति लोकक सिनेह कम भऽ जाइत छन्हि। बाजब परम्परा सँ ई लोकनि अपन नाता समाप्त क लैत छथि ।
मैथिली भाषाक समस्या केवल जाति अथवा समुदाय मात्र सँ नहि अछि । विभिन्न सांस्कृतिक एवं भौगोलिक क्षेत्रक हिसाबे सेहो लोक भाषा केँ ऊँच-नीच बुझैत छथि। सौराठ (मधुबनी) एवं सौराठ गामक लोकक द्वारा प्रयुक्त मैथिली केँ सर्वाधिक नीक आ शेष लोक द्वारा प्रयुक्त मैथिलीकेँ निम्न श्रेणीक मैथिली बुझल ज्ञाइत अछि। दक्षिणमे जे मैथिली बाजल ज्ञाइत अछि तकरा पंचकोसीक लोक दछिनाहा, पूबमे व्यवहरित मैथिली केँ पुबहा एवं पच्छिम विशेषरूपसॅं सीतामढ़ीमे प्रयुक्त मैथिलीकेँ पच्छिमाहा भाषा कहि ओकर अपमान करैत छथि ।
एहि सब कारणेँ मुसलमान, तेली, सूरी, यादब, बनिया, कोईटी, धानुख आदि मैथिली भाषा बाजय बला एहेन बुझाइ छन्हि जेना ओ लोकनि भाषाक मुख्यधारा सॅं अलग-थलग होथि । लोकविध अथवा फॉकलोर एतेक सम्पन्न होइतो स्थान बनाबएमे मिथिला एखन धरि असमर्थ रहल अछि।
नामकरणक उदाहरण अगर ली तँ बुझायत जेना ब्राह्मण एवं कायस्थ लोकनि संस्कृत निष्ठ नामक प्रयोग करबाक पूरा ठेका लऽ लेने छथि। जखन की पंजाबी भाषाक उदाहरण बहुत उल्टा अछि। पंजाबी भाषा मे नाम निर्धारित होइत अछि। गुरू ग्रन्थसाहेब एखनहुँ धरि ‘गुरग्रन्थ साहेब’ कहल ज्ञाइत अछि। स्मरण सिमरन थीक। की स्त्री की पुरूष, की छोट की पैघ जातिक सभ अपना आपकेँ भाषा, संस्कार आ संस्कृति सँ जुड़ल बुझैत अछि। सब भाषाकेँ अपन हृदयसँ सटेने रहैत अछि।
अतेक सम्पन्न फॉकलोर रहितहुँ मिथिलाक फाकलोर पर विशेष कार्य नहि भऽ रहल अछि। सुभाषजीक कथा-संग्रह एकटा उल्लेखनीय कदम थीक। एक तँ सुभाषजी पंचकोसिया नहि छथि; या दोसर ई ब्राह्मण अथवा कर्ण कायस्थ सेहो नहि छथि। लेकिन अपन परिवेशक प्रयुक्त शब्द, वाक्य फकरा, नाम आदिक वर्णन ताहि रूपमे कएने छथि । किताबक सभ पन्ना पढि लेलाक बाद अपन ढेठ गाम, गामक परिवेश इत्यादि स्मरण होबए लागत। लोकमे प्रयुक्त खांटी देसी नाम जेना कि मुनियां, कुसेसर, उपिया, अखिलन, बिहारी, बौकू , सिबननन, समसरन रघुनी, नट्टा, नथुनी, बैजनाथ, संकुन आदि पाठक केँ एकाएक गामक ठेठ परिवेशमे मानसिक रूप सॅं लऽ जाइत अछि भाषा सेहो एकदम देसी। कोनो बनाबटीपन नहि। जेना सुभाषजी क्षेत्रक लोक बजैत अछि, तहिना ई लिखलन्हि अछि।
एहि तरहक यथार्थवादी परम्पराक प्रारम्भ केला सँ मैथिली सम्पन्न हैत। वेराइटी बनतैक। पाठकक सख्या बढ़त। अनेरे संस्कृतनिष्ठ बनि जेबाक कारण मैथिलीमे पाठकक संख्या लगभग शून्य जकाँ अछि। स्थिति ई अछि जे लेखक एवं कवि लोकनि स्वयं किताब छपा मुफ्त बाँटैत छथि। तैयो कियो पढ़यवला नहि। वेबक विकासक कारणेँ किछु प्रवासी एवं मिथिला सँ बाहर रहनिहार मैथिल आइ काल्हि किछु सामग्री केँ सर्फ कए देखि लैत छथि। हालांकि इहो लोकनि सभ सामग्री मैथिली मे पढ़ैत नहि छथि। हिनका सबमे अधिकाधिक लोक अपन काज अंग्रेजीजीमे व्यक्त करैत छथि।
सुभाषजी जकां अगर आरो लेखक, कवि इत्यादि आगु आबथि यथार्थवादी परम्पराक शुरुआत हैत। मैथिली मे नव-नव शब्दावली विकसित हैत, सब क्षेत्र सम्प्रदाय, जाति, वर्गक लोक मैथिलीक संग सिनेह करताह। मैथिली पढ़बाक प्रति जाग्रत हेताह। कोसी, कमला, जीबछ, करेत, गंडक, बूढ़ी गंडक आ गंगाक बीच संगम हैत। मैथिली किछु विशेष लोकक हाथक खेलौनाना सँ ऊपर उठि सर्वहाराक भाषा बनत।
आब सुभाषजीक कथा-संग्रहक कथा-वस्तु पर कनी विचार करी । कथा-वस्तुक दृष्टिएँ सेहो लेखक अपन परिवेश सँ बान्हल छथि। कथा सम मे लेखक केँ परम्पराक नीक तत्वक प्रति सिनेह, पाखण्डक प्रति विद्रोह एक निम्नमध्यम वर्गक बेरोजगार शिक्षित युवक केर सुन्दर नायिकाक प्रति आकर्षण, कोसीक कहर, गाममे परिवर्तन केर प्रवाह, गामक समूचा यात्रा- वृतान्त, मोनक अन्तर्द्वन्द , सुन्दरताक प्रति मृगतृष्णा आदिक मनोवैज्ञानिक आ सहज वर्णन भेटत।
’’ बनैत बिगड़तैत’’ कथा मे माय-बापक मनोदशा जकर संतान बाहर रहैत छैक, नीक जकाँ कैल गेल छैक। कथाक मुख्यपात्र माला टाहि-टाहि करैत कौवाक आवाज सँ डरैत अछि। ओकरा हरकाक दैत उड़बए चाहैत छैक। लेकिन ‘ ओ थपड़ी सँ नै उड़ै छै तऽ माला कार कौवा के सरापय लागै छै — बज्जर खसौ, भागबो ने करै छै”।
परदेस मे रहि रहल संतान सबहिक प्रति मालाक मनोदशा लेखक किछु एना लिखैत छथि।
कौवा कखनियों सॅं ने काँव-काँव के टाहि लगेने छै। कौवाक टाहि सँ मालाक कलेजा धक सिन उठै छै, संतान सब परदेस रहै छै। नै जानि ककरा की भेलैक । ने चिट्ठी-पतरी दै छै ने कहियो खोज-पुछारि करै छै। कते दिन भऽ गेलै। कुशल समाचार लय जी औनाइत रहै छै। लेकिन ओकरा सब लेखे धन सन। माप-बाप मरलै की जीलै तै सँ कोनो मतलब नै।
’’ हे भगवान, तूहीं रच्छा करिहऽ । हाहा हाहा’’— माला कौवा संगे मनक शंका आ बलाय भगाबऽ चाहै छै।‘’
आ माला के बात पर हमरा जनैत लेखक सत्तोंक माध्यम सँ अपन विस्मय व्यक्त करैत छथि। मायक मनोविज्ञानक तहमे जयबाक प्रयत्न करैत छथि:
माला सब बेर अहिना करै छै1 सत्तो लाख बुझेलक बात जाइते नै छै। कतेक मामला मे तऽ सत्तो टोकितो नहि छैक । कोय परदेस जाय लागल तऽ माला लोटा मे पानि भरि देहरी पर राखि देलक। जाय काल कोय छीक देलक तऽ गेनिहार केँ कनी काल रोकने रहल। अइ सब सँ माला केँ संतोख होइ छै, तैं सन्तो नै टोकै छै। ओकरा होइ छै टोकला सँ की फैदा ? ई सब तऽ मालाक खून मे मिल गेल छै। संस्कार बनि गेल छै।
सत्तो केँ छगुन्ता होइ छै। यैह माला कहियों अपन बेटा-पुतौह आ पोती सँ तंग भऽ कऽ चाहैत रहै जे ओ सब कखैन ने चैल जाय। रटना लागल रहै जे मोटरी नीक, बच्चा नै नीक। सैह माला अखैन संतान खातिर कते चिंतित छै।‘’
अही तरहें लेखक अपन खिस्सा ‘कनियाँ पुतरा” मे लड़कीक निश्छल व्यवहार सँ आत्मविभोर भय, लड़की सँ एहेन सम्बन्ध बना लैत छथि जेना ओ लड़कीक माय अथवा पिता होथि। ट्रेनक भीर भरल बोगी मे ठाढि लड़कीक छाती जखन कथाक सुत्रधारक हाथ सँ सटैत बुझना जैत छैक जेना ‘ऊ ककरो आन संगे नै बाप— दादा या भाय-बहीन सॅं सटल हो।‘
लड़कीक भविष्य पर लेखक द्रवित होइत सूत्रधारक माध्यम सँ सोचए लगैत छथि:
ओकर जोबन फुइट रहल छै। ओकरा दिस ताकैत हम कल्पना कऽ रहल छी । अइ लड़कीक अनमोल जोबनक की हेतै ? सीता बनत की दरोपदी ? ओकरा के बचेतै ? हमरा राबन आ दुरजोधनक आशंका घेरने जा रहल ऐछ। ‘’
‘ओ लड़की’ नामक कथामे सुभाष बाबू निम्नवर्गीय दब्बूपनीक मनोदशाक वर्णन करैत छथि। जखन एक आधुनिका अपन हाथक कप ओहि कथाक पात्र नवीन केँ थमा दैत छैक तँ सूत्रधार बाजि उठैत भछि : ‘’सवाल खतम होइते नवीनक नजरि लड़कीक चेहरा सॅं उतरि कऽ ओकर हाथ आ कप पर चलि गेलै आ ओ अपमान सॅं तिलमिला गेल। ओकरा भीतर क्रोध आ घृणाक धधरा उठलै। की ओ ओहि दुनूक अँइठ कप ल’ जाएत ? लड़कीक नेत बुझिते ओ जवाब देलकै— ‘नो’। ओकर आवाज बहुत तेज आ कड़ा रहै आ मुँह लाल भ’ गेल रहै। ओकरा ओहि बातक खौंझ हुअए लगलै, ओकर जवाब एहन गुलगुल आ पिलपिल किए भ’ गेलै। ओ कियैक नहि कहि सकलै— हाउ यू डेयर ? तोहर ई मजाल। मुदा ओ कहि नहि सकलै। साइत निम्नवर्गीय दब्बूपनी आ संस्कार ओकरा रोकि लेलकै।‘’
(अगिला अकमे जारी)
मूल विदेह अंक / Original issue
Videha Digital Research Archives — preserved releases
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